‘सुब्बा राव’ नहीं, ‘सुब्ब राव’ थे वे

सारी दुनिया के ‘सुब्बा रावजी’, मेरे ‘भाई साहब’ और देश की जवान पीढ़ी के ‘भाईजी’, ‘सुब्ब रावजी’ नहीं रहे। कल रात फेस बुक पर उनकी एक तस्वीर देखी थी - जयपुर के किसी अस्पताल के पलंग पर लेटे हुए, नाक में नलियाँ लगी हुईं। चरम नियमित-अनुशासित-संयमित, सदैव मैदान में सक्रिय रहनेवाले सुब्ब रावजी के बीमार हो, बिस्तर पर पड़ जाने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी! लेकिन वे रोगी दशा में बिस्तर पर थे। सदैव ‘तन कर’ चलनेवाले, ‘चुस्त-दुरुस्त’ शब्द-युग्म के मानवाकार सुब्ब रावजी को इस दशा में देख पहली ही बात जो मन में उठी, वह थी - ‘भाई साहब अब नहीं लौटेंगे।’ रात का सोचा, सुबह हकीकत में बदल गया। दिन की शुरुआत ही सुब्ब रावजी के निधन के समाचार से हुई।   

मैं उन्हें ‘सुब्ब राव’ लिखता था। सब मुझे टोकते और ‘सुब्ब’ को सुधार कर ‘सुब्बा’ करने की कहते। जवाब में मैं कहता - “आप ‘सुब्बा’ को ‘सुब्ब’ कर लो क्योंकि वे ‘सुब्ब राव’ हैं, ‘सुब्बा राव’ नहीं।” यह बात खुद भाई साहब ने ही मुझे बताई थी। नाम तो उनका सलेम नंजुदैया राव था। लेकिन परिवार की सबसे छोटी सन्तान होने के कारण ‘सुब्ब राव’ हो गए। कर्नाटक में परिवार की सबसी छोटी सन्तान को लाड़ में ‘सुब्ब’ या ‘सुब्बु’ ही कहते हैं। (यहाँ दिए गए पत्रों में उनके हस्ताक्षर ध्यान से देखिए - उन्होंने ‘सुब्बराव’ ही लिखा है।) 

भाई साहब से मेरा परिचय दादा श्री बालकवि बैरागी के कारण ही हुआ था। वे दादा से दो बरस बड़े थे। अ. भा. काँग्रेस सेवादल के सहायक संगठक थे। दादा, ‘सेवादल’ के निष्ठावान, आज्ञाकरी स्वयम्सेवक और भाई साहब के ‘परम् भक्त’ थे। सुब्ब रावजी ने सेवादल के लिए दादा से अनेक गीत लिखवाए जिनमें ‘हम सिपाही सेवादल के, दम लेंगे हम देश बदल के’, ‘हम भारत माँ के पूत, अमन के दूत’, ‘हम भारत के मतवाले हैं, हम अमर तिरंगेवाले हैं’, ‘नौजवानों आओ रे, लो, कदम मिलाओ रे’, ‘हम हैं सिपहिया सेवादल के’ गीत प्रमुख हैं। (ये सारे गीत, दादा के गीत संग्रह ‘गौरव गीत’ में संग्रहीत हैं।) अक्टूबर 1961 में मुम्बई में सेवादल की अखिल भारतीय रैली हुई थी। उसके लिए सुब्ब रावजी ने दादा से विशेष गीत लिखवाया था जिसे दादा ने ‘विविध भारती’ शीर्षक दिया था। तत्कालीन प्रधान मन्त्री जवाहरलालजी ने इस रैली का निरीक्षण किया था। इस दौरान दादा को वह गीत गाना था। देश भर से आये स्वयं सेवकों की टुकड़ियाँ, गीत में उल्लेखित क्रम से प्रदेशवार खड़ी थीं। प्रदेशों से आये स्वयं सेवकों की संख्या असमान थी - किसी प्रदेश से ज्यादा तो किसी प्रदेश से कम। इसलिए, प्रत्येक टुकड़ी के सामने से, नेहरूजी की जीप के गुजरने का समय असमान था। दादा को जिम्मेदारी दी गई थी कि टुकड़ी के सामने से नेहरूजी के गुजरते समय में उस प्रदेश के उल्लेखवाला छन्द पूरा हो जाए। गीत के सारे छन्द समान पंक्तियों के हैं। दादा ने अपने कौशल से यह समय साधा था। समान पंक्तियो को, अधिक संख्यावाली टुकड़ी के लिए अधिक समय तक गा कर और कम संख्यावाली टुकड़ी के लिए कम समय में पूरा गाकर नेहरूजी का निरीक्षण पूरा करवाया था। दादा के इस कौशल की प्रशंसा नेहरूजी ने तो, मंच पर दादा की पीठ थपथपा कर की ही थी लेकिन सुब्ब रावजी ने दादा के इस कौशल की प्रशंसा अनगिनत अवसरों पर, अनगिनत बार की। वे दादा को ‘मिरेकलस पर्सन’ (चमत्कारी आदमी) कहते थे - ‘बैरागीजी से कहो कि इस थीम पर गीत चाहिए तो वे अगली साँस पर गीत थमा देते हैं।’ 

