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हर बरस तम से लड़ाई



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की सैंतीसवीं/अन्तिम कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


हर बरस तम से लड़ाई

हर बरस तम से लड़ाई
हर बरस यह दीप-माला
हर बरस हर पल अँधेरा
हर बरस इक पल उजाला।

किन्तु फिर भी ये बधाई
किन्तु फिर भी ये बताशे
लग रहे हैं रस्म केवल
लग रहे हैं बस तमाशे।

क्या कहें इस आत्म-सुख को!
धन्य है यह नष्ट पीढ़ी
कह रहा अन्याय जिसको
‘अधमरी, अति भ्रष्ट पीढ़ी।’
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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भाई देवदार!



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की छत्तीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


भाई देवदार 

शेखी मत बधार
भाई देवदार!
दिखाई दे रहा है कि
तू आसमान तक ऊँचा उठ गया है
और अपने आसपास वाली दूब को
गाली-गलौज पर जुट गया है।

पर
कभी थाह ली तूने अपनी जड़ों की?
शायद नही-
तेरी ऊँचाई को उठाये खड़ी हैं
तेरी जड़ें।
याने कि पाताल-फोड़ नीचाई!
हर ऊँचाई की
होती है एक नीचाई
देवदार मेरे भाई!
दूब की ऊँचाई ने अगर
आसमान नहीं छुआ
तो तुझे घमण्ड किस बात का हुआ?
उसकी नीचाई भी
पाताल-फोड़ नहीं है
आकाश है तेरा
और उस नन्हीं दूब का पिता
धरती है दोनों की माँ।
बाप को तमाचा मारने के लिए
माँ की
वह भी धरती-जैसी माँ की
छाती चीर देना
शायद तुझ-जैसे ‘ऊँचे’ लोगों का ही है काम -
तो मेरे भाई!
ऐसी बुलन्द ऊँचाई को
दूब का दूर से ही राम-राम।

भाई देवदार!
शेखी मत बघार
तू भाग्य से हो गया यदि ऊँचा और पूज्य
तो याद रख
दूब ही से सजती है पूजा की थाली
अपनी नीचाई को याद रख
और मत दिया कर
पूजा की सामग्री को गाली।
कहीं खराद पर चढ़ रहे हैं
तेरे लिये भी आरे और कुल्हाड़े
तुझे लादने को जुट रहे हैं
कहीं खाली गाड़े।

साल-छः माह में
दूब फिर उग आयेगी।
पर भाई देवदार!
तेरी नीचाई
तेरी ऊँचाई को
हमेशा हमेशा के लिये
खा जायेगी ।

इसीलिये कह रहा हूँ
भाई देवदार!
शेखी मत बघार।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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चौराहे सूने हो सकते हैं



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की पैंतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


चौराहे सूने हो सकते हैं

वे
पहले उदास हुए, फिर निराश
और अब करीब-करीब हताश।
उन्होंने खुद
पत्थरों से कुचल लिए हैं अपने ही वे हाथ
जो तने थे कभी
तुम्हारी हिमायत में।
जिस पर बनाया था
व्यवस्था ने एक अस्थायी तिल
उस अंगुली को काट फेंका है
लोगों ने खुद-ब-खुद।

जिन गलीचों पर तुम
मन्त्रणाएँ कर रहे हो
वे शीशे के बने हैं,
तुम्हारा नंगापन
निखार देते हैं वे नामुराद शीशे।
खून न थमा है, न जमा है
वह अनवरत प्रवाहित है
दूर कर लो अपना भ्रम।
चौराहे सूने हो सकते हैं
पर निर्जन नहीं हैं।

देहरी से दालान की दूरी
दम भर की होती है।
उत्तेजना और प्रकाश की गति में
ज्यादा फर्क नहीं होता।
भीड़ जब भाड़ बनती है,
तो ईंधन के पास
कोई तर्क नहीं होता।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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नाक की शोक शैली



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की चौंतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


