दादा श्री बालकवि बैरागी ने, एम. ए. (प्रथम श्रेणी में) उज्जैन के माधव महाविद्यालय से किया। इस पढ़ाई के लिए उन्होंने पहले इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लिया था। लेकिन सुमनजी (डॉ. शिवमंगलसिंहजी सुमन) उन्हें उज्जैन लिवा लाए। यह बात दादा से कई बार सुनी थी, लेकिन पूरा किस्सा कभी सुनने को नहीं मिला। दादा से दो-एक बार पूछा तो हर बार जवाब मिला - ‘कभी भी बता दूँगा यार!’ लेकिन यह ‘कभी भी’ कभी नहीं आया। पूरा किस्सा जाने की उत्सुकता कभी मरी नहीं। बनी रही। कल, 16 अक्टूबर 2026 को अचानक ही पूरा किस्सा मालूम हुआ।
अपने प्रकाशन के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुकी, श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर की मासिक पत्रिका ‘वीणा’ के सम्पादक डॉ. श्री राकेश शर्मा ये ‘यूँ ही’ मिलने गया। 21वीं सदी की दूसरी दशक में वे मासिक ‘बहुरंग’ का सम्पादन किया करते थे। बिना बात-सन्दर्भ-प्रसंग के उन्होंने ‘बहुरंग’ के (उनके सम्पादन के) अंकों की जिल्द थमा दी। जिल्द के पहले अंक की अनुक्रमणिका में सुमनजी पर दादा का लेख था। वहाँ तो पूरा पढ़ना सम्भव नहीं था। लेख के फोटू ले आया। रात को टाइप करते-करते रोमांच हो आया। आँखें झरने लगीं। मेरी कुँआरी मनोकामना ‘सुहागन’ हो गई।
अब ‘किस्सा’ पढ़ लीजिए।
नियति की डाली पर खिला अकेला ‘सुमन’
- बालकवि बैरागी
आग, पानी, हवा, धरती और आकाश इन पाँचों तत्वों को कभी भी, कहीं भी और कैसे भी, जब कभी जब कभी छुओ, सभी अपने-अपने प्राणतत्व और प्राणवत्ता का परिचय पूरी निश्छलता के साथ दे देंगे। ये तत्व कभी किसी से गलत बयानी नहीं करेंगे। ठीक यही निश्छलता और स्पष्टवादिता डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के व्यक्तित्व में रही। वे सदैव एक खुली किताब की तरह एकदम खुला जीवन बिताकर हमारे बीच से गए। नागपंचमी 2014 से उनका शताब्दी वर्ष शुरु हुआ। आज यदि वे हमारे आस-पास सशरीर होते तो अपनी आयु का सौंवा वर्ष जी रहे होते। मेरा बहुत भावुकतापूर्ण अनुभव यह रहा कि उनके सम्पर्क में रहें सैकड़ों-हजारों महानुभावों, सुबन्धुओं और सुभगिनियों ने उनके शताब्दी वर्ष को हाथोंहाथ ले लिया। जगह-जगह गतिविधियाँ और संगोष्ठियाँ तथा समारोह शुरू हो गए।
मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं उनका विद्यार्थी रहा। उनके सम्पर्क में तो मैं सन् 1951-52 से ही आ गया था, किन्तु सतत् सम्पर्क और एक विद्यार्थी तथा गुरु वाला सम्पर्क हुआ सन् 1961-62-63 और 1964 में। चूँकि मेरा विद्यार्थी जीवन विखण्डित रहा, इसलिए सन् 7947 में रामपुरा (तब होल्कर स्टेट) जिला नीमच से मेट्रिक पास करने के बावजूद अपनी पारिवारिक विपन्नता तथा अत्यन्त गम्भीर संघर्षों के कारण मैंने सन् 1959 में प्राइवेट परीक्षा देकर स्व. प्रो. श्री पी. डी. शर्मा (इंदौर) की कृपा से इण्टरमीडिएट पास किया और उन्हीं की कृपा से मन्दसौर महाविद्यालय से 1962 में बी.ए. किया तथा उज्जैन के माधव महाविद्यालय से सन् 1964 में एम.ए. (हिन्दी) प्रथम श्रेणी में पास किया। यह वह समय था जब डॉ. श्री सुमन इस महाविद्यालय के प्राचार्य थे।
