बाबा! बहुत रुलाया था आपने

आज दादा श्री बालकवि बैरागी की पाँचवीं पुण्य तिथि और चौथी बरसी है। पत्रकारिता में ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) की हैसियत प्राप्त, मध्य प्रदेश के सुपरिचित पत्रकार डॉक्टर राकेश  पाठक (ग्वालियर) ने दादा की मृत्यु के चौथे ही दिन, 16 मई 2018 को अत्यन्त आत्मीय भावाकुलता से दादा को याद किया था। राकेशजी का नयनजलसिक्त यह संस्मरण और चित्र मुझे karmveer.org से प्राप्त हुआ है। साभार प्रस्तुत है। 




बाबा कहते थे -

‘झर गए पात..
बिसर गयी टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी।’

लेकिन बाबा मैं आज करुण कथा जग से कहूँगा। कहूँ भी क्यों नहीं? कितना रुलाया था आपने हम सबको! 

सन 2006 की बात है। नवभारत में सम्पादक रहने के दौरान कोसोवो (पूर्व युगोस्लाविया) गया था। यूएन मिशन की रिपोर्टिंग करने बाद मैं नईदुनिया में सम्पादक बना तब इस यात्रा पर किताब छपी।

ग्वालियर में मेरी इस पहली किताब ‘काली चिड़ियों के देश में’ (यूरोप का यात्रा वृत्तांत) के विमोचन समारोह में आप मुख्य अतिथि थे। वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुदगल, भाषाविद् प्रो. सत्येन्द्र शर्मा और वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल साथ मंचासीन थे। कवि मित्र पवन करण संचालन कर रहे थे।

‘पहलौठी’ किताब का विमोचन था सो बहुत उमंग थी। पवन ने औपचारिकताएँ पूरी की ही थीं कि आपने अचानक माइक थाम लिया। जोर से डाँटते हुए कहा - ‘राकेश!’ (सब सन्न रह गए। मुझे कुछ समझ नहीं आया।) फिर आपने कहा - ‘तेरी किताब का विमोचन है। तू मंच पर बैठा है और माँ सामने श्रोताओं में? जा! माँ को लेकर ऊपर आ।’

मैं माँ को लेकर आया। मंच पर बैठाया।

बाबा फिर दहाड़े - ‘और उसे भी लेकर आ जिसके बिना तू अधूरा है। बहूरानी को भी मंच पर साथ बैठा।’ मैं प्रतिमा (अब स्मृतिशेष) को लेकर आया।

बाबा ने मेरे ही हाथों माँ और पत्नी का स्वागत कराया। फिर भरपूर नेह से बोले - ‘बेटा राकेश! इन दोनों के बिना तू ये किताब लिख ही नहीं सकता था।

बाबा ने अपने भाषण में जो कुछ कहा वो सबको आँसुओं के समन्दर में डुबा देने को काफी था।

बाबा हर रचना लिखते समय कागज पर सबसे पहले ‘माँ  शब्द लिखते थे। अपनी माँ को याद कर उन्होंने अपने ‘भिखमंगे’ या ‘मंगते’ होने की बात बताई। (ये उनकी माँ का आशीष ही है कि उन्होंने ‘मातृ दिवस’ को प्रस्थान किया) बाबा कहते - ‘हम लोग भिखारी नहीं भिखमंगे थे।’ कहते, ‘भिखारी फिर भी थोड़ा अच्छा शब्द है मैं तो भिखमंगा था। हमारी माँ ने हमें बनाया। सँवारा।’ वे खुद को माँ का सृजन कहते थे।

बाबा ने पूरी जिन्दगी माँग कर ही कपड़े पहने। अपने पैसे से कपड़े नहीं खरीदे। कहते थे - ‘माँग कर पहनता हूँ ताकि भूल न जाऊँ कि मैं मंगता हूँ।’ (बाबा की बहुचर्चित किताब का नाम - ‘मंगते से मिनिस्टर तक’ है।) बाबा सांसद, मन्त्री सब रहे लेकिन अपनी जमीन से हमेशा जुड़े रहे।

बोली लगवा कर 25 हज़ार में बिकवाई किताब-

विमोचन समारोह में बाबा ने एक प्रति पर मेरे और सभी अतिथियों के दस्तखत करवाये। फिर खड़े होकर कहा कि - ‘ये किताब वैसे तो सौ रुपये की है लेकिन मैं इसकी नीलाम बोली लगवा रहा हूँ। इसकी जो सबसे ज्यादा कीमत अदा करेगा उसे ये किताब मिलेगी। ये रकम गरीब बच्चों की पढ़ाई में खर्च होगी।’

सभागार में होड़ लग गई। देखते-देखते किताब की बोली हजारों में पहुँच गई।

आखिर में नगर निगम की जनसम्पर्क अधिकारी आशा सिंह ने 25 हज़ार रुपयों की बोली लगाई। उन्होंने रुँधे गले से कहा - ‘ये किताब मैं ही खरीदूँगी।’ सारे सभागार में आँसुओं का सैलाब आ गया। बाबा, चित्रा मुदगल और हम सब रो रहे थे।

बाबा ने रोते हुए कहा- ‘इस बेटी के आँसुओं से ज्यादा मूल्यवान कुछ नहीं हो सकता। अब 25 हजार से ज्यादा भी कोई बोली लगाएगा तो किताब नहीं दूँगा।’ बाबा ने मंच पर बुलाकर आशा सिंह को किताब की प्रति भेंट की।

