Showing posts with label धर्म की दुकानदारी. Show all posts
Showing posts with label धर्म की दुकानदारी. Show all posts

विनीत नारायण बनाम देवकीनन्दन ठाकुर


एक मित्र ने ‘जनसत्ता’ ई-पेपर की एक कतरन मुझे भेजी है। पुरानी है। इसी 5 जुलाई की है। इसमें देवकीनन्दन ठाकुर कह रहे हैं कि भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में कुछ कहने पर, उन्हें (देवकीनन्दन ठाकुर को) उनका सर कलम हो जाने का भय है।

मैं देवकी नन्दनठाकुर को और उनके बारे में नहीं जानता
खबर पढ़कर गूगल पर तलाश किया तो मालूम हुआ कि वे तो अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथाकार हैं! देश-विदेश में भागवत कथा सुनाते हैं। खबरवाला बयान भी उन्होंने कनाडा से लौटने के अगले दिन, न्यूज18 पर एक परिचर्चा में दिया था। 

फिर मैंने ढूँढ कर उनके प्रवचनों के कुछ वीडियो देखे/सुने। प्रभावी वक्ता हैं। निश्चय ही श्रोताओं का मन मोह लेते होंगे। ‘गीता’ उनका प्रिय ग्रन्थ है। कथा तो भागवत-पुराण की सुनाते हैं किन्तु ‘गीता’ से उद्धरण खूब देते हैं। ‘कर्मण्येवाधिकारस्तु मा फलेषु कदाचन’ उनका प्रिय सूत्र है। मैं अनुमान कर रहा हूँ कि देवकीनन्दन ठाकुर देश-विदेश में धर्म-ध्वजा फहराते हैं। ‘गीता’ उनका प्रिय ग्रन्थ है। तो मृत्यु की निश्चितता, देह की नश्वरता की बात तो करते ही होंगे। योगीराज कृष्ण को उद्धृत करते हुए ‘तू कौन होता है किसी को मारनेवाला? तू क्या, किसी को मारेगा? जिन्हें मारने के विचार से विचलित हो रहा है, वे तो पहले से ही मरे हुए हैं।’ जैसे वाक्य सुनाते ही होंगे। ‘हानि लाभ, जीवन मरण, जस अपजस विधि हाथ’ जैसे उद्धरण उच्चारते ही होंगे। लोगों को, स्वयम् को प्रभु के श्री चरणों में समर्पित कर, प्रभु-स्मरण करते हुए, निर्भय हो कर अपना कर्म करने का धर्मोपदेश भी देते ही होंगे।

लेकिन खबर पढ़ने के बाद, देवकीनन्दन ठाकुर के बारे में गूगल-ज्ञान प्राप्त करने के बाद पहली बात मेरे मन में जो आई वह यह कि उनकी सारी बातें ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ से अधिक कुछ नहीं हैं। उन्हें अपनी कही बात पर भरोसा तो दूर की बात रही, न तो अपने धर्म पर भरोसा है, न अपने ईश्वर पर न ही गीता-सन्देश पर। वे तो मौत के भय से थरथर काँपनेवाले एक सामान्य मनुष्य से अधिक कुछ भी नहीं है। यदि उन्हें अपने ईश्वर पर रंच मात्र भी भरोसा होता तो वे अपना सर कलम कर देने की धमकी से दहशतजदा नहीं होते। 

देवकीनन्दन ठाकुर का मृत्यु-भय-जनित वक्तव्य जानकर मुझे पत्रकार विनीत नारायण याद आ गए। आज की पीढ़ी विनीतजी के बारे में शायद ही जानती हो। भारत में ‘खोजी-पत्रकारिता’ के अलमबरदार के रूप में जाने जानेवाले विनीतजी मूलतः ‘बृजवासी’ हैं। विनीतजी ने 1990 के ‘जैन डायरी हवाला काण्ड’ से दुनिया भर में हंगामा मचा दिया था। राजनेताओं और आतंकियों के भ्रष्टाचारी गठजोड़ को उजागर करनेवाले इस खुलासे के कारण 1996 में पक्ष-प्रतिपक्ष के कई राजनेताओं, केन्द्रीय मन्त्रियों, मुख्य मन्त्रियों, राजपालों, अफसरशाहों को भ्रष्टाचार के लिए आरोपित किया गया था।

