क्षमा धर्म का सार

   

      
                            क्षमा धर्म का सार
                                - बालकवि बैरागी


इन दिनों जैन समाज के, दिगम्बर सम्प्रदाय का पर्यूषण-पर्व चल रहा  है। 

नीमच के दैनिक ‘नई विधा’ के लिए दादा श्री बालकवि बैरागी ने कुछ वर्षों तक, आठ दिवसीय इस पर्व के प्रत्येक दिन एक आलेख तथा क्षमापना-दिवस पर एक छन्द लिखा था। यह बात तो मुझे याद थी लेकिन यह सामग्री मेरे पास नहीं थी।

इन्दौर के दीर्घानुभवी, परिपक्व, प्रबुद्ध, विद्वान्, अग्रणी सीनीयर एडवोकेट आदरणीय श्री बी. एल. पावेचा साहब के जरिए, जावरा (रतलाम) वाले आदरणीय श्री बाबूलाजी नाहर से मुझे दादा-रचित ये आठ छन्द और एक दोहा मिला।

आदरणीय पावेचा साहब और नाहर साहब को धन्यवाद सहित, मेरी नहीं, ‘सर्व’ की यह सम्पत्ति, ‘सर्व’ को अर्पित है।

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                                                       वीतराग कोई नहीं, सबके मन में राग,

                                                        हर चादर मैली यहाँ, हर दामन में दाग।

                                                        सब संसारी जीव हैं, सब में है संसार,

                                                        कोई करुणाकर नहीं, और नहीं अवतार।

                                                        आप क्षमा-श्री-सन्त हैं, मैं हूँ मूढ़ महान्,

                                                        देव मुझे दे दीजिए, दिव्य क्षमा का दान।


                                                        पुद्गलों की सृष्टि है, पर्याय का संसार है,

                                                        साधना जिन-कल्प की भी, कर्म के अनुसार है।

                                                        वीर-वाणी जीव यह, अब तक समझ पाया नहीं,

                                                        मोक्ष के जिन-पंथ पर, चलना कभी आया नहीं।

                                                        त्रस्त हूँ आठों पहर, संसार के सन्ताप से,

                                                        याचना उत्तम क्षमा की कर रहा हूँ आप से।


                                                        तन की टूटी टापरी, मन कषाय की खान,

                                                        काम, क्रोध, मद लोभ के, आ बैठे मेहमान।

                                                        त्याग-तपस्या कुछ नहीं, नहीं सन्त-संवाद,

                                                        ऐसे में मुझसे हुए, होंगे कुछ अपराध।

                                                        विनत्-शीश, करबद्ध, मैं, अपराधी इन्सान,

                                                        माँग रहा हूँ आपसे, ‘दिव्य क्षमा’ का दान।


                                                        अनुभव आज अनाथ है, बृद्धि आज बेहोश,

                                                        पल-पल बढ़ता जा रहा, कटु-कषाय का कोष।

                                                        शून्य पड़ी है चेतना, वाणी है लाचार,

                                                        मन के राजा हो गए, अहंकार, ममकार।

                                                        मैं भी इस परिवेश में, करता नित्य प्रमाद,

                                                        देकर के उत्तम क्षमा, दें अरिहन्त-प्रसाद।


                                                        कामनाएँ मोक्ष की, और, भावनाएँ भोग की,

                                                        जिन्दगी जंजाल है, बस, इसी संजोग की।

                                                        चाहता हूँ सब सही हो, किन्तु हो पाता नहीं,

                                                        कब अवज्ञा हो गई, कुछ भी समझ आता नहीं।

                                                        इस विकट संग्राम को, किस शस्त्र के बल पर लड़ूँ?

                                                        आपसे उत्तम क्षमा मिल जाए, तो, आगे बढ़ूँ।

                

                                                        इस छोर से उस छोर तक, अविचार ही अविचार है,

                                                        दम्भ से दंशित हृदय का, नाम ही संसार है।

                                                        एक अदना जीव हूँ, मैं भी इसी संसार का,

                                                        जानता कुछ भी नहीं हूँ, अर्थ लोकाचार का।

                                                        इसलिए, मेरी विगत की, गलतियाँ बिसराइए,

                                                        दीजिए उत्तम क्षमा, अरिहन्त-मन पाईए।

    

                                                        हर कदम पर कर रहा हूँ, कुछ-न-कुछ अपराध मैं,

                                                        साधना के क्षेत्र में भी, हूँ नहीं अपवाद मैं।

                                                        खर्चता खटराग में, नित, साँस की यह सम्पदा,

                                                        मोल लेता जा रहा हूँ, आपदा पर आपदा।

                                                        प्रार्थना है आपसे, उद्धार मेरा कीजिए,

                                                        सम्पदा उत्तम क्षमा की, श्रेष्ठिवर! दे दीजिए।


                                                        मोह का विष पी रहा हूँ, किन्तु फिर भी जी रहा हूँ,

                                                        साँस की दुर्बल सुई से, जिन्दगी को सी रहा हूँ।

                                                        द्वेष का भादों बरस कर, तर-ब-तर करता मुझे,

                                                        दम्भ का दावा दहक कर, दर-ब-दर करता मुझे।

                                                        संतप्त हूँ आठों पहर, संसार के सन्ताप से,

                                                        याचना उत्तम क्षमा की कर रहा हूँ आपसे।

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                                                        क्षमा किए सुख ही बढ़े, क्षमा धर्म का सार।

                                                        अपना भी उपकार हो, पर का भी उपकार।

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मारो गोली अपनी महक को

 



दादा श्री बालकवि बैरागी की यह कविता भी मुझे पहली बार देखने/पढ़ने को मिली। उनकी बिखरी हुई, असंग्रहित रचनाओं की मेरी तलाश को जिस आत्मीयता और चिन्ता से मदद मिल रही है, वह मुझे विगलित कर देती है। 

यहाँ प्रस्तुत कविता श्री गौरीशंकर जी दुबे का कृपा-प्रसाद है। मूलतः सीतामऊ (जिला-मन्दसौर) के निवासी दुबेजी जीवन के 87वें बरस (29 अप्रेल 1940) में चल रहे हैं। रतलाम में रहते हैं। आंचलिकता और आंचलिक इतिहास पर इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में ‘आधिकारिता’ (अथॉरेटी) की हैसियत रखते हैं। इतिहासविद् और इतिहासवेत्ता के विशेषणों से अलंकृत हैं। किन्तु खुद को छात्र, जिज्ञासु और शोधार्थी ही मानते हैं। उम्र के इस मुकाम पर भी लगतार सक्रिय बने हुए हैं। खुद का लिखा भी छापते हैं और दूसरों का ‘अच्छा और पठनीय लिखा’ भी संग्रहित करके छापते हैं। 

दुबेजी को धन्यवाद देते हुए, ‘नईदुनिया’ के 2007 के दीपावली विशेषांक में छपी, दादा की इस कविता का आनन्द लीजिए।

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मारो गोली अपनी महक को


अपनी गैलरी के गमले वाले
पौधों से अधिक नहीं है औकात 
उनकी नजरों में मेरी।
वे सीचें तो मैं हरियाऊँ,
वर्ना, बिना पानी के मर जाऊँ
मेरे पत्तों, फूलों, महक तक पर
जताते हैं, अपना अधिकार,
मुझे अपनी मिट्टी से
उखाड़ फेंकने की धौंस दिलवाते हैं
इस सबसे मेरा अस्वीकार।
लटका रहूँ उनकी गैलरी में
आश्रित रहूँ उन पर
याचना करता रहूँ उनकी दया की,
बढ़ाता रहूँ उनकी शोभा,
यही है उनकी इच्छा-आकांक्षा।
और दुराग्रह यह कि
आकार नहीं ले मुझमें मेरी अपनी
कोई महत्वाकांक्षा।
बेशक गमला उनका -
गैलरी उनकी,
पर जब मैं कहूँ कि
मिट्टी मेरी-बीज मेरा,
और आकाश तक उठ जाने की
प्राणवत्ता मेरी है,
तो वे झल्लाते हैं -
मुँह मत लड़ाओ
मत इतराओ, 
अपने फूल पत्तों पर
मारो गोली अपनी महक को,
जीवित रहो, हमारी दया पर।
बस, हमारी गैलरी में
मर जाओ।
मारे-मारे मत फिरो
इधर या उधर,
आवारागर्दी मत करो,
बसन्त में यहीं फूलो
पतझर में यहीं झरो।
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रोपणी का रोना

