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जागो दादा



श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की चौबीसवीं/अन्तिम कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



जागो दादा

जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ
मालवा में दन उगीग्यो, रात की बीती घड़्याँ

चाँद-तारा डूबी ग्या है, रामजी को नाम लो
चकवी चाली घर पिया के, हाल तक थी काँ पड़्या
जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ

पाँगती मत फेर वेंडा, जाग ने सब ने जगा
न्हीं तो थारी रोर वेगा, दाँत काड़े डावड़्याँ
जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ

हाथ में लो दाँतरो ने, काँधे मेऽलो पावड़ो
अन्नदाता थारा बारक ने, मिले न्ही राबड़्याँ
जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ

पेट डाबी, फाटी जाबी, भाभी के न्हीं काँचरी
आलसी मेलाँ में होवे, थारे वाते झूँपड़्याँं
जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ

मालवी! उठ, लो पखावज, और उगेरो भैरवी
वावरा थाँ रामजी ने, जग जगावा ने घड़्या
जागो दादा भाग फाटी, बोलवा लागी चड़्याँ
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।

मेहनत करवा वारा मरदाँ

  


श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की तेईसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



मेहनत करवा वारा मरदाँ

मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो, उतरो गहरा ज्ञान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में

एक जुद्ध जीतीग्या रे जोद्धा, मचक गुलामी देईगी
(पण) दारीद्दर का भर्या टोबला, व्हा लारे न्हीं लेईगी
(तो) हिम्मत की तरवाराँ रे मरदाँ, मती मेलो थी म्यान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकरयाँ जइर्यो

जूनी नाव जुगत जोड़ी ने, भम्मर में ती काड़ी
थाँ के हाथ में डाँड देई ने, पोढ़ीग्यो खेलाड़ी
नाव फसी न्हीं जारे रे नावड़्या, फेर पाछी तूफान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

जद-जद माँ की आँखाँ छलकी, थाँ ने शीश कटाया
महूँ मानू हूँ म्हारी माँ बेनाँ ने, कुल का रतन लुटाया
पण चार चँदरमाँ और लगई लो, देई ने पसीनो दान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

गाम गोयरे कल-कल नद्दी, विफरी-विफरी वेऽईरी
थारा गाम की अनधन लछमी, चौड़े धाले जईरी
जल बिन आँसूड़ा ढारे रे घराणी, गोड़ा-गोड़ा धान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

ऊँची मेड़्याँ, टूटा छपरा, या सब प्रभु की माया
पण ऊँच-नीच, कंगाल-मातबर सब एक माँ का जाया

यूँ कई फरक करे रे वेंडा, एक जरणी का थान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो

चेतो रे बारक चेतो रे बूढ़ा, चेतो रे मोट्याराँ
ई दन पाछा न्ही आवेगा, जामण ने सिणगाराँ
श्रम का गीत गुँजाओ म्हारी बेन्याँ, खेत, खदान, अडाण में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगला मोहरत निकर्याँ जईर्यो

देव-देवरा वारा पण्डत, हुणजे रे हेलो म्हारो
ओ मज्जित का काजी-मुल्ला, मानूँगा जस थारो
नवा बोल ई जोड़ी दी जो, आरती और अजान में
मेहनत करवा वारा मरदाँ, अई जावो मैदान में
मंगल मोहरत निकर्याँ जईर्यो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।

हुणजे रे मोट्यार

 



श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की बाईसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



हुणजे रे मोट्यार

यो कूण पसीनो पूँछे
यो आलस कूण मरोड़े
यो कूण कुदाली फेंके
और काम हाथ को छोड़े

अरे हुणजे रे मोट्यार
थारा चारण की ललकार
मती फेंक थारा हाथ की कुदाली रे
अबे शुरू व्ही परीक्षा थारी रे
अरे हुणजे रे मोट्यार

अणछत्ताँ ही उठी वादरी सूरज ने निगलीगी
आँसू ही आँसू ती आखी फुलवारी हगलीगी
चाऽरी आड़ी लागी लाय
कई केऽवा में न्हीं आय
गूँगी वेईगी है वाचा बिचारी रे
अब शुरु व्ही परीक्षा थारी रे
अरे हुणजे रे मोट्यार

मन मकरायाँ खूब करीली खूब करी अणचाही रे
या ले थारा आगणियाँ में अम्मावस इतराई रे
हूझे कोनी खुद को हाथ
आखी दुनिया काड़े दाँत
छोड़ आलस की पापण खुमारी रे
अबे शुरु व्ही परीक्षा थारी रे
अरे हुणजे रे मोट्यार

धीमा पड़ न्हीं जावे घुघरा आज
नहर का नीर का
हल ती हाँचा आखर लिखजे
खेताँ को तकदीर का
आला वेईग्या माँ का गाल
थोड़ो वेगो वेगो चाल
छोड़ आलस की पापण खुमारी रे
अबे शुरू व्ही परीक्षा थारी रे
हुणजे रे मोट्यार

फूल पात कुम्हलई नही जावे देख थारा वाग का
सुर नही छूटी जावे थारा फागणिया का राग का
टूटी जावे कोन्ही ताल
थारा साज ने सम्हाल
अणफूली न्हीं सूखे कोई डारी रे
अबे शुरू व्ही परीक्षा थारी रे
अरे हुणजे रे मोट्यार

