एलआईसी की मूल्यवान परिसम्पत्ति


यह कमलेश है। पूरा नाम कमलेश मालवीय। भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की मेरी शाखा, रतलाम-2 में सहायक शाखा प्रबन्धक (विक्रय) है। इस पद का अंग्रेजी संक्षिप्त नाम यूँ तो ‘एबीएमएस’ (असिस्टण्ट ब्रांच मेनेजर, सेल्स) होता है लेकिन लोक-प्रचलित, लोक-स्वीकृत नाम ‘एबीएमएस’ है। सो, कमलेश हमारा ‘एबीएम’ है।

कल, 03 जुलाई को कमलेश की (शायद 32वीं) जन्म वर्ष गाँठ थी। मैं, यदि कल यह पोस्ट लिख देता तो शायद सबके लिए अधिक सुखद होता। त्यौहार भी हो जाता और रस्म अदायगी भी। वैसे, हकीकत यह है कि पोस्ट अप्रेल के दूसरे सप्ताह में ही लिख देनी थी। किन्तु गए कुछ बरसों से मैं ‘आलस्य का मुकाम’ बना हुआ हूँ। अपने मालवा में बासी दशहरा भी मनाते हैं और बासी ईद भी। मान लिया जाए कि मैं, कमलेश की बासी वर्ष गाँठ मना रहा हूँ। देर आयद, दुरुस्त आयद। 

एबीएम किसी भी शाखा में ‘गुप्त सरस्वती’ की तरह होता है। नये बीमे कराने में एजेण्टों की सर्वाधिक मदद एबीएम ही करता है। जो एजेण्ट किसी विकास अधिकारी से सम्बद्ध नहीं होते (जिन्हें ‘डायरेक्ट एजेण्ट’ कहा जाता है) उनसे काम (नये बीमे) करवाना और उनकी कठिनाइयाँ दूर करना, सबकी सीधी जिम्मेदारी एबीएम की होती है। मेरी शाखा में डायरेक्ट एजेण्टों की संख्या डेड़ सौ से कम नहीं होगी। याने, कमलेश, मेरी शाखा की सबसे बड़ी एजेण्ट-टीम का प्रभारी है। लेकिन एबीएम को इतने सारे काम करने होते हैं कि एबीएम की दशा ‘पीर, बवर्ची, भिश्ती, खर’ जैसी हो जाती है। कहा जा सकता है कि शाखा प्रबन्धक/प्रभारी ‘शाखा-रथ’ का सारथी होता है तो एबीएम, रथ की धुरी। 

‘वित्त से जुड़ी तमाम संस्थाओं/संस्थानों की तरह एलआईसी की वार्षिक लेखा बन्दी भी 31 मार्च को होती है। अधिकांश संस्थाओं/संस्थानों में 31 मार्च को रतजगा होता है। बैंकों में यह लेखाबन्दी पहली अप्रेल को होती है। लेकिन एलआईसी की लेखाबन्दी अप्रेल के पहले सप्ताह तक चलती है। नये बीमों के लिए आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में जिन ग्राहकों के बीमा प्रस्ताव पूरे नहीं हो पाते, उन ग्राहको से प्राप्त रकम, हम बीमा एजेण्ट 31 मार्च तक जमा कर देते हैं। बाद में दस्तावेज जुटा कर उनके बीमा प्रस्तावों का निपटारा होता है। इसलिए, मार्च के दूसरे सप्ताह से लेकर अप्रेल के पहले सप्ताह तक, एलआईसी के दफ्तरों में किसी कारखाने जैसा वातावरण बना रहता है।

मोदी सरकार द्वारा एलआईसी का आईपीओ लाने के विरोध में एलआईसी के सारे कर्मचारी 28 मार्च सोमवार और 29 मार्च मंगलवार को हड़ताल पर थे। इससे पहले शनिवार-रविवार को दफ्तरों में छुट्टी थी। ‘मार्च एण्डिंग’ के मौसम में लगातार चार दिनों तक किसी वित्तीय संस्थान में काम ठप्प हो जाने से स्थिति कितनी कठिन हो जाती होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

बीमा प्रस्तावों को  टाइप (की-इन) करना तनिक असामान्य काम होता है। ऐसा नहीं है कि फार्म देखते गए, फटाफट टाइप करते गए और काम खतम। एक फार्म को टाइप करने में प्रत्येक फार्म के पन्ने पाँच-सात बार पलटने पड़ते हैं। जिन बीमा प्रस्तावों में चिकित्सा परीक्षण होते हैं, उन्हें टाइप करने में सामान्य से अधिक समय लगता है। चूँकि मामला ‘जोखिम सुरक्षा’ (रिस्क कवरेज) का होता है, इसलिए इसमें भरपूर सावधानी और यथेष्ठ कौशल आवश्यक होता है। ‘हर कोई’ यह काम नहीं कर पाता। मेरी शाखा में भाई मुकेश जैन (धाकड़) और भाई प्रदीप गुणावत इस मामले में ‘विशेषज्ञ’ हैं।

