Showing posts with label गूंगे लोग - उच्‍छृंखल नेता. Show all posts
Showing posts with label गूंगे लोग - उच्‍छृंखल नेता. Show all posts

देश बन गया है जोड़मा-जोड़मी, छाये हुए हैं वहाँ केे पटेल बा’

यह मई 1970 की बात है। मध्य प्रदेश विधान सभा के गरोठ विधान सभा क्षेत्र का उप चुनाव था। इस विधान सभा क्षेत्र में गरोठ और भानपुरा तहसीलें शरीक हैं। दादा श्री बालकवि बैरागी तब मध्य प्रदेश सरकार में सूचना-प्रकाशन राज्य मन्त्री थे। दा’ साहब (स्वर्गीय) श्री माणक भाई अग्रवाल काँग्रेस के उम्मीदवार और दादा काँग्रेस की ओर से चुनाव-प्रभारी थे। तब आज की भाजपा, भारतीय जनसंघ थी और दीपक उसका चुनाव चिह्न। दीपक को मालवी बोली में ‘दीवो’ कहा जाता है।

यह वह जमाना था जब गाँव के लगभग सारे लोग, गाँव के पटेल बताए उम्मीदवार को वोट दे दिया करते थे। भानपुरा-गरोठ वाली सड़क पर जोड़मा-जोड़मी नाम का एक गाँव है। है तो एक ही बसाहट किन्तु दो हिस्सों में। एक हिस्सा सड़क की एक तरफ और दूसरा हिस्सा सड़क की दूसरी तरफ। एक हिस्सा जोड़मा और दूसरा जोड़मी। यह गाँव ‘जनसंघी गाँव’ माना जाता था। तब ऐसे ‘पक्के’ (आज की शब्दावली में ‘अन्ध समर्थक’) गाँवों में सेंध लगाना असम्भव प्रायः ही माना जाता था। इसलिए, ऐसे गाँवोे में दूसरी पार्टी औपचारिक से अधिक मेहनत नहीं करती थी। 

यह भानपुरा के काँग्रेस चुनाव कार्यालय की बात है। रात का समय था। दादा उस समय वहीं थे। दादा की एक पहचान उनकी वाक्पटुता और वाक्चातुर्य भी रही है। जोड़मा-जोड़मी का एक काँग्रेसी कार्यकर्ता आया और दादा से कहा कि उसका गाँव है तो पक्का जनसंघी लेकिन दादा यदि वहाँ के पटेल को समझा दें तो पूरा गाँव, ‘पलट’ सकता है। दादा ने कुछ ऐसा कहा - ‘अरे! यहाँ अपना और काम ही क्या है? चलो!’ और उस कार्यकर्ता को साथ लेकर दादा फौरन जोड़मा-जोड़मी के लिए चल दिए।

रात लगभग दस-सवा दस बजे दादा वहाँ पहुँचे। पटेल बा’ सो गए थे। उन्हें उठाया। उनके आँगन में बैठक जमी। जीप की आवाज ने पूरे गाँव को जगा दिया। आधे से ज्यादा गाँव पटेल बा’ के आँगन में जुट गया।

दादा ने सीधी बात शुरु की - ‘देखो पटेल बा’! मैं भी जानता हूँ और सब जानते हैं कि आप जनसंघ को वोट देते हो और दिलाते हो। मैं तो जनम से ही माँगनेवाला बैरागी हूँ। आज तुमसे काँग्रेस के लिए वोट माँगने आया हूँ। दो तो ठीक। नहीं दो तो भी कोई घाटा नहीं। लेकिन वो क्या बात है कि तुम न तो खुद काँग्रेस को वोट देते हो और न ही गाँव को देने देते हो?’

पटेल बा’ दादा को जानते भी थे और मानते भी थे। उन्होंने टालने की कोशिश की। लेकिन दादा मानो अड़ गए - ‘मत दो वोट! लेकिन बताओ तो सही कि क्यों नहीं? बोलो तो मालूम पड़े और मालूम पड़े तो सूझ पड़े कि पटेल बा’ को कोप भवन से बाहर कैसे निकालें!’

और बात शुरु हुई। पटेल बा’ अपनी बात कहें और दादा तुर्की-ब-तुर्की तार्किक जवाब दें। दादा यदि सरस्वती-कृपा और प्रत्युत्पन्नमतित्व से लैस तो पटेल बा’ के पास व्यावहारिकता और दीर्घ लोकानुभव के शुद्ध देसी घी से रची-पगी परिपक्वता। दो बोल रहे थे और गाँव सुन रहा था - ‘ये ले मेरा सवाल!’ ‘ये ले मेरा जवाब!’ ‘एक ने कही, दूजे ने ना मानी। दोनों कहे - मैं ज्ञानी! मैं ज्ञानी।’ मालवा के प्रख्यात लोक-नाट्य माच ‘तुर्रा-कलंगी’ में दो दल होते हैं। लेकिन उस रात जोड़मा-जोड़मी में दो लोगों में ‘तुर्रा-कलंगी’ खेला जा रहा था। 

कोई डेड़ घण्टे की ‘बातचीत’ में अन्ततः पटेल बा’ चुप हो गए। उस अँधेरी, आधी रात में दादा के चेहरे पर ‘गाँव के पलटने’ की आशा जगमगा उठी। लगभग चहकते हुए बोले - ‘तो पटेल बा’! अब तो काँग्रेस को वोट दोगे और दिलाओगे?’

पटेल बा’ कुछ इस तरह बोले मानो जबरन बुलवाया जा रहा हो। आवाज में न तो दम न जोश। बुझे, मरे मन से, नीची नजर किए बोले - ‘देखो बेरागीजी! आपकी एक-एक बात हवा होरा आनी खरी। आपकी एक-एक वात म्हारे गरे उतरीगी। पण बेरागीजी! बोट तो दीवा नेईऽज दाँगा। अबे अणी वात को कई जवाब के काँ दाँगा? तो बस, योई, के दीवो तो दीवो हे।’ (देखो बैरागीजी! आपकी एक-एक बात सवा सोलह आना सही। आपकी एक-एक बात मेरे गले उतर गई। लेकिन बैरागीजी! वोट तो दीपक को ही देंगे। अब इस बात का क्या जवाब कि क्यों देंगे? तो बस, यही, कि दीपक तो दीपक है।)

पटेल बा’ का जवाब सुनकर दादा बस, बेहोश ही नहीं हुए। शब्दों का कुशल खिलाड़ी, सरस्वती-पुत्र, कवि सम्मेलन के मंचों को लूटनेवाला अखिल भारतीय स्तर का कवि अवाक्, हतप्रभ, हक्का-बक्का, मेले में लुटे-पिटे, खाली हाथ आदमी जैसी दशा में था। उन्हें सम्पट-सूझ ही नहीं पड़ी कि उन्होंने क्या सुना! वे मानो संज्ञा शून्य, अचेत हो गए हों। सहज होने में, खुद में लौटने में उन्हें सामान्य से तनिक अधिक समय लगा। सामान्य हुए तो अपने स्वाभावानुसार ठठाकर हँसे और बोले - “पटेल बा’ की जय हो। आज आपने समझाया कि ‘अन्धोें के आगे रोना और आँखों का ओज खोना’ किसे कहते हैं।” कह कर, कोहनियों तक हाथ जोड़ कर उठते हुए नमस्कार किया और जीप में बैठते हुए बोले - ‘देखो पटेल बा’! हमें तो कोई फरक नहीं पड़ना। यहाँ से हमें पहले भी वोट नहीं मिलते थे। अब भी नहीं मिलेंगे। लेकिन गाँठ बाँध लो! जीतेगी तो काँग्रेस ही। और, जिस दीपक के तुम दीवाने बने बैठे हो ना! वह उजाला नहीं, अमावस उगलता है। खुद तो अँधेरे में डूबोगे ही, अपने पूरे गाँव को भी डुबाओगे। खूब मजे से डूबो और डुबाओ। लेकिन अँधेरे में जी नहीं पाओगे। तब, उजाले की जरूरत पड़े तो आवाज लगाना। आज माँगने आया था। तुम खाली हाथ लौटा रहे हो। लेकिन तब मैं, तुम्हारी आवाज खाली नहीं जाने दूँगा। मैं तो सूरज का वंशज हूँ। दौड़ कर आऊँगा और उजाले की गठरियाँ के ढेर तुम्हारे दरवाजे लगा दूँगा। जै रामजी की।’

उसके बाद क्या हुआ और क्या नहीं, यह जाने दीजिए। मुझे तो यह घटना इन दिनों बेतरह याद आ रही थी सो परोस दी। आपको जो समझना हो समझ लें। बस! यह मत समझिएगा कि पूरा देश जोड़मा-जोड़मी बना हुआ है और गली-गली, घर-घर में बैठे पटेल बा’ बिना किसी बात के अपनीवाली पर अड़े हुए, पूरे गाँव को अँधेरे से ढँकने की जुगत में भिड़े हुए हैं।

-----

    


बात जरूर कर, लेकिन ‘यूँ ही’ मत कर

रतलाम में होता हूँ तो अखबार पढ़ने का मन नहीं होता। लेकिन जब इन्दौर में होता हूँ तो अखबार की तलाश रहती है। काम-धाम कुछ रहता नहीं। फुरसत ही फुरसत रहती है। वहाँ अखबार मुश्किल से मिल पाता है। दो-तीन दिनों के लिए जाता हूँ। बन्दी के अखबार बाँटनेवाले हॉकर के पास अतिरिक्त प्रतियाँ नहीं होतीं। रिंग रोड़ पर सिन्धिया प्रतिमा चौराहे पर अखबारवाला आता तो है लेकिन अपने मन का राजा है। उसके बाद अखबार मिलता है ठेठ पलासिया चौराहे पर। इतनी दूर कौन जाए? इसलिए, सुबह-सुबह सड़क पर आ खड़ा होता हूँ। इस उम्मीद से कि कभी, कोई हॉकर महरबान हो जाए। 

इसी ‘कृपाकांक्षा’ में परसों, मंगलवार की सुबह कनाड़िया मार्ग पर आ खड़ा हुआ। सामनेवाली मल्टी के नीचेवाली होटल की सर्विस रोड़ के लिए बनी दो-फुटी दीवाल पर टिक गया। सात बज रहे हैं। होटल खुली नहीं है। एक ऑटो खड़ा है। दो सज्जन बैठे हुए हैं। बतिया रहे हैं। कड़ाके की सर्दी है - तापमान सात डिग्री। मैं उनकी बातें सुनने लगता हूँ। अपनी तरफ मेरा ध्यान देखकर वे अपनी बातों का सिलसिला तोड़ देते हैं। पूछते हैं - ‘कहीं बाहर से आए हैं? नए लगते हैं। पहले कभी नजर नहीं आए।!’ मैं अपना परिचय देता हूँ और वहाँ बैठने का मकसद बताता हूँ। एक कहता है - ‘आपको अखबार शायद ही मिले। लेकिन थोड़ी देर राह देख लीजिए। पाँच-सात रुपयों के लालच में कोई हॉकर किसी बन्दी वाले का अखबार आपको दे-दे।’ मैं मौन मुस्कुराहट से जवाब दे देता हूँ। उनकी बातों का टूटा सिलसिला जुड़ जाता है -

‘बहू को अच्छी नहीं लगी कैलाश की बात।’

‘कौन सी बात?’

‘वही! प्रियंका को चिकना चेहरा कहनेवाली बात।’

‘हाँ। वो तो अच्छा नहीं किया कैलाश ने। ऐसा नहीं कहना चाहिए था। शोभा नहीं देता। लेकिन सज्जन ने भी तो वही किया! उसे क्या जरूरत थी जवाब देने की? चुप रह जाता!’

‘हाँ। सज्जन ने भी घटियापन का जवाब घटियापन से दिया।’
‘हाँ। पता नहीं इन लोगों को क्या हो गया है! इन्हें न तो अपनी इमेज की चिन्ता है न अपनी पार्टी की इमेज की। पता नहीं, इनकी ऐसी बातें सुन कर इनके टीचर लोग क्या सोचते होंगे!?’

‘क्या सोचते होंगे! अपना माथा कूटते होंगे। यही पढ़ाया हमने इनको? पता नहीं राजनीति में आते ही इन लोगों को क्या हो जाता है!’