जद तक आवा वारी पीढ़ी न्ही ले जिम्मेवारी रे
वटा तलक तो करनी वेगा कण कण की रखवारी रे
या तो सूली पर है सेज
अण पर होवे ऊ मरेज
जो जागे वणी की बलिहारी रे
अबे शुरू व्ही परीक्षा थारी रे
अरे हुणजे रे मोट्यार
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन






यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।

थोड़ो दीजो रे पसीनो

 


श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह

‘अई जावो मैदान में’ की इक्कीसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।




थोड़ो दीजो रे पसीनो

आँबा अमड़ी मोरिया ने फूली लाल कनेर
काची कली गुलाब की ली भँवरा ने घेर
अलसी का फुलड़ा झर्या अजमां की गन्नाट
कूँपर की कसणा कसी ई फागणिया का ठाठ
अणी ठाठ का हाट में भटकण हारा बीर
हुणजे थारो कवि कहे मायड़ली की पीर

ऐ थोड़ो दीजो रे
थोड़ो दीजो रे पसीनो माँगे मायड़ली
थोड़ो दीजो रे

कतरई जुग में माँ मुसकई है
खून दीदो जद या ऋतु अई है
देखो झरी न्हीं पड़े पाछी
आँखड़ली
थोड़ो दीजो रे

अरियाँ गरियाँ फागण आयो
हर फुलड़ा पर रूप सवायो
देखो मुरझावे कोन्ही कोई
पाँखड़ली
थोड़ो दीजो रे

कोई हिमगिरि के होड़े होड़े
फुल बगिया की वागड़ तोड़े
देखो नमी न्हीं जावे रे मूँछाँ
बाँकड़ली
थोड़ो दीजो रे

भूखी तरसी बैठी धरती
श्रम साजन को नाम सुमरती
मँहगा मोतीड़ा से भर दो रे
माँगड़ली
थोड़ो दीजो रे

सायर सिग सपूताँ जागो
मेहनत की दुकड़्यो अई लागो
देखो लाज न्ही जावे रे माँ की
काँखड़ली
थोड़ो दीजो रे
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।





गंगा ती

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की बीसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



गंगा ती

हेला पाड़े रे चिनाराँ
हेला पाड़े रे देवदाराँ
हेला पाड़े रे पियाराँ
तूृ मती जा पियूजी के देस गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
पाछी पीहर चाल ओ

थारा दाऊजी का आँगणा में वखरीरी बारूद ओ
आज थारो लोहो माँगे मायड़ली को दूध ओ
दूध धोयो चीर थारो
रंगले लालम लाल ओ
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

फेर थारी पालकी ने भूल पियू का प्यार ने
छोड़ छोराँ तोड़ कोराँ आकरी कर धार ने
धोईले मेंहदी खोल माथो
ओर वखेरी ले बाल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

थारा समदर साथबा ती केई दे मन की वात ओ
रस जमई तरवार बाँधो अई लगन की रात ओ
रणरिझारा तोरण आवो
पेरी लो मुण्डमाल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

बालपण की अरियाँ गरियाँ बा
ड़्याँ व्ही डावड़्याँ
ताल सरवर झील पोखर और नाना काव
ड़्याँ

वाट नारे हीर राँझा
सोनी और महिवाल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

वीर थारा जई डट्या हैं बस हुकम की देर है
होट काटी र्या भतीजा कोई को अब न्हीं खेर है
जम जुझारा जाई जम्या है
लेई ने जम को जाल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

दोहिता अणगणत लाजे दाऊजी पर वारवा
सासरा का शूर लाजे सात पीढ़ी तार वा
और भूखी जोगण्याँ के
लाजे नेवज थाल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछो पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ

आगता पग तोक राणी भार को संघार कर
दुस्मणा का खून ती तू माँग को सिंगार कर
कूँख माँ की न्याल कर ने
जावजे सुसराल ओ
पाछी पीहर चाल गंगा
पाछी पीहर चाल ओ
हेला पाड़े रे चिनाराँ
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन



यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











चेत भवानी

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की उन्नीसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



चेत भवानी

चेतो माता चावण्डा ने चेतो खप्परवारी रे
चेत भवानी दुर्गा राणी धार दुधारी रे
के जामण जागी जा
हाँ ऐ जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

गूँजे ड्योढ़ी करो अपोढ़ी जामण नींदा तोड़ो रे
थारा जाया ने भीड़ील्यो लीलो घोड़ो रे
के जामण जागी जा
बोल जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

छोटी छोटी आँखाँ वारो बैरी आँखाँ काढ़े रे
लाय लगई दी केसर में ने वाग उजाड़े रे
के जामण जागी जा
हाँ ऐ जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

बैरी का लोही ती थारो माणक चौक लिपाऊँगा
चाऊ माऊ का माथा को भोग लगाऊँगा
के जामण जागी जा
बोल जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

तरसी थारी तिरसूलाँ ने खप्पर थारो खाली रे
तू हुत्ती ने बैरी के घर मने दीवाली रे
के जामण जागी जा
बोल जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

रतजग्गा की रात सुहागण और अबे न्हीं जागेगा
तू न्हीं जागी तो भारत पर कारो लागेगा
के जामण जागी जा
हां रे जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

