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मुख्य मन्त्री को न्यौता दिया और कहा - ‘आइयेगा नहीं ।’


ये हैं बी डी और नीलू। बी डी याने बाबूदासजी बैरागी। मेरे बहनोई। और नीलू याने मेरी इकलौती छोटी बहन। बी डी की जीवन संगिनी। बी डी और मैं कक्षापाठी भी हैं। 10 मई को इनके विवाह के 53वीं वर्ष गाँठ थी।

नीलू के विवाह से जुड़ी एक ऐसी रोचक घटना है जिसका इन दोनों से कहीं, कोई सम्बन्ध नहीं। किन्तु, यदि इनके विवाह का प्रसंग नहीं होता तो यह रोचक घटना भी नहीं होती।

इन दोनों का विवाह 10 मई 1968 को मनासा में सम्पन्न हुआ था। उस समय मध्य प्रदेश में संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकार थी। श्री गोविन्द नारायण सिंह मुख्य मन्त्री थे और श्रीमती विजया राजे सिन्धिया संविद की नेता। दादा प्रतिपक्ष के विधायक थे। श्रीमती सिन्धिया संविद सरकार की जननि थीं। उन्हीं की प्रेरणा और प्रोत्साहन से गो. ना. सिंह सहित 35/36 काँग्रेसी विधायकों ने दलबदल कर द्वारिका प्रसादजी मिश्रा की काँग्रेसी सरकार गिराई थी।

सरकार बन तो गई थी किन्तु बहुत जल्दी श्रीमती सिन्धिया और गो. ना. सिंह में मनमुटाव की स्थिति बन गई। गो. ना. सिंह श्रीमती सिन्धिया को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। यदि श्रीमती सिन्धिया उनसे मिलने के लिए भोपाल से, हवाई जहाज से दिल्ली के लिये निकलतीं तो गो. ना. सिंह श्रीमती सिन्धिया के दिल्ली पहुँचते-पहुँचते,  दिल्ली से भोपाल के लिए रेल से निकल जाते। श्रीमती सिन्धिया रेल से भोपाल के लिए निकलतीं तो गो. ना. सिंह, श्रीमती सिन्धिया के भोपाल पहुँचने से पहले ही हवाई जहाज से दिल्ली के लिए निकल जाते।

संविद नेत्री और मुख्य मन्त्री की इसी लुका-छुपी के दौर में नीलू की शादी का न्यौता देने के लिए दादा ने गो. ना. सिंह को फोन किया। दादा का न्यौता सुनते ही गो. ना. सिंह बोले - ‘यार! बैरागी! मैं पूरी तरह से फुरसत में हूँ। मैं मनासा आऊँगा। ठीक-ठीक तारीख और वक्त बता दे। मैं उस मुताबिक पहुँच जाऊँगा।’ 

जवाब सुनकर दादा घबरा गए। सरस्वती-पुत्र की जबान लड़खड़ा गई। दादा ने हकलाते हुए जवाब दिया - ‘ठाकुर सा’ब! पता नहीं आप क्या समझेंगे। मैंने आपको न्यौता जरूर दिया है। लेकिन आप आ मत जाना। मैंने तो शिष्टाचारवश ही न्यौता दिया है। आप भी इसे शिष्टाचार तक ही रखिए। आप तो पत्र से ही बच्चों को आशीर्वाद दे दीजिएगा।’ 

गो. ना. सिंह को लगा, दादा मजाक कर रहे हैं। बोले - ‘मजाक मत कर! मुझे भोपाल से निकलने का और राजमाताजी से बचने का बढ़िया बहाना और मौका मिल रहा है। तारीख और वक्त बता।’ दादा की घबराहट बढ़ गई। बोले - ‘मैं आपसे भला मजाक कर सकता हूँ ठाकुर सा’ब? मैं सच कह रहा हूँ, आप मत पधारिएगा। आपकी बड़ी कृपा होगी।’ गो. ना. सिंह ने बुरा नहीं माना। सहजता से बोले - ‘ठीक है। तू कहता है तो नहीं आऊँगा। लेकिन यह तो बता दे कविराज कि न्यौता देकर आने से रोक क्यों रहा है?’ 

