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सरोकार से दूर हमारा मीडिया

(मेरी यह टिप्पणी ‘जनसत्ता’ के 19 जनवरी 2014 के अंक में ‘प्रतिक्रिया’ स्तम्भ के अन्तर्गत प्रकाशित हुई थी। आज अचानक सामने आई। इसे पढा तो इसकी प्रासंगिकता जस की तस अनुभव हुई। कोई जरूरी नहीं कि आपको भी ऐसा ही लगे। इसमें दो-एक वाक्यों का सम्पादन कर दिया गया है। जनसत्ता में टिप्पणी का शीर्षक ‘सरोकार से दूर’ दिया गया था। यहाँ मैंने इसमें ‘हमारा मीडिया’ और जोड़ दिया है। यह टिप्पणी प्रकाशन के समय मोदी भारत के प्रधान मन्त्री नहीं बने थे।)

मीडिया अपनी भूमिका भूला भले न हो, पर अपनी दिशा से भटक गया लगता है। इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैैनलों के बीच गलाकाट कारोबारी होड़ के चलते हर कोई ‘नम्बर एक’ बनने की जुगत में भिड़ा हुआ है। ‘लोगों के साथ जो हो रहा है’ उसे तो सामने लाया ही जाना चाहिए, पर ‘लोगों को कैसा होना चाहिए’ - इस तकाजे को भी नहीं भूला जाना चाहिए।

साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो मीडिया इससे तनिक आगे बढ़ कर समाज को दिशा देने वाला बल्कि समाज को आकार देने वाला होता है। लेकिन हमारा मीडिया ‘समाज निर्माता’ की अपनी इस भूमिका (बल्कि ‘जिम्मेदरी’) को बिलकुल भूल गया लगता है। ‘जो हो रहा है’ से परे हट कर आज वही कहा-दिखाया जा रहा है,

जो लोगों को अच्छा लगता है या जो लोग सुनना-देखना चाहते हैं। इसी के चलते हमारा मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, मद्रासी फार्मूले वाला मुम्बइया सिनेमा बनने को उतावला नजर आ रहा है।

पूरा देश आज काँग्रेस और उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के प्रति घृणा-भाव से उफन रहा है। मोदी इस घृणा-भाव का प्रकटीकरण लोक-लुभावन अन्दाज में करते हैं। जो लोगों के मन में है, वही सब चाशनी में तर करके बोलते हैं। लोगों को अच्छा लगता ही है। यही  ‘लोगों को अच्छा लगना’ हमारे मीडिया की प्राण-वायु और लक्ष्य बन गया है। इसी के चलते किसी भी काँग्रेसी की, और इन दिनों तो किसी ‘आप’ वाले की भी, कही बात का बतंगड़ बनाना, मीडिया का न केवल स्वाभाविक काम, बल्कि लगता है, जिम्मेदारी भी बन गया है।

इसके ठीक विपरीत, मोदी की कही अनेक अनुचित और असत्य बातों की ओर से आँखें मूँद ली जाती हैं। एक ओर चिन्दी का थान बना लिया जाता है और दूसरी ओर पहाड़ भी नजर नहीं आता। और तो और, कोई यह भी पूछना नहीं चाहता कि सारी दुनिया में खोट बता रहे, सबको भ्रष्ट घोषित कर रहे मोदी के पास अपना कार्यक्रम, अपनी आर्थिक नीतियाँ क्या हैं? क्या परनिन्दा ही उनका एजेण्डा है?

दरअसल, मीडिया आज शुद्ध व्यापारी की भूमिका में आ गया लग रहा है। किसी जमाने में अखबारों के मालिक केवल अखबार चलाया करते थे। अखबार ही उनका एकमात्र व्यापार होता था। तब

उन्हें अपने अखबार की विश्वसनीयता और साख की चिन्ता होती थी। आज स्थिति बदल गई है। अब कारपोरेट घरानों ने मीडिया पर कब्जा

कर लिया है। वे अपने दूसरे उद्योग-धन्धों को बचाने और उन्हें बढ़ाने में मीडिया का उपयोग करने लगे हैं। पत्रकारिता की नैतिकता और

ऊँचे मापदण्ड इनके लिए फिजूल की बातें हो गई हैं। अपने धन-बल पर इन्हें इतना अधिक विश्वास है कि ‘लोग कया कह रहे हैं’ को पीछे छोड़ कर ये ‘लोग क्या कहें और क्या सोचें’ यह तय करने लगे हैं। आज तो टीआरपी और मुनाफा मीडिया संस्थानों का एकमात्र लक्ष्य हो गया है। यही कारण है कि चुनावों की आहट होते ही कई नए चैनल बाजार में उतर आते हैं।

आज मीडिया वही कहता-बताता है, जिसे कहने-बताने में उसे कोई जोखिम मोल नहीं लेना पड़ता या जिसका उसे प्रत्यक्ष लाभ मिलने की गुंजाइश रहती है। यह सावधानी बरतने में वह गैर-वाजिब बातों को भी प्रश्रय देने लगता है। मसलन, मोटर साइकिल पर तीन लोगांे का एक साथ सवारी करना वर्जित है, पर तीन लोगों को बिठा कर ले जा रही मोटर साइकिल अगर किसी बड़े वाहन से टकरा जाए तो वहाँ बड़े वाहन वाला ही जिम्मेदार और दोषी करार दिया जाता है। कोई भी, एक बार भी नहीं कहता कि मोटर साइकिल चालक ने भी तीन लोगों को बिठा कर गलती की थी।

नागरिकता बोध विकसित करने की अपनी जिम्मेदारी हमारा मीडिया पूरी तरह भूल चुका है। अतिक्रमण प्रत्येक कस्बे-नगर और वहाँ के प्रशासन के लिए बहुत बड़ी समस्या है। अतिक्रमणों को चिह्नित करते हुए मीडिया पहले तो प्रशासन की अकर्मण्यता के समाचार छापता-दिखाता है, लेकिन जब भी अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया जाता है तो समूचा मीडिया अतिक्रमण करने वालों के पक्ष में उतर आता है। किसी का नाम मतदाता सूची में न होने पर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन जब भी निर्वाचन नामावलियों के सुधार का काम चल रहा होता है तो मीडिया इस बारे में किसी को न तो बताता है और न ही लोगों के अपने नाम जुड़वाने-जँचवाने के लिए कोई अभियान चलाता है। ऐसा वह तभी करता है जब निर्वाचन आयोग उसे विज्ञापन जारी करता है। यानी जहाँ उसका लाभ है, वहीं उसके जनसरोकार भी उजागर होते हैं।

दरअसल, हमारा मीडिया मनममानी पर उतर आया जान पड़ता है। उचित-अनुचित का अन्तर करना, अनुचित को निरस्त और उचित को प्रोत्साहित करने का आह्वान करना, नागरिकता बोध विकसित करने जैसी मूलभूत बातें हमारे मीडिया की चिन्ता और प्राथमिकता सूची में कहीं नजर नहीं आतीं।

इसी के चलते मोदी और उनके तमाम समर्थको की गैर-वाजिब बातों की अनदेखी की जा रही है। हमारा मीडिया आज हवा का रुख देख कर चल रहा है और अपने कल के बचाव में लगा नजर आ रहा है। वस्तुपरक भाव की निरपेक्षता-निष्पक्षता अतीत की चीज होती जा

रही है। स्थिति यह है कि कैमरों के सामने कही अपनी बात से पलटने वाला नेता, उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगाता है और समूचा मीडिया हँसते-हँसते उसे झेल कर स्वीकार करता रहता है। ऐसा आज तक नहीं हुआ कि ऐसे झूठे आरोप लगाने वाले का बहिष्कार करने का साहस हमारे मीडिया ने किया हो।

हमारा मीडिया आज बाजार के दबावों के आगे झुकता नजर आ रहा है। देश और लोकतन्त्र के लिए इसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। मीडिया को लोगों की चिन्ता करनी चाहिए। लोग रहेंगे तभी बाजार भी रहेगा। बाजार का अस्तित्व ही लोगों पर टिका हुआ है। ऐसे में हमारे मीडिया को वस्तुपरक नजरिया अपनाना चाहिए। गलती को गलती मानना चाहिए न कि ‘इसकी गलती तो गलती’ और “उसकी गलती, गलती नहीं’ का व्यवहार किया जाए।

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पत्रकारिता के सरोकार और गाँधी -3

(इसी आलेख  को, पत्रकारिता से जुड़े अपने मित्रों को पढ़वाने के लिए मैं ‘अकार 46’ की अतिरिक्त प्रतियाँ मँगवाना चाह रहा था और पूरा मूल्य मिलने के बाद भी, यह जानकर कि मैं मुफ्त वितरण के लिए मँगवा रहा हूँ, सम्पादक प्रियम्वदजी ने प्रतियाँ  भेजने से इंकार कर दिया था। मुझे आकण्ठ विश्वास है कि इसे पसन्द किया जाएगा और सराहा भी जाएगा। आलेख मुझे ‘अकार’ से ही प्राप्त हुआ है।)  


संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों का भी वही हाल हुआ जैसा पहले प्रेस सम्बन्धी बनी समितियों, आयोगों और वेज बोर्डों की सिफारिशों का हुआ था। लिहाजा समिति ने जो आशंका व्यक्त की थी उसका परिणाम 2014 के आम चुनाव में देखने को मिला। यह बात अलग है कि आशंका व्यक्त करने वाली समिति के अध्यक्ष राव इन्द्रजीत भी उसी दल की नाव पर सवार हो गए, जिस पर 2014 के चुनाव को खरीदने का आरोप लगा। यह आम चुनाव इसलिए भी यादगार रहेगा क्योंकि यह अब तक का सबसे मँहगा चुनाव साबित हुआ। अरबों रुपए का वारा-न्यारा किया गया। पूरा चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की तरह लड़ा गया। जाहिर सी बात है कि पैसा भी उसी तरह से लगाया गया। दो साल पहले अमेरिका में हुए चुनाव पर 42,000 हजार करोड़ रुपए लगे थे, वहीं भारत के इस आम चुनाव पर अनुमानतः 31,950 करोड़ रुपये लगाए गए, जिसमें अकेले भाजपा ने ही 21,300 करोड़ रुपए खर्चे हैं। शेष राशि सभी दलों ने मिलकर खर्च की। करीब 3,350 करोड़ रुपए प्रिण्ट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया पर न्यौछावर किए गए। एक तरह से कारपोरेट और पीआर ने मिलकर चुनाव को कैप्चर कर लिया। भारतीय राजनीति में यह नया फेनोमिना था, जिसमें सब कुछ कारपोरेट और पीआर ने तय किया। यह फेनोमिना जहाँ भारतीय पत्रकारिता की कब्र खोदने का काम कर रहा है वहीं लोकतन्त्र को तहस-नहस कर देगा। अभी तक लोकतन्त्र में जनता की भूमिका अहम मानी जाती थी, लेकिन अब एमबीए डिग्रीधारी मैनेजर ही लोकतन्त्र की नींव माने जा रहे हैं। राजनीतिक दल करोड़ों-अरबों रुपए देकर जनता का मूड बदलने के लिए उन्हें हायर कर रहे हैं। वे ऐसा मानते हैं कि ये मैनेजर जनता का मूड उनके पक्ष में कर देते हैं। लोकतन्त्र की हत्या करने वाली इस परिपाटी पर शायद ही कहीं पत्रकारिता में सवाल उठें। ऐसी पत्रकारिता देखकर गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारीय नीति याद आती है। उन्होंने 1913 में साप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ निकाला था, जिसके पहले अंक में ‘प्रताप की नीति’ के बारे में बताते हुए लिखा था ‘मनुष्य की उन्नति भी सत्य की जीत के साथ बँधी है, इसलिए सत्य को दबाना हम महापाप समझेंगे और उसके प्रचार और प्रकाश को महापुण्य।.......जिस दिन हमारी आत्मा ऐसी हो जाए कि हम अपने प्यारे आदर्श से डिग जावें, जान-बूझकर असत्य के पक्षपाती बनने की बेशर्मी करें और उदारता, स्वतन्त्रता और निष्पक्षता को छोड़ देने की भीरुता दिखावें, वह दिन हमारे जीवन का सबसे अभागा दिन होगा और हम चाहते हैं कि हमारी उस नैतिक मृत्यु के साथ ही साथ हमारे जीवन का अन्त हो जाए।’ अगर गणेश शंकर विद्यार्थी की इस कसौटी पर आज की पत्रकारिता को कसा जाए तो शायद ही कोई समाचार पत्र और टीवी न्यूज चैनल खरा उतरे।

