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ओछी पूँजी, बड़ी दुकान, इसीलिए यह राधा नहीं नाचेगी - 3



भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथसिंह ने पार्टी के तमाम नेताओं-कार्यकर्ताओं को हड़का दिया है - ‘चुप रहो! नरेन्द्र मोदी को प्रधान मन्त्री बनाने का हल्ला-गुल्ला बन्द करो।’ असर हुआ तो जरूर किन्तु सौ टका नहीं। गुबार बैठा तो सही किन्तु गर्द अभी भी बनी हुई है। शोर थमा तो जरूर किन्तु धीमी-धीमी भिनभिनाहट हवाओं में गूँज रही है। कुछ बिगड़ैल बच्चे हर कक्षा में होते हैं जो अपने-अपने मास्टरजी की नाक में दम किए रहते हैं। देखिए न! राहुल ने सरे आम हड़काया लेकिन बेनी बाबू ने सुना? 

इस बीच, अभी-अभी ही, एक बात और हो गई। वेंकैया नायडू ने कह दिया कि पार्टी की ओर से किसे प्रधान मन्त्री घोषित किया जाए - यह फैसला, भाजपा का संसदीय बोर्ड तय करेगा। नायडू का कहना याने पार्टी का आधिकारिक वक्तव्य! गोया नायडू ने, वायुमण्डल में ठहरी हुई, थेड़ी-बहुत गर्द पर पानी की बौछार कर दी और हवाओं में बनी हुई भिनभिनाहट को म्यूट कर दिया।

ऐसे में अब, जबकि नरेन्द्र मोदी के प्रधान मन्त्री की दावेदारी को लेकर पार्टी, आसमान को साफ और हवाओं को निःशब्द कर चुकी हो, जब मैं खुद ही कह चुका हूँ कि मोदी के प्रधान मन्त्री न बनने का तीसरा कारण ‘सुपरिचित, जगजाहिर और घिसा-पिटा’ है, तो इस तीसरी कड़ी की क्या आवश्यकता और औचित्य?

मुझे किसी की भी सामान्य-समझ (कॉमनसेन्स), दूरदर्शिता और चीजों को समझने की क्षमता पर रंच मात्र भी सन्देह नहीं। लेकिन मैंने अपनी ओर से वादा किया था। सो, उसे ही निभाने के लिए यह तीसरी कड़ी।  

तर्क और अनुमान तो, अपनी सुविधा और इच्छानुसार जुटाए और गढ़े जा सकते हैं किन्तु गणित में यह सुविधा नहीं मिल पाती। तर्क शास्त्र का सहारा लेकर, दो और दो को पाँच साबित करने का चमत्कार दिखानेवाले जादूगर को भी, किराने की दुकान पर पाँचवा रुपया नगद गिनवाकर चुकाने पर ही पाँच रुपयों की कीमत का सौदा-सुल्फ मिल पाता है। तर्कों की अपनी हकीकत हो सकती है किन्तु हकीकतों के कोई तर्क नहीं हो पाते। यह ‘तर्क रहित हकीकत’ ही नरेन्द्र मोदी के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है।

यहाँ फिर एक बार मालवी की एक कहावत मेरी बात को आसान करती है। यह मालवी कहावत है - ‘ओछी पूँजी घर धणी ने खाय।’ अर्थात्, कम पूँजी के दम पर व्यापार नहीं किया जा सकता। कम पूँजी पर व्यापार करनेवाला व्यापारी अन्ततः डूबता ही डूबता है। डूबने से बचने का एक ही उपाय है - प्रचुर पूँजी। यदि प्रचुर न हो तो उसका यथेष्ट (जरूरत के मुताबिक) होना तो अनिवार्य है ही। अपनी पूँजी कम हो और खुद को बचाए रखने की ललक हो तो अपने जैसे, कम पूँजीवाले किसी दूसरे व्यापारी को तलाशा जाता है। तब, कम पूँजीवाले दो व्यापारियों की सकल पूँजी मिलकर जरूरत के मुताबिक हो जाती है। दोनों के मिलने के बाद भी पूँजी कम पड़े तो, कम पूँजीवाले किसी तीसरे की तलाश की जाती है। आवश्यकतानुसार यह सिलसिला बढ़ता चला जाता है और तब ही थमता है जब कि कम पूँजीवाले ऐसे तमाम व्यापारी खुद को बचाए रखने की स्थिति में आ जाएँ। व्यापार में ऐसे उपक्रम को भागीदारी या प्रायवेट लिमिटेड कहा जाता है जबकि राजनीति में इसे ‘गठबन्धन’ कहा जाता है। राजग (एनडीए) और संप्रग (यूपीए), भारतीय राजनीति के, ओछी पूँजीवाले ऐसे ही व्यापारियों के जमावड़े हैं जहाँ खुद को बचाए रखने के लिए साथवाले को बचाए रखना ‘विवशताजनित बुद्धिमानी और व्यवहारिकता’ बरती जा रही है। दिलजले लोग इसे इसे, ‘मीठा खाने के लिए जूठन खाना’ कहते हैं।