इन्हीं विनीत नारायणजी को हम लोगों ने 1997-98 में ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला में रतलाम बुलाया था। उन्हें रतलाम के सर्किट हाउस में ठहराया गया था। हम लोग जब उनसे शिष्टाचार भेंट करने गए तो देखा कि वे सर्किट हाउस के, पिछलेवाले खुले बरामदे में एक कुर्सी पर, ध्यान मुद्रा में बैठे, जपनी में माला जप/गिन रहे हैं। (जपनी को शायद गौमुखी और सुमरिनी भी कहते हैं।) हमारी आहट अनुभव कर उन्होंने आँखें खोलीं। हम सबके अभिवादन का उत्तर दिया। उनका माला-जाप बाधित न हो, इस विचार से हम लोग चुपचाप उनके आसपास की कुर्सियों पर बैठ गए। हमें चुप देख कर उहोंने ही बात शुरु कर दी। लेकिन उनका माला जपना/गिनना बन्द नहीं हुआ। हमसे बातें और माला-जाप, साथ-साथ करते रहे। ऐसा मैंने पहली बार देखा था। वर्ना, बात करते हुए माला जाप सामान्यतः स्वतः रुक जाता है। किन्तु विनीतजी दोनों काम सहज भाव से कर रहे थे। शायद यह उनके अभ्यास में हो गया होगा। जब उन्होंने अपनी ओर से संवाद शुरु किया तो हम लोग भी सहज भाव से, खुलकर बातें करने लगे। बातों ही बातों में मालूम हुआ कि वे कृष्ण भक्त हैं और जब भी सुविधा, समय और अवसर मिल जाता है तो कृष्ण नाम का जाप शुरु कर देते हैं। गोया, कृष्ण उनकी साँसों में बसे हुए थे। 

रात को उनका व्याख्यान हुआ। आयोजन श्री गुजराती समाज के सभागार में था। विनीतजी लगभग एक घण्टा बोले। व्याख्यान के बाद श्रोताओं के प्रश्नों का सत्र भी रखा गया था। श्रोताओं ने प्रश्न पूछने शुरु किए। विनीतजी प्रत्येक प्रश्न का पूरा-पूरा उत्तर दे रहे थे। इसी क्रम में एक प्रश्न आया - ‘हवाला काण्ड में तो बड़े-बड़े, नेता, मन्त्री, डॉन-माफिया शामिल थे। आपको उनसे डर नहीं लगा?’ विनीतजी मानो इस प्रश्न की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका जवाब कुछ इस तरह था - “क्यों नहीं लगा? लगा। बहुत डर लगा। मैं भी बाल-बच्चोंवाला आदमी हूँ। फिर, घरवालों ने, चाहनेवालों ने और दोस्तों ने भी खूब डराया। घर से जब भी निकलता तो लगता, अब जिन्दा घर नहीं लौटूँगा। पैदल जा रहा होऊँ या किसी सवारी पर, मुझे लगता, मुझे मारनेवाल मेरे आसपास ही हैं। मेरा पीछा कर रहे हैं। मैं इतना डर गया कि मेरा घर से निकलना धीरे-धीरे बन्द सा हो गया। लेकिन मेरा तो सारा काम ही घर से बाहर का! अब, घर में रहूँ तो काम कैसे करूँ? डर में घबराहट भी शामिल हो गई। मैं बहुत परेशान हो गया। इसी परेशानी में एक दिन अचानक मेरे अन्दर से आवाज आई - ‘अरे! मैं तो कृष्ण भक्त हूँ! मैंने तो खुद को कृष्ण के हवाले कर रखा है! फिर मैं क्यों डर रहा हूँ?’ मुझे बरबस बृज-लोकोक्ति याद हो आई - ‘राखे कृष्णा, मारे सै? मारे कृष्णा, राखे सै?’ (यदि कृष्ण मेरे रक्षक हैं तो मुझे कौन मार सकता है? और यदि कृष्ण ने मेरा मरण तय कर दिया है तो मुझे कौन बचा सकता है?) यह याद आते ही मेरा डर काफूर हो गया। उस पल के उस हजारवें हिस्से में ही मैं ताजादम हो गया और जैसा बैठा था वैसा ही घर से निकल पड़ा।”

बातें तो उसके बाद भी बहुत हुईं। लेकिन यहाँ अब उनका कोई मतलब नहीं। 

विनीत नारायणजी की बात को जब देवकीनन्दन ठाकुर की बात से जोड़ कर देखा तो हँसी आ गई। कृष्ण जिसके जीवनाधार हों उसे क्या भय? लेकिन कृष्ण जिसके लिए जीविका-व्यापार हो उसे तो कृष्ण भी शायद ही भय मुक्त कर सकें। 

भक्त और भक्ति-व्यापारी सर्वथा अलग-अलग होते हैं। हम ही उनमें अन्तर नहीं कर पाते और छले जाते हैं।

-----

(दोनों चित्र गूगल से साभार।)  


ऐसे होती है धरम की मुफ्त सेवा

वे दोनों तनिक सहमते हुए आए थे। बोले - ‘आप से थोड़ी बात करनी है। लेकिन डर लग रहा है। कहीं आप बात बात सबके सामने नहीं कर दो।’ मुझे हँसी आ गई। पूछा - ‘बात मेरे काम की है या तुम्हारे काम की?’ सहमी आवाज में एक बोला - ‘बात है तो हमारे ही काम की।’ मैंने कहा - ‘तो फिर रहने दो। तुम्हारे काम की तुम जानो।’ दोनों सकपका गए। दूसरा बोला - ‘वो ऐसा है कि है तो हमारे काम की लेकिन थोड़ी-थोड़ी आपके काम की भी है।’ मैंने कहा - ‘तो फिर मुझे उतनी ही बता दो जो मेरे काम की है।’ जवाब आया - ‘देखो सा’ब! हम पहले ही डरे हुए हैं। ऐसी बातें करके आप हमें और मत डराओ।’ अब मैं जोर से हँसा - ‘यार! तुम लोग साफ-साफ बात करो। लेकिन यदि तुम केवल मुझे कहने या बताने आए हो तो रहने दो। इसके बाद भी मुझे बताओगे तो मैं वादा नहीं करता कि तुम्हारी बात अपने तक ही रखूँगा।’ 