   

            2005 में लिख दिया था  2026 का सच।

            



दादा श्री बालकवि बैरागी की बिखरी हुई, असंग्रहित रचनाओं की मेरी तलाश को जिस आत्मीयता और चिन्ता से मदद मिल रही है, वह मुझे विगलित कर देती है। 

यहाँ प्रस्तुत कविता श्री गौरीशंकरजी दुबे का कृपा-प्रसाद है। मूलतः सीतामऊ (जिला-मन्दसौर) के निवासी दुबेजी जीवन के 87वें बरस (29 अप्रेल 1940) में चल रहे हैं। आंचलिकता और आंचलिक इतिहास पर इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में ‘आधिकारिता’ (अथॉरेटी) की हैसियत रखते हैं। इतिहासविद् और इतिहासवेत्ता के विशेषणों से अलंकृत हैं। किन्तु खुद को छात्र, जिज्ञासु और शोधार्थी ही मानते हैं। उम्र के इस मुकाम पर भी लगतार सक्रिय बने हुए हैं। खुद का लिखा भी छापते हैं और दूसरों का ‘अच्छा और पठनीय लिखा’ भी संग्रहित करके छापते हैं। 

दुबेजी को धन्यवाद देते हुए, ‘नईदुनिया’ के 2005 के दीपावली विशेषांक में छपी, दादा की इस कविता का आनन्द लीजिए।

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रोपणी का रोना


ये लगाएँ पौधा और पनप जाए?
असम्भव।
इनकी बनाई सड़कें, उखड़ गईं
इनके बनाए पुल,
झेल नहीं पाए पहली ही बरसात
इनके बनाए बाँधों की क्या बात
बह गए बेचारे, अपनी किस्मत के मारे।
इनकी रोकी नदियाँ, आवारा हो गईं,
उनकी बदगुमाँ लहरों में, बीसों बस्तियाँ सो गईं!
इनके बनाए कानून, इन्हीं ने तोड़े
अपने अनुशासन के कान, इन्हीं ने मरोड़े।

इनके जलाए दीवे, समारोहों के चलते ही बुझ जाते हैं,
पता नहीं लोग इनके स्वागत में
स्वागत गीत क्यों गाते हैं।

ये हाथों से काम करते नहीं, कामों में हाथ डालते हैं
और जिस भी काम में हाथ डालते हैं उसे
पताल तक खँगालते हैं।

ऐसा ही करते-करते हाथ धोे लिए इन्होंने हाथों से
और हो गए हैं इनके हाथ ‘करकमल’
न रहे वे असल न रहे अमल।
कर्मठता का गला घोंटना इनके हाथों का खेल है,
जब हाथ-हाथ नहीं रहें तब होते ऐसे ही तुफैल हैं।

विडम्बना यह कि इनके ‘करकमल’
कोहनी से ऊपर उठते नहीं
नमस्कार तक में - बस बार-बार पहुँच जाते हैं तुम्हारी झूलती झलकती जेबों तक। 
एक तुम्हारे हाथ- जो कि यकीनन हाथ हैं
हमेशा जुड़े रहते हैं इनकी अभ्यर्थना में
और पहुँचते नहीं इनकी ऐबों तक। 

जब वृक्षारोपण के लिए उन्होंने रोपणी को थामा
तो चीख निकल गई रोपणी की 
“दूर रखो मुझे इन ‘करकमलों’ से
न मैं पौधा बन पाऊँगी न वृक्ष।
न आएँगे मुझ पर फूल
और, फलों का तो सवाल ही नहीं।
न कोई मुझे सींचेगा न सम्हालेगा,
इन्हीं का पाला कोई आवारा साँड मुझे खा लेगा।
सपनों सहित मैं मर जाऊँगी,
अपना रोना रोने, मैं किस माली के घर जाऊँगी?

मेरे कौमार्य और मेरी सतवन्ती कोख को बचाओ
हजारों वर्ष की उम्र लेकर आई हूँ-
तुम्हारी बहू-बेटी हूँ,
मेरी हत्या का कलंक अपने माथे पर मत लगाओ।”
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2017 में प्रकाशित, मरणोपरान्त मिली, ‘ताजा गजल’

फेस बुक पर मेरे बने रहने के बड़े कारणों में से एक है - दादा श्री बालकवि बैरागी की, असंग्रहित, बिखरी हुई रचनाओं की तलाश। दादा की कई रचनाएँ मुझे फेस बुक से ही मिलीं। 

इसी बहाने, दादा के अनेक प्रशंसकों से सम्पर्क हुआ। कुछ से तो यह सम्पर्क ‘निरन्तर’ होता हुआ ‘अनदेखे परिचित’ की हैसियत पा गया। इन सबकी कृपा वर्षा से मैं निहाल हुआ रहता हूँ।

दादा की जो गजल यहाँ दे रहा हूँ, वह भी इसी तरह अचानक ही मिली। इसकी खास बात यह है कि यह गजल अब तक मेरी जानकारी में ही नहीं थी। मेरे लिए यह दादा  की (मरणोपरान्त) ‘ताजा रचना’ है।

यह गजल मिली जयप्रकाशजी मानस से। उनसे मैं अब तक नहीं मिला। जो भी सम्पर्क हुआ, दादा की वजह से ही और फेस बुक से ही। रायपुर निवासी, छत्तीसगढ़ के गौरव जय प्रकाशजी मानस किसी परिचय के मोहताज नहीं। हिन्दी के समकालीन शीर्ष रचनाकारों की सूची के अनिवार्य, अपरिहार्य सदस्य हैं। दादा श्री बालकवि बैरागी को प्रायः ही प्रेमादर सहित याद करते रहते हैं। उनसे पहला सम्पर्क भी इसी कारण हुआ। वह भी अपने आप में एक संस्मरण ही है। लेकिन वह फिर कभी।

अपनी फेस बुक पोस्ट में मानसजी ने दादा की इस गजल की चार पंक्तियाँ ही दी थीं। मैंने पूरी गजल माँगी तो अत्यन्त विनम्रतापूर्वक अपनी असमर्थता जता दी। मेरी बेचैनी बढ़ गई।

अपनी बेचैनी को करार देने के लिए मैंने अपना आजमाया हुआ नुस्खा ही आजमाया - फेस बुक पर मदद माँग ली। उम्मीद से बहुत जल्दी ही मदद मिल गई। संयोग ही रहा कि मदद मिली, मेरे जन्म-नगर मनासा से। मनासा के भाई सुनील पोरवाल ‘शैलू’ ने न केवल पूरी गजल उपलब्ध कराई, ‘साहित्य अमृत’ के, जून 2017 के छपे पन्ने की फोटू ही उपलब्ध करा दी। 

आप भी मानसजी और भाई सुनील पोरवाल को जान सकें, इसलिए दोनों के फोटू दे रहा हूँ। फोटू में मानसजी अपनी जीवन संगिनी कल्पनाजी के साथ नजर आ रहे हैं। ‘साहित्य अमृत’ के पन्ने की फोटू भी प्रस्तुत है।


मानसजी और भाई सुनील पोरवाल ‘शैलू’ को बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।

अब आप दादा की ‘ताजा गजल’ का आनन्द लीजिए। 

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युग बीते

- बालकवि बैरागी


                                        युग बीते संवाद नहीं है,

                                        कब बोले, कुछ याद नहीं है।


                                       सबके सपने अलग-अलग हैं,
                                       सपनों का अनुवाद नहीं है।

                                       सूरज से पहले उठ जाना,
                                       मुरगे का अपराध नहीं है।

                                       जबसे घर का चूल्हा बदला,
                                       पहले जैसा स्वाद नहीं है।

                                       अन्धा सूरज, अम्बर नापे,
                                       तिलभर कहीं विवाद नहीं है।

                                       सातों सुर खामोश पड़े हैं,
                                       कोई भी नौशाद नहीं है।

                                       खुद की जो भी करे आरती,
                                       मिलता उसे प्रसाद नहीं है।