आप बहुत याद आओगे बाबा।

-----


जबरिया मुसलमान बनाने का विरोध किया औरंगजेब ने

 भाईचारे का इतिहास - पाँचवीं/अन्तिम कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी यहाँ पढ़िए 

भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी यहाँ पढ़िए


नफरत की जो चिंगारी आज फैलाई जा रही है वह मुगलों के शासन काल में नहीं थी। 

गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में 1588 में एक तालाब खुदवाया और एक मन्दिर की आधार शिला एक मुसलमान भक्त मियाँ पीर (बाला पीर) ने रखी थी। सुलतान जैनुल आबदीन ने अमरनाथ और शारदा देवी मन्दिर में यात्रियों की सुविधा के लिए कई भवन बनवाए थे। नजीबाबाद के पठानों ने 1780 ईस्वी में अपने शायन के दौरान तीर्थयात्रियों के लिए बड़े-बड़े भवन बनवाए थे। दिल्ली के सम्राट मोहम्मद शाह ने बोधगया (बिहार) के महन्त को एक बड़ी जायदाद देने का फरमान जारी किया था। 

गुरु अर्जुन देवजी

औरंगजेब ने इलाहाबाद में महेश्वरनाथ मन्दिर के पुजारी की रकम देकर सहायता की थी। इसी तरह बलभद्र मिश्र, जादव मिश्र और गिरधर को भी धन दिया था। मुलतन के तुलई मन्दिर के एक पुजारी कल्याण दास को भी सैंकड़ों रुपये अनुदान दिया था। बाद में सुल्तान मुहम्मद मुराद बक्ष ने उज्जैन के मन्दिर में दीपक जलाने के लिए चार सेर घी हर माह देने का फरमान जारी किया था। दक्षिण के अनेक मन्दिरों के लिए भी अनुदान देने के फरमान जारी किए गए थे।

औरंगजेब पर एक आरोप यह भी है कि वह लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाता था। सबूत बताते हैं कि ऐसा नहीं था। एक सबूत यहाँ पेश है। औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने बनघेरा के राजा इन्द्रमन को कैद कर लिया था। औरंगजेब ने इन्द्रमन को आजाद करने की सिफारिश शाहजहाँ से की।

शाहजहाँ ने शर्त लगाई कि अगर इन्द्रमन मुसलमान बन जाए तो उसे छोड़ा जा सकता है। औरंगजेब ने इस शर्त को ठीक नहीं माना। उसने अपनेपिता की इस शर्त का विरोध किया। औरंगजेब का यह विरोध-पत्र अदब-ए-आलमगीरी में सुरक्षित है।

भारत की गुलामी का दौर सही मायने में अंग्रेजों के शासन से ही शुरु होता है। मुगल विदेशी थे मगर यहाँ आने के बाद वे यहीं के होकर रह गए। एन्होंने जो कमाया, यहाँ की जनता पर, यहीं खर्च किया। यहाँ की दौलत को लूट कर देश से बाहर नहीं ले गए।

मुगलों ने न यहाँ का धर्म बिगाड़ा, न भाषा बिगाड़ी, न संस्कृति, न खान-पान, पहनावा बिगाड़ा। इस देश से उन्हें कितना प्यार था इस की झलक अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की इन पंक्तियों से मिलती है 

है कितना बदनसीब जफर दफन के लिए
दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में

1857 में आजादी की पहली लड़ाई में आजादी के दीवानों ने बहादुरशाह जफर को ही अपना राजा माना था। बहादुरशाह जफर का देशप्रेम देखिए कि उसके जवान बेटों के सर कलम कर उसे पेश किए गए और उसने उफ् तक न किया। बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों ने रंगून जेल में डाल दिया। कैदी बना यह बादशाह भारत में दफन होना चाहता था मगर वह भी उसे नसीब न हो सका

बादशाह बहादुरशाह जफर

इस बादशाह की पहले से तैयार की गयी खाली कब्र आज भी महरौली में मौजूद है। जिन अंग्रेजों ने हमारा खान-पान-पहनावा और भाषा तक हम से छीन ली और जिन्होंने भारत को भिखारी बना को दिया, उनके खिलाफ ये साम्प्रदायिक लोग एक शब्द बोलना भी पसन्द नहीं करते। दरअसल अंग्रेजों ने दोनों धर्मों के बीच विष-बीज बोने के लिए इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना शुरु कर दिया। साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले आज अंग्रेजों की इसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे भी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलते थे। ये भी उसी नीति पर चल रहे हैं। आज इतिहास की सही जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। 

-----

(पहला चित्र गुरु अर्जुन देवजी, दूसरा चित्र बादशाह बहादुर शाह जफर। 
दोनों चित्र गूगल से साभार।)

शिवाजी की सेना में हजारों मुसलमान सैनिक, मुगलों के साथ मराठा सरदार

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी यहाँ पढ़िए 

भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी यहाँ पढ़िए


शाहजहाँ के बाद गद्दी पर बैठे औरंगजेब और शिवाजी की लड़ाई को भी साम्प्रदायिक ताकतें हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई बना कर पेश करती हैं। यह लड़ाई भी हिन्दू-मुस्लिम की न हो कर एक मराठा सरदार शिवाजी की राजा औरंगजेब से बगावत थी। इस बगावत में कई मुसलमान शिवाजी के साथ, तो कई हिन्दू शिवाजी के खिलाफ लड़े थे।