अमर तिरंगो लेईने म्हारो जोड़ीदार सिधारे रे
भारत की जायी ने वणको धरम पुकारे रे
के जामण जागी जा
बोल जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

आखा-पाती देई दे माड़ी म्हाने रण में जावा दे
थारा बारूड़ा ने माड़ी दूध चुकावा दे
जामण जागी जा
हाँ रे जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

म्हारी डावी भुजा कसीली जामण रेई-रेई फड़के रे
चीनी छोर्याँ का चुड़ला की चूँपा तड़के रे
जामण जागी जा
बोल जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा

म्हारा सूरज चाँद सितारा देशड़ला पर वारूँ रे
अम्मर चुड़लो थारे आँगण आज वधारूँ रे
के जामण जागी जा
हाँ ऐ जामण जागी जा के
ढोल नगारा वाजे
जामण जागी जा
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











फागण अलबेलो

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की अठारहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



फागण अलबेलो

अब के होरी पर म्हारो जोबन अरथे आवेगा
आँबड़ली पर कोयलड़ी भी मारू गावेगा
के फागण अलबेलो
बोल फागण अलबेलो के
रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

काचो रंग कसूमल अब तो साजन पर न्हीं छाँटूँगा
बालम की पागाँ पर दुसमण काचो काटूँगा
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

मानसरोवर के आँगणिये लाल हजारी फूलेगा
तरवाराँ की धाराँ ऊपर गोर्याँ झूलेगा
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेग रण को
फागण अलबेलो

साजनियाँ तू अब के म्हारे चूनर मत मोलाजे रे
मरदाणी के एक तिरंगो कफन रंगाजे रे
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

बाजूबन्द मत लाजे रे छेला रकड़ी मती घड़ाजे रे
लाणी वे तो दो बन्दूकांँ लेतो आजे रे 
फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

बिड़ला घर को धूरो म्हारा ललवट पर लगाऊँगा
बेरी का लोही ती म्हारा हाथ रचाऊँगा
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

रंग बिरंगी रसपिचकारी चोली पर न्हीं झेलूँगा
पेकिंग की गलियाँ में खूनी होली खेलूँगा
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

कन्त कामणी वारो फागण बालम अब न्हीं गाऊँगा
खूब गुलाल उड़ईली अब बारूद उड़ाऊँगा
के फागण अलबेलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

दिल्ली जई ने राजघाट पर खूनी तिलक लगाऊँगा
इन्दिराबई ने मंगल सुत्तर देई ने आऊँगा
के फागण अलबेलो
बोल फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो

अमराई में रण नोता बालम को पंथ निहारूँगा
बेरागी का गीत गावताँ वगत गुजारूँगा
के फागण अलबलो
हाँ रे फागण अलबेलो
के रंग उड़ेगा रण को
फागण अलबेलो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











धरती धूजेगा

 
श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की सत्रहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



धरती धूजेगा

सेला का मेला में म्हारो बालम रमवा जावे रे
देखो म्हारी माँग में कंकू न्ही मावे रे
के धरती धूजेगा
हाँ रे धरती धूजेगा
जूझारो म्हारो रण में जूझेगा
के धरती धूजेगा

राता डोरा आँखड़ल्याँ में, मूछड़ल्याँ न्ही छूटे रे
यो हुँकारे तो चीनी छोर्याँ छाती कूटे रे
के नाहर गरजे रे
हाँ रे नाहर गरजे रे
के चाऊ घर की चिन्ता करजे रे
के धरती धूजेगा

सिंघ सजन का भुजदण्ड देखो नत फड़के नत फाटे रे
लूमण-चूमण भूलीग्यो ने पोंचा काटे रे
के छाती ठोके रे
बोल छाती ठोके रे
के जम जाया ने कूण रोके रे
के घरती धूजेगा

वारी रे म्हारा भीमा थारी आरती उतारूँ रे
वीजरी का टुकड़ा जैसा बेटा वारूँ रे
परणी मरदाँ की
हाँ रे परणी मरदाँ की
निछारू कोराँ अपणा हिरदा की
के धरती धूजेगा

एकल्लो नही जावा दूँगा म्हूँ भी लारे चालूँगा
घाव भरी थारी काया पर झालो झालूँगा
के दुनिया देखेगा
हाँ रे दुनिया देखेगा
ने गाँधी बापू फुलड़ा फेंकेगा
के धरती धूजेगा

सात फेरा फिरताँ बालम हिलमिल होगन खाया रे
जनम-जनम का कोल निभईलाँ व्ही दन आया रे
के बोको देवा दे
बोल बोको देवा दे के
मौको जावे लावा लेवा दे
के धरती धूजेगा

मत समझो भारत ने धरती बकर्याँ की और गायाँ की
चारा जूँ काटूँगा फौज करोड़ सिपायाँ की
के बैरी मानीजा
हाँ रे बैरी मानीजा
तू थोड़ा में ही हगरी जाणीजा
के घरती धूजेगा

या एकली अम्मर जोड़ी आखर दम तक जूझेगा
बैरी कई खुद काल भी म्हां का पगल्या पूजेगा 
के धरती लावाँगा 
बोल धरती लावाँगा के
माड़ी थारो हुकम उठावाँगा
के धरती धूजेगा