सुब्ब रावजी और दादा में एक बात समान थी। दोनों ही ‘पत्राचार व्यसनी’ थे। अपने ठिकाने पर हों या प्रवास में, इनका पत्र-लेखन निरन्तर रहता था। पोर्टेबल टाइपरायटर, सुब्ब रावजी के गिनती सामान का स्थायी हिस्सा बरसों तक बना रहा। अपनी यात्राओं के रास्ते के शहरों/कस्बों के अपने मिलनेवालों को पूर्व सूचना देते थे। सुब्ब रावजी जब-जब भी रतलाम होते हुए निकले, तब-तब हर बार उन्होंने खबर की। वे बोतल-बन्द, खरीदा हुआ पानी नहीं पीते थे। गरम करके ठण्डा किया हुआ पानी ही पीते थे। मुझ जैसे तमाम लोग उनकी यह सेवा करने की राह तकते थे। 


कुछ बरस पहले (‘कुछ’ नहीं, शायद ‘कई’ बरस पहले) उनका एक ‘युवा शिविर’ रतलाम में हुआ था। फरवरी का महीना था। सात फरवरी सुब्ब रावजी की जन्म तारीख है। भावना हुई कि उन्हें कुछ भेंट किया जाए। किन्तु ऐसे सन्त व्यक्ति को क्या भेंट दी जाए? मेरी टयूब लाइट जली और मैं उनके लिए एक हजार पोस्ट कार्ड (उनका नाम-पता छपवा कर) ले गया। उस शाम, रतलाम के शहीद चौक पर उनकी प्रार्थना-सभा थी। प्रार्थनाओं के बाद लोगों ने अपनी-अपनी भंेट देनी शुरु की। मेरा नम्बर आया। मैंने पेकेट थमाया। हजार पोस्ट कार्डों का वजन! उन्हें पेकेट भारी लगा। पूछा - ‘इतना भारी क्या है?’ मैंने कहा - ‘खुद ही देख लीजिए। आपकी तबीयत खुश हो जाएगी।’ उन्होंने पेकेट खोला तो छपे-छपाए पोस्ट कार्ड देखकर सचमुच में बच्चों की तरह खुश हो गए। पेकेट हवा में उठाकर, सभा के श्रोताओं को दिखाते हुए बोले - ‘मेरे काम की गिफ्ट तो विष्णु ही लाया है।’ अब खुश होने की बारी मेरी थी।

उनकी खुशी ने मुझे आनन्द-रस से लबालब कर दिया था। कुछ बरस पहले की बात है।  मालूम हुआ कि उज्जैन के पास किसी गाँव में उनका शिविर लगनेवाला है। मैंने अपने आत्मन् विनोद भैया (डॉक्टर विनोद वैरागी) का उपयोग कर एक हजार पोस्ट कार्ड और पाँच सौ अन्तरदेशीय पत्र पहुँचाए। डाक सामग्री मिली तो खुश हुए। मुझे फोन लगाया और बोले - ‘तुम मेरा इतना ध्यान रखते हो! अब तो जब भी पोस्टेज की जरूरत होगी, तुम्हें खबर कर दूँगा।’ मैंने हाँ भरने में न तो देर की न ही कंजूसी। खूब जानता था कि वे  ऐसा कभी करेंगे ही नहीं।

दादा के निधन पर पहले उनका फोन आया और बाद में पत्र। जो कुछ कहा था, वही लिख भेजा था -

