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विकृत (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवीं/अन्तिम कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवीं/अन्तिम कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



विकृत

शालाएँ खुल गईं, विद्यालयों के कमरे बच्चों से लबरेज हो गए, जन-जीवन की चहल-पहल में एक सात्विक बदलाव आ गया। जिम्मेदार शिक्षकों ने पढ़ाई शरु कर दी। एकाध सप्ताह पाठ्य पुस्तकों का हो-हल्ला मचा और फिर गाड़ी पटरी पर आ गई। दो-ढाई हजार की आबादीवाले इस छोटे से गाँव में सरकार ने मिडिल स्कूल दे रखा था। जैसा कि आम वतीरा है, यहाँ भी कमरे कम थे और बच्चे अधिक। परिवार नियोजन की विफलता और नागरिक भावना में देश के प्रति अवमानना का सीधा प्रभाव यह पड़ा कि छठवीं, सातवीं और आठवीं कक्षा के दो-दो सेक्शन करने की नौबत आ गई। हेडमास्टर श्री मसर्रत खान अपने घिचपिच ऑफिस में साल भर तक पेश आनेवाली दुश्चिन्ताओं से घिरे बैठे अपने भृत्य पन्नालाल से कुछ कहने ही वाले थे कि पदक बाबू, उनके कमरे में बिना किसी पूछताछ, बिना किसी पूर्वाज्ञा और बिना किसी औपचारिक परवानगी के घुस आए। आए वहाँ तक तो ठीक है, पर वे बिना पूछे ही सामनेवाली अकेली कुरसी पर बैठ भी गए और हेडमास्टर साहब से उन्होंने शुद्ध अंग्रेजी में पूछा, ‘मे आई कम इन सर?’ मसर्रत साहब का मुँह फटा-का-फटा रह गया। उनके दिमाग में न जाने क्या-क्या कौंध गया। पन्नालाल का मन हुआ कि वह जोर से खिलखिलाए, पर अपनी हँसी दबाकर वह खान साहब की तरफ आदेश के लिए देखने लगा।

खान साहब ने पदक बाबू से पूछा, ‘फरमाइए! क्या बात है?’ हालाँकि वे जानते थे कि बात क्या हो सकती है।

पदक बाबू ने पहले कुरसी पर खुद को बिलकुल सीधा किया, रीढ़ की कमान को ताना और बोले, ‘मिस्टर खान! अहं ब्रह्मास्मि। मैं कल विवेकानन्द था, आज वशिष्ठ नारायण सिंह हूँ, कल सुकरात होऊँगा और फिर अरस्तू। कहिए, आपकी तत्काल जिज्ञासा क्या है? आपकी जन्म-जन्मान्तरों की कोई तपस्या फलीभूत हुई है जो मुझ जैसा अप्रतिम ऋषि, मार्ग प्रदर्शन और आशीर्वचन के लिए आपको उपलब्ध है। मैं इस विश्व को प्रभु का दिया हुआ पदक हूँ। स्पीक ऑन, बोलो, मैं सन्नद्ध हूँ, उपलब्ध हूँ।’

मसर्रत साहब ने अपनी दोनों कुहनियाँ मेज पर टिकाकर ‘हे भगवान!!’ की सिसकारी भरते हुए अपना माथा दोनों हथेलियों में दबाकर अन्ततः मेज पर रख दिया। पन्नालाल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। मसर्रत खान सहज होते, तब तक पदक बाबू फिर बोले, ‘इतनी ग्लानियुक्त मानसिकता से आप प्रधानाध्यापकी किस तरह कर सकेंगे, मिस्टर खान? वैसे मैं प्रकटतः यह कहने आया हूँ कि इस विद्यालय का प्रधानाध्यापक मुझे होना था और आपको होना था मेरा सहायक। मेरा सहायक क्या, आपको तो पन्नालाल का सहायक होना था। पर मैं एक ‘अस्तु’ लगाकर आपसे कहना चाहता हूँ कि आप अपनी समस्याओं का समाधान मुझसे प्राप्त कर सकते हैं, अहं ब्रह्मास्मि। यदा-यदा हि धर्मस्य.....’

इससे आगे मसर्रत खान के लिए सुनना कठिन था। उनका मन हुआ कि चीखें और पन्नालाल से कह कर पदक बाबू को अपने कक्ष से बाहर फिंकवा दें। पर तभी परिवेश में बढ़ती हुई धर्मान्धता का जहर उनके आड़े आ गया। वे सोच बैठे कि बिना किसी बात के गाँव में न जाने कैसा तनाव हो जाएगा। लोग अपने मतलब निकालेंगे और.....।

पदक बाबू उठे और अभय मुद्रा में हाथ फैलाकर बुद्ध की मुद्रा में तर्जनी को अंगूठे से मिलाकर वर्तुल बना कर बोले, आपकी सुविधा के लिए मैं आपके कक्ष से बहिर्गमन करता हूँ। हमारी याद जब आए तो आँसू बहा लेना। विदा दो मेरे महबूब! मैं जा रहा हूँ। कल पुनः प्रविष्ट होकर आपका स्वास्थ्य परीक्षण करूँगा। ओ. के.। पुनरपि, पुनरपि, थैंक्यू मिस्टर ग्लॉड!’ और पदक बाबू कमरे से बाहर हो गए।

मसर्रत खान कातर दृष्टि से सामने लगा अपने प्रदेश का नक्शा देखते रह गए। पन्नालाल फर्नीचर की धूल पोंछने का बहाना करके दीवार की तरफ मुह करके हँसता रहा। तटस्थ होने की कोशिश में उसे कुछ नहीं सूझा तो मसर्रत साहब से पूछ बैठा, ‘किसी को बुलाऊँ, सर?’

मसर्रत साहब खीझकर बोले, ‘अब और किसको बुलवाना चाहता है? साल भर तक अब इस कमरे में किसी के आने की जरूरत नहीं है। जो भी आए, उसे धक्के.....।’  कहकर अपनी कुरसी से वे खड़े हुए। गाँधीजी के फोटो को देखकर उन्होंने तौबा की मुद्रा में दोनों कान पकड़े। अपने ही गालों पर दो तमाचे जड़े, बालों को नोचा, दीवारों को सुनाकर बोले, ‘या अल्लाह! तौबा! लानत है इस नौकरी पर। कैसे-कैसे जाहिल मेरी किस्मत में लिख दिए हैं तूने?’ और फिर धम्म से अपनी कुरसी में धँस गए।

वे इतने हताश हो चुके थे कि चपरासी पन्नालाल से ही कह बैठे, ‘तबादलों पर वापस बेन लगने वाला है, सरकार में किसी की सुनी जाती हो तो भाग-दौड़ करके इस पागल को यहाँ से कहीं बदलवाओ। पचास बार लिख चुका हूँ कि यह आदमी पागल हो चुका है। इससे मेरी जान छुड़ाओ, पर कोई सुनता ही नहीं है। अपनी रंगबाजी के लिए दूसरे मास्टर आए दिन इस पागल को मेरे कमरे में दाखिल कर देते हैं । कुछ कमजर्फ चाहते हैं कि इस बस्ती में किसी-न-किसी तौर पर हिन्दू-मुस्लिमवाला कमीना फसाद हो जाए। पन्नालाल! तुम मेरी क्या मदद कर सकते हो? कुछ करो, भाई!’

पन्नालाल बेचारा क्या करता? वह अपनी हस्ती को बढ़ता देखकर पल-दो पल के लिए फूलकर कुप्पा हो लेता। यह वैसा ही अवसर था।

पदक बाबू को लेकर मसर्रत खान साहब के सामने नई-नई मुसीबतें पेश आने लगीं। एक तो पदक बाबू इस बस्ती और शाला में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे आदमी। तीन-चार डिग्रियाँ उनके पास अलग-अलग विश्वविद्यालयों की, फिर वे खुद भी नहीं जानते हैं कि किस क्षण कौन सी भाषा बोलने लग जाएँगे, भाषाओं के विविध योग-प्रयोग करें, वहाँ तक तो ठीक है, पर न जाने कहाँ-कहाँ के श्लोक, कविताएँ, वाक्यांश, सूत्र संगत-असंगत न जाने कहाँ से कहाँ फिट कर दें, यह उनको भी पता नहीं रहता था। अर्थ के अनर्थ हो जाते और गलियों में झगड़े होते-होते समझदार लोगों के बीच-बचाव के कारण रह जाते।

रोज सवेरे स्नान- ध्यान तिलक-चन्दन के बाद पदक बाबू अपनी कपिला गाय को लेकर चराई के लिए चौंपे में छोड़ने जाते। अपने घर से गाँव के अन्तिम छोर तक चलते-चलते वे अपनी गाय से हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती, मराठी, न जाने कौन-कौन सी भाषाओं में बातें करते। सामान्य लोगों का अनुमान था कि रात में सोते वक्त से लेकर प्रभात में उठते वक्त तक, और खासकर स्नान-ध्यान के समय तक पदक बाबू सामान्य ही रहते थे, पर ज्यों ही अपनी धोती पहनते, कुरता डालते, उसके ऊपर जैकेट पहनते और फिर नुकीली टोपी लगाकर आईने के सामने खड़े होते वैसे ही उनके भीतर विद्या का उफान उफन पड़ता। वे वहीं से बुदबुदाना, फिर बड़बड़ाना और आखिरकार ऊल-जुलूल बोलना शुरु कर देते थे। रास्ते भर मुहल्लों के लोग उनकी इस वाणी का आनन्द उठाते। ज्यों ही पता चलता कि पदक बाबू गाय लेकर आ रहे हैं त्यों ही मनचले लोग अपना काम छोड़-छाड़कर चबूतरियों पर आ जाते और कान लगाकर सुनते कि पदक बाबू गाय से क्या बातें कर रहे हैं। पदक बाबू गाय के पीछे से एकाएक उछलकर सामने आ जाते। गाय ठिठककर खड़ी हो जाती। वे घुटनों के बल गाय के सामने बैठ जाते, फिर प्रार्थना के स्वर में कहते, ‘हैलो मदर काऊ! आप सृष्टि-माता हैं। मैं आपका वत्स हूँ। सन्ध्या को यथासमय लौटने की कृपा करना। दिन भर कोई आवारागर्दी मत करना, अन्यथा आपकी सन्तति का अपयश होगा।’ और गाने लग जाते, ‘जाओ, पर सन्ध्या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाए रात’। फिर कहते, ‘ओ होली मदर! यू आर लवली। हूँ तमारे माटे प्रणय निवेदन करूँ छुँ, सेज की शिकन सँवारते न बीत जाए रात। लौट आओ माँग के सिन्दूर की सौगन्ध तुमको।’

लड़के-बच्चे खिलखिलाते, बहुएँ लम्बे घूँघटों को छोटा करतीं और बेतहाशा हँस पड़तीं। पदक बाबू की भाषा न गाय समझती, न बहू-बेटियाँ; पर एक दृश्य तो वैसा बन ही जाता था कि गलियों का सवेरा सही हो जाए।

एक दिन तो गजब हो गया। पदक बाबू स्कूल जाने के लिए घर से निकले, मुख्य मार्ग से गली में मुड़े। मन-ही-मन बुदबुदाते जा रहे थे कि सामने से पानी भरे बेवड़े माथों पर लिये घूँघटवाली तीन-चार बहुएँ उन्हें आती दिखाई दीं। पदक बाबू पर अपनी विद्या का दौरा पड़ गया। वह बीच रास्ते में घुटनों के बल उनके सामने बैठ गए। फिर हाथ पसारकर थिएटर की मुद्रा में शुरु हो गए, ‘किस पिपासु की पिपासा शान्त करने के लिए यह उपक्रम कर रही हो, सुभगे! तृषित को पहचानो। वह आपके समक्ष याचक मुद्रा में प्रस्तुत है।’ और दोनों हाथों की ओक माँडकर पानी पिलाने का आग्रह करने लगे।

बेचारी लड़कियों के होश उड़ गए, लाज-मर्यादा भूलकर एक चिल्लाई, ‘कमीने! बेवड़ा जो माथे पर मार दिया तो भेजा बाहर आ जाएगा।’ पर बात इतनी ही नहीं रही, अनायास बैठे-ही-बैठे पदक बाबू की नजर पड़ गई गली के मन्दिर के शिखर पर, जहाँ शिखर कलश के पास ही ध्वज-स्तम्भ पर एक मोर पक्षी बैठा-बैठा कूक रहा था। पनिहारिन रास्ता बनाएँ तब तक पदक बाबू ने अपने जीवन का अभी तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दिया। उन्होंने आव देखा न ताव, अपनी धोती की काँछ पीछे से खोली। खुली काँछ को पीठ पर पूरा-का-पूरा सिर से ऊपर तक खींचा, धोती के उस पल्लू को दोनों हाथों से पीठ पर चौड़ाई में फैलाया और नर्तन करने लग गए घरों से पचासों नर-नारी निकलकर गली में एकत्र हो गए। बच्चे किलकारी भरकर तालियाँ बजा रहे थे। पदक बाबू बोले, “दूर हटो, मेरा मन-मयूर नाच रहा है। मैं नर्तन कर रहा हूँ। आषाढ़स्य प्रथम दिवसे-‘मेघदूतम्’ में यही हुआ था। मेरा यह कटिवस्त्र मयूर पंखों का पुंज है, राशि है। मयूर पंख फैल गए हैं।” बड़ी मुश्किल से सयानों ने उन्हें फिर से धोती पहनाई और स्कूल की तरफ चलता किया।

बात मसर्रत साहब तक भी पहुँची। उन्होंने लिपिक से कहकर तत्काल सारा मामला लिखकर वरिष्ठ कार्यालय तक लिखकर भेजा। पर दोपहर ढलते-ढलते मसर्रत साहब के सामने गाँव के नवयुवकों का एक शिष्टमण्डल आ धमका। वातावरण से डरे-सहमे मसर्रत साहब खौफ खा गए कि अब होगी तोड़-फोड़। पर उनके दीदे फटे रह गए, जब उस शिष्टमण्डल में शामिल कई नवयुवकों ने उनसे निवेदन किया, ‘मसर्रत साहब! कुछ ऐसी व्यवस्था कर दें कि पदक बाबू अपनी गाय छोड़ते समय और स्कूल आते-जाते समय प्रतिदिन एक ही गली से नहीं निकलें। वे रोज अलग-अलग गलियों से गुजरें, ताकि उनकी प्रबल मेधा का प्रदर्शन सारे गाँव में समान रूप से देखने को मिल सके।’

यह माँग सुनते ही मसर्रत खान बदहवास होकर खड़े हो गए। उन्होंने गाँधी बाबा की तसवीर के सामने हाथ जोड़े, अपने दोनों कान पकड़े, गालों पर तमाचे मारे और चीखे, ‘या अल्लाह! तौबा, रहम कर, हे भगवान। तुम कहीं हो भी या......। क्या हो गया है इस गाँव को?’ और सारा शिष्टमण्डल खिलखिलाता-हुआ बाहर निकल गया।

शिष्टाचार के नाते मसर्रत साहब उस शिष्टमण्डल को विदाई देने पीछे-के-पीछे बाहर आए तो देखते क्या हैं कि अपने बस्ते ले-लेकर बच्चे घर की ओर भाग रहे है। शोर उठ रहा था, ‘छुट्टी! छुट्टी!!’ वे लपककर बच्चों के आगे खड़े हो गए। उनको रोका। पूछा, ‘कहाँ हुई छुट्टी? चलो जाओ, अपनी क्लास में बैठो।’ बात की तह में जाने पर पता चला कि पदक बाबू ने क्लास में जाते ही बच्चों से कहा, “मेरे प्रिय बटुकों! हे मेरे शिष्यवृन्द! उच्चारित करो कि तुम आज मुझसे क्या पढ़ना चाहते हो? आज मैं तुम्हें धन्य कर दूँगा, निहाल कर दूँगा, मालामाल कर दूँगा। मैं कुबेर हूँ, मैं वृहस्पति हूँ, मैं गरुड़ हूँ, मैं परमहंस हूँ। ओ मानस के राजहंस! तुम भूल न जाना आने को। इस महान् विश्व में आज के ही दिन क्रूड आइल का आविष्कार हुआ था। जाओ सभी, ‘क्रूड आइल डे’ मनाओ! जाओ! छुट्टी।” और बच्चे ‘क्रूड आइल डे’ मनाने को भाग निकले।

थक-हारकर आखिर एक दिन मसर्रत खान ने गाँव के समझदार लोगों की बैठक बुलाई। उनसे निवेदन किया कि ‘बदनामी आपके गाँव की हो रही आपसे कुछ हो सकता हो तो आप करें, वरना आप लोग तुझे एक ज्ञापन दे दें ताकि मैं सारा मामला पुलिस को देकर पदक महाशय को मेडिकल के लिए भिजवा दूँ और चाहे इन्दौर बाण गंगा, चाहे जयपुर, चाहे बरेली चाहे आगरा, कहीं-न-कहीं इनका इलाज हो सके। भविष्य बिगड़ रहा है तो आपके बच्चों का बिगड़ रहा है। मैं सीधे-सीधे लिख दूँगा तो आप कहेंगे कि खान साहब से एक पागल भी नहीं पचा।’

बड़ी अवहेलना के भाव से गाँववालों ने कहा, ‘वो तो ठीक है, सर! पर पड़ा रहने दो। एक पागल के कारण गाँव में रौनक है। आपका क्या लेता है? क्यों परेशानी में पड़ते हैं आप? छोड़िए भी!’