म्हूँ पकड़ूँगा अमर तिरंगो तू गोली सन्नाजे रे
पेकिंग पर नेजा गाड़ी ने गले लगाजे रे
तो जोबन वारूँगा
हाँ रे जोबन वारूँगा के
न्हीतर थारो शीश उतारूँगा
के धरती धूजेगा
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











देस म्हारो बदल्यो

 
श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की सोलहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



देस म्हारो बदल्यो

कलम मेली लो कान पर, ब्रह्माजी महाराज
थाँ का लिख्या मेटीद्या, म्हाँ मरदाँ ने आज
बदली द्या घर आँगणाँ, बदल्या हाट बजार
बदल्या बादल बीजरी, बदलीगी जलधार
मान, मान, मत मान पण, लग्या आग में वाग
अब मत लिखजे डोकरा, तू भारत का भाग

अणा पाड़-पड़ौसी प्यारा से
अणा गोरा से भई कारा से
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाने कूण कहे कंगाल
ओ बदल्यो, रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो
यो देसड़ल्यो म्हारो बदल्यो

मेहनत करवा वारा बन्दा जूझीग्या तकदीर ती
सूखा सरवर पाछा लेहर्या ठण्डा मीठा नीर ती
पक्का पणघट पाणी लावे पंथीड़ा ने पणिहारी
रगड़-रगड़ पग धोवे एड़्याँ
 छैल छबीली छणिहारी
चरड़-मरड़ बोले मोजड़्याँ

 वाजे बिछुड़्याँ 
पसीना में अई झकझोर छणिहारी 
सोना रूप को माथे बेवड़ो काँधे नेजड़ली
चली जईरी पियाजी की पोर पणिहारी
अणा पणघट की पणिहाराँ से
अणाँ छाँणाँ की छणिहाराँ से
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाने कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

लाख-लाख हाथाँ ती म्हाँने, नद्याँ मात्तर तो की ली
कन्ता के घर जाती कामणी, मन भायो जाँ रोकी ली
डूँगर की छाती में म्हाँकी, मेहनत ने नख गाड़ीद्या
पग पाँवड़े धन कंचन का भर भण्डार्या काढ़ीद्या
कल कल करती नद्याँ ती म्हाने
झरझर बोल बोलाया रे
गौरी शंकर तक को माथो
ई पग घूँदी आया रे
नद्याँ ती अणा नारा ती
अणा ऊँचा परबत प्यारा ती
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाणे कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

हल का तीखा मूँडा आगे बाँजड़ धरती थाकीगी
बंध्या पालणाँ घरे वाँझ के, देखो जुवाराँ पाकीगी
डेढ़ परस को बंध्यो डागरो, गोफण फेरी री राणी
नवा खात ती पैदा वेईग्यो बीघे-बीघे सौ माणी
उपणे धराणी माणक मोती
सैणाँ में रही समझाय पियाजी म्हारा
रकड़ी ने रतन जड़ाव
सोना में आखी थने
पीरी-पीरी कर दूँ यूँ मत आग लगाव
रसीली म्हारी तू तो बस उपण्याँ ही जाव
अणा खेताँ का रखवारा से
अणा गहूँ चणा जौ ज्वाराँ से
थी पूछो म्हारा हाल
म्हाने कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

जणी बाप ने आखी ऊमर दस्खत करतँं न्हीं आया
देस-देस की पोथ्याँ वाँचे वणी बाप का कुलजाया
खेत खरा में नवी डावड़ी बारामासी गावे रे
श्रम हल्दी में लिपट्यो पिवड़ो कद तोरण पर आवे रे
वेगा आवो बरात लेई ने रंग रसिया
रंग रसिया ओ म्हारे हिरदे बसिया
ओ म्हारे मन में बसिया
परण्याँ से अणाँ क्वारा से
(अणा) आज परणवा वारा से
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाने कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

डामर सीमट और भाटा ती काचा गेला बाँधी द्या
बड़ा शहर और गाम गामड़ी का करजोड़ा फाँदी द्या
रोज परोड़े गाड़ी गेरे खेड़ा को मोट्यार रे
चाँद चल्यो परगाम चकोरी नम-नम करे जुहार रे
वेगा आजो रे गुमानी
म्हारे नैणा नी भावे पाणी
वेगा आजो रे गुमानी
अणी गोरा चाँद उजारा से
(अणी) चाँद का नवलख तारा से
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाने कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

आनी मानी लाल गुमानी अब विपता न्ही झेलेगा
कंगाली की कम्मर तोड़ी मस्साणाँ में मेलेगा
जामण को सिणगार करी र्या अपणा खून पसीना ती
ई की ई ललकाराँ अई री मथरा और मदीना ती
ओ थाने जगती को कीदां सिणगार ओ गुमानीलाला
लाज नही चली जावे देस की
ओ आखी जगती का माथा परला मोड़, ओ गुमानीलाला
लाज नही चली जावे देस की
अणा साधू सन्त फकीराँ से
अणा निरधन और अमीराँ से
थी पूछो म्हाँका हाल
म्हाँने कूण कहे कंगाल
बदल्यो रे बदल्यो, बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो

(इस गीत के हर छन्द की समापन पंक्तियों में एक-एक लोकधुन का प्रयोग किया गया है। एक ही गीत के लिये छः लोकधुनों का याद होना आवश्यक है। शिल्प की विविधता का यही कारण है।)
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











मौसम बदली ग्यो

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की पन्द्रहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



मौसम बदली ग्यो

आँबा की झमकारी ऊपर कारी कोयल यूँ गावे
अपणो बेलीे आप बणे ऊ जुग-जुग पूजावे
के मौसम बदली ग्यो
हाँ रे मौसम बदलीग्यो के
करणो वे ऊ करलो वीरा
मौसम बदलीग्यो

पापी पतझड़ आयो थाँ की जुही चमेली चूँटीग्यो
पण थाँ से सेजड़ल्याँ न्ही छुटी और ऊ लूटीग्यो
के मौसम बदलीग्यो

लाखाँ वीर जुझारा जूझ्या जद यो फागण आयो रे
थाँ से तो बस नवो पसीनों अण ने चायो रे
के मौसम बदलीग्यो

अतरी नद्याँ अतरा नारा आगणियाँ में वे वे रे
फेर काँ अपणी धरती माता तरसी रे वे रे
के मौसम बदलीग्यो

स्वर्ग वणई ने कूण जगत में कण के भेंट चढ़ावे है
मरदाँ अपणी-अपणी मेहनत काऽमें आवे है
के मौसम बदलीग्यो

थाँ की मेहनत थाँ की हिम्मत आज देस ने माँगी है
पास-पड़ौसी सबकी नजराँ थाँ पर लागी हे
के मौसम बदलीग्यो

(ई) पिचपन छप्पन क्रोड़ पूत जद एक जीव वेई जावेगा
(तो) बोलो यो फागणियो पाछो कसरूँ जावेगा
के मौसम बदलीग्यो

आवो अरब-खरब हाथाँ ती जामण को सिणगार करो
अरब-खरब आँगरियाँ अणकी सूनी माँग भरो
के मौसम बदलीग्यो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











धरती को गीत

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की चौदहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।




धरती को गीत

आवो धरती का गीत गावाँ रे
धरती का गीत
म्हारी जरणी का गीत
म्हारी माड़ी का गीत गावाँ रे
आओ धरती का गीत गावाँ रे

खोरा में जण के ई जीव हँसे खेले
बारकाँ ने छाती ती परमाँ न्ही मेले
पाप को ने पुण्य को यो भारी भार झेले
अण का गरभ में रतन
छाती पे बेठो गगन
अंग-अंग भारी थोड़ो भार घटावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे

अण से बड़ो कूण दाता औ’ दानी
लेवे तो मुट्ठी ने देवेे है माणी
अरबाँ ने खरबाँ ने पारी री राणी
फल देवे फूल देवे
रोज वगर भूल देवे
वाँट-चूँट जीमाँ और सबने जिमावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे

सूरज बरे ने गरे चाँद तारा
ठारे हियारा ने बारे उन्हारा
रोम-रोम फोड़े चौमासा की धाराँ
जोगण तपस्या करे
तप ती कदी न्हीं टरे
अण का चरण में चालो ऊमर चढ़ावाँ रे
आवो धरती का गीत 
गावाँ रे

गेरा-गेरा समदर ई रूड़ा रूपारा
नरमाल नद्दियाँ ने नारा कुँवारा
सरवर ने झरझरता झरना की धारा
तो भी अणकी प्यास जागे
पल-पल पसीनो माँगे 
मेहनत को खारो पाणी हिलमिल चखावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे

जीवो जटा तक हालरो हुणावे
अन्न दे धन्न दे या वारी-वारी जावे
मौत आयाँ माड़ी म्हारी कारजे लगावे
थोड़ो सो न्याय करो
ममता का घाव भरो
घावाँ पे सेवा की ठण्डी लूणी लगावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे
लाखाँ ही धरमा ने धारे धराणी
(पण) दूध को दूध और पाणी को पाणी
पीड़ा अणी की कणी ने न्ही जाणी
खावा में चार रोटी
राखो काँ नीऽत खोटी
चालो धरम ने बजार में ती पाछो लावाँ रेे
आवो धरती का गीत गावाँ रे

अणका ही पूत करे अणती बेईमानी
जुद्ध लड़े सिद्ध वणे शाणा ने ज्ञानी,
खेल हाँटे छाती फाटे तो भी छानी-मानी
मनकाँ ती प्रीत जोड़ो
गिद्धाँ की रीत छोड़ो
जीवन को गीत ऊँची टीप मे उठावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे
बदली द्यो तार-तार थाने अणका तन को
फेर भी नही हाल्यो है राम अणका मन को
रोम-रोम अणको है पक्को वचन को
जाया आपी अण का
दबेल अण का ऋण का
ईमान गाठो राखी थोड़ो कर्जाे चुकावाँ रे
आवो धरती का गीत गावाँ रे

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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











पसीनो ललाट को

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की तेरहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



पसीनो ललाट को

लिख्या लेख कदी न्ही धोवे पाणी घाटम-घाट को
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट कोे

भाग लिखण सारू उठ्या जद माचा से भगवान
चरर मरर माचो कर्यो बस खुलग्या म्हारा कान
म्हारी दशा पर दाँत काड़तो
बोल्यो ढाँचो खाट को
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