औरंगजेब ने शिवाजी से लड़ने के लिए राजा जय सिंह को भेजा था। जय सिंह की सेना में दो हजार मराठा घुड़सवार और सात हजार पैदल सिपाही, नेताजी पालकर की कमान में शिवाजी के विरुद्ध लड़ रहे थे। शिवाजी की सेना में दिलेर खाँ ने मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिये थे। शिवाजी की सेना में भी हजारों मुसलमान घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। यही नहीं, शिवाजी के मुंशी भी काजी खाँ थे। औरंगजेब और शिवाजी की लड़ाई हिन्दू-मुसलमानों की लड़ाई तो थी ही नहीं। यह मुगलों-मराठों की लड़ाई भी नहीं थी। बहुत से इज्जतदार मराठा सरदार हमेशा मुगलों की सेना में रहे। सिंद खेड़ के जाधव राव के अलावा कान्होजी शिर्के, नागोजी माने, आवाजी ढल, रामचन्द्र और बहीरजी पण्ढेर वगैरह मराठा सरदार, मुगलों के साथ रहे थे।


शिवाजी

राजा, राजा होता था, हिन्दू या मुसलमान नहीं। शिवाजी ने जब मुगलों के व्यापार केन्द्र सूरत पर हमला किया तो शिवाजी के सैनिकों ने वहाँ चार दिनों तक हिन्दू व्यापारियों के साथ जमकर लूटपाट की। सूरत के मशहूर व्यापारी वीरजी बोरा थे जिनके अपने जहाज थे। उस समय उनकी सम्पत्ति अस्सी लाख रुपये थी। शिवाजी के सैनिकों ने वीरजी बोरा को भी जमकर लूटा। औरंगजेब ने सूरत की सुरक्षा के लिए सेना भेजी। उसने तीन साल तक व्यापारियों से चुंगी न वसूल करने का हुक्म भी जारी कर दिया।

औरंगजेब ने अनेक ब्राह्मणों व जैनों को जायदाद के लिए स्थायी पट्टे भी जारी किए थे। औरंगजेब के ये फरमान आज भी सुरक्षित हैं। बनारस में गोसाई माधव दास, गोसाई रामजीवन दास और पालीताना में जैन जौहरी सतीदास का भी ऐसे ही फरमान दिए गए थे।

अकबर के जमाने में हिन्दू मनसबदारों की संख्या केवल 32 थी। जहाँगीर के जमाने में यह 56 हो गई। औरंगजेब के जमाने में यह बढ़कर 104 हो गई थी। इससे यह साबित होता है कि औरंगजेब को हिन्दुओं से कोई बैर नहीं था। दरबार में और सेना में हिन्दुओं की भर्ती बिना किसी भेदभाव के की जाती थी। 

मुगल शासन का यह समय हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का एक सुनहरा समय था। आज स्वार्थी लोग इस सुनहरे इतिहास पर कालिख पोतना चाहते हैें।

यही वह समय था जब कबीरदास ने पाखण्डों के लिए हिन्दू पण्डितों और मौलवियों, दोनों को लताड़ा था। आज की तरह किसी मौलवी की हिम्मत, कबीरदास के खिलाफ फतवा जारी करने की नहीं हुई, न ही कोई पण्डित, कबीरदास को दण्ड दे सका।

-----

(चित्र गूगल से साभार)


सलीम के विद्रोह में सलीम के साथ थे हिन्दू-मुसलमान

 भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)



अकबर के बेटे सलीम के विद्रोह में भी हिन्दू-मुसलमान दोनों सलीम के साथ थे। ओरछा के सरदार बीर सिंह देव ने अबुल फजल को मार दिया था। जिस पर गुस्सा  होकर अकबर ने बीर सिंह देव को मारने का फरमान जारी कर दिया। तब सलीम ने बीर सिंह देव का साथ दिया और उसे बचा लिया था। यही नहीं, अकबर की मृत्यु के बाद जब सलीम, जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा तो उसने बीर सिंह देव को अपने दरबार में ऊँचा ओहदा भी दिया। 


जहाँगीर (सलीम)

जहाँगीर के शासन में जब बीकानेर के पाँच हजारी मनसबदार राम सिंह ने विद्रोह किया तो इसे दबाने के लिए अम्बर के राय जगन्नाथ कछवाहा को भेजा गया। इसी तरह उड़ीसा के राजा पुरुषोत्तम दास को हराने के लिए टोडरमल के पुत्र कल्याण सिंह को भेजा गया था।

गलती करने पर जहाँगीर किसी मौलवी के साथ भी रियायत नहीं करता था। जहाँगीर ने मूर्खतापूर्ण उपदेश देने पर शेख इब्राहीम बाबा को चुनार में और शेख अहमद बाबा को ग्वालियर की कैद में डाल दिया था। जहाँगीर के दरबार में चित्रकार बिशनदास और हिन्दी विद्वान जदरूप गोसाई तथा राम मनोहर लाल को काफी सम्मान मिला हुआ था।

जहाँगीर ने हिन्दुओं को मन्दिर बनाने की पूरी छूट दी थी। उन्हें बिना कोई कर अदा किए धार्मिक यात्राएँ करने की छूट भी दी थी। इस तरह जहाँगीर को किसी भी हालत में साम्प्रदायिक नहीं कहा जा सकता। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में, जहाँगीर को आधा मुगल और आधा राजपूत बताया है।