मसर्रत खान के लिए यह उदासीनता नया झटका था। वे हतप्रभ थे। क्या हो गया है इस गाँव को? न अपने बच्चों की चिन्ता, न अपनी बहू-बेटियों की परवाह। एक पूरा गाँव तबाह हो रहा है और यारों को मनोरंजन की पड़ी है। वे बुरी तरह खीझ गए। वक्त की नजाकत को देखते हुए बोले कुछ नहीं और यह विचार-बैठक उठने को ही थी कि पदक बाबू आ धमके।

आते ही उन्होंने समवेत बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘इफ यू मीट ए फेअरी, डोण्ट रन अवे। शी विल नॉट वाण्ट टू हर्ट यू। शी विल वाण्ट टू ओनली प्ले विद यू।’ फिर पूछा, ‘समझे? नहीं समझे न? इस महान् कविता का अर्थ है-अगर कहीं तुम्हारी भेंट किसी परी से हो जाए तो उससे दूर मत भागो। डोण्ट रन अवे। वो तुम्हें कष्ट नहीं देना चाहेगी। वह केवल तुम्हारे साथ। खेलना चाहेगी।’ और आँखें मूँदकर बोलते चले गए, ‘मैं एक परी हूँ। मुझसे दूर मत भागो, प्यारे बच्चों! मैं तुम्हारे साथ खेलना चाहती हूँ।’ कहकर पदक बाबू फटाक से मुड़े और ‘ओ. के., टा-टा’ कहते हुए परिदृश्य से दूर हो गए।

मसर्रत साहब के लिए यह पराकाष्ठा थी। उनका बस चलता तो वे चीख-चीखकर रोते। पर हालात की मजबूरी थी। तब भी उनकी आँखों में आँसू छलछला आए। विचार-सभा कनखियों से एक-दूसरे को देखती हुआ खिसक ली। पर इस सबका चरम यह रहा कि तबादलों पर बेन लगने से पहले एक दिन की डाक में लिपिक ने जब डाक खोलकर मर्सरत खान साहब के सामने फैलाई तो वे पचास-साठ बार अपनी आँखों को मसलकर एक कागज को देखते रह गए। सचमुच यह तबादला आदेश ही था। विभाग ने तो उनकी नहीं सुनी, पर शायद भगवान ने उनकी सुन ली थी। यह तबादला आदेश खुद मसर्रत खान साहब के लिए था। इस गाँव से उनको कहीं दूसरे मिडिल स्कूल में रख दिया गया था।

उन्होंने गाँधीजी के फोटो को फिर से देखा। एक हलकी सी मुसकान उनके चेहरे पर खिल आई। उन्होंने पन्नालाल से कहा, ‘जाओ पन्नालाल! पदक बाबू को बुला लाओ।’

पन्नालाल चौंका, ‘क्या हो गया, सर? कोई खास बात?’

वे हँसे। बोले, ‘जाओ, जितना कहें उतना करो।’

पदक बाबू कमरे में आए। मसर्रत खान ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, सामनेवाली कुरसी दी। बोले, ‘पदक बाबू! पहले मैं बोल लूँ, फिर आप बोलना। सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि मैं अब आपके सत्संग से वंचित रहूँगा। मेरा तबादला कर दिया गया है। इस स्कूल को आप सँभालना। सीनियरिटी के लिहाज से इस अमले में मेरे बाद अब आप ही यहाँ का चार्ज लेंगे।’ और लिपिक को देखकर बोले, ‘बड़े बाबू! चार्ज देने की सारी तैयारी कर लो।’

पदक बाबू न पहले कुछ समझते थे, न अब कुछ समझे । अपनी रौ में कहने लगे, ‘हे पार्थ! इस तरह शस्त्र मत फेंक। तू यह धर्मयुद्ध लड़। यह मेरा आदेश है।’ और बोले, ‘माननीय प्रधानाध्यापक महोदय! तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा-त्वया चा पि मया चा पि। आप इसका मतलब समझे? जब भगवान कृष्ण ने देखा कि अर्जुन पर मानसिक कायरता का दौरा पड़ गय्ा है तो उन्होंने अर्जुन को ढाढस देते हुए कहा-‘हे अर्जुन! त्वया चा पि अर्थात् तू भी चाय पी ले और मया चा पि, मैं भी चाय पी लूँ। यानी खूब सोच ले, खूब समझ ले, चाहे तो कुछ उत्तेजक औषधि ले ले, पर यह युद्ध तो तुझे करना ही पड़ेगा। तू लड़, उठ, खड़ा हो जा।

मसर्रत खान ने दाँत पीसे, मन-ही-मन कुछ बुदबुदाए, फिर बोले, ‘मिस्टर पदक! तुम्हारे कारण शास्त्रों का मखौल हो रहा है। तुम्हारे कारण पीढ़ियाँ बरबाद हो रही हैं। तुम्हारे कारण सरकार, शासन, यह गाँव, बस्ती सब-के-सब बदनाम हो रहे हैं। तुम अपना उपचार क्यों नहीं करवाते? तुम्हारे घरवाले तुम्हें किस तरह बरदाश्त कर रहे हैं? मेस बस चलता तो....’

पदक बाबू एक क्षण भी विचलित नहीं हुए। कड़क आवाज में बोले, “मिस्टर खान! मुझसे बराबरी का व्यवहार करो। महाराजाधिराज पुरु की जगह मैं हूँ। आप इस समय वक्त के सिकन्दर हैं। आप भी हेडमास्टर और अब मैं भी हेडमास्टर।’ और उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के गाना शुरु कर दिया, ’ओ जानेवाले, हो सके तो लौट के आना।’ फिर कहा, ‘यह संसार असार है, बच्चा! न यहाँ कोई आता है, न यहाँ से कोई जाता है। सब लीलाधर की लीला है।’

पन्नालाल आज परेशान था। जब तक नया हेडमास्टर नहीं आए तब तक उसे पदक बाबू के मातहत ही काम करना है, यह सोचकर वह चुपचाप खड़ा रहा। पदक बाबू ने कमरे से निकलने के पहले आज की तारीख में

अपना अन्तिम वाक्य कहा, ‘पन्नालाल! राम झरोखे बैठकर सबका मुजरा लेत, जैसी जाकी चाकरी तैसा ताको देत।’ और मसर्रत खान की तरफ देखकर कह बैठे, ‘जाओ रानी! याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, तेरा यह बलिदान लाएगा स्वतन्त्रता अविनाशी।’

पदक बाबू कमरे से बाहर निकल रहे हैं। मसर्रत खान कुरसी छोड़ने के लिए कुरसी पर बैठ रहे हैं और पन्नालाल कभी इधर देख रहा है तो कभी उधर। 

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‘बिजूका बाबू’ की बीसवी कहानी ‘छात्र’ यहाँ पढिए।  


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


 

 

 

 

 

 


  


 


 

 

  

 

  

 


छात्र (श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की बीसवीं कहानी)

 

श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की बीसवीं कहानी  


यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



छात्र

अब अगर किस्मत ही काली स्याही से लिखी गईं हो तो कोई क्या करे। तत्पर भाई का जब-जब साबका पड़ा, ऐसे ही लोगों से पड़ा। वैसे उनकी  दुनिया विद्यार्थियों की दुनिया रही। छात्र संसार में उन्हें हमेशा सम्मानित स्थान मिला। अगर यूनियनबाजी करते तो शायद वे एकछत्र छात्र नेता होते, ‘स्टूडेण्ट लीडर’ कहलाते। आड़े वक्त छात्रों के काम आना उनका व्यसन रहा। लेकिन इन दिनों में उनका अनुभव यह रहा कि छात्रों के सामने आड़ा वक्त ज्यादा आने लगा। कभी-कभी तो सारा-का-सारा दिन उन्हें इस ‘आड़े वक्त’ को ‘खड़ा वक्त’ बनाने में ही लगाना पड़ जाता है। एक आता है तो एक जाता है। पहला जाता है तो दूसरा आ जाता है। काम भी, उनके टेढ़े-मेढ़े।

एक तो विश्वविद्यालय वाले शहर में तत्पर भाई का निवास। फिर खुद का सामाजिक और राजनीतिक रुतबा। सबसे ज्यादा कष्टदायक बात यह कि तत्पर भाई ने किसी को ना कहना नहीं सीखा। उनके साथी मित्र उनकी इस आदत को लेकर न जाने कैसे-कैसे मजाक करते हैं। प्रचलित मजाक यह है कि अगर तत्पर भाई को भगवान ने कहीं लड़की बना दिया होता ये दस-बीस हजार लोगों का जीवन तबाह कर देते। तत्पर भाई हैं कि सारी बातों को हँसकर पी जाते हैं। किन्तु यदा-कदा वे ऐसे करिश्मे भी कर बैठते हैं कि बड़े-बड़े बीहड़ छात्र नेता तक अपनी दादागिरी भूलकर उनके पाँव पकड़ लेते हैं। छात्र नेताओं और छात्र संगठनों की दीम लगी खोखली नींव के हजार किस्से तत्पर भाई की जबान पर हैं। कभी-कभी तो वे खुद ही कह बैठते हैं कि ऐसी खोखली नींव पर छात्र राजनीति किस तरह छात्रों के भविष्य का स्वन-महल खड़ा कर सकेगी। पर तब भी वे अपनी सदाशयता और ‘आड़े वक्त को खड़ा वक्त’ बनाने की तत्परता से बाज नहीं आते। आखिर तत्पर भाई जो ठहरे! तब भी कल उन्होंने कमाल कर दिया।

दो नवयुवक छात्र नेता उनके किसी सुपरिचित सज्जन का अनुशंसा-पत्र लेकर तत्पर भाई के सामने खड़े हो गए। तत्पर भाई ने पत्र पढ़ा। दोनों नवयुवकों को सादर बैठाया। उनका चाय-नाश्ता करवाया। फिर विस्तार से परिचय पूछा। दोनों को भरपूर आत्मीयता से अपनापन दिया। मन-ही-मन सोचा कि अगर ये फिल्म या किसी टी. वी. सीरियल में ट्राई करते तो हीरो या साइड हीरो अवश्य बनाए जाते। पर उन्होंने अनुशंसा-पत्र की गम्भीरता को देखते हुए उनसे कोई छेड़-छाड़ नहीं की। वे सीधे काम की बात पर आ गए।

‘हाँ तो हीरो! तुम्हारी सूचना पक्की है कि तुम्हारी कॉपियाँ यहीं आई हुई हैं?’ तत्पर भाई का प्रश्न था।

‘जी सर! हमारी सूचना पक्की है। कॉपियाँ यहीं हैं और जायसवाल सर आपके अच्छे मित्र ही नहीं, आपसे उपकृत भी हैं। वे आपका कहा टालेंगे

नहीं। हमारे भविष्य का सवाल है। अगर कुछ नम्बर बढ़ जाएँगे तो...।’ दोनों में से एक बोला। दूसरा अपनी कमीज पर पड़ी सलवटों को ठीक करता हुआ जीन्स की जेब से कंघा निकालक़र अपने बालों में लच्छे डालता तत्पर भाई की बैठक में लगे शीशे का उपयोग करता रहा।

‘चलो, जायसवालजी से बात कर लेते हैं।’ और तत्पर भाई उठ खड़े हुए।

यह सुनते ही दोनों चौंक गए।

‘सर! आप तो फोन कर दीजिए। जायसवाल सर से हम मिल लेंगे।’ एक बोला।

‘नहीं भाई! जो कुछ होना है, वह तुम्हारे सामने ही होना है। चलो, वक्त बरबाद मत करो।’ तत्पर भाई की तत्परता ने दोनों को कुछ सोच में डाल दिया।

और तत्पर भाई आधे घण्टे के भीतर ही जायसवालजी के घर पहुँच गए।

जायसवालजी को कुछ भी नया नहीं लगा। वे समझ गए कि यह नम्बर बढाने का चक्कर है। समय के सत्य से वे भलीभाँति परिचित थे। उन्होंने केवल दोनों छात्रों से उनके विश्वविद्यालय का नाम पूछा। फिर परीक्षा केन्द्र का नाम पूछा। फिर स्वयमेव ही कह दिया, ‘हाँ। आपकी कॉपियाँ मेरे पास हैं। अभी उन्हें जाँचना शुरु नहीं किया है। बताइए अपने रोल नम्बर?’

दोनों ने अपने-अपने रोल नम्बर बताए।

जायसवाल सर ने एक बण्डल की तरफ इशारा किया, ‘उठाओ और निकालो अपनी-अपनी कॉपी।’

दोनों ने अपनी-अपनी कॉपी निकाली। तत्पर भाई देखते रहे। कॉपियाँ निकालकर वे जायसवाल सर को देने लगे। जायसवाल सर ने तत्पर भाई से कहा, ‘भाई! देख लो इन कॉपियों को। मेरी अपनी नौकरी दाँव पर लग ही रही है। खुद ही जाँच कर नम्बर दे दो। शेष मेरी जिम्मेदारी।’

दोनों खुश। तत्पर बाबू पानी-पानी। पर वे बात को पेंदे तक समझ गए। उन्होंने कॉपियों के पन्ने देखे। मुश्किल से एकाध सवाल का उत्तर लिखने की कोशिश की गई थी। शेष सारी कॉपी कोरी पड़ी थी।

तत्पर भाई ने दोनों से उनके राजनीतिक दलों की जानकारी ली। दोनों अलग-अलग राजनीतिक दलों के छात्र नेता थे।

तत्पर भाई ने अपना खुद का कलम एक छात्र को दिया। जायसवाल सर से एक कलम माँगकर दूसरे हीरो को दिया। बण्डल पर जो प्रश्नपत्र था वह दोनों के सामने रखा। पुस्तकों की अलमारी की तरफ इशारा किया। पूरी गम्भीरता से कहा, ‘हीरो! सामनेवाली अलमारी से इन सवालों के उत्तरवाली तुम्हारी कोर्स बुक्स रखी हैं। मैं तुम लोगों के भोजनादि की व्यवस्था करवाता हूँ। चाय-पानी यहाँ मिल जाएगा। जायसवालजी के सामने बैठो। पुस्तकें लो। प्रश्नपत्र यह रहा। पूरे छह घण्टों का समय आप लोगों को मैं देता हूँ। अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में अपने हाथ से सही उत्तर लिख दो। मार्किंग तुम्हारे सामने हो ही जाएगा। शाम की ट्रेन से अपने घर के लिए निकल जाना। समझ गए!’