दोनों ने आँखों ही आँखों में बात की, फैसला लिया। दूसरा बोला - ‘देखो सा’ब! आए तो आपको सुनाने ही हैं। सुना कर ही जाएँगे। आपको जो करना हो वो कर लेना। लेकिन आपको हमारे बच्चों की सौगन्ध, आप हमारा नाम किसी को मत बताना।’ मानो उनके खानदान पर अहसान कर रहा होऊँ, कुछ इस तरह कहा - ‘हाँ। ये वादा मैं करता हूँ। तुम्हारा नाम नहीं बताऊँगा लेकिन तुम्हारा नाम, पता और मोबाइल नम्बर अपने पास लिख कर जरूर रखूँगा। सुनकर दोनों के हाथ-पाँव फूल गए। घबरा कर पूछा - ‘क्यों? वो किस लिए?’ जोर से हँसते हुए मैंने कहा - ‘डरो मत यार! यदि तुम्हारी बात में काम का मसाला हुआ और मुझे कुछ  पूछताछ करनी पड़ी तो तुमसे फोन करके पूछ लूँगा। इसलिए।’ दोनों की घबराहट कम हुई। मैंने अर्द्धांगिनीजी को आवाज लगा कर उनके लिए पानी और चाय के लिए कहा और उनसे बोला - ‘अब फटाफट अपने काम की बात मुझे बता दो। जरा साफ-साफ बताना। खुलकर।’ 

बिना किसी क्रम के, टुकड़ों-टुकड़ों में, एक दूसरे की बात पूरी करते हुए  उन्होंने जो बताया उसका सार था कि वे मेरा, 14 जून वाला, ‘बिच्छू पण्डित’ का लेख पढ़ कर आए थे। दोनों ही रतलाम की श्री सनातन धर्म सभा के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनकी संस्था और  महारुद्र यज्ञ समिति, प्रत्येक अधिक मास में, त्रिवेणी मेले में नौ दिवसीय ग्यारह कुण्डी यज्ञ कराती हैं। यज्ञ करानेवाले पण्डितों के व्यवहार से वे परेशान रहते हैं लेकिन कर कुछ नहीं पाते। ‘आपको तो एक बिच्छू पण्डित की बात मालूम हुई। लेकिन ये ग्यारह के ग्यारह बिच्छू पण्डित से कम नहीं हैं। हमें तो सा‘ब पूरे नौ दिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों को झेलना पड़ता है।’ 

बात मेरी समझ में नहीं आई। मैंने तनिक झल्ला कर कहा - ‘मैंने पहले ही कहा है, साफ-साफ बात करो। मुझे घुमा फिरा कर बात करना पसन्द नहीं।’ मेरे तेवर देख दोनों असहज हो गए। एक बोला - “वो! सा’ब! ऐसा है कि व्यवस्था में राई बराबर भी कमी हो जाए तो ये पण्डित माथे आ जाते हैं। आँखें दिखाने लगते हैं। कहते हैं - ‘हम अपना काम छोड़ कर आते हैं। धरम का काम है। समिति से एक पाई भी नहीं लेते हैं। तुम्हें केवल व्यवस्था करनी है। तुमसे वो भी नहीं होती? फिर तुम्हारी समिति किस काम की? फोकट में वाहवाही लूटते हो।’ मैंने पूछा - ‘क्या सच्ची में समिति उन्हें दक्षिणा नहीं देती?’ वे बोले - ‘हाँ सा’ब। वो लोग समिति से कोई दक्षिणा नहीं लेते।’ मैंने पूछा - ‘तो फिर झगड़ा किस बात का? सही तो कहते हैं वो! तुम लोगों को बुरा क्यों लगता है?’ वे मानो मेरे इसी सवाल की राह देख रहे थे। फौरन बोले - ‘येई तो वो बात है सा’ब जो बताने आए हैं। वो समिति से दक्षिणा नहीं लेते लेकिन हर एक पण्डित एक हजार रुपये रोज से कम नहीं उठाता। फिर भी हमें आँखें दिखाते हैं। हम कुछ भी कहते हैं तो वही, ‘हम अपना काम छोड़ कर फोकट में धरम का काम करने आते हैं।’ की बात सुनाते हैं।”