                                       दीवाली की हो गई होली,
                                       शेष बचा प्रह्लाद नहीं है।

                                    मिट्टी जिसका तन-मन-धन हो,
                                       उसे कहीं अवसाद नहीं है।

                                       जाने को ही आए हम सब,
                                       कोई भी अपवाद नहीं है।

                                    तुम अनादि हो, तुम अनन्त हो,
                                       यह कोई उन्माद नहीं है।

                                       कोई भी इस कोलाहल में,
                                       सुनता अनहद नाद नहीं है।

                                       आज राम का स्वागत करने,
                                       शबरी और निषाद नहीं है।
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चम्बल इलाके का अद्भुत उन्माद ‘खुईया’



किसी जमाने में इन्दौर से प्रकाशित होते रहे दैनिक ‘चेतना’ के 10 मार्च 1998 के अंक में प्रकाशित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे मन्दसौर के ख्यात इतिहासवेत्ता-पुरातत्ववेत्ता डॉक्टर श्री कैलाशचन्द्रजी पाण्डेय ने अत्यन्त कृपापूर्वक उपलब्ध कराया है। पाण्डेयजी का चित्र और उनसे प्राप्त ‘चेतना’ की कतरन यहाँ प्रस्तुत है।

‘खुईया’ और इसका यह वर्णन ‘रोमांचक और मनोरंजक’ लगते-लगते ‘भयावह, दहशतनाक’ लगने लगता है। ऐसी परम्परा और ऐसे ब्यौरे पर विश्वास कर पाना कठिन होने लगता है। इस परम्परा के बारे में जानने के लिए मैंने कोशिशें कीं। फेस बुक पर पोस्ट के जरिए भी मदद माँगी। इससे जुड़े वास्तविक, काल्पनिक चित्र पाने के लिए गूगल पर भी कोशिश की। किन्तु कहीं से कोई सूत्र हाथ नहीं लगा। लेख पढ़ते हुए पूरे समय याद रखिएगा कि यह 1993 में छपा था और तब यह परम्परा ‘समाप्तप्रायः’ दशा में थी।



चम्बल इलाके का अद्भुत उन्माद ‘खुईया’

-बालकवि बैरागी


अद्भुत उन्माद है ‘खुइया’। उन्माद भी केवल महिलाओं में। मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना और चम्बल तथा कुँवारी नदियों की कछारों में बसे देहातों में इस रस्म ने कई बार लोगों की जान तक ले ली है। समय के विकास के साथ ही अब यह रस्म, यह उन्माद कम होता जा रहा है। लेकिन बताया जाता है कि यत्र-तत्र यह रस्म आज भी पूरी होने के समाचार बनते हैं। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस उन्माद भरी रस्म का रिश्ता पवित्र विवाह संस्कार जैसे मांगलिक सन्दर्भ से जुड़ा हुआ है। 

दिलचस्प बात यह भी है कि इस उन्माद का शिकार केवल पुरुष वर्ग ही होता है। उन्माद-पूर्ण आक्रमण करनेवाला समूह महिलाओं का रहता है।

किसी गाँव-देहात या कस्बे में किसी लड़के की शादी है। लड़के की घुड़चढ़ी हो गई है। बारात सज गई और दूल्हा अपनी बारात लेकर लड़की के गाँव चल पड़ा। बारात के जाने से लेकर पाणिग्रहण संस्कार पूरा करके दूल्हा जब तक दुल्हन सहित अपनी बारात के साथ सकुशल घर नहीं लौट आता तब तक का समय-काल ‘खुईया’ कहलाता है। दूल्हे के घर, ज्यौत पर आई बहन-बेटियों, घर की महिलाओं और उसके गली-मुहल्लेवाली औरतों पर एक पागलपन सवार हो जाता है। समूह के समूह इस उन्माद से ग्रस्त हो जाते हैं। कोई पुरुष उनके हत्थे चढ़ भर जाना चाहिए। अगर हत्थे नहीं चढ़ा तो जैसे-तैसे, बहला-फुसलाकर किसी न किसी बहाने उसे अपने घेरे में फँसा लिया जाता है। ज्योंही यह ‘मर्द बच्चा’ ‘खुईया’ चढ़ी औरतों के दायरे में आया कि फिर एक सर्वथा नई ‘लोक संस्कृति’ और ‘लोक सभ्यता’ से उसका सामना होता है।

बेलन, मूसल, झाड़ू, डण्डा, लकड़ी, लाठी, जूता, चप्पल, घूँसा, थप्पड़, लात, हाथ इस कदर चलते हैं कि सारी ‘मर्दानगी’ धरी रह जाती है। कपड़े उसके जिस्म पर बच गए तो समझो सस्ते में छूटे। गालियाँ एक-से-एक बेजोड़-अनमोल और शब्दकोश से कोसों दूर कि उसकी माँ, बहिन, बीबी, बेटी, बहू सब इन गालियों में विद्यमान। भारत की पुलिस ‘खुईया’ में से अपने लिए नई गालियाँ थोक में ले सकती है। जो मर्द मार खा रहा है उसके बचाव का कोई रास्ता नहीं। पच्चीस-तीस महिलाएँ एक पुरुष को घेरे और उसके कपड़े फाड़े या उतारे तो वह करेगा भी क्या?

एक समय था जब यदि किसी को पता चल जाता था कि गाँव में ‘खुईया’ चढ़ा हुआ है तो लोग उस गाँव का रास्ता बदल लेते थे। गलियाँ बन्द हो जाती थीं। मर्द घर में घुस कर अपनी खैर मनाते थे। किस्से यहाँ तक बने मिलते हैं कि कई मर्दों को पेड़ों से बाँध दिया गया। फिर पिटाई हुई। हाथ-पाँव बाँध कर, उसके वस्त्र हरण करके छोड़ देने के उदाहरण भी मिले। क्रूरतम उदाहरण यह भी मिला कि पहले पुरुष के हाथ पीछे बाँध दिए गए। फिर उसका एक पाँव पेड़ से बाँधकर दूसरा पाँव एक भैंस के गले में लटके रस्से से बाँधा गया। फिर भैंस को पीटकर दौड़ाया गया। गालियाँ इतनी जोर और हल्ले वाली कि बेचारा अधमरा होकर अचेत हो गया। ‘खुईया’ का शिकार अगर गाँव में अपना रोना रोए तो लोग उलटा उसे ही डाँटे - ‘तू उस मुहल्ले में गया ही क्यों?’ राज-कचहरी करो तो गवाहदार कोई नहीं। पुलिस भी कहे - ‘खुईया में यह सब होता है। बीड़ी पी और घर जा। भगवान का शुक्र मना।’ 

पहले बारातें दो-दो, तीन-तीन दिनों में लौटती थीं। उन दिनों यह उन्माद गाँवों में जरा ज्यादा ही टिकता था। अब शादी-ब्याह साँझ-सवेर में हो जाते हैं। बारातें बीस-बाईस घण्टे में लौट आती हैं। ‘खुईया’ का ज्वार जल्दी उतर जाता है। वैसे भी महिलाओं में पढ़ाई और शिक्षा का आलोक फैलने के बाद इस रस्म में कुछ ‘रहम’ जैसा तत्व शामिल हो गया है।

‘खुईया’ में से बच कर निकले एक भाई ने मुझे बताया कि यह उन्माद युवा और अधेड़ महिलाओं पर ज्यादा चढ़ता है। अपने समय को जी चुकी बूढ़ी महिलाएँ दर्शक बनी देखती रहती हैं। नई लड़किया औचक-भौंचक, हक्की-बक्की रह जाती हैं। कुछ ‘खुईया’ का प्रशिक्षण लेती हैं। कुछ नई-नई गालियों से पहली बार परिचय प्राप्त करती हैं। 

‘खुईया’ का बुखार उतर जाने पर वही ‘मरद’ उन्हीं महिलाओं में बहुत ही सहजता से इतने शील और लज्जा से सम्मान पाता है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। न इसे शिकायत, न उन्हें मलाल।

पता नहीं, भारत की लोक-संस्कृति का यह कौन सा रंग है? पर जैसा भी है, अद्भुत है। अनोखा है।

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‘चेतना’ की कतरन


इस त्याग-पत्र को, आज क्या कहेंगे?



