दादा श्री बालकवि बैरागी की यह कविता भी मुझे पहली बार देखने/पढ़ने को मिली। उनकी बिखरी हुई, असंग्रहित रचनाओं की मेरी तलाश को जिस आत्मीयता और चिन्ता से मदद मिल रही है, वह मुझे विगलित कर देती है।
यहाँ प्रस्तुत कविता श्री गौरीशंकर जी दुबे का कृपा-प्रसाद है। मूलतः सीतामऊ (जिला-मन्दसौर) के निवासी दुबेजी जीवन के 87वें बरस (29 अप्रेल 1940) में चल रहे हैं। रतलाम में रहते हैं। आंचलिकता और आंचलिक इतिहास पर इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में ‘आधिकारिता’ (अथॉरेटी) की हैसियत रखते हैं। इतिहासविद् और इतिहासवेत्ता के विशेषणों से अलंकृत हैं। किन्तु खुद को छात्र, जिज्ञासु और शोधार्थी ही मानते हैं। उम्र के इस मुकाम पर भी लगतार सक्रिय बने हुए हैं। खुद का लिखा भी छापते हैं और दूसरों का ‘अच्छा और पठनीय लिखा’ भी संग्रहित करके छापते हैं।
दुबेजी को धन्यवाद देते हुए, ‘नईदुनिया’ के 2007 के दीपावली विशेषांक में छपी, दादा की इस कविता का आनन्द लीजिए।
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मारो गोली अपनी महक को
पौधों से अधिक नहीं है औकात
उनकी नजरों में मेरी।
वे सीचें तो मैं हरियाऊँ,
वर्ना, बिना पानी के मर जाऊँ
मेरे पत्तों, फूलों, महक तक पर
जताते हैं, अपना अधिकार,
मुझे अपनी मिट्टी से
उखाड़ फेंकने की धौंस दिलवाते हैं
इस सबसे मेरा अस्वीकार।
लटका रहूँ उनकी गैलरी में
आश्रित रहूँ उन पर
याचना करता रहूँ उनकी दया की,
बढ़ाता रहूँ उनकी शोभा,
यही है उनकी इच्छा-आकांक्षा।
और दुराग्रह यह कि
आकार नहीं ले मुझमें मेरी अपनी
कोई महत्वाकांक्षा।
बेशक गमला उनका -
गैलरी उनकी,
पर जब मैं कहूँ कि
मिट्टी मेरी-बीज मेरा,
और आकाश तक उठ जाने की
प्राणवत्ता मेरी है,
तो वे झल्लाते हैं -
मुँह मत लड़ाओ
मत इतराओ,
अपने फूल पत्तों पर
मारो गोली अपनी महक को,
जीवित रहो, हमारी दया पर।
बस, हमारी गैलरी में
मर जाओ।
मारे-मारे मत फिरो
इधर या उधर,
आवारागर्दी मत करो,
बसन्त में यहीं फूलो
पतझर में यहीं झरो।