उनकी बात मेरे सर के ऊपर से निकल गई। मेरी शकल देख कर एक बोला - ’वो ऐसा है सा’ब कि मेले में दूर-दूर से तो धार्मिक-दानी लोग आते ही हैं, आसपास के गाँवों के लोग टुल्लर के टुल्लर आते हैं। ये आनेवाले यज्ञ को तो भेंट चढ़ाते ही हैं, अपनी-अपनी हैसियत से यज्ञ करानेवाले सारे पण्डितों को भी दान-दक्षिणा देते हैं। सौ-सौ रुपये देनेवाले तो दिन में पाँच-सात आ ही जाते हैं। इसके अलावा कभी कोई धोतियाँ दे जाता है तो कोई शालें दे जाता है। कभी कोई कुर्तों का कपड़ा दे जाता है। कभी मौसमी फलों की थैलियाँ तो कभी मिठाई के डब्बे। एक साल एक आदमी चाँदी के सिक्के दे गया था। इन पण्डितों को ये चीजें और दक्षिणा नजर नहीं आतीं। हमने एक बार कहा भी कि यदि फोकट में ही धरम सेवा कर रहे हो तो ये दान-दक्षिणा भी मत लो। समिति को दे दो। हमने जैसे ही कहा तो वे गुर्रा कर लाल-लाल आँखें दिखाने लगे। कहने लगे कि यह समिति ने थोड़ी ही दिया है! यह तो श्रद्धालु भक्त दे जाते हैं। इसका समिति से क्या लेना-देना?’ 

दोनों की बातों से लग रहा था कि तकनीकी रूप से पण्डित सही थे और व्यावहारिक रूप से ये दोनों सही थे। लेकिन मैं फिर भी समझ नहीं पाया कि वे मुझसे क्या चाहते थे। मैंने अपनी उलझन बताई तो उन्होंने अपने वाद का मुद्दा पेश किया - ‘वो! ऐसा है सा’ब कि उन पण्डितों को हमें ही झेलना पड़ता है। वे हमारी टप्पल में टींचे मारते हैं। हमें इस तरह सुनाते हैं जैसे वे हमारे खानदान पर एहसान कर रहे हों। हम इनके तानों से आजीज आ गए सा’ब। हम इसीसे मुक्ति चाहते हैं।’ मुझे अचरज हुआ। कहा - ‘समितिवालों से क्यों नहीं कहते? उनसे कहो। वे जरूर कोई रास्ता निकालेंगे।’ जवाब आया - ‘समितिवाले तो सा’ब ऐन टेम पर ही आते हैं और हार-फूल करके चले जाते हैं। हम कहते हैं तो सुनते नहीं।’ उनकी आँखों से लग रहा था कि वे सच ही बोल रहे थे। मैंने कहा - ‘एक काम करो। इन पण्डितों को मिलनेवाले फायदे रतलाम के दस-बीस दूसरे पण्डितों को गिनवाओ और उनसे कहो कि अगली बार वे सबके सब समिति से कहें कि वे भी समिति से बिना किसी दान-दक्षिणा के धरम की सेवा करना चाहते हैं। इसके साथ ही साथ समितिवालों को भी बराबर वास्तविकता बताते रहना। मुझे लगता है कि यदि तुम ईमानदारी से मेहनत करोगे तो तुम्हारा काम हो जाएगा।’

दोनों खुश हो गए। एक बोला - ‘अरे सा’ब! ये बात हमारे दिमाग में क्यों नहीं आई। आपके यहाँ से निकलते ही हम तो इसी काम पर लग जाएँगे। पण्डित बदलें या न बदलें लेकिन इन ग्यारह बिच्छू पण्डितों की बोलती जरूर बन्द हो जाएगी।’

इस बीच चाय आ ही चुकी थी और वे पी ही चुके थे। वे जाने लगे तो मैंने कहा -‘लेकिन अगली बार जब यज्ञ हो तो मुझे बताना जरूर कि क्या हुआ। नहीं बताओगे तो ये सारी बातें तुम्हारा नाम लेकर सबको बता दूँगा।’

इस बार वे डरे नहीं। जोर से हँसे और कोहनियों तक हाथ जोड़, कर चले गए।
-----  

ये पण्डित डुबो देंगे धर्म को

बिच्छू पण्डित का बड़ा दबदबा है। आतंकित रहते हैं लोग उनसे। लेकिन उनके बिना काम नहीं चलता। मुहूर्त निकालने-साधने और अनुष्ठान, धार्मिक, मांगलिक प्रसंगों के क्रिया-कर्मों में न तो कोई समझौता करते हैं न ही यजमान या उसके परिजनों का हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं। बुरी तरह से डाँट देते हैं। किसी का लिहाज नहीं करते और न ही जगह, मौका देखते हैं। परशुराम के अवतार हो जाते हैं। कहते हैं - ‘धर्म के मामले में कोई समझौता नहीं चलेगा।’  उनके इस स्‍वभाव के कारण ही लोगों ने उनका यह नामकरण किया  है। बिच्छू पण्डित की उपस्थिति का मतलब ही है कि सब कुछ मुहूर्त में और शास्त्रानुसार, विधि-विधान से पूरा होगा। लोग उनसे डरते हैं लेकिन अपने काम उन्हीं से कराते हैं। यजमानी ही उनकी रोजी-रोटी है। दक्षिणा जरूर यजमान की श्रद्धा अनुसार होती है लेकिन अपना पारिश्रमिक खुद ही तय करते हैं।  

अर्चेन्द्र बड़ा भगत है बिच्छू पण्डित का। भगत नहीं, अन्ध-भगत है। उसे भी लग रहा है कि लोग धर्म विमुख हो रहे हैं और सनातन धर्म रसातल में जा रहा है। इसे बचाना जरूरी है। वह इसी काम में लगा रहता है। 

