श्री बालकवि बैरागी का पाँचवा काव्य संग्रह: गौरव गीत

 


बालकवि बैरागी: शंख भी, वीणा भी

‘बालकवि बैरागी’ कवि सम्मेलन का केसरी भी है कि दहाड़े और कोकिला भी कि कूके। कहूँ, उसके एक फेफड़ में शंख तो दूसरे में वीणा - झंकार भी, हुँकार भी। वह जीवन का गायक है - न जीवन का भाट, न जीवन का क्लर्क। जीवन का गायक इसलिए कि उसने जीवन पाया नहीं, बनाया है। उसकी तड़फ में कल्पना की कान्ति नहीं, सीधी क्रान्ति है। यह बहुत से लोग जान गए हैं कि वह भिखारी से विचारी बना है, पर यह कम लोग जानते हैं कि उसके विचार छन्द में कूकते हैं तो गद्य में भी निशाना चूकते नहीं।

                                            - पं. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

(प्रभाकरजी की यह टिप्पणी, ‘गौरव गीत’ के अन्तिम आवरण पृष्ठ पर छपी है। किन्तु इसे यहाँ, सबसे पहले देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया।)

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कल से दादा के गीत संग्रह ‘गौरव गीत’ के गीतों का प्रकाशन शुरु कर रहा हूँ। यह दादा का पाँचवाँ संग्रह है। यद्यपि ये गीत काँग्रेस सेवादल के लिए लिखे गए हैं किन्तु इनमें कई गीत ऐसे मिल जाएँगे जो राष्ट्रीय उत्सवों पर प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

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संग्रह की सामान्य जानकारियाँ

‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ

गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह

कवि - बालकवि बैरागी

प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)

आवरण - मोहन झाला, उज्जैन

कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)

प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,

प्रकाशन वर्ष - 1966

मूल्य - 1.50 रुपये

मुद्रक - रतनलाल जैन,

पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 

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समर्पण

काँग्रेस सेवादल की कर्मठ स्वयं सेविका

स्वर्गीया पीलू सिधवा

को

जिसे हम भुवनेश्वर से वापस नहीं ला सके

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सन्देश

राष्ट्रीय गौरव को मुखरित कर राष्ट्र की एकता का शंखनाद करने वाले राष्ट्रीय कवि बालकवि बैरागी का कविता संग्रह ‘गौरव गीत’ देखकर स्वयं गौरव से भर उठा।

बैरागी मध्य प्रदेश की अमूल्य सम्पत्ति हैं जो कि अपनी राष्ट्रीय रचनाओं को ‘गौरव गीत’ के द्वारा सौंप कर राष्ट्रीय जागरण की इस बेला में महान् कार्य कर रहे हैं।

मेरी हार्दिक कामना है कि ‘गौरव गीत’ जन-जन के मुख से मुखरित हो। मेरे समस्त आशीर्वाद उनकी सफलता के लिये प्रस्तुत हैं।

लालाराम बाजपेयी
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

प्रिय बैरागीजी,

यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि आप अपनी सुरुचिपूर्ण, ओजस्वी और प्रेरणास्पद रचनाओं का संग्रह ‘गौरव गीत’ के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं।

मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि ‘गौरव गीत’ की रचनाएँ नगर-नगर और ग्राम-ग्राम में गूँजें और हमारे कार्यकर्ता इनसे प्रेरणा प्राप्त कर देश भक्ति की भावना से ओत-प्रोत रहें।

समस्त शुभ-कामनाओं सहित।

आपका,
शंकरलाल तिवारी,
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

भाई बैरागीजी हमारे प्रान्त के ‘गौरव’ हैं। बैरागीजी की रचनाओं से अब पूरा देश परिचित हो चुका है। इनकी रचनाओं में काफी ओज और जोश है। राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत ‘गौरव गीत’ नयी पीढ़ी को प्रोत्साहित करनेवाला एक अत्यन्त उपयोगी एवं सरस कविता संग्रह है।

‘गौरव गीत’ पढ़कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ‘गौरव गीत’ का कवि इस परिश्रम के लिए हार्दिक बधाई का पात्र है।

समस्त शुभ-कामनाओं के साथ।

सवाईसिंह सिसौदिया,
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि आप काँग्रेस सेवादल के गीतों का संग्रह ‘गौरव गीत’ के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं।

आज जबकि हमारा देश कठिन समस्याओं का सामना कर रहा है, ऐसे समय में भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावनाओं को उत्पन्न करना अत्यन्त आवश्यक है।

मझे आशा है कि ‘गौरव गीत’ के प्रकाशन के रूप में आपका यह प्रयास भारतीय जनता में नया उत्साह और नया जोश उत्पन्न करेगा।