नाक की शोक-शैली

सुना है मैंने कि
ईश्वर मर गया।
व्यवस्था की छाती पर
कील ठोकने वाले हाथ
बँधे रह गये अपनी ही छाती पर।
सिहासनों को रौंदनेवाले पाँव
रख दिये गये प्लास्टर के कोटरों में।

आकाश के ललाट पर
मिट्टी मारनेवाला माथा
लुढ़क गया अनजानी दिशा में।
उमंगों का इन्द्र-धनुष
तनने के पहले ही टूट गया
काल-पुरुष की चुटकी से एक तीर
अलक्ष्य ही छूट गया।

यह सब हुआ सरे आम सडकों पर
ठीक उनकी नाक के नीचे
जिनकी नाक, बकौल उनके
नाक नहीं हमारा भविष्य है।
अब वे सुरक्षित रखने के लिए
हमारा भविष्य
तोड़ रहे हैं हमारा वर्तमान
जो कि नितान्त हमारा है।

तुम नहीं कर सकते कोई शोक-सभा
बन्द कर दिये हैं उन्होंने
तुम्हारे प्रार्थना-स्थल
चूँकि तुम कहोगे
‘ईश्वर’ मर गया
और उनका कहना है कि
जब तक वे जीवित हैं
ईश्वर मर नहीं सकता
और मर भी गया हो तो
उसका मातम
कोई कर नहीं सकता।

तुम्हें अगर कोई शोक,
कोई मातम
करना भी हो तो
उनकी शैली में करो
वरना ‘ईश्वर’ की तरह
सड़कों पर
अधूरी मौत मरो।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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आज के दिन



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की तैंतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


आज के दिन

काँपता रहा पीपल का पत्ता
अडिग रहा तना
अविचलित रहीं जड़ें
उखडी हवाएँ देती रहीं थपेड़े
और सोचती रहीं मन ही मन
कि इस पीपल को
छेड़ें या नहीं छेड़ें?
पर बन्दूक की नली में पलता मौसम
‘सब कुछ ठीक है’
कहता रहा।
और वह वासुदेव
जी हाँ, वह पीपल
इस ‘सब कुछ ठीक है’ को
चुपचाप सहता रहा।

इस कम्पन को
उन्होंने माना अपनी विजय
इस अडिगन, अविचलन और चुप्पी को
वे समझते रहे कायरता
पीपल के अखण्ड-स्वधर्म-सूत्र को
तौलते रहे वे बन्दूक से
याने कि सत्ता की सनातन भूख से।

मैं हूँ वह थरथराता पत्ता
तुम हो अडिग तने
तुम्हारी संकल्प-सिंचित अस्मिता है
इस पीपल की जड़।
और ‘वे’?
‘वे’ केवल ‘वे’ हैं
हर युग के अपने-अपने ‘वे’।

मेरा हर कम्पन
बताता है हवा का रुख
और उनको है ये दुख
कि मैं स्थिर क्यों नहीं हो जाता?
सड़ाँध-भरी बन्दूक का
जयगान क्यों नहीं गाता?

अडिग रहो तुम,
अविचलित रहे तुम्हारी अस्मिता
थरथराता रहूँ मैं
तभी तो पूज्य रहेगा यह वासुदेव।

लिख लो मेरा वचन
आज के पावन क्षणों पर
कि
स्वस्तिक हमेशा बनेंगे तनों पर
मत्थे हमेशा टिकेंगे जड़ों पर
और टूटता पत्ता भी
प्रहार करता रहेगा
बन्दूक के जबड़ों पर।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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फिर से मुझे तलाश है



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की बत्तीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


फिर से मुझे तलाश है

खुद सूरज ने मान लिया है,
नहीं हुआ उजियारा
इससे तो अच्छा था यारों,
गैरों का अँधियारा!

भला-बुरा जो भी होता था,
तम में तो होता था,
सुर-बेसुर जो भी रोता था,
गम में तो रोता था!
   
पिछली मावस के खाते में,
अपना काजल डाले,
उस सूरज को सूरज कैसे
मानें धरतीवाले।

धरती कोई गगन नहीं है,
कोई भी चमका ले,
ऐरे-गैरे नक्षत्रों से,
अपना काम चला ले!