एक दिन अर्चेन्द्र के पिता ने घर पर ब्राह्मण-भोज आयोजित करने की भावना प्रकट की। अर्चेन्द्र ने फौरन हाँ भरी और कहा - ‘ब्राह्मण भोज से एक दिन पहले घर पर यज्ञ-हवन करा लेते हैं और ब्राह्मण-भोजवाले दिन, भोजन से पहले किसी विद्वान् ब्राह्मण का एक व्याख्यान भी करा लेते हैं।’ पिताजी निहाल हो गए। विचार को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी और छूट अर्चेन्द्र को दे दी।

व्याख्यान आयोजनों में उपस्थिति को लेकर अर्चेन्द्र के अनुभव बहुत अच्छे नहीं थे। यह उपक्रम किसी तिथि या प्रसंग से जुड़ा हुआ तो था नहीं। सो, उपस्थिति अधिकाधिक रहे, इस लक्ष्य से अर्चेन्द्र ने तय किया, घर पर किया जानेवाला हवन शनिवार को और व्याख्यान तथा भोजन रविवार को। 

अपनी योजना लेकर अर्चेन्द्र बिच्छू पण्डित के पास पहुँचा। पूरी बात सुनकर पण्डितजी ने पंचांग खोला। पन्ने पलटे। कभी कागज पर लिख कर तो कभी अंगुलियों पर, कोई बीस-बाईस मिनिट तक गणना की और घोषणा की - ‘शनिवार को तो हवन सम्भव ही नहीं।’ अर्चेन्द्र आसमान से धरती पर आ गिरा। उसने बिच्छू पण्डित को समझाने की कोशिश की कि न तो कोई मंगल आयोजन है न ही कोई मुहूर्त साधना है। बस! हवन मात्र करना है। सुबह न हो तो शाम को कर लेंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता। बिच्छू पण्डित ने कुपित नेत्रों से अर्चेन्द्र को देख और एक के बाद एक कई ग्रहों और योगों का हवाला देते हुए कहा कि जिस शनिवार की बात अर्चेन्द्र कर रहा है उस शनिवार को तो हवन करने का सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि बहुत ही आवश्यक है तो शनिवार से पहलेवाले गुरुवार को हवन कराया जा सकता है। सुन कर अर्चेन्द्र पशोपेश में पड़ गया। हवन गुरुवार को याने व्याख्यान शुक्रवार को और शुक्रवार तो अच्छा-भला कामकाजी दिन! सुननेवाले कैसे आएँगे? व्याख्यान तो फ्लाप हो जाएगा! उसने बिच्छू पण्डित से चिरौरी की - ‘गुरु! जरा एक बार और ध्यान से देख लो! कोई रास्ता निकलता हो।’ सुन कर बिच्छू पण्डित आपे से बाहर हो गए। मानो अर्चेन्द्र को धक्के देकर फेंक देंगे, कुछ इस तरह कहा - ‘तू तो मुझे जानता है! मैं धरम के काम में समझौता नहीं करता। फौरन निकल जा यहाँ से।’

बिच्छू पण्डित का स्वभाव जानता था अर्चेन्द्र। इसलिए उसने बुरा नहीं माना। मरी-मरी आवाज में कहा - ‘ठीक है गुरु! गुरुवार को हवन करवा देना।’ बिच्छू पण्डित खुश हो गए। हवन की पूरी रूपरेखा और पारिश्रमिक की रकम तय कर अर्चेन्द्र लौट आया। पिताजी को बताया। हवन गुरुवार को हो या शुक्रवार को। पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ना था। 

पूरा खाका अर्चेन्द्र के मन में शुरु से ही साफ था। व्याख्यान हेतु विद्वान् ब्राह्मण से उसने पहले की कच्ची बात कर रखी थी। तारीख तय होते ही बात पक्की कर दी। ताबड़तोड़ निमन्त्रण पत्र छपवाए। फोन और वाट्स एप पर सबको खबर कर दी। अपनी व्यवस्थाओं को लेकर वह पहले ही क्षण से निश्चिन्त था। अब उसने पूरा ध्यान, व्याख्यान में अधिकाधिक उपस्थिति पर केन्द्रित कर दिया। 

वह इसी काम में लगा था कि वह हो गया जिसने अचेन्द्र के विश्वास के वट-वृक्ष को जड़ सहित उखाड़ दिया।

