1988 में वेनिटी बेग वाली अशिक्षित, अनपढ़ आदिवासी सरपंच

लगता है, दादा श्री बालकवि बैरागी के, इधर-उधर बिखरे हुए लिखे को जुटाने में मेरी हर कोशिश अपने-आप में एक संस्मरण बन जाएगी।

देश के ख्यात इतिहासवेत्ता और पुरातत्ववेत्ता मन्दसौरवाले डॉ. श्री कैलाश चन्द्रजी पाण्डेय ने दादा का एक प्रेस नोट और उससे जुड़ा, स्व. राजीव गाँधी का एक पत्र भेजा। आज की यह पोस्ट इन्हीं पर आधारित है। दादा का यह प्रेस नोट और राजीवजी का पत्र यहाँ दे रहा हूँ।

प्रेस नोट पढ़कर, पत्रकारिता का सुप्त अमीबा सक्रिय हो गया। मुझे लगा कि इसे प्रकाशित करते हुए, इसकी नायिका का चित्र भी साथ में हो तो लेख की सुन्दरता (और विश्वसनीयता भी) बढ़ जाएगी। लेकिन बात लगभग चालीस बरस पुरानी। मुझे नायिका के नाम और गाँव से अधिक कुछ भी नहीं पता। चित्र कैसे और किससे हासिल किया जाए? ऐसे में मेरे ‘बीमा एजेण्ट’ ने कोंचा - ‘मदद के लिए दसों दिशाओं में आवाज लगाओ। मिल जाए तो मुकद्दर। न मिले तो भला खोया क्या?’ 

जहाँ-जहाँ हलकी से हलकी भी गुंजाइश हो सकती थी, वह प्रत्येक दरवाजा खटखटाया। एक जचाब आया - ‘मेरा तो कोई सम्पर्क नहीं। आसपास टटोलता हूँ।’ एक अन्य ने कहा - ‘हलकी सी उम्मीद है। मैं कोशिश करता हूँ।’ लेकिन अगले ही दिन क्षमा-याचना आ गई। 

मुझे कोई जल्दी नहीं थी। सोचा, दो-एक दिन और राह देख लेते हैं। लेकिन अचानक लॉटरी खुल गई। देश के विख्यात आरटीआई एक्टिविस्ट, मेरे कृपालु, नीमचवाले श्री चन्द्रशेखर गौर का सन्देश आया - ‘शाम तक फोटू आ जाएँगे।’ मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। शेखर भाई का भला इस क्षेत्र से क्या सम्बन्ध? रहा नहीं गया। फौरन ही फोन किय। पूछा - ‘यह तो आपका क्षेत्र ही नहीं! कैसे किया आपने यह कारनामा? बोले - ‘मुझे भी अन्दाज नहीं था कि इतना आसान हो जाएगा। मैंने नीमच काँग्रेस जिलाध्यक्ष  श्री तरुणजी बाहेती  से बात की। उन्होंने नायिका के गाँव के ही एक काँग्रेसी नेता श्री भगवान भील का नम्बर दिया। मैंने भगवान से बात की। आपका और दादा श्री बालकवि बैरागी का हवाला दिया। उन्होंने शाम तक फोटू उपलब्ध कराने का वादा किया। उम्मीद करें कि शाम तक फोटू आ जाएँ।’ मेरे लिय यह सब किसी चमत्कार से कम नहीं था। शेखर भाई में मुझे वेताल/फेण्टम नजर आने लगा। शाम से पहले ही न केवल फोटू आ गए बल्कि भाई भगवान भील का फोन भी आ गया। बहुत खुश थे। बताया कि वे जावद जनपद पंचायत में ‘जनपद प्रतिनिधि’ भी हैं और नीमच जिला आदिवासी काँग्रेस के जिलाध्यक्ष भी हैं। 

जो काम मेरे लिए ‘हिमालय’ था, उसे शेखरजी और भगवान भाई ने मेरे बरामदे के गमले के गुलाब की तरह उपलब्ध करा दिया। कैसे धन्यवाद दूँ? कितने आभार मानूँ? ये फोटू मिलने पर मेरे अन्तर का पत्रकार बिलकुल उस बच्चे की तरह खुश है जिसे मनचाहा खिलौना मिल जाए।

अब आप, संस्मरण बन चुके इस किस्से का आनन्द लीजिए। (यदि यह आनन्ददायक हो तो।)

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दिनांक 21 अगस्त 1988


प्रकाशनार्थ

महोदय!

अभिवादन सादर -

एक बहुत ही दिलचस्प स्थिति प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

इस पत्र के साथ हमारे प्रधान मन्त्री श्री राजीव गाँधी का 7 अगस्त 1988 का एक पत्र (फोटो स्टेट) देखिए। इस पत्र में राजीवजी ने एक सरपंच श्रीमती हरकू बाई का उल्लेख किया है। हरकू बाई मन्दसौर जिले की आदिवासी पंचायत कोज्याँ (तहसील जावद) की सरपंच हैं और एक भद्र आदिवासी गृहिणी हैं। बिलकुल अपढ़ और निरक्षर। 