जायसवाल सर चुप।

 दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। अपनी कॉपियों को देखा। फिर एक-दूसरे को देखा। कभी जायसवाल सर को तो कभी तत्पर भाई की तरफ देखकर फिर से एक-दूसरे को देखा। कमरे में सन्नाटा गहरा गया।

एक बोला, ‘हम बड़ी उम्मीद से आए थे, सर।’

‘आप तो हमें टाल रहे हैं, सर!’ दूसरा बोला।

तत्पर भाई ने धीरे से पूछा, ‘आप हम दोनों में से किससे कह रहे हैं? जिससे भी कह रहे हों उसकी आँखों में आँखें डालकर कहो। हमें पता तो चले कि आपको कौन टाल रहा है!’

‘खैर सर! हम जा रहे हैं, पर आप यह अच्छा नहीं कर रहे हैं।’ एक बोला।

तत्पर भाई ने एक सुझाव और रखा, ‘अच्छा! चलो! ऐसा करते हैं कि सवालों के जवाब जायसवाल सर बोल देंगे, तुम अपने हाथ से लिख तो दो।’

‘अब छोड़िए भी, सर! यही सब करना होता तो हम आपके पास क्यों आते!’ पता नहीं दोनों में से कौन बोला।

न किसी ने धन्यवाद दिया, न किसी ने धन्यवाद लिया।

दोनों उठकर बैठक से बाहर होने लगे।

‘ना! ना!! ऐसे नहीं। अपनी कॉपियों को वापस उसी बण्डल में बाँधकर वहीं रख दो, जहाँ से तुमने उठाया था।’

दोनों मेधावी छात्रों ने जब उस बण्डल को बाँधना शुरु किया तो तत्पर भाई को लगा जैसे वे अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों और छात्र संगठनों की गतिविधियों का बण्डल बाँध रहे हैं।

तत्पर भाई ने एक बार फिर काली स्थाही से लिखी किस्मत को पढ़ने की कोशिश की।

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‘बिजूका बाबू’ की उन्नीसवी कहानी ‘पुल पर एक शाम’ यहाँ पढिए।

‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवी/अन्तिम कहानी ‘विकृत’ यहाँ पढिए।



कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


 

 

  

 


पुल पर एक शाम (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की उन्नीसवीं कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की उन्नीसवीं कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



पुल पर एक शाम

यदि यह आलेख मैं नहीं लिखूँगा तो मेरा दम घुट जाएगा।

अपने मानसिक स्वास्थ्य और लेखकीय सहजता को लौटाने के लिए मैं इस प्रसंग को लिख ही देना ठीक समझता हूँ।

आप इस सबको पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं कि इसे कहते हैं बिना किसी बात के बेबात अपना और अपने पाठकों का समय नष्ट करना। पर मैं यह इलजाम भी अपने माथे लेने के लिए तैयार हूँ। 

देश का पहला ‘युवा उत्सव’ समाप्त हो चुका होगा, तब कहीं ये पंक्तियाँ आपके सामने आ पाएँगी। 

स्वामी विवेकानन्दजी का जन्मदिन भी बीत गया।

‘युवा वर्ग’ और ‘युवा’ शब्द आज हमारी राष्ट्रीय चेतना में चिन्तन और बहस का मूल बनता जा रहा है।

तब मेरे मानस-पटल पर रह-रहकर एक आकृति कौंध-कौंध जाती है। इतने दिन हो गए, मैं इस दृश्य को अपने रक्त-प्रवाह में दौड़ता महसूस करता हूँ और शायद तब तक करता रहूँगा जब तक मैं व्यक्त नहीं हो जाता।

मैं अपने एक मित्र की मारुति वैन से भोपाल के लिए निकला हूँ। जाना मुझे कर्नाटक था। ड्राइवर का नाम है बाबू। उसके पासवाली अगली सीट पर मैं हूँ। मेरे पीछेवाली सीटों पर जावद (मन्दसौर, म.प्र.) के विधायक श्री घनश्याम पाटीदार और उनके पास हमारे एक सहयात्री श्री चन्द्रकुमार जैन बैठे हुए हैं। हमारी यात्रा नीमच से शुरु हुई। हम लोग बतियाते-बतियाते चले जा रहे हैं। आगे सड़क अत्यन्त खराब है, सो हम जावरा से ही मुख्य मार्ग छोड़कर उपमार्ग पर महिदपुरवाला रास्ता ले लेते हैं। सूरज हमारी पीठ पर है। शाम ढलने को है। जावरा से कुछ ही किलोमीटर चलकर ‘मलैनी’ नदी के पाट को पार करने के लिए उसकी रपटनुमा पुलिया पर प्रवेश करने वाले हैं। हम चारों जो बातें कर रहे हैं वे संगत भी हैं और विसंगत भी। हमारी बातों का दायरा फैलता भी है, सिकुड़ता भी है। मैं ‘मलैनी’ का सही नाम अपने सहयात्रियों को बताता हूँ। इस नदी का नाम वस्तुतः ‘मलयिनी’ रहा होगा। सैलाना के आस-पास किसी जमाने में अत्यन्त घने मलय-वन (चंदन वन) से चन्दन की सुगन्ध लेकर यह नदी ललककर लपक चली थी। अच्छा-भला नाम था ‘मलयिनी’, पर कालान्तर में हो गया ‘मलैनी’। और जिस समय अस्ताचलगामी क्लान्त रवि की सान्ध्य रश्मियाँ ‘मलैनी’ के पानी पर पड़ती दीखती हैं तो वह पानी अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही गन्दा और लाल-लाल लगता है। उसकी गन्दगी का और भी कोई कारण हो सकता है। जल प्रदूषण हमारी नदियों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकेगा। ‘मलैनी’ भी इस अलंकार से अछूती नहीं है। होगी भी कैसे?

मेरी नजर पुलिया के ठीक बीच के दृश्य पर ठिठक जीती है। मेरा भावुक मन, संवेदनशील मानस एकाएक विकृत हो जाता है। उस गोधूलि वेला में मैं देखता हूँ कि हमारी गाड़ी के ठीक आगे-आगे पन्द्रह-सोलह वर्ष का एक किशोर अपने गाँव की ओर भागता जा रहा है। वह अकेला नहीं है। उसके पाँवों में औसत से ज्यादा कीमत के नई डिजाइन के, बन्दवाले गुदगुदे बढ़िया जूते हैं। मैं सोचता हूँ कि उन जूतों की कीमत आज के हिसाब से दो सौ से तीन सौ रुपयों के बीच जरूर होगी। आधुनिक फैशन की जींस उसकी  टाँगों पर कसी हुई है। एक अच्छी सी रेशमी जैसी कमीज उसकी काया पर है, जो जींस के भीतर डली हुई है और माथे पर धूप से बचानेवाली ‘क्रिकेट कैप’ जैसी टोपी। उसके हाथों में तीन-चार पुस्तकें हैं और दो-एक कॉपियाँ भी। यह तो एक सामान्य सा, साधारण दृश्य है। पर विशेष बात यह है कि यह किशोर हमारी गाड़ी को रास्ता देने के लिए अपने आगे-आगे भागते चल रहे चार-पाँच गधों को अपनी पुस्तकों से उनके पुट्ठों पर हलकी थापें लगा-लगाकर तेज दौड़ाने की कोशिश कर रहा है। इतना ही नहीं, वह उन गधों को तरह-तरह के नामों से पुकारता, पुचकारता, दुलारता, फटकारता बराबर भागा जा रहा है। 

मैं इस दृश्य को देखकर मुग्ध रह गया। मैंने चन्द्रकुमार से इस किशोर के जूतों, जींस, कमीज, टोपी वगैरह की कीमत का जोड़ लगाने का आग्रह किया। अपने विधायक बन्धु से कहा, ‘आगे भाग रहे गधों की कीमत कितनी हो सकती है?’ ड्राइवर बाबू से मैंने कहा, ‘बाबू! गाड़ी को चुपचाप इन गधों से आगे निकालकर बीच पुलिया पर रोक लो। मैं इस बच्चे से बात करना चाहता हूँ।’ और बाबू ने पुलिया के उस छोर से पहले ही यह काम कर दिया। हमारी गाड़ी रुक गई। गधे पुल के उस पार तक पहुँच गए। भागता किशोर ठिठककर खड़ा हो गया। मैंने अपनी खिड़की का शीशा नीचे उतारा। उस किशोर को आवाज दी। सूरज की किरणें मेरे चेहरे और उसकी पीठ पर थीं। मैंने देखा, एक श्यामल वर्ण, तन्दुरुस्त, चुस्त और चाक-चौबन्द किशोर का अद्भुत, दीप्ति से दमकता चेहरा। मैं अनुमान लगा रहा था कि एक पूरे अपराह्न की थकान और उड़ती गोधूलि से इसका चेहरा म्लान होे गया होगा। पर मेरा अनुमान गलत था। यद्यपि वह तरोताजा नहीं था, तब भी थका और मुरझाया भी नहीं था।

मुझे अपना खुद का विपन्न बचपन याद आ गया। मैं आज के विधायक भाई घनश्याम पाटीदार के उस रूप को याद करने लगा, जब कि अपने

युवाकाल के आरम्भ में घनश्याम मन्दसौर के एक पेट्रोल पम्प पर हाथों से हैण्डल घुमा-घुमाकर सारा दिन बसों, मोटरों और कारों में ईंधन भरता रहता था। एक संघर्षरत मजदूर के तौर पर घनश्याम ने इस जीवन को ठाट से जिया था। घनश्याम ने भी अपनी तरफ का शीशा नीचे उतारा। 

मैंने उस-किशोर से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

मैं प्रायः ठगा सा देखता रह गया, जब कि उसने पहले सभ्यता के साथ हम सभी को प्रणाम किया, फिर अपने बेतरतीब भागते गधों पर एक नजर डाली और सन्तुलित स्वर में उत्तर दिया, ‘भूपेन्द्र प्रजापति।’ उसने यह उत्तर बिना किसी कुण्ठा और बिना किसी संकोच या झिझक के दिया। मेरी आँखें छलछला आईं। वह चाहता तो अपना नाम भूपेन्द्र कुमार बता सकता था। कुण्ठित होता तो ‘प्रजापति’ नहीं भी बताता। पर मैं उसके चेहरे की उस आभा को मैं आज सहेजे बैठा हूँ। बोला-

भूपेन्द्र प्रजापति।’

‘ये गधे किसके हैं?’ मेरा प्रश्न था।

‘जी, मेरे हैं।’

‘क्या तुम पढ़ते हो?’

‘जी हाँ, मैं दसवीं कक्षा का विद्यार्थी हूँ। पढ़ रहा हूँ।’ उसने अपनी पुस्तकों को सहेजते हुए उत्तर दिया।

‘कहाँ से आ रहे हो, कहाँ जा रहे हो?’ मैंने सवाल किया।

‘जी, गधे चराने गया था। वहाँ कुछ पढ़ा, होमवर्क किया। अब शाम ढल रही है, अपने पशुधन को लेकर घर जा रहा हूँ।’ उसका निस्संकोच उत्तर था।

मेरी भावुकता मुझे अपने बचपन के अत्यन्त विपन्न और विवश संघर्षकाल में घसीटकर यही कोई पचास बरस पीछे खींच ले गई। मैं रो पड़ा। मैंने कहा, ‘जियो बेटा भूपेन्द्र! तुम खूब तरक्की करोगे। अपने माता-पिता और शिक्षक-गुरुओं को प्रसन्न रखना। तुम एक ऊर्जस्वी और कुण्ठाविहीन किशोर हो। तुम्हारा भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल है। तुम अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना और उनके पशुधन के रखवाले के तौर पर तुम्हारी भूमिका पर हम सभी की बधाई देना। र्दश्वर तुम्हें सफलताभरा, सुयशपूर्ण, समृद्ध जीवन दे। जाओ।’

मैंने देखा, भूपेन्द्र अवाक् हम सभी को देख रहा है। शायद हमारा परिचय जानने की उत्सुकता उसकी आँखों में तैर रही थी। 

मैंने अपने आँसू पोंछे। पहले ड्रायवर का परिचय दिया, ‘यह बाबू है। यह गाड़ी इसके मालिक की है। फिर चन्द्र कुमार का परिचय करावाया और फिर भाई घनश्याम पाटीदार विधायक का।

अब भूपेन्द्र की नजर मुझपर और केवल मुझपर थी। भाई श्री घनश्याम पाटीदार ने बताया, ‘ये बालकवि.....’ और ‘बैरागी’ शब्द स्वयम् भूपेन्द्र के मुँह से निकल पड़ा। उसने अगला दरवाजा खोला, मेरे पाँव छुए और सिर झुकाकर बोला, ‘सर! सब आपका आशीर्वाद है।’ और भूपेन्द्र ने मेरी गाड़ी का दरवाजा बन्द कर दिया। वह पुस्तकों सहित हाथ जोड़े प्रणाम की मुद्रा में एक तरफ खड़ा हो गया।

‘चलो बाबू!’ मैंने कहा।

बाबू ने कार स्टार्ट की, गियर लगाया। हम लोग चल पड़े।

चन्द्र कुमार ने पीछेवाले शीशे में देखकर कहा, ‘दादा! भूपेंद्र अभी तक वहीं खड़ा है।’

यह रतलाम जिले की जावरा तहसील के गाँव दूधाखेड़ी के पास बहती ‘मलैनी’ नदी के पुल का परिदृश्य था। मैं प्रकृति-पुत्र सूर्य को डूबते देख रहा था; पर साथ ही मैं एक उदित होते सूर्य का भी दर्शन कर रहा था। मन-ही-मन मैंने गायत्री पढ़ी। प्रभु! हमारे आँगन को ऐसी उन्मुक्त पीढ़ियाँ दे। निस्संकोच और कुण्ठाविहीन। 

अपनी पढ़ाई मन लगाकर करना भूपेन्द्र!

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विशेष-

- इस पुस्तक के प्रकाशन काल में श्री घनश्याम पाटीदार मध्य प्रदेश सरकार में श्री दिग्विजयसिंहजी के मन्त्रिमण्डल में सामान्य प्रशासन तथा विधि विभागों के स्वतन्त्र प्रभार वाले राज्यमन्त्री हैं।

- लेखक राज्यसभा का सदस्य है।

- ईश्वर जाने आज भूपेन्द्र कहाँ होगा? कैसा होगा? क्या होगा?