(‘भाई साहब’ के दामाद, मेरे पुराने कृपालु श्री भारत भूषण शुक्ला ने ‘श्री श्यामसुन्दर पाटीदार स्मृति ग्रन्थ’ की प्रति दी। उसी से इस घटना का पहला, बहुत बारीक धागा मिला। उससे मैंने अपनी यादों के कोठार की खूब छानबीन की, घुटनों पर खूब मालिश की और संस्मरण का यह ‘कटपीस’ तैयार किया।)

अखबार हो या इलेक्ट्रनिक मीडिया, ‘त्याग-पत्र की माँग’ सबमें समान रूप से मौजूद है। माँगनेवाले पूरी ताकत से माँग रहे हैं और देनेवाले, पूरी ताकत से इस माँग की अनसुनी-अनदेखी कर रहे हें।

ऐसे माहौल में कल्पना की जा सकती है कि कोई मन्त्री, चुपचाप त्याग-पत्र दे दे? इतना चुपचाप कि यह चुप्पी चौंेका दे। हैरत में डाल दे। न पीड़ित पक्ष माँगे, न विरोधी दल, न कोई यूनियन न सामाजिक संगठन, न कोई अखबार, न खुद मुख्य मन्त्री, न ही पार्टी का असन्तुष्ट गुट! 

लेकिन हुआ है। एक ऐसा ‘चुपचाप त्याग-पत्र’ हुआ है। मध्य प्रदेश में हुआ है।

आगे कुछ जानने से पहले, इस कथा के नायक श्री श्यामसुन्दरजी पाटीदारजी के बारे में थोऽड़ा सा जान लीजिए। वे, मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले के छोटे से गाँव लासूर के देहाती-किसानी पृष्ठभूमि से आये, कानूनों के ज्ञाता, विद्वान् वकील थे। जिला मुख्यालयवाले नगर, भगवान पशुपतिनाथ की नगरी मन्दसौर में बस गए थे। वहीं वकालात करते थे। लेकिन बाद में वकालात छोड़कर मजदूरों-कामगारों की बेहतरी की भावना से राजनीति में आ गए थे। वे बरसों तक मन्दसौर विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे।   

1984 का, लोक सभा का मध्यावधि चुनाव, असामान्य स्थितियों में हुआ चुनाव था। यूनियन कार्बाइड का भीषण गैस काण्ड हो चुका था। मरनेवालों की गिनती पर पूर्ण विराम नहीं लग रहा था। हर सुबह अखबारों में मौतों का आँकड़ा बढ़ रहा था। राजनीति या तो चौकड़ियाँ भूल भी रही थी और चौकड़ियाँ मार भी रही थी। अखबारों के लिए अपना मुखपृष्ठ संयोजित करना ‘जानलेवा’ काम बन गया था-गैस काण्ड को ़प्रमुखता दें या चुनावी खबरों को? दादा श्री बालकवि बैरागी मन्दसौर संसदीय क्षेत्र से काँग्रेस के उम्मीदवार थे। वे उस समय विधायक भी थे। मध्य प्रदेश में काँग्रेस की सरकार थी। अर्जुनसिंहजी मुख्य मन्त्री थी। मतदान तीन चरणों में होना था - 24, 27 और 28 दिसम्बर को। 

मन्दसौर क्षेत्र का मतदान 27 दिसम्बर को हो चुका था। यह 28 दिसम्बर की शाम थी। हम सब, समीक्षाओं और अनुमानों की जुगाली कर रहे थे। डायलिंग वाले लेण्ड लाइन फोन, रेडियो और अखबार ही संचार-समाचार का माध्यम थे। शाम सात बजे आकाशवाणी के भोपाल-इन्दौर केन्द्र से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन प्रसारित होता था। उस 28 दिसम्बर की शाम के प्रादेशिक समाचार बुलेटिन का पहला समाचार था - ‘प्रदेश के श्रम मन्त्री श्री श्यामसुन्दर पाटीदार ने त्याग-पत्र दे दिया है जिसे राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया है।’ हम सब चौंके। लेकिन एक और इस बात ने हमें को चौंकाया कि समाचार सुन कर दादा नहीं चौंके। हमने पूछा - ‘आपने सुना?’ दादा ने सहज भाव से कहा -‘हाँ। सुना।’ हम फिर चौंके - ‘आपको अजीब नहीं लगा? आपको कारण मालूम है?’ उसी तरह सहज भाव से दादा ने जवाब दिया - ”कारण न तो किसी ने बताया और न ही मैंने पूछा लेकिन मुझे मालूम है। अजीब तो तब लगता यदि ‘भाई साहब’ स्तीफा नहीं देते।“ पाटीदारजी को हमारे इलाके में (आज भी) ‘भाई साहब’ कहा-पुकारा और जाना-पहचाना जाता है। हम सब भौंचक्के, दादा का मुँह देखने लगे। उसी शान्त भाव-मुद्रा में दादा ने कहा - ‘तलाश करो कि भाई साहब ने स्तीफा कब दिया। उन्होंने स्तीफा आज नहीं दिया होगा। पहले ही दे चुके होंगे।’ हम किससे और कैसे पूछते-तलाशते? हमारी पहुँच ही कितनी थी। हम ‘मियाओं’ की ‘दिल्ली’ तो दादा ही थे और वे ही हमसे तलाश करने की कह रहे थे! बात वहीं आई-गई हो गई।

पूरा किस्सा बाद में, बहुत बाद में मालूम हुआ।

यूनियन कार्बाइड कारखाने में गैस काण्ड हुआ था 2-3 दिसम्बर की सेतु-रात्रि (दरमियानी रात) में। कह सकते हैं, 3 दिसम्बर को। ‘भाई साहब’, 4 दिसम्बर को मुख्यमन्त्री अर्जुनसिंहजी के पास पहुँच गए। श्रम मन्त्री के पद से अपना त्याग-पत्र उन्हें थमाया। उन क्षणों में अर्जुनसिंहजी की स्थिति-मनस्थिति का अनुमान कर पाना अभी भी कठिन ही होगा। हर पल बढ़ता मौतों का आँकड़ा, जिस स्थिति में हर इन्तजाम कम और छोटा पड़ जाए, आदमी संज्ञा-शून्य होने की दशा में आ जाए, उस दशा में मरते लोगों को बचाने के इन्तजामों की चिन्ता, यूनियन कार्बाइड के कर्ता-धर्ता एण्डरसन को भगाए जाने का गम्भीर आरोप, बदहवासी की ऐसी घटाटोप दशा में, एक मन्त्री अपना स्तीफा सौंपने चला आए!  

कुछ ही पलों का, वहाँ हुआ वार्तालाप कुछ ऐसा था - 

‘यह समय नहीं है इस पर बात करने का। अभी जाइए। बाद में बात करेंगे।’  

‘जी। बात बाद में करेंगे। आप यह (त्याग-पत्र) रख लीजिए।’ 

‘आपसे किसी ने माँगा?’ 

‘नहीं। किसी ने नहीं माँगा।’ 

‘तो फिर?।’ ‘मैं स्वीकार नहीं करता।’ 

‘वह आपका अधिकार है। आप जानें। मैं अपनी आत्मा की अनसुनी नहीं कर सकता। नैतिक जिम्मेदारी मेरी बनती है। मैं स्तीफा दे चुका। वापस नहीं लूँगा। आप अस्वीकार करेंगे तो भी वापस नहीं लूँगा।’  

‘ठीक है। मैं रख रहा हूँ। लेकिन आप देख रहे हैं, चुनाव चल रहे हैं। आप इसकी (त्याग-पत्र की) कहीं चर्चा मत कीजिएगा। पार्टी को नुकसान हो सकता है।’ 

‘जी। ठीक है। आप निश्चिन्त रहिए।’ 

और, अपनी चिर-परिचित मुद्रा में, विनम्रता से करबद्ध नमस्कार कर, ‘भाई साहब’ लौट आए।

28 दिसम्बर की शाम, मतदान का अन्तिम दौर समाप्त हुआ और ‘भाई साहब’ का त्याग-पत्र स्वीकार करने की खबर आ गई।