जिस गुरुवार को हवन होना तय हुआ था, उससे पहलेवाले रविवार को बिच्छू पण्डित का फोन आया। वे कह रहे थे कि शनिवार को हवन सम्भव है। अर्चेन्द्र चाहे तो वे शनिवार को हवन करा देंगे। अर्चेन्द्र उलझन में पड़ गया। बात तो उसके मन की थी लेकिन कमान से तीर छूट चुका था। अब बदलाव मुमकिन नहीं था। अर्चेन्द्र ने कहा - ‘अब तो कुछ नहीं हो सकता गुरु! निमन्त्रण बँट गए, हलवाई और भोजन की जगह तय हो गई। लेकिन यह गुंजाइश कैसे निकल आई गुरु? उस दिन तो आपने साफ कह दिया था कि शनिवार को कोई हवन ही नहीं हो सकता। अब कैसे हो गया?’ बिच्छू पण्डित ने ‘वो ऐसा है। वो वैसा है! वो उस दिन उधर ध्यान नहीं गया।’ जैसे जवाब दिए। लेकिन अर्चेन्द्र के गले नहीं उतरी। उसने कहा - ‘गुरु! आपसे ऐसी चूक हो ही नहीं सकती। आपने तो उस दिन आधे घण्टे तक पंचाग उल्टा-पुल्टा था और ढेर सारी गणनाएँ की थीं। आधा घण्टा कम नहीं होता गुरु! कोई गुंजाइश होती तो आप बता देते। कोई दूसरा पंचाग तो नहीं देख लिया?’ जवाब में सफाइयाँ देने की रौ में बहकर बिच्छू गुरु ने एक बात ऐसी कह दी कि अर्चेन्द्र चेतनाविहीन, जड़ हो गया। बिच्छू पण्डित ने कहा - ‘ये सब तो देखने में मैं चूका ही लेकिन अभी-अभी खबर मिली कि उस शनिवार को मैंने बड़नगर में जो हवन कराने की हाँ भर रखी थी, वह प्रोग्राम केंसल हो गया है। अब मैं शनिवार को फ्री हूँ। चाहो तो शनिवार को हवन करा लो।’

अर्चेन्द्र को काटो तो खून नहीं। उसके जी में आया कि फोन में ही हाथ डालकर बिच्छू गुरु की गर्दन मरोड़ दे। कोई ग्रह और कोई कुयोग आड़े नहीं आ रहा था। उस दिन उन्हें बड़नगर जाना था इसलिए उस शनिवार को हवन का होना ही निषिद्ध कर दिया! सारा मामला बिच्छू पण्डित के पारिश्रमिक का था। वे धरम के काम में समझौता नहीं करते लेकिन अपने पारिश्रमिक की मोटी रकम के लिए धरम की बलि चढ़ा सकते हैं। अर्चेन्द्र तो समझ रहा था कि सनातन धर्म ही उनका धर्म है। लेकिन अब वे ही बता रहे हैं कि उनका धर्म तो उनके पारिश्रमिक की रकम है। अर्चेन्द्र ने खुद पर काबू किया। यह कह कर फोन बन्द कर दिया कि हवन तो गुरुवार को ही होगा। वे समय पर आ जाएँ।

गुरुवार को हवन और शुक्रवार को व्याख्यान तथा भोजन हो गया। अर्चेन्द्र की मेहनत रंग लाई। उपस्थिति उसकी अपेक्षानुरूप ही रही। पिताजी प्रसन्न हुए। उनकी आत्मा तृप्त हुई उन्होंने अर्चेन्द्र को खूब आशीष दिए।

यह सब मुझे सुनाने अर्चेन्द्र आया था। बहुत गुस्से में था। बिच्छू पण्डित को भारी-भारी गालियाँ दे रहा था। मैं बार-बार उसे समझाऊँ और वह हर बार पटरी से उतर जाए। कोई बीस-पचीस मिनिट बैठ कर (और बिच्छू पण्डित का वाचिक दाह संस्कार कर) लौटा। जाते-जाते कह गया - ‘ये स्साले पण्डित! इन्हें न भगवान पर भरोसा न ही भाग्य पर। अपने पुरुषार्थ पर भी भरोसा नहीं। जब बिच्छू गुरु ही ऐसा करें तो बाकी की क्‍या बात करें? ये करेंगे धरम की रक्षा? ये तो धरम को बेच खाएँगे। डुबो देंगे सनातन धर्म को।’

मैं क्या कहता? कहता भी तो किससे? अर्चेन्द्र तो जा चुका था।
----- 



(इस प्रसंग के दोनों पात्र जीवित हैं और रतलाम में ही हैं। अर्चेन्द्र की सुरक्षा और बिच्छू पण्डित के कोप के भय से नाम बदल दिए हैं। भय यह भी रहा कि बिच्छू पण्डित मुझ पर मानहानि का मुकदमा न लगा दें। इन दिनों ऐसे मुकदमों का मौसम जो आया हुआ है। ) 

धार्मिक आयोजनों की अपनी-अपनी प्राप्तियाँ

इन्दौर को मध्य प्रदेश की आर्थिक और पत्रकारिता की राजधानी माननेवाले अपनी जानकारी में बढ़ोतरी कर लें। इन्दौर, दो-दो ज्योतिर्लिंगों (महाकालेश्वर और औंकारेश्वर) वाले मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी की हैसियत भी हासिल कर चुका लगता है। इसके साथ ही साथ, अपने मौलिक मालवी जायकों के लिए विश्वप्रसिद्ध इस शहर ने, धार्मिक मादकता युक्त जायकेदार मिठाई का आविष्कार भी किया है। 