मेरा पारिवारिक संघर्ष और कवि सम्मेलनों में भारत भ्रमण अच्छी खासी लोकप्रियता के बीच बराबर चल रहा था। डॉ. सुमन की उपस्थिति और प्रायः अध्यक्षता में इस समयावधि में मैं यहीं कोई बीस-तीस कवि सम्मेलन पढ़कर उनका प्रोत्साहनपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त कर चुका था। यह मुझ पर सरस्वती माता की कृपा ही मानो कि वे मेरे प्रति विशेष स्नेहशील थे। उन पर लिखने का उपक्रम यदि मैं अकेला ही करूँ तो हजारों पृष्ठ भी कम पड़ेंगे। खैर, मैं यहाँ वह संस्मरण और क्षण लिखना उचित समझता हूँ कि किस तरह मैं उनका “सीधा विद्यार्थी” बना और कैसे उनकी सहायता से मैं एम.ए. हुआ।
मन्दसौर से बी.ए. करने के बाद मुझे मेरी पत्नी सौ. श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी (सुशील ’पिया’ ) ने सुझाया कि आप वैसे ही सारे देश में घूमते-फिरते हो, इन्दौर के किसी कॉलेज में अपना नाम लिखा लो और एम. ए. कर लो। दादा श्री पी. डी. शर्मा. वहाँ आपका ध्यान रख लेंगे। बात जँच गई, लेकिन जेब में और घर में इतनी राशि नहीं थी कि मैं कॉलेज की प्रवेश फीस जमा करता और दाखिला ले लेता। ईश्वर ने सहायता ऐसे वक्त कर दी।
मुझे भरती करनेवाले अधिकारी ने सारे दस्तावेज और जो राशि मैंने जमा की थी वह पूरा पैसा मुझे थमा दिया। मैं यथावत् की जगह पूर्ववत् हो गया। सुमनजी ने अपनी गाड़ी दी। मैंने धर्मशाला से अपना झोलाझण्डा उठाया। उसी गाड़ी से वे मुझे उज्जैन तक लाए। डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को बुलवाकर मुझे उनके जिम्मे किया। फ्रीगंज का सत्यनारायण मन्दिर उनका निवास था। मुझे आदेश दिया, जब भी उज्जैन आऊँ तब वहीं रहूँ। जब भी मैं उज्जैन में रहूँ तो तो अपनी जीविका के संघर्ष के साथ माधव महाविद्यालय में एक या दो पीरीयडों में उपस्थित जरूर हो जाऊँ और प्राचार्य कक्ष में जाकर डॉ. श्री सुमन को प्रणाम अवश्य करूँ। एम. ए. में उस समय हिन्दी पढ़ानेवाले जो प्रोफेसर महानुभाव थे, उनमें स्व. पुरुषोत्तमदासजी टण्डन के पुत्र श्री गुरुप्रसादजी टण्डन, डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय, फिर भाषा विज्ञान के प्रोफेसर श्री भटनागर (नाम मैं भूल रहा हूँ), (प्रतापगढ़, राजस्थान) की एक विदुषी प्रोफेसर श्रीमती बक्षी (उम्र में यद्यपि मुझसे छोटी), मेरे शिक्षक गुरु रहे प्रो. चन्द्रकान्त देवताले जैसे लोग प्रमुख रहे। यदा-कदा डॉ. सुमन स्वयं एकाध क्लास ले लेते थे। जिस दिन वे कहीं, किसी भी क्लास में पीरीयड ले रहे होते तब आसपास की सारी क्लासें प्रोफेसरों सहित शून्य हो जातीं थी। पीरीयड पूरा होने की घण्टी बजानेवाला चपरासी भी भूल जाता था और वह पीरीयड कई घण्टों का हो जाता था। सुमनजी खुद भी घड़ी देखना भूल जाते थे। विद्यार्थी अपनी जिज्ञासाओं और प्रश्नों से क्लास को संवाद में बदल देते थे। मेरे अभिन्न मित्र, मालवी-हिन्दी के सुकवि भाई श्री हरीश निगम मेरे साथ ही एम. ए. कर रहे थे। हम एकाग्र होकर सुमनजी को सुनते और उनसे बहुत कुछ सीखते रहते थे।