अब यह कहनेवाली बात नहीं रही कि दिल्ली में अपने दम पर सरकार बना पाना न तो काँग्रेस के लिए सम्भव है और न ही भाजपा के लिए। दोनों को बैसाखियाँ चाहिए ही चाहिए। मजे की बात है कि सारी की सारी ‘बैसाखियाँ’ इन दोनों दलों पर बिलकुल ही भरोसा नहीं करतीं। भरोसा करना तो बाद की बात रही, सबकी सब इन दोनों से भयाक्रान्त बनी रहती हैं। कभी-कभी तो यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि ये ‘बैसाखियाँ’ किस कारण इन्हें सहारा देती हैं - सत्ता में भागीदारी के लाभ लेने के लिए या येन-केन-प्रकारेण अपना अस्तित्व बचाए और बनाए रखने के लिए? अपने लिए इन्हें इन दोनों में से किसी न किसी के साथ जुड़ना ही पड़ता है। सो, ये सब, ‘कम हानिकारक’ को चुनती रहती हैं। करुणा (निधि), ममता, माया और जय ललिता, के पास ‘दोनों घाटों पर सत्ता-स्नान के अनुभव की अतिरिक्त/विशेष योग्यता’ है। कुछ दल ऐसे हैं जिन्हें या तो भाजपा के ही साथ रहना है या फिर काँग्रेस के साथ ही। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनकी पहचान ‘काँग्रेस विरोध’ है और जो शुरु से हैं तो राजग (एनडीए) के साथ किन्तु पाला बदलने में उन्हें रंच मात्र भी असुविधा नहीं होगी और क्षण भर की देरी नहीं लगेगी। जनता दल युनाइटेड (जदयू) और बीजू जनता दल (बीजद), राजग के ऐसे ही दो साथी हैं। इनका जो आयतन और घनत्व राजग के लिए ‘अपरिहार्य होने की सीमा तक महत्वपूर्ण’ है, इनका वही आयतन और घनत्व, भाजपा के लिए चिन्ता और मुश्किलें बढ़ाता है। उड़ीसा में नवीन बाबू (बीजद) ने भाजपा की बोलती ही बन्द कर रखी है जबकि बिहार में नीतिश की मुस्कान ‘जानलेवा’ बनी हुई है। राजग के घटकों की कम होती संख्या, इन दोनों दलों की अपरिहार्यता और महत्व में बढ़ोतरी ही करती है।

हालाँकि यह कल्पना में भी सम्भव नहीं है किन्तु राजनीतिक आकलन में मूर्खतापूर्ण दुस्साहस बरतते हुए कल्पना की जा सकती है कि बाकी सारे घटक भले ही एक बार, नरेन्द्र मोदी के नाम पर ‘मूक सहमति’ जता दें किन्तु उड़ीसा और बिहार के दोनों जननायक ऐसा कभी नहीं करेंगे। करते तो भला ऐसी, सतही और कच्ची विचार-भूमिवाली आलेख-श्रृंखला की गुंजाइश बन पाती?

