बालकवि बैरागी - वह सब-कुछ विस्तार से, जो हर कोई जानना चाहता है



डॉ. राजेन्द्र जोशी

(दादा के साक्षात्कारों पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। किन्तु अचानक ही ऐसा हुआ कि दादा के, एक के बाद एक, पाँच साक्षात्कार मेरे सामने आ गए। तब मैंने तय किया कि इन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इन साक्षात्कारों को प्रकाशन हेतु तैयार करते-करते मुझे दो साक्षात्कार और मिल गए। अब, जब साक्षात्कार प्रकाशन का यह क्रम शुरु कर रहा हूँ तब कुल सात साक्षात्कार मेरे सामने हैं। इन साक्षाकारों को सार्वजनिक करने का मेरा एक ही उद्देश्य है - दादा से जुड़ी अधिकाधिक सामग्री नेट’ के जरिये सार्वजनिक हो ताकि पहली बात तो यह कि दादा के बारे में जानने के जिज्ञासुओं को अधिकाधिक सामग्री एक स्थान पर मिल जाए और दूसरी बात यह कि ‘नेट’ पर उपलब्धता इन्हें स्थायित्व प्रदान करेगी। इन साक्षात्कारों की साहित्यिक उपयोगिता, उपादेयता मेरे विचार में बिलकुल नहीं रही है। वह, आप, पाठक ही तय कीजिएगा। यह साक्षात्‍कार आमने-सामने लिया गया था।- विष्णु बैरागी।)



जन्‍म के समय आपके परिवार का परिदृश्य क्या और कैसा था?

मेरे जन्म के समय मेरा परिवार अत्यन्त गरीब और विपन्न स्थिति में था। निर्धन, गरीब और विपन्न शब्द भी छोटे पड़ते थे। मेरे पिता जन्म से ही विकलांग और लाचार थे। वे गर्भ से ही अपने दोनों पाँवों और दाहिने हाथ से विकलांग हो चुके थे।

परिवार का पारम्परिक व्यवसाय क्या था?

परिवार का पारम्परिक व्यवसाय था मन्दिर में पूजा और भिक्षावृत्ति।

परिवार में आपका लालन-पालन कैसे हुआ?

मेरा लालन-पालन भिक्षान्न पर हुआ। जब मैं मात्र साढ़े चार वर्ष का था, तब मेरी माँ ने मुझे जो पहला खिलौना खेलने के लिए दिया, वह था भीख माँगने का बर्तन। इससे आप अनुमान लगा लें कि ‘लालन-पालन’ शब्द मुझे कैसे लगते रहे होंगे।

आप कितने भाई-बहन हैं। इनमें आप किस क्रम में आते हैं?

हम कुल 12 भाई-बहन पैदा हुए। मैं सबसे बड़ा (जेठा) हूँ। हम दो भाई और दो बहनें इस समय जीवित हैं। मेरे भाई-बहन कुपोषण और अकाल मृत्यु से मरे। उपचार का सवाल ही नहीं था। मैंने खुद कई जगह कहा और लिखा है कि ‘गरीब के घर में बच्चा पैदा नहीं होता-हमेशा बूढ़ा जनम लेता है।’ मैं भी वही हूँ।

शिक्षा, दीक्षा कहाँ कैसे और कितनी हुई?

शिक्षा मेरी बहुत कठिनाई से हुई। मेरा पितृनगर मनासा होल्कर राजाओं का नगर था। एक मामूली कस्बा। स्कूल वहाँ केवल 7वीं तक था। वर्नाक्यूलर फाइनल कहा जाता था। 7वीं की परीक्षा देने इन्दौर जाना पड़ता था, मनासा से 280 कि.मी. दूर। मैंने 7वीं वहीं से पास की। भीख से भाड़ा इकट्ठा करके मैं इन्दौर गया 1944 में।

हाईस्कूल तक शिक्षा मैंने ननिहाल रामपुरा में 1944 से 1947 तक पूरी की। रामपुरा मेरा जन्मस्थान-नगर है। मनासा से 32 कि.मी. दूर। यहीं से मैंने बमुश्किल मैट्रिक (10वीं) पास की। परीक्षा देने इन्दौर-होल्करों की राजधानी जाना होता था। भिक्षावृत्ति एकमात्र सहारा था। रामपुरा-मनासा की दूरी प्रायः पैदल तय करता था। मनासा में परिवार के लिए और रामपुरा में खुद के लिए भीख माँगता था। भीख में आटा, रोटी, कपड़े, कापियाँ, पुस्तकें, कलमें, सब माँगना पड़ता था।