पूज्य सुमनजी ने मुझे एम. ए. फाइनल की परीक्षा के लिए फोन करके किस तरह कोलकाता (तब कलकत्ता) कवि सम्मेलन के मंच से उठवाया और उज्जैन बुलवाकर परीक्षा की तैयारी करवाई यह संस्मरण आज भी मुझे रोमांचित कर देता है। कैसे उन्होंने मध्य प्रदेश के सूचना-प्रकाशन, भाषा-पर्यटन विभागों के राज्य मन्त्री, अपने विद्यार्थी बालकवि बैरागी के सिनाप्सिस पी-एच. डी. के लिए विक्रम विश्व विद्यालय के कुलपति के रूप में रजिस्टर तो कर लिए, पर साथ ही यह भी कह दिया कि “तुम चाहते हो तो हम तुम्हें रजिस्ट्रेशन दे देते हैं, तुम्हारे पास एक योग्यतम निर्देशक डॉ. श्री चिन्तामणि उपाध्याय हैं। तुम्हारा विषय ‘मालवी लोकगीत: एक अध्ययन’ बिलकुल तुम्हारा है, लेकिन बैरागी! त्ुम पी-एच. डी. नहीं कर सकोगे।” मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने पूछा - ‘सर! मैं क्यों नहीं कर पाऊँगा डॉक्टरेट?’ वे हँसकर बोले - ‘लोग तब तक तुम पर डॉक्टरेट कर लेंगे। तुम नहीं कर पाओगे।’ और उनका यह आकलन सौ फीसद खरा साबित हुआ। इस समय तक मुझ पर चार विश्वविद्यालयों से पी-एच. डी. हो चुकी है। हरीश निगम की बेटी, प्रियरानी अशोक ने मुझ पर पहली डॉक्टरेट ली थी। एम. फिल. तो शायद 8-10 विद्यार्थियों ने किया ही है।
संस्मरणों की अनन्त श्रंखला है। मैं क्या-क्या लिखूँ? अपने अन्तिम समय में जबकि वे मृत्यु शैया पर थे, तब मैं अपने प्रिय मित्र डॉ. प्रो. सरोजकुमार (इन्दौर) के साथ सुमनजी का आशीर्वाद लेने उज्जैन के अस्पताल में गया, तब उन्होंने आँखें खोलकर हमें देखा और सरोज भाई से कहा - ‘सरोज! बैरागी दूर से आया है, इसे चाय पिलाओ।’ कैसी तो चाय और कैसा दूर-पास? हम दोनों आँसू पोंछते हुए अस्पताल से नीचे उतरकर सड़क पर आए और हमारी पूरी इन्दौर यात्रा चुपचाप एक उदासी में पूरी हुई।
वे याद आते हें। उनकी महानता याद आती है। उनके दिए संस्कार में माता-पिता के दिए संस्कारों से सीधा संवाद करते प्रतीत होते हैं। उनकी कविताएँ याद आती हैं और जीवन जीने का सलीका सिखाती हैं। उन्होंने कहीं लिखा है - ‘जल रहे हैं दीप-जलती है जवानी।’ आज वे होते तो मैं उनसे प्रार्थना करके महकवि निराला की अद्भुत कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ खुद भी सुनता और आपको भी सुनवाता।
डॉ. सुमन सचमुच नियति की डाली पर खिले, अपनी तरह के एकामत्र ‘सुमन’ थे।
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(‘बहुरंग’, मार्च 2015, रंग प्रकाशन, 33 बक्षी गली, राजवाड़ा, इन्दौर।)