पिछले आम चुनाव में सत्ता में आने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार के शुरुआती महीनों में भारतीय दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) की मीडिया स्वामित्व व उससे जुड़े मसलों पर रिपोर्ट आई। आयोग ने खबरों के प्रकाशन और प्रसारण में स्वतन्त्रता और बहुलता सुनिश्चित करने के लिए समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में प्रवेश करने वाले राजनीतिक दलों और कारपोरेट घरानों पर पाबन्दी  की सिफारिश की। न्यूज मीडिया में शेयर बँटवारे के ढाँचे, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हितों का खुलासा करने की बात कही। आन्तरिक बहुलता से निपटने के लिए आयोग ने 2008 के एक सुझाव को दोहराते हुए कहा कि राजनीतिक, सरकारी अथवा धार्मिक इकाइयों एवं उनसे जुड़े लोगों को बाहर करना चाहिए। चौथा बिन्दु-मीडिया को कम्पनियों के नियन्त्रण से मुक्त रखना होगा। पाँचवाँ-दूरदर्शन को स्वतन्त्र और निष्पक्ष ढंग से प्रसारण करने के लिए स्वायत्त बनाना होगा। छठा-प्रिण्ट और टीवी मीडिया के लिए एक ही स्वतन्त्र नियामक (इसमें अधिकतर मीडिया जगत से बाहर के प्रमुख लोगों को रखना) की स्थापना करना, जिसे पेड न्यूज व निजी समझौतों के आधार पर खबरों के प्रकाशन व सम्पादकीय स्वतन्त्रता से जुड़े मुद्दों की जाँच करने और जुर्माना लगाने का अधिकार देने की सिफारिश की है। इस स्वतन्त्र नियामक को पेड न्यूज पर सभी पक्षों की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है। सातवाँ बिन्दु सम्पादकीय मण्डल में निजी समझौते, पेड न्यूज या विज्ञापन से जुड़े किसी भी हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध लगाना है तो आठवाँ बिन्दु राजनीतिक दलों, धार्मिक संस्थाओं, सार्वजनिक धन से चलने वाली संस्थाओं व उनकी सहायक एजेंसियों को प्रसारण और टीवी चैनल वितरण क्षेत्र में आने से रोका जाना है। साथ ही अगर किसी संगठन को पहले से मंजूरी मिली है तो उसे बाहर निकलने का विकल्प भी रखना चाहिए। लेकिन जैसी आशंका थी, मोदी सरकार ने ठीक वैसा ही किया। सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को ठण्डे बस्ते में डाल दिया। सरकार के पास इसके सिवा दूसरा विकल्प भी नहीं था, क्योंकि जिन लोगों (कारपोरेट, पीआर और मीडिया) ने सामूहिक रूप से मोदी को यहां तक पहुँचाने में अहम किरदार निभाया हो उन पर मोदी सरकार शिकंजा कसेगी, यह उम्मीद करना बेमानी है।

गाँधी ने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को दिशा देने का काम किया। जीवन के अन्तिम समय तक राजनीतिक और सामाजिक काम किए। सत्याग्रह, जुलूस से लेकर आन्दोलनों का नेतृत्व किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी पत्रकारिता को कभी किसी व्यक्ति विशेष अथवा संगठन का मोहरा नहीं बनाया। वह अपने लिखे एक-एक शब्द पर मनन करते थे। उसके सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम के बारे में सोचते थे। सच की कसौटी पर खरा उतरने वाली भाषा का इस्तेमाल करते थे। इसके साथ ही वह पाठकों को यह अधिकार देते थे कि वे समाचार पत्र पर नजर रखें कि कहीं कोई अनुचित और झूठी खबर तो नहीं छपी है। अविवेकपूर्ण भाषा का इस्तेमाल तो नहीं हुआ है। उन्होंने यहाँ तक लिखा कि ‘सम्पादक पर पाठकों का चाबुक रहना ही चाहिए, जिसका उपयोग सम्पादक के बिगड़ने पर हो।’ ऐसा लिखते हुए गाँधी एक तरह से पत्रकारिता को चोट पहुँचाने वालों को शक की नजर से देखने की वकालत करते थे। शक करने वाली उनकी सीख का मायने आज कहीं अधिक है। मौजूदा समय के जनसंचार माध्यमों में जिस तरह से खबरों के प्रकाशन और प्रसारण में पक्षपात किया जा रहा है उसे देखते हुए पाठकों और दर्शकों को हर खबर को शक की नजर से देखना होगा। उन पर आँख मूँदकर भरोसा करने के बजाय उसके आगे और पीछे के बारे में सोचना होगा। पत्रकारिता ने तथ्यों को क्रॉस चेक करने वाला सिद्धान्त लगभग बिसरा दिया है, लेकिन लोगों को ये जिम्मेदारी उठानी होगी कि वे पत्रकारिता में पेश किए जा रहे तथ्यों को क्रॉस चेक करें। तत्पश्चात अपनी राय बनाएँ। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनमें और एक अशिक्षित व्यक्ति में किसी तरह का अन्तर नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में आप वही भाषा बोलेंगे जो समाचार पत्र बोलता है और टीवी बोलता है।
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(लखनऊ में, 1-2 अक्टूबर 2016 को आयोजित दो दिवसीय ‘अहिंसा फेस्टिवल’ में दिए गए व्याख्यान का सम्पादित स्वरूप। मूल आलेख तथा सन्दर्भ सूची ‘अकार-46’ में उपलब्घ।)



अटल तिवारी - पत्रकारिता से दस-बारह वर्षों तक जुड़े रहे हैं। लखनऊ आकाशवाणी के लिए बेग़म अख़्तर पर श्रृंखला ‘कुछ नक्श मेरी याद के’ तैयार की है। आजकल दिल्ली के एक कॉलेज में पत्रकारिता पढ़ाते हैं।
सम्पर्क - मोबा.: 098683 25191
ई-मेल: atal.tewari@gmail.com








अकार - 15/269, सिविल लाइन्स, कानपुर - 208001
सम्पर्क: फोन - 0512 2305561 मोबा.:098392 15236 
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पत्रकारिता के सरोकार और गाँधी -2

(इसी आलेख  को, पत्रकारिता से जुड़े अपने मित्रों को पढ़वाने के लिए मैं ‘अकार 46’ की अतिरिक्त प्रतियाँ मँगवाना चाह रहा था और पूरा मूल्य मिलने के बाद भी, यह जानकर कि मैं मुफ्त वितरण के लिए मँगवा रहा हूँ, सम्पादक प्रियम्वदजी ने प्रतियाँ  भेजने से इंकार कर दिया था। मुझे आकण्ठ विश्वास है कि इसे पसन्द किया जाएगा और सराहा भी जाएगा। आलेख मुझे ‘अकार’ से ही प्राप्त हुआ है।)  

पत्रकारिता के सरोकार और गाँधी - 1


- अटल तिवारी -

इस तरह पत्रकारिता के लिए आपातकाल वाला दशक सबसे अधिक नुकसानदायक रहा। आपातकाल के बाद सत्ता में आने वाली जनता पार्टी सरकार के सूचना एवं प्रसारण मन्त्री लालकृष्ण आडवाणी ने अभियान चलाकर पत्रकारिता में एक खास विचारधारा के लोगों को प्रमुख पदों पर नियुक्त कराया, जिसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे समाचार पत्रों में उस खास विचारधारा के लोगों की बहुतायत हो गई। यही वजह है कि जब मण्डल के बाद कमण्डल का दौर आया तो पत्रकारिता, खासकर हिन्दी पत्रकारिता में उक्त विचारधारा वालों ने पत्रकार कम बल्कि विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और संघ के कार्यकर्ता वाली भूमिका ज्यादा निभाई। दूसरी ओर उर्दू पत्रकारिता में पत्रकारों ने पत्रकार कम बल्कि मुस्लिम लीग से जुड़े होने का परिचय अधिक दिया। इन पत्रकारों ने गाँधी की उन पंक्तियों को भी याद नहीं रखा, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अपनी निष्ठा के प्रति ईमानदारी बरतते हुए मैं दुर्भावना या क्रोध में कुछ भी नहीं लिख सकता। मैं निरर्थक नहीं लिख सकता। मैं केवल भावनाओं को भड़काने के लिए भी नहीं लिख सकता। लिखने के लिए विषयों तथा शब्दावली को चुनने में मैं हफ्तों तक जो संयम बरतता हूं, पाठक उसकी कल्पना नहीं कर सकता।’ राम मन्दिर-बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पत्रकारिता की बात लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में भी विस्तृत रूप से कही गई है। रिपोर्ट का सार है कि पत्रकारिता ने तटस्थ रूप से काम करने के बजाय लोगों को भड़काने का काम किया। एक बात ध्यान देने वाली है कि अगर किसी खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त किया जाता है तो उसका असर तत्काल नहीं बल्कि आने वाले समय में देखने को मिलता है। इसकी गवाही मन्दिर-मस्जिद विवाद के साथ ही मुम्बई, गुजरात से लेकर मुजफ्फरनगर दंगे तक में की जाने वाली पत्रकारिता से मिलती है। ऐसी पत्रकारिता करने वाले पत्रकार और सम्पादकों के लिए पराड़करजी की चन्द पंक्तियां फिट बैठती हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘यदि हममें योग्यता हो और यदि सचमुच हम कुछ देश सेवा करना चाहते हों तो हमें अपने पत्रों में सदा सर्व प्रकार से उच्च आदर्श को स्थान देना चाहिए। पत्र बेचने के लाभ से अश्लील समाचारों को महत्व देकर तथा दुराचरणमूलक अपराधों का चित्ताकर्षक वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे हैं, इस बात को कभी न भूलना चाहिए। अपराधी एकाध पर अत्याचार करके दण्ड पाता है और हम सारे समाज की रुचि बिगाड़ कर आदर पाना चाहते हैं।’ आज यही काम अधिकांश पत्रकारिता कर रही है। वह देश भक्ति के नाम पर सरकार की नीतियों की आलोचना करने वालों को कठघरे में खड़ा कर रही है। उन्हें देशद्रोही बता रही है। अश्लील समाचारों को महत्व दे रही है। अपराधियों का महिमामण्डन कर रही है। उसे नहीं पता कि गाँधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान प्रेस के सम्बन्ध में कहा था ‘राष्ट्रीय संस्थाओं और राष्ट्रीय नीतियों की ईमानदारी से आलोचना करने से राष्ट्रीय हितों को कभी नुकसान नहीं होगा।’ इतना ही नहीं नागरिकों को किसी विचार अथवा नीतियों से असहमति जताने का अधिकार सम्विधान से मिला है। इसके बावजूद मौजूदा समय में असहमति जताने वालों को कुछ ज्यादा ही निशाना बनाया जा रहा है और ऐसा करने वालों को सरकार की तरफ से भी अपरोक्ष रूप से शह मिली है।