प्रिय विष्णु भाई,

क्षति मात्र आपकी या एक परिवार की नहीं। क्षति हम सबकी। क्षति भारत माता की है। इस दुख में मैं आप सबके साथ हूँ। 

जैसे सब व्यवस्थित रहा हो। सुबह बहुत दिनों बाद बालकविजी की मीठी आवाज सुना फोन पर। वे बोले भीलवाड़ा शिविर में नहीं आया पर उज्जैन शिविर में जरूर आऊँगा। उज्जैन (सेवाधाम) शिविर है। मई 23 से 30 तक। मैं कल सुबह उज्जैन पहुँच रहा हूँ।

क्या कवि था! क्या ओजस और क्या प्रतिभा! सुबह बात हुई, रात को दुखद खबर आ गई। 

उनके लिए तो अच्छी मौत। न कोई तकलीफ पाए न ही किसी को तकलीफ दी। पुण्य पुरुष की मौत। धन्य है।

घर पर सबको प्यार।

प्यारा भाई,

सुब्बराव


17 जुलाई 2018 को वे रतलाम आए थे। लॉ कॉलेज के सभागार में कोई आयोजन था। जानकारी मिली तो मैं मिलने पहुँचा। यादव सा‘ब (श्री माँगीलालजी यादव) का साथ चलना पहले से ही तय था। आयोजन के दिए समय से कुछ पहले हम दोनों पहुँचे। वहाँ लगभग सन्नाटा था। मैंने यादव सा’ब से कहा - ‘भगवान करे, सुब्ब रावजी समय पर नहीं पहुँचें। यहाँ तो कुछ भी नहीं है। वे समय के बहुत ही पाबन्द हैं। कहीं ऐसा न हो कि वे समय पर आ जाएँ और उल्टे पाँवों लौट जाएँ। कमोबेश ऐसा ही हुआ। वे समय पर आ गए। वही हुआ। प्रतीक्षा कर पाना उनके लिए दूभर हो रहा था। हम कुछ लोगों ने बड़ी ही मुश्किल से उन्हें रोके रखा। मुझे देखकर खुश हुए थे। बोले थे - ‘जानता था, तुम आओगे ही। तुम्हारे घर आना है। पता नहीं कब छुट्टी मिलेगी। लेकिन आऊँगा जरूर।’

अपने कहे मुताबिक वे आए। रात के दस बज चुके थे। बहुत ही थके हुए थे। आँखें झपक रही थीं। बोल पाना मुश्किल हो रहा था। फिर भी देर तक दादा की बातें करते रहे। इस दौरान मैं अपने मोबाइल से उनकी मुद्राएँ कैद करता रहा।  खूब सारे किस्से सुनाए। जो बात फोन पर कह चुके थे और पत्र में लिख चुके थे, मुँदी आँखों वही बात दोहराते रहे - ‘नुकसान तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी हुआ है। हम सबका हुआ है। भारत माता का हुआ है।’ 

मैंने खूब मनुहार की लेकिन पानी के सिवाय कुछ नहीं लिया। जाने लगे तो मैंने एक लिफाफा उन्हें थमाया। कहा - ‘यह एन व्हाय पी (राष्ट्रीय युवा परियोजना) के लिए है। सुनते ही उनकी मुँद रही आँखों में चमक आ गई। बोले - ‘इसके लिए जितना भी दो, जितना भी करो, कम है। सरकार ने अपनी सूची से इसे निकाल दिया है। मेरा रेल-पास भी निरस्त कर दिया है। लेकिन कमी कुछ भी महसूस नहीं हुई। सब काम बराबर चल रहा है। लोग खूब मदद कर रहे हैं। यही देश की ताकत है।’ 

अब ‘सुब्ब रावजी’, ‘भाई साहब’, ‘भाईजी’ हमारे बीच नहीं हैं। उनसे बहुत ज्यादा मुलाकातें भी नहीं हुईं। लेकिन उनका मुस्कुराता चेहरा नजरों में बना हुआ है। गाँधी के बाद सम्भवतः वे इकलौते ऐसे भारतीय थे जिन्होंने गाँधी को जीया। 

मेरा मन कहता है, गाँधी आज होते तो सुब्ब रावजी की सूरत में ही होते।

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