यहाँ प्राण बोना पड़ता है,
तब लगती है लाली,
ऋतुएँ नहीं बदल पाती हैं,
बातें खाली-माली!

कण-कण फिर अँधियारे में है,
कण-कण पुनः उदास है,
किसी अजन्मी ज्योति-किरण की,
फिर से मुझे तलाश है!

सम्भवतः फिर ऊषा आये,
सम्भवतः फिर रात ढले,
इसी भूमिका की खातिर,
फिर नन्हा-सा दीप जले!
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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मर्दों की कविता



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की इकतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


मर्दों की कविता

या तो सूखा या बेहद बरखा
यानी कि
दोनों तरफ दुश्मन पानी
और गडबड़ा जाये हर भविष्यवाणी।
एक के बाद दूसरा अभाव
तिस पर फिर मानव का स्वभाव?
जीना और वह भी ऐसा
कि राम ही जाने
जाने कैसा।
उस पर फिर अमावस?
वह भी उजास की आस में
चिकनी और काली
अब कैसे मने दीवाली?
पर आ ही गई, है आँगन में तो
स्वागत करो
जैसी हैसियत, वैसी हिम्मत
जैसी हिम्मत, वैसा हौसला
चलो गूँधो मिट्टी
बनाओ दीया।
ढूँढो कोई चिन्दी या फटी लत्ती
बँटो बत्ती
नहीं है तेल तो रोओ मत
निचोड़ो शरीर
नितारो पसीना
और फिर चकमक लो संकल्प की।
अब मारो चोट, चमकाओ चिनगारी,
छँटने दो आग के फव्वारे
झड़ने दो फुलझड़ी
बारूद की बदतमीजी में लगा दो पलीता,
दुःख का क्या? वह तो पहिले ही गया-बीता।
छाती ठोक के आसमान से बोलो
तू एक नहीं लाख बरस, मत बरस,
और तेरा मन पड़े उस बस्ती को डुबा दे
परस-परस 
हम भी हैं मरद के बच्चे
धरती पर जब भी चलेगी
मरदों की चलेगी
और तू बरसाता रह
अभाव, अँधियारा, अनय और उल्का,
मर्दों के घर दीवाली की रोशनी
जलेगी, जलेगी और करोड़ बार जलेगी।
बहुत हो गई तेरी बक-बक,
अपनी आसमानी सुल्तानी
अपने घर रख।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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आत्म-स्वीकृति



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की तीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


आत्म-स्वीकृति

कितना अच्छा लगता है
इन पर्वों का आना
त्यौहारों, जयन्तियों और
स्मृति-दिवसों को
विशेषांकों के माध्यम से
घर बैठे पा जाना ।

तब वे चाहते हैं कि
मैं कुछ लिखूँ
अनुक्रमणिका में जीवित दिखूँ।
और जब जागता है मेरा पर-पीड़क,
मेरा पशु, मेरा अमानव,
करवट लेती है एक बर्बरता
फड़कने लगती है कलम की निब
घुमड़-घुमड़ जाता है एक
नितान्त निन्दनीय अट्टहास,
दौड़ती है दोगली नजर
फूठता है कमीना स्वर
गाता हूँ गीत भूख के
उगलता हूँ एक नपुंसक लावा
गालियाँ देता हूँ व्यवस्था को
कोसता हूँ उन्हें जो कि
मेरी सुविधाओं के दाता हैं,
संरक्षक हैं।

धोखा देता हूँ दरिद्रनारायण को।
नोचता हूँ बाल।
फाड़ लेता हूँ बनियान
एक थरथराते
क्रान्ति-आवेश में
जो कि कहीं नहीं है
मेरे सारे परिवेश में।
राम जाने कब उगेगा भविष्य का अग्निबीज
मेरे देश में?