कमण्डल के दरम्यान ही लागू की जाने वाली भूमण्डलीकरण की नीतियों ने देखते ही देखते भारतीय पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बदल दिया। समाचार पत्रों के राज्य संस्करण, जिलेवार संस्करणों में तब्दील हो गए। जिलेवार संस्करणों को भरने के लिए कुछ भी प्रकाशित किया जाने लगा। गम्भीर बातों को नजरअन्दाज करके लफंगों को महत्व दिया जाने लगा। आज स्थिति यह है कि अगर 15 से 20 लफंगे आपके बनाए बनते हैं, जो किसी भी मसले पर जिन्दाबाद-मुर्दाबाद नारे लगा सकते हों, किसी के ऊपर जूता फेंक सकते हों, किसी के चेहरे पर स्याही फेंक सकते हों, पाकिस्तान को औकात बता देने वाली भाषा बोल सकते हों तो आप किसी भी समाचार पत्र के पृष्ठ पर सुशोभित हो सकते हैं। किसी भी टीवी न्यूज चैनल के प्राइम टाइम में मेहमान हो सकते हैं। अचानक आपकी पूछ बढ़ जाती है। आप अपने में गौरवान्वित महसूसते हैं।

दूसरे प्रेस आयोग ने कहा था कि भारतीय भाषाओं, स्थानीय तथा अन्य छोटे और मध्यम समाचार पत्रों के विकास में योगदान देना जरूरी है। आयोग का मानना था कि ऐसा होने से पत्रकारिता में विविधता बनी रहेगी। मोनोपाली का खतरा नहीं होगा। लेकिन आयोग की इस सिफारिश पर किसी भी दल की सरकार ने तवज्जो नहीं दी। आज करीब 38 साल बाद आयोग की आशंका पूरी तरह सच साबित हो रही है। भारतीय पत्रकारिता में कुछ कारपोरेट घरानों का एकाधिकार हो चुका है। चन्द मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के अधिकांश क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। देश के प्रिण्ट मीडिया पर 9 बड़े मीडिया घरानों का प्रभुत्व हो चुका है। यही स्थिति इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी है। मीडिया के इस बदले परिदृश्य में एक-एक घराने के कई-कई टीवी न्यूज चैनल हैं। एफएम रेडियो स्टेशन, समाचार पत्र-पत्रिकाएँ, वेबसाइट्स हैं। वे एक तरह के मीडिया एकाधिकार के तहत काम कर रहे हैं। यानी जिस खबर को वह चमकाना चाहते हैं वह चमकती है और जिसे मिटाना चाहते हैं वह फिर कहीं नहीं ठहरती। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में पूरी तरह से मीडिया एकाधिकार के हालात पैदा हो जाएँगे।

इक्कीसवीं सदी की पत्रकारिता में पत्रकारिता और लोकतन्त्र को चोट पहुँचाने वाली अनेक घटनाएँ घटी हैं। इसमें सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाली पेड न्यूज की कुप्रवृत्ति का सामने आना है। पेड न्यूज मतलब पैसा देकर प्रकाशित/प्रसारित कराई जाने वाली प्रचार सामग्री, जिसमें पाठक और दर्शक को यह तक न बताया जाए कि उक्त सामग्री खबर नहीं बल्कि विज्ञापन है। पेड न्यूज की शिकायतें पहले से रही थीं, लेकिन 2009 के आम चुनाव में ये भयावह रूप में सामने आईं। इसकी भयावहता को हरियाणा की एक घटना से समझा जा सकता है। उस समय राज्य में काँग्रेस की सरकार थी।  भूपेन्द्र सिंह हुड्डा मुख्यमन्त्री थे। चुनाव के दौरान काँग्रेस के विरोधी दल की रोहतक में एक छोटी सभा थी। उसकी खबर एक समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर छपी, जिसमें सभा में शामिल लोगों की संख्या अनेक गुना बढ़ाकर बताई गई थी। मुख्यमन्त्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने समाचार पत्र के मालिक को फोन किया। रैली के सम्बन्ध में प्रकाशित खबर के बारे में बात की तो जवाब मिला कि वह विज्ञापन था। जिसने पैसा दिया, उसका मजमून छप गया। समाचार पत्र के मालिक का जवाब सुनकर हुड्डा सन्न रह गए। उन्होंने पूछा कि ‘पैसा देकर क्या कोई कुछ भी छपवा सकता है?’ जवाब मिला-‘बिल्कुल, सामग्री का जिम्मा उसी का होता है।’ मैंने कहा-कल के अंक में पहला पूरा पृष्ठ हमारे लिए बुक कीजिए और एक पंक्ति बड़े-बड़े हर्फों में हमारे खर्च पर छापिए कि यह समाचार पत्र झूठा है। छापेंगे न? समाचार पत्र के मालिक बोले-आप कैसी बात कर रहे हैं?’ पेड न्यूज नामक बीमारी के शुरुआती दौर में लगा था कि इक्के-दुक्के समाचार पत्र ही इसकी गिरफ्त में हैं। मगर धीरे-धीरे ऐसी शिकायतें आम हो चलीं। देखते-देखते पेड न्यूज का सिलसिला एक ओढ़ी जाने वाली बीमारी की तरह अधिकांश समाचार पत्रों और टीवी न्यूज चैनलों को घेरता चला गया। कुछ सम्पादकों और पत्रकारों ने इसके खिलाफ अभियान चलाया। प्रेस परिषद से लेकर संसद की स्थायी समिति तक ने इसका अध्ययन किया। सभी ने पेड न्यूज को भारतीय लोकतन्त्र और पत्रकारिता के लिए खतरनाक माना।

पेड न्यूज के मामले में प्रेस परिषद की जाँच रिपोर्ट पर तत्कालीन यूपीए सरकार ने मन्त्री समूह गठित किया था। समूह ने इस मसले पर विचार किया। इसके बावजूद समूह की सिफारिशों को अन्तिम रूप नहीं दिया जा सका। इतना ही नहीं यह फैसला भी लिया गया था कि पेड न्यूज सम्बन्धी मन्त्री समूह को पुनर्गठित नहीं किया जाएगा। जब भी मुद्दे को आवश्यक समझा जाए, उपयुक्त मन्त्रिमण्डल समिति/मन्त्रिमण्डल के समक्ष रखा जाएगा। इस बात पर संसद की स्थायी समिति को बताया गया चूँकि मुद्दा सम्वेदनशील है और इस पर अन्तर-मन्त्रालयी परामर्श की जरूरत है, इसलिए मन्त्रालय ने पेड न्यूज सम्बन्धी समूह को पुनर्गठित करने के लिए मन्त्रिमण्डल सचिवालय से अनुरोध किया है। इस प्रकरण पर संसद की स्थायी समिति ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘सरकार इस महत्वपूर्ण नीति की पहल पर निर्णय लेने में हिचक रही है, क्योंकि इस सम्बन्ध में आम चुनाव 2009 में ध्यान में आई कमियों पर पीसीआई (भारतीय प्रेस परिषद्/प्रेस कौंसिल ऑफ इण्डिया) द्वारा नियुक्त समिति द्वारा जुलाई 2010 में की गई सिफारिशों पर निर्णय लेने में सरकार की विफलता उजागर हुई है। अतः समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि मन्त्रालय पीसीआई (भारतीय प्रेस परिषद्/प्रेस कौंसिल ऑफ इण्डिया) की रिपोर्ट पर शीघ्र कार्रवाई करे।’ असल में पत्रकारिता को लेकर जितने भी नियम-कानून बने हैं, उनको मीडिया घराने ठेंगा दिखाते रहे हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि इन घरानों पर कानून लागू किए जाएँ। इसके लिए एक नियामक अधिकरण बने। यह संस्था बिना टालमटोल के मामलों में त्वरित फैसला ले। एक बात ध्यान रखी जाए कि नियामक अधिकरण की बात करते हुए हम मीडिया पर सरकारी हस्तक्षेप की वकालत नहीं कर रहे हैं। इसमें प्रिण्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रमुख लोगों को रखा जाए। उन्हें विषय वस्तु की जाँच करने और गलती पर चेतावनी देने फिर कार्रवाई करने का अधिकार दिया जाए। प्रेस परिषद की शक्तियों में इजाफा किया जाए। राव इन्द्रजीत की अध्यक्षता वाली समिति ने प्रेस परिषद की सिफारिशों पर फैसला न लेने के लिए सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर की थी। समिति ने प्रेस परिषद का पुनरुद्धार करने पर बल देते हुए मीडिया, विशेषकर मीडिया की आय के स्रोत को सूचना का अधिकार के अधीन एवं लोकपाल विधेयक के दायरे में लाने की बात कही थी। सबसे अहम बात यह कि पेड न्यूज के तहत होने वाले फिजूलखर्ची को रोकने के लिए आगामी आम चुनाव से पहले ठोस कदम उठाए जाएँ। अगर इसका संज्ञान नहीं लिया गया तो अगले साल होने वाले आम चुनाव में इस बीमारी के और अधिक भयावक रूप लेने की आशंका है। 
(आलेख का शेष भाग तीसरी कड़ी में)
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(लखनऊ में, 1-2 अक्टूबर 2016 को आयोजित दो दिवसीय ‘अहिंसा फेस्टिवल’ में दिए गए व्याख्यान का सम्पादित स्वरूप। मूल आलेख तथा न्दर्भ सूची ‘अकार-46’ में उपलब्घ।)





अटल तिवारी - पत्रकारिता से दस-बारह वर्षों तक जुड़े रहे हैं। लखनऊ आकाशवाणी के लिए बेग़म अख़्तर पर श्रृंखला ‘कुछ नक्श मेरी याद के’ तैयार की है। आजकल दिल्ली के एक कॉलेज में पत्रकारिता पढ़ाते हैं।
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पत्रकारिता के सरोकार और गाँधी - 1