पूरे 12 वर्ष बाद 1959 में मैंने प्राइवेट स्तर पर इण्टरमीडिएट पास किया। फिर मन्दसौर कॉलेज से सन् 1961 में बी.ए. किया। एक वर्ष का फिर अन्तराल लेना पड़ा।

सन् 964 में उज्जैन माधव महाविद्यालय से (विक्रम विश्वविद्यालय) हिन्दी में एम. ए. (प्रथम श्रेणी) किया।

मेरी शिक्षा पर आप सौ-दो सौ पृष्ठ आराम से लिख सकते हैं। पारिवारिक संघर्ष और सस्याओं से जूझना तथा अपना जीवन चलाना, सैंकड़ों पृष्ठों का मामला है। मुझे ‘शिक्षा’ तो मिली पर ‘दीक्षा’ आज तक नहीं मिली।किसी भी दीक्षान्त समारोह में शामिल नहीं हुआ।

गीत, कविता लिखने और मंचों से पढ़ने के प्रति कब से रुझान बढ़ा?

मेरे माता-पिता अच्छे गायक थे। घर में संगीत का वातावरण था। पिताजी छोटी सारंगी (चिकारा) अच्छा बजाते थे। माँ के पास लोकगीत और सन्त गीत थे। सारा घर सुर में था। मैं कभी पिताजी और माँ के साथ गाया करता था। स्कूल के मंचों पर तो मैं चौथी-पाँचवीं कक्षा से ही आ चुका था। अपनी पहली कविता ‘भाई सभी करो व्यायाम’ अपनी चौथी क्लास में, 9 वर्ष की आयु में ही लिखकर अन्तर्कक्षा प्रतियोगिता में मैं अपनी कक्षा का प्रतिभागी प्रतिनिधि बना। चूँकि यह ‘भाषण प्रतियोगिता’ थी, सो तकनीकी तौर पर मेरी कक्षा हार गई, पर मुझे कविता के कारण पहला पुरस्कार मिल गया था। यह सन् 1940 या 41 का वर्ष था।

किन-किन महान कवियों, लेखकों, चिन्तकों, विचारकों और महान् विभूतियों के सम्पर्क में आने का मौका मिला?

यह सूची बहुत लम्बी और अनन्त है। आज तक सतत् है। मेरे पद्य या कि कविता पर तीन महाकवियों का सीधा प्रभाव है। पूज्य श्री स्व. पं. भवानी प्रसादजी मिश्र (मन्ना), पूज्यश्री स्व. राष्ट्रकवि रामधारी सिंहजी ‘दिनकर’ और पूज्य स्व. श्री डा. शिवमंगल सिंहजी ‘सुमन’। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। वैसे ही मेरे गद्य के शिल्पी हैं स्व. डॉ. श्री धर्मवीरजी भारती, स्व. डॉ. श्री महावीरजी अधिकारी, स्व. श्री राहुल बारपुते, स्व. श्री राजेन्द्र माथुर जैसे महान पत्रकार हैं। मैं वैसे अपने गद्य के मामले में सम्पादकाचार्य पं. श्री कन्हैयालालजी मिश्र ‘प्रभाकर’ (स्वर्गीय) का सीधा ‘एकलव्य’ हूँ।

राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कब और कैसे हुआ?

सन् 1945 में मेरे जन्म नगर रामपुरा में इन्दौर राज्य प्रजा मण्डल का प्रान्तीय अधिवेशन था। मैं 8वीं पास कर चुका था। 9वीं का विद्यार्थी था। इन्दौर के सुप्रसिद्ध कवि गीतकार, स्वतन्त्रता सेनानी श्री नरेन्द्र सिंहजी तोमर (ईश्वर की कृपा से वे अब भी स्वस्थ-प्रसन्न हमारे बीच में हैं) इस सम्मेलन में आने वाले थे, पर किसी कारणवश वे नहीं पधार सके। बस! श्री माणकलालजी अग्रवाल, श्री स्व. रामलालजी पोखरना, स्व. हकीम अब्बास अली जी, स्व. श्री लक्ष्मणसिंह जी चौहान जैसे बड़े सेनानियों ने रामपुरा के अधिवेशन स्थल ‘छोटे तालाब’ में तोमरजी की भूमिका मुझे सौंप दी। उस दिन कांग्रेस में मेरा सीधा प्रवेश हुआ। तब से आज तक मैं अटल, अडिग, अविचल, अनवरत, तिरंगा थामे अपना समर्पित जीवन जी रहा हूँ।

सर्वप्रथम 1967 के निर्वाचन में मनासा विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवारी के लिए क्या आपने आवेदन दिया था?