गो. ना. सिंह के सहज स्वरों ने दादा को राहत दी। लम्बी साँस लेकर बोले - ‘और तो कोई बात नहीं ठाकुर सा’ब। बात यही है कि आप अकले तो आएँगे नहीं! कमिश्नर, डीआईजी, कलेक्टर, एस पी, पूरा अमला आएगा। भगदड़ मच जाएगी। सब लोग आप पर टूट पड़ेंगे। मेरी बहन की शादी एक तरफ धरी रह जाएगी। लग्न-मुहूरत चूक जाएगा। आपके आने से शोभा तो बढ़ेगी लेकिन ब्याह का मण्डप खलिहान बन जाएगा। इसीलिए आपको मना करने की धृष्टता कर रहा हूँ। हाथ जोड़ कर कह रहा हूँ, आप मत पधारिएगा।’

दादा की बात सुनकर गो. ना. सिंह हँस दिए। बोले - ‘हाँ कविराज! तेरी बात तो सही है। यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। ठीक है। नहीं आऊँगा। तू अपनी बहन की शादी ठाठ से, खूब धूम-धाम से कर। किसी बात की तकलीफ मत देखना। मेरे जैसा कोई काम हो तो खबर कर देना।’ दादा ने धन्यवाद देते हुए कहा - ‘आपके जैसा काम आपको बता दिया और आपने हाथों-हाथ कर भी दिया। बड़ी कृपा है आपकी। इसी तरह मेरी चिन्ता और देख-रेख करते रहिएगा।’

और गो. ना. सिंह ने अपना वादा निभाया। हाँ, उन्होंने उज्जैन कमिश्नर और मन्दसौर कलेक्टर को जरूर हिदायत दी - ‘देखना! कविराज को कोई तकलीफ न हो।’ दोनों अफसरों ने दादा को अलग-अलग यह हिदायत सुनाते हुए पूछा - ‘सर! हुकुम करें।’ सुनकर दादा एक बार फिर परेशान हो गए। दोनों को एक ही जवाब दिया - ‘मनासा मेरा गाँव है। इसीने मुझे पाला-पोसा है। गाँववाले ही सब काम कर रहे हैं। मुझे कोई काम करने ही नहीं दे रहे।  आपकी कृपा है। बस! आप भी वही कृपा कीजिएगा जिसकी माँग मैंने ठाकुर सा’ब से की है।’ कमिश्नर तो हँसते हुए मान गए लेकिन कलेक्टर नहीं माने। हँसते हुए बोले - ‘क्षमा करें सर! मेरे जिले का मामला है। मुझे तो आना ही है। मैं तो आऊँगा।’

इस किस्से की जानकारी नीलू-बी डी को अब तक तो नहीं ही रही होगी। यह पोस्ट पढ़कर अब हो जाएगी। लेकिन हर बरस, नीलू-बी डी की विवाह वर्ष गाँठ के साथ, इस रोचक घटना की भी वर्ष-गाँठ मैं मना लेता हूँ।

उम्र में नीलू मुझसे बहुत छोटी है लेकिन घर-गृहस्थी के मामले में मुझसे सात बरस नौ महीने अधिक अनुभवी है। नीलू-बी डी को बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभ-कामनाएँ। सपरिवार स्वस्थ-प्रसन्न, सकुशल रहो। खूब खुश रहो।

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(यह पोस्ट 10 मई 2021 को फेस बुक पर दी गई थी। ब्लॉग पर इसलिए 
दे रहा हूँ कि कायम रहे और आसानी से तलाशी जा सके।)

जन्म दिन का जश्न न मनने की खुशी

मुकेश इस समय मेरे सामने होता तो शाल-श्रीफल से उसे सम्मानित कर देता।

मेरी ससुराल, इन्दौर-उज्जैन के बीच, सावेर में है। मुकेश मेरा सबसे छोटा साला है। शासकीय विद्यालय में अध्यापक है। रहता तो सावेर में है किन्तु इन्दौर में भी मकान बना लिया है। उसका बड़ा बेटा नन्दन इन्दौर में ही  नौकरी करता है। मुकेश और मेरी सलहज मंजू प्रायः प्रति शनिवार शाम को इन्दौर आ जाते हैं।

आज, रविवार 26 फरवरी, मुकेश-मंजू के छोटे बेटे तन्मय की जन्म तारीख है। इस शनिवार मुकेश-मंजू इन्दौर आए तो तन्मय को भी साथ लेते आए - इस शुभ-विचार से कि पूरा परिवार एक साथ तन्मय का जन्म दिन मना लेगा। मेरे सास-ससुरजी भी इन्दौर ही रहते हैं। हमारा छोटा बेटा तथागत भी इन्दौर में ही नौकरी कर रहा है। 

मुकेश स्वभावतः पारम्परिक और सुविधानुसार प्रगतिशील है। घर का सबसे छोटा बेटा होने से कुछ विशेषाधिकार उसे स्वतः प्राप्त हैं जिनके चलते कभी-कभी मुझे भी, बिना असम्मान बरते, ‘सद्भावना और सदाशयतापूर्वक’ हड़का देता है। 