(इसी आलेख  को, पत्रकारिता से जुड़े अपने मित्रों को पढ़वाने के लिए मैं ‘अकार 46’ की अतिरिक्त प्रतियाँ मँगवाना चाह रहा था और पूरा मूल्य मिलने के बाद भी, यह जानकर कि मैं मुफ्त वितरण के लिए मँगवा रहा हूँ, सम्पादक प्रियम्वदजी ने प्रतियाँ  भेजने से इंकार कर दिया था। मुझे आकण्ठ विश्वास है कि इसे पसन्द किया जाएगा और सराहा भी जाएगा। आलेख मुझे ‘अकार’ से ही प्राप्त हुआ है।)  


1925 में, वृन्दावन में आयोजित हिन्दी सम्पादक सम्मेलन में सभापति के हैसियत से सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने, ‘समाचार पत्रों का आदर्श’ शीर्षक से दिए गए व्याख्यान में, भविष्य में हिन्दी के समाचार पत्र के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा था: ‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गम्भीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जायगी। यह सब होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे।’

करीब 92 साल पहले पराड़करजी के दिए गए व्याख्यान से पता चलता है कि वह पत्रकारिता की मौजूदा अनुभूतियों के साथ-साथ भविष्य में होने वाले बदलावों को भी बखूबी पहचान रहे थे। उन्होंने हिन्दी समाचार पत्रों के सम्बन्ध में जब यह बात कही थी उस समय टेलीविजन पत्रकारिता का नामोनिशां नहीं था, लेकिन उनकी बात हिन्दी समाचार पत्रों के साथ-साथ आज की टेलीविजन पत्रकारिता पर भी पूरी तरह से लागू होती है। जैसा कि सब जानते हैं, भारत में पत्रकारिता की शुरुआत मुनाफा कमाने के लिए नहीं हुई थी। पत्रकारिता का उद्देश्य देश में नवजागरण लाने और उस नवजाग्रत समाज को स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए प्रेरित करने का था। आज की तरह उस समय ऐसे व्यावसायिक पत्रकार नहीं थे, जिनका काम महज एक समाचार पत्र निकालना अथवा टीवी न्यूज चैनल चलाना होता। उस समय सभी भाषाओं के बड़े लेखकों ने समाचार पत्र निकालने अथवा उसमें सहयोग करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया था। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी लेखनी से चेतना का प्रसार करने और बराबरी का समाज बनाने का काम किया। पहले जिस तरह लेखक ही पत्रकार और सम्पादक होते थे उसी तरह पहले के अधिकांश नेता भी पत्रकार और सम्पादक की जिम्मेदारी निभाते थे। काँग्रेस की स्थापना करने वाले करीब 70 फीसदी लोग किसी न किसी रूप में पत्रकारिता से जुड़े थे। बाबूराव विष्णु पराड़कर जिस समय सक्रिय पत्रकारिता करते हुए नवजागरण लाने की दिशा में काम कर रहे थे ठीक उसी समय महात्मा गाँधी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। स्वतन्त्रता आन्दोलन में गाँधी की जो भूमिका रही है, हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में पराड़करजी का भी वही योगदान है। पराड़करजी जिस समाचार पत्र ‘आज’ के लम्बे समय तक सम्पादक रहे वह गाँधी की नीतियों का प्रबल पक्षधर था। गाँधी समाचार पत्रों की ताकत को पहचानते थे। उसका सदुपयोग वह दक्षिण अफ्रीका में ‘इण्डियन ओपीनियन’ नामक पत्र निकाल कर कर चुके थे। एक तरह से गाँधी एक चालाक राजनीतिज्ञ थे। यहाँ चालाक शब्द का इस्तेमाल नकारात्मक तौर पर नहीं किया जा रहा है। गाँधी को यह पता था कि उन्हें अपनी बात आम जनमानस के बीच कैसे पहुँचानी है। इसी नीति के तहत उन्होंने भारतीय राजनीति में समाचार पत्रों का देश और समाज हित में सबसे ज्यादा सदुपयोग किया। उनकी पत्रकारिता का प्रमुख उद्देश्य जनता तक पहुँचना था। अपने इसी उद्देश्य के तहत उन्होंने समाचार पत्रों को खासा महत्व दिया। उन्हें यह स्वीकारने में गुरेज भी नहीं था। अपनी इसी बेबाकी का परिचय देते हुए उन्होंने 2 जुलाई 1925 को ‘यंग इण्डिया’ में लिखा था कि ‘पत्रकारिता में मेरा क्षेत्र मात्र यहाँ तक सीमित है कि मैंने पत्रकारिता का व्यवसाय अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में एक सहायक के रूप में चुना है।’

गाँधी तकरीबन आधा दर्जन समाचार पत्रों के सम्पादन और प्रकाशन से जुड़े रहे। इसके अलावा उनका प्रयास रहता था कि उनकी लिखी और बोली बातों को देश के अन्य समाचार पत्र भी महत्व दें। इसके लिए वह जिस भी शहर की यात्रा करते थे वहाँ के समाचार पत्रों के सम्पादकों से अवश्य मिलते थे। इस मेल-मिलाप के लिए उन्हें अनेक बार घण्टों इन्तजार तक करना पड़ता था। यही नहीं, उन्हें अपने विरोधी पक्ष वाले सम्पादकों से भी मिलने में गुरेज नहीं था। एक घटना प्रयाग से प्रकाशित होने वाले ‘पायोनियर’ पत्र से जुड़ी है। जुलाई 1896 में गाँधी कलकत्ता-बम्बई मेल से राजकोट के लिए जा रहे थे। पाँच जुलाई को लगभग 11 बजे दिन में ट्रेन इलाहाबाद पहुँची, जहाँ उसका 45 मिनट का ठहराव होता था। गाँधी इस समय का सदुपयोग करना चाहते थे। इतने समय में इलाहाबाद की एक झलक लेने के साथ ही उन्हें दवा लेनी थी। दवा लेने में देर लग गई और जब गाँधी स्टेशन पहुँचे तो गाड़ी चलती दिखाई दी। स्टेशन मास्टर भला था सो उसने गाँधीजी का सामान उतरवा दिया था। इस परिस्थिति में गाँधी को अब दूसरे दिन ही जाना था। एक दिन का उपयोग कैसे हो, इसके लिए गाँधी ने अंग्रेज सरकार के हिमायती पत्र ‘पायोनियर’ के सम्पादक से मिलने की सोची। गाँधी लिखते हैं ‘यहाँ के पायोनियर पत्र की ख्याति मैंने सुनी थी। भारत की आकांक्षाओं का वह विरोधी है, यह मैं जानता था। मुझे याद पड़ता है कि उस समय मि. चेजनी उसके सम्पादक थे। मैं तो सब पक्षों के आदमियों से मिलकर सहायता प्राप्त करना चाहता था। इसलिए मैंने मि. चेजनी को मुलाकात के लिए पत्र लिखा। चेजनी ने बुला लिया। उन्होंने गौर से मेरी बातें सुनीं। मुझे आश्वासन दिया कि आप जो कुछ लिखेंगे, मैं उस पर तुरन्त टिप्पणी करूँगा। परन्तु मैं आपको यह वचन नहीं दे सकता कि आपकी सब बातों को मैं स्वीकार कर सकूँगा।’

गाँधी पत्रकारिता में बाहरी धन लगाने को खतरनाक मानते थे। इसीलिए वह अपने समाचार पत्र ‘नवजीवन’ और ‘यंग इण्डिया’ में विज्ञापन नहीं छापते थे। अपनी इस नीति के बारे में उनका मानना था कि विज्ञापन न छापने से उन्हें अथवा उनके पत्रों को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ बल्कि ऐसा करने से पत्रों के विचार स्वातन्त्र्य की रक्षा करने में मदद मिली। एक तरह से वह पत्रकारिता को दो रूपों में विभाजित करते थे-एक व्यावसायिक पत्रकारिता और दूसरा लोकसेवी पत्रकारिता। वह मानते थे कि पत्रकारिता को व्यवसाय बनाने से वह दूषित हो जाती है और लोकसेवा के लक्ष्य से भटक जाती है। समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले समाचारों और लेखों पर उस समय कितना ध्यान दिया जाता था, इस सम्बन्ध में दो घटनाओं का उल्लेख करना आवश्यक है। पहली घटना गाँधीजी से जुड़ी है, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है, ‘इण्डियन ओपीनियन में मैंने एक भी शब्द बिना बिचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। मेरे लिए यह अखबार संयम की तालीम सिद्ध हुआ।......इस अखबार के बिना सत्याग्रह की लड़ाई चल नहीं सकती थी।’ दूसरी घटना काँग्रेस और गाँधीजी की नीतियों के प्रबल पक्षधर ‘आज’ समाचार पत्र से जुड़ी है। बनारस से प्रकाशित ‘आज’ के मालिक शिव प्रसाद गुप्त थे और सम्पादक पराड़करजी। गुप्तजी आज के दौर के मालिकों की तरह नहीं बल्कि जानकार व्यक्ति थे। साहित्य अनुरागी थे। लेखकों और सम्पादकों का सम्मान करते थे। इसी दरम्यान उन्होंने एक लेख लिखा। पराड़करजी को देखने के लिए दिया। उन्होंने देखकर बताया कि लेख छपने योग्य नहीं है। इसे दोबारा लिखने का प्रयास करें। शिव प्रसाद गुप्त लेख दोबारा लिखकर पराड़करजी से मिलने पहुँचे। उन्होंने पढ़ा और कहा कि गुप्तजी बात बनी नहीं। गुप्तजी ने अनुरोध किया कि मेरी इच्छा है कि यह छप जाए। पराड़करजी ने सुझाव दिया कि यह विज्ञापन के रूप में छप जाएगा। और वह लेख विज्ञापन के रूप में छपा, जिसका शिव प्रसाद गुप्त ने बाकायदा भुगतान किया। इन दो घटनाओं से उस दौर की पत्रकारिता को समझा जा सकता है, लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि उस समय की पत्रकारिता में कमियाँ नहीं थीं। उस दौर में भी पत्रकारिता के एक हिस्से पर आरोप लगे। साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का आरोप लगा। जिस समाचार पत्र ‘मतवाला’ का बड़े सम्मान के साथ नाम लिया जाता है उसके मालिक को जेल तक जाना पड़ा। समाचार पत्रों के इस रवैये से खिन्न होकर ही भगत सिंह ने जून 1927 में ‘किरती’ पत्रिका में लिखा था ‘पत्रकारिता व्यवसाय जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल कराते हैं। एक-दो जगह नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिये दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, पर दुख है कि इन्होंने अपना कुल कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक लड़ाई-झगड़ा करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है।’