सर्वहारा!
मेरे बन्धु!
तुम कितने दृढ़-कवच हो मेरे?
तुम्हें पहन कर मैं ठाट से
उड़ा लेता हूँ खिल्ली
गरीबी हटाओ
समाजवाद और
सम्पूर्ण क्रान्ति की।
खींच लेता हूँ कमाऊ तस्वीरें
तुम्हारी क्रान्ति और क्लान्ति की।
तुम नहीं होते तो
क्या होता मेरे पेट का?
कोई कुछ भी चाहे पर मैं,
हाँ, मैं चाहता हूँ कि
तुम पर सदैव जलता रहे सूरज
तमतमाते जेठ का।

तुम चख तो लो मेरे आँसू
मीठे हैं, खारे नहीं हैं
मेरी आँखों में तुम
जिन्हें अपना समझ रहे हो
वे ग्लीसरीन के हैं,
तुम्हारे नहीं हैं।
तुम जितना मरोगे
मेरे गीतों में
उतनी ही जान होगी,
तुम जितने कुचले जाओगे,
मेरी कविता उतनी ही
महान् होगी,
तुम जितना जोर से रोओगे
मैं उतना ही जोर से गाऊँगा,
तुम जब-जब मरोगे
मैं तब-तब
जयन्तियाँ मनाऊँगा।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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ओ दिनकरों के वंशधर



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की उनतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


ओ दिनकरों के वंशधर!

जब अँधेरा मुँह चिढ़ाये
दिल जलाये दीप का
और घोंघे कर उठें
उपहास उजली सीप का,
तब बताओ
मोतियों के वंशधर! हम क्या करें?
और दिनकर के
दहकते वंशधर! हम क्या करें?

अंश उजले वंश का जब
तिलमिला कर जल उठे
और उसकी लौ लपट बन
तम जलाने को जुटे
उस समूचे रोष का ही
पुण्य यह उजियार है
मन्युमय उस दीप का
शायद यही आधार है।

मीत!
इस आधार को
इस मन्यु को आकाश दो।
युद्धरत हो तुम सतत्
ऐसा प्रबल आभास दो।
तुम विजेता हो, अजित हो, इष्ट हो
ऐसा कहो ललकार कर।
लिख चुका जय-गीत,
अब तुम
आ न जाना हार कर।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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कोरा प्रमाद



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की अट्ठाईसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


कोरा प्रमाद

स्वजनों के लिये
संज्ञा
सज्जनों के लिये
सर्वनाम
परिजनों के लिए सम्बोधन
और अपरिचितों के लिये
एक प्रयोजन-पूर्ण
सजीव शरीर-मात्र हूँ।

कवि कोई नहीं मानता मुझे
किसी का कवि नहीं हूँ मैं।
मेरे पूरक शरीर तक को
मेरी एक भी पंक्ति याद नहीं,
फिर भी खुद को कवि कहना
क्या कोरा प्रमाद नहीं?

और
तुम अपेक्षा करते हो मुझसे
अग्नि-वर्णी क्रान्ति की,
दाद देता हूँ तुम्हारी इस
भौलिक भ्रान्ति की।

जिस पर तुम
चस्पा करना चाहते हो
क्रान्ति।
उसे समझा देते हैं वे
केवल परिवर्तन से।
पेट का यह टापू
कभी नहीं जुड़ता जीवन से।
पेट और जीवन
चिन्तन के अलग-अलग छोर हैं
पेट की बात अलग
और
जीवन की बात और है।

जीवन की प्यास है क्रान्ति
पेट की भूख है रोटी,
और जब कविता
जुड़ जाती है पेट से,
तब वह नहीं मरोड़ पाती
किसी नल की टोंटी।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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अँधेरे में गा रहा हूँ



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की सत्ताईसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


अँधेरे में गा रहा हूँ

अँधेरे में गा रहा हूँ
किसी किरन के लिए।
कह रहा हूँ सबसे कि
तुम भी गाओ,
पर गाता कोई नहीं,
समवेत होने, आता कोई नहीं।
हामी तो सभी भरते हैं
पर राम जाने किससे डरते हैं?