‘ऐसी बातों से ही लोग राजनीति को गन्दी मानते हैं।’

‘हाँ। राजनीति के कारण ही सज्जन बोला होगा। सोचा होगा, चुप रह जाऊँगा तो लोग बेवकूफ समझेंगे।’

‘हो सकता है। लेकिन बोल कर बेवकूफ साबित होने से तो अच्छा है कि चुप रह बेवकूफ साबित हुआ जाए। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता।’

सन्दर्भ मुझे समझ में आ जाता है। कैलाश याने कैलाश विजयवर्गीय और सज्जन याने मध्य प्रदेश सरकार के मन्त्री सज्जन सिंह वर्मा। हमारे राज नेता भाषा की शालीनता से दूरी बढ़ाने की प्रतियोगिता करते नजर आ रहे हैं। उन्हें रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं। लेकिन यह वार्तालाप सुनकर मेरी सुबह अच्छी हो गई - लोग हमारे नेताओं पर न केवल नजरें बनाए हुए हैं बल्कि उनकी भाषा पर भी ध्यान दे रहे हैं। आज अकेले में बात कर रहे हैं, कल मुँह पर बोलेंगे। बात निकलती है तो दूर तलक जाती ही है। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता। खून के दाग खून से नहीं धोए जा सकते।

अब तक एक भी हॉकर इधर से नहीं निकला है। वे दोनों खड़े होते हैं। मुझे सलाह देते हैं - ‘अच्छा होगा कि आप माधव राव के पुतलेवाले चौराहे पर चले जाओ।’ उनके साथ-साथ मैं भी उठ जाता हूँ। 

रिंग रोड़ चौराहे पर खूब भीड़ है। बॉम्बे हास्पिटल की ओर से आ रहा एक ट्रक उलट गया है। नुकसान तो कुछ नहीं हुआ लेकिन यातायात अस्तव्यस्त हो गया है। जाम लगा हुआ है। शीत लहर के कारण कलेक्टर ने स्कूलों की छुट्टी कर दी है। स्कूलों के वाहन गलती से ही नजर आ रहे हैं। उद्यमों/संस्थानों के वाहन सड़कों पर हैं। उनके कर्मचारी अपने-अपने वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सबको जल्दी है। ट्रेफिक पुलिस के दो जवान और तीन-चार समाजसेवी मिलकर ट्रेफिक क्लीयर करने में लगे हुए हैं। लोग उनकी परवाह नहीं कर रहे हैं। जिसे, जहाँ गुंजाइश मिल रही है, अपना वाहन घुसेड़ रहा है। ऐसा करने में खुद की और सबकी मुश्किलें बढ़ रही है। अखबारवाला नहीं आया है।एक ऑटो वाला कहता है - ‘अब नहीं आएगा। आना होता तो आ गया होता।’ मैं अपने मुकाम की ओर चल पड़ता हूँ। दारू की दुकान से दो दुकान आगेवाली होटल के सामने, दो लोग सड़क पर खड़े-खड़े चाय पीते हुए, दीन-दुनिया से बेपरवाह बातें कर रहे हैं। इस तरह कि रास्ते चलते आदमी को बिना कोशिश के ही सुनाई दे जाए। लगता है, दोनों एक ही संस्थान में काम करते हैं और कम्पनी के वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों समवय हैं। चालीस-पैंतालीस के आसपास। मुखमुद्रा और बेलौसपन से एक झटके में समझ पड़ जाती है कि गम्भीर बिलकुल नहीं हैं। वक्तकटी की चुहलबाजी कर रहे हैं -

‘तुम स्साले काँग्रेसियों को उस एक खानदान के सिवाय और कुछ नजर नहीं आता। अपने घर के हीरों की न तो परख करते हो न ही पूछताछ। ये तो हम हैं जो बड़ा दिल करके तुम्हारेवालों को सम्मानित कर देते हैं। हिम्मत चाहिए इसके लिए। तुम सब तो मम्मी से डरते हो।’

तू कभी नहीं सुधरेगा! तेरे आका इतने भले नहीं है कि बिना किसी लालच के किसी के गले में माला डाल दे। इतने भले होते तो आडवाणी और जोशी की ये दुर्गत न करते। लोकसभा चुनाव में सीटों का घाटा पूरा करना है। इसलिए बंगालियों को खुश करने के लिए प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न दे दिया। लेकिन ये चाल उल्टी न पड़ जाए। जानता है प्रणव मुखर्जी कौन है? इन्दिरा गाँधी ने जो इमरजेन्सी लगाई थी, उसका ब्लाइण्ड सपोर्टर था! उस समय, उसकी केबिनेट में मिनिस्टर था। इन्दिरा की इमरजेन्सी का विरोध और इमरजेन्सी का समर्थन करनेवाले को भारत-रत्न! तेरे आकाओं ने ये भी नहीं सोचा कि उन्होंने इमरजेन्सी का समर्थन कर दिया है। अब किस मुँह से इमरजेन्सी को क्रिटिसाइज करेंगे? और अभी जो कमलनाथ ने मीसा बन्दियों की पेंशन खत्म करने का जो आर्डर जारी किया है, उसका विरोध किस मुँह से करोगे? मुँह उठाकर कुछ तो भी बोल देते हो! कुछ अक्कल-वक्कल है के नहीं?’

‘अरे! तू तो सीरीयस हो गया यार! कहाँ तो तू राहुल को पप्पू कहता है और कहाँ ऐसी बातें कर रहा है?’

‘तेने हरकत ही ऐसी की! मैं तो जानता हूँ कि मुझे राहुल और सोनिया रोटी नहीं देते। लेकिन तू तो ऐसे बातें करता है जैसे मोदी केवल तेरे भरोसे, तेरे दम पे पीएम बना हुआ है और वहीं से तेरा टिप्पन आता है! अरे भई! जब पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी बातें करेंगे तो सबका भट्टा बैठेगा नहीं तो और क्या होगा? ईमानदारी से अपना काम करो। सही को सही और गलत को गलत कहो।’

‘सॉरी-सॉरी यार! तू सही कह रहा है। मैंने तो यूँ ही बात-बात में बात कर दी थी। दिल पे मत ले।’

‘बात-बात में बात तो जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। पढ़ा-लिखा, समझदार, एक बच्चे का बाप है। जिम्मेदारी से बात किया कर।’ उसे कोई जवाब मिलता उससे पहले ही उनकी बस आ गई। 

वे दोनों चले गए। अब मुझे अखबार की जरूरत नहीं रह गई थी। जाते-जाते वह अनजान आदमी सूत्र दे गया - ‘बात जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। जिम्मेदारी से किया कर।’ क्या यह सूत्र मुझ अकेले के लिए है?
-----    

‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 31 जनवरी 2019

‘राज’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें

‘दोनों में डिफरेंस ही क्या है? दोनों एक ही तो हैं अंकल!’ सुनकर मैं चौंका भी और हतप्रभ भी हुआ। 

यह 25 जनवरी की अपराह्न है। सत्तरवें गणतन्त्र दिवस से ठीक एक दिन पहले की अपराह्न। मेरे परम मित्र रवि शर्मा के भानजे लकी के विवाह प्रसंग के कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए बिबड़ोद मार्ग स्थित एक मांगलिक परिसर में बैठा हूँ। सब लोग फुरसत में गपिया रहे हैं। लोकसभा चुनावों पर बातें हो रही हैं। ‘सरकार किसकी बनेगी?’ इस पर हर कोई बढ़-चढ़कर, विशेषज्ञ की मुद्रा में अन्तिम राय दे रहा है। सबकी अपनी-अपनी पसन्द है। वे अपनी पसन्द की सरकार बनवा रहे हैं। मैंने अचानक ही कह दिया - “सरकारें तो बनती-बिगड़ती रहती हैं। आती जाती हैं। बेहतर होगा कि ‘राज’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें।’ मेरी इसी बात के जवाब में एक अपरिचित नौजवान ने वह कहा जो मैंने शुरु में लिखा है। वह नौजवान स्नातक कक्षा के अन्तिम वर्ष का विद्यार्थी है। वह ‘राज्य’ और ‘राज’ को पर्यायवाची माने बैठा है। यह हमारी, भाषागत विफलता है या अपनी अगली पीढ़ी से बनी हमारी संवादहीनता का परिणाम? मेरा भाग्य अच्छा था कि उस नौजवान ने समझने की खिड़कियाँ बन्द नहीं कर रखी थीं। उसने इस अन्तर को समझाने का आग्रह किया। मेरी बात तनिक लम्बी हो गई लेकिन उस नौजवान ने पल भर भी धैर्य नहीं छोड़ा। वह मेरी बात चुपचाप सुनता रहा। 

हम स्वभावतः लोकतान्त्रिक समाज रहे हैं। शासक भले ही एक व्यक्ति (राजा) रहा हो लेकिन वह भी ‘लोक’ केन्द्रित ही रहा। भारत का इतिहास जनपदों और गणराज्यों के उल्लेखों से भरा पड़ा है। शासक कोई भी रहा हो, ‘गण’ और ‘जन’ ही उसके लक्ष्य रहे हैं। राजाओं ने राज तो किया लेकिन ‘राज्य’ ही उनकी पहली चिन्ता और पहली प्राथमिकता रहा। राम के वनवास काल में भरत ने राज तो किया लेकिन राजा बनकर नहीं। उन्होंने ‘अवध’ की चिन्ता की, खुद के पद की नहीं। मेवाड़ के शासकों ने भगवान एकलिंगजी के प्रतिनिधियों के रूप में राज किया। जिन्होंने ‘राज’ की परवाह की, वे लोकोपवाद के रूप में उल्लेखित किए गए और जिन्होंने ‘राज्य’ की परवाह की वे इतिहास बन गए।

कानूनी और तकनीकी विवेचन से तनिक नीचे उतरकर बोलचाल की भाषा में बात करें तो ‘राज्य’ एक स्वतन्त्र, सार्वभौम भूमि प्रदेश होता है और ‘राज’ उसकी संचालन व्यवस्था। भारत एक स्वतन्त्र, सार्वभौम गणराज्य है और निर्वाचित संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली इसकी संचालन व्यवस्था। इस प्रणाली से ही हम अपनी सरकार चुनते हैं। ऐसी प्रत्येक सरकार (याने कि ‘राज’) अस्थायी होती है लेकिन ‘राज्य’ तो स्थायी, अविचल बना रहता है।

लेकिन ‘सेवक भाव’ से राज करने की बात अब ‘कल्पनातीत’ से कोसोें आगे बढ़कर ‘मूर्खतापूर्ण सोच’ हो गई है। अब तो जो भी सरकार में आता है, वह आजीवन वहीं बना रह जाना चाहता है। इसीलिए प्रत्येक ‘राजा’ खुद को ‘राज्य’ साबित करने लगता है। तब, ‘व्यक्ति विरोधी’ को ‘राष्ट्र विरोधी’ घोषित किया जाने लगता है। इसका पहला उदाहरण इन्दिरा राज में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने ‘इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा’ कह कर पेश किया था। तब, विरोधियों की बात तो दूर रही, अनेक काँग्रेसियों ने भी इस ‘अमृत वचन’ से असहमति व्यक्त कर इसकी खिल्ली उड़ाई थी। 1977 के आम चुनावों में देश ने बरुआ का मुगालता दूर कर दिया। खुद इन्दिरा गाँधी ही चुनाव हार गई।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ‘राज’ और ‘राज्य’ का अन्तर जिस तरह से हमें समझाया वह अद्भुत है। उन्होंने ‘राज्य’ (भारत) को मुक्ति दिलाने के लिए ‘राज’ (अंग्रेजी राज) को उखाड़ फेंका। गाँधी के प्रत्येक आग्रह, अभियान को अंग्रेज सरकार ने राष्ट्रद्रोह कहा लेकिन गाँधी ने हर बार साबित किया कि वे देश का नहीं, अंग्रेजी राज का विरोध कर रहे थे। आश्चर्य यह कि यह अनूठा विरोध भी वे अंग्रेज सरकार के (याने ‘राज’ के) कानूनों का पालन करते हुए कर रहे थे। क्रान्तिकारियों का साथ न देने के कुछ आरोप् गाँधी पर इसलिए भी लगे कि गाँधी ने, अपने सिद्धान्तों के अधीन, ‘राज’ के कानूनों का उल्लंघन करने से इंकार कर दिया था। 
‘राज’ और ‘राज्य’ कभी भी समानार्थी या कि पर्यायवाची नहीं रहे। केवल तानाशाही शासन पद्धति में ही ये दोनों समानार्थी माने जाते हैं। तब, राजा को ही राष्ट्र बना दिया जाता है। राजा के विरोधी को राष्ट्र का विरोधी करार दिया जाता है और मृत्युदण्ड या देश निकाला दे दिया जाता है। इन्दिरा राज में इन्दिरा विरोधियों को देश विरोधी करार दिया जाता था। वही दौर आज फिर लौट आया है। प्रधान मन्त्री मोदी को ‘राष्ट्र’ निरूपित किया जा रहा है। उनके विरोधियों को राष्ट्र विरोधी करार दिया जा रहा है और ऐसे ‘राष्ट्र विरोधियों’ को पाकिस्तान भेजने का तो मानो मन्त्रालय ही स्थापित हो गया है। इतिहास गवाह है कि तानाशाहों का अन्त या तो आत्म-हत्या से हुआ है या फाँसी से।

हमारे संविधान में राजनीतिक प्रतिबद्धता की बाध्यता नहीं थी। संविधान विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रधान मन्त्री चुनने के बाद संसद सदस्य राजनीति प्रतिबद्धता से मुक्त हो जाते थे। किन्तु बाद के वर्षों में (सम्भवतः राजीव गाँधी के कार्यकाल में, जब दलबदल निरोधी प्रावधान प्रभाव में आए) पार्टी व्हीप की बाध्यता शुरु हुई।

आज ‘राज्य’ पर ‘पार्टी लाइन’ हावी हो गई है। प्रत्येक पार्टी के लोग जानते हैं कि उनकी पार्टी की अनेक बातें असंवैधानिक, अनुचित और आपत्तिजनक हैं। लेकिन वे सब केवल ‘पार्टी लाइन’ के अधीन ‘क्रीत दास भाव’ से उनका समर्थन करते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कही गई अपनी अनगिनत बातों पर हमारे मौजूदा प्रधान मन्त्री मोदी ने जिस तरह से पलटियाँ खाई हैं और उनके तमाम समर्थक जिस तरह से मौन हैं, वह हमारे सामने है।

प्रत्येक गणतन्त्र दिवस हमारे आत्म निरीक्षण का अवसर बन कर सामने आता है। हम स्वतन्त्र, सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य हैं। यही हमारी पहली चिन्ता और पहली जिम्मेदारी है। सरकारें क्षण भंगुर हैं। देश चिरंजीवी, चिरन्तन है। हमारी सरकारें कर्तव्यच्युत न हों, यह हमारी जिम्मेदारी है। अपनी पार्टी के ‘राज’ का अन्ध समर्थन करते रहे तो ‘राज्य’ खो बैठेंगे। ‘राज्य’ हमारा माथा है और ‘राज’ उसे ढँकनेवाली टोपियाँ। सर है सलामत तो टोपी हजार। ‘गण’ (याने कि ‘हम, भारत के लोग’) अपने ‘राजा’ पर, वस्तुपरक भाव से (आब्जेक्टिवली) नजर रखें और पथभ्रष्ट होने पर उसे रोकें-टोकें। यह गुंजाइश रखंे कि ‘हमारा राजा’ मनुष्य है, गलती कर सकता है। यदि ‘राजा’ हमारी पार्टी का है तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। विरोधी कुछ कहे, उससे पहले हम ही उसे टोकें। 

कुर्सी पर बैठते ही प्रत्येक ‘राजा’ मुगालते में आ जाता है कि अब उसे कोई हटा नहीं सकता। उसे याद दिलाते रहें कि इस कुर्सी पर कल कोई और था, कल कोई और होगा। पदान्ध-मदान्ध हो रहे अपने राजा को राहत इन्दौरी का यह शेर जोर-जोर से, बार-बार सुनाएँ, सुनाते रहें -

आज जो सहिब-ए-मसनद हैं, कल नहीं होंगे
किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़े  है?