मैं आपकी पूर्ण सफलता की कामना करता हूँ।

वृन्दावनसिंह तोमर,
जी. ओ. सी.
काँग्रेस सेवादल, मध्य प्रदेश

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सन्देश

श्री बालकवि बैरागी से मेरा घनिष्ठ परिचय बरसों से है। वह बचपन से ही सेवादल के एक कर्मठ सदस्य रहे हैं। छोटी सी उम्र से ही कविता लिखना आरम्भ कर दिया और सेवादल के लिये कितनी ही कविताएँ लिखीं। तभी वह बालकवि कहलाया। धीरे-धीरे उनकी कविताओं में ओज आना शुरु हुआ। उनका कविता पठ का ढंग अति आकर्षक है। कोयल सा मीठा स्वर और सेनानी जैसी हुँकार। उनकी कविताएँ बम्बई तथा अन्य सभी स्थानों पर सेवादल के हर सेवक-सेविका की जबान पर हैं। सेवादल की अखिल भारतीय रैली भोपाल के अवसर पर बालकवि बैरागी की कविता ‘सेवादल के सबल सिपाही उमड़-घुमड़ कर आये हैं’ आज भी कानों में गूँज रही है।

स्वर्गीय प्रधान मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने जिन्होंने रैली का उद्घाटन किया था बालकवि की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

बालकवि बैरागी आज कवियों के गगन मण्डल में एक निहायत चमकते सितारे हैं। आपको अखिल भारतीय प्रसिद्धि प्राप्त है। जिस अ. भा. कवि सम्मेलन में बालकवि न हो, फीका सा दिखता है। श्रोतागण बालकवि को सुनने के बार-बार इच्छुक रहते हैं। आजकल बालकवि कवियों की सबसे अग्रिम पंक्ति में हैं।

उनकी सेवादल के गीतों की किताब ‘गौरव गीत’ का निश्चय ही सर्वत्र स्वागत होगा और सेवादल के हर सेवक-सेविका इसकी प्रतियाँ अपनाकर गौरव का अनुभव करेंगे।

‘परवाना’,
सूचना अधिकारी, काँग्रेस सेवादल
7, जन्तर मन्तर रोड़, दिल्ली

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भूमिका

अपनी लौह लेखनी से राष्ट्र की एकता और प्रगति के चरण पखार कर जन-जन के मन में राष्ट्रीय जागरण का उद्घोष करने वाले राष्ट्रीय कवि बालकवि बैरागी का कविता संग्रह ‘गौरव गीत’ इस देश के राष्ट्र भक्तों के लिए प्रेरणादायी अमूल्य थाती होगा।

‘गौरव गीत’ में उन्हीं रचनाओं का समावेश है जो राष्ट्र की वेदी पर बलि जाने वाले लौह लाड़लों का मार्ग दर्शन करती हे।

वे ‘गौरव गीत’ के माध्यम से राष्ट्र के गौरव को अक्षुण्ण रखेंगे।

इन्हीं शुभ-कामनाओं के साथ।

श्यामसुन्दर नारायण मुश्रान
अध्यक्ष, मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी,
भोपाल दिनांक 17-7-66

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मेरा पृष्ठ

मेरे गीतों का एक और संग्रह ‘गौरव गीत’ आपके हाथों में है। यह प्रकाशित नहीं भी होता तो किसी का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं था। न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। निश्चित ही ये गीत मैंने समय-समय पर काँग्रेस सेवादल के लिये लिखे हैं। भारत भर में लाखों स्वयं सेवक इन गीतों को गाते हैं और इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में भी इनका प्रकाशन हो चुका है। लेकिन सेवादल के मेरे साथियों का आग्रह साकार करने में मुझे कई गीत निकालकर अलग रखने पड़े हैं। जो भी गीत इसमें दे रहा हूँ वे बहु-प्रचारित हैं। साफ-साफ कहूँ कि मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। काँग्रेस संस्था और सेवादल के लिये बेशक इन गीतों का कोई महत्व नहीं हो सकता है। पर मेरे लिये तो इन गीतों का महत्व है। और चूँकि मेरे कवि को यश दिलाने वाले प्रथम सोपान के रूप में ये गीत अहमियत रखते हैं अतः इनको भी पुस्तकाकार देकर मैंने सेवादल का कर्ज चुकाने का रंच भर प्रयास किया है। मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। अब तो आप भी इस प्रकाशन के औचित्य को स्वीकार करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।