प्राण नहीं छटपटाता किसी का
घुटता तो है दम
पर निगल जाते हैं घूँट की तरह घुटन को
वे जाने किस तरह समझा लेते हैं
मन को।

जानता तो मैं भी हूँ कि
किरन को आना है, वह आयेगी।
काजल लगी चाँदनी को जाना है,
वह जायेगी।

पर सोचता हूँ कि
मेरे किये यह हो जाये,
इस अँधेरे में और कुछ नहीं तो
मेरी और तुम्हारी कायरता ही
खो जाये।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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नये सिरे से



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की छब्बीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


नये सिरे से

फिर कस गई हैं उनकी मुट्ठियाँ
फिर भिंच गये हैं उनके जबड़े
फिर आँखों में उतर आया है
उनका आत्म-विद्रोह।

शायद वे फिर खा गये हैं धोखा
अपनी ऊर्जा का आकलन
फिर से करने लगे हैं वे
फिर जुटने लगे हैं उनके जुलूस

फिर ले रहे हैं सुराग
वैसा ही सब कुछ।
फिर शुरु हो गया है
नये सिरे से
पहिले घूँसा तान कर
केवल कसमसा कर रह गये थे वे,
लगता है इस बार वे कुछ करके रहेंगे।

वैसा, जैसा कि पहिले होना था
पर हुआ कुछ नहीं
सोचता हूँ क्यों उन्होंने मेरी कनपटी को
आज तक छुआ नहीं।

स्फटिक पत्थर
जितना ठण्डा ऊपर से होता है
उतना भीतर से नहीं होता
चिनगारियों की चिनाव बहती है
उसके कलेजे में
जब वह पड़ जाता है किसी गोफन में
और कर बैठता है चोट।
तो गाड़ देता है पीढियों के क्रान्ति-ध्वज
आदमखोरों के भेजे में।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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तू हँस



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की पचीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


तू हँस

ओ मेरे स्व,
हँस।
मेरे अन्तर्यामी मनु! तू हँस।

व्यवस्था की जटिलता
और आचरण की कुटिलता
लाख रोके तुझे
पर तू हँस,
मेरे आत्मदेव! तू हँस।

विषम वातावरण में हँसकर जीना
और नागफनी निराशा का विष
ठठाकर पीना
मात्र तेरे ही बस की बात है।
तेरे निर्माता ने हँसने की शक्ति
दी है केवल तुझे-यानी कि मनुष्य को।
तेरे सिवाय कोई हँस नहीं सकता-
न घोड़ा, न गधा, न बन्दर, न भालू,
न तोता, न मैना
फिर भी बिना हँसे गुम-सुम रहना
खुला विरोध है उस प्रभु का।
विरोध भी करना है तो हँसते-हँसते कर।

रुदन से जीवन शुरु करनेवाले
मेरे आराध्य मनुष्य!
मरना भी हो तो हँसते-हँसते मर।

वक्त-बेवक्त हँसने के लिए खुद को गुदगुदा,
इस छोटे-से काम के लिये
नहीं उतरेगा आसमान से
कोई खुदा,
उसे और भी कई काम हैं,
वेसे भी तेरे मारे उसकी नींद हराम है।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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मत करो तारीफ



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की चौबीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


मत करो तारीफ

मन बहुत है बात करने का
मगर किससे करूँ?
बात केवल बात होती तो
भला कुछ बात थी।
किन्तु अब तो श्लेष में भी श्लेष है।
या कि वे सब ढूँढ़ते हैं बहुत कुछ
जो कि उसमें है नहीं।
जो निरर्थक शब्द थे कल तक
आज उनकी परत में
अर्थ उग आये अनेकों।

क्या हुआ? कैसे हुआ?
मैं समझ पाया नहीं।
सब समय का फेर है।
जानता हूँ कल अचानक
शब्द सब बेकार होंगे।
श्लेष सब अभिधा बनेंगे
और मैं छिलका समय का
मात्र छिलके-सा
पड़ा इतिहास का घूरा बनूँगा।