गणतन्त्र दिवस की इस मंगल वेला में हम अपनी गरेबाँ में झाँकें। ‘राज’ या ‘राजा’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें। ‘राज्य’ बना रहेगा तो ‘अपना राजा’ और ‘अपना राज’ बनता रहेगा। ‘राज्य’ ही नहीं रहेगा तो कौन सा राजा और किसका राज?

गणतन्त्र दिवस की शुभ-कामनाएँ। अमर रहे गणतन्त्र हमारा।
-----



ये समझ रहे हैं, रामजी इनके भरोसे हैं

26 नवम्बर सोमवार की दोपहर। चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। भाजपा और काँग्रेस के उम्मीदवार रैलियों के जरिये, कस्बे के प्रमुख बाजारों में मतदाताओं को अपनी शकलें दिखा रहे हैं, उनके हाथ जोड़ रहे हैं। 

चुनाव की रंगीनी और गहमा-गहमी तलाशते हुए, हम सात फुरसतिये बिना किसी पूर्व योजना के, अचानक ही माणक चौक में एक ठीये पर  मिल गए हैं। सातों के सातों सत्तर पार। देश की प्रमुख सभी राजनीतिक विचारधाराएँ इनसे प्रतिनिधित्व पा रही हैं। सबके सब घुटे-घुटाए। सूरदास की ‘कारी कामरियाँ’, जिन पर दूजा रंग चढ़ने की आशंका भी नहीं। प्रत्येक अपने आप में एक मदरसा। कोई डाइबिटिक है तो कोई बीपी का मरीज। सबके अपने-अपने परहेज हैं। लेकिन जैसे गणित में ऋण-ऋण मिलकर धन हो जाता है, उसी तरह यहाँ परहेजियों के सारे परहेज, कुण्ठित चटोरापन बन कर जबान पर आ बैठे हैं। कॉमरेड की दुकान की कचौरियाँ और शंकर स्वीट्स की कड़क-मीठी चाय आ गई है। सबकी जबानें नश्तर तो हैं लेकिन नुकीली नहीं। छिलके उतार रही हैं। चुभ नहीं रहीं। कचौरियाँ कुतरने और चाय चुसकने के बीच बातें होने लगीं - 

- कश्यप जीत जाएगा।

- अभी से क्या कहें! प्रेमलता  जोरदार टक्कर दे रही है।

- क्या टक्कर दे रही है? कश्यप के सामने कहाँ लगती है? खानापूर्ति कर रही है। 

- इस मुगालते में मत रहना। अण्डर करण्ट दौड़ रहा है। बरसों बाद कोई सनातनी उम्मीदवार सामने है। 

- तुम लोग धरम-जाति से कभी ऊपर भी उठो यार! ये क्या जैन-सनातनी लगा रखा है? एक पूरी नई पीढ़ी सामने आ गई है। वो तुम्हारे धरम-जात के चक्कर में नहीं पड़ती। अपने दिमाग से काम लेती है। 

- हाँ! वो तो है। लेकिन उनके सामने आप्शन क्या है? 

- ये ‘नोटा’ को वोट नहीं दे सकते?

- दे सकते हैं लेकिन देंगे नहीं। वे कमिटेड नहीं हैं। तुमसे-हमसे ज्यादा पढ़े-लिखे, समझदार हैं। वोट को बेकार नहीं जाने देंगे। वोट तो किसी न किसी पार्टी को ही देंगे।

- हाँ। किसी न किसी पार्टी को ही देंगे। 

- देखो यार! इतने भावुक और आदर्शवादी मत बनो। अपना शहर, व्यापारी शहर है और व्यापारी कभी घाटे का सौदा नहीं करता। इसलिए जीतेगा तो कश्यप ही। उसके जीतने में ही सबका फायदा है।

- लेकिन कश्यप से नाराज लोग भी कम नहीं। जीत भले ही जाए लेकिन इस बार पसीना आ रहा है। 

- अरे! यार! तुम लोग ये क्या कश्यप-प्रेमलता में उलझ गए! कल अयोध्या में जो हुआ वो मालूम है तुम्हें?

- लो! इससे मिलो! चौबीस घण्टे हो गए हैं। अखबारों और टीवी में सब आ गया। सबने कह दिया कि उद्धव ठाकरे का शो फ्लॉप हो गया। पाँच हजार भी नहीं थे उसके मजमे में।

- य्ये! येई तो सुनने के लिए मैंने इसे उचकाया था। उचक गया स्साला। उद्धव की तो बता दी लेकिन वीएचपी की नहीं बताई। जरा वीएचपी की भी तो बता दे!

- क्यों? वीएचपी की क्या बताना? भव्य प्रोग्राम रहा। 

- अच्छा! कितना भव्य रहा?

- मुझसे क्या पूछते हो? अखबार में पढ़ लो! टीवी में देख लो!

- अरे! शाणे! हमको क्या उल्लू समझता है? तीन बज रहे हैं। हम क्या सीधे बिस्तर से उठ कर चले आ रहे हैं? बिना मुँह धोये? अरेे! दुनिया की खबर ले कर आ रहे हैं! तेरे मुँह से सुनना है। बता! कितना भव्य रहा वीएचपी का मजमा?

- अरे! यार! बुड्डा हो गया है। याददाश्त चली गई है बिचारे की। मगज (बादाम) खाता तो है लेकिन असर नहीं करती। तू ही बता दे।

- वो तो मैं बता ही दूँगा। लेकिन पहले ये, उद्धव के मजमे की गिनती बतानेवाला तो कुछ बोले!

- चल! तू ही बता दे। तेरी आँखों पर तो पट्टी बँधी है। मैं कुछ भी बताऊँगा तो तू मानेगा तो नहीं। तू ही बता।

- बड़ी जल्दी मैदान छोड़ दिया तेने तो रे! अपनी जाँघ उघाड़ने में शरम आती है? चल! मैं ही बताता हूँ। दो लाख लोग इकट्ठा करने का दावा किया था। चालीस हजार भी नहीं पहुँचे! पण्डाल खाली था। 

- नहीं। चालीस नहीं। पचास हजार। लेकिन चालीस हजार भी कोई कम नहीं होते। 

- सवाल कम-ज्यादा का नहीं है रे! सवाल तो तुम्हारे होश उड़ने का है। उद्धव ने तुम्हारे होश उड़ा दिए। उसने तो तुम्हारी दुकान पर कब्जा कर ही लिया था। बाबरी डिमालेशन का क्रेडिट ले ही लिया था उसने तो। वो अयोध्या आने की बात नहीं करता तो तुम लोग ये मजमा लगाते?

- क्यों? क्रेडिट लेने की बात ही कहाँ है। वो तो हमने ही किया था।

- अच्छा! तुमने किया था? लेकिन उद्धव के दावे के जवाब में वीएचपी ने तो कबूल कर लिया कि उस डिमालेशन में केवल वीएचपी का नहीं, देश के दूसरे संगठनों का भी योगदान है!

- ये तो वीएचपी की शालीनता है। देश के सम्पूर्ण हिन्दू समाज को क्रेडिट दे रही है। लेकिन हिन्दू भावनाओं की चिन्ता तो हम ही कर रहे हैं? इसमें क्रेडिट की बात ही कहाँ है। छाती ठोक कर कहते हैं - हाँ हमने किया है। 

- अच्छा! ये छाती ठोकनेवाले तो सबके सब मादा बने हुए हैं। कोर्ट में  तो एक भी सूरमा जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सबके सब एक भाव से कह रहे हैं कि बाबरी गिराने में उनका हाथ नहीं है। तुममें केवल एक ही मरद है। उमा भारती। उसी ने कहा कि वो बाबरी गिराने में शामिल है। बाकी तो तुम सबके सब मादा हो।

- अरे यार! क्यों इसके पीछे पड़ गया! हकीकत अपन सब जानते हैं।

- यही तो! जानता तो ये भी है लेकिन कबूल नहीं करता। अच्छा चल बता! अभी ये जमावड़ा क्यों किया? क्या प्रसंग था?

- क्या प्रसंग था? अरे! राम मन्दिर तो देश के हिन्दू समाज की आस्था का मामला है। बहुत राह देख ली।  अब नहीं देखेंगे। अभी नहीं तो कभी नहीं। बस! यही तो कह रहे हैं!

- अच्छा! साढ़े चार साल पहले जब एक साथ 282 आए थे लोक सभा में तब आते ही रामजी क्यों याद नहीं आए? चलो कोई बात नहीं। लेकिन उसके बाद अब तक क्या करते रहे? अडानी-अम्बानी के जरिए जेबें भरते रहे। पेट्रोल, नोटबन्दी और जीएसटी से लोगों की जान लेते रहे। अब जब लोग सामने आकर बोलने लगे हैं। हिसाब माँगने लगे हैं तो रामजी याद आ गए? लोग बेवकूफ नहीं हैं। सब जानते हैं। तुम तो लोगों की नब्ज टटोल रहे थे। लेकिन फ्लॉप हो गए। यही तुम्हारी परेशानी है। इसी से तुम घबरा रहे हो। तुम्हें रामजी नहीं, 2019 का चुनाव नजर आ रहा है। 

- ऐसी कोई बात नहीं है। चुनाव, चुनाव की जगह और राम मन्दिर अपनी जगह। मन्दिर बनाना तो हमारे जीवन का ध्येय है। तुम चाहे जितनी बाधाएँ खड़ी कर दो, मन्दिर तो बन कर रहेगा। हम ही बनाएँगे।

- अरे! यार! तुम दोनों ने चाय-कचोरी का नास कर दिया। बन्द करो यह सब। चलो! एक-एक कचोरी और चाय और बुलाओ।

- हाँ! हाँ! बुलाओ। मेरी ओर से। लेकिन एक बात तुम सब सुन लो। ये ऐसे बात कर रहा है जैसे रामजी इसके भरोसे हैं। जरा समझाओ इसे। रामजी इसके भरोसे नहीं, ये रामजी के भरोसे है। और ये ही नहीं, सारी दुनिया रामजी के भरोसे है। इसे समझाओ कि रामजी अपनी चिन्ता खुद कर लेंगे। चुनाव जीतने के लिए कोई और टोटका करे।

तीसरा कोई और बोलता, इससे पहले कॉमरेड की दुकान से कचोरियाँ आ र्गइं। सब उन्हीं में अपने-अपने रामजी देखने लगे।
-----
     
‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 29 नवम्बर 2018



‘नोटा’ बन गया ‘सोटा’: जीत गया तो फिर से होंगे चुनाव

यह किसी सपने के सच हो जाने जैसा है। 

हमारे मँहगे चुनाव मुझे देश में व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण लगते हैं। धनबली और बाहुबली लोग विधायी सदनों पहुँचकर हमारी तकदीरों से खेलते हैं। ‘इण्डिया’ के लोग ‘भारत’ की तकदीर बनाने का ठेका ले लेते हैं। वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में पहुँच ही नहीं पाते।

इनसे मुक्ति पाने के लिए मुझे ‘नोटा’ प्रभावी, परिणामदायी हथियार अनुभव होता है। लेकिन उसका वर्तमान स्वरूप मुझे और क्षुब्ध कर देता है। इसका वर्तमान स्वरूप, उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं की नाराजी, असहमति तो जरूर प्रकट करता है लेकिन  किसी को जीतने से रोक नहीं पाता। अपनी इसी बात को लेकर मैं 05 अक्टूबर 2018 को, ‘नोटा’ को उम्मीदवार की हैसियत दिए जाने की बात कही थी। तब मुझे सपने में भी गुमान नहीं था कि डेड़ माह से भी कम अवधि में मेरी मुराद पूरी होने की शुरुआत हो जाएगी। कल, 13 नवम्बर को अचानक ही मुझे जानकारी मिली कि ‘नोटा’ को उम्मीदवार मान लिया गया है और यदि इसे सबसे ज्यादा वोट मिल गए तो वहाँ फिर से चुनाव कराया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 सितम्बर 2013 को ‘नोटा’ का बटन, मतदान मशीन पर उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। लेकिन आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को तमाम उम्मीदवारों से ज्यादा मत मिल जाएँ तब भी, (‘नोटा’ के बाद) सर्वाधिक मत हासिल करनेवाले उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया जाए। याने, चूँकि ‘नोटा’ कोई उम्मीदवार नहीं है इसलिए वह जीत कर भी हार जाएगा और उसे मिले मत, निरस्त मत माने जाएँगे। 