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‘बिजूका बाबू’ की अठारहवी कहानी ‘अन्धा शेर’ यहाँ पढ़िए।

‘बिजूका बाबू’ की बीसवी कहानी ‘छात्र’ यहाँ पढ़िए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


  


 

 

 


 

 


 

 

  

 

  

   


 


 


अन्धा शेर (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की अठारहवीं कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की अठारहवीं कहानी
 
यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



अन्धा शेर

इस कहानी को लिखने की जितनी भी कोशिशें प्रखर बाबू ने कीं उतनी ही विफलता उनके हाथ लगी। हर बार वे कोशिश करते और हार-थककर कलम रख देते। कागज सरका देते। दिमाग में बात पकती, बाहर आने को कसमसाती। शिराओं में झनझनाती, पर उनके कागज कोरे-के-कोरे रह जाते। जब से उनके मस्तिष्क में यह कहानी शोभाराम ने डाली है, तभी से वे इसे लिखने की छटपटाहट में विकल बैठे हुए हैं। महीनों से सहज नहीं हो पाए। पहला मानसिक संघर्ष तो उनके मन में इसी बात को लेकर रहा कि वे इस कहानी का शीर्षक क्यो दें? कई शीर्षक उनके मानस-पटल पर उभरे जैसे-कोशिश, प्रयत्न, संकोच, धर्मसंकट, शशोपंज, गर्भपात, भ्रूण-हत्या वगैरह-वगैरह, पर वे किसी भी शीर्षक को तय नहीं कर पाए। एक शीर्षक ‘लिहाज’ भी ध्यान में आया, पर फिर कुछ सोच-साचकर, कागजों को कोरा ही सरकाकर अपना पठन-पाठन करने लगे। कहानी बनी नहीं। बन तो गई पर बाहर नहीं आई। इस कथानक पर उन्होंने अपनी पत्नी से भी बहस की। पत्नी बेचारी क्या करती? वे जब-जब लिखने को बैठते, वह समय भाँपकर चाय का प्याला आगे रख देती। बच्चों को कमरे में जाने से रोक लेती। वातावरण को अनुकूल रखती। टेलीफोन का चोंगा परे रख देतीं। कोई भी मिलने-जुलनेवाला आता तो बाहर से ही उसे रुखसत कर देती। तब भी  महीनों हो गए, प्रखर बाबू कहानी पर कलम नहीं चला पाए। पत्नी ने एक दिन बड़ा चोटिल विनोद भी कर लिया। कह पड़ी, ‘लगता है, गर्भाधान ही नहीं हुआ, वरना नौ महीने दस दिन में तो जटिल-से-जटिल प्रकरण में भी प्रसव हो जाता है। अब इस प्लाट को लेकर कोई सीजेरियन तो करने से रहा! कहानी साल भर से ठक-ठक कर रही है, पर दरवाजा ही नहीं-ख़ुला देवता! लगता है, सरस्वती ने दरवाजे पर ताला लगा दिया है।’ और प्रखर बाबू हँसकर रह जाते। कलम चलती नहीं।

इस बीच शोभाराम उनसे पचास बार मिल लिया होगा। जब-जब मिलता, पूछता, ‘प्रखर भाई! बनी कुछ बात?’ और प्रखर बाबू शोभाराम को आश्वस्त करते कि ‘बनेगी, बनेगी, शोभाराम। बात जरूर बनेगी।’ शोभाराम का एक ही आग्रह था कि कहानी में उसका नाम शोभाराम ही रखा जाए। कोई काल्पनिक नाम उसके चरित्र को नहीं दिया जाए।

कथानक का दूसरा पक्ष कुछ ज्यादा ही उलझानेवाला था। प्रखर महाशय ने शोभाराम को वचन दे रखा था कि वे उसका नाम शोभाराम ही लिखेंगे। पर कहानी में एक और पात्र करीब-करीब केन्द्र में था। वह था डा. खरे जैसा अतिप्रतिष्ठित और लोकप्रिय चरित्र। शोभाराम के कारण डॉ. खरे को भी यह जानकारी-मिल गई थी-कि प्रखर बाबू उनको और शोभाराम को लेकर किसी कहानी का ताना-बाना बुन रहे हैं। इस सूचना से डॉ. खरे खुश थे। चाहते वे भी थे कि कहानी में उनका जिक्र हो। वे देखना यह चाहते थे कि उनके चरित्र को लेकर कहानीकार चित्रण कैसा करता है। अगर उनका चरित्र विकृत हो गया तो वे न तो शोभाराम को छोड़ेंगे और न प्रखर बाबू को। दोनों की ऐसी-तैसी करके ही दम लेंगे। 

कहानी में अगर उसके बीज तत्व पर नजर डाली जाए तो विशेष कुछ भी नहीं था। न बात न बात का नाम। पर अगर इस बीज को सही जमीन मिल गई और उस बीज को शब्द का सिंचन सही-सही मिल गया तो कहानी जरूर बनाई जा सकती है। ऐसा प्रखर महाशय सोचते रते थे।

वह बीज आखिर था कौन सा? उसकी प्राणवत्ता आखिर थी कैसी? पच्चीस-तीस साल पहले सरकारी नौकरी पर आए थे। जैसा कि उनका सरनेम खरे है, वे उसके अनुरूप सचमुच में भी खरे निकले। खरे यानी खरे-खट्ट। न किसी से लगाव, न किसी से दुराव। मरीज का इलाज करना और अपने काम से काम रखना। अपनी फीस लेना और मरीज को तन्दुरुस्त रखने को पूरी कोशिश करना। उनके विभाग में कहीं किसी जिला अधिकारी से उनका कुछ कहना-सुनना हो गया और सरकार ने उनका तबादला इस शहर से बहुत दूर, प्रदेश के दूसरे छोर पर कर-दिया। वैसे भी खरे साहब इस प्रदेश के रहनेवाले नहीं थे। वे पड़ोसी, प्रदेश के निवासी थे और आज भी हैं पर इस शहर में जनता से उनका लाग-लगाव इलाज को लेकर कुछ ऐसा हो गया कि गाँववाले नहीं चाहते थे कि वे यहाँ से चले जाएँ। गाँव के लोगों ने भाग-दौड़ की। कई दिनों तक हलचल रही, पर डॉ. खरे का तबादला स्थगित नहीं हुआ, सो नहीं ही हुआ। गाँववालों ने डॉ. खरे को पटा-पुटू कर उनसे इसी शहर में ही अपना निजी अस्पताल खोलने का आग्रह किया, और डॉ. खरे ने इसे मान भी लिया। सरकार की नाक पर चूना लगाता हुआ डॉ. खरे का अस्पताल धड़ल्ले से चल निकला। इस शहर में इस तरह निजी डॉक्टरों के नाम पर डॉ. खरे पहले एम. बी. बी. एस. डॉक्टर रहे। पर एक बदलाव लोगों ने देखा। धीरे-धीरे डॉ. खरे ने खुद को शहर में जमते-जमाते यह भी समझ लिया कि अब वे यहाँ न तो सरकारी नौकर हैं, न पड़ोसी प्रान्त से आए कोई परदेशी। अब वे यहीं के नागरिक हैं, यहीं के निवासी हैं और यहाँ रहना उनकी स्थायी नियती है। उनके और उनके बाल-बच्चों तथा परिजनों के जीवन के सभी सोलह संस्कार यहीं होंगे। वे केवल नागरिक ही नहीं, निवासी भी हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक बदलाव था और इसका प्रभाव डॉक्टर खरे के रोजमर्रा के अपनत्व पर पड़ना एक सहज बात थी। खरे साहब का अस्पताल कुछ ऐसा चला कि बस, पूछिए ही नहीं।

शोभाराम इस अस्पताल में एक दिन खुद बीमार होकर दाखिल हुआ। खरे साहब ने शोभाराम को जाँचा-परखा, देखा-भाला और कहा, ‘शोभाराम! जब तक मैं जिन्दा हूँ, तू मरेगा नहीं। चिन्ता मत कर। अपने परिवारवालों को तंग मत कर।’ और उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया।

सात-आठ दिन शोभाराम डॉक्टर खरे के इलाज में रहा। जब वह जाने लगा तो उसने चाहा कि खरे साहब अपना बिल वसूल कर लें। खरे साहब उसकी पीठ ठोकते हुए बोले, ‘अच्छा तो तुझे भगवान ने किया है। मैंने तो बस, ईश्वर के आदेश का पालन किया है। कोई पैसा-वैसा नहीं। तेरा मन  पड़े, उतना पैसा रेडक्रॉस के डिब्बे में डाल देना। जा, अपनी खेती-बाड़ी देख।’

शोभाराम के लिए यह पहला अनुभव था। उसने डॉ. खरे से कहा, ’डॉक्टर साहब! जब मैं आया था तब आपने कहा था कि जब तक मैं जिन्दा हूँ तब तक आप मुझे मरने नहीं देंगे। अब अगर यही बात है तो एक बात मेरी भी सुन लो।’ शोभाराम का इतना कहना भर था कि डॉ. खरे के अस्पताल की सारी हलचल ठप हो गई।

खरे साहब ने कहा, ‘बोल भाई! मुझे दूसरा मरीज देखना है, जल्दी कर।

शोभाराम बोला, ‘जब तक आप जिन्दा हैं तब तक अगर मैं मरूँगा नहीं, तो डॉक्टर साहब! यह भी बात पक्की मान लो कि जब तक मैं जिन्दा हूँ तब तक इस अस्पताल की शान के खिलाफ अगर कहीं कोई आवाज शोभा के कान में भी पड़ी तो शोभा जान पर खेल जाएगा!’ और शोभाराम अपने  घरवालों के साथ अपने ट्रैक्टर पर बैठकर अपने गाँव के लिए रवाना हो गया।

भीतर की बात यह थी कि डॉ. खरे को शोभाराम की पब्लिसिटी वैल्यू की जानकारी हो चुकी थी। वे समझ गए थे कि इस अस्पताल को यशस्वी रखने के लिए जहाँ उपचार और उनका डॉक्टरी अनुभव जरूरी है, वहीं कुछ ऐसे लोग भी जरूरी हैं जो इन बातों की चर्चा यहाँ-वहाँ करते रहें। इस मायने में शोभाराम एक महत्वपूर्ण आदमी था। 

शोभाराम चूँकि इसी अंचल का रहनेवाला था इसलिए अकसर प्रखर बाबू से उसका मिलना-जुलना होता रहता था। शहर से यही कोई चार-पाँच किलो मीटर दूर के एक छोटे से गाँव का निवासी शोभाराम अत्यन्त बड़बोला और वाचाल आदमी था। उसके बारे में तरह-तरह की कहावतें बन गईं थीं। प्रचलित बात यह थी कि विक्रम पंचांग पर संवत-मिती लग सकती है पर शोभाराम की बात पर कहीं कोई संवत-मिती नहीं लगती है। अगर उसने बोलना शुरु कर दिया तो फिर पूर्णविराम का कोई सवाल ही नहीं है। बातचीत की शैली उसकी इतनी दिलचस्प और अपनेपन से भरी हुई थी कि सुननेवाला बस, उसी का होकर रह जाता था । एक तरह से वह सभाजीत आदमी था। जहाँ शोभाराम होता वहाँ बस वह-ही-वह हुआ करता था। उसके गाँव को उसपर गर्व था। गाँव में कोई भी मेहमान किसी के भी यहाँ आता तो उसे शोभाराम से अवश्य मिलाया जाता। अगर शोभाराम को पता भी चल जाता कि अमुक परिवार में कोई अतिथि आया हैं, तो शोभाराम अपने घर से चाय की केतली, गरमागरम चाय से भरकर, कप-बसी बजाता हुआ मेहमान के सामने जाकर खड़ा हो जाता था। बात-बात में अपनी जनेऊ को कुरते से बाहर खींचकर कसम खाना शोभाराम की आदत थी। सुर उसका हमेशा ऊँचा रहता था। वह कभी लो वॉल्यूम में बोला ही नहीं। बातों में दृष्टान्तों और लोक-कथाओं तथा बोध-कथाओं के टुकड़े वह ऐसे फिट कर-देता था कि जो भी सुनता, वह सुनता ही रह जाता। वह खुद भी कहता था कि मैं बात शुरु करना तो जानता हूँ, पर बात को समाप्त कहाँ करना है, यह मैं सीख नहीं पाया। मैं अगर कुछ पढ़-लिख जाता और बात को खत्म करने की कला सीख लेता तो देश का उच्च कोटि का कथाकार होता। मेरा ब्राह्मण होना सार्थक हो जाता। पर अब किया भी क्या जा सकता है।

इसके बाद शोभाराम का डॉ. खरे साहब के अस्पताल पर रोज का आना-जाना हो गया। मरीजों की भीड़ में स्वस्थ शोभाराम चुपचाप बैैठा-बैठा ही इस बात का अध्ययन करता रहता कि आज डॉ. खरे ने किस मरीज के साथ किस तरह का सलूक किया। हालाँकि शोभाराम का इससे लेना-देना कुछ था नहीं। वह अपने घर का खाता-पीता एक भद्र और भला आदमी था, पर गहरे मन से चाहता था कि डॉ. खरे का अस्पताल खूब चले और भगवा डॉक्टर खरे के हाथ की यश-रेखा को और अधिक लम्बी और गहरी करे। अपनी खेती-बाड़ी और लेन-देन को लेकर शोभाराम का तीन-चौथाई दिन इस शहर में ही निकलता था। वह अजार-बजार के काम निपटाकर थोड़ा-बहुत वक्त अस्पताल के आस-पास ही बिताता था।

गाँव से चला और गाँव में वापस जाता तो साइकिल को रोककर वह अपने गाँव के खेड़ापति हनुमान के मन्दिर पर ठहरता। अपनी शैली में हनुमानजी से दो बातें करता और फिर अपनी दिनचर्या को आगे बढ़ता। जब वह शहर में नहीं आता तो उसका सारा दिन इन हनुमानजी महाराज के मन्दिर की चबूतरियों पर ही बीतता। यह शोभाराम का नियम नहीं, उसकी जीवन-शैली थी। वहाँ पर भी वह आते-जाते लोगों को रोक लेता। उनसे गप लड़ाता और अपना मुख्य श्रोता हनुमानजी को मानकर जनेऊ निकालकर शपथ उठाता और अपनी बातों की प्रामाणिकता सिद्ध करता रहता था। इन बातों में वह दो-चार बार डॉ. खरे और उनके अस्पताल की प्रशंसा अवश्य करता।

धीरे-धीरे शोभाराम ने डॉ. खरे में आते बदलाव को सतह पर आते देखा। बदलाव बेशक बहुत धीमा था, पर उसका असर जन-चर्चाओं में शोभाराम के कहे के खिलाफ तो पड़ता ही था। कई बार ऐसा भी हो गया कि डॉक्टर साहब ने अपने मरीज के हित में, उस पर अपना अधिकार मानते हुए, इलाज करते-करते मरीज के मानवीय असहयोग पर दो-एक तमाचे रसीद कर दिए। पहले ऐसा यदा-कदा होता था, फिर महीने में दो-चार बार होने लगा। एकाध बार ऐसा भी हुआ कि दूसरे प्रतिद्वन्द्वी डॉक्टरों ने इस तरह मार खाए मरीजों को पुलिस थाने की ओर धकेल दिया। डॉ. खरे की प्रतिष्ठा पर चोट करने की कोशिश की। होते-होते डॉ. खरे की छवि कुछ इस तरह की बन चली कि वे जब-तब अपने मरीजों और मरीजों के साथ आनेवाले पारिवारिक सदस्यों के साथ चिढ़कर दुर्व्यवहार और मार-पीट कर बैठते हैं। एक दिन, आधी रात को आए मरीज के साथी ने जब बार-बार डॉ. खरे के दरवाजे की घण्टी बजाई तो डॉ. खरे ने खीजकर उस घण्टी बजानेवाले का स्वागत ही डण्डे से किया। सारा सीन देखकर, ट्रेक्टर-ट्राली में जो मरीज पड़ा हुआ था वह ट्राली से कूदकर अँधेरी रात में सामनेवाली सड़क पर सरपट दौड़ लगाकर भाग गया।