हुआ यूँ कि, आप मानें या नहीं मानें मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री का आगमन विगत 28 वर्षों से नहीं हुआ है। सन् 1954 में पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू  गाँधी सागर बाँध का शिलान्यास करने पधारे थे। फिर 1960 में वे उसी बाँध का उद्घाटन करने पधारे। तब पण्डितजी ने मेरे जिले का एक तरह से सघन दौरा किया था। बेशक उनके बाद सन् 1972 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी एक चुनाव सभा में भाषण देने हेतु पधारी। वे कुल मिलाकर शायद आधा घण्टा मन्दसौर में रुकीं। वे पुनः 1979 में मन्दसौर आईं पर तब वे प्रधान मन्त्री नहीं थीं। हमारी काँग्रेस अध्यक्ष थीं। 1972 में वे जरूर प्रधान मन्त्री के तौर पर आईं किन्तु चुनाव सभा के सिवाय वे कहीं नहीं गईं। और चुनाव सभा की हाजिरी को हमारी जनता वस्तुतः हाजिरी नहीं मानती। इस तरह मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री की गैर हाजिरी विगत 28 वर्षों से रेखांकित होती जा रही है। 

श्री राजीव गाँधी भी सन् 1984 के अपने दौरे में जावरा तक तो पधारे पर मन्दसौर नहीं लाये जा सके। जावरा मेरा चुनाव क्षेत्र होते हुए भी मूलतः रतलाम जिले का एक हिस्सा है। याने कि रस्म के तौर पर मेरे चुनाव क्षेत्र में प्रधान मन्त्री कृपापूर्वक पधारे तो सही पर मन्दसौर जिले में भारत के प्रधान मन्त्री की 28 वर्षीय सन्नाटेदार अनुपस्थिति को जिले की पूरी दो पीढ़ियों ने गहरी टीस के साथ अनुभव किया है। अस्तु,

मैंने राजीवजी के सामने बार-बार इस अनुपस्थिति का जिक्र किया। वे हर बार सहमत रहे कि यह अनुपस्थिति उपस्थिति में बदली जानी चाहिए। और तभी हरकू बाई बीच में आती है। 

आजादी के 40 साल बाद मैं पहला सांसद ऐसा निकला जो संसद सदस्य के तौर पर पहली बार कोज्याँ गया। क्षमा कर दें, मन्दसौर के कलेक्टर को भी मैंने प्रेरित करके 40 साल में पहली बार कोज्याँ जाने की स्थिति पैदा की। तब तक कोई कलेक्टर नामधारी अधिकारी कोज्याँ नहीं पधारे थे। वह घनघोर सूखे का समय था। कलेक्टर मेरे दौरे के भी एकाध माह बाद ही वहाँ पहुँचे। 

कोज्याँ की चौपाल पर मैंने आदिवासी बहिन भाइयों से अपनी शैली में बात की। पूछताछ भी की। अपनी दैनन्दिन समस्याओं के साथ हरकू बाई ने यह माँग भी रखी कि श्री राजीव गाँधी कोज्याँ पधारे। अन्धा क्या माँगे - दो आँख। मेरी वही स्थिति हो गई। मैंने शर्त रखी कि यदि हरकू बाई अपने दस्तखत से राजीवजी को पत्र लिख कर न्यौता दे तो मैं राजीवजी को ला सकता हूँ। 

और हरकू बाई ने तपस्या शुरू कर दी। 

इस अपढ़ महिला सरपंच ने रात-दिन एक करके लिखना-पढ़ना और हस्ताक्षर करना सीखना शुरू किया। राजीवजी के नाम पत्र तैयार किया। हस्ताक्षर किये और जावद क्षेत्र के हमारे सक्रिय कार्यकर्ता भाई श्री घनश्याम पाटीदार के माध्यम से मुझ तक पहुँचाया। मैं इस तपस्या से अभिभूत, रोमांचित। अपने पत्र के साथ हरकू बाई का लिखित न्यौता लेकर राजीवजी के सामने खड़ा हो गया। सारी बात उन्हें बताई। वे सस्मित सुनते रहे। पत्र लिया। निर्देश अंकित किया और परिणाम आपके सामने है। 

निस्सन्देह प्रधान मन्त्री राजीव गाँधी इस वर्षा के बाद मन्दसौर जिले में पधारेंगे। प्रधान मन्त्री के इस दौरे का बड़ा श्रेय मैं श्रीमती हरकू बाई को अभी से दे दना चाहता हूँ। मेरा विश्वास है कि तब तक हरकू बाई का अक्षर ज्ञान अधिक विस्तृत हो जायेगा। हरकू बाई का मैं जितना भी आभार मानूँ, मुझे कम लगता है। हरकू बाई जिन्दाबाद।

बालकवि बैरागी।

संलग्न

श्री राजीव गाँधी का 7 अगस्त 1988 का पत्र (फोटो स्टेट)

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दादा का प्रेस नोट


श्री राजीव गाँधी का पत्र



चित्र मे हरकूबाई अपने पति श्री नारायणलाल और पोते नन्दलाल के साथ। हरकूबाई के हाथ में ‘वैनिटी बेग’ ‘दर्शनीय’ है। सन् 1988 में, दूर-दराज के गाँव की किसी अनपढ़-अशिक्षित आदिवासी महिला के हाथ में वैनिटी बेग किसी ‘बॉक्स न्यूज’ से कम नहीं होता। भगवान भाई ने रोंगटे खड़े कर देनेवाली बात बताई - ‘यह फोटू उसी दिन, उसी समय का है जब हरकू बाई, राजीवजी से मिलने के लिए दिल्ली के लिए गाँव से जा रही थी।’ (हरकूबाई के राजीवजी से मिलने की बात के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम।) इसके साथवाले चित्र में आज की हरकूबाई है। 

चित्र में बाँये से भगवान भाई भील अपनी पत्नी घीसीबाई, बेटों हरिकिश्न और देवराज के साथ। डॉ. के. सी. पण्डेयजी और कृपालु चन्द्र शेखरजी गौर।

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