31 मार्च 2002 को ‘भाई साहब’ का निधन हुआ। मरणोपरान्त उनके कागज-पत्तर खँगालते हुए उनका ‘यह’ त्याग-पत्र सामने आया। भाई साहब के ‘व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों’ के बारे में दादा का अनुमान सौ टका सही निकला। 4 दिसम्बर 1984 की तारीखवाले इस त्याग-पत्र की इबारत है - ‘प्रिय अर्जुनसिंहजी, औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, श्रम मन्त्रालय का विषय है। न केवल मध्य प्रदेश वरन् देश में कल यूनियन कार्बाइड से विषाक्त गैस के रिसाव के कारण भोपाल में हुई त्रासदी अभूतपूर्व अपने प्रकार की है। उसका नैतिक दायित्व मुझ पर है। मुझे इस त्रासदी के लिए खेद है और मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। लोेकतन्त्र के उच्च आदर्शों के अनुरूप मुझे इस पद पर बने रहना उचित नहीं। अतः मैं अपना त्याग-पत्र प्रस्तुत कर निवेदन करता हूँ कि तत्काल प्रभाव से मुझे इस पद से मुक्त करने की कृपा करें। आपके सहयोग और मार्गदर्शन के लिए सदैव आभारी रहूँगा। भवदीय - श्याम सुन्दर पाटीदार।’  

‘भाई साहब’ के इस त्याग-पत्र को, आज के जमाने में क्या कहा जाएगा?

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ऊपरवाले चित्र में अपनी पुत्री भारती, नाती दर्पण और नातिन दीप्ति के साथ ‘भाई साहब’। नीचेवाले चित्र में अपने बेटे दर्पण को ‘बर्थ-डे-केक’ खिलाते हुए दामाद भारत भूषण शुक्ला और दोनों को प्रसन्नवदन निहारते हुए ‘भाई साहब’।


1988 में वेनिटी बेग वाली अशिक्षित, अनपढ़ आदिवासी सरपंच

लगता है, दादा श्री बालकवि बैरागी के, इधर-उधर बिखरे हुए लिखे को जुटाने में मेरी हर कोशिश अपने-आप में एक संस्मरण बन जाएगी।

देश के ख्यात इतिहासवेत्ता और पुरातत्ववेत्ता मन्दसौरवाले डॉ. श्री कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय ने दादा का एक प्रेस नोट और उससे जुड़ा, स्व. राजीव गाँधी का एक पत्र भेजा। आज की यह पोस्ट इन्हीं पर आधारित है। दादा का यह प्रेस नोट और राजीवजी का पत्र यहाँ दे रहा हूँ।

प्रेस नोट पढ़कर, पत्रकारिता का सुप्त अमीबा सक्रिय हो गया। मुझे लगा कि इसे प्रकाशित करते हुए, इसकी नायिका का चित्र भी साथ में हो तो लेख की सुन्दरता (और विश्वसनीयता भी) बढ़ जाएगी। लेकिन बात लगभग चालीस बरस पुरानी। मुझे नायिका के नाम और गाँव से अधिक कुछ भी नहीं पता। चित्र कैसे और किससे हासिल किया जाए? ऐसे में मेरे ‘बीमा एजेण्ट’ ने कोंचा - ‘मदद के लिए दसों दिशाओं में आवाज लगाओ। मिल जाए तो मुकद्दर। न मिले तो भला खोया क्या?’ 

जहाँ-जहाँ हलकी से हलकी भी गुंजाइश हो सकती थी, वह प्रत्येक दरवाजा खटखटाया। एक जचाब आया - ‘मेरा तो कोई सम्पर्क नहीं। आसपास टटोलता हूँ।’ एक अन्य ने कहा - ‘हलकी सी उम्मीद है। मैं कोशिश करता हूँ।’ लेकिन अगले ही दिन क्षमा-याचना आ गई। 

मुझे कोई जल्दी नहीं थी। सोचा, दो-एक दिन और राह देख लेते हैं। लेकिन अचानक लॉटरी खुल गई। देश के विख्यात आरटीआई एक्टिविस्ट, मेरे कृपालु, नीमचवाले श्री चन्द्रशेखर गौर का सन्देश आया - ‘शाम तक फोटू आ जाएँगे।’ मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। शेखर भाई का भला इस क्षेत्र से क्या सम्बन्ध? रहा नहीं गया। फौरन ही फोन किय। पूछा - ‘यह तो आपका क्षेत्र ही नहीं! कैसे किया आपने यह कारनामा? बोले - ‘मुझे भी अन्दाज नहीं था कि इतना आसान हो जाएगा। मैंने नीमच काँग्रेस जिलाध्यक्ष  श्री तरुणजी बाहेती  से बात की। उन्होंने नायिका के गाँव के ही एक काँग्रेसी नेता श्री भगवान भील का नम्बर दिया। मैंने भगवान से बात की। आपका और दादा श्री बालकवि बैरागी का हवाला दिया। उन्होंने शाम तक फोटू उपलब्ध कराने का वादा किया। उम्मीद करें कि शाम तक फोटू आ जाएँ।’ मेरे लिय यह सब किसी चमत्कार से कम नहीं था। शेखर भाई में मुझे वेताल/फेण्टम नजर आने लगा। शाम से पहले ही न केवल फोटू आ गए बल्कि भाई भगवान भील का फोन भी आ गया। बहुत खुश थे। बताया कि वे जावद जनपद पंचायत में ‘जनपद प्रतिनिधि’ भी हैं और नीमच जिला आदिवासी काँग्रेस के जिलाध्यक्ष भी हैं। 

जो काम मेरे लिए ‘हिमालय’ था, उसे शेखरजी और भगवान भाई ने मेरे बरामदे के गमले के गुलाब की तरह उपलब्ध करा दिया। कैसे धन्यवाद दूँ? कितने आभार मानूँ? ये फोटू मिलने पर मेरे अन्तर का पत्रकार बिलकुल उस बच्चे की तरह खुश है जिसे मनचाहा खिलौना मिल जाए।

अब आप, संस्मरण बन चुके इस किस्से का आनन्द लीजिए। (यदि यह आनन्ददायक हो तो।)

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दिनांक 21 अगस्त 1988


प्रकाशनार्थ

महोदय!

अभिवादन सादर -

एक बहुत ही दिलचस्प स्थिति प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

इस पत्र के साथ हमारे प्रधान मन्त्री श्री राजीव गाँधी का 7 अगस्त 1988 का एक पत्र (फोटो स्टेट) देखिए। इस पत्र में राजीवजी ने एक सरपंच श्रीमती हरकू बाई का उल्लेख किया है। हरकू बाई मन्दसौर जिले की आदिवासी पंचायत कोज्याँ (तहसील जावद) की सरपंच हैं और एक भद्र आदिवासी गृहिणी हैं। बिलकुल अपढ़ और निरक्षर। 

हुआ यूँ कि, आप मानें या नहीं मानें मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री का आगमन विगत 28 वर्षों से नहीं हुआ है। सन् 1954 में पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू  गाँधी सागर बाँध का शिलान्यास करने पधारे थे। फिर 1960 में वे उसी बाँध का उद्घाटन करने पधारे। तब पण्डितजी ने मेरे जिले का एक तरह से सघन दौरा किया था। बेशक उनके बाद सन् 1972 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी एक चुनाव सभा में भाषण देने हेतु पधारी। वे कुल मिलाकर शायद आधा घण्टा मन्दसौर में रुकीं। वे पुनः 1979 में मन्दसौर आईं पर तब वे प्रधान मन्त्री नहीं थीं। हमारी काँग्रेस अध्यक्ष थीं। 1972 में वे जरूर प्रधान मन्त्री के तौर पर आईं किन्तु चुनाव सभा के सिवाय वे कहीं नहीं गईं। और चुनाव सभा की हाजिरी को हमारी जनता वस्तुतः हाजिरी नहीं मानती। इस तरह मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री की गैर हाजिरी विगत 28 वर्षों से रेखांकित होती जा रही है। 

श्री राजीव गाँधी भी सन् 1984 के अपने दौरे में जावरा तक तो पधारे पर मन्दसौर नहीं लाये जा सके। जावरा मेरा चुनाव क्षेत्र होते हुए भी मूलतः रतलाम जिले का एक हिस्सा है। याने कि रस्म के तौर पर मेरे चुनाव क्षेत्र में प्रधान मन्त्री कृपापूर्वक पधारे तो सही पर मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री की 28 वर्षीय सन्नाटेदार अनुपस्थिति को जिले की पूरी दो पीढ़ियों ने गहरी टीस के साथ अनुभव किया है। अस्तु,