करीब 90 साल पहले लिखी भगत सिंह की बातें इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की पत्रकारिता पर एकदम सही साबित हो रही हैं। पहले और आज के समय में अन्तर केवल इतना है कि आज अज्ञानता, साम्प्रदायिकता, संकीर्णता फैलाने और साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करने के कारोबार में समाचार पत्रों से आगे टीवी न्यूज चैनल अपनी भूमिका निभा रहे हैं। जहाँ तक गाँधीजी की बात है तो वह समाचार पत्रों की शक्ति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों सन्दर्भों में पहचानते थे। उसको लेकर सचेत रहते थे। इसी बात को केन्द्र में रखकर उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘समाचार पत्र एक जबरदस्त शक्ति है, किन्तु जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गाँव के गाँव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार कलम का निरंकुश प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। यदि अंकुश बाहर से आता है तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है।’ वैसे पत्रकारिता में जब-जब कलम निरंकुश होती है तो उसकी भरपाई देश और समाज को करनी पड़ती है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दरम्यान जहाँ पत्रकारिता के एक हिस्से पर ही सवाल उठे थे वहीं आजादी के बाद खासकर सत्तर के दशक के बाद उसमें खासी गिरावट देखने को मिली। आपातकाल एक ऐसी घटना है, जहाँ भारतीय पत्रकारिता दो खेमों में बँटी नजर आई। एक पक्ष आपातकाल के समर्थन में खड़ा नजर आया तो दूसरा आपातकाल के विरोध में। बहुत कम लोगों ने तीसरे पक्ष यानी सन्तुलित होकर बात की। इसे दूसरे तरीके से भी कह सकते हैं कि आपातकाल से जहाँ सत्ता का अलोकतान्त्रिक चेहरा सामने आया वहीं सेंसरशिप ने भारतीय पत्रकारिता की अवसरवादिता को सामने लाने का काम किया। इससे यह भी पता चला कि आधुनिक कही जाने वाली भारतीय पत्रकारिता ने स्वतन्त्रता आन्दोलन की पत्रकारिता की विरासत से स्वयं को अलग कर लिया है। इस बदलाव का लाभ पत्रकारिता के कुलीन तबके को मिला। सत्ताधारियों और समाचार पत्र के मालिकों को यह अहसास हो गया कि सम्पादकों और पत्रकारों का आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी के साथ सम्पादकीय आचार-विचार का दोहन शुरू हो गया। पत्रकारिता में नई-नई प्रवृत्तियाँ उभरने लगीं। प्रबन्धन और विज्ञापन संस्था का प्रभुत्व बढ़ने लगा तो सम्पादकीय का प्रभुत्व कमजोर होने लगा।
(आलेख का शेष भाग दूसरी और तीसरी कड़ियों में)
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(लखनऊ में, 1-2 अक्टूबर 2016 को आयोजित दो दिवसीय ‘अहिंसा फेस्टिवल’ में दिए गए व्याख्यान का सम्पादित स्वरूप। मूल आलेख तथा सन्दर्भ सूची ‘अकार-46’ में उपलब्घ।)


 अटल तिवारी - पत्रकारिता से दस-बारह वर्षों तक जुड़े रहे हैं। लखनऊ आकाशवाणी के लिए बेग़म अख़्तर पर श्रृंखला ‘कुछ नक्श मेरी याद के’ तैयार की है। आजकल दिल्ली के एक कॉलेज में पत्रकारिता  पढ़ाते हैं।
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......और मैंने शेर भगा दिए

पत्रकारिता की विश्वसनीयता को लेकर जब लिख रहा था तब, लिखते-लिखते ही मुझे मेरी एक दुस्साहसभरी मूर्खता याद आ रही थी। मेरी यह मूर्खता, पत्रकारिता की विश्वसीनयता से सीधे-सीधे शायद न जुड़ती हो लेकिन मुझे यह अन्ततः जुड़ती हुई ही लगती है। 

यह 1973-74 की बात है। मैं मन्दसौर में एक दैनिक का सम्पादक था। तब, जिला स्तर के अखबार टेªडल पर छपते थे और आकाशवाणी के रात पौने नौ बजेवाले समाचार बुलेटिन के बाद अन्तिम स्वरूप ले लेते थे। तब, लेण्ड लाइन टेलिफोन ही सम्पर्क का एकमात्र साधन होता था। अपने शहर/कस्बे से बाहर बात करने के लिए ट्रंक कॉल बुक करने पड़ते थे। तब, एसटीडी सेवाएँ भी नहीं थीं।

वह तेज बरसात की रात थी। शिवना में बाढ़ आई हुई थी। आधा से अधिक मन्दसौर बाढ़ के पानी से लबालब था। निचली बस्तियाँ पानी में डूबी हुई थीं और मुख्य बाजार की मुख्य सड़कें नहरें बनी हुई थीं। उन दिनों शिवना की बाढ़ वार्षिक प्रतीक्षित घटना हुआ करती थी। लोग त्रस्त भी रहते थे और दुःख का आनन्द भी लिया करते थे। शहर की मुख्य बाजार की मुख्य सड़क, कालिदास मार्ग पर एक वर्ष मैंने भी नौका विहार किया था। जिला प्रशासन को पहले से ही मालूम रहता था कि कहाँ-कहाँ, क्या-क्या हो सकता है। उसकी तैयारी पूरी रहती थी। इसी के चलते बाढ़ से निपटने के इन्तजामों को लेकर हम अखबारवालों को जिला प्रशासन की आलोचना करने के मौके बहुत ही कम मिल पाते थे।

उस वर्ष, बरसात के उस मौसम में मन्दसौर में एक सर्कस आया हुआ था। बाढ़ ने उसके डेरे-तम्बू उखाड़ दिए थे। सर्कस में तीन या चार शेर भी थे। बाढ़ के कारण उन शेरों के भाग जाने की चर्चा पूरे मन्दसौर में फैली हुई थी। बरसात से हमारा फोन बन्द पड़ा था। नयापुरा स्थित हमारा दफ्तर बाढ़ से तनिक भी प्रभावित नहीं था किन्तु हम पूरी दुनिया से कटे हुए थे। ‘लेटेस्ट’ समाचार जानने के लिए लोग आ-जा रहे थे। मैं उनसे शेरों की खबर की ही पूछताछ कर रहा था। किसी के पास पक्की खबर नहीं थी लेकिन अपना अनुमान जताने में कोई भी देर नहीं कर रहा था। लगभग प्रत्येक कहता - ‘एँ! ये भी कोई पूछने की बात है? वो तो कभी के भाग गए होंगे।’ 

उन दिनों मैं मन्दसौर का युवतम पत्रकार का तमगा हासिल किए था। उत्साह से लबालब। हमारा अखबार नया-नया था। मैं पहली बार सम्पादन कर रहा था किन्तु इन्दौर-भोपाल के अनेक पत्रकारों से मेरा सम्पर्क हो चुका था। उनका काम करने का तरीका मैं देख चुका था। इसका मुझे अतिरिक्त लाभ मिला था। मेरे सम्वाददाताओं में मेरे प्रति अतिरिक्त विश्वास, मालिक से मिली छूट और मेरी थोड़ी-बहुत मेहनत के कारण हमारे अखबार ने लोगों के बीच हमारी उम्मीदों से अधिक विश्वसनीयता हासिल कर ली थी। हमें गर्मजोशी से हाथोंहाथ लिया जा रहा था।  ये सारी बातें मुझे, अपने प्रतियोगी अखबारों को पछाड़ने की उद्दाम भावना के अधीन लोगों के अनुमान को अन्तिम सच मानने को उकसाए जा रही थी। पत्रकारिता (और बाद में बीमा में भी) मेरे गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र त्यागी मेरे दफ्तर में ही बैठे थे। उन दिनों वे ‘नव-भारत’ का काम देख रहे थे। साहित्य, इतिहास और पुरातत्व में उनका बड़ा दखल था। वे जानकारियों और सन्दर्भों के भण्डार थे। मन्दसौर ही नहीं, पूरे जिले में उनका बड़ा दबदबा था। वे ‘घुमा कर’ बात करते थे। पत्रकारवार्ताओं में उनके सवाल सामनेवाले पर धोबी पछाड़ जैसा असर करते थे। वे मुझ पर बराबर नजर गड़ाए हुए थे। सर्कस के शेरों को लेकर जैसे ही कोई आगन्तुक अपना अनुमान जताता, बुलेट की तरह त्यागीजी का सवाल आता - ‘अन्दाज से कह रहे हो या तुमने भागे हुए शेरों को देखा या सर्कस के मालिक से बात की है?’ जवाब देनेवाले की मानो घिघ्घी बँध जाती। घुटी-घुटी आवाज आती - ‘अन्दाज से कहा।’ त्यागीजी कहते तो कुछ नहीं लेकिन जिन नजरों से सामनेवाले को देखते, वह उनकी ताब नहीं झेल पाता। वह जल्दी से जल्दी जाने की जुगत भिड़ाने लगता।

रात के नौ बज चुके थे। शेरों के भाग जाने की प्रतीक्षामय अपेक्षा में मैंने पहला पेज रोक रखा था। कम्पोजिटर चाह कर भी नहीं जा पा रहे थे। उनकी पूरी बस्ती पानी में डूबी हुई थी। उन्हें सुबह तक प्रेस में ही रुकना था। सवा नौ बजते-बजते मेरा धीरज उबलने लगा। अचानक ही एक सन्देशवाहक आया। वह त्यागीजी के लिए सन्देश लेकर आया था। उन्हें तत्काल ही घर के लिए रवाना होना पड़ा। लेकिन जाने से पहले, किसी कड़क थानेदार की तरह मुझे हिदायत दे गए - ‘मैं जानता हूँ, तू शेरों को भगाने के लिए उतावला बैठा है। तेरे पास काई अधिकृत खबर नहीं है। पीआरओ या कलेक्टर या एसपी से तेरी बात नहीं हुई है। आनेवाले सबसे मैंने तेरे सामने ही पूछा है। एक ने भी ने भी शेरों के भागने की खातरी नहीं की है। मैं जा रहा हूँ। तू शेर भगा मत देना। बहुत ही नाजुक मामला है। जिला प्रशासन पहले से ही परेशान है। शेरों के भागने की खबर से लोगों में दहशत फैलेगी और भगदड़ मच सकती है। किसी भी कीमत पर शेरों का भगाना मत।’

और त्यागीजी चले गए। उनकी हिदायत मुझे बिलकुल ही अच्छी नहीं लगी। मेरा मन उसे मानने को तैयार ही नहीं था। साढ़े नौ बजते-बजते मुख्य कम्पोजीटर रमेश बोला - ‘बैरागीजी! हमें तो रात भर यहीं रहना है। लेकिन बाकी लोगों को तो घर जाना है! अखबार कब छपेगा और कब बाहर जाएगा? जो भी करना हो, करो।’ दफ्तर में अब मैं ही मैं था। मालिक तो वैसे भी नहीं रहते थे। जो भी थे, मेरा कहा माननेवाले ही थे। उत्साह के अतिरेक मैंने जोखिम लेने का फैसला किया। शेरों के भागने का समाचार लिखा और रमेश को थमाया। रमेश ने अविश्वास और हैरतभरी नजरों से मुझे देखा और निराशाजनक स्वरों में बोला - ‘तो अपन शेर भगा रहे हैं?’ मैंने अनुभवी पत्रकार और सम्पादकीय रुतबे से कहा - ‘हाँ। अपन ने भगा दिए। अपन ने क्या भगा दिए, वे सच्ची में भाग गए।’

अखबार छपा। यूँ तो मैं देर से उठता हूँ किन्तु उस दिन जल्दी उठ गया। बाढ़ का पानी लगभग रात जैसा ही बना हुआ था। सरकारी मदद से कोतवाली पहुँचा। मैं गर्वोन्मत्त, इतराया हुआ था। लेकिन कोतवाली पहुँचते ही वहाँ मौजूद तमाम सरकारी अधिकारी मुझ पर टूट पड़े। पिटाई के अलावा बाकी सब मेरे साथ हुआ। मैं वहाँ से भाग जाना चाहता था लेकिन चारों ओर पानी ही पानी। जाने के लिए सरकारी मदद चाहिए और सारे के सारे मुझसे नाराज। बिना चाय-पानी, ग्यारह बज गए। त्यागीजी भी वहाँ पहुँच गए। मुझे देखते ही उनकी आँखों से मानो लपटें उठने लगी। मैंने प्रणाम किया तो मेरे दोनों हाथ झटक कर अन्दर चले गए। उसके बाद कोई सप्ताह भर तक मुझसे बात ही नहीं की। वह समय मेरे लिए अत्यधिक पीड़ादायक रहा। लेकिन कहता भी तो किससे कहता और क्या कहता?

