तुम भी कुछ करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की तेईसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


तुम भी कुछ करो

मेरा सुर में गाना - कुछ बेसुरों ने
आज तक सुरीला नहीं माना।

कई बार वे
आक्रामक दहाड़ के साथ
मेरा गला दबोचने दौड़े।
मैं तब भी निर्विकार गाता रहा।
तब उन्होंने मुझे मारा कटिबन्ध के नीचे
मेरा सुर तब भी नहीं टूटा।
उल्टा मैं गाता ही रहा तन्मय आँख मींचे।

बिलबिला उठा उनका आहत अहम्।
पराजित दर्प
बना बैठा उन्हें पशु।
उनका बेसुरा गाना
बदल गया गुर्राहट में।

पहिले भी वे गुर्राते ही थे।
उन्होंने गाया ही कब?
गीत उनको घुट्टी में आया ही कब?
फिर वे उतारू हुए चरित्र-हनन पर।
तब भी मेरा सुर नहीं छूटा
समय ने थूका उन्हीं पर।
फिर फूटी हिंसा
तो भी मैं अक्षत और अनवरत गुनगुनाता चलता रहा

उनका पशु उबलता रहा।
और अब? अब वे मुझ पर,
बेतहाशा, ऊल-जलूल अनाघात
कुल्हाड़ों और फरसों से वार कर रहे हैं।
चिल्ला रहे हैं दर्शक, बचो! बचो!
पर टीप में लगा मेरा सुर
मुझसे छूटने का नहीं
वे खुद जानते हैं कि
उनके तोड़े मेरा एक भी रोम टूटने का नहीं।
मैं तो तुमसे कह रहा हूँ
कि तुम भी कुछ करो।
इन्होंने फरसों, धारियों, कुल्हाड़ों और बर्छियों से
मुझे नहीं, मात्र काटा है मेरी परछाई को
यहाँ से वहाँ तक
गोड़ दी है उन्होंने मीलों जमीन।

तुम !
उसमें डाल दो सजीव बीज
उगाओ फसल, भरो अपने खलिहान
क्षमादात्री माँ धरित्री की कान्ता कोख
उतावली है अटाटूट होने को।
बन्द करो तुम
मेरी सहानुभूति में उगे इस क्रन्दन को, इस रोने को।
इनके व्यक्तित्व की तरह
इनका आक्रमण भी बेसुरा है,
ये काटते रहेंगे मेरी परछाइयाँ
इनके नोचे नहीं नुचता मेरा सुर
समय अपने आप काट देगा इनके खुर।

सुर और गीत के ये सनातन दुश्मन
इसी तरह गुर्रा-गुर्रा कर मर जायेंगे
तब तक मुझ-जैसे प्राण-गायक
सामवेद का एक और सुरीला भाष्य
तैयार कर जायेंगे।

तुम तो डालो जीवित बीज
उगाओ फसल, भरो अपने खलिहान, भरो।
वे नहीं कर पाये कुछ
मैं कर चुका बहुत कुछ
तुम भी कुछ करो।

तो
तुम हो जाओ नपुंसक
और हो जाऊँ मैं नंगा
तो कहाँ जायेंगे वे
जो संकोचशील हैं?

तुम हो जाओ उन्मत्त
और मैं हो जाऊँ प्रमत्त
तो क्या करेंगे वे
जो निरीह हैं?

तुम हो जाओ उच्छृंखल
और मैं हो जाऊँ उदासीन
तो कहाँ बसेंगे वे
जो उपासे हैं?

तुम हो जाओ अनुत्तरदायी
और मैं हो जाऊँ ऊल-जलूल
तो क्या करेंगे वे
जो कमेले हैं?

तुम करो ताण्डव
और मैं करूँ तर्पण
तो क्या होगा उनका
जो तीर्थ कर हैं?

तुम नहीं रहो तुम
और मैं नहीं रहूँ मैं
तो कहाँ रहेंगे वे
जो सब कुछ हैं?

तुम हो जाओ विश्वासधाती
आर मैं हो जाऊँ अविश्वस्त
तो क्या होगा विश्वास का
जोकि ‘वे’ हैं?
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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8 comments:

  1. यथार्थ पर प्रहार करती हमेशा हर परिदृष्य में सटीक अभिव्यक्ति ।

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    1. टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरा हौसला बढ़ा।

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  2. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (04-10-2021 ) को 'जहाँ एक पथ बन्द हो, मिले दूसरी राह' (चर्चा अंक-4207) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    1. चयन के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  3. सुर और गीत के ये सनातन दुश्मन
    इसी तरह गुर्रा-गुर्रा कर मर जायेंगे
    तब तक मुझ-जैसे प्राण-गायक
    सामवेद का एक और सुरीला भाष्य
    तैयार कर जायेंगे।
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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    1. टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरा हौसला बढ़ा।

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  4. बहुत ही बढ़िया सृजन।
    पढ़वाने हेतु बहुत बहुत शुक्रिया सर।
    साधुवाद

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    1. टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरा हौसला बढ़ा।

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