डॉ. खरे ने गुस्से से कहा, ‘इसी मरीज के लिए तू इतनी घण्टियाँ घनघना रहा है? देख! वो तो तुझसे भी ज्यादा कुलाँचे भर रहा है!’ और उस मरीज को कोई चार-पाँच सौ गज दूरी से पकड़कर वापस अस्पताल लाया गया। इलाज तो खैर हुआ ही सही, पर इस तरह की घटनाओं ने शोभाराम को विचलित कर दिया। अपने ही मरीजों और उनके साथ आनेवाले परिजनों के साथ डॉ. खरे का यह व्यवहार शोभाराम के लिए, और खासकर उसके भीतर के ब्राह्मण जीव के लिए अधर्म के दायरे में आता था। शोभाराम कहा करता था कि ‘जैसा भी हो, मरीज जिए या मरे पर मरीज आखिर डॉक्टर साहब को फीस देता है और उस फीस से डॉक्टरों की रोटी चलती है। माना कि मरीज किसी डॉक्टर का अन्नदाता नहीं होता, पर मरीज भी मनुष्य तो होता ही है।

कुछ इसी तरह का सिलसिला चलता रहा। एक दिन शोभाराम ने शाम को शहर से अपने गाँव जाते समय अपने साथ साइकिल पर चल रहे दूसरे ग्राम-बन्धु से अपनी शैली में डॉ. खरे के लिए कह दिया कि-‘कुछ भी हो, डॉ. खरे आदमी खरा है, भला है, भद्र है। और इस इलाके का शेर है।’

साथी ने कहा, ‘डॉक्टर शेर तो है, पर यार शोभाराम! यह कैसा शेर है, जो जब-तब अपने ही मरीजों पर हाथ उठा देता है?’ बात में कहीं कोई गाँठ या कुटिलता नहीं थी। मन दोनों के साफ थे। पर शोभाराम के मुँह से निकल गया, ‘भैया! यह डॉ. खरे शेर तो है, पर यह शेर, अन्धा शेर है। जब इस शेर को कुछ सूझता नहीं है तो यह अपने ही लोगों पर आ पड़ता है। और अन्धा शेर हमला करता है तो फिर पहचानता नहीं है कि सामनेवाला उसका क्या लगता है।’ बातें करते-करते रास्ता कट गया। शोभाराम अपने घर और वह अपने घर। 

चलते-फिरते बात डॉ. खरे तक पहुँची कि शोभाराम ने खरे साहब को ‘अन्धा शेर’ कह दिया है। वे मरीज देख रहे थे। उन्होंने मरीज को छोड़ा और अपने सफाई कर्मचारी शंकर को आवाज दी ‘शंकर!’

डॉ. खरे की आवाज में शेर की दहाड़ थी। शंकर काँपता हुआ आया। खरे साहब ने कहा, ‘जा, ड्राइवर से कह कि वह जीप स्टार्ट करे। जैसा भी  हो, जहाँ भी हो, उस शोभा को पकड़कर मेरे सामने ला। कहना कि मैंने उसे तत्काल बुलाया है।

शंकर न जाने क्या-क्या सोच बैठा। 

दस मिनट का ही तो रास्ता था। जीप ठीक शोभाराम के घर के सामने रुकी। गाँव के लोग जीप के आस-पास इकट्ठे हो गए। आखिर शोभाराम के यहाँ अस्पताल की जीप क्यों आई ? शोभाराम भीतर खाना खा रहा था।

शंकर ने बाहर से ही आवाज लगाई, ‘शोभाराम दादा! ओ ऽ शोभाराम दादा!!’

‘कौन?’ शोभाराम ने भीतर से ही पूछा।

‘मैं शंकर भंगी। चलो, डॉक्टर साहब बुला रहे हैं।’ शंकर बोला।

शोभाराम ने भीतर से ही कहा, “क्या ‘भंगी-भंगी’ कर रहा है! जानता नहीं है कि सरकार ने भंगी को भंगी कहने पर रोक लगा दी है? कहना ही है तो खुद को ‘मेहतर’ कह, ‘सफाई कामगार’ कह। ठहर जा, आता हूँ।”

पाँच-सात मिनट में शोभाराम बाहर आया। मन-ही-मन सोचता रहा कि एक ब्राह्मण के घर बुलाने भेजा भी तो डॉक्टर साहब ने किसे भेजा! उसका सवर्ण झनझना पड़ा। बोला, ‘क्या बात है?’

शंकर बोला, ‘अपने देवी-देवता मना लो, पण्डितजी! आज डॉक्टर साहब आपका खाया-पिया निकाल देंगे। बहुत बड़बड़ करते रहते हो।’ उसने आखिर तक नहीं बताया कि बात क्या है। कहा कि बस चलो, और इसी वक्त चलो।

गाँववालों ने समझा कि आज मामला आर-पार का ही होकर रहेगा। या तो शोभाराम अस्पताल में मिलेगा या फिर पुलिस थाने में। खरे साहब की नाराजी के दो ही मतलब निकलने लगे थे। 

शोभाराम ने जीप को हनुमानजी के मन्दिर के पास रुकवाया। हनुमानजी से साफ-साफ शब्दों में कहा, ‘अंजनीलाल! अगर सब ठीक-ठाक रहा तो मैं वापस आते समय आपके सामने सुन्दरकाण्ड का पूरा पाठ करूँगा और घर जाकर रात को सत्यनारायण की कथा करवाऊँगा। और अगर बात बिगड़ गई तो.....।’ और यह पहला अवसर था, जब शोभाराम अपना वाक्य पूरा नहीं कर सका। वह मन्दिर से बाहर निकल आया। जीप में बैठा। और जीप दस-बारह मिनट में डॉ. खरे के अस्पताल के सामने आकर खड़ी हो गई। अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ थी। 

डॉ. खरे ने सारा काम रोक लिया। शोभाराम से पूछा, “क्यों शोभाराम! तूने मुझे ‘अन्धा शेर’ कहा?”

एक क्षण को शोभाराम सकपकाया। सारी बात उसके दिमाग में कौंध गई। उसने मन-ही-मन चौपाई पढ़ी-‘नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमत बीरा। भूत पिशाच निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै।’

डॉ. खरे दहाड़े, ‘बोलता क्यों नहीं है? कहा या नहीं?’

‘हाँ, मैंने कहा कि आप अन्धे शेर हैं।’ शोभाराम ललाट का पसीना पोंछते हुए बोला।

‘क्यों कहा?’ डॉ. खरे का सीधा सवाल था। भीतर वाले मरीज बाहर आ गए थे और सड़क पर जाते हुए लोग ठहरकर अस्पताल के आँगन में जुट गए थे।

‘कहा इसलिए कि आप पर जब-जब चिढ़ और गुस्से का अन्धापन सवार होता है तब-तब आप यह भी नहीं देखते हो कि आपका हाथ किस पर उठ रहा है? आप जिसके साथ बदसलूकी कर रहे हैं, वह अपना है या पराया? और शेर तो आप हैं हीं। क्या आप शेर नहीं हैं? आपने कभी सोचा कि कहीं सामनेवाले का भी हाथ उठ गया तो क्या होगा?’

डॉ. खरे शोभाराम का मुँह देखते रह गए। 

शोभाराम ने फिर कहा, ‘आप एक काम करो डॉक्टर साहब! यह बाहरवाला बोर्ड बदलवा दो। इसपर पेंटर से लिखवा दो-‘डॉ. खरे का पुलिस थाना!। लोग अस्पताल मानकर यहाँ पच्चीस साल से आ रहे हैं। आपने धीरे-धीरे इसे अस्पताल से थाने में बदल दिया है। जैसे प्राइवेट अस्पताल होते हैं, एक प्राइवेट थाना भी सही।’

डॉ. खरे का गुस्सा काफूर हो गया। बोले, ‘अच्छा शोभाराम! जा, एक पान लाकर मुझे खिला।’ और भीड़ बिखर गईं। शोभाराम सामने पान की दुकान पर चला गया। ।

डॉ. खरे के व्यवहार में कुछ बरसों से एक बदलाव यह भी आ गया था कि वे जिसपर बिगड़ जाते उस पर हाथ उठा देते, पर जिससे खुश होते उससे एक पान मँगवाकर आधा खुद खाते और आधा सामनेवाले को भी खिलाते।

शोभाराम ने अपने गाँव लौटतेे समय हनुमानजी के सामने बैठकर सुन्दरकाण्ड का पाठ किया। रात हो सत्यनारायण की कथा करवाई। डॉ. खरे का अस्पताल पहले भी चल रहा था और आज भी चल रहा है। यह जरूर है कि यदा-कदा उनके कान पर ‘अन्धा शेर’ जैसा नाम पड़ जाता है।

मात्र इतनी सी बात पर कहानी किस तरह लिखी जाए? प्रखर बाबू बार-बार सोचते रहे कि उनके और डॉ. खरे के पारिवारिक और निजी रिश्तों को देखते हुए उन्हें यह लिखना भी चाहिए या नहीं। लिखेंगे तो डॉ. खरे क्या सोचेंगे। कहानी का नायक कौन होगा - शोभाराम या डॉ. खरे? कथानक के अथ और इति कैसे होंगे? वे विचारमग्न हो गए। आज तक सरपट चलनेवाली उनकी कलम रह-रहकर ठिठकने लगी। वे शीर्षक ही तय नहीं कर पाए। खैर, शीर्षक तो बाद में भी बन जाएगा, पर कहानी पाठकों को कैसी लगेगी? जनजीवन पर इसका प्रभाव क्या होगा? कहीं लिहाज टूट तो नहीं जाएगा? आखिर किसी कहानी का धर्म क्या होता है? कहानी, कहानी रहेगी या नहीं? वह कहीं उपदेश तो नहीं बन जाएगी? वे सोचते-सोचते शून्यलोक में चले गए।

उनको चेत तब आया जब पत्नी ने कहा, ‘अब उठो भी। नहा-धोकर खाना खा लो। बात नहीं बनती है तो रखो कलम। सरकाओ कागजों को। क्या लिखने का ठेका आपने ही ले रखा है?’

प्रखर बाबू ने इतना ही कहा, ‘भली मानस! तुझे क्या पता कि मैं किस पीड़ा से गुजर रहा हूँ! तुझे क्या पता कि मेरा मानसिक उद्वेलन किस बात को

लेकर है! तू कब समझेगी कि मेरी सरस्वती आज मुझपर किस व्यंग्य से देख रही है!’ और उन्होंने कागजों को सरकाते-हुए कहा, ‘चलो, फिर कभी लिखेंगे, पहले सरस्वती माता को पहले जैसी ही ममतालु हो जाने दो।’

और प्रखर बाबू नहाने के लिए उठ गए।

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‘बिजूका बाबू’ की सत्रहवी कहानी ‘गंगोज’ यहाँ पढ़िए।

‘बिजूका बाबू’ की उन्नीसवी कहानी ‘पुल पर एक शाम’ यहाँ पढ़िए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 
 


 

 

 

     

     

     

     

 

 



  

 


   

  

  

 

 

 

   

 

 



  

      

   

 

       

     

 



  


 

 

 



 

   

 


   

 

 

    

 

     

   

    

      

 

    

     

      

    

     


 


   


    

 

 


गंगोज (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की सत्रहवीं कहानी)




श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की सत्रहवीं कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



गंगोज

बिलकुल अनजानी जगह हो, आप पहली बार वहाँ गए हों, आपका अपना वहाँ कोई नहीं हो, न आप किसी को जानें, न कोई आपको पहचाने, रास्ता चलते आदमी तो आदमी अनावर-जनावर भी आपको नहीं देखते हों, वहाँ अगर कोई आपके सामने आकर खड़ा हो जाए, फिर बिलकुल आपके पास करीब-करीब सटकर बैठ जाए, आपका नाम बता दे, आपके पिताजी का नाम बता दे, आपकी जाति बता दे, आपका जिला और आपका गाँव ही नहीं, आपके गाँव के दो-चार जाने पहचाने लोगों के नाम बता दे, तो क्या आप चौंक नहीं पड़ेंगे? चौंकना तो चौंकना, आपका कलेजा मुँह को आ जाएगा, धक् रह जाएगा। आप चकरा जाएँगे, चक्कर खा जाएँगे, धरती पर धड़ाम हो जाएँगे।

अपने अमरचन्द के साथ यही हुआ। जिन्दगी में पहली बार हरिद्वार गया। गया क्या, ले जाया गया। उसके सेठ टीटू पण्डित की मारुति वैन को टैक्सी के तौर पर चलाता हुआ ड्राइवर अमरचन्द जिस परिवार को लेकर हरिद्वार गयाा वह परिवार अमरचन्द को वहीं हरिद्वार में छोड़कर आठ-दस दिनों के लिए वहाँ से दूसरी रेग्यूलर टैक्सी लेकर बद्रीनाथ-केदारनाथ-गंगोत्तरी-जमुनोत्तरी-चार धाम की पवित्र यात्रा पर चला गया। जाते समय उस परिवार ने अमरचन्द को छह सौ रुपयों के नोट थमाए और कहा कि ‘हम लोग ज्यों ही वापस आएँगे, फिर अपने घर को निकलना है। इसलिए तू अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ खरीद-वरीद लेना। अपना खाना-वाना आराम से खाना। यहीं हर की पौड़ी पर रोज गंगास्नान करना। अपनी गाड़ी में ही सोना और सँभलकर रहना। किसी अफड़े-लफड़े में मत पड़ जाना, वरना ये हरिद्वार है। यहाँ तेरी जमानत भी नहीं होगी। इतनी सारी हिदायतें सुनकर अमरचन्द का मन बहुत टूटा। उसने दस-बीस बार सोचा कि वह भी अपने यात्री परिवार के साथ ही बद्री-केदार हो आए, पर उसकी हिम्मत नहीं हुई। फिर यात्रियों की संख्या का चक्कर भी पड़ता था। टैक्सीवाला पाँच से ज्यादा सवारियाँ लेता नहीं। अमरचन्द को और शामिल किया जाता तो सवारियाँ छह हो जातीं। मन मारकर अमरचन्द वहीं रुक गया। उसने सोचा, गंगा मैया की यही मरजी है। वैसे भी परिवार का वह पहला आदमी था, जो हर की पौड़ी तक पहुँचा था। उसके पुरखे तो गंगा-यात्रा के सपने देखते-देखते ही दुनिया से चले गए थे। घडी-दो घड़ी उसने अपने आपको तसल्ली दी, मन को समझाया और हरिद्वार की रेलम-पेल में रम जाने की मानसिकता बना ली। उसे आठ से दस दिन यहीं काटना है। ड्राइवर आदमी अगर दो घण्टे भी एक मुकाम पर ठहर जाए तो उसके हाथ-पाँव जाम हो जाते हैं। किलोमीटर के पत्थर तक गिनने की और देखने की जिसकी आदत नहीं रही हो, जो केवल सामने की सड़क और मंजिल का नाम देखता चलता रहे, उसे आप एक जगह, वह भी अपने बच्चों से दूर, अपने साथी-संगातियों से बहुत दूर, अकेला आठ-दस दिन के लिए बैठा दें, यह कैसे हो सकता है?