शाहजहाँ

जहाँगीर के बाद शाहजहाँ ने भी हिन्दू-मुसलिम एकता की मशाल को जलाए रखा। शाहजहाँ के समय कमलाकर भट्ट ने ‘निर्णय सिन्धु’ की रचना की। कवीन्द्राचार्य ने ऋगवेद की व्याख्या लिखी, नित्यानन्द ने ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थ लिख। पण्डित जगन्नाथ ने दारा शिरोह और आसफ खान की प्रशंसा में कविताएँ लिखीं। हिन्दू विधि-विधान के लेखक मित्र मिश्र भी शाहजहाँ के ही समय में फले-फूले थे।

-------

(दोनों चित्र गूगल से साभार।)


भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - पाँचवीं/अन्तिम कड़ी यहाँ पढ़िए


राणा, राज्य-रक्षा के लिए और अकबर राज्य-विस्तार के लिए लड़े

 भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी यहाँ पढ़िए


साम्प्रदायिक लोग अकबर को भी मुसलमान और राणा प्रताप को हिन्दू बना कर पेश करते हैं। अकबर ने धर्म के नाम पर खड़ी की गयी दीवारों को तोड़ा था। उसने राजपूत कुल में शादी की थी। उसने ‘दीन-ए-इलाही’ नाम से नया धर्म चलाने की भी कोशिश की थी। राणा प्रताप के नाम पर राजनीति करने वालों ने अकबर को भी नहीं बख्शा। 


अकबर

असलियत यह है कि राणा प्रताप अपने राज्य की रक्षा के लिए लड़ रहे थे और अकबर अपने राज्य के विस्तार के लिए। न राणा प्रताप का मकसद हिन्दू धर्म की रक्षा करना था, और न ही अकबर का मकसद इस्लाम की रक्षा करना था। अगर ऐसा होता तो राणा प्रताप के साथ मुसलमान न होते और अकबर के साथ हिन्दू न होते।


महाराणा प्रताप

अकबर की सेना का सेनापति राजा मान सिंह था। राणा प्रताप की सेना के आगे हकीम खान सूर अपने आठ सौ घुड़सवारों के साथ चल रहा था। इस लड़ाई को हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई कहना इतिहास का मजाक उड़ाना है।


राजा मान सिंह 

अकबर ने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए बहुत कुछ किया था। अकबर ने गाय के मांस पर पूरा तरह पाबन्दी लगा दी थी। यही नहीं, जो हिन्दू किसी कारण से मुसलमान बन गये थे उन्हें फिर से हिन्दू बनने की इजाजत दे दी थी।

अकबर ने नवरत्नों में राजा टोडरमल, बीरबल और तानसेन जैसी हस्तियाँ थीं। अकबर की सेना में राजा मान सिंह का पुत्र जगत सिंह, राय रैयन (विक्रमादित्य द्वितीय), राय लौन करण, रामचन्द्र बघेल, बाथ का राजा आदि प्रमुख सेनापति थे।

अकबर ने संस्कृत ग्रन्थों के अरबी और फारसी में अनुवाद की परम्परा भी शुरु कराई। अकबर ने उस समय की हिन्दी को बढ़ावा दिया था। अकबर ने बीरबल को कविराज की उपाधि दे रखी थी । राजा भगवान दास, राजा मान सिंह, अब्दुरहीम खानखाना अकबर के दरबारी हिन्दी कवि थे। दरबार के बाहर तुलसीदास,  सूरदास, नाभाजी, केशव और नन्ददास आदि कवियों ने अकबर के समय ही कविता की थी। गोपाल भट्ट नामक कवि को भी अकबर के दरबार में पूरी इज्जत मिली थी।

(सभी चित्र गूगल के सौजन्य से साभार।)

-----


भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - पाँचवीं/अन्तिम कड़ी यहाँ पढ़िए



किसी राजा ने कभी धर्म युद्ध नहीं लड़ा

भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की हर समय यह कोशिश रहती है कि भारत के इतिहास को साम्प्रदायिक बनाकर पेश किया जाए। बाबर-राणा सांगा की लड़ाई हो या अकबर-महाराणा प्रताप की या शिवाजी और औरंगजेब की। ये लोग राणा सांगा, महाराणा प्रताप और शिवाजी को हिन्दू बनाकर पेश करते हैं तथा बाबर, अकबर और औरेंगजेब को मुसलमान बना कर। सही बात तो यह है कि राजा, राजा होता था, उसकी सेना में हिन्दू-मुसलमान सभी होते थे। जब राजा को मौका मिलता था, वह हिन्दू-मुसलमान सभी के साथ लूटमार करते थे। मन्दिर ज्यादा इसलिये लूटे जाते थे कि वहाँ सोना-चाँदी और धन जमा होता था। मस्जिदों में ऐसा कुछ न पहले होता था, न अब होता है। राजाओं का काम अपने राज्य का विस्तार करना होता था। उनके रास्ते में जो भी आता था, वह उन का दुश्मन होता था। अगर राजाओं का धर्म से कुछ लेना-देना होता तो कोई हिन्दू राजा किसी हिन्दू राजा पर हमला नहीं करता और न ही कोई मुसलमान राजा किसी मुसलमान राजा पर हमला करता। साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले लोग राजाओं को भी धर्म का रखवाला बना कर पेश करते हैं। राजाओं का काम ज्यादा से ज्यादा इलाका अपने कब्जे में करना होता था। वे ज्यादा से ज्यादा टैक्स वसूल करके अय्याशी करना चाहते थे।