अ. भा. सेवादल के सहायक संगठक भाई साहब श्री एस. एन. सुब्बराव का मैं जितना आभार मानूँ उतना ही कम है। इन रचनाओं तथा ऐसी मेरी पचासों रचनाओं के पीछे उनकी अपार प्रेरणा रही है। म. प्र. काँग्रेस सेवादल के जी. ओ. सी. भाई श्री वृन्दावनसिंहजी तोमर का भी मैं हृदय से उपकार मानता हूँ। मेरी सफलताओं को वे अपना निजी गौरव मानते हैं। यह उनकी महानता है। सेवादल के लाख-लाख भाई-बहनों का मैं वन्दन करता हूँ जो मेरी इन रचनाओं को गाते हैं और हर बार मुझसे नई रचना माँगते हैं। उनका एहसान है कि वे इनको गाते भी हैं और खरीदते भी हैं। सही अर्थों में इन गीतों पर उनका ही अधिकार है।

म. प्र. काँग्रेस सेवादल के अध्यक्ष माननीय श्री श्यामसुन्दर नारायणजी मुश्रान ने इस संग्रह की भूमिका लिखकर इन गीतों की प्राण रक्षा की है। उनकी मुझ पर अपार कृपा रही है और वे वात्सल्य का भाव सदा-सदा मेरे प्रति रखते आये हैं। उनका मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। जिन-जिन महानुभावों ने इस संग्रह को अपनी शुभ-कामनाएँ दी हैं, मैं उनको धन्यवाद देता हूँ।

पंचशील छापेखाने के मालिक बापू दादा और मुद्रक रतन दादा तथा वहाँ के कर्मचारियों को धन्यवाद नहीं दूँगा तो बात अधूरी रह जायेगी। इनकी कृपा से ही यह संग्रह इतनी जल्दी छप सका है।

दो नाम और हैं जो इस समय मुझे लेने हैं। एक तो भाई श्री पूरन सहगल ‘मधु’ जिनकी जिद इस किताब के प्रकाशन के लिये बलवती रही है और एक है बावरी ‘छाया’ जो उसके भैया की पाँचवी पोथी देखते ही रोमांचित हो जायेगी। मेरी रचनाओं को वह सिर्फ पढ़ती ही नहीं, ममता भरे हाथों से सहलाती रहती है और मेरे लिये पूजाएँ करती रहती है। उसका ममत्वपूर्ण स्पर्श ही मेरे गीतों को वाचाल बना देता है।

सुशील ‘पिया’ ने चुरा-चुरा करके जोड़े हुए पैसे ‘गौरव गीत’ के प्रकाशन के लिये मेरे हाथ में रख दिये। इससे मुझे लगा कि पत्नी की चोरियाँ भी उपयोगी होती हैं। वह चाहती तो इन रुपयों का किनारी-गोटा खरीद सकती थी, जेवर बनवा सकती थी या उसके बेटों के लिये कपड़ा खरीद सकती थी। पर, ‘सेवादल के लिये गीतों की किताब छप रही है’ यह सुनते ही उसने अपना काला पैसा बाहर ला दिया। यह सेवादल के सिद्धान्तों और आदर्शों का ही प्रभाव है। ‘पिया’ का ‘पियापन’ अलबेला है। उसको धन्यवाद देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

आपका तो आभारी हूँ ही

बालकवि बैरागी
मनासा (म. प्र.), जिला मन्दसौर
दिनांक 15 अगस्त 1966

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छन्द

तुम्हें वतन से प्यार नहीं तो
भाई तुम इंसान नहीं।
माँ का दूध लजा कर जीये
उस सा बेईमान नहीं।


छन्द

जब तक ऊमर है, साँसे हैं
गीत वतन के गाये जा।
मानव बन कर आया है तो
मानव धर्म निभाये जा।

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अनुक्रम

1. अभिलाषा

2. सेवादल के सबल सिपाही

3. हम सिपाही सेवादल के

4. हौसला हमारा

5. आज तो गूँजेगी धरती

6. श्रम का मंगल मोहरत

7. हम भारत माँ के पूत

8. हँसते-गाते

9. आगे-आगे बढ़ रहे हैं

10. आई नई हिलोर

11. हम भारत के मतवाले हैं

12. नौजवानों आओ रे

13. नेहरू के सिपाहियों

14. चलो चलें सीमा पर मरने

15. त्यौहार है

16. यह मशाल है आजादी की

17. ज्योति जले

18. जो भी कोई साथ हमारे आयेगा

19. मत घबराओ

20. नई बेला आई रे

21. नौजवान आ गये सारे जहान के

22. विविध भारती

23. असन्तुष्ट काँग्रेसियों से

24. यह प्यारा दिन

25. सेवादल के आदि पुरुष

26. सेवादल में आवो रे

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गौरव गीत’ का पहला गीत ‘अभिलाषा’ यहाँ पढ़िए


मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी। 

‘दरद दीवानी’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।



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