लेकिन महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (मरानिआ) इस स्थिति से एक कदम आगे बढ़ गया है। ‘मरानिआ’ के सचिव शेखर चन्ने के अनुसार अब (महाराष्ट्र में) किसी चुनाव/उप चुनाव में यदि ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिले तो किसी भी उम्मीदवार को विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा। श्री चन्ने के अनुसार यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। 

लेकिन यह आदेश फिलहाल महाराष्ट्र के समस्त नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के चुनावों, उप चुनावों में ही लागू होगा।

श्री चन्ने के अनुसार, ‘नोटा’ के वर्तमान स्वरूप में मतदाताओं की नकारात्मकता अनदेखी रह जाती है इसलिए यह प्रावधान किया गया है। इसमें ‘नोटा’ को ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ (Fictional Electoral Candidate) माना जाएगा और यदि चुनावी उम्मीदवारों को इस ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ से कम मत मिले को कोई भी उम्मीदवार विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (जिस पद के लिए यह चुनाव हुआ था, उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा।

हालाँकि यह अधूरी जीत है किन्तु यह पूरी जीत की शुरुआत है। ‘मरानिआ’ का क्षेत्राधिकार चूँकि केवल राज्यस्तरीय निकायों तक सीमित है इसलिए उसने अपने क्षेत्राधिकार के मतदाताओं को यह ताकत दे दी। यह शुरुआत यहीं नहीं रुकेगी। यह ‘छूत की बीमारी’ की तरह फैलेगी ही फैलेगी। एक के बाद एक, अन्य राज्य भी अपने मतदाताओं को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए इस प्रावधान को लागू करेंगे और अन्ततः बात भारत निर्वाचन आयोग तक पहुँचेगी ही पहुँचेगी। इसमें देर लग सकती है लेकिन ऐसा होना तो तय हो गया है।

मतदाताओं को अधिक ताकतवर बनाने के लिए, उनकी नापसन्दगी को स्वीकृती दिलाने हेतु, चुनाव सुधारों के लिए काम कर रहे अनेक एक्टिविस्ट और एनजीओ, ‘नोटा’ का प्रावधान लागू होने के ठीक बाद से लगातार माँग कर रहे हैं कि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिलने की दशा में वहाँ फिर से चुनाव तो कराया ही जाए, मतदाताओं के इंकार को स्वीकृती देते हुए, उस चुनाव में, ‘नोटा’ के जरिए खारिज किए गए तमाम उम्मीदवारों को फिर से उस चुनाव के लिए अयोग्य भी घोषित किया जाए।

हमारे राजनेता देश को और देश के लोगों को जिस मुकाम पर ले आए हैं उसके चलते यह सब होगा। होकर रहेगा। देश को मँहगे चुनावों से मुक्ति मिलेगी, एक औसत आदमी चुनाव लड़ सकेगा, वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में नजर आएँगे। आर्थिक भ्रष्टाचार यदि समूल नष्ट नहीं भी हुआ तो भी वह न्यूनतम स्तर पर आएगा। राजनीतिक दलों के, दरियाँ-जाजम उठाने-झटकारनेवाले, झण्डे-डण्डे उठानेवाले मैदानी कार्यकर्ताओं की पूछ-परख होगी। ऐसी बातों की बहुत लम्बी सूची है। वे सब होंगी।

शुरुआत हो चुकी है। विधायी सदनों में बैठे तमाम नेता, अपने सारे मतभेद भुलाकर इसे रोकने में जुट जाएँगे। मुमकिन है, कुछ बरसों तक वे इसे रोक भी लें। लेकिन वे अन्ततः परास्त होंगे। वही ‘जनता-जनार्दन’ की जीत होगी।

अँधरे को प्रकाश की अनुपस्थिति कहते हैं। लेकिन वह तो एक प्राकृतिक स्थिति है। अँधेरा दूर करने के लिए उजाला करना पड़ता है। छोटे-छोटे जुगनू लगातार जूझ रहे हैं। हर रात की एक सुबह होती ही है। लेकिन वे इस भरोसे चुपचाप नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाने तक रुकेंगे नहीं। चैन से नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाकर ही मानेंगे।
-----

(यह पोस्ट मैंने, इण्डियन एक्सप्रेस के मुम्बई संस्करण में, दिनांक 13 नवम्बर 2018 को प्रकाशित समाचार के आधार पर लिखी है। इस समाचार की लिंक मुझे, ग्वालियरवाले श्री  विष्णुकान्त शर्मा Vishnukant Sharma की फेस बुक वॉल से मिली है।  श्री शर्मा की वॉल पर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार वे, इस पोस्ट के लिखे जाने के समय तक, 28 नवम्बर को हो रहे विधान सभा चुनावों में ग्वालियर विधान सभा क्षेत्र 15 से प्रत्याशी हैं। 

मेरा अंग्रेजी ज्ञान बहुत कम है। मैंने, परम् सद्भाव और सदाशयता से, अपनी सूझ-समझ के अनुसार इस समाचार का यथासम्भव समुचित हिन्दी भावानुवाद किया है। समाचार का जो हिस्सा मुझे समझ नहीं पड़ा, वह मैंने छोड़ दिया है। मुझसे यदि कोई चूक हुई हो तो कृपया मुझे अविलम्ब सूचित कीजिएगा ताकि मैं खुद को सुधार सकूँ। मुझे प्राप्त समाचार लिंक यहाँ दे रहा हूँ।)

‘नोटा’ की पुकार - मुझे ‘सोटा’ बनाओ

मेरी धारणा है कि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारे मँहगे चुनावों में हैं। नेता चुनाव लड़ता है। जीते या हारे, नतीजों के बाद वह खर्चे की भरपाई और अगले चुनाव की तैयारी के लिए धन संग्रहण में जुट जाता है। वह और कोई काम करे, न करे, धन संग्रहण करता रहता है। कह सकते हैं कि धन संग्रहण नेता का मुख्य काम है। इसीलिए भ्रष्टाचार ही आज हमारे नेताओं की मुख्य पहचान बन कर रह गया है। कोई भी नेता अकेला धन संग्रहण नहीं कर पाता। यदि वह सत्ता में है तो सरकारी  अधिकारी/कर्मचारी उसका सबसे बड़ा औजार होते हैं। हम अधिकारियों/कर्मचारियों को भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के लिए कोसते हैं। लेकिन तनिक ध्यान से समग्र स्थितियों का विश्लेषण करेंगे तो पाएँगे कि इसके मूल में अन्ततः नेता ही होता है जो चुनावों के लिए धन संग्रह करता है। इसीलिए प्रत्येक नेता, किसी अधिकारी/कर्मचारी के भ्रष्टाचार पर गर्जना के सिवाय कभी, कुछ नहीं कर पाता। भ्रष्ट नेता के पास वह नैतिक आत्म-बल  नहीं होता कि वह किसी को भ्रष्टाचार के लिए दण्डित कर सके। ऐसे में हमारे चुनाव पूँजीपतियों, नेताओं और अधिकारियों/कर्मचारियों के ‘बँधुआ मजदूर’ बन कर रह गए प्रतीत होते हैं। आज कोई ईमानदार, भला आदमी चुनाव लड़ने की सोच ही नहीं सकता। उम्मीदवारी तय करते समय पार्टियाँ ‘जीतने की सम्भावना’ को एक मात्र पैमाना बनाती हैं और इस पैमाने पर कोई ईमानदार, भला, मैदानी कार्यकर्ता कभी भी खरा नहीं उतरता। अन्ततः कोई धन-बली, बाहु-बली ही हमारे सामने पेश किया जाता है।

चुनावों को इन जंजीरों से कैसे मुक्त कराया जाए? चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय सरकार को समय-समय पर चुनाव सुधारों के लिए कहते रहते हैं। लेकिन चूँकि ये सारे सुझाव नेताओं की चुनावी सम्भावनाओं पर कुठाराघात करते हैं इसलिए वे (याने कि सरकार) इन पर ध्यान-कान ही नहीं देते। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी-अभी ही सरकार से आग्रह किया है संसद को अपराधियों से मुक्त कराने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए। लेकिन जिस संसद में तीस प्रतिशत लोग ‘अपराध-दागी’ हों वे भला (संसद में प्रवेश के) अपने रास्ते क्यों बन्द करेंगे? 

ऐसे में मुझे ‘नोटा’ अवतार की तरह नजर आता है। मुमकिन है, मेरा सोचना ‘अतिआशावाद’ हो। लेकिन कोई भी व्यवस्था/प्रणाली सम्पूर्ण निर्दोष (जीरो डिफेक्ट) नहीं होती। ऐसे में न्यूनतम दोष (मिनिमम डिफेक्ट) वाली व्यवस्था/प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। मुझे लगता है, ‘नोटा’ हमें यह व्यवस्था/प्रणाली देने में मददगार हो सकता है। 

अपने मौजूदा स्वरूप में ‘नोटा’, उम्मीदवारों के प्रति हमारी निराशा, उनके प्रति हमारा अस्वीकार तो प्रकट करता है किन्तु किसी एक को जीतने से रोक नहीं सकता। एक लाख मतदाताओं में से 99,900 मतदाता ‘नोटा’ का बटन दबा दें तब भी, शेष 100 में से सर्वाधिक वोट पानेवाला उम्मीदवार जीत जाएगा। मध्य प्रदेश में, 2013 के विधान सभा चुनावों में 26 उम्मीदवारों की और दिसम्बर 2017-जनवरी 2018 में हुए गुजरात विधान सभा चुनावों में 30 उम्मीदवारों की जीत का अन्तर ‘नोटा’ को मिले वोटों से कम था। जाहिर है, आज का ‘नोटा’ हमारी नाराजी तो जताता है किन्तु जिसे हम खारिज करना चाह रहे हैं उसे विधायी सदन में जाने से रोक नहीं पाता।

‘सपाक्स’ ने दो दिन पहले ‘सपाक्स समाज दल’ के नाम खुद को राजनीतिक दल में बदलने की घोषणा की है। इससे पहले तक ‘सपाक्स’ के कार्यकर्ता ‘नोटा का सोटा’ का डर दिखा रहे थे। दोनों प्रमुख पार्टियाँ भयभीत भी थीं। किन्तु वे निश्चिन्त भी थीं कि ‘नोटा’ केवल ‘नोटा’ ही रहेगा, ‘सोटा’ नहीं बन पाएगा। वह किसी न किसी को जीतने से तो रोक नहीं पाएगा। सोटा याने लट्ठ, याने मारक/घातक, याने परिणामदायी। लेकिन आज का ‘नोटा’ मारक या घातक, प्रभावी या कि जन-मनोनुकूल और इससे आगे बढ़कर कहूँ तो जिस मकसद से यह लागू किया था उसके अनुकूल परिणामदायी नहीं है। 

इसलिए ‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदला जाना चाहिए। ‘नोटा’ को एक उम्मीदवार की हैसियत दी जानी चाहिए। तब ही यह इसका मकसद पूरा कर सकेगा। उसके बिना यह एक आत्मवंचना के झुनझुने से अधिक कुछ नहीं है। 

‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदलने के लिए इसे उम्मीदवार की हैसियत दी जानी चाहिए। यदि नोटा जीत जाए तो वहाँ फिर से चुनाव कराया जाए। इस चुनाव में वे लोग उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे जो ‘नोटा’ से परास्त हुए थे क्योंकि मतदाता तो उन्हें पहले ही खारिज कर चुके हैं। यह प्रावधान चुनावी विसंगतियों के लिए ‘मारक’ साबित होगा और राजनीतिक दल खुद को दुरुस्त करने के लिए विवश होंगेे।

उपरोक्त प्रावधान हो जाए तो इसके चमत्कारी नतीजे मिलेंगे। मेरे कुछ आशावादी अनुमान इस तरह हैं।

पार्टी कार्यकर्ताओं/समर्थकों को छाताधारी उम्मीदवारों से मुक्ति मिलेगी। देश में आज भी कई लोक सभा, विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र ऐसे मिल जाएँगे जहाँ पहले चुनाव से लेकर आज तक, उस निर्वाचन क्षेत्र से बाहर का आदमी चुनाव जीत रहा है। पार्टी लाइन या पार्टी अनुशासन के नाम पर कार्यकर्ता, बुझे मन से, मन मारकर बाहरी उम्मीदवार को विजयी बनाते हैं। ‘नोटा’ के ‘सोटा’ बन जाने के बाद कार्यकर्ता अपने नेताओं को ‘नोटा’ का भय दिखाकर बाहरी उम्मीदवार को रोक सकेंगे। तब वे कह सकेंगे कि ऐसा करके वे किसी विरोधी को विधायी सदन में नहीं भेज रहे हैं क्योंकि ‘नोटा’ के जीतने पर सब उम्मीदवार खारिज हो जाएँगे। तब पार्टी को स्थानीय उम्मीदवार तलाशना पड़ेगा। तब, बरसों से पार्टी के लिए जाजम बिछानेवाले, दरियाँ झटकनेवाले कार्यकर्ताओं में से किसी को मौका मिल सकेगा। तब लोकतन्त्र की भवनानुरूप ऐसा सच्चा और वास्तविक, स्थानीय नेतृत्व सामने आएगा जिसे अपने क्षेत्र की समस्याओं की न केवल जानकारी होगी बल्कि उन्हें हल करने में भी उसकी दिलचस्पी होगी। ऐसे उम्मीदवार के लिए तमाम कार्यकर्ता अतिरिक्त उत्साह से काम करेंगे जिसका परोक्ष प्रभाव चुनावी खर्च पर भी पड़ेगा ही पड़ेगा।