मैंने राजीवजी के सामने बार-बार इस अनुपस्थिति का जिक्र किया। वे हर बार सहमत रहे कि यह अनुपस्थिति उपस्थिति में बदली जानी चाहिए। और तभी हरकू बाई बीच में आती है। 

आजादी के 40 साल बाद मैं पहला सांसद ऐसा निकला जो संसद सदस्य के तौर पर पहली बार कोज्याँ गया। क्षमा कर दें, मन्दसौर के कलेक्टर को भी मैंने प्रेरित करके 40 साल में पहली बार कोज्याँ जाने की स्थिति पैदा की। तब तक कोई कलेक्टर नामधारी अधिकारी कोज्याँ नहीं पधारे थे। वह घनघोर सूखे का समय था। कलेक्टर मेरे दौरे के भी एकाध माह बाद ही वहाँ पहुँचे। 

कोज्याँ की चौपाल पर मैंने आदिवासी बहिन भाइयों से अपनी शैली में बात की। पूछताछ भी की। अपनी दैनन्दिन समस्याओं के साथ हरकू बाई ने यह माँग भी रखी कि श्री राजीव गाँधी कोज्याँ पधारे। अन्धा क्या माँगे - दो आँख। मेरी वही स्थिति हो गई। मैंने शर्त रखी कि यदि हरकू बाई अपने दस्तखत से राजीवजी को पत्र लिख कर न्यौता दे तो मैं राजीवजी को ला सकता हूँ। 

और हरकू बाई ने तपस्या शुरू कर दी। 

इस अपढ़ महिला सरपंच ने रात-दिन एक करके लिखना-पढ़ना और हस्ताक्षर करना सीखना शुरू किया। राजीवजी के नाम पत्र तैयार किया। हस्ताक्षर किये और जावद क्षेत्र के हमारे सक्रिय कार्यकर्ता भाई श्री घनश्याम पाटीदार के माध्यम से मुझ तक पहुँचाया। मैं इस तपस्या से अभिभूत, रोमांचित। अपने पत्र के साथ हरकू बाई का लिखित न्यौता लेकर राजीवजी के सामने खड़ा हो गया। सारी बात उन्हें बताई। वे सस्मित सुनते रहे। पत्र लिया। निर्देश अंकित किया और परिणाम आपके सामने है। 

निस्सन्देह प्रधान मन्त्री राजीव गाँधी इस वर्षा के बाद मन्दसौर जिले में पधारेंगे। प्रधान मन्त्री के इस दौरे का बड़ा श्रेय मैं श्रीमती हरकू बाई को अभी से दे दना चाहता हूँ। मेरा विश्वास है कि तब तक हरकू बाई का अक्षर ज्ञान अधिक विस्तृत हो जायेगा। हरकू बाई का मैं जितना भी आभार मानूँ, मुझे कम लगता है। हरकू बाई जिन्दाबाद।

बालकवि बैरागी।

संलग्न

श्री राजीव गाँधी का 7 अगस्त 1988 का पत्र (फोटो स्टेट)

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दादा का प्रेस नोट


श्री राजीव गाँधी का पत्र



चित्र मे हरकूबाई अपने पति श्री नारायणलाल और पोते नन्दलाल के साथ। हरकूबाई के हाथ में ‘वैनिटी बेग’ ‘दर्शनीय’ है। सन् 1988 में, दूर-दराज के गाँव की किसी अनपढ़-अशिक्षित आदिवासी महिला के हाथ में वैनिटी बेग किसी ‘बॉक्स न्यूज’ से कम नहीं होता। भगवान भाई ने रोंगटे खड़े कर देनेवाली बात बताई - ‘यह फोटू उसी दिन, उसी समय का है जब हरकू बाई, राजीवजी से मिलने के लिए दिल्ली के लिए गाँव से जा रही थी।’ (हरकूबाई के राजीवजी से मिलने की बात के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम।) इसके साथवाले चित्र में आज की हरकूबाई है। 

चित्र में बाँये से भगवान भाई भील अपनी पत्नी घीसीबाई, बेटों हरिकिश्न और देवराज के साथ। डॉ. के. सी. पण्डेयजी और कृपालु चन्द्र शेखरजी गौर।

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दशपुर जनपद के शैलाश्रय: मिट्टी के ये रंग हजारों वर्ष पुराने हैं

दशपुर जनपद (‘दशपुर’ यानी मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय वाला शहर मन्दसौर) के शैलाश्रयों पर केन्द्रित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे अचानक ही मिला। मुमकिन है, लेख मिलने की कथा, मूल लेख से बड़ी हो जाए, लेकिन पढ़ लीजिए।  

दादा की आत्मकथा ‘मँगते से मिनिस्टर’ का नाम अधिकांश लोगों ने सुना ही होगा। सब मानकर चल रहे हैं कि यह किताब प्रकाशित हो चुकी है। जबकि यह किताब अब तक छपी ही नहीं है। हमारे परिवार में किसी के पास इसकी पाण्डुलिपि ही नहीं है। दादा ने दिल्ली के कुछ प्रकाशकों को इस किताब की पाण्डुलिपि दी थी। लेकिन हममें से किसी को, किसी प्रकाशक के बारे में भी मालूम नहीं।  

मैं, दादा की, इधर-उधर बिखरी हुई प्रकाशित/अप्रकाशित रचनाओं की तलाश में अनवरत लगा हुआ हूँ। इसी क्रम में, देश के जान-माने इतिहासकार और पुरातत्वविद्, दशपुर एडवांस स्टडीज सेण्टर, मन्दसौर के डायरेक्टर डॉ. श्रीयुत कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय से अचानक संकेत मिला कि ‘मँगते से मिनिस्टर’ की पाण्डुलिपि मन्दसौर के एक मुद्रक के पास हो सकती है। मेरे लिए तो यह खबर ‘करण्टदार’ थी। उनसे सम्पर्क किया। पाण्डुलिपि की बात खतम होते-होते पाण्डेयजी ने इस लेख का जिक्र किया। यह लेख वस्तुतः, मन्दसौर निवासी श्री गिरजाशंकरजी रूनवाल का साक्षात्कार है। रूनवालजी के बारे में, यह लेख पढ़ते-पढ़ते आप खुद जान जाएँगे।

रूनवालजी से बात कर पाना सम्भव नहीं था। पाण्डेयजी ने रूनवालजी के बेटे श्री मनीष रूनवाल का नम्बर दिया। मनीषजी ने ही लेख उपलब्ध कराया।  

लेख का पुरातात्विक, ऐतिहासिक महत्व क्या है, कितना है, यह जानने-समझने की कोशिश मैंने बिलकुल ही नहीं की। यदि किसी को रुचिकर, उपयोगी अनुभव हो जाए तो मेरे लिए यह अतिरिक्त प्राप्ति होगी। मेरे लिए तो यह लेख दादा का एक ‘लुप्तप्रायः’ लेख है। दादा की बिखरी रचनाओं को संग्रहित करने के अपने अभियान के तहत मैं इसे अपने ब्लॉग पर और सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर रहा हूँ। 

साप्ताहिक हिन्दुस्तान (दिल्ली) के 8 जुलाई 1984 के अंक में प्रकाशित इस लेख के सामने आने का समूचा श्रेय माननीय डॉ. श्री कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय, माननीय गिरजाशंकरजी रूनवाल  और श्री मनीषजी रूनवाल को है।

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श्री गिरजाशंकरजी रूनवाल,     डॉ. कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय,     श्री मनीषजी रूनवाल।



दशपुर जनपद के शैलाश्रय: मिट्टी के ये रंग हजारों वर्ष पुराने हैं

- बालकवि बैरागी

वे अपने परिश्रम के पाँखुरी-पृष्ठों को बटोर रहे हैं। पूरे दो घण्टों की लम्बी भेंट-वार्ता पर मेरी विह्वल कलम अनायास कुछ पंक्तियाँ निसृत कर बैठती हैं -

एक यायावर भटकता फिर रहा है
खोज में शैलाश्रयों की
पार करता पर्वतों को
लाँघता नाले नदी नद
नापता निर्द्वन्द्व नटखट
निर्झरों को
राम जाने यह निरन्तर यात्रा
होगी समापित कब।

कौन है यह यायावर? कहाँ की है यह यात्रा? कब से शुरु हुई? कब पूरी होगी? क्या पाया इस यायावर ने? आखिर यह सब क्यों हो रहा है?