मेरी खूब जग-हँसाई हुई। जो प्रतियोगी पत्रकार मेरा लिहाज पालते थे, सबको ख्ुालकर खेलने का मौका मिल गया। मेरी दशा यह कि घर में रुक नहीं सकता और बाहर कहीं बैठने की हिम्मत ही न हो। कोई एक पखवाड़े बाद त्यागीजी ने मेरी ओर देखा। मेरी पीठ पर खूब घूँसे मारे। उसके बाद दिन में जब भी पहली बार मिलते या फोन पर बात होती तो पहला सवाल करते - ‘आज कितने शेर भगाए?’ जवाब में मुझे रोना-रोना आ जाता।

तब संचार साधन बहुत सीमित थे। इसलिए, हमारे अखबार के पाठकीय क्षेत्र के बाहर बात बहुत ही धीरे-धीरे लोगों तक पहुँची। मेरी तकदीर अच्छी रही कि पुरानी हो जाने के कारण कहीं भी ज्यादा देर नहीं टिकी। 

किन्तु आदमी अपनी मूर्खताएँ कभी नहीं भूलता। भूल ही नहीं सकता। उसे डर लगा रहता है - कोई पुराना जानकार उस मूर्खता को उजागर न कर दे। और वैसा होता ही होता है। आज भी, जब उन दिनों के साथी-संगाती मिल जाते हैं तो कोई न कोई तो मजे ले ही लेता है - ‘अच्छा हुआ रे! जो तूने पत्रकारिता छोड़ दी। वर्ना जाने कहाँ-कहाँ जाने कितने शेर भगाता रहता।’  

समझदार लोग अपनी मूर्खताओं से अकल लेते हैं। अधिक समझदार वे होते हैं जो दूसरे की मूर्खता से अकल लेते हैं। आपके लिए यह बहुत ही बढ़िया मौका है।
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पहली बार सुना ऐसा इंकार

‘हलो!’

‘हलो।’

‘प्रियम्वदजी बोल रहे हैं?’

‘जी हाँ! मैं प्रियम्वद बोल रहा हूँ।’

‘नमस्कार प्रियम्वदजी। मैं रतलाम से विष्णु बैरागी बोल रहा हूँ।’

‘ओह! विष्णुजी! नमस्कार! नमस्कार!! कहिए!

‘आप मुझे अकार 46 की कितनी प्रतियाँ उपलब्ध करा सकते हैं?’

‘आप कहें उतनी। लेकिन आपको क्यों चाहिए?’

‘अपने कुछ मित्रों को भेंट देने के लिए। दरअसल इस अंक में अटल तिवारी का लेख मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं उसे, पत्रकारिता से जुड़े अपने कुछ मित्रों को पढ़वाना चाहता हूँ।’

‘माफ करें विष्णुजी। अकार मुफ्त वितरण के लिए नहीं है।’

‘मुफ्त नहीं। प्रतियों का मूल्य मैं चुकाऊँगा।’

‘जी। आप चुकाएँगे। वे नहीं, जिन तक यह पहुँचेगा। आप जिसे भी भेजना चाहते हैं, उन्हें अकार का अता-पता दे दीजिए। लेख के बारे में उन्हें बता कर अकार की सिफारिश कर दीजिए और अंक का मूल्य भेजने के लिए कह दीजिए। हम डाक खर्च लिए बिना उन्हें अंक उन्हें भेज देंगे।’

‘भुगतान वे करें या मैं करूँ, आपको क्या फर्क पड़ता है? आपको तो आपके पैसे मिल रहे हैं!’

‘जी। हमें तो हमारे पैसे मिल रहे हैं लेकिन आप उन्हें जबरिया पढ़ा रहे हैं, वह भी मुफ्त में। हम इसके खिलाफ हैं।’

‘मुझे थोड़ी अजीब लग रही है आपकी बात।’

‘सही कहा आपने। अजीब लग ही रही होगी क्योंकि ऐसी बात सामान्यतः कोई सम्पादक-प्रकाशक नहीं करता। आप जिसे भी अकार का यह अंक भेजना चाह रहे हैं वे कितने भी गरीब हों लेकिन इतने भी नहीं कि पचास रुपये भी खर्च न कर सकें। हमारे (हिन्दीवाले) लोग, घर से निकल कर, दुकान पर जाकर, दो हजार का जूता खरीद लेते हैं लेकिन हिन्दी की किसी किताब या पत्रिका के लिए घर से निकल कर पोस्ट ऑफिस/बैंक जाकर पचास रुपये चुकाने को तैयार नहीं। हम इस मानसिकता से न तो सहमत हैं न ही इसे बढ़ावा देते हैं।’

‘..............’

‘हलो! विष्णुजी! सुन रहे हैं?’

‘जी। सुन रहा हूँ।’

‘पता नहीं आपने ध्यान दिया या नहीं, अकार बिना विज्ञापन के छप रहा है। आसान नहीं है ऐसा करना। हम करने की कोशिश में लगे हुए हैं। हम इसे लेखकों, पाठकों का प्रकाशन बनाना चाहते हैं। हम तो इसे इनका को-आपरेटिव बनाना चाहते हैं। उनका सहकारी स्वामित्व चाहते हैं। अकार के प्रत्येक अंक में अकार के बैंक खाते के ब्यौरे दिए रहते हैं। हमें सहयोग राशि भी चाहिए और कीमत चुका कर पढ़नेवाले भी। इसलिए विष्णुजी! क्षमा करें! इस अंक की प्रतियाँ तो हैं  किन्तु आपको नहीं भेजेंगे।’

‘ठीक है।’

यह ‘ठीक है।’ कहते समय मेरी आवाज में रंच मात्र भी निराशा या गुस्सा नहीं था। ताजगी अनुभव की मैंने अपनी आवाज में। जब से सूझ-समझ (अब, वह जैसी भी है) आई है तब से पहली बार ऐसा इंकार सुना। यह इंकार, हिन्दी के आकाश में गूँजे, गरजे। इस इंकार को समूचा हिन्दी समुदाय बाहुपाश में ले। इस तरह कि छूट न पाए। वहीं कैद रह जाए ताकि फिर किसी प्रियम्वद को ऐसा इंकार उच्चारित करने का अवसर नहीं मिले। जितने लिखने, छपनेवाले हों उसके सौ-हजार गुना खरीद कर पढ़नेवाले हों।

‘अकार’ के सम्पर्क ब्यौरे - अकार प्रकाशन,           
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(जिन मित्रों को अकार का यह अंक भेजना चाह रहा था, उन सबको अब इस ब्लॉग पोस्ट की लिंक भेज रहा हूँ।)

पत्रकारिता: विश्वसनीयता की जगह विज्ञापन

एक मई को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में घुस कर भारतीय सेना के नायक सुबेदार परमजीति सिंह और सीमा सुरक्षा बल के प्रेम सागर की हत्या कर दी। दोनों के शवों के साथ बर्बरता भी बरती। देश उद्वेलित था कि कुछ समाचार चेनलों ने समाचार दिया कि जवाब में भारतीय सेना ने दो पाकिस्तानी चौकियाँ ध्वस्त कर दीं और सात पाकिस्तानी जवानों को मार गिराया। आक्रामक तेवरों के कारण विशिष्ट पहचान बनानेवाले, सत्तारूढ़ भाजपा के आधिकारिक प्रवक्ता सम्बित पात्रा ने एक शहीद की विधवा पत्नी को ये सूचनाएँ, गर्वपूर्वक देकर तसल्ली दी। लोगों ने सन्तोष और राहत अनुभव की। किन्तु जल्दी ही यह तसल्ली छिन गई। सेना की उत्तरी कमान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सेना ने बदले की कोई कार्रवाई नहीं की है। चैनलें अपनी मर्जी से समाचार दिखा रही हैं। सेना जब बदला लेगी, तब आधिकारिक रूप से बयान जारी किया जाएगा। यह चौंकानेवाला, हताशाजनक समाचार था। लेकिन एक भी समाचर चैनल ने इस गलत प्रसारण के लिए न माफी माँगी न खेद प्रकट किया। सेना को अपनी विश्वसनीयता की चिन्ता हुई। वहाँ से प्रतिवाद किया गया। लेकिन समाचार चेनलों को अपनी विश्वसनीयता की चिन्ता हुई हो, ऐसा नहीं लगा।

चैनलों को यह समाचार अपने सम्वाददाता से नहीं,  किसी व्यक्ति या संस्था से मिला था जो ‘जिम्मेदार और विश्वसनीय’ ही नहीं इस हैसियतवाला भी रहा होगा जिसे झूठा कहने का साहस कोई नहीं जुटा सका। किन्तु सामान्य समझवाला व्यक्ति भी जान गया कि किसके कहने से यह समाचार प्रसारित हुआ और क्यों एक भी चेनल उसका नाम नहीं बता पाया। भाग्यशाली हैं वे चेनल जो जग-हँसाई, भयभीत और आतंकित होने से बच गए।

हमें आठवीं कक्षा में समझाया गया था - यदि धन खोया तो कुछ नहीं खोया। स्वाथ्य खोया तो कुछ खोया। किन्तु चरित्र खोया तोे सब कुछ खो दो दिया। पत्रकारिता के सन्दर्भों में ‘विश्वसनीयता’ ही यह चरित्र होता है। 

मुझे इन्दौर से दैनिक भास्कर का शुरुआती समय याद आ रहा है। तब ‘नईदुनिया’ का एक छत्र दबदबा था। समाचारों की विश्वसनीयता, रिपोर्टिंग पर मैदानी सम्वाददाताओं द्वारा किया जानेवाला परिश्रम उसकी विशिष्ट पहचान था। तथ्यात्मकता के प्रति उसकी सावधानी का नमूना यह कि सरदार स्वर्ण सिंह जब विदेश मन्त्री बने तो उन्हें ‘स्वर्ण सिंह’ लिखा जाए या ‘स्वरन सिंह’, इस पर बहुत दिनों तक मन्थन होता रहा क्यों कि वे हिन्दी में अपने हस्ताक्षर ‘स्वरन सिंह’ करते थे। विश्वसनीयता यह कि अपने ही अखबार में छपे समाचार की तसल्ली करने के लिए भास्कर के लोग नईदुनिया देखा करते थे।