राणा सांगा

औरंगजेब

किसी राजा ने कभी धर्मयुद्ध नहीं लड़ा। अगर किसी राजा के बारे में ऐसा कहा जाता है तो वह झूठ है। धार्मिक स्थानों को तोड़ने की बात है तो पहले न तो ईंट भट्टे थे न सीमेण्ट के कारखाने और न पत्थर तराशने के कारखाने। एक स्थान का मलबा दूसरे में प्रयोग करना आम बात थी। धार्मिक रंग देकर अपनी राजनीति करने वालों की पता चाहिए कि राजतन्त्र का बदला लोकतन्त्र में नहीं लिया जा सकता।

यहाँ एक बात बड़ी मजेदार है कि साम्प्रदायिक ताकतों का इतिहास बाबर से शुरु हो कर औरंगजेब पर खत्म होता है। फिर मुस्लिम लीग के जन्म से देश के बँटवारे पर खत्म हो जाता है। बाबर से पहले का समय इनके इतिहास का विषय नहीं है, न ही अंग्रेजों की गुलामी और उनके द्वारा दी गयी गुलामी की निशानियाँ इनके इतिहास में हैं।

हम बाबर से शुरु करते हैं।

बाबर

बाबर के साथ लड़ाई में राणा सांगा अकेला नहीं था। हसन खाँ मेवाती और महमूद लोदी भी उसके साथ थे। इब्राहीम लोदी का भाई सुल्तान अहमद लोदी भी बाबर से लड़ने के लिए राणा के झण्डे के तले आ गया था। इस तरह से बाबर के खिलाफ लड़ाई में उस समय भारत के हिन्दू और एकजुट थे।

बाबर के बाद उसका बेटा हुमायूँ राजा बना। शेरशाह के हमले के समय ब्रह्माजीत गौड़ उसका पीछा कर रहा था उस समय अटेल के राजा वीरभान ने हुमायूँ को नदी पार कराई थी। वीरभान ने अपनी सहायता की भावना से यह काम किया था। अगर उसमें हुमायूँ के धर्म के बारे में कोई गलत विचार होता तो वह उसे वहीं खत्म कर सकता था। 

हुमायूँ 

हुमायूँ जब अमरकोट पहुँचा तो राजपूतों और जाटों की सेना ने उसे भरपूर मदद पहुँचाई थी। हुमायूँ ने जब अमरकोट छोड़ा तो उसकी बेगम हमीदा बानो गर्भवती थी तथा पूरे दिन से थी। इसलिए उसने बेगम को वहीं राजपूत स्त्रियों के पास छोड़ दिया। यहीं पर हुमायूँ के जाने के तीन दिन बाद अकबर का जन्म हुआ था। अमरकोट के राजा ने हुमायूँ की बेगम की देखभाल अपनी बेटी की तरह की थी।

(सभी चित्र गूगल के सौजन्य से साभार।)

-----


भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - पाँचवीं/अन्तिम कड़ी यहाँ पढ़िए



गुल से लिपटी रही तितली

आज दादा श्री बालकवि बैरागी का 93वाँ जन्म दिन और 92वीं जन्म वर्ष-गाँठ है। उनके प्रेमी-प्रशंसक उन्हें आत्मीयता और श्रद्धा-प्रेम से याद कर रहे हैं। याद करनेवालों में कलमकार भी हैं और राजनीतिकर्मी भी। 

दादा की राजनीति आजीवन काँग्रेस-प्रतिबद्धता की रही। काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति के चलते उन्हें जिस भी हाल में रहना पड़ा,सदैव प्रसन्नतापूर्वक रहे। कभी, कोई शिकायत नहीं की। जब भी किया, पार्टी का बखान और पार्टी के प्रति कृतज्ञता, आभार ही प्रकट किया। वे साहित्य को अपना धर्म और राजनीति को अपना कर्म कहते थे। अपने ‘धर्म और कर्म’ की शुचिता और पावनता की रक्षा और निर्वाह उन्होंने आजीवन, अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया। अनजाने में भी दोनों का घालमेल नहीं होने दिया। अपने बारे में वे सदैव कहते थे - “मै ‘काँग्रेसी कवि’ हूँ, ‘काँग्रेस का कवि’ नहीं।” इस बारीक अन्तर को लोग समझें या नहीं, इसकी परवाह किए बिना वे अपना जीवन जीते रहे।

राजनीतिक निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़ा उनका एक प्रसंग मुझे गए कई दिनों से बराबर याद आ रहा है।   

चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर घमासान मचना आम बात है। जिसे उम्मीदवारी मिल जाती है, उसके यहाँ वसन्त आ जाता है और जिसे नहीं मिलती वह खुद को पतझड़ में पाता है। पतझड़ में वसन्त लाने की ललक, लोभ-मोह में आदमी पार्टियाँ बदल लेते हैं। कल जिसे डायन कहते नहीं थकते थे उसी पार्टी को आज माँ कह कर लहालोट हो जाता है। आत्मा, नैतिकता, लोकलाज जैसे मूल्य, अवैध सन्तानों की तरह त्याग दिए जाते हैं। सत्ता की सम्भावनाओं के वीरान में अकेले रहना अब शायद ही किसी को भाता हो। निष्ठा और प्रतिबद्धता का निर्वाह अब या तो लाचारी में किया जाता है या लालच में। आत्मा और नैतिकता के आधार पर विरले ही ये मूल्य निभा रहे हैं।

