2017 में प्रकाशित, मरणोपरान्त मिली, ‘ताजा गजल’

फेस बुक पर मेरे बने रहने के बड़े कारणों में से एक है - दादा श्री बालकवि बैरागी की, असंग्रहित, बिखरी हुई रचनाओं की तलाश। दादा की कई रचनाएँ मुझे फेस बुक से ही मिलीं। 

इसी बहाने, दादा के अनेक प्रशंसकों से सम्पर्क हुआ। कुछ से तो यह सम्पर्क ‘निरन्तर’ होता हुआ ‘अनदेखे परिचित’ की हैसियत पा गया। इन सबकी कृपा वर्षा से मैं निहाल हुआ रहता हूँ।

दादा की जो गजल यहाँ दे रहा हूँ, वह भी इसी तरह अचानक ही मिली। इसकी खास बात यह है कि यह गजल अब तक मेरी जानकारी में ही नहीं थी। मेरे लिए यह दादा  की (मरणोपरान्त) ‘ताजा रचना’ है।

यह गजल मिली जयप्रकाशजी मानस से। उनसे मैं अब तक नहीं मिला। जो भी सम्पर्क हुआ, दादा की वजह से ही और फेस बुक से ही। रायपुर निवासी, छत्तीसगढ़ के गौरव जय प्रकाशजी मानस किसी परिचय के मोहताज नहीं। हिन्दी के समकालीन शीर्ष रचनाकारों की सूची के अनिवार्य, अपरिहार्य सदस्य हैं। दादा श्री बालकवि बैरागी को प्रायः ही प्रेमादर सहित याद करते रहते हैं। उनसे पहला सम्पर्क भी इसी कारण हुआ। वह भी अपने आप में एक संस्मरण ही है। लेकिन वह फिर कभी।

अपनी फेस बुक पोस्ट में मानसजी ने दादा की इस गजल की चार पंक्तियाँ ही दी थीं। मैंने पूरी गजल माँगी तो अत्यन्त विनम्रतापूर्वक अपनी असमर्थता जता दी। मेरी बेचैनी बढ़ गई।

अपनी बेचैनी को करार देने के लिए मैंने अपना आजमाया हुआ नुस्खा ही आजमाया - फेस बुक पर मदद माँग ली। उम्मीद से बहुत जल्दी ही मदद मिल गई। संयोग ही रहा कि मदद मिली, मेरे जन्म-नगर मनासा से। मनासा के भाई सुनील पोरवाल ‘शैलू’ ने न केवल पूरी गजल उपलब्ध कराई, ‘साहित्य अमृत’ के, जून 2017 के छपे पन्ने की फोटू ही उपलब्ध करा दी। 

आप भी मानसजी और भाई सुनील पोरवाल को जान सकें, इसलिए दोनों के फोटू दे रहा हूँ। फोटू में मानसजी अपनी जीवन संगिनी कल्पनाजी के साथ नजर आ रहे हैं। ‘साहित्य अमृत’ के पन्ने की फोटू भी प्रस्तुत है।


मानसजी और भाई सुनील पोरवाल ‘शैलू’ को बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।

अब आप दादा की ‘ताजा गजल’ का आनन्द लीजिए। 

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युग बीते

- बालकवि बैरागी


                                        युग बीते संवाद नहीं है,

                                        कब बोले, कुछ याद नहीं है।


                                       सबके सपने अलग-अलग हैं,
                                       सपनों का अनुवाद नहीं है।

                                       सूरज से पहले उठ जाना,
                                       मुरगे का अपराध नहीं है।

                                       जबसे घर का चूल्हा बदला,
                                       पहले जैसा स्वाद नहीं है।

                                       अन्धा सूरज, अम्बर नापे,
                                       तिलभर कहीं विवाद नहीं है।

                                       सातों सुर खामोश पड़े हैं,
                                       कोई भी नौशाद नहीं है।

                                       खुद की जो भी करे आरती,
                                       मिलता उसे प्रसाद नहीं है।

                                       दीवाली की हो गई होली,
                                       शेष बचा प्रह्लाद नहीं है।

                                    मिट्टी जिसका तन-मन-धन हो,
                                       उसे कहीं अवसाद नहीं है।

                                       जाने को ही आए हम सब,
                                       कोई भी अपवाद नहीं है।

                                    तुम अनादि हो, तुम अनन्त हो,
                                       यह कोई उन्माद नहीं है।

                                       कोई भी इस कोलाहल में,
                                       सुनता अनहद नाद नहीं है।

                                       आज राम का स्वागत करने,
                                       शबरी और निषाद नहीं है।
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