पहले अमरचन्द अपनी गाड़ी पर गया। उसे उसने प्यार से सहलाया। चारों तरफ घूमकर उसे देखा। पहियों को ठोक-बजाकर टटोला। अपने गले में पड़े गमछे से स्टीयरिंग की पोंछ-पाँछ की। चारों फाटक बन्द किए। फिर गाड़ी लॉक की। एक चक्कर फिर से गाड़ी का लगाया और सामनेवाले होटल पर चाय पीने चला गया। ले-दे कर बस यही एक आसरा हो सकता है कि वह इस होटलवाले से दोस्ती गाँठ ले। ड्रायवर आदमी होटलवाले से दोस्ती नहीं करेगा तो क्या किसी सोने-चाँदी की दुकानवाले से करेगा? उसने चाय पी। फिर होटल से सटी हुई पान की गुमटी के सामने जाकर खड़ा हो गया। सँकरा रास्ता और हरिद्वार की सड़कें! आते-जाते रिक्शे, तिपहिया, टेम्पो, जातरी और यात्री। न जाने कहाँ-कहाँ के साधु-सन्त! भगवान का नाम लेने की जिन्हें फुरसत नहीं ऐसे भगवाधारी। साइकिलों पर पैडल मारते अजब-गजब के लोग। भण्डारे की तलाश में घूमते-फिरते न जाने कैसे-कैसे विरक्त और गृहस्थ। इधर भीड़, उधर भीड़। एक पान खाने के लिए पहले पचास धक्के खाओ। अमरचन्द दस मिनट में ही बौखला गया। इतनी सारी चहल-पहल में, भागती ही नहीं, करीब-करीब गंगा की धारा जैसी बहती भारी भीड़ में तन से भी अकेला और मन से भी अकेला। गंगा मैया की जय से अधिक कारों, स्कूटरों, मोटर साइकिलों के हॉर्नों की आवाजें। साइकिल-रिक्शा की लगातार बजती घण्टियाँ। रगड़ते-छिलते कन्धे। अमरचन्द को लगा कि एक हफ्ते में तो वह पागल हो जाएगा। बगल में ही उसने एस. टी. डी. टेलीफोन का बूथ देखा, पर फोन करे तो भी कहाँ करे? दुनिया से जुड़ने का सारा साधन सामने। जीती-जागती चलती-भागती दुनिया उसके आस-पास, लेकिन कितना अकेला पड़ गया अमरचन्द। उसके मन में आया कि एक बार वह जोर से चीखे। अपने परिवार के किसी भी सदस्य का नाम लेकर चिल्लाए। उसे पुकारे। मंसादेवी की पहाड़ियों से अपनी आवाज को भिड़ा दे। पर यह सब भी अगर वह कर ले, तब भी किसकी सहानुभूति यहाँ मिलनेवाली है। उसे आठ-दस दिन अकेले रहना है और अकेले भी इस भरे संसार में ही रहना है।

पानवाले ने उसे पान दिया। फिर उसने सिगरेट का एक पैकेट खरीदा। इतनी सी देर में दो-तीन लोग और एक-दो रिक्शे उससे साइड माँगते हुए टकराकर निकल गए। उसने लम्बा हाथ किया। पचास का नोट पानवाले को दिया। पानवाले ने अपना पैसा काटकर बाकी रकम उसे लौटाते हुए नसीहत दी, ‘भैया! पाई-पैसा सँभालकर रखना। जेबकतरों से सावधान रहना।’

यह नसीहत सुनते-सुनते अमरचन्द सिहर पड़ा। अपने यात्रियों के जाने के बाद यह पहला बोल था, जो अमरचन्द ने इस पराए तीरथ में किसी के मुँह से उसके अपने हित का सुना था। उसे लगा कि यहाँ भी उसका भला चाहनेवाला भगवान ने बैठा रखा है। भगवान है और सचमुच है। वह आश्वस्त होकर सामनेवाले चबूतरे पर बैठ गया। सिगरेट पीते-पीते उसने अपने मन में दस दिनों के लिए दिनचर्या को आकार दिया। रूपरेखा बनाई। सोचा, अमरचन्द की आज की उपलब्धि यह रही कि उसे इस सर्वथा अपरिंचित शहर में एक चायवाला और एक पानवाला हासिल हो गया। बोलने-बतियाने का सिलसिला शुरु तो हुआ! उसका अकेलापन टूटा। एक से दो ही नहीं, तीन हो गए। वह कहीं जाकर खड़ा हो सकता है। रेलम-पेल कम हो तो दो-एक बोल, बोल सकता है। दो-एक दिनों में उसका अनमनापन कुछ कम हुआ। वह भी इस गहमागहमी का एक हिस्सा बन गया।

शायद यह तीसरा या चौथा दिन था। गंगा के एक घाट पर बैठा-बैठा अमरचन्द गंगा मैया के मटमैले पानी पर नजरें गड़ाए राम जाने कहाँ-कहाँ के गढ़े गूँथ रहा था। तभी एक बिलकुल अनजाना, अपरिचित आदमी उसके पास आया। अमरचन्द ने उसे भी अपने ही जैसा यात्री मानकर ‘राम-राम’ भी नहीं की। पर जब सामनेवाले ने साधिकार कहा, “भैया अमरचन्द! तीरथ में आकर गंगा किनारे ‘जय गंगा माई’ भी नहीं बोलोगे?” तब अमरचन्द हक्का-बक्का रह गया। अजनबी ने अमरचन्द की मनःस्थिति का आकलन कर लिया। अमरचन्द के जिले का नाम लेते हुए उसने पूछा, ‘तुम इसी जिले के रहनेवाले हो?’

अमरचन्द अवाक्। 

फिर उसने अमरचन्द के गाँव का नाम लेकर पूछा, ‘यही गाँव है न तुम्हारा?’

अमरचन्द के मुँह से निकला - ‘हाँ।’

‘तुम्हारे पिताजी का नाम दीपचन्दजी था न?’

सिवाय हाँ कहने के, अमरचन्द के पास कोई चारा नहीं था। 

‘तुम लोग सोनकर हो न?’ अजनबी का अगला सवाल था।

‘हाँ साहब, हम सोनकर हैं।’

बात यहीं खत्म नहीं हुई। सामनेवाला बोला ‘दीपचन्दजी को मरे यह चौथा साल है न?’

घबराकर अमरचन्द खड़ा हो गया। गंगा के ठण्डे किनारे पर भी उसे पसीना छूट गया।

आगत भाई ने अमरचन्द को सिखावन दी ‘तू यहाँ बैठा-बठा पान-सिगरेट कर रहा है। तेरा बाप वहाँ श्राद्ध के लिए छटपटा रहा है। तेरी माँ के मरने के बाद जिस बाप ने तुझे माँ की तरह पाला हों, तू उसी बाप को, गंगा के किनारे आकर भी पिण्डदान नहीं दे। उसके फूल गंगा में ब्रह्मकुण्ड को अर्पण नहीं करे। न माँ का तर्पण करे, न बाप का। अच्छा-खासा खाता-कमाता ड्राइवर है और माँ-बाप अभी तक पानी माँग रहे हैं। वाह-रे अमर! वाह रे सपूत! चल उठ, खड़ा हो जा! हर की पौड़ी पर चल। तेरे पण्डाजी से मिलवा देता हूँ  केदार-बद्री से तेरी पार्टी वापस आए, तब तक तू इस कर्मकाण्ड से निपट ले, अपना कर्ज उतार ले। माँ-बाप को पिण्डदान देकर अपना जन्म सकारथ कर ले। जिन्दगी में बार-बार गंगा किनारे आना होता है क्या? हाँ, तेरे चार-पाँच बाप हों तो बात अलग है।’

अमरचन्द को लगा कि उसका जन्म अकारथ है। उसके कारण उसके माँ-बाप अधर में लटके हुए हैं। धिक्कार है उसकी जिन्दगी को। मन हुआ कि गंगा में छलाँग लगा ले। आँखों में आँसू छलछला आए। हाथ जोड़कर वह खड़ा हो गया।

अजनबी ने ही उसे साइकिल रिक्शा पर अपने साथ बैठाया। पण्डाजी के पास ले गया। उसे पण्डाजी को सौंपा। अमरचन्द की कठिनाई यह थी कि उसके पास न उसकी माँ के फूल थे, न बाप के। दोनों की अस्थियाँ पहले ही चम्बल में विसर्जित हो चुकी थीं। जात गंगा को माँ के वक्त उसका बाप और बाप के वक्त खुद अमरचन्द भोजन करवा चुका था। पण्डाजी के पास ऐसी बातों के लिए पचास रास्ते तैयार थे। अमरचन्द को समझाया, ‘तू चाहे जजमान! तो सोने के फूल बनवा ले, चाहे तो चाँदी के बन जाएँगे। अगर सोने-चाँदी की हैसियत नहीं है तो कुदरत के खिलाए सफेद चमेली-जूही के फूल तैयार हैं। खर्च-वर्च की चिन्ता मत कर। हमारे लोग साल-दो साल में उधर आते रहते हैं। तेरी श्रद्धा और हैसियत जो भी हो, तू तब दे देना, पर पहले माथे पर से माता-पिता का यह पिण्ड-प्रदान का बोझा तो उतार।’

और...और...ठीक चौघड़िया देखकर अमरचन्द का माथा मूँड दिया गया। सारा श्राद्धकर्म पूरी श्रद्धा से करवाया गया। पण्डाजी ने पूरा सत्कार किया । जब तक अमरचन्द अभी हरिद्वार में रहे, तब तक उसके खाने-ठहरने की सारी व्यवस्था कर दी । श्राद्ध कर्म के निमित्त वह इस समय जो भी ठीक समझे, राशि दे दे। बाकी लेन-देन होता रहेगा। पण्डों और जजमानों का लेन-देन, रिश्ता-नाता जनम-जनम का रहता है। अमरचन्द तो पण्डा-परिवार के इस उदार आचरण पर हैरान रह गया। अपनी जेब टटोलकर उसने जितना भी इस समय वह दे सकता था, उतना पण्डाजी को अर्पित कर दिया। बाकी अपने गाँव जाकर वह भेज देगा या पण्डाजी के प्रतिनिधि को दे देगा, यह वचन गंगाजल की अंजुलि भरकर कर दिया। पण्डाजी ने प्रसादी, गंगाजली, कण्ठीमाला, गंगाजी का कुण्ड्या और हाथ में यात्रा की डाँगड़ीवाली लकड़ी थमा दी। अमरचन्द को भरोसा दिलवा दिया कि वह घर पहुँचेगा, उससे पहले वहाँ उसकी पत्नी को यह सूचना मिल चुकी होगी कि अमरचन्द हरिद्वार में अपने माता-पिता का पिण्डदान करके आ रहा है वहाँ सारी तैयारी कर ले। जौ-जुवारे बो दे और गंगा माई के रतजगे शरु कर ले। अमरचन्द जब वहाँ पहुँचे तब सीधा घर में प्रविष्ट नहीं हो जाए। उसे ढोल-ढमाके के साथ बधावे। गाँव में उसके जुलूस निकाले। जाति-समाज को इकट्ठा करे। जब तक गंगोज नहीं हो जाए तब तक अमरचन्द मुहल्ले के किसी मन्दिर या देवल पर ही अपना डेरा लगाए। इस परिवार में यह पहला गंगोज है, पहली गंगा-पूजा है, इसका ध्यान रखे। गाँव के किसी सीमावर्ती कुएँ या बावड़ी से महिलाएँ कलश भरें । फिर कलश-यात्रा निकले। सबके नए वेश-लुगड़े हों । जिसे कोई देवभाव आता हो, उसका धूप-ध्यान पूरा किया जाए। नाई, कुम्हारों का भाव भरा स्वागत-सत्कार हो। जात-गंगा के महत्वपूर्ण लोगों को और समाज के पूज्य लोगों को भेंट-दान-दक्षिणा जैसी व्यवस्था की जाए। उस दिन अमरचन्द पुराना कपड़ा नहीं पहने। पहले अमरचन्द सभी बुजुर्गों को पाँवधोक करे, फिर जो भी लोग गंगा माता को सम्मान देना चाहें, वे अमरचन्द के पाँव छुएँ। अमरचन्द के घर में केवल इसी के पाँव हैं, जो गंगाजल से भी धुले हैं, वगैरह-वगैरह।

नौवें दिन बद्री-केदारवाली पार्टी वापस लौट आई। वे लोग एकाएक अमरचन्द को पहचान नहीं पाए। पर जब पता चला कि अमरचन्द ने अपने पुरखों को तार दिया है, तो सभी उसे बधाइयाँ देने लगे। अमरचन्द जब अपनी पार्टी को लेकर वापस लौटने लगा तो उसने चायवाले और पानवाले अपने मित्रों से विदा लेना चाही। अमरचन्द अपनी हैरानी को छिपा नहीं पाया। उसने दोनों से पूछा, ‘भैया, मुझे यह तो बता दो कि इन पण्डों को मेरा नाम, पता और ये सारी बातें मालूम कैसे हो गई?’

पानवाला हँसा। बोला, ‘अमरचन्द! यह हरिद्वार है। यहाँ के पण्डे घट-घट और घर-घर की जानकारी पाने का माद्दा रखते है। इनके लोग अकसर ज्वालापुर से ही यात्रियों को सम्हाल लेते हैं। रहा सवाल तेरा, सो भैये! जब तूने उस दिन पान और सिगरेट खरीदने के बाद, पचास का नोट मुझे देने के लिए अपना हाथ लम्बा किया था, तब तेरे हाथ पर नील-से गुदा हुआ तेरा नाम ‘अमरचन्द’ मैंने देख लिया था। इनके आदमी को मैंने तेरा नाम बता दिया और बता दिया कि तू मारुति वैन लेकर एक पार्टी को लाया है। तेरा नाम और तेरी मारुति वैन का नम्बर मिल जाने के बाद तो फिर यहाँ का सारा तन्त्र-संसार इस एस. टी. डी. पर दुनिया भर से मनचाही जानकारी इकट्ठी कर लेता है। इन्होंने यह तक पता लगा लिया होगा कि तेरी घरवाली का नाम क्या है और तेरी जाति पंचायत में क्या हैसियत है? तू घर पहुँच तो सही। जो कुछ वहाँ होने जा रहा है, उसकी जानकारी तुझे यहाँ से नहीं होगी।

एक विचित्र सा रोमांच लेकर अमरचन्द ने अपनी वापसी यात्रा शुरु की। उसके लिए यह बिलकुल पहला और अकेला अनुभव था।

और सबकुछ वैसा ही हुआ। पण्डाजी ने इस नगर के अपने दो जजमानो को टेलीफोन करके अमरचन्द के घर तक सारे समाचार और योजना पहुँचा दी थी। गत दस-बारह दिनों से अमरचन्द के यहाँ गंगा माता के गीत गाए जा रहे थे। उसके कई नाते-रिश्तेदार उसका इन्तजार कर रहे थे।

गंगोज की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। उसके सेठ ने एकाएक अमरचन्द को पहचाना नहीं, पर फिर उसे घर जाने के लिए छुट्टी दे दी। जब वह घर पहुँचा तो सचमुच उसकी सुहागन ने उसे घर में घुसने नहीं दिया। जैसा-जैसा पण्डाजी ने कहा था, वैसा-वैसा होता चला जा रहा था। कुल मिलाकर यही, पच्चीस-तीस हजार के बीच में अमरचन्द इधर-उधर का कर्जदार हो गया। ब्याज का घोड़ा लगातार दौड़ रहा है। यह अलग बात है कि जाति समाज में अमरचन्द का रुतबा जरा ठीक-ठीक जम गया। उसकी घरवाली का ठसका ही बदल गया। आखिर उसने गंगोज जो कर लिया!