इसी नजरिये से देखेंगे तो पाएँगे कि राजनीति में परिवारवाद, भ्रष्ट-बेईमान-दागी-दुराचारियों के उम्मीदवार बनने, पार्टियों में विद्रोह, गुटबाजी, भीतरघात की सम्भावनाएँ शून्यवत होंगी। सबसे अच्छी बात होगी कि पार्टियों में आन्तरिक लोकतन्त्र पनपेगा, विकसित होगा। आन्तरिक लोकतन्त्र किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत होती है। पार्टियों का आन्तरिक लोकतन्त्र किसी जमाने में हमारी विशेषता और पहचान हुआ करती थी। काँग्रेस की ‘युवा तुर्क तिकड़ी’ चन्द्रशेखर, कृष्णकान्त और मोहन धारिया पार्टी के अन्दर जिस तरह वैचारिक बहस करती थी उससे नेतृत्व को असुविधा होती थी। काँग्रेस के इतिहास में चन्द्रशेखर ऐसे पहले और एकमात्र व्यक्ति बने हुए हैं जिन्होंने इन्दिराजी की इच्छा के विरुद्ध अ. भा. काँग्रेस कमेटी के सदस्य का चुनाव लड़ा और जीता।  इन्दिराजी यह पराजय स्वीकार नहीं कर पाईं और पार्टी का आन्तरिक लोकतन्त्र ही खत्म कर दिया। यहीं से काँग्रेस का पराभव प्रारम्भ हुआ। यह दुर्भाग्य ही है कि सत्ता में आने के बाद प्रत्येक पार्टी काँग्रेस हो जाती है। इसीलिए आज किसी भी पार्टी में आन्तरिक लोकतन्त्र नजर नहीं आता। वामपंथी पार्टियाँ अपवाद होने का दावा कर सकती हैं किन्तु अपवाद सदैव ही सामान्यता की ही पुष्टि करते हैं।

‘नोटा’ को यदि उपरोक्तानुसार स्वरूप दे दिया जाए यह ‘लाख दुःखों की एक दवा हो सकता है। तब चुनाव लड़ने के लिए नेताओं को भारी-भरकम चन्दा जुटाने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी जिसका अर्थ होगा, भ्रष्टाचार में भरपूर कमी। भ्रष्टाचार तब भी होगा किन्तु तब हमारे नेताओं में भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्रवाई करने का आत्म-बल होगा।

फिर कह रहा हूँ, ‘नोटा’ को लेकर मेरा सोच अतिआशावादी हो सकता है, इसमें कमियाँ हो सकती हैं। किन्तु ‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदलने पर हम ‘न्यूनतम दोष’ वाली दशा में आ सकते हैं।
-----  

दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 04 अक्टूबर 2018



चुनाव सुधारों के पक्ष में आक्रामक वातावरण चाहिए

मेरी यह पोस्ट दैनिक ‘सुबह सवेरे’ भोपाल में दिनांक 20 सितम्बर 2018 को (और रतलाम से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उपग्रह में 27 सितम्बर को) छप चुकी थी। किन्तु इसका दूसरा भाग प्रकाशित होने तक के लिए मैंने इसे ब्लॉग पर देने के लिए रोक रखा था। आज, 04 अक्टूबर को इसका दूसरा भाग ‘सुबह सवेरे’ में छप गया है जिसे मैं कल ब्लॉग पर दूँगा। मुझे गा कि दोनों भाग एक के बाद एक देना बेहतर होगा। 

एक अखबारी खबर के मुतािबक एक आयोजन में बोलते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत ने, चुनाव में काला धन रोकने के लिए मौजूदा कानूनों को अपर्याप्त बताया है। मुमकिन है, मुख्य चुनाव आयुक्त ने और भी कुछ कहा हो लेकिन मुझ जैसे पाठकों तक तो केवल एक ही बात पहुँची कि वे केवल एक ही बात पर चिन्तित थे - चुनाव में काले धन को रोकने के लिए।

चुनाव में बढ़ता काला धन हमारी समस्या है तो जरूर लेकिन यह चिन्ता न तो एकमात्र है न ही आधारभूत। जब तक चुनावों का मौजूदा ‘अत्यधिक खर्चीला’ स्वरूप बना रहेगा तब तक काला धन न केवल अपना डंका बजाता रहा बल्कि इसका दखल बढ़ता ही जाएगा। लिहाजा, चुनावों में काले धन को नियन्त्रित करने से पहले, चुनावों को खर्चीला होने से बचाने पर विचार किया जाना चाहिए और यह काम केवल चुनाव सुधारों से ही सम्भव है। लेकिन यही सबसे कठिन काम भी है। इसलिए कि सुधार करने का अधिकार हमारे सांसदों के पास है और उनमें से शायद ही कोई इनमें विश्वास और रुचि रखता हो। यह स्थिति भारतीय चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन इसे केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी मानकर छोड़ देना हम सबका, सबसे बड़ा अपराध है - मेरे तईं, राष्ट्रद्रोह के स्तर का अपराध। 

चुनाव आयुक्त आते-जाते रहेंगे। वे सब अपने-अपने हिसाब से कोशिशें करते रहेंगे। वे जिस वर्ग से आते हैं, उसे मँहगाई, भ्रष्टाचार, अफसरशाही, बाबू राज से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें पड़ता है। लेकिन हम ही उदासीन हैं। आयोग की प्रत्येक पहल अन्ततः हम आम लोगों का हित रक्षण ही करती है लेकिन हम ही इससे उदासीन हैं। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग ताकतवर बने लेकिन हम उसे ताकतवर बनाने में दिलचस्पी नहीं रखते। हम भूल जाते हैं कि हम ही चुनाव आयोग की ताकत हैं।

हमारे मँहगे चुनाव, भ्रष्टाचार सहित अनेक समस्याओं की जड़ हैं। ये जब तक मँहगे बने रहेंगे, काले धन का दबदबा बना रहेगा। आज पार्टियाँ उम्मीदवारों का चयन योग्यता, शिक्षा, चाल-चरित्र, ईमानदारी जैसे मूलभूत गुणों के आधार पर नहीं, ‘जीतने की सम्भावना’ के अधीन करती हैं। यह ‘सम्भावना’  धन-बल, बाहु-बल से जुटाई जाती है। इसी के चलते देश के विधायी सदन कभी-कभी अपराधियों की शरण स्थली अनुभव होने लगते हैं।

चुनाव सुधारों के लिए चुनाव आयोग प्रति पल प्रयासरत नही संघर्षरत रहता है। टी. एन. शेषन से पहले तक चुनाव आयोग ‘नख दन्त विहीन शेर’ था। शेषन ने इसे नई पहचान और नए तेवर दिए। उसके बाद से ही नेताओं को इससे असुविधा होने लगी। लेकिन गए तीन-चार बरसों में शेषन-पूर्व का समय लौटता नजर आने लगा है। इसके बावजूद चुनाव आयोग समय-समय पर जनोपयोगी और लोकतन्त्र की रक्षा करते हुए महत्वपूर्ण सुझाव देता रहता है। ‘नोटा’ ऐसा ही एक सुझाव था जो वास्तविकता बना। किन्तु आयोग के इन सुझावों को जन समर्थन कभी नहीं मिलता।

अभी-अभी आयोग ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। एक व्यक्ति एक ही स्थान से चुनाव लड़े, दो स्थानों से जीता हुआ व्यक्ति किसी एक स्थान से त्याग-पत्र दे तो वहाँ होनेवाले उप चुनाव का खर्च उससे वसूल किया जाए या, वहाँ दूसरे नम्बर पर आए उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाए। ये दोनों ही सुझाव ऐसे हैं जिन्हें मंजूर कराने के लिए पूरे देश को सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। चुनाव आयोग ने तो यह सुझाव अब दिया है लेकिन मेरे कस्बे के चार्टर्ड इंजीनीयर जयन्त बोहरा कोई बीस बरस पहले ही यह सुझाव दे चुके थे। उनके साथ मिलकर मैंने भी खूब लिखा-पढ़ी की थी। किन्तु कार्रवाई तो दूर रही, मुझे पावती भी नहीं मिली। ‘व्यवस्था’ से जवाब पाना भाग्यशालियों को ही नसीब होता है। लेकिन, त्याग-पत्र देनेवाले से खर्च वसूल करना, मौजूदा व्यवस्था को मजबूत ही करेगा। हमारे नेताओं के पास अकूत धन है। वे आसानी से खर्चा दे देंगे। इसलिए, त्याग-पत्र के बाद वहाँ दूसरे नम्बर पर आए उम्मीदवार को ही विजयी घोषित किया जाना चाहिए। तब नेता को, विधायी सदन में एक विरोधी के बढ़ जाने की चिन्ता होगी। इस व्यवस्था से न केवल उप चुनाव के ताम-झाम और उपक्रम से मुक्ति मिलेगी बल्कि लोकतन्त्र के विचार को मजबूती भी मिलेगी। 

चुनाव आयोग के इन सुझावों को प्रचण्ड जन समर्थन मिलना चाहिए। आज का समीकरण यह बन गया है कि जो नेता के हित में होता है वह नागरिकों के लिए अहितकारी होता है। इसका विलोम समीकरण यही होगा कि जो नेता के प्रतिकूल होगा वह नागरिकों के अनुकूल होगा। चुनाव आयोग के प्रस्तावित सुधार नागरिकों के अत्यधिक अनुकूल हैं। इन्हें प्रचण्ड जन समर्थन मिलना चाहिए।

अजाक्स, अपाक्स, करणी सेना जैसे संगठनों ने, अपने-अपने कारणों से इन दिनों देश में आन्दोलन छेड़ रखा है। राजनीतिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर लोग जगह-जगह नेताओं-मन्त्रियों से सवाल पूछ रहे हैं, काले झण्डे दिखा रहे हैं, टमाटर फेंक रहे हैं। नेता-मन्त्री गूँगे हो गए हैं। उनके बोल नहीं फूट रहे। वे रास्ते बदल रहे हैं। दौरे निरस्त कर रहे हैं। ये तीन संगठन तो उदाहरण मात्र हैं। मेरा कहना है कि देश भर के तमाम सार्वजनिक संगठनों (इनमें मैं लायंस, रोटरी, जेसी जैसे ‘सेवा संगठनों’ को भी शरीक करता हूँ) ने चुनाव आयोग के प्रस्तावित सुधारों के पक्ष में भी ऐसा ही आक्रामक वातावरण बनाना चाहिए। केवल चुनाव सुधार ही हमें मँहगे चुनावों से मुक्ति दिला सकते हैं। 

चुनाव सुधारों में दो सुधार और फौरन शरीक किए जाने चाहिए। पहला, दलबदल करनेवाला अगले छः वर्ष तक किसी दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का पात्र न रहे। वह निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत जाए तो किसी दल में शामिल न हो सके।   

दूसरा - चुनावी चन्दे के मामले में मौजूदा सरकार ने, इलेक्टोरेल बॉण्ड की व्यवस्था कर एक पाप किया है। बढ़ती पारदर्शिता के इस समय में यह व्यवस्था काले धन को बढ़ावा देती है। पार्टी के समर्थकों/कार्यकर्ताओं को मालूम होना चाहिए कि उनकी पार्टी किन लोगों से चन्दा ले रही है। इलेक्टोरोल बॉण्ड यह जानकारी छुपाते हैं। यह व्यवस्था फौरन वापस ली जानी चाहिए।

सपाक्स और करणी सेना के आन्दोलन में नोटा का जिक्र खूब हो रहा है - एक धमकी के रूप में तमाम नेता और दल इस धमकी से आतंकित हैं। नोटा का वर्तमान स्वरूप अपर्याप्त और अप्रभावी है। अभी यह असन्तोष प्रकट करने का माध्यम मात्र है। नोटा को एक उम्मीदवार की हैसियत देकर इसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। मेरा तो मानना है कि नोटा को यदि इसके ‘आशय’ (इंटेंशन) के अनुरूप हैसियत दे दी जाए तो हमें शनै-शनै मँहगे चुनावों से ही नहीं, अनेक राजनीतिक समस्याओं से भी मुक्ति मिल जाएगी जिसकी अन्तिम परिणति भ्रष्टाचार से मुक्ति होगी।

नोटा हमारे ‘लाख दुःखों की एक दवा’ है। यह अलग से स्वतन्त्र आलेख का विषय है। मैं इस पर अवश्य लिखूँगा। शायद अगले सप्ताह ही। लेकिन हम मूल बात को नहीं भूलें - चुनाव आयोग के प्रस्तावित चुनाव सुधारों से हम खुद को जोड़ें, आयोग को ताकत दें। हमने संसदीय प्रणाली अपनाई है। इसलिए चुनाव हमारे लिए अपरिहार्य हैं। हम चुनाव प्रणाली को ऐसी बनाएँ कि आप भी चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा सकें और मैं भी। 

हम सब अपने-अपने नेताओं से कहीं न कहीं असन्तुष्ट, अप्रसन्न और दुःखी हैं। हमारे ये नेता चुनाव आयोग से डरते हैं। गोया, चुनाव आयोग परोक्षतः हमारा (और प्रकारान्तर में लोकतन्त्र का) ही मनोरथ साध रहा है। इसलिए भी हमने चुनाव आयोग को खुलकर, मुक्त-हृदय, मुक्त-कण्ठ, मुक्त-मन, मुक्त-धन सहयोग करना चाहिए। 

-----
दैनिक ‘सुबह सवेरे’,  भोपाल, 20 सितम्बर 2018 



नोटबन्दी: इसमें देश कहीं नहीं था

नोटबन्दी की विफलता का बचाव करते हुए वित्त मन्त्री अरुण जेटली सच ही कह रहे थे कि नोटबन्दी का मकसद यह देखना नहीं था कि बन्द किए गए नोटों में से कितने नोट वापस आएँगे। यह कहते हुए वे यह भी कह रहे थे कि आठ नवम्बर 2016 की रात को, नोटबन्दी की घोषणा करते हुए प्रधान मन्त्री मोदी झूठ बोले थे कि नोटबन्दी का लक्ष्य  आतंकवाद, नकली मुद्रा, काले धन और भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना था। आँकड़े और जमीनी वास्तविकताएँ बता रही हैं कि जेटली ही सच्चे हैं, प्रधान मन्त्री नहीं। नोटबन्दी का लक्ष्य देश की बेहतरी नहीं था।

तब, क्या था नोटबन्दी का लक्ष्य?