1967 से 1972 तक दादा विधायक रहे। इस काल में 1969 से 1972 तक वे मध्य प्रदेश के सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री रहे। 1972 के विधान सभा चुनावों में उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली। शायद ही कोई विश्वास करे, उम्मीदवारी की भागदौड़ और प्रतियोगिता में दादा कभी नहीं रहे, कभी ‘केम्पेनिंग’ नहीं किया। उनके लिए जब भी किया, उनके नेताओं ने किया। 

सो, 1972 में जब उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली तो हजारों-हजार बातें चलीं। लेकिन ‘बातों’ के इस गुबार में दादा बराबर चुप्पी साधे रहे। 

इसी बीच, मार्च 1972 में, ‘दिनमान’ के एक अंक में दादा की दो कविताएँ छपीं तो काँग्रेस की आंचलिक राजनीति में एक, छोटा-मोटा तूफान सा आ गया। ‘दिनमान’ उस समय ‘राजनीतिक बजट’ का ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) माना जाता था। उसमें जगह पाना ‘बड़ी’ और ‘प्रतिष्ठा’ की बात होती थी। श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सह सम्पादक थे। दादा की ये दो कविताएँ सर्वेश्वरजी की टिप्पणी सहित निम्नानुसार छपी थीं -

आक्रोश का सन्दर्भ: 

असत्य से हम व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों से जुड़े होने के कारण भी टकराते हैं और निजी स्वार्थों से जुड़े होने के कारण भी। इसलिए सत्य कहने, विरोध करने और जूझने-टकराने का मूल्य उस सन्दर्भ से ही लगाया जाता है। एक मुद्दा चुनाव का है, जिसे टिकिट नही मिलता उसे गुस्सा आता है। जिसकी जबान चलती है वह बकता-झकता है। जिसकी कलम चलती है वह उसे दौड़ाता है।  बालकवि बैरागी को चुनाव टिकिट नहीं मिला। उन्होंने एक पत्र के साथ कुछ कविताएँ भेजीं। दो यहाँ दी जा रही हैं जो उनके रचनात्मक आक्रोश को एक दिलचस्प पहलू प्रदान करती है:

“मध्यप्रदेश के सूचना प्रसारण राज्य-मन्त्री का चोला उतरने पर कविसम्मेलनों में घूम रहा हूँ। ‘जहाज का पंछी’ या ‘लौट के बुद्धू’ जो भी कहें। ‘दिनमान’ के लिए इस पत्र के साथ छोटी-छोटी कविताएँ (कुछ एडहॉक कविताएँ) भेज रहा हूँ। नीमच से भागलपुर तक के प्रवास में थर्ड स्लीपर में जो बातें मुसाफिर इन दिनों करते हैं वही प्रेरणा है। इस प्रकार की ये पहली कविताएँ हैं जो इंदिरा जी के एक अनुयायी द्वारा लिखी जा रही हैं। मैं कल, आज और कल उनके पीछे था, हूँ और रहूँगा। लोग कैसी कैसी बातें करते हैं कि क्या कुछ कहें और उत्तर दें!”

                (1)

व्यंग्य कर के कहने लगे त्यागी जी
‘कहिए बैरागी जी!
चला गया न मन्त्रीपद?
छिन गयी न विधायकी?
और करो काँग्रेस की भाँडगिरी
चापलूसी और गायिकी?
मरोड़ दी न मिसिरजी ने घेंटी
कत्ल हो गए न श्यामाचरण?
आ गए न सेठी?
अच्छे भले चल रहे थे
मरे राजनीती में
कुर्सी के लालच में
फँस गए न फजीती में-’
मैंने उनके कानों से मुँह सटाया
कन्धा दबाया
आँख मारी और समझाया
“गुरु! मौसम शानदार है
भाव ऊँचे दिख रहे हैं
‘गाय बछड़े’ वालों के
छिलके भी काजू के भाव बिक रहे हैं।
बैठा नहीं रहूँगा यूँ ही
काजू न सही मूँगफली तो हूँ ही
जुलूस में सबसे आगे हो लूँगा
गला फाड़ कर जय बोलूँगा
बड़ा भरोसा है मेरा
जवाहरलाल की बेटी में
कभी तो रहम खाएगी
और घुसेड़ देगी किसी
एडहॉक कमेटी में।”

                (2)

चुनाव लड़ने वालो!
तुम किसी भी पार्टी में क्यों न हो
ले जाओ नया नारा
इतना लगाओ, इतना लगाओ
कि फट जाए आसमान सारा
‘इन्दिरा गाँधी जिन्दाबाद
बाकी दुनिया मुर्दाबाद।’

-----

जैसा कि मैंने कहा ही है, इन कविताओं ने काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति में तूफान सा ला दिया। दादा के प्रतिद्वन्द्वी काँग्रेसियों ने इन कविताओं को इन्दिरा-विरोधी और इन्दिराजी का अपमान घोषित कर, दादा को काँग्रेस से निष्कासित करने का अभियान शुरु कर दिया। कुछ ही महीनों चला यह अभियान यद्यपि अन्ततः ‘चाय की प्याली में तूफान’ की गति को ही प्राप्त हुआ लेकिन वे कुछ महीने मन्दसौर जिले की काँग्रेस की राजनीति के बड़े ही तनाव भरे महीने रहे। 