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‘बिजूका बाबू’ की सोलहवी कहानी ‘दवे साहब का कुत्ता’ यहाँ पढिए।

‘बिजूका बाबू’ की अठारहवी कहानी ‘अन्धा शेर’ यहाँ पढिए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


 


 


 

 

   


 

 

 


  

 

 


 

 


दवे साहब का कुत्ता (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की सोलहवीं कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की सोलहवीं कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।




दवे साहब का कुत्ता

वैसे तो दवे साहब बजात-ए-खुद एक दिलचस्प आदमी हैं, पर जब-जब वे अपने कुत्ते के साथ होते हैं या अपने कुत्ते के बारे में बात करते हैं तब-तब और भी ज्यादा दिलचस्प लगने लगते हैं। अपने कुत्ते के मामले में वे यों कहो कि भक्ति-भाव से ग्रस्त हैं। गनीमत है कि उनका सारा-का-सारा परिवार कुत्ते के प्रति उनकी आसक्ति को खूब समझ गया है, वरना आए दिन बखेड़े हो जाते।

एक तो उन्होंने अपने दरवाजे पर दूसरों की तरह वह तख्ती नहीं लगाई, जिसमें लिखा रहता है-‘कुत्तों से सावधान’। विपरीत इसके उन्होंने अपने दरवाजे पर एक बोर्ड लगा दिया, ‘दवे परिवार आपका हार्दिक स्वागत करता है। पधारिए, वेलकम’! लोग हैं कि गच्चा खा जाते हैं। अपने कामकाजों को लेकर भले लोग उनके दरवाजे पर जाते हैं और दरवाजा खुलते ही जिस स्वागताध्यक्ष से भेंटार्थियों का पाला पड़ता है, वह होता है दवे साहब का कुत्ता। दरवाजा चाहे दवे साहब खुद खोलें, वे आगन्तुक का भरपूर स्वागत पहले अपने कुत्ते से करवाते हैं, बाद में स्वयं अभिवादन करते हैं। कोई भला आदमी कैसे भीतर प्रविष्ट हो?

कई-कई बार तो यहाँ तक हो गया कि कुत्ते ने आनेवाले महाशय की छाती पर अपने दोनों अगले पाँव रख दिए और अपनी लार से लथपथ जबान को आगत के गले और गालों तक लगा दिया। लोग सिर से पाँव तक काँपते रहे और दवे साहब इत्मीनान से कहते रहे, ‘काटेगा नहीं, काटेगा नहीं! चिन्ता नहीं करें। लाड़ में आ गया है। आपको पहली बार देखा तो आपसे दोस्ती कर रहा है।’ यानी वे अपने कुत्ते को कुछ नहीं कहेंगे। जो भी कहेंगे, बस आपसे ही कहेंगे। समझाना हुआ तो भी आपको ही समझाएँगे। कुत्ता तो समझदार है ही, क्योंकि वह दवे साहब का कुत्ता है। उसकी समझदारी पर दवे साहब को कभी शक नहीं हुआ। अपने बाल-बच्चों से ज्यादा ध्यान और खयाल दवे साहब ने अपने कुत्ते का रखा है। चाहे वह खाने-पीने का मामला हो, चाहे गरमी-सर्दी या सम-विषम मौसम का। अपने कार्यालय से कम-से कम चार या पाँच फोन वे अपने घर, बस अपने कुत्ते का हाल-चाल पूछने के लिए ही करते हैं। उनका गणित सीधा-सा है कि सरकार एक दिन के तीन लोकल कॉल फ्री देती है। उसके बाद एक कॉल का अस्सी पैसा या एक रुपया लगता है। अगर रुपए-दो रुपए रोज अपने एक प्रियजन, परिजन, स्वजन या आत्मीयजन का हाल-चाल पूछने पर खर्च हो गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? श्रीमती दवे की एक शिकायत बहुत वाजिब है। वे कहती हैं कि इस कुत्ते के सिवाय घर में हम लोग भी तो रहते हैं। अपने कुत्ते के समाचार लेने के बाद दो-चार वाक्य हम लोगों के लिए भी बोल लिया करो।

पर दवे साहब के दिलो-दिमाग में से कुत्ता निकले तो कामिनी आए! वे हँसते हुए बात बदल देते हैं। 

उस दिन तो दवे साहब ने कमाल ही कर दिया। कोई काम लेकर अमुकजी दवे साहब के इरवाजे पर पहुँच गए। उनको पता नहीं था कि वहाँ दवे साहब से पहले उनका कुत्ता स्वागत करेगा। जो श्वान-शैली दवे साहब के यहाँ स्वागत में प्रचलित थी उससे सर्वथा अनभिज्ञ श्री अमुकजी ने घण्टी का बटन दबाया। दवे साहब के साथ उनका भयानक आतंकवादी कुत्ता बिजली की तेजी से लपकता हुआ अमुकजी की छरती पर अपने दोनों पंजों को गड़ाकर उनका मुँह चाटने की कोशिश में पिल पड़ा। पच्चीस-पचास किलो, ऐसे वजन को सहने की आदत अमुकजी को इस तरह की नहीं थी। वे चौकड़ियाँ भूल गए। वे यह भी भूल गए कि उनके आने का निमित्त क्या था। कपड़ों का सत्यानास तो हो ही चुका था। सारा मुँह फसूकर से भर गया। आँखें फटी-की-फटी रह गईं और माथा भिन्ना गया। चक्कर खाकर गिरते, तब तक हँसते हुए दवे साहब ने उन्हें सँभाला। सँभाला ही नहीं, समझाया भी कि आप कोई ऐसी-वैसी हलचल नहीं करें। अपनी जगह स्थिर खड़े रहें। काटेगा नहीं, बस जरा सा या तो आपको सूँघेगा या थोड़ा सा चाटेगा। अमुकजी को सहज होने में कई मिनट लग गए। दवे साहब इस सादर स्वागत के बाद अमुकजी को अपने ड्राइंगरूम में ले गए। कुत्ता पीछे-पीछे। 

अमुकजी जिस सोफे पर बैठे, उसके ठीक सामनेवाले सोफे पर कुत्ते ने भी पोजीशन ली। मानो पूछ रहा हो कि ‘कहिए, कैसे पधारना हुआ?’

श्रीमती दवे ने अमुकजी को पानी पिलाया और अपने प्यारे कुत्ते पर एक मीठी सी नजर डालती हुई बोलीं, ‘बड़ा हरामी है। नॉटी ब्वॉय।’ दवे साहब उठे और अपने नॉटी ब्वॉय को सहलाने लगे। अमुकजी कभी दवे साहब को देख रहे थे तो कभी श्रीमती दवे को। उनकी हिम्मत नहीं हो रही  थी उस कुत्ते की आँखों में आँखें डालने की। दवे साहब ने अमुकजी के पधारने का मकसद पूछा। अब जाकर अमुकजी को लगा कि उनसे आने का कारण पूछा जा रहा है। मन की सारी झल्लाहट मुँह पर आ गई। वे करीब-करीब बौखलाकर खीझ पड़े। कोशिश करने पर भी आने का निमित्त याद नहीं आ सका। जी में आया कि दवे साहब को चार तमाचे जड़ दे, पर सामने कुत्ता बैठा हुआ था। दाँत किटकिटाते और जबड़े भींचते हुए बोले, ‘झक मारने आया था। अपने इस कमीने को सँभालकर रखो। अगर यही सब आपके यहाँ होता रहा तो कौन आएगा आपके दरवाजे पर? देख रहे हैं मेरी हालत? क्या गत बना दीं है आपके इस...’ और अमुकजी ने श्रीमती दवे की उपस्थिति का लिहाज भूलते हुए उनके कुत्ते को पाँच-दस भारी गालियाँ जड़ दीं। दवे साहब बैठे-बैठे मुसकराते रहे। श्रीमती दवे चाय बनाने के बहाने किचन में चली गईं। कुत्ता बराबर अमुकजी को देखता रहा।

जब दस-बीस मिनट अमुकजी बोल-बाल लिये, तब दवे साहब ने पूरी सहानुभूति के साथ पहले अमुकजी को देखा और फिर अपने मन की पूरी गहराई से प्यार भरी नजर अपने कुत्ते पर डाली और उठ खड़े हो गए। अमुकजी समझे कि वे अब उनकी बात सुनेंगे। पर दवे साहब ने कमाल कर दिया। वे करीब-करीब माफी माँगने के अन्दाज में अपने कुत्ते के सामने खड़ेे हो गए। फिर उसे सहलाते हुए, उसे गोद में लेते हुए कुत्तेवाले सोफे पर बैठ गए। खूब लाड़-प्यार और दुलार-पुचकार कुत्ते पर बरसाने के बाद पलकें उठाकर अमुकजी को ऐखकर कुत्ते से बोले, ‘भैया, आज सुबह-ही-सुबह बहुत गालियाँ सुननी पड़ीं न! ये अपने मेहमान हैं। इनकी तरफ से मैं आपसे माफी माँगता हूँ। आपका जीवन सार्वजनिक जीवन है। आपकी लाइफ पब्लिक लाइफ है और पब्लिक लाइफ में ऐसी बातों का बुरा नहीं मानते। इनका काम था गाली देना, आपका काम था गाली सुनना। ये बोल लिये, अपन ने सुन ली। वो कहावत है ना-’गँवार की गाली हँसकर टाली’। अब अपन अपने मेहमान को तो गँवार कह नहीं सकेंगे। तो इस कहावत को यों ठीक कर लेते हैं कि ‘मेहमान की गाली हँसकर टाली’। मैं आपसे माफी माँगता हूँ। आप इनको माफ कर दो। पब्लिक लाइफ में भला-बुरा सब सुनना पड़ता है। अपन किस-किससे लड़ने जाएँगे? कल को अगर अपन चुनाव में खड़े हो गए तो अपन को भी इनके दरवाजे पर जाना होगा। आज आपने पूरी गर्मजोशी से इनका स्वागत किया, तब भी आपको गाली खानी पड़ रही है। कल आप इनके दरवाजे पर जाकर दोनों हाथ जोड़कर बात करेंगे, तब भी ये गालियाँ ही देंगे। चलो, सब भूल जाओ। आराम से बैठो।’ और दवे साहब ने अपने प्यारे कुत्ते को सिर से पूँछ तक सहलाया। उसे सोफे पर पूरी श्रद्धा से बैठाया। खुद खड़े हुए और पूरी गम्भीरता के साथ कुत्ते से परवानगी माँगनेवाले अन्दाज में पूछने लगे, ‘अच्छा तो मैं अब इनसे बात करूँ? ये अपने मेहमान हैं। बड़ा करम करके अपने घर पधारे हैं।’ और आराम से अपनी सीट पर बैठकर अमुकजी से मुखातिब हुए, ‘हाँ तो भाई साहब! कहिए, आपकी क्या सेवा की जाए?’

अमुकजी का खून खौल रहा था। धड़कन अभी तक तेज थी। गुस्सा उतरता नहीं लग रहा था। पता नहीं दिमाग कहाँ से कहाँ तक चला गया था। करीब-करीब चीखकर बोले, ‘भाड़ में जाए आपकी सेवा! जहन्नुम में जाएँ आप! स्साले को शूट कर दूँगा। कुत्ते को कुत्ते की तरह पालिए। आनेवालों की छाती पर चढ़ता है। बड़े आए सेवा की पूछनेवाले। आधे घण्टे से तो आप इसी से माफी माँग रहे हैं, जैसे मुझसे कोई गलती हो गई हो। लानत है। धिक्कार है!’ और कहते-कहते अमुकजी तैश में खड़े हो गए।

श्रीमती दवे चाय की ट्रे लेकर ड्राइंगरूम में प्रविष्ट हुईं। अमुकजी ने पूरी हिकारत के साथ चाय की ट्रे को देखा। चिल्लाकर बोले, ‘फेंक दो इस चाय को! हो गई हमारी चाय! जो कुत्ते की औलाद हो, वो आए आपके दरवाजे पर। नमस्ते!’ और अमुकजी बाहर की ओर चल पड़े।

दवे साहब ने अमुकजी को रोका नहीं। उन्होंने फिर अपने कुत्ते को आवाज दी, ‘जाओ भैया। अमुकजी को दरवाजे तक सादर छोड आओ। इनसे कहना कि फिर से पधारना। हमारा दरवाजा आपके लिए चौबीसों घण्टे खुला है।’

अमुकजी के पाँव एक बार फिर लड़खड़ाए। आतंक के मारे उनकी आँखें मुँद गईं। उन्होंने पाया कि दवे साहब का कुत्ता उन्हें सूँघ रहा है और करीब-करीब, साथ-साथ चल रहा है।

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‘बिजूका बाबू’ की पन्द्रहवी कहानी ‘होली’ यहाँ पढ़िए।

‘बिजूका बाबू’ की सत्रहवी कहानी ‘गंगोज’ यहाँ पढ़िए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 

 


  


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

    

   

   

   

   

    


 


 

 

 


होली (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की पन्द्रहवीं कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की पन्द्रहवीं कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



होली

विवाद इस बात पर नहीं था कि यह होली जले या नहीं जले,  रगपट्टा यह था कि  होली ‘यहाँ’ जले या नहीं जले। तरह-तरह के लोग और किस्म-किस्म के दिमाग। पता नहीं किसने यहाँ होली जलाने की सुर्री छोड़ी पर धीरे-धीरे बात आगे बढ़ती गई और यार लोगों ने होली का डाँडा यहाँ पर गाड़ ही दिया। एक बार जब होली का डाँडा गड़ गया तो फिर किसकी हिम्मत है, जो उसे उखाड़ दे?

वैसे होली के मामले में हजारों सालों से एक परम्परा चली ही आ रही है कि माघी पूनम को होली का डाँडा गाड़ो और फागुन की पूनम को, जितना भी अलिद्दर-दलिद्दर उसके आस-पास गाँववाले रख जाएँ या फेंक जाएँ, उसे धूमधाम से ढोल बजा-बजाकर गाते-नाचते जला दो। अब यह अलग बात है कि लोग उसमें न जाने क्या-क्या फेंक-फाँक जाते हैं। अंग्रेजी में जैसे ‘सॉरी’ कहने से हजार गुनाह माफ हो जाते हैं, वही मामला होली का भी है। आप मनचाही भड़ास निकाल लें और हल्ला करके कह दें, ‘बुरा न मानो होली है’, बस! सारी बात खत्म।

पर इस बार गाँव में होली माता ने नया बखेड़ा खड़ा करवा दिया। ये तो भला हो दो-चार समझदार लोगों का, जो सारा मामला निपटा-निपटू दिया, वरना वह लाठी चलती कि पलाशों की जगह लाशों का रंग बह जाता।

वैसे देखो तो हुआ-हुआया कुछ नहीं। एक जमाना था, जब कि हर गाँवे में एक रावण बनाया और मारा या जलाया जाता था। आज जमाना यह आया कि गाँव-गाँव रावणों की संख्या बढ़ गई। एक के दस हो गए। दस माथों की जगह सौ माथे आसमान में तन गए। जब आप गली-गली रावण बनाने और जलाने से नहीं रोक सकते हैं तो फिर होली पर कौन सा कानून लगा सकेंगे? हमारा गाँव, हमारी गली, हमारा मुहल्ला और हमारी होली। हम क्या किसी के बाप का खा रहे हैं, जो कोई हमें रोक देगा? हम होली में अपने घर का दलिद्दर जलाएँ या दादाजी की दौलत, आप कौन होते हैं आड़ लगानेवाले? गाँव-बस्ती के आजवाले लड़के इस डायलॉग तक आ पहुँचे हैं। फिर इस बार तो इस गाँव की टोपी में एक तुर्रा और भी लग गया है। पंचायत का सरपंच इसी गाँव का अपना आदमी चुना गया और वह भी हमारे अपने इसी मुहल्ले का। उसके घर के सामनेवाले चौक में होली गड़ेगी, फिर पुजेगी और धूम-धड़ाके से जलेगी। जिसको भी राज-कचहरी करना हो, करके देख ले। वो जमाना गया, जब होली पटेल की पोल और सेठजी की हवेली के सामने जलाई जाती थी। अब देश में लोक-तन्तर है और जनता खूब जानती है. कि किसका तन्तर किस तरह कर दिया जाए।