यही भाजपा का संकट है और मोदी के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा भी। अकाली दल जैसे घटकों को छोड़ दें तो बाकी सारे घटकों का काम, भाजपा के बिना चल सकता है किन्तु इन सबके बिना भाजपा का काम नहीं चल सकता। सत्ता की व्यसनी काँग्रेस के लिए नवीन पटनायक और नीतिश को कबूल करना तनिक भी कठिन नहीं होगा। समाजवादी विचारधारा के सूत्र काँग्रेस से जुड़ने में कोई मानसिक बाधा नहीं होगी। धर्मनिरपेक्षता की रक्षा और साम्प्रदायिकता के विरोध के नाम पर तो बिलकुल ही नहीं। सामान्य समझ रखनेवाला राजनीतिक प्रेक्षक भी जानता है कि नवीन पटनायक और नीतिश को लपकने के लिए काँग्रेस आतुर बैठी है जबकि मोदी को प्रधानमन्त्री बनाने के नाम पर इन्हें राजग में बनाए रखना, भाजपा के लिए असम्भवप्रायः ही है। ऐसे में, यह कहना अधिक ठीक होगा कि इन दोनों को साथ बनाए रखना नहीं  बल्कि इन दोनों के साथ बने रहना भाजपा की अपरिहार्यता भी है और मजबूरी भी।

इसी बीच, राजग के संयोजक और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव की, अभी-अभी छोड़ी गई, एक ‘छछूँदर’ ने यदि भाजपा की नींद उड़ा दी हो तो अचरज नहीं। शरद यादव ने, राजग के घटकों में बढ़ोतरी की कोशिशें करने की आवश्यकता जताई है। इस 'छछूँदर' का राजनीतिक पेंच यह कि जितने अधिक घटक दल होंगे, भाजपा को उतने अधिक दलों की खुशामद करनी पडेगी। घटक दलों की अधिकता, भाजपा का वजन भी कम करेगी। अटलजी के बाद भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं बचा है जिसके नाम पर, राजग के सारे घटक सहमत हो जाएँ। यह अटलजी का ही करिश्मा था कि लगभग सवा दो दर्जन दल, राजग में प्रेमपूर्वक बने हुए थे। आज तो स्थिति यह हो गई है कि गिनती के घटकों को सम्हाले रखना भाजपा के लिए सर्कसी-करतब से कम कठिन नहीं हो रहा है। ऐसे में मोदी के नाम का असर इन सब पर बिलकुल वैसा ही होता नजर आ रहा है मानो कनखजूरे पर शकर डाली जा रही हो। 

मौजूदा राजग : ढेर सारे चले गए, गिनती के रह गए

ऐसे में, जबकि 2014 के चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलना नहीं है, जबकि बाकी सबका काम भाजपा के बिना चलता नजर आ रहा हो लेकिन इनके बिना भाजपा का काम चलना नहीं, जबकि काँग्रेस ने सबके लिए सारे रास्ते खुले रखे हुए हों लेकिन मोदी के नाम पर भाजपा के सारे रास्ते बन्द होते नजर आ रहे हों और सत्ता का मीठा खाने के लिए उसे जब सहयोगी दलों पर ही निर्भर होना है तो उसे ‘राग मोदी’ आलापना बन्द करना ही पड़ेगा। ऐसा वह कर भी लेगी। सत्ता जरूरी है, मोदी नहीं। सत्ता के लिए जब ‘राष्ट्रीय अस्मिता’ और ‘धार्मिक आस्था’ के अपने (राम मन्दिर, समान नागरिक संहिता और धारा 370 जैसे) तमाम ‘बेस्ट सेलेबल मुद्दे’ हिन्द महासागर में डुबाए जा सकते हों (याद करें कि राजग गठन के समय केवल भाजपा ने अपने मुद्दे छोड़े थे, अन्य किसी भी दल ने अपना कोई मुद्दा नहीं छोड़ा था) तो ‘एक आदमी’ से जान छुड़ाना तो बिलकुल ही मुश्किल नहीं होगा। फिर, मोदी के बहाने एक बार फिर वही पुरानी (भाजपा और संघ की, एक साथ दोहरी सदस्यतावाली) बहस शुरु होने की आशंका बलवती हो जाएगी जिसके चलते जनता पार्टी का विघटन हुआ था! भाजपा इस वक्त तो यह जोखिम बिलकुल ही नहीं लेना चाहेगी।

इसलिए, जबकि खाँटी संघी और नादान भाजपाई भी मान रहे हों कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलना नहीं (कोई भी 160-180 से आगे नहीं बढ़ रहा) और सहयोगी दलों की ‘अनुकम्पा’ के बिना दिल्ली दूर ही रहनी है तो फिर वही किया जाएगा जो करना पड़ेगा - मोदी के नाम से इस तरह मुक्ति पाई जाएगी जैसे कि कोई भी ‘समझदार’ आदमी, खटमलों भरी रजाई से पाता है - उसे फेंक कर। सो, बहुमत का नौ मन तेल नहीं मिलेगा और इसीलिए प्रधानमन्त्री पद पर, राधा के नाच की तरह मोदी नजर नहीं ही आएँगे।

लेकिन, राधा का और नाच का कोई न कोई रिश्ता है तो जरूर! नहीं होता तो भला यह कहावत कैसे बनती? तो ‘नाच’ के नाते से जुड़ी यह राधा यदि नाचेगी नहीं तो ठुमकेगी भी नहीं? इसके पाँव भी नहीं उठेंगे? क्या करेगी यह राधा? 