आज जो भी बोलता हूँ
सब ‘वचन’ लगते समय को
किन्तु कल
कविता लिखूँगा या कि कोई गीत-
सचमुच गीत ही लेगा जनम,
तो उसे काली गुफा में
गाड़ कर दुनिया हँसेगी
और फिर फबती कसेगी
सूरमा की शक्ल देखो
देख लो सिंहासनों का कीट
औंधे मुँह पड़ा है।

इसलिये
तुम मत करो तारीफ मेरी
आदमी की जात से जालिम समय
हर दम बड़ा है।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
-----
 
 

 






















तुम भी कुछ करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की तेईसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


तुम भी कुछ करो

मेरा सुर में गाना - कुछ बेसुरों ने
आज तक सुरीला नहीं माना।

कई बार वे
आक्रामक दहाड़ के साथ
मेरा गला दबोचने दौड़े।
मैं तब भी निर्विकार गाता रहा।
तब उन्होंने मुझे मारा कटिबन्ध के नीचे
मेरा सुर तब भी नहीं टूटा।
उल्टा मैं गाता ही रहा तन्मय आँख मींचे।

बिलबिला उठा उनका आहत अहम्।
पराजित दर्प
बना बैठा उन्हें पशु।
उनका बेसुरा गाना
बदल गया गुर्राहट में।

पहिले भी वे गुर्राते ही थे।
उन्होंने गाया ही कब?
गीत उनको घुट्टी में आया ही कब?
फिर वे उतारू हुए चरित्र-हनन पर।
तब भी मेरा सुर नहीं छूटा
समय ने थूका उन्हीं पर।
फिर फूटी हिंसा
तो भी मैं अक्षत और अनवरत गुनगुनाता चलता रहा

उनका पशु उबलता रहा।
और अब? अब वे मुझ पर,
बेतहाशा, ऊल-जलूल अनाघात
कुल्हाड़ों और फरसों से वार कर रहे हैं।
चिल्ला रहे हैं दर्शक, बचो! बचो!
पर टीप में लगा मेरा सुर
मुझसे छूटने का नहीं
वे खुद जानते हैं कि
उनके तोड़े मेरा एक भी रोम टूटने का नहीं।
मैं तो तुमसे कह रहा हूँ
कि तुम भी कुछ करो।
इन्होंने फरसों, धारियों, कुल्हाड़ों और बर्छियों से
मुझे नहीं, मात्र काटा है मेरी परछाई को
यहाँ से वहाँ तक
गोड़ दी है उन्होंने मीलों जमीन।

तुम !
उसमें डाल दो सजीव बीज
उगाओ फसल, भरो अपने खलिहान
क्षमादात्री माँ धरित्री की कान्ता कोख
उतावली है अटाटूट होने को।
बन्द करो तुम
मेरी सहानुभूति में उगे इस क्रन्दन को, इस रोने को।
इनके व्यक्तित्व की तरह
इनका आक्रमण भी बेसुरा है,
ये काटते रहेंगे मेरी परछाइयाँ
इनके नोचे नहीं नुचता मेरा सुर
समय अपने आप काट देगा इनके खुर।

सुर और गीत के ये सनातन दुश्मन
इसी तरह गुर्रा-गुर्रा कर मर जायेंगे
तब तक मुझ-जैसे प्राण-गायक
सामवेद का एक और सुरीला भाष्य
तैयार कर जायेंगे।

तुम तो डालो जीवित बीज
उगाओ फसल, भरो अपने खलिहान, भरो।
वे नहीं कर पाये कुछ
मैं कर चुका बहुत कुछ
तुम भी कुछ करो।

तो
तुम हो जाओ नपुंसक
और हो जाऊँ मैं नंगा
तो कहाँ जायेंगे वे
जो संकोचशील हैं?

तुम हो जाओ उन्मत्त
और मैं हो जाऊँ प्रमत्त
तो क्या करेंगे वे
जो निरीह हैं?

तुम हो जाओ उच्छृंखल
और मैं हो जाऊँ उदासीन
तो कहाँ बसेंगे वे
जो उपासे हैं?

तुम हो जाओ अनुत्तरदायी
और मैं हो जाऊँ ऊल-जलूल
तो क्या करेंगे वे
जो कमेले हैं?

