चम्बल इलाके का अद्भुत उन्माद ‘खुईया’



किसी जमाने में इन्दौर से प्रकाशित होते रहे दैनिक ‘चेतना’ के 10 मार्च 1998 के अंक में प्रकाशित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे मन्दसौर के ख्यात इतिहासवेत्ता-पुरातत्ववेत्ता डॉक्टर श्री कैलाशचन्द्रजी पाण्डेय ने अत्यन्त कृपापूर्वक उपलब्ध कराया है। पाण्डेयजी का चित्र और उनसे प्राप्त ‘चेतना’ की कतरन यहाँ प्रस्तुत है।

‘खुईया’ और इसका यह वर्णन ‘रोमांचक और मनोरंजक’ लगते-लगते ‘भयावह, दहशतनाक’ लगने लगता है। ऐसी परम्परा और ऐसे ब्यौरे पर विश्वास कर पाना कठिन होने लगता है। इस परम्परा के बारे में जानने के लिए मैंने कोशिशें कीं। फेस बुक पर पोस्ट के जरिए भी मदद माँगी। इससे जुड़े वास्तविक, काल्पनिक चित्र पाने के लिए गूगल पर भी कोशिश की। किन्तु कहीं से कोई सूत्र हाथ नहीं लगा। लेख पढ़ते हुए पूरे समय याद रखिएगा कि यह 1993 में छपा था और तब यह परम्परा ‘समाप्तप्रायः’ दशा में थी।



चम्बल इलाके का अद्भुत उन्माद ‘खुईया’

-बालकवि बैरागी


अद्भुत उन्माद है ‘खुइया’। उन्माद भी केवल महिलाओं में। मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना और चम्बल तथा कुँवारी नदियों की कछारों में बसे देहातों में इस रस्म ने कई बार लोगों की जान तक ले ली है। समय के विकास के साथ ही अब यह रस्म, यह उन्माद कम होता जा रहा है। लेकिन बताया जाता है कि यत्र-तत्र यह रस्म आज भी पूरी होने के समाचार बनते हैं। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस उन्माद भरी रस्म का रिश्ता पवित्र विवाह संस्कार जैसे मांगलिक सन्दर्भ से जुड़ा हुआ है। 

दिलचस्प बात यह भी है कि इस उन्माद का शिकार केवल पुरुष वर्ग ही होता है। उन्माद-पूर्ण आक्रमण करनेवाला समूह महिलाओं का रहता है।

किसी गाँव-देहात या कस्बे में किसी लड़के की शादी है। लड़के की घुड़चढ़ी हो गई है। बारात सज गई और दूल्हा अपनी बारात लेकर लड़की के गाँव चल पड़ा। बारात के जाने से लेकर पाणिग्रहण संस्कार पूरा करके दूल्हा जब तक दुल्हन सहित अपनी बारात के साथ सकुशल घर नहीं लौट आता तब तक का समय-काल ‘खुईया’ कहलाता है। दूल्हे के घर, ज्यौत पर आई बहन-बेटियों, घर की महिलाओं और उसके गली-मुहल्लेवाली औरतों पर एक पागलपन सवार हो जाता है। समूह के समूह इस उन्माद से ग्रस्त हो जाते हैं। कोई पुरुष उनके हत्थे चढ़ भर जाना चाहिए। अगर हत्थे नहीं चढ़ा तो जैसे-तैसे, बहला-फुसलाकर किसी न किसी बहाने उसे अपने घेरे में फँसा लिया जाता है। ज्योंही यह ‘मर्द बच्चा’ ‘खुईया’ चढ़ी औरतों के दायरे में आया कि फिर एक सर्वथा नई ‘लोक संस्कृति’ और ‘लोक सभ्यता’ से उसका सामना होता है।

बेलन, मूसल, झाड़ू, डण्डा, लकड़ी, लाठी, जूता, चप्पल, घूँसा, थप्पड़, लात, हाथ इस कदर चलते हैं कि सारी ‘मर्दानगी’ धरी रह जाती है। कपड़े उसके जिस्म पर बच गए तो समझो सस्ते में छूटे। गालियाँ एक-से-एक बेजोड़-अनमोल और शब्दकोश से कोसों दूर कि उसकी माँ, बहिन, बीबी, बेटी, बहू सब इन गालियों में विद्यमान। भारत की पुलिस ‘खुईया’ में से अपने लिए नई गालियाँ थोक में ले सकती है। जो मर्द मार खा रहा है उसके बचाव का कोई रास्ता नहीं। पच्चीस-तीस महिलाएँ एक पुरुष को घेरे और उसके कपड़े फाड़े या उतारे तो वह करेगा भी क्या?

एक समय था जब यदि किसी को पता चल जाता था कि गाँव में ‘खुईया’ चढ़ा हुआ है तो लोग उस गाँव का रास्ता बदल लेते थे। गलियाँ बन्द हो जाती थीं। मर्द घर में घुस कर अपनी खैर मनाते थे। किस्से यहाँ तक बने मिलते हैं कि कई मर्दों को पेड़ों से बाँध दिया गया। फिर पिटाई हुई। हाथ-पाँव बाँध कर, उसके वस्त्र हरण करके छोड़ देने के उदाहरण भी मिले। क्रूरतम उदाहरण यह भी मिला कि पहले पुरुष के हाथ पीछे बाँध दिए गए। फिर उसका एक पाँव पेड़ से बाँधकर दूसरा पाँव एक भैंस के गले में लटके रस्से से बाँधा गया। फिर भैंस को पीटकर दौड़ाया गया। गालियाँ इतनी जोर और हल्ले वाली कि बेचारा अधमरा होकर अचेत हो गया। ‘खुईया’ का शिकार अगर गाँव में अपना रोना रोए तो लोग उलटा उसे ही डाँटे - ‘तू उस मुहल्ले में गया ही क्यों?’ राज-कचहरी करो तो गवाहदार कोई नहीं। पुलिस भी कहे - ‘खुईया में यह सब होता है। बीड़ी पी और घर जा। भगवान का शुक्र मना।’ 

पहले बारातें दो-दो, तीन-तीन दिनों में लौटती थीं। उन दिनों यह उन्माद गाँवों में जरा ज्यादा ही टिकता था। अब शादी-ब्याह साँझ-सवेर में हो जाते हैं। बारातें बीस-बाईस घण्टे में लौट आती हैं। ‘खुईया’ का ज्वार जल्दी उतर जाता है। वैसे भी महिलाओं में पढ़ाई और शिक्षा का आलोक फैलने के बाद इस रस्म में कुछ ‘रहम’ जैसा तत्व शामिल हो गया है।

‘खुईया’ में से बच कर निकले एक भाई ने मुझे बताया कि यह उन्माद युवा और अधेड़ महिलाओं पर ज्यादा चढ़ता है। अपने समय को जी चुकी बूढ़ी महिलाएँ दर्शक बनी देखती रहती हैं। नई लड़किया औचक-भौंचक, हक्की-बक्की रह जाती हैं। कुछ ‘खुईया’ का प्रशिक्षण लेती हैं। कुछ नई-नई गालियों से पहली बार परिचय प्राप्त करती हैं। 

‘खुईया’ का बुखार उतर जाने पर वही ‘मरद’ उन्हीं महिलाओं में बहुत ही सहजता से इतने शील और लज्जा से सम्मान पाता है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। न इसे शिकायत, न उन्हें मलाल।

पता नहीं, भारत की लोक-संस्कृति का यह कौन सा रंग है? पर जैसा भी है, अद्भुत है। अनोखा है।

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‘चेतना’ की कतरन