नहीं। मैंने कोई आवेदन नहीं किया था।

काँग्रेस पार्टी ने मनासा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से आपको जनसंघ के कद्दावर नेता श्री सुन्दरलाल पटवा के विरुद्ध अपना उम्मीदवार बनाया। पार्टी ने आपमें ऐसी कौन-सी खूबी देखी, जिसके कारण आपको इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया?

अपनी आयु के 14वें वर्ष से ही मैं कांग्रेस में सक्रिय रहा हूँ। सन् 1945 से मैं पार्टी में निष्ठा, ईमानदारी, कर्मठता, मेहनती और कर्त्तव्यपरायण कार्यकर्ता के रूप में प्रतिबद्धता से जुड़ा हूँ। सन् 1967 के निर्वाचन में पार्टी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता की वजह से ही शायद मुझे इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए उपयुक्त समझा गया हो। मेरे राजनीतिक जीवन के निर्माताओं के आशीष का ही मैं इसे प्रतिफल मानता हूँ।

राजनीति में निरन्तर मिल रही कामयाबी और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर मिली संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में आपको कैसा महसूस हुआ?

राजनीतिक जीवन में मिली जिम्मेदारियों को मैंने देशसेवा और जनसेवा के लिए एक स्वर्ण अवसर माना। तत्कालीन मुख्यमन्त्री पण्डित द्वारिका प्रसादजी मिश्र ने तो मुझे अपना संसदीय सचिव बनाया। पण्डित श्यामाचरण शुक्ल ने मुझे अपने मन्त्रि मण्डल में राज्य मन्त्री बनाकर सूचना-प्रकाशन और भाषा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। श्री अर्जुन सिंह ने मुझे सन् 1980 में अपने मन्त्रि मण्डल में राज्य मन्त्री के रूप में शामिल किया। तब मैंने खाद्य विभाग और लोक निर्माण विभाग की जिम्मेदारी सम्हाली थी। बाद में मैं लोकसभा और उसके बाद राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुआ। इन सभी पदों पर मैंने बड़ी ही लगन और दिलचस्पी के साथ अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया। इन पदों पर मुझे सेवा के जो अवसर मिले, उनसे मुझे बहुत सन्तोष मिला।

राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में आप समान रूप से निरन्तर कामयाबी की मंजिल की ओर अग्रसर रहे । आपकी राजनीतिक यात्रा कब से शुरु हुई और आज तक के इस मुकाम पर आते-आते किन-किन पड़ावों से आपको गुजरना पड़ा?

सन् 1945 से ही कांग्रेस में सक्रिय रहा। उम्र और परिवार के संघर्ष आड़े आ गए। दुर्भाग्य से स्वतन्त्रता संग्राम का सिपाही नहीं बन सका। सन् 1967-1972 में मध्य प्रदेश विधानसभा में मनासा क्षेत्र से कांग्रेस का विधायक। फिर संसदीय सचिव, फिर सदस्य प्रतिपक्ष, फिर राज्य मन्त्री। तब मध्य प्रदेश के मुख्य मन्त्री पं. श्री द्वारिका प्रसादजी मिश्र और पं. श्री श्यामाचरणजी शुक्ल थे।

सन् 1980-1984 में मध्य प्रदेश की विधानसभा में मनासा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस का विधायक रहा। सन् 1981 के जून तक राज्य मन्त्री रहा। तब म. प्र. के मुख्य मन्त्री श्री अर्जुन सिंहजी थे। सन् 1984-1989 तक मध्य प्रदेश के मन्दसौर-जावरा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा। जीता। भारत के प्रधान मन्त्री स्व. श्री राजीव गाँधी थे। मैं कांग्रेस के टिकट पर ही लड़ा और जीता। सन् 1989 में कांग्रेस टिकट पर मन्दसौर जावरा सीट का लोकसभा चुनाव लड़ा। हार गया। सन् 1993 में मध्य प्रदेश की विधानसभा का चुनाव कांग्रेस टिकट पर नीमच क्षेत्र से लड़ा और केवल 66 वोटों से हार गया। सन् 1998 जून से सन् 2004 जून तक मध्य प्रदेश की ओर से कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा का चुनाव लड़ा और निर्विरोध जीता। पूरे 6 वर्ष ससम्मान राज्यसभा सदस्य रहा। तब दो प्रधान मन्त्री देखे (1) पं. श्री अटल बिहारी वाजपेयी और (2) सरदार श्री मनमोहन सिंहजी। मुझ पर दलबदल का कलंक कभी नहीं लगा। मैं कभी नहीं बिका। विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में मेरी उपस्थिति 99 प्रतिशत रही। विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में उत्तेजक से उत्तेजक क्षणों में भी कभी मैं अध्यक्ष की आसन्दी के सामने गर्भगृह में नहीं गया। अपनी सीट कभी नहीं छोड़ी। सदनों का अनुशासन और मर्यादा कभी नहीं तोड़ी।

माता-पिता ने आपको जीवन के किस क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखा था। उनके जीवन का आप पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ा?