तुम करो ताण्डव
और मैं करूँ तर्पण
तो क्या होगा उनका
जो तीर्थ कर हैं?

तुम नहीं रहो तुम
और मैं नहीं रहूँ मैं
तो कहाँ रहेंगे वे
जो सब कुछ हैं?

तुम हो जाओ विश्वासधाती
आर मैं हो जाऊँ अविश्वस्त
तो क्या होगा विश्वास का
जोकि ‘वे’ हैं?
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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क्या करेंगे



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की बाईसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


क्या करेंगे?

उन्होंने पीठ सहलाने के बहाने
मेरी पीछ में छुरा मारा।
लहू जरूर बहा मेरा,
पर मर गये वे खुद।

कारण जानकर क्या करेंगे?
मेरी पीठ में छुरा घोपनेवाले
हमेशा मुझसे पहिले मरेंगे।

समूचे पीठ-प्रदेश में
मैं सम्हाल कर रखता हूँ
उन्हीं विश्वासघातियों का दिल
उनका हर छुरा लगता है
उन्हीं के दिलों में।
छटपटाकर वे
चीख भी नहीं सकते
तड़प-तड़प कर मर जाते हैं।

आप-जैसे-सौ पचास लोग
चूमते हैं मेरे बहते घाव
और वे हरे-हरे घाव मजे से भर जाते हैं।
विभीषण बेशक हो सकते हैं लंकापति
पर जस के चँदोवे उनके माथों पर
नहीं तनते
वे मिलें तो उनसे कह देना कि
त्रेता से आज तक का इतिहास देख लो,
कभी भी विभीषण के
मन्दिर नहीं बनते।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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रेत के रिश्ते



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की इक्कीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


रेत के रिश्ते

कुछ ने खींचा
कुछ ने धकेला
अन्ततोगत्वा भीड़ का यह रेला
ले ही आया मुझे यहाँ तक।
कोई कहता है इसे सुवर्णगिरि
कोई कहता है इसे कजलीवन
अब मैं और मेरा बैरागी मन
पड़ गया है नितान्त अकेला ।
वापस लौट गया है
सारा का सारा मेला।

पोंछ रहा हूँ गुलाल,
निकाल रहा हूँ मालाएँ,
सोच रहा हूँ
कहाँ रखूँ हाथ के नारियल?
ऊपर देखता हूँ तो
आकांक्षाओं की आकाश-गंगा,
नीचे देखूँ तो
अपेक्षाओं का अथाह सागर,
सामने हैं
समस्याओं के सर्पिल संशय वन।
और पीछे?
साहस नहीं रहा पीछे देखने का।
कितना कठिन है
दायित्वों की ऊँचाई पर जीना?
बातों ही बातों में
आ जाएगा साठवाँ महीना।
तब फिर वे
या तो मुझे और ऊपर धकेल देंगे
या खींच कर पटक देंगे
जमीन पर
यहाँ बैठूँ भी तो बैठूँ
किसके यकीन पर?

कुर्सी पर रोप दिया है
उन्होंने मुझे मेरी जमीन से उखाड़ कर
कुंकुम की हथेली
छाप दी है उन्होंने
मेरे दिल के दाहिने किवाड़ पर।
अभ्यस्त भी हूँ
व्यस्त भी हूँ
और मस्त भी हूँ
पर इस बिन्दु से नीचे की नीचाई
जीने नहीं देती
और ऊँचाई मरने नहीं देती
जैसा कि चाहते हैं वे,
जो कि मुझे यहाँ छोड़ गये हैं
उखाड़ कर अपनी मिट्टी से
रेत से मेरा रिश्ता जोड़ गये हैं ।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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लताड़



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की बीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


लताड़

इतने बरसों की हो गई आजादी
ऐ भाई बुद्धिवादी!
अब तो तुम मूर्खतापूर्ण तटस्थता छोड़ दो।
यह तटस्थता-मात्र तटस्थता नहीं,
जड़ता हो गई है
इस जड़ता को तोड़ दो।