शनिवार 26 मार्च और रविवार 27 मार्च को जब दफ्तर की छुट्टी थी, कमलेश तब भी बीमा प्रस्ताव ‘की-इन’ कर रहा था। सोमवार, 28 मार्च को दफ्तर में सन्नाटा था। कमलेश, फार्मों और कम्प्यूटर से जूझ रहा था। भोजनावकाश में घर जाने के लिए दफ्तर की सीढ़ियाँ उतर ही रहा था कि अचानक सन्तुलन गड़बड़ा गया और वह लुड़कता हुआ, पहली सीढ़ी से अन्तिम सीढ़ी पर आ गया। गिनती के लोग मौजूद थे। उन्होंने और शाखा प्रबन्धक अरविन्दजी सावन्त ने कमलेश को सम्हाला। फौरन अस्पताल ले गए। भाग्य अच्छा था कि हाथों-हाथ कमलेश की देखभाल शुरु हो गई। जाँचें हुईं तो तसल्ली की बात यह रही कि बाँये हाथ में बहुत ही मामूली टूट-फूट हुई है। सबसे ज्यादा तसल्ली इस बात की रही कि ‘कम्पाउण्ड फ्रेक्चर’ नहीं था। डॉक्टर ने आवश्यक मरहम-पट्टी की, कुछ दवाइयाँ सुझाईं और ‘कम्पलीट रेस्ट फॉर वन वीक’ की हिदायत के साथ कमलेश को घर भेज दिया।

अब कल्पना कीजिए कि ऐसी दशा में आप-हम या कोई सामान्य कर्मचारी होता तो क्या करता? सीधी सी बात है, डॉक्टर का कहा मान कर सीधे घर जाता और बिस्तर पकड़ लेता। लेकिन कमलेश ने सबको हैरान कर दिया। खुद तो वाहन चला नहीं सकता था। सो बोला - ‘मुझे घर छोड़ दीजिए। भोजन करके खबर करता हूँ। लेने आ जाइएगा।’ सबने समझाया। डॉक्टर की हिदायत का हवाला दिया। कहा - ‘भाई मेरे! तुम्हारे बिना एलआईसी का काम ठप्प नहीं हो जाएगा। घर पर रहो। आराम करो। पूरी तरह ठीक हो जाओ तो काम पर लौट आना।’ लेकिन कमलेश ने किसी की, कोई बात नहीं सुनी। बोला - ‘पहले से फार्मों का ढेर पड़ा है। एम्पलाई दो दिनोे की हड़ताल पर हैं। सारे एजेण्ट अपने-अपने प्रपोजल कम्पलीट होने की राह देख रहे हैं। मैं सीरीयस नहीं हूँ। फ्रेक्चर बाँये हाथ में हुआ है। काम तो दाहिने हाथ से करूँगा!’ 

और कमलेश ने किसी की नहीं सुनी। भोजन करते ही काम पर लौट आया। और ऐसा भी नहीं कि शाम पाँच बजे तक ही काम किया हो! देर रात तक काम करता रहा। और केवल उस एक दिन ही नहीं, लेखाबन्दी के अन्तिम दिन तक फार्म की-इन करता रहा। मोटा अनुमान है कि इस समयावधि में कमलेश ने लगभग तीन सौ फार्म की-इन किए होंगे।

अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर मैंने कर्मचारियों को तीन श्रेणियों में बाँट रखा है - पहली श्रेणी के कर्मचारी ‘काम’ करते हैं। वे ‘दस से पाँच’ में बँधकर नहीं रहते। कोशिश करते हैं कि कल के लिए कम से कम काम बचे। घड़ी की सुइयाँ इन कर्मचारियों की नजरों को तरसती हैं। दूसरी श्रेणी के कर्मचारी ‘नौकरी’ करते हैं। वे समय पर आते हैं। दिन भर अपना काम निपटाते हैं और समय पर कागज-पत्तर समेट कर घर चले जाते हैं। तीसरी श्रेणी के कर्मचारी न तो काम करते हैं न ही नौकरी। वे पूरे वेतन की पेंशन लेते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता, समय पर लॉग-इन/गुड मार्निंग करना होती है। यह काम करके वे दिन भर के लिए मुक्त हो जाते हैं। घड़ी की सुइयाँ उन्हें सदैव रुकी हुई लगती हैं। ऐसे कर्मचारी अपना दिन कैसे बिताते हैं, यह अपने आप में स्वतन्त्र निबन्ध का विषय है।

लेकिन कमलेश ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया। कमलेश (और, निश्चय ही कमलेश अकेला ऐसा कर्मचारी नहीं होगा। उन तमाम कर्मचारियों) के लिए कौन सी श्रेणी बनाऊँ? ऐसे कर्मचारी किसी भी संस्थान के लिए अत्यधिक मूल्यवान परिसम्पत्ति होते हैं। दुःखद यह है कि इनके काम का समुचित मूल्यांकन कभी नहीं होता। सरकारी/अर्द्ध सरकारी संस्थानों में घोड़ों और गधों में (चाह कर भी) अन्तर नहीं किया जा सकता। न तो पहली श्रेणी वालों को अतिरिक्त लाभ दिए जाते हैं न ही तीसरी श्रेणी वाले दण्डित किए जाते हैं। किन्तु ‘सुखद आश्चर्य’ यह कि पहली श्रेणी के कर्मचारी इस बात से भी दुखी नहीं होते। 

इन सारी बातों के बीच कमलेश को देखकर मन को बड़ी ठण्डक मिलती है। ‘मैं कमलेश के साथ काम रहा हूँ’ यह विचार अतिरिक्त सुख देता है। 

प्रिय कमलेश को बहुत-बहुत बधाइयाँ और अकूत शुभ-कामनाएँ। मुझ जैसे तमाम लोगों को तुम पर गर्व है प्रिय कमलेश! खूब मेहनत करो, खूब तरक्की करो। खूब यशस्वी बनो। 

मेहनत के सुफल मिलते ही मिलते हैं। कमलेश को भी मिलेंगे ही।

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तनिक दूर से काम करता नजर आ रहा कमलेश।


शाखा प्रबन्धक अरविन्दजी सावन्त और कमलेश।