पाँच दाण पूजा करे ने तीन दाण तू न्हाय
रोणा रोवा भाग का तू नत को तीरथ जाय
पण नही धोवे लेख करम का
यो चन्दन को वाटको
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

गंगा न्हायो गोमती ने गयो नरमदा तीर
देव देवरा धोकिया ने लाख मनाया पीर
भाग दौड़ में भाग थकीग्यो
तू भी वेईग्यो साठ को
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

थाकीग्यो भगवान भी कर मुन्शी को काम
मन आवे उइ माँडने राखे अपणो नाम
कटा तलक थी गुण गावोगा
अणी रुपारी चाट को 
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

बड़े परोड़े उठो और धरती ने शीश नमाओ रे
श्रम सरवर का अमृत जल से आखा दन भर न्हाओ रे
तो राते अपणे आप मिलेगा
शीरा भरियो वाटको
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

चाँद लिखे तारा भणे रे आखी-आखी रात
सूरज आखो दन कहे रे किरणाँ से या बात
पेलो-पेलो बोल यही है
खुशहाली का पाठ को
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

भाग भरोसे आँगणे मत कर दुःख का ढेर
चोटी ती ऐड़ी तलक श्रम का मोती पेर
थारे पगाँ पड़ेगा वाण्यो
जबरा जंगी हाट को
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को

थाली में ती गई गरीबी रही कटोरी माँय
ध्यान राखजो अणी घड़ी में कोई ऊँघी न्ही जाय
जाती-जाती कंगाली के
दीजो रे दादा झाटको
ललाट की लकीराँ धोवे पसीनो ललाट को
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











धरती का जाया ओ

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की बारहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



धरती का जाया ओ

धरती का जाया ओ
धरती का धाया ओ
धीरप ती धीराँ धोर्याँ ने धर में धरजो रे
इन्दर तो गरजीग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

सूरज की किरणाँ का चूल्हा धक-धक करता ही रेईग्या
रुई सरीखा धोरा बादल कारा घुँघरारा वेईग्या
इन्दरगढ़ का पणघट पर राजा इन्दर को मन बोरईग्यो
रूपा वरणी बादरी में अमल कसूम्बो घोरईग्यो
प्याला दे वीजू राणी
इन्दर ने मूछाँ ताणी
हाथ हथेर्याँ छक छाला का प्याला भरजो रे
इन्दर तो गरजी ग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

मीठी नद्याँ मीठी नार्याँ मीठो निरधन नारो ओ
(पण) सौ गोर्याँ को सायब समदर मन को कतरो खारो ओ
दो टपका भी मीठो पाणी समदर थाने न्ही देवे
(पण) सूरज लूटे भरी दुपेराँ तो भी यो कई न्ही केवे
समदर ने यूँ ही रोवा दो
सूरज ने सत खोवा दो
थी तो बस दो भाटा लेईने
खारी वेवा जाती नद्याँ के आड़ा फरजो रे
इन्दर तो गरजी ग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

गगन गोखड़े बेठो ब्रम्हा देखो कतरो पोमावे
अण बूढ़ा-ठाड़ा हाथाँ पाँ ती काँ तू किस्मत लिक्खावे
वाँकी-चूँकी रेख अपणी खेंची आज बतई दो रे
अणा आकासा की अट्टार्याँ की ईंटाँ परी डगई दो रे
टॉंक पकड़ लो ब्रम्हा की 
आदत छोड़ो खम्मा की
ब्रम्हा को सिंघासण कोसो
जदी पुरेगा आज तलक को अपणो हरजो रे
इन्दर तो गरजी ग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

बाँध गाँठड़ी गज मोत्याँ की गगन जातरी निकरी ग्या
(तो) मेघराज की मारा में ती मँहगा मोती वखरीग्या
ओ धरती की राजल बेटी हुण ले झूँपड़ी की राणी
थारे छत्ताई इतरई है मेघराज की पटराणी
थारा नाथ ने हमझई दे
थारी आँत ने यूँ केई दे
दो-दो पीढ़ी जीवे फेर भी
जामण का जंगी जाया पर काँ यो करजो रे
इन्दर तो गरजी ग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

चालो थाने हेला पाड़े खेताँ को चिकणो गारो
चालो थाने याद करी र्यो तरे-तरे को बिजवारो 
वावो, करपो, नींदो, काटो और खरा में लावो रे
नवी कलम का गीत नवादा नवा सुराँ में गावो रे 
बजे ख़रा में इकतारो 
लगे रसीलो रणकारो 
अणी मौज पर देव बरेगा
अणा अभागा ने बरवा दो कोई मत बरजो रे
इन्दर तो गरजीग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ

बारा क्रोड़ पचोर पूत की जामण का जाया जागो
धरती का मालक के खाते इन्दर को नामो लागो
थाँ के वेताँ थाँ की माँ को मालक दूजो केवावे
अब करनो के मरनो रे मरदाँ लोही उकरनो ही चावे
चालो पसीनो देवाओ
हाँचा बेटा केवावो
जरण मरण की अणी आण पर
ओ धरती का पूत हपूताँ जूझी मरजो रे
इन्दर तो गरजी ग्यो मरदाँ थी भी गरजो रे
धरती का जाया ओ
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