एक अत्यन्त विपन्न और गरीब, भिक्षान्न पर पलने वाले संघर्षरत परिवार में मुझे प्रभु ने जन्म दिया।  मात्र साढ़े चार वर्ष की उम्र में माँ ने मुझे जो पहला खिलौना थमाया, वह था ‘भिक्षा-पात्र’। यह भिक्षा-पात्र घनघोर संघर्षों के बाद छूटा। मेरा सारा शिक्षण भीख से ही पूरा हुआ। मैं माँ का निर्माण हूँ। सन् 1952 से ही मैं खादीधारी हूँ। अपने अतीत को भूल नहीं जाऊँ, इसलिए आज भी मैं कपड़े माँग कर पहनता हूँ।

आप क्या किसी धार्मिक, साम्प्रदायिक या जाति विशेष के नेता के रूप में जाने जाते हैं?

इस तरह का सवाल मुझ जैसे व्यक्ति के लिए कोई मानी नहीं रखता है। साहित्य मेरा धर्म और राजनीति मेरा कर्म है। मैं मूलतः आस्थावान व्यक्ति हूँ। धर्म निरपेक्षता का अनुयायी हूँ। मैं सिर्फ साधारण से साधारण एक इंसान हूँ और इसी रूप में अपनी पहचान कायम रखना चाहता हूँ।

कहा जाता है राजनीति में दुश्मनों की और साहित्य में ईर्ष्यालुओं की संख्या जितनी ज्यादा होती है, व्यक्ति उतना  ही अपने क्षेत्र में कामयाब माना जाता है। आपकी टिप्पणी ?

मैंने तो कभी किसी को दुश्मनी या ईर्ष्या की नजर से नहीं देखा। हाँ, यदि देखने वालों को ऐसा लग रहा हो, तो मुझे कुछ नहीं कहना। मैं तो सभी तरह के लोगों के बीच प्रसन्नतापूर्वक जीना सीख गया हूँ।

प्रत्येक कामयाब व्यक्ति के पीछे कोई न कोई होता है या कुछ ऐसे महान् पुरुष होते हैं, जिनसे उसे सदैव प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलता रहता है। क्या आपका जीवन भी किसी महान व्यक्ति से प्रभावित है?

राजनीति में मेरे प्रेरक हैं-राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, श्री लाल बहादुर शास्त्री, मौलाना आजाद, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, श्रीमती इन्दिरा गाँधी, श्री जगजीवरामजी, श्री राजीव गाँधी, श्रीमती सोनिया गाँधी, श्री एस.एन. सुब्बाराव आदि। तिरंगा ध्वज भी मेरी प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है।

क्या आपने साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में कोई शिष्य या पट्ठा तैयार किया है? क्या आपके आसपास भी चाटुकारों का जमघट लगा रहता है?

गुरुडम थोपने जैसे विकार से मैं काफी दूर हूँ। जो मुझसे जुड़ते चले गए और जो मुझे प्रेम, आदर, स्नेह और सम्मान देते हैं, वे मेरे भाई की तरह हैं। आयु और अनुभव में कई मुझसे उन्नीस-बीस हो सकते हैं, किन्तु उनसे मेरा नाता गुरु-शिष्य का नहीं, बल्कि भाइयों जैसा ही है। झूठी प्रशंसा कर अपना उल्लू सीधा करनेवाले लोग मुझसे नहीं जुड़ पाते हैं। ऐसे लोगों का जमघट लगाने का मुझे कोई शौक भी नहीं है।

क्या आपने कभी थकावट महसूस की है या कोई ऐसा दिन आया है, जब आपने फुरसत में हाथ पर हाथ धरकर गुजारा हो?

मेरी अपनी एक दिनचर्या है। उम्र तीन चौथाई शतक पार कर चुकी है। थकता वह है, जिसमें ईर्ष्या, राग-द्वेष, निराशा, आलस्य और उदासीनता के भाव हों। मैंने अपने जीवन में सक्रियता को अपना लिया है। फुरसत से बैठना तो मैं सोच ही नहीं सकता।

हर्ष और विषाद की घड़ियों के अनुभव भी जीवन में आए होंगे?