बेबात की इसी बात में बात तलाश करने की कोशिश, अगली, ‘चकल्लसी’ कड़ी में।



मोदी याने अमरबेल याने यह राधा नहीं नाचेगी - 2


अब यह भी कोई रहस्योद्घाटन नहीं है कि रंच मात्र भी राजनीतिक जिम्मेदारी और जोखिम लिए बिना, सत्ता-सुख सहित तमाम राजनीतिक सुख हासिल करना, ‘संघ’ की एकमेव सांस्कृतिक गतिविधि और एकमेव लक्ष्य है। पूरे देश में, भाजपा के, तमाम संगठन मन्त्री, अनिवार्यतः ‘संघ’ से यूँ ही नहीं आते! ‘संघ’ और इसके स्वयम् सेवकों के सत्ता-प्रेम की रोशनी में तनिक ध्यान से एक बात तलाश कीजिए कि ‘संघ’ से भाजपा के संगठन मन्त्री के पद पर आए कितने स्वयम् सेवक, वापस ‘संघ’ में अपनी पुरानी हैसियत में या ‘संघ’ के किसी अन्य आनुषांगिक संगठन में लौटे? ऐसे मामले ‘अपवादों में अपवाद’ की तरह ही सामने आएँगे जबकि अन्य आनुषांगिक संगठनों में भेजे गए स्वयम् सेवकों की, उसी हैसियत में ‘संघ’ में वापसी के मामले ढेर सारे मिल जाएँगे। 

सो, जहाँ भाजपा सत्ता में है वहाँ संघ के किसी निष्ठावान, समर्पित और आज्ञाकारी स्वयम् सेवक का सत्ता-प्रमुख होना सहज अनिवार्यता है ही। अपने इन्हीं गुणों के कारण मोदी को गुजरात का सत्ता सिंहासन मिला और उन्होंने वह कर दिखाया जो अन्य किसी भी प्रदेश का भाजपाई मुख्यमन्त्री अब तक नहीं कर सका। आजादी के बाद, देश में पहली बार (और अब तक ‘एकमात्र’), संघ की कट्टर वैचारिकता को उन्होंने गुजरात में साकार कर दिखाया। उन्होंने गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला में बदलने का इतिहास रच दिया। अपने सपनों को धरती की वास्तविकता में बदल देनेवाले अपने ऐसे अनूठे स्वयम् सेवक पर ‘संघ’ भला गर्व क्यों न करता? क्यों न इठलाता? सो, वह गर्व करता रहा और इठलाता रहा। किन्तु गर्वित रहने और इठलाने की, इस ‘आत्म-मुग्धता की तल्लीनता’ में उसे पता ही नहीं चला कि कब मोदी विराट बन गए और संघ वामन रह गया। मोदी के कद की बात छोड़िए, मोदी की परछाई ही इतनी घनी और व्यापक हो गई कि संघ नजर ही नहीं आता। मोदी का जूता इतना बड़ा हो गया कि उसे पहनने के चक्कर में, अपने तमाम आनुषांगिक संगठनों सहित समूचा संघ उसमें गुम हो गया। अनवरत कठिन परिश्रम करते हुए, सुनियोजित कार्यशैली और रणनीति से अर्जित उपलब्धियाँ पूरी तरह से अपने व्यक्तिगत खाते में जमा कर, लोकप्रियता, जनाधार और चुम्बकीय लोकार्षण के दम पर मोदी ने मानो संघ को परिदृष्य से ही ओझल कर दिया। आज पूरे गुजरात में संघ और उसके तमाम आनुषांगिक संगठन, ‘समृद्ध-कमाऊ और बलशाली पुत्र के हाथों लतियाए-जुतियाए पिता’ की दशा प्राप्त कर चुके हैं। वे सब मोदी के कृपा-दया-आश्रित निरीह पात्र बन कर रह गए हैं। मोदी के सामने इनकी दशा ‘जबरा मारे, रोने न दे’ जैसी होकर रह गई है। ‘कहा भी न जाए, चुप रहा भी न जाए’ वाली दशा ऐसी ही होती होगी। लेकिन जब मीठा खाना जीवन का मकसद बन जाए और व्यसन भी, तो फिर नीची नजर किए जूठा खाने से परहेज नहीं किया जा सकता। इस मामले में यह कह कर तसल्ली तलाशी जा सकती है कि झूठा हो या जूता - है तो अपनेवाले का ही!   