पसीनो एक साथ चूवा दो

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की ग्यारहवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



पसीनो एक साथ चूवा दो

लालकिला का मालकाँ मत बैठो नक्काम
पसीनो एक साथ चूवा दो मरदाँ वेई जागा सब काम
के थाँको ऊँचो उठेगा गाम
के थाँको जग में वेगा नाम
के थाँको भलो करेगा राम
पसीनो एक साथ चूवा दो

अपणा बैली आप बणो ने काम पड़ौसी के आवो
जीवो और जीवा दो सब ने भटक्या के पंथ बतावो
अपणी मदद करी ले वणकी मदद करे है राम
(के) थाँको वेई जा गा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

माप तौल का खाड़ा में थी कंचन खाद वणावो
न्हाको खेत में और खरा ती गाड़îाँ भर-भर लावो
अण बोल्या गूँगा ढाँढा ने हमझो मती गुलाम
के थाँ को वेइ जागा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

तीन डाकणाँ ती लड़वा की कर लो आज तैयारी
पेली गन्दगी दूजी गरीबी तीजी घोर गँवारी
थाँ का डाव पर आँख लगई ने बेठो रे मुलक तमाम
के थाँको वेई जा गा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

दानी ज्ञानी ओ हिन्दवानी दीजो यें भी ध्यान
श्रम ती मोटो अणी जगत में कोन्ही दूजो दान
अणी दान का फल भर देगा हगरा खाली ठाम
के थाँको वेई जा गा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

गाँठ बाँध लो म्हारी बात के मन्दर मज्जत वारा
साफ सफाई में है बिराजा अल्ला ईश्वर थारा
सुघड़ आँगणे आठी पहराँ प्रभुजी करे मुकाम
के थाँको वेई जागा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

सबती मोटी ताकत खेती देसड़ला की केवावे
हिलमिल टेको लागी जा तो परबत तोकई जावे
सहकार ती मोटो जग में कोनी दूजो काम
के थाँ को वेई जा गा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो

गाम आपणो कई न्ही माँगे, माँगे बस दो बात
उजरो-उजरो मन माँगे ने मैला-मैला हाथ
बस अतरो सो देई दो ने लेई लो नाम-दाम-आराम
के थाँ को वेई जा गा सब काम
पसीनो एक साथ चूवा दो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











म्हारा वीर

श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की दसवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



म्हारा वीर

जदी आँगणियाँ में आजादी को उड़ीग्यो अबीर।
तो भाग के भरोसे मती बैठो म्हारा वीर

कतरई ने सूली पे सेजाँ सजई है
कतरी ही बेन्यां की राख्याँ रिसई है
लाखाँ ही लोर्याँ ने झोर्याँ भुलई है
हज्जाराँ गोर्याँ ने होर्याँ न्ही गई है
जदी जईने दिल्ली पोंचो आपणो वजीर
तो भाग के भरोसे मती बेठो म्हारा वीर
जदी आँगणियां में आजादी को.....

काँधा पर आया वजन पर जवानी
लाहौर वारा वचन पर जवानी
देख थारा तन पर ने मन पर जवानी
राधा तो राधा किसन पर जवानी
ब्रज थारो डूबे-डूबे दौड़ रे अहीर
भाग के भरोसे मती बैठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादी को.....

याद आवे आज म्हने झाँसी की राणी
मोराँ पर ममता ने जोर पर जवानी
दाँत में लगाम और हाथ में भवानी
जूझी तो धूजीगी तोपां तूफानी
फावड़ो तो पकड़ो वणका लाड़ला रणधीर
भाग के भरोसे मती बैठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादी को....

हिरदा में हिम्मत का डेरा लगावो
मेहनत का मोतीड़ा माथे सजावो
परदेश में मती झोर्याँ बिछावो
यूँ मत लुटो और यूँ मत ठगावो
जावे है सोनो ने आवे कथीर
भाग के भरोसे मती बेठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादी को.....

देसड़लो अपणो यो मानी गुमानी
आखा जगत को दाता औ दानी
खेत-खेत गईर्या कबीरा की वाणी
डग-डग पे रोटी ने पग-पग पे पाणी
फेर यो अमीर क्यूँ दीखे रे फकीर
भाग के भरोसे मती बैठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादी को.....

हिम्मत जो आज थी कर लो रे वीरा
नक्खाँ से परबत का फाड़ी दो लीरा
गंगा माँ, गोमा या गेरी गम्भीरा
मेहनत का माधव की वेई जावे मीरा
आसा लगावे थाँ से जमना को तीर
भाग के भरोसे मती बेठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादो को.....