वही, जो मेरे एक सीए मित्र ने मुझे, नोटबन्दी की घोषणा के अगले दिन, नौ नवम्बर को बताया था। 

सरकारों की आर्थिक नीतियों/निर्णयों का राजनीतिक भाष्य करने के शौकीन इन सीए मित्र ने कहा था ‘यह नोटबन्दी राजनीति है बैरागीजी! जोरदार राजनीति। मुद्दा यूपी का चुनाव है। यूपी में सपा, बसपा, काँग्रेस सबकी खाट खड़ी हो गई है। भाजपा सबका सूपड़ा साफ कर देगी।’ मुझे बात न तो समझ पड़ी थी न ही इसे राजनीतिक कदम मानने को तैयार हुआ था। मेरा विश्वास रहा है कि राजनीतिज्ञ कितना ही टुच्चा, घटिया, झूठा, दम्भी हो, पार्टी या राजनीति के लिए देश को तो दाँव पर कभी नहीं लगाएगा। नोटबन्दी के बाद फैली अफरा-तफरी, अपना ही पैसा पाने के लिए तड़पते, तरसते, करुण क्रन्दन करते, अपनी बेटियों के हाथ पीले करने के लिए पाई-पाई को मोहताज हो गए, पैसों के अभाव में ईलाज हासिल न करने से मर गए लोगों को, बैंकों के सामने लाइन में लगे मरते लोगों को देख-देख कर, उनके बारे में सुन-सुन कर, पढ़-पढ़ कर भी मैं नोटबन्दी को राजनीतिक फैसला मानने को कभी तैयार नहीं हुआ। फिर, ‘संघ’ और भाजपा तो ‘दल से पहले देश’ की दुहाई देते हैं! ये भला अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश को दाँव पर कैसे लगा सकते हैं?

लेकिन धीरे-धीरे सामने आई, आती रही वास्तविकताओं से मोह भंग होने लगा। सरकार द्वारा जारी किए गए, दो हजार के जाली नोट तो नोटबन्दी की अवधि में ही काश्मीर में आतंकियों से बरामद हो गए। आठ नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा हुई और नवम्बर समाप्त होते-होते ही 155 बड़ी आतंकी घटनाएँ हो गईं। 2017 में ये बढ़कर 184 हो गईं और 31 जुलाई 2018 तक 191 घटनाएँ हो गईं। आतंकियों के हाथों हमारे जवानों का मरना जारी रहा।

भ्रष्टाचार के मामले में हमारी दशा तो बद से बदतर हो गई। ट्रांसपरेंसी इण्टरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामले में, 2017 में दुनिया के 175 देशों में हमारा स्थान 79वाँ था जो 2018 में 81वाँ हो गया। 

जाली नोटों के मामले में, आतंकवादी हमें असफल साबित कर ही चुके थे। देश में भी ‘कलाकारों’ ने हमें धूल चटा दी। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार 2016-17 में देश में 2000 के 638 नकली नोट बरामद हुए थे। 2017-18 में यह संख्या बढ़कर 17,929 हो गई। 

काले धन के मामले में तो न केवल सरकार की बल्कि हमारे देश की, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार किरकिरी हो गई। बन्द किए नोटों के मूल्य के 99.3 प्रतिशत नोट वापस आ गए! सरकारी आँकड़ों के मुताबिक केवल 10,270 हजार करोड़ रुपये ही वापस नहीं आए। लेकिन इस रकम को भी पूरी तरह काला धन नहीं कह पा रहे क्योंकि नेपाल-भूटान में अभी भी हमारे पुराने नोट चल रहे हैं। नौ दिसम्बर 2016 को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को अपना अनुमान बताया था कि नोटबन्दी से तीन से चार लाख करोड़ रुपयों के नोट वापस नहीं आएँगे। अब जेटली कह रहे हैं कि नोटबन्दी का लक्ष्य यह देखना नहीं था कि कितने नोट वापस आएँगे। सच यही है। नोटबन्दी का लक्ष्य यह नहीं था।

वापस आए नोटों की संख्या का समाचार 30 अगस्त को सामने आया तो मेरे ज्ञान-चक्षु खुले। मैंने उन सीए मित्र को फोन लगाया। वे बाहर थे। मैंने पूछा - ‘आपने कैसे कहा था कि नोटबन्दी का मुद्दा यूपी चुनाव हैं?’ वे बोले - ‘मुझे पता था, आप फोन करोगे ही करोगे। अभी बाहर हूँ। सोमवार रात को आऊँगा। मंगलवार को बात करेंगे।’

बड़ी ही आकुलता में बीते मेरे ये पाँच दिन। मंगलवार (4 सितम्बर) की सुबह, उन्हें फोन किए बिना ही उनके यहाँ पहुँच गया। वे उठे-उठे ही थे। खुलकर हँसते हुए अगवानी की। मुझसे रहा नहीं जा रहा था। बैठते-बैठते ही पूछताछ शुरु कर दी। और जोर से हँसते हुए बोले - ‘अरे! इतनी भी क्या जल्दी? इस उमर में ऐसी बेकरारी शोभा नहीं देती। सब बताता हूँ। बैठिए तो सही!’ 

उनके मुताबिक राजनीति उनका विषय नहीं है न ही इसमें उन्हें दिलचस्पी है। सीए होने के कारण सरकार की आर्थिक नीतियों/निर्णयों पर उनकी नजर रहती है। इसीलिए इन नीतियों/निर्णयों के राजनीतिक प्रभावों का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। नोटबन्दी के राजनीतिक आयाम भी इसी तरह देखने की कोशिश की थी। नोटबन्दी की घोषणा के ‘टाइमिंग’ से उन्होंने अनुमान लगाया और यह मात्र संयोग ही रहा कि कड़ियाँ एक के बाद एक, कुछ ऐसी जुड़ती गईं कि उनका अनुमान  सही निकला।

उन्होंने सविस्तार पूरी कहानी सुनाई। मौजूदा सरकार में अब सीबीआई इकलौता तोता नहीं रह गया। संवैधानिक संस्थाएँ एक के बाद एक ‘तोता-दशा’ प्राप्त करती जा रही हैं। सो, यूपी के चुनावों का पूरा खाका सरकार के पास था ही। आठ नवम्‍बर की रात को नोटबन्दी की घोषणा के कारण जेब में पड़ा पैसा अप्रभावी-अनुपयोगी हो गया। बैंकों से लेन-देन की सीमा लगा दी गई। 27 दिसम्बर को, बसपा के पार्टी फण्ड में जमा 104 करोड़ रुपयों की जाँच शुरु कर दी गई। 17 जनवरी को यूपी विधान सभा चुनाव घोषित हो गए। मँहगी रैलियाँ हों या साधन-संसाधन, हर मामले में भाजपा ही भाजपा थी। भाजपा के 30 से अधिक हेलिकाफ्टर उड़ रहे थे। बाकी पार्टियों के पास 10 भी नहीं थे। ‘आपको याद होगा, तब अखबारों में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई, पार्टी के रंग और चुनाव चिह्नवाली सैंकड़ों मोटर सायकिलों के फोटू छपे थे। ये सब नोटबन्दी से पहले ही खरीद ली गईं थीं।’ 12 मार्च को यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम आए। भाजपा ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया। इसके ठीक अगले ही दिन, 13 मार्च को चुनाव आयोग ने घोषणा की कि बसपा के पार्टी फण्ड के 104 करोड़ रुपयों के मामले में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई। और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि 13 मार्च को,  यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम घोषित होने के अगले ही दिन, रिजर्व बैंक ने बैंकों से रकम निकासी सीमा पर लगाया प्रतिबन्ध हटा लिया।
उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई मोटर सायकिलों 
का ऐसा ही चित्र उन दिनों अखबारों में छपा था।  यह चित्र फेस बुक से 05 सितम्बर को लिया गया है।  


सीए मित्र की बातें सुनते-सुनते मुझे भी कुछ बातें याद आने लगीं। नोटबन्दी के बाद दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने एक चैनल पर बैंकों के आँकड़े दिए थे जिनके मुताबिक 2016 की, जुलाई-सितम्‍बर वाली दूसरी तिमाही में बैंकों में जमा धन, पूर्व वर्षों की इसी  समयावधि के मुकाबले कई गुना अधिक था। केजरीवाल का दावा था कि नोटबन्दी की पूर्व सूचना मिलने के बाद भाजपा ने ही यह धन जमा कराया था। यह भी याद आया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षतावाले सहकारी बैंक में बहुत बड़ी संख्या में (सम्भवतः भारत के किसी भी सहकारी बैंक में सबसे ज्यादा) पुराने नोट जमा किए गए थे। यह भी याद आया कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा धन में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह याद आते-आते जेटली का वह वक्तव्य भी याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा धन सारा का सारा काला धन नहीं कहा जा सकता।     

पूरी कहानी सुनते-सुनते मुझे, अपने स्कूली दिनों में पढ़े हुए, कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यास याद आ गए। जिसे सारा देश राष्ट्र सेवा मान रहा था, अपना ही पैसा पाने के लिए, लाइनों में लगे, एड़ियाँ रगड़ते-रगड़ते मर गए लोगों के परिजनों को सीमा पर शहीद हुए जवान याद दिलाए जा रहे थे, वह सब झूठ, छलावा था! इस सबमें देश कहीं नहीं था! देश के लिए राजनीति थी या राजनीति के लिए देश को काम में ले लिया गया! 

मैं आर्थिक मामलों का जानकार नहीं। लेकिन नोटबन्दी की विभीषिका एक सच है। उस पर, ‘कर्नल रंजीत’ की तरह मेरे इन सीए मित्र का दिया यह ब्यौरा! जहाँ चश्मदीद गवाह न हों, दस्तावेजी सबूत न हों, वहाँ परिस्थितिजन्य साक्ष्य बोलते हैं। 

तो क्या ‘दल से पहले देश’ वाला मुहावरा उलट दिया गया था? जेटली यही तो नहीं कह रहे थे?
-----   
दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 06 सितम्बर 2018



भारत: धनाढ्यों द्वारा नियन्त्रित धार्मिक गरीबों का देश

पाटीदार समुदाय की कुलदेवी है उमिया देवी। ‘विश्व उमिया धाम मन्दिर’ निर्माण हेतु गत दिनों अहमदाबाद में सम्पन्न हुई बैठक में पाटीदार समाज ने केवल तीन घण्टों में 150 करोड़ रुपये जुटा लिए। याने प्रति मिनिट 84 लाख रुपये। मुम्बई के दो पटेल भाइयों ने इक्यावन करोड़ रुपये देने की घोषणा की। यह, इस बैठक में घोषित की गई सबसे बड़ी रकम है। पूरी परियोजना एक हजार करोड़ रुपयों की है। यदि यही गति और मनोदशा बनी रही तो शेष 6 बैठकों में समूची परियोजना की रकम जुटा ली जाएगी। यह वही पाटीदार समाज है जिसे आरक्षण दिलाने के लिए हार्दिक पटेल संघर्षरत हैं। ऐसे आँकड़ों पर हार्दिक कहते हैं कि पाटीदार समुदाय में गरीबों की संख्या अधिक है। ऐसी आर्थिक हैसियतवाले पाटीदार तो गिनती के ही हैं। हार्दिक सच ही कहते होंगे।

एक समुदाय के एक मुनि का देहावसान हो गया। उनकी अर्थी में कन्धा देने की बोलियाँ लगीं। सबसे आगे, दाहिना कन्धा देने से शुरु हुई बोलियाँ खत्म हुईं तो कुल रकम आठ करोड़ हुई। उल्लेखनीय बात यह रही कि एक के बाद एक, ये सारी बोलियाँ एक ही भक्त के नाम पर खत्म हुईं। एक व्यक्ति तो अर्थी उठा नहीं सकता! निश्चय ही इस भक्त ने, कन्धे देने का अपना अधिकार अन्य भक्तों को देने का सौजन्य बरता होगा।

दिल्ली के एक साई भक्त ने गए दिनों शिरड़ी पहुँच कर, डेड़ किलो वजन का सोने का हार साई बाबा को चढ़ाया। इस हार का मूल्य बयालीस लाख रुपये आँका गया। यह हार साई बाबा की मूर्ति को भिन्न-भिन्न उत्सवों-प्रसंगों पर ही पहनाया जाएगा। 

अखबारों में छपे ऐसे समाचार पढ़ते-पढ़ते हर बार उक्ति याद आ जाती है - ‘भारत, निर्धनों का धनाढ्य देश है।’ लगता है, इस उक्ति में सुधार किया जा सकता है - ‘भारत, धनाढ्यों द्वारा नियन्त्रित धार्मिक गरीबों का देश है।’

हम पाँच-सात ‘मूर्ख मित्र’ जब भी मिल बैठते हैं तो चकित भाव से ऐसे समाचारों पर चर्चा करते हैं। सामूहिक धर्म का सामाजिक अवदान हमें अब तक समझ नहीं आया। जाति आधारित आरक्षण का विरोध करते हुए आर्थिक आरक्षण की बात कही जाति है। कहा जाता है कि हर जाति, समुदाय में आर्थिक पिछड़े लोग हैं। लेकिन धर्म के नाम पर जब, कुछ ही घण्टों में जुटाए जानेवाले ऐसे भारी-भरकम आँकड़े सामने आते हैं तो सहसा ही मन में विचार आता है - अपनी ही जाति, अपने ही समुदाय के आर्थिक पिछड़ों की याद इन लोगों को क्यों नहीं आ पाती? शिक्षा, अवसर, रोजगार जैसे आधारभूत जीवनदायी उपक्रम अपने ही समुदाय के वंचितों, उपेक्षितों को उपलब्ध कराने में इनकी रुचि क्यों नहीं हो पाती?