कोई एक पखवाड़े से इन्दौर में हूँ तो ऐसी बातें मालूम हो पाईं। वर्ना, प्रोन्नत तकनीकी विस्फोट के कारण, तमाम ‘अखिल भारतीय’ अखबार ‘स्थानीय’ होकर रह गए हैं। इन्दौर की खबरें रतलाम के अखबारों में नहीं मिलतीं और रतलाम की खबरें इन्दौर के अखबारों में नहीं। रतलाम-इन्दौर तो बहुत दूर की बात हो गई, जिले की खबरें भी पूरे जिले में नहीं पहुँच पाती। इन्दौर में पूरी तरह से फुरसत में हूँ। ‘जो नहीं पढ़ा, वह नया’ की तर्ज पर पुराने अखबार भी नए लग रहे हैं। 

धार्मिक गतिविधियाँ यूँ तो हर कस्बे, गाँव में चलती रहती हैं। लेकिन इन्दौर में कुछ इस तरह चलती हैं मानो ‘बम्बई का बच्चा’ यह शहर इन्हीं गतिविधियों के कारण अपनी साँसें लेता है। पुराने अखबारों की ताजी खबरें यह कि अप्रेल में यहाँ तीन कथाएँ हुईं। एक कथा के निमित्त पाँच किलो मीटर लम्बी कलश यात्रा निकली जिसमें लगभग चालीस हजार महिलाओं ने भाग लिया। हमारे देश में धर्म, महिलाओं के जरिए शक्ति पाता है। इसे अनुभव कर, कथा के यजमान ने घर-घर जाकर महिलाओं को न्यौता। खाली हाथ नहीं, प्रत्येक महिला को एक साड़ी भेंट कर। यजमान को इस बात का कष्ट रहा कि लक्ष्य एक लाख साड़ियों का था लेकिन अस्सी हजार ही पहुँचा पाए।  कथा के लिए एक लाख वर्ग फुट का पाण्डाल बना। तीस हजार वर्ग फुट की भोजनशाला अलग से बनाई गई। महिलाओं को घर जाकर भोजन बनाने की चिन्ता से मुक्त रखने के लिए, कथा के बाद तमाम श्रोताओं के लिए भोजन की व्यवस्था थी। सारे व्यंजन शुद्ध देशी घी से बने जिन्हें बावन काउण्टरों के माध्यम से श्रद्धालुओं तक पहुँचाया गया। अब यह यजमान आभार प्रदर्शन करते हुए सवा लाख घरों में  प्रसाद पहुँचाने घर-घर जा रहा है।  

समाचार ने मुझे चकित किया। एक के बाद एक अखबार पलटे तो मालूम हुआ कि यह कथा का यजमान, 2019 के विधान सभा चुनावों में एक पार्टी की उम्मीदवारी का दावेदार है। यह भी मालूम हुआ कि गए चुनावों में अपनी पार्टी से टिकिट न मिलने से असन्तुष्ट हो, निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़, एक पार्टी का विद्रोही उम्मीदवार खुद हार कर और अपनी पार्टी को हराने के बाद फिर चुनाव लड़ने की मंशा से इस सबमें जुटा हुआ है। इस सूचना ने मुझे जिज्ञासु बना दिया। अनूठी जानकारियाँ मिलने लगीं। हर जानकारी एक नई जिज्ञासा जगाए। मित्रों से पूछा तो सब मेरे अज्ञान पर हँसे। मालूम हुआ कि इन्दौर की राजनीति में तो यह सब ‘बुनियादी अनिवार्यता’ है। इस ‘संस्कार’ के बिना तो कोई राजनीति में प्रवेश कर ही नहीं सकता। 

मित्रों ने बताया कि इन्दौर में पाँच विधायक हैं। इस समय, सारे के सारे भाजपा के हैं। विकास कार्यों के लिए किसकी, कितनी-कैसी पहचान है, इस पर दो राय हो सकती है किन्तु इस बात पर सब एक मत हैं कि कम से कम तीन विधायकों की पहचान, अपनी-अपनी धार्मिक गतिविधियों के कारण बनी हुई है। किसी की पहचान चुनरी यात्रा से है तो किसी की कथा-प्रवचन आयोजन से तो किसी की भोजन-भण्डारे से। एक विधायक लड़कियों के विवाह कराते हैं तो एक विधायक से ‘आप कुछ भी धार्मिक आयोजन करवा लो’ से है। जो दो विधायक धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों से दूर रहते आए हैं उनमें से एक अब मजबूर होकर धार्मिक हो चले हैं। लोगों की नजरें अब पाँचवें पर हैं - ‘देखते हैं! कब तक टिके रहते हैं।’ इन्दौर वह शहर है जहाँ किसी न किसी धार्मिक आयोजन का विशाल पाण्डाल बारहों महीने-सातों दिन-चौबीसों घण्टे तना रहता है।

कुछ पुराने पत्रकार मित्रों से बात करता हूँ तो मालूम होता है, कोई भी आयोजन करोड़ों से कम का नहीं होता। हर आयोजन भरपूर समय, भरपूर तैयारियाँ और भरपूर धन बल-जन बल माँगता है। मैं पूछता हूँ - ‘इतना खर्चा ये लोग कहाँ से लाते होंगे और इस सबसे इन्हें क्या मिल जाता है?’ मेरे कन्धे पर धौल टिकाते हुए एक मित्र ने समझाया - ‘यह खर्चा नहीं। इन्वेस्टमेण्ट है। ऐसा इन्वेस्टमेण्ट जो बीसियों गुना होकर लौटता है।’