‘कोउ नृप होउ हमें का हानि’,
इस आधी चौपाई में
तुमने एक चौथाई शताब्दी नष्ट कर दी।

बुरा मत मानो यार !
इस बेवकूफी में तुमने
एक पूरी पीढ़ी भ्रष्ट कर दी।
छूटा हुआ तीर
बीता हुआ समय
और बोला हुआ बोल वापिस नहीं आता।

अभी भी समय है
समय क्या, ठीक-ठीक समय है
इससे ज्यादा अँधेरा
घर-आँगन में कभी नहीं था।
पतझर के खूँटे
इतने मजबूत कब गड़े थे?
घुटन इतनी है कि
मुर्दे तक छटपटाने लगे हैं
हर आँख बेचैन है
हर मनुष्य यदि वह मनुष्य है तो
निरीह है, कातर है, 
आकाश में तारे कम, नारे ज्यादा भर गये हैं।

धरती बँटना चाहती है,
पर बँट नहीं पाती,
गरीबी हटना चाहती है,
पर हट नहीं पाती,
कुछ ऐसा लगता है कि
तुम बोलो तो कुछ बने।

विप्लव प्रतीक्षा में है
क्रान्ति ठिठक कर खड़ी है,
और तुम्हारे मुँह पर
जड़ता की कुण्डी चढ़ी है।
तुम्हें नष्ट ही होना है न
तो मेरा कहा मानो
बिजली की तरह कौंधो
और नष्ट हो जाओ
ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ो
और मौत की तरह स्पष्ट हो जाओ।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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प्रातः - सन्ध्या



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की उन्नीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


प्रातः - सन्ध्या

एक सूरज और निकला
दूर दक्षिण के समुद्री छोर से
अर्ध्य इसको दें
पढ़ें गायत्रियाँ
और प्रभु से-
यदि कहीं वह सुन सके तो
प्राथना पावन करें-
हे नियन्ता!
सूर्य यह, सविता प्रखर
स्वर्ण-किरणों से नया आलोक दे
हर क्षितिज पर छाप छोड़े पूर्व की
वह्लि इसकी हो अपूर्वा।

और पश्चिम
सामने इसके कभी आए नहीं
मुक्त पंछी, घाम इसका सह सकें
‘अस्त’ जैसा शब्द
इसकी कुण्डली में
स्थान क्या
उपस्थान तक पाए नहीं ।
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संग्रह के ब्यौरे

रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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गायत्री-गर्भ



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की अठारहवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


गायत्री-गर्भ

पाण्डुरोग का रोगी
तुम्हारा यह सूरज
न तो फसलें पकाता है
न बादल बनाता है।
इसके कारण ऋतुएँ
नहीं होतीं ऋतुमती
उजाला तो खैर इसके पास
कभी था ही नहीं।
वह गर्भ, गर्भ ही नहीं था
जिसमें इसका भ्रूण बना,
वह कोख, कोख ही नहीं थी
जिसने इसे जना।
ढाक के सूखे पत्ते सा
टाँक तो दिया है इसे तुमने आकाश में
पर अब यह रोक नहीं पा रहा है रात को।
लोग गालियाँ दे रहे हैं सूरज की जात को।
ब्राह्मण कैसे करें त्रिकाल सन्ध्या?
क्षत्रिय कैसे कहें खुद को सूर्यवंशी?
वैश्य कैसे करें सूर्याेपासना?
और शूद्र कैसे लें शकुन?
धरती पर कोलाहल
और आकाश में सन्नाटा
चुम्बन के नाम पर तुम्हारा यह चाँटा
भूल नहीं पायेंगे तुम्हारे ही बन्दीजन
बेसुरी प्रभातियाँ गानेवाले
इस रोग-काल में
टटपुँजिये तारे सड़ियल सूरज को
जितना भुनाना चाहें भुना लें।
दूर कहीं शुरु हो गई है गायत्री
तुम परेशान मत होओ इस हलचल पर
शायद सही सूर्य का रथ लेकर
अरुण पहुँच ही रहा है उदयाचल पर।।
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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