प्रभु की पटखनी


यह प्रभु है। पूरा नाम प्रभुलाल सिलोद। सब्जियों का व्यापारी है। रतलाम के नीम चौक में बैठता है। राधा स्वामी सम्प्रदाय का अनुयायी है। जब भी इन्दौर में राधा स्वामी सत्संग होता है, अपनी दुकान बन्द कर इन्दौर जाता है। मेरा अन्नदाता रहा है। अन्नदाता याने मेरा बीमा ग्राहक। अब इसका बेटा धर्मेन्द्र मेरा अन्नदाता बना हुआ है। मेरे घर से इसकी दुकान तक पहुँचने के लिए मुझे दो सब्जी बाजार पार करने पड़ते हैं। लेकिन इस प्रभु का प्रताप यह है कि दोनों बाजार पार करते हुए, सब्जी की किसी दुकान पर नजर नहीं पड़ती। मैं इससे मोल-भाव नहीं करता। सब्जियों का झोला थमाते हुए जितनी रकम बताता है, आँख मूँद कर चुका देता हूँ।

मँहगे भाव का पेट्रोल जला कर, दो सब्जी बाजार पार कर, इस प्रभु से सब्जी खरीदने की शुरुआत तो इसी वजह से हुई थी कि यह मेरा ग्राहक है। जो मुझे ग्राहकी दे, मैं भी उसे ग्राहकी दूँ - यही भावना रही। किन्तु मेरी इस भावना को इसने जल्दी ही परास्त कर दिया। एक दिन इसने मुझे गिलकी देने से इंकार  दिया। बोला - ‘आज गिलकी नहीं है।’ मैं प्रभु की शकल देखने लगा। टोकरी में रखी गिलकियाँ मुझे नजर आ रही थीं और प्रभु इंकार कर रहा था। गिलकी की टोकरी दिखाते हुए मैंने कहा - ‘ये रखी तो हैं!’ अपना काम करते हुए, मेरी ओर देखे बिना ही प्रभु ने जवाब दिया - ‘हाँ। रखी हैं। लेकिन अच्छी नहीं है। आपको नहीं दूँगा।’ सुनकर मुझे विश्वास नहीं हुआ लेकिन अच्छा लगा - ‘मुझे अपना खास मानता है। मेरा ध्यान रखता है। मेरी चिन्ता करता है।’ उस दिन से मैं इस प्रभु का भगत हो गया। उस दिन के बाद से मैं ध्यान रखने लगा कि प्रभु से सब्जी तब ही लूँ जब कोई और ग्राहक मौजूद न हो ताकि मुझ ‘खासम-खास’ की चिन्ता करते हुए यह किसी धर्म-संकट में न पड़े। 

लेकिन आज प्रभु ने ‘खासम-खास’ का मेरा यह मुगालता दूर कर दिया। आज इसकी दुकान पर पहुँचा तो कोई और ग्राहक नहीं था। मैंने तसल्ली और बेफिक्री से अपनी ‘पानड़ी’ (सूची) प्रभु को सौंप दी। प्रभु सब्जियाँ निकालने लगा। मैं खड़ा-खड़ा उसे देखता, प्रतीक्षा करता रहा। तभी पीछे से आवाज आई - ‘चँवला फली है?’ प्रभु ने ‘आवाज’ की ओर देखा और जवाब दिया - ‘है तो सही लेकिन आज की नहीं, कल की है।’ ‘आवाज’ ने पूछा - ‘कल की है! कोई बात नहीं। लेकिन अच्छी तो है?’ प्रभु ने अविलम्ब जवाब दिया - ‘न तो बहुत अच्छी, न बहुत खराब। मीडियम है।’ अगला सवाल आया - ‘घर-धराणी (गृहस्वामिनी) नाराज जो नहीं होगी?’ प्रभु के हाथ थम गए। ‘आवाज’ की ओर देखता हुआ बोला - ‘मैं मेरी चँवला फली के बारे में कह सकता हूँ। आपकी घर-धराणी की आप जानो। आप दोनों के बीच में मुझे मत डालो। मैंने चँवला फली के बारे में बता दिया कि आज की नहीं, कल की है और मीडिमय क्वालिटी की है।’ ‘आवाज’ भी शायद इसका, मेरी ही तरह कोई दिल-लगा ग्राहक था। बोला - ‘चल! तू तेरा काम कर। मेरी मैं निपटूँगा। दे दे आधा किलो।’ प्रभु ने मेरा का रोका। ‘आवाज’ को चँवला फली दी और पैसे लेकर विदा किया।

अब फिर मैं अकेला ग्राहक था। मैं अपने ‘खासम-खास’ होने के एकाधिकार के ध्वस्त होने से छोटे-मोटे सदमे में आ गया था। मैंने पूछा - ‘सबको इसी तरह सब्जी बेचते हो?’ बच्चों के से भोलेपन से प्रभु ने जवाब दिया - ‘हाँ। तो? और क्या करूँ? सब्जी जैसी है, वैसी है। इसमें क्या छुपाना?’ मैं अचकचा गया था। सहम कर पूछा - ‘ग्राहक चला जाए तो?’ उसी भाव और मुख-मुद्रा में प्रभु बोला - ‘देखो बाबूजी! ग्राहक तो भगवान होता है। भगवान से क्या झूठ बोलना? मैं कुछ भी कह दूँ, सब्जी सामने नजर आ रही है। और फिर बाबूजी! जब ग्राहक मेरा बताया मोल चुका रहा है तो मेरी जवाबदारी है कि उसे मोल के मुताबिक माल दूँ। मुझे मेरी तकदीर का मिलेगा। लेकिन ग्राहक को तो सन्तोष होगा कि मैंने उसे ठगा नहीं।’

प्रभु ने मुझे अवाक् कर दिया था। मैं जड़-मति की तरह उसे देख रहा था। मैं तो समझ रहा था कि एक-अकेला मैं ही उसका खासम-खास हूँ। लेकिन हकीकत तो यह थी उसके लिए तो उसका हर ग्राहक खासम-खास था। मैं उसके अनगिनत खासम-खासों में से एक खासम-खास हूँ। जब सारे के सारे खासम-खास हों तो कोई एक खुद को खासम-खास कैसे समझ सकता है? 

प्रभु ने एक झटके में मुझे खासम-खास की आसन्दी से सामान्य के पटिये पर ला पटका था। लेकिन सच कहूँ,  इस पटखनी में बड़ा आनन्द आया। 

यह प्रभु तो वास्तव में प्रभु ही है - सबको एक नजर से देखनेवाला।
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