लेकिन समय काफी कुछ बदल ही देता है। अपवादों को छोड़ दें तो आज प्रायः हर अखबार/चौनल चारण की तरह बिरदाविलयाँ गा रहा है, भाट की तरह ‘अन्नदाता यजमान’ की वंश-वृक्षावली बाँच रहा है। ‘विश्वसनीयता’ की जगह विज्ञापन’ ने ले ली है। कस्बाई स्तर पर काम कर रहे, एक विज्ञापन एजेन्सी का प्रभारी आश्वस्ति देता है - ‘आप जो चाहेंगे, छप जाएगा। जो चाहेंगे, रुक जाएगा।’

पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ पुकारा जाता है। किन्तु शायद ही किसी को मालूम हो कि आधिकारिक रूप से लोकतन्त्र के तीन ही स्तम्भ उल्लेखित किए गए हैं - विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका। लेकिन ‘लोक स्वीकार’ ने इसे चौथा स्तम्भ बना दिया। विधायी सदनों में प्रतिपक्ष के जरिए लोगों की बात जाहिर होती है। लेकिन जब प्रतिपक्ष भी सत्ता पक्ष से मिल जाए तो? तब यह चौथा खम्भा ही जनता की आवाज बनता है। इसीलिए जनहितरक्षण की दृष्टि से पत्रकार सदैव ही प्रतिपक्ष में अपेक्षित रहता है - जो सरकार पर भी अंकुश लगाए और प्रतिपक्ष पर भी। लालच, स्वार्थ ने हमें आत्म-केन्द्रित बना दिया है। इस स्खलन से कोई नहीं बचा है। बच भी कैसे सकता है? जब तालाब का पानी उतरता है तो चारों दिशाओं में समान रूप से उतरता है। कोई इस स्खलन से नहीं बचा है। सब इसी दुनिया, इसी समाज के जीव हैं। इसके बावजूद समाज को हर समय तीन खेमों से उम्मीद बनी रहती है - न्यायपालिका, अध्यापक और पत्रकारिता। 

ऐसे में पत्रकारिता की विश्वसनीयता भंग होना हम सबकी चिन्ता होनी चाहिए। कभी पत्रकार को आदर से देखा जाता था। उसे अपनी पहचान जताने की आवश्यकता कभी नहीं होती थी। आज स्थिति उलट गई लगती है। आज तो पत्रकार जगत ही पत्रकारों से त्रस्त, क्षुब्ध है। वाहनों पर, लिखे ‘प्रेस’ पर लोगों का व्यवहार ‘इससे बचो’ जैसा होता है। यह मर्मान्तक पीड़ादायक है कि पत्रकारिता की जितनी निन्दा और भर्त्सना हमारे इस समय में हो रही है उतनी अब तक कभी नहीं हुई। लेकिन इसके लिए किसी और को दोष कैसे दिया जाए? पेटलावद विस्फोट काण्ड के दिनों में छाए अखबारी बवण्डर पर एक नेता ने अत्यन्त विश्वासपूर्वक कहा था - ‘आप जिन्हें वॉच डाग कह रहे हैं ना! देखना वे सबके सब जल्दी ही पूँछ हिलाते नजर आएँगे।’ ऐसा हुआ या नहीं, इस पर बहस हो सकती है किन्तु कोई नेता विश्वासपूर्वक ऐसा कहने की हिम्मत करता है, यही क्या कम चिन्ताजनक नहीं है?

पत्रकारों की व्यक्तिगत विचारधारा तब भी होती थी किन्तु तब वे ‘काँग्रेसी पत्रकार’, ‘जनसंघी पत्रकार’, ‘समाजवादी पत्रकार’ होते थे, ‘काँग्रेस के पत्रकार’, ‘जनसंघ के पत्रकार’, ‘समाजवादी पार्टी के पत्रकार’ नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता, शुचिता और सार्वजनिक प्रतिष्ठा की चिन्ता सब समान रूप से करते थे। 1975-76 में मैं, भोपाल में, अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद’ में नौकरी करता था। वहाँ हसनात सिद्दीकी काँग्रेसी,  यशवन्तजी अरगरे और संगीतजी संघी/जनसंघी और गोविन्दजी तोमर समाजवादी के रूप में चिह्नित किए जाते थे। किन्तु इनमें से किसी के भी कारण ‘हितवाद’ की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर कभी खरोंच नहीं आई। जो भी अखबार या व्यक्ति, पत्रकारिता के इन बुनियादी तत्वों से दूर हुआ, उसे दुर्दिन ही झेलने पड़े। नेशनल हेरॉल्ड की दशा हमारे सामने है। भाजपा का मुख-पत्र बने हुए,  एक अखबार को उसके अंश धारक भी नहीं खरीद रहे। 

पत्रकारों की स्थिति का अनुमान मैं भली प्रकार कर सकता हूँ। अखबारों, मीडिया घरानों के मालिक जब पूँजीपति हो तो पत्रकार भला पत्रकारिता कैसे कर सकते हैं? कर ही नहीं सकते। उन्हें नौकरी कर, अपने बाल-बच्चे पालने हैं। लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता का संकट इन्हें ही झेलना पड़ रहा है। लोग इनसे उम्मीद करते हैं कि ये सच लिखें लेकिन मालिक कहता है - सच कहने से बचने का विश्वसनीय तरीका निकालो। मैं भी कभी पत्रकार रहा हूँ। मैं इनमें खुद को देखता हूँ। जवाब इन्हें ही देना पड़ता होगा। ये क्या कहते होंगे? डॉक्टर बशीर बद्र साहब का यह शेर इनके काम आता होगा -

किसने जलाई बस्तियाँ, बाजार क्यों लुटे
मैं चाँद पर गया था, मुझे कुछ पता नहीं

समय कभी थमता नहीं। इसीलिए, वक्त तो बदलेगा ही। इलेक्ट्रानिक मीडिया के शुरुआती दिनों में प्रभाषजी जोशी रतलाम आए थे। चिन्तित युवा पत्रकारों से  उन्होंने कहा था - ‘तेज बहाववाली नदी में, बीच में खड़े हो। अपनी अंगुलियाँ, पूरी ताकत से रेत में गड़ाए रखो। बहाव स्थायी नहीं है। निकल जाएगा। बस! तुम बहने से बचो।’

पूँजी का यह हमला मारक है। सरकारी प्रश्रय इसे पल-पल बढ़ा रहा है। गंगा हिमालय से निकलती है लेकिन बाढ़ मैदानों में आती है। बचाव के रास्ते मैदानवालों को ही तलाशने पड़ेंगे। जूझना कायम रखिए। थकिए नहीं। बुरा से बुरा आदमी भी अच्छे दोस्त चाहता है। निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता की आवश्यकता देश-समाज को हर दौर में रही है, रहती ही है। जब आपातकाल में रास्ते तलाश लिए थे तो अब भी तलाश ही लेंगे। 

हर रात की सुबह होती है। शम्मा जलाए रखिए। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे, भोपाल में दिनांक 18/05/2017 को प्रकाशित)

पत्रकारिता याने ‘निपटा दो स्सा ऽ ऽ ऽ ले को’


17 मार्च रविवार को, ‘जनसत्ता’ में, ‘अनन्तर’ स्तम्भ में श्री ओम थानवी के, ‘अक्ल बड़ी या भैंस’ शीर्षक आलेख के, तीसरे पैराग्राफ के पहले दो वाक्यों ‘अखबारों की सबसे बड़ी समस्या है, समझ और सम्वेदनशीलता की कमी। इसके कारण सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि का उनमें अभाव दिखता है।’ ने मुझे यह संस्मरण लिखने को विवश कर दिया।

यह, 1970 से 1975 के बीच की बात है। मैं मन्दसौर में, ‘दैनिक दशपुर दर्शन’ का सम्पादक था। जिला युवक काँग्रेस के अध्यक्ष श्री सौभाग्यमल जैन ‘करुण’, अखबार के मालिक थे। मन्दसौर तब आठ तहसीलोंवाले अविभाजित मन्दसौर जिले का मुख्यालय था। कालान्तर में इसका विभाजन हो गया और चार तहसीलें मिला कर नीमच जिला बना दिया गया। उन दिनों मन्दसौर की जनसंख्या एक लाख से भी कम थी।

अखबार यद्यपि ‘काँग्रेसी का’ था किन्तु ‘काँग्रेस का’ नहीं था। ऐसी प्रत्येक कोशिश को मैंने असफल किया। सौभाग्य भाई की पीठ सुनती है कि उन्होंने एक बार भी मुझे रोका-टोका नहीं। मेरी इन ‘हरकतों’ के कारण उन्हें काँग्रेस के, प्रादेशिक स्तर के नेताओं से प्रायः ही खरी-खोटी और अच्छी-बुरी सुननी पड़ती रहती थी।

पूरे अविभाजित मन्दसौर जिले पर भारतीय जनसंघ का दबदबा था। एक समय वह भी था कि वहाँ की सातों ही विधान सभा सीटों पर भारतीय जनसंघ का ‘दीपक’ जगमगा रहा था। किन्तु 1967 में पहली बार जनसंघ के इस ‘अभेद्यप्रायः दुर्ग’ में दरार आई जब दादा ने श्री सुन्दरलालजी पटवा को हराया था। बाकी छहों सीटों पर जनसंघ का कब्जा कायम रहा था। पटवाजी जिले के ‘एकमात्र पराजित जनसंघी उम्मीदवार’ बने थे।

मैं जिन सज्जन की बात कर रहा हूँ ‘वे’ मन्दसौर जिले के एक विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। अपने विधान सभा मुख्यालय पर नहीं रहते थे। मूलतः, मन्दसौर के पास के एक गाँव के निवासी थे और मन्दसौर में रहते थे। मैं उनका नाम नहीं लिखूँगा। ‘वे’ अब दुनिया में नहीं हैं। 

‘वे’ प्रखर वक्ता थे। जन-रोचकता और आक्रामकता उनके भाषणों के प्रमुख तत्व हुआ करते थे। संघ/जनसंघ/(और आज की भाजपा) के सामान्य वक्ताओं की तरह ‘वे’ भी ‘विचार’ की दुहाई देकर ‘व्यक्ति’ पर प्रहार करने में विशेषज्ञ थे। दादा तब तक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित हो चुके थे - इस सीमा तक कि जनसंघ के लगभग प्रत्येक वक्ता का भाषण, दादा के व्यक्तित्व-हनन के बिना कभी पूरा नहीं होता था। किन्तु कुछ लोग इस क्रम में दादा को पीछे छोड़ मेरी भाभीजी तक को निशाने पर लेने में संकोच नहीं करते थे। जैसा कि होता ही है, घटिया उपमाओं, अभद्र भाषा-शब्दावली से सजे ऐसे भाषण लोगों को खूब पसन्द भी आते। ‘वे’ भी ऐसा ही करते थे। मुझे बहुत बुरा लगता। गुस्सा आता। तमतमा कर दादा से कहता - “आप तो ‘सरस्वती-पुत्र’ हैं। बड़ी सुन्दरता और शालीनता से सबको जवाब दे सकते हैं। जवाब क्यों नहीं देते?” दादा हर बार मुस्कुरा कर, कभी मेरी पीठ, कभी मेरा कन्धा तो कभी मेरा माथा थपथपाते हुए कहते - ‘तू क्या समझता है मुझे तकलीफ नहीं होती? होती है। लेकिन अपन भी वैसा ही करने लगे तो उनमें और अपने में फरक ही क्या रह जाएगा? लोगों की समझ पर भरोसा रख। लोग सब समझते हैं। तेरी भाभी का मजाक उड़ानेवाले उनके भाषणों पर तालियाँ बजानेवाले भी उन्हें ही बुरा कहेंगे।” दादा की ऐसी बातें मुझे कभी अच्छी नहीं लगीं।