संघ से पहचान और अवसर पानेवाले नरेन्द्र मोदी आज संघ और भाजपा के पर्याय पुरुष और भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता दिलाने के लिए अपरिमित सम्भावनाओं के कोष बन गए हैं। उनके लिए गुजरात अब ऐसा ‘राजसी छप्पर पलंग’ बन कर रह गया है जिस पर लेटने पर उनके पैर बाहर लटकते हैं। अब उन्हें ‘राज्य’ नहीं, ‘राष्ट्र’ चाहिए। 

एक ओर अपने भ्रष्टाचार और अपनी अकर्मण्यता के कारण चरम अलोकप्रियता और जन-असन्तोष से घिरी यूपीए सरकार और दूसरी ओर मोदी जैसा, लोक-लुभावन, वोट जुटाऊ सक्षम, दक्ष नेता। याने, भाजपा के लिए सत्ता सम्भावनाओं का ऐसा स्वर्णिम अवसर जो अब तक कभी नहीं मिला और भविष्य में शायद ही मिले। सो, सत्ता लपकने के लिए संघ परिवार के पेट में मरोड़ें उठने लगें तो अस्वाभाविक क्या? सो, पूरा देश ये उठती मरोड़ें देख रहा है। 

लेकिन यही वह क्षण है जहाँ संघ परिवार ठिठका नजर आ रहा। क्या किया जाए और क्या नहीं? मोदी एक मात्र तारणहार। लेकिन दूध का जला हुआ जब छाछ को ही फूँक-फूँक कर पीता हो तो भला दूध को पीने के लिए तो उसे अतिरिक्त आत्मबल जुटाना पड़ेगा। पीने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा। इसी सोच ने जकड़न पैदा कर रखी है।

अपनी जिन खूबियों के दम पर मोदी, भाजपा और दिल्ली की दूरी न्यूनतम कर सकते हैं उन्हीं खूबियों ने परिजनों को भयाक्रान्त कर रखा है। गुजरात में मोदी ने खुद को जिस तरह से साबित किया, उसी से दहशत भी फैली हुई है। मोदी जहाँ होते हैं वहाँ फिर और कोई नहीं होता। हो ही नहीं सकता। फिर मोदी होंगे और केवल मोदी ही होंगे। अब भला ‘ऐसे’ मोदी को कैसे और क्यों कर लाया जाए जो लानेवालों का वजूद ही नहीं रहने दे? गोया, मोदी, मोदी न हुए, अमरबेल हो गए! जिस पर छा गए, उसे ही निष्प्राण कर दिया! तब मोदी को लानेवालों का क्या होगा? वे मोदी को किसके लिए लाएँगे - खुद के लिए या मोदी के लिए?  

यही मुश्किल है। मोदी के बिना दिल्ली से नजदीकी बनना कठिन और मोदी को लाना याने खुद को विसर्जित करने के लिए तैयार रहना। गोया, स्थिति कुछ ऐसी कि जिस स्वर्ग की प्राप्ति के लिए सब कुछ किया जा रहा हो, उस स्वर्ग के मिलने के पहले ही क्षण प्राणान्त का खतरा! 

तो फिर क्या किया जाए? आज जैसे भी और जितने भी हरे-भरे हैं, वैसा ही, उतना ही हरा-भरा रह कर प्रसन्नतापर्वूक जी लिया जाए या सुनहरी अमरबेल ओढ़ कर निष्प्राण हो लिया जाए? मर-मर कर जीया जाए या एक बार जी कर मर जाएँ?

ऐसे क्षणों में जिन्दगी अचानक ही बहुत प्यारी लगने लगती है। जिन्दा रहे तो बेहतरी ले आएँगे। लेकिन जिन्दा ही नहीं रहे तो?