न तो हर्ष की घड़ियों में कभी इतराता हूँ और न ही विषाद की घड़ियों में टूटता हूँ। खुशी और गम के पलों को जीवन की अनिवार्यता मानकर ‘इंज्वाय’ करता हूँ।

आपका पारिवारिक परिदृश्य क्या है? क्या आप अपने परिवारजनों और सन्तान पक्ष से मिल रहे व्यवहार से सन्तुष्ट हैं?

मैं अपने आपको बहुत खुशनसीब और सुखी मानता हूँ। माता-पिता के स्नेह के साथ ही धर्मपत्नी, भाई-बहन, पुत्रों और तीसरी पीढ़ी के सदस्यों से मिल रहे आत्मीय व्यवहार पर मैं गर्व करता हूँ। सन्तानपक्ष की तरफ से मैं निश्चिन्त हूँ और तनावरहित जीवन गुजार रहा हूँ। मेरा पारिवारिक परिदृश्य इस तरह से है-

मेरी पत्नी हैं सौ. सुशील चन्द्रिका बैरागी, जिसके साथ मेरा विवाह दिनांक 7 मई, 954 को सम्पन्न हुआ। बड़ा पुत्र है सुशील नन्दन बैरागी (मन्ना बैरागी)। पुत्र वधू है-सौ. कृष्णकान्ता बैरागी (उज्जैन)। पोती रौनक बैरागी-उसकी शिक्षा है बी.एस. सी./एम. ए. (लोक प्रशासन) प्रथम श्रेणी, गोल्ड मेडलिस्ट, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, नेट परीक्षा उत्तीर्ण। (राजस्थान प्रशासन सेवा की परीक्षा भी उसने पास की है)। विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से विनिवेश विषय में पी.एच.डी. हासिल की है। पोता है-नमन बैरागी, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से बी. ई. पास किया है। वर्तमान में एच. एस. बी. सी. मल्टीनेशनल कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और फिलहाल अमेरिका में बफेलो में पदस्थ। मेरा दूसरा बेटा है-सुशील वन्दन बैरागी (गोर्की बैरागी) और पुत्रवधू का नाम है श्रीमती नीरजा (सक्सेना) भोपाल। उसकी दो बेटियाँ (मेरी पोतियॉं) हैं -बड़ी बेटी-कुमारी अभिसार बैरागी, जो कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता में एल. एल. बी. (कानून) की प्रथम वर्ष की छात्रा है और दूसरी-कुमारी अनमोल बैरागी-भोपाल में अध्ययनरत है।

सन्तान पक्ष से मिले कोई सकारात्मक या नकारात्मक अनुभव? क्या आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ अन्य राजनेताओं की तरह कोई भौतिक या आर्थिक सम्पदा बना ली है?

मैं पूर्व में ही बता चुका हूँ कि सन्तानपक्ष से मुझे सुख और निश्चिन्तता दोनों मिले हैं। मैं इस कथन पर विश्वास रखता हूँ-‘पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय।’

अब आप वानप्रस्थ आश्रम की परिधि में हैं? कैसा अनुभव कर रहे हैं?

उत्तर - (इस सवाल पर ठहाका लगाते हुए) अच्छा सवाल किया है तुमने राजेन्द्र। मेरे जीवन के इस कटु सत्य को तुम अच्छी तरह समझते हो। मैं बालकवि के रूप में जाना जाता हूँ। बैरागी खानदान में पैदा हुआ हूँ, इसलिए मेरे गोत्र में बैराग्य की झलक मिलती है। जिस व्यक्ति ने बचपन में, बाल्यकाल न भोगकर यौवन की जिम्मेदारियाँ और बुढ़ापे की शालीनता को भोगा है, उसे यदि उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते बैरागी या बाल यानी कि बच्चा बने रहने का सम्बोधन मिलता है, तो अपने जीवन की इसे मैं एक उपलब्धि मानता हूँ। मैं किसी भी उम्र से गुजरा, मैं ‘बालकवि’ ही रहा और मैं किसी भी आश्रम से गुजरा ‘बैरागी’ ही रहा। प्रत्येक आश्रम की अपनी-अपनी मस्ती है, मौज है। मैं कल भी मजे में था, आज भी मजे में हूँ।

माता-पिता ने नन्दराम दास नाम रखा था। ये ‘बालकवि’ सम्बोधन कब से और कैसे पड़ गया?