जिला काँग्रेस पर दादा के प्रतिद्वन्द्वी गुट का कब्जा था। दादा तो अपने कवि सम्मेलनी दौरों पर रहते थे। वे पत्रकारों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रह सकते थे। संचार साधन बहुत ही सीमित थे। लेकिन प्रतिद्वन्द्वी तो, चौबीसों घण्टे, यहीं के यहीं थे। सो, स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन एक न एक सुर्खी बनी रहती थी। दादा की अनुपस्थिति में दादा के समर्थक, प्रेमी अपनी क्षमतानुसार मोर्चा बचाने के लिए ‘युद्ध-रत’ थे। दोनों खेमों की फौज, ‘खुद राजा से अधिक राजा के प्रति वफादार’ की भावना से आमने-सामने थे। लेकिन दादा पर इस अभियान का कोई प्रभाव नजर नहीं आता था। वे जब भी आते, अपने प्रेमियों से कहते - “क्यों अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो? कुछ नहीं होना-जाना। तुम सब यहाँ मरने-मारने पर उतारू हो। जबकि ‘ऊपरवालों’ को इस बात की हवा भी नहीं है। घर-गृहस्थी लेकर बैठे हो! बाल-बच्चे पालने हैं कि नहीं? अपना-अपना काम करो भाई!”

दादा की ऐसी बातें सुन-सुन कर दादा के समर्थक पशोपेश में पड़ जाते - ‘यहाँ हम जी-जान से भिड़े हुए हैं और दादा हैं कि हमें ही हड़का रहे हैं?’ इसी मनोदशा में, झुंझलाए कुछ प्रेमियों को दादा ने एक बार घेर लिया और ‘आर-पार’ की लड़ाई की बात करने लगे। एक ने तमक कर कहा - ‘आप बड़े नेता हो। आप तो अपना काम चला लोगे। लेकिन जब आप ही (काँग्रेस में) नहीं रहोगे तो हमारी तो दुर्गति हो जाएगी। हमें कौन बचाएगा?’

दादा को शायद इस बात का अनुमान रहा होगा। उन्होंने कहा - ‘देखो! मेरा तो जनम ही काँग्रेस में हुआ है। मैं जन्मा भी काँग्रेस में और मरूँगा भी काँग्रेस में।’ थोड़ा रुक कर बोले - ‘मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों से मेरा नाम लेकर कहना कि हो सकता है कि वे मुझे काँग्रेस से निकाल दें। लेकिन मेरे अन्दर, मेरी आत्मा में जो काँग्रेस है, है उनकी या किसी हिम्मत कि उसे निकाल दे?’ 

दादा की बात सुनकर उनके सारे प्रेमी चुप हो गए। अपना जाना-पहचाना ठहाका लगा कर बोले - “उन्हें मेरी ओर से यह शेर सुना देना -

‘गुल से लिपटी हुई तितली को गिराओ तो जानूँ,
हवाओं, तुमने दरख्तों को गिराया होगा।’

 मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों को कोई काम ही नहीं है। सब फुरसतिये हैं। लेकिन यार! तुम तो कामकाजी लोग हो! किसके चक्कर में अपना वक्त खराब कर रहे हो? मैंने अपने कवि सम्मेलन बन्द कर दिए क्या? कहीं, कुछ भी होना-जाना नहीं है। अपना-अपना और काँग्रेस का काम करो भैया! काँग्रेस का काम है देश बनाना। यह, बहुत बड़ा काम है। इसी में जुट जाओ।”

दादा के प्रेमियों ने भारी और बुझे मन से, अत्यधिक अनिच्छापूर्वक दादा का कहा माना। लेकिन इसके बाद हुआ वही जो दादा ने कहा था। कहीं, कुछ भी नहीं हुआ। पत्ता भी नहीं खड़का। 

यह तो 1972 की बात थी। लेकिन जमाने ने देखा - तितली अपने गुल से ही लिपटी रही। अपनी अन्तिम साँस तक।

-----


दल बदलना याने माँ की कोख बदलना


दादा श्री बालकवि  बैरागी ने नियमित रूप से डायरी कभी नहीं लिखी। किन्तु सन् 2004 मेंअकस्मात ही उन्होंने प्रकट किया कि उन्होंने सन् 2001 की, पूरे 365 दिनों की डायरी लिखी है। भोपाल में ‘दुष्यन्त स्मारक’ वाले श्री राजुरकर राज ने यह डायरी, ‘पड़ाव प्रकाशन, भोपाल’ से मई 2004 में, ‘बैरागी की डायरी’ शीर्षक से प्रकाशित की है।यहाँ प्रस्तुत अंश उसी डायरी से, दादा के वक्तव्य से लिया गया है।

दादा, जून 1999 से जून 2004 तक, संसद के उच्च सदन, राज्य-सभा के सदस्य रहे। जैसा कि अपनी इस डायरी में दादा ने ही कहा है, इस डायरी लेखन की जानकारी, दादा के सिवाय किसी को भी नहीं थी। और तो और मेरी भाभीजी श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी को भी नहीं।

अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने के लिए नेताओं द्वारा राजनीतिक निष्ठा बदलने के, हतप्रभ करनेवाले इस लज्जाजनक समय में दादा की ये बातें अविश्वसनीय ही लगेंगी। 

मैं प्रायः कहता रहता हूँ कि प्रत्येक आदमी की एक कीमत होती है और हर आदमी खरीदा जा सकता है। किन्तु यदि भिखारी भी धार ले कि उसे नहीं बिकना है तो उसे कुबेर भी नहीं खरीद सकता।