यह वह जमाना था जब मन्दसौर जैसी छोटी जगहों से निकलनेवाले अखबार, छपाई मशीन सहित सारे कामों पर पूरी तरह से मानव-श्रम पर निर्भर होते थे। स्टिक-कम्पोजिंग, गेली में पेज बनाना, हाथ से संचालित मशीन पर पेज का प्रूफ निकालना, पूरे पेज को ‘चेस’ में कस कर मशीन पर चढ़ाना और एक-एक पेज छापना। पाँव से चलाई जानेवाली ट्रेडल मशीन पर अखबार छपता था। दोपहर में 2 बजकर 40 मिनिट पर आकाशवाणी से प्रसारित होनेवाले ‘धीमी गति के समाचार’ मुखपृष्ठ के मुख्य समाचार का स्रोत होते थे। शाम तक तीन पेज छाप लिए जाते। रात आठ बजते-बजते मुखपृष्ठ तैयार हो जाया करता था। आकाशवाणी से, रात पौने नौ बजे प्रसारित होनेवाले समाचार की प्रतीक्षा की जाती थी। उस बुलेटिन में कुछ काम का हुआ तो ठीक वर्ना फटाफट अखबार छापने की तैयारियाँ शुरु हो जातीं। मुखपृष्ठ का मशीन प्रूफ देखकर मैं अपनी कुर्सी पर निढाल हो जाता। एक दिन की मजदूरी पूरी।

ऐसे ही एक दिन, अपराह्न में खबर मिली कि ‘उनकी’  सयानी बेटी, एक मुसलमान युवक के साथ घर छोड़ कर चली गई है। आज से  लगभग 45-50 बरस पहले भी, संघ का कट्टर हिन्दुत्व, आनुपातिक रूप से तनिक भी कम नहीं था। मुसलमानों के प्रति नफरत और उन्हें राष्ट्र विरोधी निरूपित करना आज से कम नहीं था। होली पर साम्प्रदायिक दंगे होना मन्दसौर की पहचान बन गया था - कुछ इस तरह कि तय करना मुश्किल हो जाता था कि लोग होली की प्रतीक्षा कर रहे हैं या दंगों की। ऐसे में, कट्टर हिन्दुत्ववाले, कट्टर हिन्दू की, वह भी हिन्दू नेता की, बेटी का, घर से छोड़ कर चले जाना, वह भी किसी मुसलमान युवक के साथ!  कल्पना की जा सकती है कि मन्दसौर में क्या स्थिति बन गई होगी। पूरे शहर में सनसनी फैल गई। बिना किसी के कहे, दुकानों के शटर/दरवाजे आधे-आधे बन्द हो गए। हर कोई दहशतजदा था। स्कूलों में अघोषित छुट्टी हो गई। जिला प्रशासन एकदम ‘हाई अलर्ट’ पर आ गया - पंजों के बल, अंगुलियों पर खड़ा।

दस-पाँच मिनिट बीतते-न-बीतते, मेरा फोन घनघनाना शुरु हो गया - लगातार। एक से बात कर, रिसीवर रखकर हाथ हटाऊँ उससे पहले ही दूसरी घण्टी। और फोन भी केवल मन्दसौर शहर से नहीं, जिले के अन्य कस्बों से भी। मानो इतना ही पर्याप्त न हो, एक के बाद एक, ‘शुभ-चिन्तकों’ का आना शुरु हो गया। मेरी टेबल के सामने चार कुर्सियाँ रखी रहती थीं। वे चारों कभी की भर चुकी थीं। शाम होते-होते मेरा दफ्तर छोटा पड़ गया। मेरे दो सहायकों सहित तमाम कर्मचारियों का काम करना दूभर हो गया। एक के बाद एक, कोई न कोई चला आ रहा था और प्रत्येक के पास, इस मामले से जुड़ी, कोई न कोई अनूठी/अनछुई याने कि ‘एक्सक्लूसिव’ चटपटी-मसालेदार सूचना थी। सबकी एक राय थी - “आज इसे छोड़ना मत। इसने कभी, कोई कसर नहीं छोड़ी। दादा को तो ठीक, इसने भाभी पर भी छींटाकशी की है। भाभी को क्या-क्या नहीं कहा? तुझे याद है कि नहीं, बाजारू औरतों की लाइन में बैठाया था इसने भाभी को? आज इसे बिलकुल मत छोड़ना। बढ़िया मौका मिला है। निपटा दे इस स्सा ऽ ऽ ऽ ले को आज।”

घटना की सूचना मिलने के बाद, बड़ी देर तक मैं भी यही सब सोच रहा था - नफरत और प्रतिशोध की आग में जलते हुए। मैंने सौभाग्य भाई से पूछा - ‘क्या करना है?’ उन्होंने सदैव की तरह कहा - ‘जो तू ठीक समझे।’ किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, मेरे विवेक ने मुझे सहलाना शुरु किया। विचार आया - “यही घटना ‘इनके’ साथ न होकर किसी औसत आदमी के साथ होती तब मैं क्या करता?” बस! इस विचार ने मेरी सारी दुविधा दूर कर दी। तमाम शुभ-चिन्तकों को जैसे-जैसे विदा किया। मुखपृष्ठ का काम निपटाया। हमारा मुख्य कम्पोजिटर रमेश मुझ पर बराबर नजरें टिकाए हुए था। वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट था और मेरी काँग्रेसी पृष्ठभूमि के कारण मुझसे, नफरत करने की सीमा तक चिढ़ता था। मेरी फजीहत करने का कोई मौका, कभी नहीं छोड़ता था। उसने एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन उसकी आँखें लगातार बोल रही थीं।

छपाई के लिए मुखपृष्ठ की चेस मशीन पर चढ़ाई जाने लगी तो रमेश मेरे पास आया और रुँधे कण्ठ से, बहुत ही  मुश्किल से (मैं किसी भी तरह नहीं बता पाऊँगा कि कितनी मुश्किल से) कुछ ऐसा बोला - “मुझे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि आप यह शराफत बरतेंगे। मैंने मान लिया था कि आपकी तो शादी भी नहीं हुई इसलिए आप बेटी के बाप का दर्द क्या जानेंगे? मैं बेटी का बाप हूँ। ‘उनसे’ मैं भी सहमत नहीं हूँ। मुझे पक्का भरोसा था कि आज आप राजनीति खेलेंगे और ‘उनको और ‘उनकी’ बेटी को, चौराहे पर टाँग देंगे। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। आज आपने ‘उनकी’ नहीं, तमाम बेटियों की और तमाम बेटियों के बापों की इज्जत बचा ली। मैं भगवान को नहीं मानता लेकिन आज मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि आपको लम्बी उम्र दे और आपके जरिए इसी तरह बेटियों की, बेटियों वालों की हिफाजत करता रहे। आज आपने मुझे अपना गुलाम बना लिया।’

मैं हक्का-बक्का रह गया। रमेश ने मेरा मन कब और कैसे पढ़ लिया? मैंने भी बिलकुल यही सोचा था - इस घटना का कोई सामाजिक महत्व तो है नहीं! इसे न छापने से मेरे अखबार को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन छापने से एक परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा पर खरोंच अवश्य आ जाएगी। यदि यह घटना ‘उनके’ परिवार में न हुई होती तो मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं होते। किन्तु, चूँकि मैं ‘उनसे’ मर्माहत हूँ, उन्हें लेकर बदले की आग में जल रहा हूँ, इसीलिए इस घटना का महत्व है। इस मामले में तो मैं खुद एक पक्ष हूँ? भला, न्यायाधीश जैसी भूमिका कैसे निभा सकता हूँ?

अब अकेला रमेश नहीं रो रहा था। मैं भी उसके साथ रो रहा था। लेकिन यह रोना, अपनी आत्मा का कलुष धुल जाने, और (किन्हीं भी कारणों से) पत्रकारिता की छवि को कलुषित करने से बच जाने से उपजी प्रसन्नता का रोना था।

संयत होकर मैंने ‘उनके’ घर का नम्बर डायल किया। मेरा नाम सुनते ही, उधर से मुझे टालने की कोशिश की गई। मैंने कहा - ‘उनसे कहिए कि उनका सबसे बड़ा बेटा बात करना चाहता है।’ वे फोन पर आए। उनकी ‘हेलो’ सुनते ही मैंने कहा - ‘दादा! कुछ मत कहना। मैं जो कह रहा हूँ, चुपचाप सुन लेना। मुझे अपने परिवार का सबसे बड़ा बेटा समझना और मेरी ओर से निश्चिन्त रहना। मैं आपसे मिलना चाहूँगा लेकिन आपकी सेवा में तभी हाजिर होऊँगा जब आप बुलाएँगे।’ जवाब में मुझे जो ‘विलाप क्रन्दन’ सुनाई दिया, वह इस क्षण भी मेरे कानों में गूँज रहा है। वे कुछ नहीं बोल पा रहे थे। लगातार रोए जा रहे थे - धाड़ें मार-मार कर, बेटी का नाम ले-ले कर। मैं तो कुछ बोल ही नहीं रहा था। कुछ पलों के बाद किसी आवाज सुनाई दी। कोई उन्हें कह रहा था - ‘क्या कर रहे हो? वो अपना दुश्मन है। उसके सामने रोना अच्छा नहीं लगता। चुप हो जाओ।’ और ‘उन्हें’ समझाते हुए, दूसरी आवाजवाले व्यक्ति ने रिसीवर रख दिया।

अगले दिन, क्या हुआ, कैसे उन्होंने खुद मुझे फोन किया, तत्काल अपने घर बुलाया, क्या-क्या कहा - यह सब लिखने का कोई अर्थ नहीं। सहज ही कल्पना की जा सकती है कि क्या हुआ होगा। ‘अपने हिय से जानियो, मेरे हिय की बात।’

लेकिन हाँ, यह सब लिखते हुए इस समय मुझे सचमुच में ताज्जुब हो रहा है कि मैं यह विवेक कैसे बरत पाया? उस समय मेरी उम्र 28 वर्ष थी। गरम खून और वह भी बदला लेने को उबलता हुआ! नफरत से लबालब! जब ‘बुद्धि’ उकसा रही हो - ‘ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा। तुझसे पूछने वाला, सवाल-जवाब करनेवाला कोई नहीं। निपटा दे स्साले को।’ तब मैं कैसे संयमित रह पाया? थानवीजी का यह लेख पढ़ते हुए अब अनुभव हो रहा है कि अपने से बेहतर पत्रकारों की छाया में बैठने से, उन्हें काम करते हुए, ऐसे मामलों में उनकी बातें सुनते हुए, उनसे मिले संस्कारों का ही प्रभाव रहा होगा कि मैं कच्ची उम्र में समझदारी बरत पाया।