सन् 1951 (नवम्बर) में मनासा की एक आमसभा में तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री डा. कैलाशनाथजी काटजू ने नन्दराम दास बैरागी की कविताएँ सुनकर उसे बालकवि बैरागी नाम दे दिया और तभी से मैं इस नाम से छा गया हूँ।

साहित्य क्षेत्र में, विशेषकर लोक-भाषा और लोक-साहित्य के क्षेत्र में आपका विशेष योगदान है। अपने रचना संसार पर कुछ कहना चाहेंगे? 

मेरा रचना संसार इस प्रकर है -नौ वर्ष की आयु में पहली कविता लिखी। तब मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। मूलतः मालवी बोली से कविता लेखन शुरु तथा मालवी के वरिष्ठ कवियों में प्रमुख। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के स्नातक कोर्स (फाइनल) में मालवी की मेरी छह कविताएँ शामिल। सन् 1953 से आज तक देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में सतत्, निरन्तर आमन्त्रित। लाल किले के कवि सम्मेलन में प्रमुख कवियों में शामिल। आकाशवाणी, दूरदर्शन और अन्य प्रसार चेनलों पर सतत् प्रसारित। देश की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित। छोटी-बड़ी 25-26 फिल्मों के लिए गीत-लेखन।

अब तक आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं?

मेरी कई पुस्तके हैं, जो गद्य और पद्य में छपकर आई हैं। उनमें कविता संग्रह हैं-दरद-दीवानी, जूझ रहा है हिन्दुस्तान, ललकार, भावी रक्षक देश के, दो टूक, रेत के रिश्ते, वंशज का वक्तव्य, कोई तो समझे, ओ! अमलतास, आओ बच्चो, गाओ बच्चो, गौरव गीत, दादी का कर्ज, शीलवती आग, आलोक का अट्टहास, (सूरीनाम विश्व हिन्दी सम्मेलन -2008 में वहाँ के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा लोकार्पित), मैं उपस्थित हूँ यहाँ, मन ही मन, गीत लहर, गीत बहार, सिण्ड्रैला (काव्यानुवाद), गुलिवर (काव्यानुवाद)। मालवी गीत संग्रह हैं-चटक म्हारा चम्पा, अई जावो मैदान में । गद्य में ये पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं-उपन्यास-सरपंच (सहयोगी उपन्यास लेखन) यात्रा वर्णन-कच्छ का पदयात्री, बर्लिन से बब्बू का। कहानी संग्रह-मनुहार भाभी, बिजूका बाबू। विशेष प्रकाशित-बैरागी की डायरी।

देश के प्रायः प्रत्येक राज्य के विभिन्न नगरों और गाँवों में आपने राजनीतिक और साहित्यिक यात्राएँ की हैं। क्या कभी आपने विदेशों की भी यात्राएँ की हैं?

राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों को अकसर विदेश यात्राओं के अवसर मिलते रहे हैं। सांसद होने के नाते विभिन्न समितियों के माध्यम से और साहित्यिक आयोजनों में एक रचनाकार होने के नाते मुझे भी विदेश-भ्रमण के अवसर मिलते रहे हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लेने के अलावा विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में भी मुझे विदेशों में आमन्त्रित किया जाता रहा है। मैंने अब तक निम्न देशों की यात्राएँ कर ली हैं-(1) अमेरिका (2) इंग्लैण्ड (3) मारीशस (दो बार) (4 जर्मनी (5) श्रीलंका (6) नेपाल (7) कम्बोडिया (8) सूरीनाम (9) म्यांमार (10) सेशल्स (11) बैंकाक (12) हालैंड-नीदरलैण्ड।

अवसरों, परिस्थितियों और व्यवस्थाओं के अनुरूप शब्द और वाक्यों का उपयोग करना भी आपके कला-कौशल की विशेषता है। कांग्रेस के एक क्षमतावान, ऊर्जावान और जागरूक जननेता श्री दिग्विजय सिंह के नाम का संक्षिप्तिकरण ‘दिग्गी राजा’ सम्बोधन भी आपके ही मस्तिष्क की उपज है। इसी तरह आपने समय-समय पर देश को बहुत सारे नारे भी दिए हैं, जो सहज ही लोगों के मन, मस्तिष्क और जुबान पर छाए हुए हैं। उनमें से कुछ नारों का कृपया जिक्र करें?