दादा के वक्तव्य का यह अंश इस बात का एक छोटा सा प्रमाण है।

-----


अनायास ईश्वरीय वरदान की तरह श्रीमती सोनिया गाँधी ने जून 998 में मध्यप्रदेश के राजनीतिक परिवेश की आशाओं और अनुमानों में एक नया पृष्ठ जोड़ते हुए मुझे संसद के राज्य-सभा सदन में सदस्य चुनवाकर बैठा दिया। पूरे छः वर्षाे के लिए। 

सन् 1945 से इन पंक्तियों के लिखने तक मैं काँग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर तिरंगा हाथ में थामे अपना जीवन जी रहा हूँ। ईश्वर ने मुझे कलम थमाकर एक सर्वथा भिखमंगे (शत-प्रतिशत मँगते) परिवार में जन्म दिया। माँ ने मुझे टूटने से बचाया। आजन्म अपाहिज और लाचार बाप का मैं जेठा बेटा। पूर्णतः माँ का निर्माण। मैं खुद कहता रहा हूँ - ‘गरीब के घर में बच्चा पैदा नहीं होता-हमेशा बूढ़ा ही पैदा होता है।’ सो वही मैं। होश आने पर मैंने कहा - ‘साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म।’ धर्म और कर्म के बीच की क्षीण-सी रेखा को मैंने न लाँघा, न मिटाया। मान-सम्मान, अपमान, पुरस्कार, तिरस्कार, प्यार, प्रताड़ना, उतार-चढ़ाव, सिंहासन-आसन-निरासन, पद-अपद, जो भी मिला, सभी को प्रभु का प्रसाद मानकर ठहाकों के साथ चलता रहा। काँग्रेस की राजनीति में न कभी मचला, न कभी फिसला, न कभी बहका, न कभी बिका। मुझे खरीदने बड़े-बड़े धनी, राजे-महाराजे, रानियाँ-महारानियाँ अपने-अपने समय पर पूरी निर्लज्जता से पधारे। मेरे अभावों, मेरी गरीबी और मेरे संघर्षाें के खुले आकाशी तम्बू में मुझे ठहाका लगाते देख, पानी-पानी होकर लौट गये। आजादी की लड़ाई में मैंने नाखून भी नहीं कटाया किन्तु श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने मुझे मध्य-प्रदेश में दो बार मिनिस्टर बनवाया। एक बार संसदीय सचिव बनवाया। श्री राजीव गाँधी ने मुझे मन्दसौर जैसे विकट क्षेत्र से लोकसभा में चुनवाया और श्रीमती सोनिया गाँधी की अहेतुकी कृपा के कारण इस समय राज्यसभा का एक मुखर कॉँग्रेसी सदस्य हूँ। जी हाँ, मेरे कार्यकाल के पूरे छः वर्ष इसी 29 जून 2004 को पूरे होने जा रहे हैं। दलबदल और आस्था बदल जैसे कलंक मुझ पर कभी नहीं लगे। दलबदल पर मैंने एक टिप्पणी कर दी-‘पता नहीं लोग माँ की कोख कैसे बदल लेते हैं?’ कुछ लोग भौंचक सुनते रहे। श्रोताओं ने उन लोगों की तरफ ठहाका मारकर व्यंग्य से देखा।

अभी-अभी, लोक-सभा के चुनावी मौसम में एक महानुभाव मुझ टटालने पधारे। उन्हें लगा, बैरागीजी की राज्य-सभा टर्म खत्म हो रही है। लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं। ये पार्टीवालों को चुनाव लड़वा रहे हैं, ख़ुद नहीं लड़ रहे हैं। मध्य-प्रदेश में काँग्रेस केे पास विधानसभा में संख्या बल इतना भी नहीं है कि कोई एक सदस्य राज्यसभा में पार्टी ला सके। तब फिर ये क्या करेंगे? मुझसे पूछ बैठे - ‘आप अपने बारे में क्या सोच रहे हैं? कहीं किसी द......ल.......ने.......ता..... वेता से बात हुई या हम.......।’ मैं तैयार बैठा था। उनका वाक्य पूरा हो उससे पहले ही बोला - ‘मैं अपने बारे में सोच रहा हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरे आँगन में से मेरी लाश को जलाने के लिये कुत्ते अपने आँगन में लिये नहीं चले जायें। बचाना। अपने उत्तराधिकारियों से कह रहा हूँ।’ उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।

मैंने रहीम को पढ़ा है। महाकवि ने लिखा है-

सर सूखे, पंछी उड़े, औरे सरन समाहिं।
दीन मीन बिनु पंख के, कहु रहीम कँह जाहिं।।

दलबदल की राजनीति पर मैं यह दोहा चस्पा करता हूँ। तालाब का पानी सूखने पर उसके किनारे के हरे-भरे वृक्षों पर किलोलें करने वाले पंछी दूसरे तालाबों के किनारों पर चले जाते हैं, लेकिन उस सूखते तालाब की मछलियाँ तड़प-तड़प कर उसी तालाब में जान दे देती हैं पर तालाब नहीं छोड़तीं। पंख मछली के पास तैरने के लिए होते हैं। पंख पक्षियों के पास उड़ने के लिए होते हैं। मेरा और आस्था-बदल दलबदलुओं का यही फासला है। वे हरियाली की तलाश में कहीं भी जा सकते हैं। मुझे इसी तालाब में जान देनी है।

-----