सो, मुझे लगता है कि सत्ता-सुख के अपने सांस्कृतिक लालच के चलते संघ परिवार भले ही एक बार जोखिम उठाने की बात सोच ले किन्तु में भाजपा में, जिन्दा रहने की ललक रखनेवाले, जिन्दगी को प्यार करनेवाले लोग अधिक हैं। एक, दो की बात होती तो शायद सोचा जा सकता था। किन्तु बात जब बीसियों लोगों की हो और बीसियों लोग भी वे जो महत्वाकांक्षाएँ लिए बैठे हों तो फिर वे सब के सब, सामूहिक आत्महत्या कर, किसी एक को उपकृत करेंगे? उन्हें यदि आत्महत्या ही करनी होती तो भला राजनीति में आते? राजनीति तो आया ही इसलिए जाता है कि अपनेवालों के कन्धों पर चढ़कर सिंहासन तक पहुँचा जाए और विरोधियों की सहायता से वहाँ सुखपूर्वक बैठा रहा जाए। 

लेकिन, मोदी के प्रधानमन्त्री न बन पाने का, मुझे यह कारण भी अन्तिम नहीं लग रहा। 

अगला कारण यद्यपि सुपरिचित, जगजाहिर और घिसा-पिटा है। लेकिन वह, अगली कड़ी में। 

(यहॉं प्रस्‍तुत समस्‍त चित्र गूगल से लिया गया है। इसका उपयोग किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया जा रहा है। यदि आपत्ति हो तो सूचित करें। उस दशा में इसे अविलम्‍ब हटा लिया जाएगा।)

यह राधा नहीं नाचेगी - 1

 
खुश होनेवाले खुश हो जाएँ और दुःखी होनेवाले दुःखी। अपनी सीमाओं से परे जाकर मैं घोषणा कर रहा हूँ - नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधान मन्त्री नहीं बन रहे। मैं न तो कोई रहस्योद्घाटन कर रहा और न ही, चौंकानेवाली कोई अनूठी बात कह रहा। भारतीय राजनीति की नाम मात्र की समझ रखनेवाला सड़कछाप आदमी भी जानता है कि इस क्षण का सच तो यही है।

मोदी अनेक विशेषताओं के धनी हैं। जनमानस की नब्ज खूब अच्छी तरह टटोल लेते हैं। वक्तृत्व कौशल ऐसा कि घटिया से घटिया बात पर भी तालियाँ पिटवा लें। कहाँ, कब, क्या बोलना - यह तो भली प्रकार जानते ही हैं, यह और अधिक भली भाँति जानते हैं कि कहाँ, कब, क्या नहीं बोलना। यह गुण बहुत कम राजनेताओं में पाया जाता है। याददाश्त पर भरपूर जोर डालिए - आप पाएँगे कि अपने ‘कर्मों’ से भले ही वे विवादास्पद हुए किन्तु अपने किसी वक्तव्य से नहीं। ‘मीडिया ने मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया’ वाला, राजनेताओं का प्रिय और पहचान बन चुका जुमला उनके मुँह से मैंने तो आज तक नहीं सुना। गुजरात में अपनी पार्टी को चुनाव जितवाने में उनकी महारत तो अब विश्व विख्यात हो चुकी है। व्यक्तिगत और परिजनों के भ्रष्टाचार के पारम्परिक आरोपों से वे अब तक बचे हुए हैं। ऐसी और कई बातें उनके पक्ष में जाती हैं।

लेकिन उनकी एक विशेषता ऐसी है जो इन सब पर न केवल भारी पड़ती है अपितु प्रधानमन्त्री बनने की उनकी समस्त सम्भावनाओं को नष्ट-प्रायः कर देती है। यह विशेषता है - अपने विरोधियों को निपटाना और ऐसा निपटाना कि वह (विरोधी) तो ‘अतीत की वस्तु’ बन ही जाए,  उसके (विरोधी के) तमाम समर्थक, भयाक्रान्त होकर, खुद का अस्तित्व बनाए रखने की चिन्ता करने लगें। भाजपा विरोधी तो उनकी इस विशेषता के शिकार हुए ही, भाजपा के भीतर मौजूद अपने विरोधियों को भी उन्होंने इसी तरह, समान रूप से निपटाया - बिना किसी भेद-भाव के। शंकर सिंह वाघेला ने तो काँग्रेस की छतरी में शरण ले ली किन्तु सुरेश देसाई और केशु भाई पटेल (दोनों ही, गुजरात के पूर्व मुख्यमन्त्री) जैसे दमदार नेताओं को अब तक जमीन नहीं मिल रही। संघ के प्रखर प्रचारक संजय जोशी को तो उन्होंने, पूरी दुनिया के सामने लगभग नंगा दौड़ते हुए दिखाकर ‘अन्तरराष्ट्रीय और ऐतिहासिक’ बना दिया। उनकी वह गत बना दी कि बेचारे को त्याग पत्र देना पड़ा।   