प्रख्यात भाषाविद्, कवि-साहित्यकार डॉक्टर जय कुमार जलज के यहाँ बैठा था। वे किसी से बात कर रहे थे। मैं मूक श्रोता था।  बातों ही बातों में जलजी ने बताया, एक सन्त-मुनि से उन्होंने कहा कि उनके (सन्त-मुनि के) समाज के अनेक युवा लड़के/लड़कियाँ मुम्बई, पुणे, बेंगलुरु, चैन्ने, हैदराबाद जैसे विभिन्न महानगरों में नौकरीपेशा बने हुए हैं। वहाँ वे अकेले रहते हैं और स्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि वे चाहकर भी अपने परिवार की धार्मिक परम्पराएँ नहीं निभा पाते। समाज के धनाढ्य लोग यदि मन्दिरों-मठों पर धन लगाने के बजाय, अपने ही समुदाय के ऐसे बच्चों के लिए समुचित आवास व्यवस्था उपलब्ध करा दें तो न केवल बच्चों को ‘परदेस’ में ढंग-ढांग का ठिकाना मिल जाएगा बल्कि, परिवार से दूर रहनेवाले वे बच्चे अपने परिवार/समुदाय की खान-पान, पूजा-पाठ, देव/मन्दिर-दर्शन जैसी पारम्परिक धार्मिकता से भी जुड़े रहेंगे। जलजजी का सुझाव था कि यह व्यवस्था निःशुल्क न हो। बच्चों से ‘नो प्रॉफिट-नो लॉस’ आधार पर भुगतान लिया जाए। जलजी ने सन्त-मुनि से आग्रह किया कि वे (सन्त-मुनि)  उनके समाज के धनाढ्य लोगों से ऐसा करने का आग्रह करें। सुनकर सन्त-मुनि ने विचार की प्रशंसा तो की किन्तु कहा कि उनका काम केवल धर्मोपदेश देना है, ऐसा आग्रह करना, ऐसी सलाह देना नहीं। जलजी की बात सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाया। पूछ बैठा कि वे सन्त-मुनि किस समाज/समुदाय के थे। जलजी ने हँसते हुए जवाब दिया - ‘वे मेरे समुदाय के भी थे आपके समुदाय के भी। साधु, सन्त, मुनि किसी विशेष जाति, समाज, सम्प्रदाय के नहीं होते। वे तो समग्र मनुष्य समाज के होते हैं।’

दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिनों तक चलनेवाले इन धार्मिक आयोजनों/समारोहों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। हजारों आबाल-वृद्ध नर-नारी इनमें प्रतिदिन शामिल होते हैं। अपने अमूल्य मानव श्रम के अनेक घण्टे इनमें खपाते हैं। लेकिन बदले में पाते क्या हैं - यह समझना हर बार कठिन ही हुआ। श्रद्धा और आस्था के तर्क हर बार ऐसी जिज्ञासाओं को ‘चिर-कुमारी’ बनाए रखते हैं। ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार हुआ है कि प्रवचनों से लौटते हुए लोगों से मैंने, सोद्देश्य पूछा - ‘कैसा लगा आपको?’ उत्तर मिला - ‘बहुत सुन्दर व्याख्यान था महाराजजी का।’ मैंने पूछा - ‘क्या कहा महाराजजी ने?’ जवाब मिला - ‘यह तो याद नहीं। लेकिन बहुत सुन्दर व्याख्यान दिया महाराजजी ने।’ यह जवाब देते समय उनकी प्रसन्नता देखते ही बनती थी।

मुझे सामूहिक धर्म की एक ही उपयोगिता अनुभव हुई - दुःखी आदमी अपना दुःख भूल जाता है। अपने असफल प्रयत्नों की समीक्षा से बचने में, ऐसी भीड़, आदमी की बड़ी मदद करती है। वह अपने आसपास अपने ही जैसे अनेक असफलों को देख शायद राहत पाता है - ‘मैं अकेला ही ऐसा नहीं हूँ।’ अपने समान ही दूसरों को असफल, अधूरा, व्यथित, पीड़ित देख-देख कर उसे अपना दुःख कम अनुभव होने लगता होगा। पिछले जन्म के कर्म-फल भुगतने की भयानक कथाएँ सुनते-सुनते, अपना अगला जन्म सुधारने की सोचते हुए वह अपना कष्टदायक वर्तमान भूल जाता होगा। यही उसके लिए बड़ी राहत होती होगी। इसके अतिरिक्त और कोई व्यक्तिगत प्राप्ति मुझे तो नजर नहीं आती।

लेकिन इन्दौर के राजनेताओं द्वारा आयोजित धार्मिक समारोहों में जरुर कुछ व्यक्तिगत प्राप्तियाँ मैंने देखी हैं। वहाँ महिलाओं को साड़ियाँ, घरु उपयोग के बर्तन, स्वादिष्ट-मँहगी मिठाई के डिब्बे व्यक्तिगत स्तर पर मिल जाते हैं। लेकिन इनमें से ऐसा कुछ भी नहीं जो आदमी की जिन्दगी सँवार दे। ऐसे सामूहिक धार्मिक आयोजन मुझे तो, आदमी को जड़ होने की सीमा तक यथास्थितिवादी बनाते लगते हैं। कभी-कभी तो, पीछे ले जानेवाले भी लगते हैं। धर्म तो मनुष्य की आत्मोन्नति का श्रेष्ठ उपकरण है। यह व्यक्ति को कर्मठ, पुरुषार्थी बनता है। किन्तु सामूहिक धर्म तो मुझे आदमी को अकर्मण्य, भाग्यवादी बनाता अनुभव होता है। 

राजनीति ने इस स्थिति में ‘कोढ़ में खाज’ जैसा ही काम किया है। लोगों की धार्मिकता राजनेता के लिए सोने का अण्डा देनेवाली मुर्गी है। धार्मिक भीड़ नेता को वोट-धन से मालामाल करती है। भोपाल के एक नेता गए दो-तीन बरसों से, अपने विधान सभा क्षेत्र में ‘सामूहिक रक्षा बन्धन’ मना रहे हैं। पूछा जा सकता है कि यह ‘भ्रातृ भाव’ केवल अपने क्षेत्र की महिलाओं तक ही सीमित क्यों? इसका एक ही जवाब है - ‘यह भ्रातृ-भाव नहीं, वोट-भाव है।’ 

धर्म और राजनीति के घातक घालमेल को वाजिब ठहरानेवालों की कमी नहीं है। ये सब चतुर लोग हैं। इनका धर्म पूरी तरह से ‘सोद्देश्य और स्वार्थप्रेरित’ होता है। तनिक ध्यान से देखिए। धर्म-यात्राएँ, यज्ञ, कथा आयोजित करानेवाला नेता रक्षा बन्धन तो सामूहिक मनाता है, लेकिन लक्ष्मी पूजन सदैव अकेला ही करता है। अपने घर की लक्ष्मी पूजा में अपने एक भी मतदाता को शामिल नहीं करता। 

लक्ष्मी व्यक्तिगत है। बाकी सब सामूहिक है। यही धर्म है।
----- 

दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 30 अगस्त 2018

पहरुए! सावधान रहना



हम आजादी का बहत्तरवाँ जलसा मना रहे हैं। बच्चे-बच्चे के मन में आजादी की खुशी और उल्लास की रोशनी महसूस होनी चाहिए। लेकिन नहीं हो रही। यह रोशनी मुट्ठी भर हाथों में कैद नजर आ रही है। लोगों की आँखों में डर और दहशत छायी हुई है।  

विधायी सदनों में दागियों, अपराधियों की बढ़ती उपस्थिति से सर्वोच्च न्यायालय चिन्तित है। आज से नहीं, बरसों से। इन्हें इन सदनों से बाहर बनाए रखने के उपाय तलाश करने के लिए सरकार से लगातार कह रहा है। सरकारें मना नहीं करतीं। लेकिन उपाय भी नहीं करतीं। इन पर रोक लगाने के लिए कानून जरूरी है। कानून विधायी सदनों में बनते हैं जहाँ वे ही लोग बैठे हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के लिए चिन्ता का विाय बने हुए हैं। यह आशावाद का चरम बिन्दु है - चीलों से, गोश्त की सुरक्षा की उम्मीद की जा रही है। ये लोग जनता की सुरक्षा और न्याय दिलाने के लिए कानून बनाते हैं। ये ऐसे ही कानून बनाते हैं जो इन्हें सुरक्षित रख सकें। ये ही देश की वास्तविक जनता हैं।

विधायी सदनों में अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। देहातियों, किसानों, मजदूरों की उपस्थिति इन सदनों में कम होती जा रही है। आँकड़े बताते हैं कि 165 अरबपति पुनर्निवाचित हुए हैं। ये अरबपति लोग देश के गरीबों की बेहतरी की नीतियाँ बनाते हैं। ‘गरीब’ की अपनी-अपनी परिभाषा है। अरबपति आदमी के लिए करोड़पति गरीब होता है। आँकड़े कहते हैं कि देश की बाईस प्रतिशत सम्पदा पर देश के एक प्रतिशत लोगों का कब्जा है। एक अन्य सर्वेक्षण कहता है कि देश की 78 प्रतिशत दौलत, देश के तीन प्रतिशत लोगों की तिजोरियों मे जमा है। गरीबों की चिन्ता में दुबले हुए जा रहे हमारे इन निर्वाचित ‘जनप्रतिनिधियों’ को खेत, खेती, किसान फूटी आँखों नहीं सुहाते। खेती की जमीन इनकी आँखों में खटकती है। खेती में जमीन बेकार ही खपाई जा रही है। इस जमीन पर भारी कारखाने लगाए जा सकते हैं।

साफ नजर आ रहा है, देश और समाज की प्राथमिकताएँ बदल दी गई हैं। समाजवादी सामाजिक की रचना, सामाजिक जुड़ाव, सर्वधर्म समभाव, अन्तिम आदमी की बेहतरी जैसी बातें तो अब हाशिये से भी धकेली जा रही हैं। नफरत की दुकानें सजी हुई हैं। दलितों, शोषितों, वंचितों से जीने का अधिकार छीना जा रहा है। गर्मी के मौसम में तीन दलित युवक सार्वजनिक कुए के ठण्डे पानी में तैरने उतर गए तो सवर्णों की गरमी के शिकार हो गए। तीनों की सार्वजनिक पिटाई कर दी गई। एक दलित ने ठाकुरों की तरह मूँछें रख लीं तो उसकी मूँछें नोच ली गईं और अधमरा कर दिया गया। दलित अपनी शादियों का जलसा नहीं रचा सकते। उनकी बारातें पुलिस रक्षा में निकलती हैं। उनके लिए मन्दिरों के दरवाजे बन्द हैं। नजर बचाकर कोई अन्दर चला गया तो भक्त उसकी वह दशा करते हैं भगवान भी उसे बचा नहीं पाता। बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की हत्या अब सामान्य घटना होती जा रही है। हो भी क्यों नहीं? सत्ता के पहरुए, बुद्धिजीवियों को एक लाइन में खड़ा कर, गोलियों से भून देने की बात खुले आम कहते हैं। भ्रष्टाचार के गवाहों को दिनदहाड़े सड़क पर कुचला जा रहा है। देख सब रहे हैं लेकिन चुप हैं।

सब कुछ बदला जा रहा है। नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं। ‘राष्ट्र’ को परे धकेल दिया गया है और ‘राष्ट्रवाद’ परोसा जा रहा है। जिन कामों, बातों से देश बनता है, वे सब काम और बातें ‘वर्जित सूची’ में डाली जा रही हैं। जिन्होंने देश से गद्दारी की, वे लोगों की वफादारियों के प्रमाण-पत्र जारी कर रहे हैं। भारत माता की महाआरतियाँ हो रही हैं लेकिन भारत की माताएँ देहातों में नंगी घुमाई जा रही हैं। ‘एक शाम - भारतमाता के नाम’ के आयोजन होते हैं लेकिन भारत माँ के बेटों को सड़कों पर घेरकर मार दिया जाता है। संविधान और कानून की दुहाइयाँ दी जाती हैं लेकिन भीड़तन्त्र, उच्छृंखलता और जंगल के कानून को मान्यता दी जाती है। 

हमने आजादी का मोल नहीं जाना। आज भी नहीं जान पा रहे हैं। कहते हैं, मुफ्त की चीज की कदर नहीं होती। रक्त क्रान्ति के बिना शायद ही किसी देश को आजादी मिली हो। इतिहास देखें तो लगता है, हमें आजादी बहुत ही सस्ते में मिल गई। खून हमने भी बहाया, प्राणोत्सर्ग हमने भी किया, अनगिनत नौजवानों ने अपने सपने इस देश पर कुरबान कर दिए, माँओं ने अपने बेटे, बहनों ने भाई और सुहागनों ने सिन्दूर गँवाया। लेकिन फिर भी दूसरे देशों के मुकाबले हमने बहुत कम कीमत चुकाई। शायद इसीलिए हमने अपनी आजादी का मोल नहीं समझा। हमने आजादी को केवल अधिकार मान लिया और भूल गए कि यह हमारी जिम्मेदारी भी है। 