एक लम्बे समय से हल्की-हल्की सुरसुरी मुझ तक आई जरूर थी कि मनासा और जावद तहसील की उत्तर सीमा पर रांगोली जैसे सजे-धजे अरावली शैल-शृंग की बीहड़ घाटियों में एक बावला ‘मास्टर’ अपनी सायकिल लिए रात-दिन घूमता फिर रहा है। गत छह महीने तक तो आसपास के लोग यों समझे कि हो न हो किसी तन्त्र साधना में यह शिक्षक पगला गया है। पर कालान्तर में स्थिति स्पष्ट हो गई।

जावद तहसील में एक गाँव है - डीकेन। वहाँ की कन्या माध्यमिक शाला में प्रधानाध्यापक है मन्दसौर निवासी श्री गिरजाशंकर रूनवाल। सैंतालीस वर्षीय इस अधेड़ शिक्षक ने अन्ततः दशपुर जनपद में अपनी यायावरी के दौरान आज से यही कई 30000 साल पुराने शैलाश्रयों को खोज ही लिया। हमारे किसान, हमारे चरवाहे, हमारे ग्वाल-गोपाल हो-न-हो इन शैलाश्रयों के आसपास से पचासों बार गुजरे होंगे पर उनकी अल्हड़ और लापरवाह नजरों ने कभी भी इन शैलाश्रयों का नोटिस नहीं लिया। अपनी पीएच.डी. के सिलसिले में गिरजाशंकर भाई ठेठ वहाँ तक जा पहुँचे जहाँ तक कि उनसे पहले उस नजर को लेकर कोई नहीं पहुँच पाया था। डॉ. हरिभाऊ वाकणकर उनके निर्देशक हैं और अपने निर्देशक की अन्तरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त परम्परा से जुड़ कर गिरजा भाई ने अपने निर्देशक गुरु को नया गौरव ही दिया है। बधाई!

मैं उनसे लम्बी बात करता हूँ। गिरजाशंकर मेरे पुराने साथी हैं। हमारा किशोरकाल साथ-साथ बीता। हमारा यौवन अपने-अपने संघर्षों में खिसक गया, पर गिरजा भाई की संकोचभरी विनम्रता जहाँ-की-तहाँ है, जस-की-तस। वे सकुचाते हुए अपना ब्रीफकेस खोलते हैं और उसमें से कतिपय विद्वानों की कुछ पोथियाँ मेरे आगे रखते हैं। फिर शैलाश्रयों में प्राप्त हजारों साल पुराने शैल चित्रों की समानुपातिक स्केल पर तैयार की गई अनुकृतियों को मेरे सामने फैला देते हैं। एक-एक चित्र पर पॉइण्टर रखते हुए मुझे उसका काल और समय बताते हैं। मैं विस्फारित आँखों से उनको देखता रहता हूँ। मेरे अपने ही आस-पास संस्कृति और संसृति का इतना विराट, विशाल भण्डार फैला पड़ा है और हम में से कोई भी इस अनमोल राशि को पहचान नहीं सका! परिचय के लिए उनमें से कुछ चित्र मैंने रख लिए। पाठकों की जानकारी के लिए भी दे रहा हूँ।

40 हजार साल पुराने शैल चित्र

जब गिरजा भाई भानपुरा में कभी थे तब ही उन्हें जानकारी मिल गई थी कि मन्दसौर जिले में शैल चित्र प्रचुर मात्रा में मिल सकते हैं। आज उनका यह नियम है कि वे स्कूल से दोपहर एक बजे छूटते ही अपनी सायकल लेकर निकल पड़ते हैं। प्रतिदिन करीब 15 से 20 किलोमीटर की यात्रा वे सायकल पर करते हैं और पहाड़ों के वक्ष और ललाट पर लिखी इस चित्र-लिपि को पढ़ने का प्रयत्न करते हैं। उनका कहना है कि मन्दसौर जिले में प्रागैतिहासिक काल से भी पुरानी शैल-चित्रावली मिलने की पूरी सम्भावना है। यानी कि चालीस हजार साल से भी पुराने शैल चित्र! एक रोमांच सा मुझे हो आता है। उनका यह भ्रमण अकेले होता है। जितना सायकल से नाप सकते थे उतना नाप चुके। अब तो उन्हें पदयात्रा ही करनी होगी। दशपुर जनपद की जावद तथा मनासा तहसीलों के जिन स्थानों पर वे सफलतापूर्वक यह खोज पूरी कर पाएँगे वे हैं - अधरशिला, जेतपुरा, खरड़ी, लाँपिया, चिरपरेवा, करेर, राणी छज्जा, कंजारड़ा घाटा, भरड़ा दोह तथा सीमावर्ती राजस्थान के इलाके गरवाड़ा और बाबाजी की मण्डी। सप्ताह में चार दिन उनका यह भ्रमण होता है। शेष तीन दिन वे इन सन्दर्भों का होम-वर्क करते हैं। काल-निर्णय पर जब मैंने उनसे सवाल किया तो वह बोले, इन शैल चित्रों के बारे में मध्य प्रदेश सरकार की पुरातत्व पार्टी और विक्रम विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा काल निर्णय किया गया है। बड़े ही आदर के साथ वे डॉ. वाकणकर का नाम लेते हैं और साथ ही इस दिशा में काम कर रही रजिस्ट्रेशन अधिकारी कुमारी भारती जोशी का भी उल्लेख पूरे आदर के साथ करते हैं।

श्री गिरजाशंकरजी ने इस यात्रा के दौरान करीब-करीब एक सौ शैलाश्रय ऐसे तलाशे हैं जिन पर कि ये चित्र मिलते हैं। एक अलभ्य कला-संसार का सर्जन यहाँ उनको मिलता है। डॉ. जगदीश गुप्त ने अपनी पुस्तक ‘प्रागतिहासिक भारतीय चित्रकला’ के 1967 के संस्करण में पृष्ठ 419-420 पर लिखा है कि सिन्धु घाटी सभ्यता से पूर्व ‘उल्टे स्वस्तिक’ याने कि ‘वामावर्त स्वस्तिक’ मात्र कल्पना की वस्तु थे। गिरजाशंकरजी ने अपनी खोज में यहाँ उल्टे स्वस्तिक ढूँढ कर डॉ. जगदीश गुप्त के इन पृष्ठों पर हमारे जनपद को गौरव के साथ स्थापित कर दिया है। तब फिर क्या दशपुर जनपद सिन्धु घाटी सभ्यता से भी पहलेवाली सभ्यता का शीर्ष है? मैं इस बिन्दु को विद्वानों एवं विशेषज्ञों के लिए छोड़ कर आगे बढ़ जाता हूँ।