धारी ले मन में जो दो हाथ वारा
खोली दे बैकुण्ठ का बन्द तारा
रेत में वेवई दे अमरत की धारा
समदर में पग-पग पे बाँधी दे पाराँ
पारस ती कम कोन्‍ही थाँको सरीर
भाग के भरोसे मती बेठो म्हारा वीर
जदी आँगणियाँ में आजादी को.....
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन





यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।











चालो गऊ का जाया हो

 श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की नौवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।




चालो गऊ का जाया हो

टचर टचर टच टच टच टच टच
चालो रे गऊ का जाया ओ
थाँ को म्हारो साथ जनम को
मोटी थाँ की माया ओ
चालो रे गऊ का जाया ओ

कारी-कारी अंधारी बीती बैरण रात है
ऊपर तारो ऊगीग्यो रणियारो परभात है
होवा वारा सभी जोगा थाँ के ही जायाँ ओ
चालो रे गऊ का जाया ओ

नवी नवादी परभाती पंख पंखेरु गईर्या है
घट्याँ ओरी लुगायाँ ने मोतीड़ा पीसई र्या है
के विरहा के वारहमासा मन का गीत गवाया ओ
चालो गऊ का जाया ओ

राम नाम तो लेईल्यो है नाम काम को लेणो है
था भी जाणों गोठीड़ा, करजो कतरो देणो है
लेवा वारो जसरूँ-तसरूँ परखेगा सवाया ओ
चालो गऊ का जाया ओ

थाँ के पाँ है चार पग म्हारे पाँ दो हाथ है
खुद का खुद मुख्त्यार हाँ या कई कमती वात है
पण आजादी का अम्मर फल भी आपाँ ने न्ही खाया ओ
चालो गऊ का जाया ओ

काम मोकरो करणो है छोटी सी है जिन्दगानी
दन-दन ऊपर जईरी है जई ने पाछी न्ही आणी
कतरी मुश्किल ती अषाढ़ का बादीला दन आया हो
चालो गऊ का जाया ओ

म्हारे जस्सा लाखाँ की लागी थाँ से आस है
टूटी-फूटी झुँपड़्याँ ने था को ही विश्वास है।
सब नुगरा निकरी ग्या तो भी थाँ ने कौल निभाया ओ
चालो गऊ का जाया ओ

चाले आखो देस यो थाँ की पग हेन्याणी पर
थाँ की अम्मर धाक है इन्दर ने इन्द्राणी पर
आसमान ती वत्ती ठण्डी थाँ की गेरी छाया ओ
चालो गऊ का जाया ओ

म्हारा किसन करीम हो थी म्हारा रामा पीर हो
अन्दाता थी म्हारा हो जामण जाया वीर हो
थाँ के पाछे मौज करे थाँ का भतीजा भौजायाँ ओ
चालो गऊ का जाया ओ

थीं धरती का देव हो म्हूँ धरती को भार हूँ
हाथ पराणी म्हारे है पण लाख दाण लाचार हूँ
दारीद्दर मेटेगा म्हारा थाँ की पारस काया ओ
चालो गऊ का जाया ओ
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन




यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।










फिकर करो

 श्री बालकवि बैरागी के मालवी श्रम-गीत संग्रह
‘अई जावो मैदान में’ की आठवीं कविता


यह संग्रह डॉ. श्री चिन्तामणिजी उपाध्याय को समर्पित किया गया है।



फिकर करो

फिकर करो रे भई फिकर करो
थोड़ी-थोड़ी घर की भी फिकर करो
यूँ मत नवरई हिरो-फिरो
(या) आजादी जवान वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे दादा फिकर करो

घर में बेटी वेईगी मोटी
ल्यावे बेवड़ो ने पोईले रोटी
अंगाँ को रूप निखर्यो
रूप को सरुप बिखर्यो 
(या) फूलाँ को बाण वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे लाला फिकर करो

राता-राता गाल पड़ीग्या
सपना ऊबी भींत चढ़ीग्या
एड़्यॉं के बाल लागे
कई कूँ कमाल लागे
काम की कमान वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे बाबू फिकर करो

गुलक्यारी में दाख पकी गी
(तो) सग्गा भई की नीत डगी गी
गोत भूल्यो वंश भूल्यो
बाबुल को अंश भूल्यो
या, खून की पिछाण वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे भई फिकर करो

तोड़ी काड़्यो राखी तागो
लाल्यो लापर लारे लागो
नेणा में खोट राखे
यें वें ती कोट डाके
चोट कतरी दाँण वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे राजा फिकर करो

घर भेद्याँ का सपना कारा
आँत पेट की बेचणहारा
माटी को धान खावे
याराँ का गीत गावे
या लूण पर लचाण वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे लाला फिकर करो

आँखाँ आगे बेठो लाड़ो
थी कई यें वें आँखाँ फाड़ो
बेटी को हिवड़ो फाटे
आँसू ढारे होठ काटे
या मोरनी हैरान वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे दादा फिकर करो

और मती अब विरह बढ़ाओ
एका को लाड़ो लेई आवो
घर में जँवाई ने राखो
दोहिता का गाल चाखो
घणी खेंच-ताण वेईगी
आजादी जवान वेईगी
फिकर करो रे भई फिकर करो
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संग्रह के ब्यौरे
अई जावो मैदान में (मालवी कविता संग्रह) 
कवि - बालकवि बेरागी
प्रकाशक - कालिदास निगम, कालिदास प्रकाशन, 
निगम-निकुंज, 38/1, यन्त्र महल मार्ग, उज्जन (म. प्र.) 45600
प्रथम संस्करण - पूर्णिमा, 986
मूल्य रू 15/- ( पन्द्रह रुपया)
आवरण - डॉ. विष्णु भटनागर
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मुद्रक - राजेश प्रिन्टर्स, 4, हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन



यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। ‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।