मोदी की यह विशेषता सामान्य भाजपाइयों को तो ‘कायल’ करती है किन्तु शीर्ष स्तर के भाजपाइयों को (विशेषकर उन भाजपाइयों को जो खुद को प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर बैठे देखना चाह रहे हैं) भयाक्रान्त बनाए रखती है। कोई ताज्जुब नहीं कि वे चैन की नींद भी न ले पा रहे हों। ऐसे तमाम भाजपाई, अपने सारे मतभेद भुलाकर, ‘दुश्मन का दुश्मन, अपना दोस्त’ के सिद्धान्त को अपनाकर मोदी को गुजरात तक ही सीमित रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। यह उनके (मोदी विरोधियों के) राजनीतिक भविष्य का (लगभग, जीवन-मरण जैसा) सवाल जो ठहरा!

यहाँ मुझे अनायास ही पूर्व केन्द्रीय मन्त्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मन्त्री, स्वर्गीय अर्जुनसिंहजी की याद हो आई है। अपनी बौद्धिकता, विद्वत्ता, अकादमिकता के कारण, कुशल राजनेताओंकी भीड़ में वे अलग से पहचाने जाते थे। जहाँ तक मेरी जानकारी है, समृद्ध निजी लायब्रेरी के मामले में वे, देश के सम्भवतः एकमात्र राजनेता थे। वे किताबें खरीदने के शौकीन थे और जब भी विदेश यात्रा से लौटते थे तो उनके सामान में पुस्तकों की पूरी एक खेप अवश्य होती थी। 

यह जगजाहिर बात है कि वे अत्यधिक महत्वाकांक्षी थे और इन्दिरा, राजीव की हत्या के बाद खुद को प्रधानमन्त्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते थे। लेकिन स्थितियाँ उनके प्रतिकूल रहीं। उन्होंने काँग्रेस से नाता तोड़ने का फैसला किया। ‘गाँधी परिवार विहीन काँग्रेस’ के उस संक्षिप्त काल खण्ड में अनेक काँग्रेसी, अर्जुनसिंहजी के आसपास जुटे तो सही किन्तु उनका नेतृत्व स्वीकार करना तो दूर रहा, कोई उनके नाम से अपनी पहचान बनाने को भी तैयार नहीं हुआ। सबको लग रहा था कि अर्जुनसिंह नामक बरगद के नीचे उनकी तो पहचान ही गुम हो जाएगी। सब मानो दहशतजदा हों। हालत यह हुई कि उन्हें ‘तिवारी काँग्रेस’ के नाम से पार्टी बनानी पड़ी। दिल्लीवाले आज भी कहते हैं कि इस पार्टी में केवल नाम ही नारायण दत्त तिवारी का था - सारे साधन/संसाधन अर्जुनसिंहजी के ही थे।

बहेलिये के जाल में फँस चुकी चिड़ियाएँ, एक जुट होकर जिस तरह बहेलिये का जाल ले उड़ी थीं, उसी तरह, अपने सर पर मँडराए (राजनीतिक भविष्य के नष्ट हो जाने के) खतरे को दूर करने के लिए अनेक भयभीत लोग एकजुट होकर उस खतरे के लिए खतरा बन सकते हैं। मोदी को भी ऐसे अनेक भयभीत एकजुट भाजपाइयों का खतरा बना हुआ है।

लेकिन पोस्ट के शीर्षक ‘यह राधा नहीं नाचेगी’ से इन सारी बातों का क्या रिश्ता? है साहब! रिश्ता है। यह रिश्ता इस पोस्ट की अगली कड़ी में बताऊँगा।

(यहॉं प्रस्‍तुत समस्‍त चित्र गूगल से लिए गए हैं। इनका उपयोग किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया जा रहा है। यदि आपत्ति हो तो सूचित करें। उस दशा में इन्‍हें अविलम्‍ब हटा लिया जाएगा।)