तो, इन दिनों जैसा कि चलन बन गया है, बच्चों ने, 25 और 26 फरवरी की सेतु रात्रि की बारह बजे, तन्मय के जन्म दिन का केक काटना और जश्न मनाना तय कर तदनुसार साज-ओ-सामान जुटा लिए। 

आधी रात में जन्म दिन मनाना मुझे आज तक न तो सुहाया न ही समझ में आया। आधी रात में तारीख बदलना मुझे एक ‘व्यवस्था’ लगती है, (प्रमुखतः यात्रा टिकिटों के आरक्षण को लेकर) संस्कृति और परम्परा नहीं। किन्तु सम्भवतः, 31 दिसम्बर की आधी रात को नए साल के आगमन का जश्न मनाने से यह व्यवस्था, परम्परा का रूप लेती हुई संस्कृति बन गई। आधुनिक और प्रगतिशील होने का दिखावा करने की होड़ में हम भारतीय ‘अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेज’ हो गए और भूल गए कि हम ‘उदय तिथि’ वाले लोग हैं। हमारा दिन सूर्योदय से प्रारम्भ होता है। इसीलिए, आधी रात में जन्म दिन वर्ष गाँठ का उत्सव मनाना आज तक मेरे गले नहीं उतर पाया है। बहुत पहले मैं ऐसा करने से रोकने की कोशिश करता था किन्तु एक बार भी सफल नहीं हो पाया। बच्चों के माँ-बाप मुझसे सहमत होते और बच्चों के सामने हथियार डाल, मेरे सामने झेंपते। जल्दी ही मुझे अकल आ गई और भारतीय संस्कृति को बचाने का यह महान् काम मैंने बन्द कर दिया। लेकिन दुःखी तो होता ही हूँ। ऐसे में, ऐसे उपक्रमों की खिल्ली उड़ाकर अपनी भड़ास निकाल लेता हूँ और खुश होकर अपनी पीठ थपथपा लेता हूँ।

आज सुबह, अपने प्रिय भतीजे को शुभाशीष और शुभ-कामनाएँ देने से पहले मेरी उत्तमार्द्ध ने, जश्न के हालचाल जाने के लिए तथागत को फोन लगाया। तथागत ने जवाब दिया - कौन सा जश्न मम्मी? कोई जश्न-वश्न नहीं हुआ। मामाजी को मालूम हुआ तो उन्होंने डाँट दिया। बोले - ‘ये क्या उल्लूपना है? कोई कहाँ से आएगा और कोई कहाँ से। आधी रात में आते-जाते कहीं कुछ हो गया तो मुँह काला हो जाएगा। लेने के देने पड़ जाएँगे। चुपचाप सो जाओ। जो भी करना हो, सुबह करना।’ इसलिए हमारा तो सारा जश्न धरा का धरा रह गया मम्मी। 

‘उदय तिथि’ वाले मुद्दे पर उत्तमार्द्धजी भी मेरी पार्टी में हैं। सो, तथागत का जवाब सुनकर हँस-हँस कर दोहरी हो गई। इसी दशा में, बड़ी मुश्किल से मुझे सारी बात बताई।  हँसी तो मुझे भी आई किन्तु खुशी ज्यादा हुई। नहीं जान पाया (न ही जानना चाहा) कि मुकेश ने यह सब मानसिकता के अधीन किया या व्यावहारिकता के अधीन। किन्तु बात मेरे मन की थी। मेरी तबीयत खुश हो गई।  मैंने फौरन ही मुकेश को फोन लगाया और इस ‘नेक काम’ के लिए खूब प्रशंसा की और बधाइयाँ दी। मेरी मनःस्थिति और बधाई देने का कारण जान कर मुकेश भी खूब खुश हुआ और हँसा। मैंने कहा - ‘फटाफट तुम चारों का फोटू भेजो।’ उसने पूछा - ‘क्या करोगे जीजाजी?’ मैंने कहा - ‘क्या करूँगा? अरे भई! तेने वो काम किया जो मैं चाहता हूँ कि सब करें। तू मेरे सामने होता तिलक लगा कर शाल-श्रीफल से तेरा सम्मान कर देता। मुझसे खुश समेटी नहीं जा रही। अपनी खुशी बाँटूँगा। उसी के लिए फोटू चाहिए। फटाफट भेज।’

मुकेश ने अभी ही फोटू भेजा और उतनी ही फुर्ती से मैं अपनी खुशी का विस्तार कर रहा हूँ।

नेक काम में भला देर क्यों?
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(चित्र में बॉंये  से तन्‍मय, मुकेश, मंजू और नन्‍दन)