हम दो हमारे दो (सन् 1969-1970 में दिया, जब मैं मध्य प्रदेश की सरकार का सूचना राज्य मन्त्री था।)।

आजादी की पहरेदारी-नए खून की जिम्मेदारी (दिल्ली के रामलीला मैदान में पं. श्री जवाहरलालजी नेहरू ने देश को सौंपा)।

अंकुर को आकाश दो (बच्चों को विकास के अवसर दीजिए)।

खेत सुखी खलिहान सुखी-तो सारा हिन्दुस्तान सुखी।

हरियाली मर गई अगर तो खुशहाली मर जाएगी।

तन-मन-धन: सबसे ऊपर वन।

न मेरा न तुम्हारा-भारत सबका, हमारा।

केरल से कारगिल घाटी तक-गौहाटी से चौपाटी तक-सारा देश हमारा।

इन नारों के साथ ही आपने कुछ प्रेरक सूत्र भी दिए हैं जो देशभर में फैले हुए हैं। वे कौन-कौन से हैं?

मेरे कुछ सूत्र वाक्य इस तरह से हैं-

जो तना अपनी कोंपल का स्वागत नहीं करता, वह ठूँठ हो जाता है।

कोई भी नदी एक किनारे की नहीं होती। लोकतन्त्र भी दो किनारों के बीच बहता दरिया है। एक है पक्ष, दूसरा है प्रतिपक्ष। किनारे टूटे नहीं। दरिया प्रदूषित नहीं हो, यह हमारी जिम्मेदारी है।

जो लोकतन्त्र असहमति का सम्मान नहीं करता, वह चरित्रहीन हो जाता है।

आपके हितैषी हजार हो सकते हैं, पर मित्र दो-चार भी नहीं।

आइए! हम इस बात पर सहमत हो जाएँ कि हम सब एक दूसरे से असहमत हैं।

अभाव से अच्छा और सद्भाव से सच्चा कोई मित्र नहीं होता।

कड़वाहट, झल्लाहट और बौखलाहट से लोकतन्त्र नहीं चलता।

निराशा के बीज बोकर आप आशा की फसल नहीं काट सकते।

जो आलोचना नहीं सह पाता, वह सत्ता में नहीं रह पाता।

भारत धार्मिक लोगों का देश है, धर्मान्ध लोगों का नहीं।

सबकी सुनो और सही रास्ता चुनो।

भारत की राजनीति में वे ही आएँ, जिनका दिल, दिमाग और दरवाजा खुला हो और बड़ा हो।

परिश्रम, पसीना और पुरुषार्थ कभी पराजित नहीं होते।

सारे संसार के गटर मिलकर भी एक गंगा नहीं बना सकते। गटर करोड़ों हैं, गंगा अकेली।

उन पीढ़ियों को नकार देता है इतिहास, जिनमें नहीं होता आत्मविश्वास।

जीवन वह नहीं है जो तुम जीते हो। जीवन वह है, जो तुम जीना चाहते हो।

आरतियों और उत्सवों में जलते हुए दीये काम आते हैं। बुझे दीये नहीं।

हिन्दी यहीं थी, यहीं है और यहीं रहेगी। भारत से जब भी जाएगी,अंग्रेजी ही जाएगी।

बैरागीजी! आपने एक कवि और लेखक के रूप में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। मंच पर गीत पढ़ने और पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होने पर आपको प्रशंसकों से खूब वाहवाही मिली है। आप अपनी साहित्यिक उपलब्धियों पर सम्मानित भी होते रहे हैं। सम्मानों के बारे में कुछ बताएँगे?

यूँ तो सैकड़ों सम्मान और मान-पत्र मिले हैं, किन्तु कुछ ही का उल्लेख कर रहा हूँ। सभी सम्मानों, पुरुस्कारों और अभिनन्दनों का विवरण देना कठिन है-

- आचार्य तुलसी सम्मान (अखिल भारतीय) पुरुस्कार।
- श्री नेमीचन्द्र श्रीश्रीमाल सम्मान-पुरुस्कार, रायपुर (छत्तीसगढ़)।
- श्री झाबरमल शर्मा परुरस्कार (अखिल भारतीय)।
- अक्षर आदित्य सम्मान-मध्यप्रदेश।
- साहित्य महोपाध्याय सम्मान-साहित्य सम्मान (प्रयाग)।
- परम विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान-द्वितीय हिन्दी भाषा कुम्भ बैंगलूर (कर्नाटक)। (मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद एवं अखिल कर्नाटक हिन्दी अकादमी द्वारा)
- वैष्णव विभूति सम्मान।
- वैष्णव समाज रत्न सम्मान
- वैष्णव शिरोमणि सम्मान
- बन्दा बैरागी सम्मान-अखिल भारतीय पंजाब बैरागी महासभा द्वारा।
- खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती सम्मान-हिन्दी साहित्य और नव रचना हेतु (कल्याण-ठाणे-महाराष्ट्र द्वारा)।
-श्रीमती राधादेवी मालोटिया सम्मान-पुरुस्कार (अखिल भारतीय) कोलकाता द्वारा।
- श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ शैली सम्मान-पुरुस्कार (अखिल भारतीय) सहारनपुर (उ.प्र.)।

मन्त्री, सांसद और विधायक के रूप में तो आपने अपने दायित्वों का निर्वहन बड़ी ही कुशलता और सफलता से किया है। इन दायित्वों केअलावा भी क्या राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आपको दायित्व मिलते रहे हैं?