सात अगस्त 1942 को, भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पर बोलते हुए गाँधी ने गिनती के वाक्यों में काफी-कुछ कह दिया था - ‘स्वतन्त्रता प्राप्त करते ही आपका काम खतम नहीं हो जाएगा। हमारी कार्ययोजना में तानाशाहों के लिए कोई जगह नहीं है।......अगर आप सच्ची आजादी पाना चाहते हैं तो आपको मेल-जोल पैदा करना होगा। ऐसे मेल-जोल से ही सच्चा लोकतन्त्र पैदा होगा।’ इसके कुछ ही बरसों बाद, संविधान सभा में अपने अन्तिम भाषण में अम्बेडकर ने कहा था - ‘यदि हम भारतीय, पंथ और मत को देश पर हावी होने देंगे तो आजादी शायद हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी।.......सामाजिक स्वतन्त्रता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता अधूरी है।’ आज लग रहा है, हम इस खतरे की अनदेखी कर रहे हैं और अधूरेपन को बढ़ा रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम पूरी तरह रीत जाएँगे और अपने खाली हाथ देखते रहेंगे। अम्बेडकर ने तब आह्वान किया था - ‘समता और न्याय के सिद्धान्त पर आधारित समाज की रचना का संकल्प लें और जुट जाएँ।’ यह कह कर अम्बेडकर वस्तुतः गाँधी की बात को ही आगे बढ़ा रहे थे।

लेकिन हम वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं। हम आजाद बने रहें, यही हमारी चाहत हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि आपदाएँ भेदभाव नहीं करतीं। लेकिन हवेलियाँ/कोठियाँ आग और बाढ़ से सुरक्षित ही रहती हैं। बाढ़ में तटवर्ती कच्चे मकान, झोंपड़े ही बहते हैं और आग भी इन्हें ही घेरती है। यह देश कच्चे मकानों/झोंपड़ों का देश है, कोठियों/हवेलियों का नहीं। आजादी हमारी जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी।
यह सब देख-देख कर कवि गिरिजा कुमार माथुर अचानक ही बड़ी शिद्दत से याद आ जाते हैं। 15 अगस्त 1947 की आधी रात जब नेहरू संसद के सेण्ट्रल हॉल में स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधान मन्त्री के रूप में भाषण दे रहे थे और पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तब उन्होंने लिखा था - ‘आज विजय की रात, पहरुए! सावधान रहना।’ कवि त्रिकालदर्शी होता है। माथुरजी ने आजादी के पहले ही पल हमें आगाह किया था। हम अनसुनी करते रहे। माथुरजी ने हमें आजादी के ‘पहरुए’ कहा था। हम उपभोक्ता बन गए। बीत गई सो बीत गई। खूब भोग लिया आजादी का आनन्द। अब बारी आ गई है जिम्मेदारी निभाने की। हम ही इसे लाए हैं। हम ही इसे बचा सकते हैं। हम ही इसे बचाएँगे। 

समता और न्याय के सिद्धान्त पर आधारित समाज की रचना का संकल्प लें और जुट जाएँ।
-----  

‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 15 अगस्त 2018



जनता बोलती नहीं, चुपचाप फैसला सुना देती है

मैं इन्दौर में था। सर्व सुविधा नगर से महू नाका जाने के लिए नौ नम्बर की बस में सवार। मेरी अगली सीट पर बैठे दो बन्दे बहस में व्यस्त थे। सुबह-सुबह का वक्त। दोनों ही जवान और ताजादम। एक अति उत्साह में, बढ़-चढ़कर बोल रहा था। दूसरा शान्त भाव और संयत स्वर में, लगभग निर्विकार भाव से बोल रहा था। पहलेवाला मोदी समर्थक था। दूसरा किसका समर्थक था, यह तो मालूम नहीं हो पा रहा था लेकिन मोदी समर्थक नहीं था। बहस का विषय नया और अनूठा नहीं था। चारों ओर जो हो रहा है, वही विषय था। आगे, अपनी बात सुविधाजनक रूप से कहने के लिए मैं दोनों को क्रमशः ‘मोस’ (मोदी समर्थक) और ‘मोसन’ (मोदी समर्थक नहीं) कहूँगा।

मोसन -  तुम ये जो सब कर रहे हो, ठीक नहीं है। नीदर फेयर नार गुड।

मोस - व्हाट डू यू मीन? क्या कर रहे हैं हम लोग?

मोसन - यही! मनमानी, मारापीटी। किसी पर हमला कर देना। जान ले लेना। इट इज एनार्की। (यह अराजकता है।)

मोस - नो! इट इज नाट एनार्की। इट इज जस्टिस। वी आर डूइंग जस्टिस। (नहीं! यह अराजकता नहीं है। हम तो न्याय कर रहे हैं।) 

मोसन - यही तो एनर्की (अराजकता) है। तुम कौन होते हो जस्टिस करनेवाले? कोर्ट्स आर देयर फॉर जस्टिस। (न्याय करने के लिए न्यायालय है।)

मोस - कोर्ट टेक्स ए लांग टाइम। वी हेव नो टाइम एण्ड नो पेशंस। वी काण्ट वेट। एण्ड मेनी टाइम्स कोर्ट्स डिलीवर डिसिजंस ओनली। दे डोण्ट डू जस्टिस। (न्यायालय बहुत समय लेते हैं। हमारे पास न तो समय है न ही धैर्य। और कई बार तो न्यायालय केवल फैसला सुनाते हैं। न्याय नहीं करते।)

मोसन - व्हाट रबिश! यू आर रिजेक्टिंग ज्यूडिशियरी आट राइट! यू आर एडमिटिंग देट यू आर डूइंग एनार्की। (क्या बेवकूफी है! तुम न्यायपालिका को सिरे से ही खारिज कर रहे हो! कबूल कर रहे हो कि तुम अराजकता फैला रहे हो।)

मोस - डू यू फील सो? देन, लेट इट बी सो। (तुम्हें ऐसा लगता है? ठीक है! यही सही।) अब तो यही चलेगा।

मोसन - यू आर बिहेविंग इन सच ए मेनर देट यू पीपुल हेव गॉट द चेयर फॉर एव्हर। इट इज पब्लिक टू डिसाइड, नॉट यू। नोट इट! पब्लिक विल नॉट एसेप्ट इट। दे विल किक यू। (तुम तो इस तरह व्यवहार कर रहे हो जैसे कि तुम्हें कुर्सी स्थायी रूप से मिल गई है! यह तुम नहीं, जनता तय करेगी। लिख लो, जनता यह कबूल नहीं करेगी। लात मार कर तुम्हें भगा देगी।)

मोस (खुल कर हँसते हुए। जैसे ‘मोसन’ की खिल्ली उड़ा रहा हो) - पब्लिक? व्हेयर इज पब्लिक? इज एनी वन स्पीकिंग? एव्हरीवन इज सायलेंट। कीपिंग मम। इट मीन्स, दे आर एग्री विथ अस। नॉट एग्री ओनली! दे आर सपोर्टिंग अस टू। (लोग? कहाँ हैं लोग? एक भी बोल रहा है? सब चुप हैं। इसका मतलब है, वे हमसे सहमत हैं। केवल सहमत ही नहीं, वे हमारा समर्थन भी कर रहे हैं।)

मोसन (अचानक हिन्दी में बोलने लगा। शायद अंग्रेजी में खुद को व्यक्त नहीं कर पा रहा था) -  साइलेंस का मतलब हर बार सहमति नहीं होता। रेप की विक्टिम (शिकार) औरत का मुँह दबा दिया। वह बोल नहीं सकती। इसका मतलब क्या वह रेप को एग्री है?  रेप को सपोर्ट कर रही है? नो। यू आर रांग। यू आर मिसलीडिंग, मिसइण्टरप्रीटिंग। (नहीं! तुम गलत कह रहे हो। गलत व्याख्या कर रहे हो।) फॉरगेट नॉट! अपने यहाँ नर को नारायण और जनता को जनार्दन कहा गया है। पब्लिक एक लिमिट तक सहन करती है। वह बोलती नहीं। चुपचाप अपना डिसीजन सुना देती है। पब्लिक ही गॉड है और गॉड की लाठी की आवाज नहीं आती। 

‘मोसन’ की यह बात सुनकर मैं चौंक गया। मुझे 1977 के लोक सभा चुनाव याद आ गए। अब मुझे ‘मोस’ और ‘मोसन’ की बातें नहीं सुनाई दे रही थीं। 

उस समय मैं मन्दसौर में दैनिक ‘दशपुर दर्शन’ का सम्पादक था। काँग्रेस ने मन्दसौर संसदीय क्षेत्र से रतलामवाले बंसी भाई गाँधी को उम्मीदवार बनाया था। इन्दौरवाले महेश भाई जोशी उनके चुनाव संचालक बनकर मन्दसौर आए थे। ‘दशुपर दर्शन’ के मालिक सौभाग्यमलजी जैन काँग्रेस की सक्रिय राजनीति में थे। महेश जोशी उनके नेता थे। अपनी रणनीति की बुनावट के तहत महेश भाई ने ‘दशपुर दर्शन’ की भूमिका के बारे में सौभाग भाई से बात की। उन्होंने मुझे आगे कर दिया। मैंने कहा कि यदि एक ही पक्ष की बातें छपेंगी तो दूसरा पक्ष अखबार पढ़ना ही बन्द कर देगा। इसलिए खबरों में शालीन सन्तुलन रहेगा। महेश भाई का कहा मुझे अभी भी शब्दशः याद है - “ये ‘नईदुनिया’ वाली, ‘तेरी भी जय और उसकी भी जय’ नहीं चलेगी।’ फैसला हो चुका था। चुनाव तक मैं लगभग पूरी तरह फुरसत में हो गया।

मन्दसौर जिले के अग्रणी काँग्रेसी नेता (स्वर्गीय) भँवरलालजी नाहटा ने मुझे पकड़ लिया। वे ‘कवरेज’ के लिए अपनी, देहातों की आम सभाओं में मुझे ले जाने लगे। हम लोग शाम आठ बजे निकलते। नौ बजते-बजते पूर्व निर्धारित गाँव पहुँचते। आम सभा शुरु होती। लगभग पूरा का पूरा गाँव, आबाल-वृद्ध सभा में पहुँचता। बिछात छोटी पड़ जाती। कहीं-कहीं महिलाएँ भी बड़ी संख्या में आतीं। किसी गाँव में दो-एक स्थानीय वक्ता होते। कहीं-कहीं अकेले नाहटाजी ही अकेले वक्ता होते। नाहटाजी बहुत अच्छा बोलते थे। बीच-बीच में मालवी में भी बात करते। आम सभा देर तक चलती। कभी-कभी आधी रात तक। नाहटाजी की आम सभाएँ ‘प्रचण्ड सफल’ कहलाने की अधिकारिणी होती थीं। 

आम सभा की शानदार और प्रचण्ड सफलता से गद्गदायमान नाहटाजी लौटते में मेरी प्रतिक्रिया पूछते। मैं उनकी मनमाफिक बातें नहीं कर पाता। वे तुनक जाते। मेरी टप्पल में धौल टिकाते हुए कहते - ‘पूरा का पूरा गाँव सभा में मौजूद था। सबके सब आखरी तक बैठे रहे। एक बच्चा भी उठ कर नहीं गया। एक भी आदमी ने कोई सवाल नहीं उठाया। तुझे कुछ भी नजर नहीं आया?’ मैं कहता - ‘यह सब तो मुझे नजर आया बाबूजी! लेकिन मुझे और भी कुछ नजर आया।’ वे पूछते - ‘तुझे ऐसा क्या नजर आया जो मुझे नजर नहीं आया?’ मैं कहता - ‘मैंने देखा कि आपके भाषण के दौरान कोई अपनी जगह से नहीं हिला। किसी ने कोई सवाल तो नहीं पूछा लेकिन एक भी आदमी हँसा भी नहीं। एक बार भी तालियाँ नहीं बजीं। सब ऐसे बैठे थे जैसे थानेदार ने जबरन उन्हें बैठा रखा हो। मुझे तो ऐसा लगा जैसे आप जिन्दा लोगों को नहीं, गेहूँ के बोरों को भाषण दे रहे थे।’ मेरी बात सुनकर नाहटाजी और ज्यादा नाराज होते थे। कहते थे - ‘तुम अखबारवाले स्साले! किसी के सगे नहीं होते। तुम्हें कुछ भी अच्छा नजर नहीं आता।’ मैं चुप रहता। बोल कर अपनी टप्पल में धौल कौन खाए?

चुनाव परिणाम ने देश को ही नहीं, दुनिया को हिला कर रख दिया। आम सभाओं में गूँगे रहनेवाले, गेहूँ के बोरों की तरह निर्जीव, चुपचाप भाषण सुननेवाले लोग बिना मुँह खोले ऐसे बोले कि इतिहास बन गया। बंसी भाई गाँधी हार गए। लेकिन बंसी भाई कहाँ लगते? खुद इन्दिरा गाँधी ही हार गईं। गूँगे लोगों ने उन्हें इतिहास के कूड़े के ढेर पर फेंक दिया। 

‘मोसन’ की बात इकतालीस बरस पीछे खींच ले गई। मैं अपने में लौटा तब तक वे दोनों उतर चुके थे। इस बात पर ‘मोस’ का जवाब नहीं सुन पाया। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जनार्दन की लाठी की आवाज सुन ली हो और वह चुप रहा गया हो?  
-----
‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 09 अगस्त 2018