इन शैल चित्रों का काल हमारे विशेेषज्ञों ने 3000 से 30000 साल पुराने निर्णीत किया है। डॉ. वाकणकर अपनी पुस्तक ‘दी डान ऑफ इण्डियन आर्ट’ में लिखते हैं कि आदि मानव ने सबसे पहला रंग जो उपयोग में लिया वह हरा और लाल रंग था। जब भारतीय शैल चित्रों और शैलाश्रयों की खोजबीन के दौरान महाराष्ट्र के धूलिया और मध्य प्रदेश के भीमबैठका का कार्बन परीक्षण नीदरलैण्ड में करवाया गया तो शुतुरमुर्ग के अण्डों की उम्र के आधार पर वहाँ के हरे रंग का काल निर्धारण हुआ। 39000 वर्ष पुराना। यदि इसको हम आधार मानते हैं तो दशपुर जनपद का आदिम हरा रंग इससे भी पुराना मिलता है। इन शैलाश्रयों में हरे रंग के कुल दो चित्र बचे हैं। गिरजाशंकरजी ने जो अनुकृतियाँ प्रस्तुत की हैं, वे बिलकुल उन्हीं रंगों में हैं जैसे कि वहाँ चट्टानों पर पाए जाते हैं। जो रंग इन चित्रों में पाए गए हैं वे हैं - हरा, लाल, जामुनिया, काला और सफेद। हजारों साल से आज तक ये रंग ज्यो-के-त्यों हैं। काल की चपेट और मौसम की मार भी इनकी ‘ओप’ को कम नहीं कर पाई। फफूँद ने यहाँ-वहाँ अवश्य इन्हें मटमैला किया है। पर पानी के छींटे पड़ते ही फफूँद दब जाती है और रंग उभर आता है। पानी सूखने पर रंग वापस फफूँद में दब जाता है। काल निर्णय में यह फफूँद भी सहायक होती है। गिरजाशंकरजी का कहना है कि भीमबैठका और धूलिया के शैलाश्रयों में जो रंग और पैटर्न मिलता है, वही यहाँ भी प्राप्त होता है। यदि इस आलेख को मैं धूलिया या भीमबैठका के आसपास बैठ कर लिखता तो फिर यह वाक्य उल्टा हो जाता। तब मैं लिखता कि यहाँ भी रंग और पैटर्न वही है जो दशपुर जनपद में पाया जाता है। यानी कि कौन पुरातन है, यह विवाद का विषय है।

मैं चित्रों की गतिविधियों पर प्रश्न करता हूँ। गिरजाशंकर मुझे बताते हैं, 15 हजार साल पुरानी कलाकृतियों में कुल दो गतिविधियाँ हैं - शिकार और नृत्य। पूजा के प्रतीक उसके बाद जीवन में आए। मध्याश्मयुगीन मानव यानी कि आज से करीब 15 हजार साल पुराना मनुष्य पशुओं के मुख की तरह अपनी आकृति बना लिया करता था। सिर पर रंग-बिरंगे पंखों को लगा लिया करता था। भुजाओं को सजाने के लिए कुहनियों पर बड़े-बड़े फुँदने बाँध लिया करता था। विशेष उत्सवों पर पशु-शिरोभूषा, मुखाच्छादन एवं चर्म-वस्त्र पहने जाते थे। अन्य दिनों पर केवल लंगोट से काम चलता था। खुशी के अवसरों पर समूह नृत्य हुआ करते थे। नृत्य करनेवाले सभी लोगों के हाथों व पाँवों की मुद्राएँ एक समान दिखने से यह अनुमान लगाया जाता था कि सम्भवतः ताल बजा कर ध्वनि पर नृत्य करने का ज्ञान हमारे आदि मानव को था। 

शैलाश्रय का आभास आपको कैसे होता है? इस सवाल पर गिरजाशंकर भाई कहते हैं, आसपास पानी हो, नदी हो या नाला हो या फिर कोई झरना झरता हो तो वहाँ तलाश करने पर शैलाश्रय मिल सकते हैं। जहाँ-जहाँ आदि मानव को आश्रय मिला उन्हीं स्थानों का नाम शैलाश्रय होता गया। बस्तियाँ थीं नहीं। जहाँ-जहाँ वह रहा, उसने अपनी छाप छोड़ी। सपाट और समतल चट्टानों पर उसने चित्र नहीं बनाए। जितने भी चित्र मिलते हैं, सब भित्तियों और छतों पर मिलते हैं। स्पष्ट है कि सारे चित्र खड़े-खड़े बनाए गए होंगे। चित्रांकन के समय चट्टानों का चयन बहुत सूझ-बूझ के साथ किया गया है। रिसनेवाली या परतदार चट्टानों पर ये चित्र नहीं बनाए गए। सारा सृजन हुआ है भूरी या सफेद चट्टान पर ही। कई स्थानों पर चित्रों में संशोधन और एक चित्र के ऊपर दूसरा चित्र बनाए जाने का भी उदाहरण है। जैसे एक पुराने चित्र पर कूबड़वाला बैल बना दिया गया है। यानी कि कूबड़वाला बैल ईसवी सन की पेण्टिंगों में आएगा। एक उदाहरण संशोधन का भी मिलता है। हरे रंग के एक हिरन का मुँह बाद में लाल कर दिया गया है। उसके पेट में लाल चौकोर भी बना दिए गए हैं। कलाकृतियों के पहनावे से यह पता नहीं चलता है कि चित्रांकित छवि पुरुष की है या स्त्री की। केवल राणी छज्जे पर जो नृत्य-चित्र पाया जाता है उसकी वेशभूषा से स्पष्ट होता है कि ये महिलाएँ हैं। इसलिए उनका नाम भी ‘राणी छज्जा’ दिया गया है।

विषय और आकार पर जो कुछ गिरजा भाई बताते हैं वह बहुत दिलचस्प है। उनका कहना है कि इन चित्रों में पूरा ‘सर्कल’ कहीं नहीं मिलता। वक्र और वर्ग मिलते हैं। पशु हैं, पक्षी हैं, सूर्य है, शस्त्र हैं, सर्प, हाथी और बन्दर भी हैं। गर्भिणी गाय के पेट के भीतर वत्स बना कर दिखाया गया है। पूजा प्रतीकों में हाथ के चिह्न बहुतायत से मिलते हैं। बड़ी-से-बड़ी आकृति मिलती है 40 सेण्टीमीटर की और छोटी-से-छोटी 2 सेण्टी मीटर तक की। उल्टा सातिया (स्वस्तिक) इस चित्र परिवार की विशेषता है। एक-एक मंजिल की ऊँचाई तक इन कलाकारों की कूचियाँ चली हैं। इससे उस युग की ऊँचाई का भी अनुमान हो सकता है।

मेरा अन्तिम सवाल था कि हमारी सरकार ने इस दिशा में कुछ किया या नहीं? गिरजा भाई की थकान पर एक मुस्कान चिपक गई। मध्य प्रदेश सरकार ने इसी क्षेत्र के इन चित्रों के अनुकृतिकरण और काल-निर्णय के अनुसन्धान हेतु अपने पुरातत्व विभाग द्वारा 4 हजार रुपयों की राशि स्वीकृत की है। निदेशालय-सचिवालय में बैठे श्री चतुर्वेदी इस ओर पूरे जागरूक हैं। पर राजस्थान सरकार का काम अद्भुत है। गिरजाशंकरजी गए तीन सालों से चित्तौड़गढ़ के कलेक्टर महोदय को और राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग को, वहाँ पाई जानेवाली 9 चट्टानों के बारे में लगातार लिख रहे हैं, पर कहीं से कोई प्रतिध्वनि नहीं आई। बाबाजी की मण्डी में पानी किनारे 9 चट्टानों पर इसी तरह के शैल चित्र राजस्थान सरकार को निरन्तर आमन्त्रित कर रहे हैं।

निश्चय ही गिरजाशंकर रूनवाल की यह तपस्या हमारे पुरातत्वविदों के सोच-संसार में नया आन्दोलन पैदा करेगी। नए विवाद होंगे, नए निर्णय होंगे, नए समाधान होंगे। हम भी जानना चाहेंगे कि मिट्टी के ये रंग कितने पुराने हैं? हमार चट्टानों कर माँग में भरा गया ‘फोफरिया पत्थर’ का यह रंग कितने साल पहले घिसा गया था। हमारी गेरू की गेरुआ आभ कब से आभासित है?

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जिला मन्दसौर (म. प्र.) में मिले शैल-चित्र (पहली पंक्ति) ‘समूह नर्तन’ अनुमानतः 5000 वर्ष पुराना चित्र। (दूसरी पंक्ति) अनुमानतः 10000 वर्ष पुराना चित्र। (तीसरी पंक्ति) 5000 वर्ष पुराना चित्र।


जिला मन्दसौर (म. प्र.) में मिले शैल-चित्र(पहली पंक्ति) पहला चित्र ‘वराह’ लगभग 15000 वर्ष पुराना। दूसरा चित्र ‘मछली’ लगभग 15000 वर्ष पुराना। (दूसरी पंक्ति) ‘वृषभ’ तथा ‘शिकार’ 5000 पुराना चित्र। (तीसरी पंक्ति) पहला चित्र ‘अधर शिव’ लगभग 5000 वर्ष पुराना तथा ‘नृत्य’ लगभग 5000 वर्ष पुराना चित्र।

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