कई राजनीतिक और शासकीय समितियों में मुझे शामिल किया जाता रहा है। इन समितियों में रहकर मैंने देशव्यापी भ्रमण किया है। कुछदायित्वों का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहता हूँ-
- भारत सरकार की केन्द्रीय समिति का सदस्य (अध्यक्ष, प्रधानमन्त्री)।
- केन्द्रीय पोत परिवहन मन्त्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य।
- भारत सरकार के कार्मिक एवं पेंशन मन्त्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य।
- हिन्दी को राष्ट्रसंघ में स्थान दिलाने हेतु प्रयत्नशील भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय की समिति का सदस्य।
- श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति-इन्दौर (म. प्र.) का उपाध्यक्ष।

भाषा और साहित्य में राष्ट्रीय स्तर पर आपके योगदान के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपको कुछ दायित्व मिले हैं?

मुझे अन्तरारष्ट्रीय विश्व हिन्दी परिषद्, मारीशस के शासी निकाय में भारत सरकार द्वारा सदस्य नामित किया है। देशव्यापी भ्रमण भी मैंने खूब किए हैं-

संसद सदस्य के रूप में संचार मन्त्रालय, सूचना मन्त्रालय, मानव संसाधन विकास मन्त्रालय एवं पेट्रोलियम मन्त्रालय की स्थायी समितियों का सदस्य रहा।

संसदीय राजभाषा समिति की दूसरी और तीसरी उप समिति के सदस्य के रूप में राजभाषा के सन्दर्भ में सारे देश का कम से कम चार बार भ्रमण।
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नंदा बाबार: फकीर से वजीर,  ISBN 978.93.80458.14.4, सम्पादक - राजेन्द्र जोशी, प्रकाशक - सामयिक बुक्स, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, एन. एस. मार्ग, नई दिल्ली - 110002, मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086,  प्रथम संस्करण - 2010, मूल्य - 300.00, सर्वाधिकार - सम्पादक


अगला कड़ी में ढुराना (तहसील-(तहसील-गोहाना, जिला-सोनीपत, हरियाणा) निवासी डॉक्टर अशोक बैरागी द्वारा लिया गया साक्षात्कार। 


श्री बालकवि बैरागी के अन्‍य साक्षात्‍कार











7 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर अपूर्व जानकारियों से भरा साक्षात्कार. बालकवि बैरागी का नाम केवल एक कविता "आशीषों का आंचल भरकर.... ", जो छात्रों के पाठ्यक्रम में थी, के कारण ही जाना था. आज यह संस्मरण पढ़कर जो कुछ जाना है हृदय श्रद्धा से भर गया. बहुत सराहनीय कार्य है यह प्रस्तुति.

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    1. आपकी टिप्‍पणी आज, अभी ही देखी। साक्षात्‍कार को विस्‍तारित करने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। बडी कृपा है आपकी। विलम्बित उत्‍तर के लिए क्षमा कर दीजिएगा। (यहटिप्‍पणी मैंने 8 दिसम्‍बर को लिखी थी। पतानहीं, किसी दूसरी जगह कैसे पोस्‍ट हो गई।)

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  2. बालकवि बैरागी जी का बहुत सुन्दर साक्षात्कार शेयर करने हेतु धन्यवाद ।

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    1. ब्‍लॉग पर आनके लिए तथा टिप्‍पणी करने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  3. आदरनीय सर,बैरागी कवि से परिचय विविध भारती पर उनके साक्षात्कार से हुआ था, जो कि उन दिनों मैं बहुत सुनती थी।आपके ब्लॉग पर यदा -कदा आती रही हूँ।रामलीला पर लिखे आपके लेख से आपके ब्लॉग से परिचय हुआ।बालकवि जी के साक्षात्कार से उनके जीवन के कई पहलुओं से परिचय हुआ।कोटि कोटि धन्यवाद और प्रणाम।बालकवि जी की पुण्य स्मृति को सादर नमन।! निष्ठापूर्वक सहोदर धर्म निभाने के लिए एक बार फिर से आपका
    आभार 🙏🙏

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  4. शायद कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी चली गई हैं 🙏🙏

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