सो इस सरपंच चौकवाली होली के पीछे भी दो-चार लोगों ने कोई-न-कोई तन्तर पहले अपने दिमाग में फिट किया और फिर उस तन्तर को इस होली माता पर चिपका दिया। वैसे देखो तो बात, न बात का नाम। चुनाव, चुनाव की जगह हैं। कभी हो जाते हैं, कभी नहीं होते। पर इस बार पंचायत का चुनाव हो ही गया और लोकल राजनीति की गोटियाँ कुछ ऐसी बैठीं कि बालू बा का बेटा बगदीराम ग्राम पंचायत का सरपंच बन बैठा। अब बन क्या बैठा, उसे बना दिया गया। न तो बालू बा चाहते थे, न बगदीराम। पर कहीं-न-कहीं बगदीराम की हथेली में राज रेखा शायद है कि किसी कारण से वह एकाएक गहरी हो गई होगी। सो जोग संजोग में बदल गया।

इस बदलाव का असर गाँव पर पड़ना था, सो पड़ा ही। बरसों से चले आ रहे गाँव के कई समीकरण एकाएक बदल गए। लोगों की लाग और लगावों में गहरा फर्क आ-गया। चतुर लोगों के रास्ते बदल गए। और तो और, खेत-खलिहानों पर जाने-आने के सनातन रास्तों से समझदार लोग इधर-उधर होने लगे। समझदार और सयाने लोग सब समझते थे। कहनेवाले कह भी देते थे, पर बालू बा के व्यवहार और विनम्र बोलचाल से कड़वाहट सतह के ऊपर नहीं आ पाई। बालू बा ने जिन्दगी देखी थी उन्होंने बगदीराम को बार-बार कुल मिलाकर एक ही बात कही कि ये जो राजकाज है, वह नवरात्रि की छाया जैसा मामला है। और नवरात्रि नौ दिन की होती है। दसवें दिन दशहरा और ग्यारहवें दिन ग्यारस माता का व्रत करना ही पड़ता है। अगर ग्यारस माता का व्रत नहीं करो तो बारहवें दिन प्रदोष पक्का। इसलिए इस सरपंची पर इतराना मत। जोग-संजोग है कि लॉटरी में यह पंचायत अपने जैसे समाज के नाम पर खुल गई, वरना सात-सात जनम तक इस खानदान का कोई आदमी सरपंची की कुरसी पर नहीं पहुँच सकता था। बालू बा समझाते-समझाते यहाँ तक कह बैठते थे कि ‘तुझे सरपंच बनानेवाले लोग खुद नहीं बन सकते थे, इसलिए उन्होंने तुझे सरपंच बनाकर अपनी राजनीति पूरी कर ली। अगली बार लॉटरी में यही पंचायत अगर सामान्य खुल गई तो बगदू! तू तो क्या, तेरा बाप भी सरपंच नहीं बन सकेगा। इसलिए गाँव-बस्ती और लोक-मर्यादा का ध्यान रखकर, सबसे मिल-जुलकर काम करना और अपनी राम-राम, श्याम-श्याम की रामा-शामी में कहीं कोई बदबू मत मिला देना। जनता का राज और लोक-तन्तर तलवार की धार पर चलनेवाली बात है। तेरा सिर जिस दिन अभिमान में ऊँचा होगा उस दिन मेरी नाक नीची हो जाएगी। इस बात का ध्यान रखना।’

बगदू सरपंच रोज इस तरह की बातें सुनता और उनको पल्ले बाँधता। बेशक वह पढ़ा-लिखा लड़का था और उसको सरपंच बनानेवाले करीब-करीब सभी वार्ड मेम्बर कमोबेश उसी की उम्र के थे। तब भी सरपंच पद पर आने के छह महीनों में ही उसने अनुभव कर लिया था कि सत्ता का चरित्र वेश्या का चरित्र होता है। वह यह भी समझ गया था कि कुरसी कभी खाली नहीं होती। यह सदा सुहागन रहनेवाली काठ की पुतली है। पद पर रहकर अपने गाँव का विकास करना और जनता की सेवा भी करने का मतलब निकलता है कि आप पनघट के आस-पास पत्थरों पर जमी हुई काई पर नंगे पाँव चलो। इंच-इंच पर पाँव फिसलने का डर। जरा फिसले कि गिरे। सँभलकर चलो, वरना यार लोग तमाशा देख-देखकर तालियाँ बजाएँग और ठट्ठा करेंगे सो अलग। अब अगर गिरेगा तो वह बगदू नहीं गिरेगा, गिरनेवाला ‘बगदू सरपंच’ होगा।

इतनी समझदारी के साथ काम करनेवाले बगदू सरपंच को भी भाई लोगों ने होली पर लत्ती मार ही दी। अपनी खुन्नस निकालने के चक्कर मंे चण्ट-चतुर लोगों न होली का एक डाँडा चुपचाप ही बगदू सरपंच के वार्ड में उसके घर के पासवाले छोटे से चौक पर गाड़ दिया। नाम दे दिया ‘सरपंच साहब की होली।’ न जाने कहाँ-कहाँ से लाकर इस होली पर लोगों ने झाड़-झंखाड़, अलिद्दर-दलिद्दर इकट्ठा कर दिया। बालू बा ने समझाया, पर माने कौन! बगदू ने भी हाथ जोड़े कि जहाँ जलती आ रही है वहीं जलने दो। एक नया बखेड़ा मत खड़ा करो। पर जब डाँडा गड़ गया तो गड़ गया। अब यह बखेड़ा नहीं है, होली है और होली को जलना है। बस! बालू बा ने जब तर्क करने की कोशिश की तो भाई लोगों ने तरह-तरह के उदाहरण देकर उन्हें चुप कर दिया।

बालू बा ने कहा, ‘भैया! एक गाँव में दो होलियाँ शोभा नहीं देतीं। कल से गली-गली में होलियाँ जलना शुरु हो जाएँगी तो जनता का एका टूटेगा अलगाव बढ़ेगा। पानी पर लकीरें मत खींचो। एक होली जले, एक रावण मरे तो दशहरे और होली पर गाँव की एकता नजर आती है। अभी भी समझ लो और इस होली को अपने गाँव की जूनी होली में डालकर इस अलगाव को धो डालो। यह कहाँ का बखेड़ा है कि एक होली गाँव की और एक होली सरपंच की!’

पर दाँव लगानेवालों ने बालू बा के नहले पर दहला यों कहकर जड़ दिया कि ‘बा, अगर रावण दो होते हैं तो उनको-मारनेवाले राम भी तो दो होते हैं। अगर होलियाँ दो हैं तो प्रह्लाद भी दो होंगे न। आप अपनी नजर रामजी और प्रह्लादजी पर रखा करो। इस उम्र में कहाँ आप रावण और होली को देखने बैठ गए।’ और सयानों का वह टोला ‘होली है’ का हल्ला करता हुआ अगली तैयारी में लग गया।

अगली तैयारी होनी भी क्या थी। गाँव के एक उभरते हुए लोक कलाकार को होली का शानदार पुतला बनाने का ऑर्डर दिया गया। उसकी गोद में प्रह्लाद ऐसा बैठाना है कि होली जल जाए, पर प्रह्लाद का पुतला सही-सलामत, साबुत बच जाए। होली को बदसूरत नहीं बल्कि शानदार और खूबसूरत बनाने की खास हिदायतें दी गईं। सरपंच की शान के मुताबिक होली की वेशभूषा बढ़िया हो। प्रह्लाद राजकुँवर जैसा ही हो, वगैरह -वगैरह। कलाकार को मन का काम मिल गया था। उसे उसका मेहनताना भी पूरा मिल रहा आ। उसके पास अभी बीस दिनों का समय शेष था। उसने मन लगाकर दानों पुतले बनाने का सिलसिला शुरु किया। उसे तरह-तरह के सुझाव मिलते और वह हर सुझाव पर विचार करता और उनके अनुरूप् पुतलों को आकार देता। प्रह्लाद के पुतले का उसके सामने कोई विशेष रूप-प्ररूप नहीं था। उसे तो जीवित बचना ही था। वैसे भी प्रह्लाद का पुतला सीमेण्ट का बनाया जा रहा था, ताकि होलिका दहन के बाद भी प्रह्लाद सुरक्षित रहे। कारीगरी और कलाकारी तो होली के पुतले में थी। बगदू सरपंच इस सारी  तैयारी से अनजान अपनी सरपंची कर रहा था। उसे तो बस होली के दिन शुभ मुहर्त में दहन के लिए होली के आस-पास तीन फेरे लगाकर पुतले को आग लगानी थी। 

जिस शाम को होलिका-दहन होना था, अपराह्न में ढोल-ताशों और बैण्ड-बाजों के साथ भाई लोगों ने ट्रैक्टर-ट्रॉली में जुलूस के साथ दोनों पुतले लाकर बगदू सरपंचवाली नई होली के चौक पर स्थापित कर दिए। ठेले पर लाउडस्पीकर लगाकर गाँव में ऐलान करवा दिया कि स्थानीय कलाकार की शानदार कला के दर्शन करने पधारो। होली माता का ऐसा पुतला आज तक न तो बना है, न बेेनगा। मुहूर्त रात साढ़े आठ बजे का। अभी भरपूर समय है। जो भी लोग इस आदर्श होली को देखना चाहें, वे देख लें।

हर गली-मुहल्ले से लोग-लुगाइयाँ नई होली को देखने के लिए ठट्ठ-के-ठट्ठ जुट गए। लोग देख-देख कर तारीफ करते। क्या तो होली का चेहरा, क्या तो खूबसूरती! क्या उसका पहनावा, क्या उसकी धज और क्या रुतबा! कलाकार कभी रोमांचित होता तो कभी गद्गद। जनता का अभिवादन स्वीकार करते-करते वह थक गया। नौजवानों ने लाउडस्पीकर पर पूरी आवाज में लोकगीतों के कैसेट बजाने और भरपूर मस्ती के साथ उत्तेजक ढोल बजवाने का काम चालू रखा। होली के आस-पास लोगों की टिप्पणियाँ हो तो रही थीं, पर सुनी नहीं जा रही थीं।

ऐसे में बालू बा भी उस कलाकृति के दर्शन करने पधार गए। बगदू सरपंच को तो मुहूर्त पर ही आना था। उसके तथा गाँव के दो-चार लोगों के लिए कुरसियाँ और बेंचें लगाई जा रही थीं। बालू बा आए उन्होंने होली के पुतले को पहली नजर देखा और उनकी आँख और मुँह.... वे चीखते तो भी वहाँ सुनता कौन? चौक से जरा ही दूरी पर दस-पन्द्रह लड़के जान-बूझकर अनजान बने चपर-चपर कर रहे थे। सचमुच में वे किसी हुड़दंग का प्लान बना रहे थे। ये वे ही लोग थे, जिन्होंने इस होली की सारी रचना पहले दिन से आज तक की थी। 

बालू बा ने हाथ जोड़कर करीब-करीब रिरियाते हुए उनसे कहा, ‘भैया, तुमने ये क्या किया? इस होली के पुतले का तो सारा रूप-रंग, चेहरा-मोहरा, पहनावा और सज-धज सब पुरानेवाले सरपंच की घरवाली जैसा है। उसे पता चलेगा तो अभी यहाँ खून-खच्चर हो जाएगा। तुम अभी ही, इस सारे मायाजाल को समेटो और इस गाँव को आराम से रहने दो। मत करो झगड़ा।’

बालू बा अपना मुकदमा पेश कर ही रहे थे कि एक दूसरी टोली पुरानेवाले सरपंच साहब को होली माता के दर्शन करवाने के लिए लेकर वहाँ आ गई। होली का दिन और कुरसी छिन जाने के घाव से लहूलुहान अहम्वाला सरपंच अपने घर के भीतरवाले आँगन में शराब पी रहा था। यार लोग उसे उकसाकर उठा लाए। कुहराम और कोलाहल के घनघोर निनाद में पूर्व सरपंच ने होली के पुतले पर ज्यों ही एक नजर डाली, उसकी सारी दारू उतर गई। वह पहले कुछ ठिठका, फिर उसने अपने जबड़े भींचे, आँखों को पूरा विस्तार दिया और आसमान भरकर चीखा। सारे जीवन में उसने गालियों की जो भी सम्पदा इकट्ठी की थी, वह सब उसने धरती से आकाश तक फैला दी। एक ऐसा तमाशा शुरु हुआ जिसे सँभालनेवाला शायद ही कोई हो। उसने बजते ढोल को दो लात दी। ढोल फूट गया। लाउडस्पीकर के तारों को तोड़-ताड़कर तहस-नहस कर दिया। आस-पास पड़े काँटों और लकड़ियों के ढेर में से एक मोटा लट्ठा निकाला और चारों तरफ दौड़ना शुरु कर दिया। बालू बा से उसने कहा, ‘बाल्या! बुला अपने बगद्या को। वो तेरी औलाद हो तो आज यहाँ होली जलाकर देख ले। किसने बनाया है यह पुतला।’ और पता चला कि सबसे पहले पुतला बनानेवाला कलाकार ही वहाँ से भागा था।

जाते-जाते वह कहता जा रहा था, ‘मैंने पूरे सात दिनों तक लोगों, के हाथ जोड़े कि मत बनवाओ ऐसी शक्ल। पर मेरी किसी ने नहीं सुनी। मैं क्या करता? इसमें ढाई सौ रुपए के तो कपड़े ही लगे हैं, बाकी खर्चा अलग। प्रह्लाद के पुतले में दो बोरी सीमेंट लगी और रंग-रोगन, कपड़े-लत्ते का पैसा अलग। अभी तो मेरी पेमेण्ट भी बाकी है। और अब जूते भी मैं ही खाऊँ? जलना हो तो जले और नहीं जलना हो तो नहीं जले, मेरी बला से।’

हालात का पता चलते ही बगदू सरपंच मौके पर पहुँचा। होली जलाने का मुहूर्त निकट आ रहा था। दर्शकों की भीड़ प्रतिपल बढ़ती जा रही थी और दर्शकों में स्वयमेव दो दल हो गए थे। एक दल कहता था, ‘होली जलेगी’ और दूसरा कहता था, ‘जिसकी माँ ने दूध पिलाया हो, कोई जलाकर देख ले।’ बगदू निरपराध होते भी सर झुकाए खड़ा हुआ न जाने क्या सोच रहा था।

(और सुधी पाठक महानुभावों! मैं आपको अपनी पूरी संस्कृति-भावना के साथ यह अधिकार देता हूँ कि कृपया आप इस कहानी को अपनी-अपनी भारतीयता के साथ कोई अन्त दें। मैं इस कहानी को समाप्त नहीं कर पा रहा हूँ। प्रार्थना मेरी यही है कि कृपया आप इसमें सरकार को नहीं लाएँगे तो आपकी बड़ी महरबानी होगी। गाँव की बात  तक ही रहे तो शायद इस कहानी को सही अन्त मिल सके। आइए, हम नए और पुराने दोनों सरपंचों से कहें - “बुरा न मानो होली है।’) 

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 ‘बिजूका बाबू’ की चौदहवी कहानी ‘पीढ़ियाँ’ यहाँ पढिए।

‘बिजूका बाबू’ की सोलहवी कहानी ‘दवे साहब का कुत्ता’ यहाँ पढिए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली