दशपुर जनपद के शैलाश्रय: मिट्टी के ये रंग हजारों वर्ष पुराने हैं

दशपुर जनपद (‘दशपुर’ यानी मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय वाला शहर मन्दसौर) के शैलाश्रयों पर केन्द्रित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे अचानक ही मिला। मुमकिन है, लेख मिलने की कथा, मूल लेख से बड़ी हो जाए, लेकिन पढ़ लीजिए।  

दादा की आत्मकथा ‘मँगते से मिनिस्टर’ का नाम अधिकांश लोगों ने सुना ही होगा। सब मानकर चल रहे हैं कि यह किताब प्रकाशित हो चुकी है। जबकि यह किताब अब तक छपी ही नहीं है। हमारे परिवार में किसी के पास इसकी पाण्डुलिपि ही नहीं है। दादा ने दिल्ली के कुछ प्रकाशकों को इस किताब की पाण्डुलिपि दी थी। लेकिन हममें से किसी को, किसी प्रकाशक के बारे में भी मालूम नहीं।  

मैं, दादा की, इधर-उधर बिखरी हुई प्रकाशित/अप्रकाशित रचनाओं की तलाश में अनवरत लगा हुआ हूँ। इसी क्रम में, देश के जान-माने इतिहासकार और पुरातत्वविद्, दशपुर एडवांस स्टडीज सेण्टर, मन्दसौर के डायरेक्टर डॉ. श्रीयुत कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय से अचानक संकेत मिला कि ‘मँगते से मिनिस्टर’ की पाण्डुलिपि मन्दसौर के एक मुद्रक के पास हो सकती है। मेरे लिए तो यह खबर ‘करण्टदार’ थी। उनसे सम्पर्क किया। पाण्डुलिपि की बात खतम होते-होते पाण्डेयजी ने इस लेख का जिक्र किया। यह लेख वस्तुतः, मन्दसौर निवासी श्री गिरजाशंकरजी रूनवाल का साक्षात्कार है। रूनवालजी के बारे में, यह लेख पढ़ते-पढ़ते आप खुद जान जाएँगे।

रूनवालजी से बात कर पाना सम्भव नहीं था। पाण्डेयजी ने रूनवालजी के बेटे श्री मनीष रूनवाल का नम्बर दिया। मनीषजी ने ही लेख उपलब्ध कराया।  

लेख का पुरातात्विक, ऐतिहासिक महत्व क्या है, कितना है, यह जानने-समझने की कोशिश मैंने बिलकुल ही नहीं की। यदि किसी को रुचिकर, उपयोगी अनुभव हो जाए तो मेरे लिए यह अतिरिक्त प्राप्ति होगी। मेरे लिए तो यह लेख दादा का एक ‘लुप्तप्रायः’ लेख है। दादा की बिखरी रचनाओं को संग्रहित करने के अपने अभियान के तहत मैं इसे अपने ब्लॉग पर और सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर रहा हूँ। 

साप्ताहिक हिन्दुस्तान (दिल्ली) के 8 जुलाई 1984 के अंक में प्रकाशित इस लेख के सामने आने का समूचा श्रेय माननीय डॉ. श्री कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय, माननीय गिरजाशंकरजी रूनवाल  और श्री मनीषजी रूनवाल को है।

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श्री गिरजाशंकरजी रूनवाल,     डॉ. कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय,     श्री मनीषजी रूनवाल।



दशपुर जनपद के शैलाश्रय: मिट्टी के ये रंग हजारों वर्ष पुराने हैं

- बालकवि बैरागी

वे अपने परिश्रम के पाँखुरी-पृष्ठों को बटोर रहे हैं। पूरे दो घण्टों की लम्बी भेंट-वार्ता पर मेरी विह्वल कलम अनायास कुछ पंक्तियाँ निसृत कर बैठती हैं -

एक यायावर भटकता फिर रहा है
खोज में शैलाश्रयों की
पार करता पर्वतों को
लाँघता नाले नदी नद
नापता निर्द्वन्द्व नटखट
निर्झरों को
राम जाने यह निरन्तर यात्रा
होगी समापित कब।

कौन है यह यायावर? कहाँ की है यह यात्रा? कब से शुरु हुई? कब पूरी होगी? क्या पाया इस यायावर ने? आखिर यह सब क्यों हो रहा है?

एक लम्बे समय से हल्की-हल्की सुरसुरी मुझ तक आई जरूर थी कि मनासा और जावद तहसील की उत्तर सीमा पर रांगोली जैसे सजे-धजे अरावली शैल-शृंग की बीहड़ घाटियों में एक बावला ‘मास्टर’ अपनी सायकिल लिए रात-दिन घूमता फिर रहा है। गत छह महीने तक तो आसपास के लोग यों समझे कि हो न हो किसी तन्त्र साधना में यह शिक्षक पगला गया है। पर कालान्तर में स्थिति स्पष्ट हो गई।

जावद तहसील में एक गाँव है - डीकेन। वहाँ की कन्या माध्यमिक शाला में प्रधानाध्यापक है मन्दसौर निवासी श्री गिरजाशंकर रूनवाल। सैंतालीस वर्षीय इस अधेड़ शिक्षक ने अन्ततः दशपुर जनपद में अपनी यायावरी के दौरान आज से यही कई 30000 साल पुराने शैलाश्रयों को खोज ही लिया। हमारे किसान, हमारे चरवाहे, हमारे ग्वाल-गोपाल हो-न-हो इन शैलाश्रयों के आसपास से पचासों बार गुजरे होंगे पर उनकी अल्हड़ और लापरवाह नजरों ने कभी भी इन शैलाश्रयों का नोटिस नहीं लिया। अपनी पीएच.डी. के सिलसिले में गिरजाशंकर भाई ठेठ वहाँ तक जा पहुँचे जहाँ तक कि उनसे पहले उस नजर को लेकर कोई नहीं पहुँच पाया था। डॉ. हरिभाऊ वाकणकर उनके निर्देशक हैं और अपने निर्देशक की अन्तरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त परम्परा से जुड़ कर गिरजा भाई ने अपने निर्देशक गुरु को नया गौरव ही दिया है। बधाई!

मैं उनसे लम्बी बात करता हूँ। गिरजाशंकर मेरे पुराने साथी हैं। हमारा किशोरकाल साथ-साथ बीता। हमारा यौवन अपने-अपने संघर्षों में खिसक गया, पर गिरजा भाई की संकोचभरी विनम्रता जहाँ-की-तहाँ है, जस-की-तस। वे सकुचाते हुए अपना ब्रीफकेस खोलते हैं और उसमें से कतिपय विद्वानों की कुछ पोथियाँ मेरे आगे रखते हैं। फिर शैलाश्रयों में प्राप्त हजारों साल पुराने शैल चित्रों की समानुपातिक स्केल पर तैयार की गई अनुकृतियों को मेरे सामने फैला देते हैं। एक-एक चित्र पर पॉइण्टर रखते हुए मुझे उसका काल और समय बताते हैं। मैं विस्फारित आँखों से उनको देखता रहता हूँ। मेरे अपने ही आस-पास संस्कृति और संसृति का इतना विराट, विशाल भण्डार फैला पड़ा है और हम में से कोई भी इस अनमोल राशि को पहचान नहीं सका! परिचय के लिए उनमें से कुछ चित्र मैंने रख लिए। पाठकों की जानकारी के लिए भी दे रहा हूँ।

40 हजार साल पुराने शैल चित्र

जब गिरजा भाई भानपुरा में कभी थे तब ही उन्हें जानकारी मिल गई थी कि मन्दसौर जिले में शैल चित्र प्रचुर मात्रा में मिल सकते हैं। आज उनका यह नियम है कि वे स्कूल से दोपहर एक बजे छूटते ही अपनी सायकल लेकर निकल पड़ते हैं। प्रतिदिन करीब 15 से 20 किलोमीटर की यात्रा वे सायकल पर करते हैं और पहाड़ों के वक्ष और ललाट पर लिखी इस चित्र-लिपि को पढ़ने का प्रयत्न करते हैं। उनका कहना है कि मन्दसौर जिले में प्रागैतिहासिक काल से भी पुरानी शैल-चित्रावली मिलने की पूरी सम्भावना है। यानी कि चालीस हजार साल से भी पुराने शैल चित्र! एक रोमांच सा मुझे हो आता है। उनका यह भ्रमण अकेले होता है। जितना सायकल से नाप सकते थे उतना नाप चुके। अब तो उन्हें पदयात्रा ही करनी होगी। दशपुर जनपद की जावद तथा मनासा तहसीलों के जिन स्थानों पर वे सफलतापूर्वक यह खोज पूरी कर पाएँगे वे हैं - अधरशिला, जेतपुरा, खरड़ी, लाँपिया, चिरपरेवा, करेर, राणी छज्जा, कंजारड़ा घाटा, भरड़ा दोह तथा सीमावर्ती राजस्थान के इलाके गरवाड़ा और बाबाजी की मण्डी। सप्ताह में चार दिन उनका यह भ्रमण होता है। शेष तीन दिन वे इन सन्दर्भों का होम-वर्क करते हैं। काल-निर्णय पर जब मैंने उनसे सवाल किया तो वह बोले, इन शैल चित्रों के बारे में मध्य प्रदेश सरकार की पुरातत्व पार्टी और विक्रम विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा काल निर्णय किया गया है। बड़े ही आदर के साथ वे डॉ. वाकणकर का नाम लेते हैं और साथ ही इस दिशा में काम कर रही रजिस्ट्रेशन अधिकारी कुमारी भारती जोशी का भी उल्लेख पूरे आदर के साथ करते हैं।

श्री गिरजाशंकरजी ने इस यात्रा के दौरान करीब-करीब एक सौ शैलाश्रय ऐसे तलाशे हैं जिन पर कि ये चित्र मिलते हैं। एक अलभ्य कला-संसार का सर्जन यहाँ उनको मिलता है। डॉ. जगदीश गुप्त ने अपनी पुस्तक ‘प्रागतिहासिक भारतीय चित्रकला’ के 1967 के संस्करण में पृष्ठ 419-420 पर लिखा है कि सिन्धु घाटी सभ्यता से पूर्व ‘उल्टे स्वस्तिक’ याने कि ‘वामावर्त स्वस्तिक’ मात्र कल्पना की वस्तु थे। गिरजाशंकरजी ने अपनी खोज में यहाँ उल्टे स्वस्तिक ढूँढ कर डॉ. जगदीश गुप्त के इन पृष्ठों पर हमारे जनपद को गौरव के साथ स्थापित कर दिया है। तब फिर क्या दशपुर जनपद सिन्धु घाटी सभ्यता से भी पहलेवाली सभ्यता का शीर्ष है? मैं इस बिन्दु को विद्वानों एवं विशेषज्ञों के लिए छोड़ कर आगे बढ़ जाता हूँ।

इन शैल चित्रों का काल हमारे विशेेषज्ञों ने 3000 से 30000 साल पुराने निर्णीत किया है। डॉ. वाकणकर अपनी पुस्तक ‘दी डान ऑफ इण्डियन आर्ट’ में लिखते हैं कि आदि मानव ने सबसे पहला रंग जो उपयोग में लिया वह हरा और लाल रंग था। जब भारतीय शैल चित्रों और शैलाश्रयों की खोजबीन के दौरान महाराष्ट्र के धूलिया और मध्य प्रदेश के भीमबैठका का कार्बन परीक्षण नीदरलैण्ड में करवाया गया तो शुतुरमुर्ग के अण्डों की उम्र के आधार पर वहाँ के हरे रंग का काल निर्धारण हुआ। 39000 वर्ष पुराना। यदि इसको हम आधार मानते हैं तो दशपुर जनपद का आदिम हरा रंग इससे भी पुराना मिलता है। इन शैलाश्रयों में हरे रंग के कुल दो चित्र बचे हैं। गिरजाशंकरजी ने जो अनुकृतियाँ प्रस्तुत की हैं, वे बिलकुल उन्हीं रंगों में हैं जैसे कि वहाँ चट्टानों पर पाए जाते हैं। जो रंग इन चित्रों में पाए गए हैं वे हैं - हरा, लाल, जामुनिया, काला और सफेद। हजारों साल से आज तक ये रंग ज्यो-के-त्यों हैं। काल की चपेट और मौसम की मार भी इनकी ‘ओप’ को कम नहीं कर पाई। फफूँद ने यहाँ-वहाँ अवश्य इन्हें मटमैला किया है। पर पानी के छींटे पड़ते ही फफूँद दब जाती है और रंग उभर आता है। पानी सूखने पर रंग वापस फफूँद में दब जाता है। काल निर्णय में यह फफूँद भी सहायक होती है। गिरजाशंकरजी का कहना है कि भीमबैठका और धूलिया के शैलाश्रयों में जो रंग और पैटर्न मिलता है, वही यहाँ भी प्राप्त होता है। यदि इस आलेख को मैं धूलिया या भीमबैठका के आसपास बैठ कर लिखता तो फिर यह वाक्य उल्टा हो जाता। तब मैं लिखता कि यहाँ भी रंग और पैटर्न वही है जो दशपुर जनपद में पाया जाता है। यानी कि कौन पुरातन है, यह विवाद का विषय है।

मैं चित्रों की गतिविधियों पर प्रश्न करता हूँ। गिरजाशंकर मुझे बताते हैं, 15 हजार साल पुरानी कलाकृतियों में कुल दो गतिविधियाँ हैं - शिकार और नृत्य। पूजा के प्रतीक उसके बाद जीवन में आए। मध्याश्मयुगीन मानव यानी कि आज से करीब 15 हजार साल पुराना मनुष्य पशुओं के मुख की तरह अपनी आकृति बना लिया करता था। सिर पर रंग-बिरंगे पंखों को लगा लिया करता था। भुजाओं को सजाने के लिए कुहनियों पर बड़े-बड़े फुँदने बाँध लिया करता था। विशेष उत्सवों पर पशु-शिरोभूषा, मुखाच्छादन एवं चर्म-वस्त्र पहने जाते थे। अन्य दिनों पर केवल लंगोट से काम चलता था। खुशी के अवसरों पर समूह नृत्य हुआ करते थे। नृत्य करनेवाले सभी लोगों के हाथों व पाँवों की मुद्राएँ एक समान दिखने से यह अनुमान लगाया जाता था कि सम्भवतः ताल बजा कर ध्वनि पर नृत्य करने का ज्ञान हमारे आदि मानव को था। 

शैलाश्रय का आभास आपको कैसे होता है? इस सवाल पर गिरजाशंकर भाई कहते हैं, आसपास पानी हो, नदी हो या नाला हो या फिर कोई झरना झरता हो तो वहाँ तलाश करने पर शैलाश्रय मिल सकते हैं। जहाँ-जहाँ आदि मानव को आश्रय मिला उन्हीं स्थानों का नाम शैलाश्रय होता गया। बस्तियाँ थीं नहीं। जहाँ-जहाँ वह रहा, उसने अपनी छाप छोड़ी। सपाट और समतल चट्टानों पर उसने चित्र नहीं बनाए। जितने भी चित्र मिलते हैं, सब भित्तियों और छतों पर मिलते हैं। स्पष्ट है कि सारे चित्र खड़े-खड़े बनाए गए होंगे। चित्रांकन के समय चट्टानों का चयन बहुत सूझ-बूझ के साथ किया गया है। रिसनेवाली या परतदार चट्टानों पर ये चित्र नहीं बनाए गए। सारा सृजन हुआ है भूरी या सफेद चट्टान पर ही। कई स्थानों पर चित्रों में संशोधन और एक चित्र के ऊपर दूसरा चित्र बनाए जाने का भी उदाहरण है। जैसे एक पुराने चित्र पर कूबड़वाला बैल बना दिया गया है। यानी कि कूबड़वाला बैल ईसवी सन की पेण्टिंगों में आएगा। एक उदाहरण संशोधन का भी मिलता है। हरे रंग के एक हिरन का मुँह बाद में लाल कर दिया गया है। उसके पेट में लाल चौकोर भी बना दिए गए हैं। कलाकृतियों के पहनावे से यह पता नहीं चलता है कि चित्रांकित छवि पुरुष की है या स्त्री की। केवल राणी छज्जे पर जो नृत्य-चित्र पाया जाता है उसकी वेशभूषा से स्पष्ट होता है कि ये महिलाएँ हैं। इसलिए उनका नाम भी ‘राणी छज्जा’ दिया गया है।

विषय और आकार पर जो कुछ गिरजा भाई बताते हैं वह बहुत दिलचस्प है। उनका कहना है कि इन चित्रों में पूरा ‘सर्कल’ कहीं नहीं मिलता। वक्र और वर्ग मिलते हैं। पशु हैं, पक्षी हैं, सूर्य है, शस्त्र हैं, सर्प, हाथी और बन्दर भी हैं। गर्भिणी गाय के पेट के भीतर वत्स बना कर दिखाया गया है। पूजा प्रतीकों में हाथ के चिह्न बहुतायत से मिलते हैं। बड़ी-से-बड़ी आकृति मिलती है 40 सेण्टीमीटर की और छोटी-से-छोटी 2 सेण्टी मीटर तक की। उल्टा सातिया (स्वस्तिक) इस चित्र परिवार की विशेषता है। एक-एक मंजिल की ऊँचाई तक इन कलाकारों की कूचियाँ चली हैं। इससे उस युग की ऊँचाई का भी अनुमान हो सकता है।

मेरा अन्तिम सवाल था कि हमारी सरकार ने इस दिशा में कुछ किया या नहीं? गिरजा भाई की थकान पर एक मुस्कान चिपक गई। मध्य प्रदेश सरकार ने इसी क्षेत्र के इन चित्रों के अनुकृतिकरण और काल-निर्णय के अनुसन्धान हेतु अपने पुरातत्व विभाग द्वारा 4 हजार रुपयों की राशि स्वीकृत की है। निदेशालय-सचिवालय में बैठे श्री चतुर्वेदी इस ओर पूरे जागरूक हैं। पर राजस्थान सरकार का काम अद्भुत है। गिरजाशंकरजी गए तीन सालों से चित्तौड़गढ़ के कलेक्टर महोदय को और राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग को, वहाँ पाई जानेवाली 9 चट्टानों के बारे में लगातार लिख रहे हैं, पर कहीं से कोई प्रतिध्वनि नहीं आई। बाबाजी की मण्डी में पानी किनारे 9 चट्टानों पर इसी तरह के शैल चित्र राजस्थान सरकार को निरन्तर आमन्त्रित कर रहे हैं।

निश्चय ही गिरजाशंकर रूनवाल की यह तपस्या हमारे पुरातत्वविदों के सोच-संसार में नया आन्दोलन पैदा करेगी। नए विवाद होंगे, नए निर्णय होंगे, नए समाधान होंगे। हम भी जानना चाहेंगे कि मिट्टी के ये रंग कितने पुराने हैं? हमार चट्टानों कर माँग में भरा गया ‘फोफरिया पत्थर’ का यह रंग कितने साल पहले घिसा गया था। हमारी गेरू की गेरुआ आभ कब से आभासित है?

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जिला मन्दसौर (म. प्र.) में मिले शैल-चित्र (पहली पंक्ति) ‘समूह नर्तन’ अनुमानतः 5000 वर्ष पुराना चित्र। (दूसरी पंक्ति) अनुमानतः 10000 वर्ष पुराना चित्र। (तीसरी पंक्ति) 5000 वर्ष पुराना चित्र।


जिला मन्दसौर (म. प्र.) में मिले शैल-चित्र(पहली पंक्ति) पहला चित्र ‘वराह’ लगभग 15000 वर्ष पुराना। दूसरा चित्र ‘मछली’ लगभग 15000 वर्ष पुराना। (दूसरी पंक्ति) ‘वृषभ’ तथा ‘शिकार’ 5000 पुराना चित्र। (तीसरी पंक्ति) पहला चित्र ‘अधर शिव’ लगभग 5000 वर्ष पुराना तथा ‘नृत्य’ लगभग 5000 वर्ष पुराना चित्र।

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