मित्र के जवाब ने मुझे विचारक बना दिया। ऐसे धार्मिक उपक्रम पूरे देश में बारहों महीने चलते रहते हैं। गए दिनों उज्जैन में चक्रतीर्थ श्मशान घट पर ग्यारह दिवसीय, पाँचवाँ ‘सह सुधार महायज्ञ’ हुआ जिसमें इक्कीस फुट गहरे कुए में, 11 किलो चाँदी के कलश से, सूखे मेवे और  एक घण्टे में 90 किलो, एक दिन में 22 क्विंण्टल के मान से शुद्ध देशी घी की आहुतियाँ दी गईं। अभी-अभी पूरे मालवा में साँई-सप्ताह मनाया गया। सात मई को सब जगह भण्डारे हुए। मेरे कस्बे में कम से कम करोड़ रुपये तो इस पर खर्च हुए ही होंगे। देश भर में खर्च होनेवाले इन अरबों रुपयों से कितने स्कूल, कितने अस्पताल साधन-सम्पन्न बनाए जा सकते थे? कितने कुपोषित बच्चों को आहार उपलब्ध कराया जा सकता था? पाँच वर्ष की उम्र तक पहुँचने से पहले ही काल कवलित हो जानेवाले कितने शिशु बचाए जा सकते थे? प्रसव के दौरान होनेवाली कितनी मौतें रोकी जा सकती थीं? कितने बच्चों को उच्च शिक्षित किया जा सकता था? कितनी बच्चियों को उनका हक दिलाया जा सकता था? कितने लोगों को भिक्षा वृत्ति से मुक्त कराया जा सकता था? ये सब बातें सबके (खर्च करनेवालों के और श्रध्दालुओं के) मन में भी आई ही होंगी! लेकिन ऐसा क्या हुआ कि किसी ने अपने मन की नहीं सुनी? 

इन धार्मिक उपक्रमों का सामाजिक अवदान क्या है?अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे। इसके विपरीत लगता है मानो धर्मिक आयोजनों और अपराधों की गति और संख्या में प्रतियोगिता बनी हुई है। लोगों के बीच झगड़े कम नहीं हो रहे। प्रेम के बजय नफरत फैल रही है। समस्याएँ कम नहीं हो रहीं। भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा। लगता है, हमारे दैनन्दिन जीवन की इन सारी बातों से धर्म का कोई लेना-देना है ही नहीं। इन्दौर में पहली बार कथा बाँचने आई किशोरीजी ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा कि कथा सुननेवालों में से दस प्रतिशत पर ही कथा-प्रवचन का असर होता है। मुझे लगता है, ये दस प्रतिशत लोग भी वे ही होंगे जो पहले से ही धर्म को जी रहे होंगे। याने, पहले से ही धार्मिक व्यक्ति अधिक धार्मिक हो रहा है और बाकी सब वैसे के वैसे बने हुए हैं।

धर्म को मनुष्य की आत्मा की उन्नति का श्रेष्ठ माध्यम कहा गया है। ऐसा होता भी होगा। लेकिन वह व्यक्तिगत स्तर पर ही होता होगा। धर्म जब सामूहिक होता है तो वह अपना मूल स्वरूप और अर्थ खोकर केवल दिखावा बन कर रह जाता है।

आज तो नजर आ रहा है कि राजनीति और धन-बल ने धर्म को बैल की तरह जोत रखा है। श्रद्धालुओं को हलों की मूठें थमा दी है। बैल और हलवाहे अपना काम कर रहे हैं। राजनीति और धन-बली इसकी फसल से अपनी कुर्सियों के पाए मजबूत कर रहे हैं, अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं। हलवाहे और उनके परिजन, चलते बैल का गोबर एकत्र कर, उसके ऊपले थाप कर खुद को धन्य और कृतार्थ कर अनुभव कर रहे हैं।
-----  

दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 10 मई 2018                


वह धर्म जताता रहा, बीमे चले गए

और आखिकार वह हो ही हो गया जिसके लिये मैं मन ही मन मना रहा था कि ऐसा न हो। कभी न हो।

अपने धार्मिक आग्रहों का आक्रामक प्रकटीकरण आदमी को भले ही आत्म-सन्तुष्ट करे किन्तु वह अन्ततः हानिकारक ही होता है। इसका प्रभाव व्यापक होता है। आदमी का दायरा सिकुड़ता जाता है। वह अपने धर्म के अनुयायियों के बीच ही सिमटता जाता है। अपनों के बीच ही रहना आदमी की लोकप्रियता कम करता है। उसके चाहनेवालों की संख्या अपवादस्वरूप ही बढ़ती है। इसके विपरीत उसके न चाहनेवालों की संख्या बढ़ती जाती है। एक तो अपनेवालों को अपनेवाले की कमियाँ और अवगुण मालूम होते हैं और दूसरे, अपनेवालों के बीच एक अघोषित प्रतियोगिता सदैव बनी ही रहती है। ऐसे में, पराये तो पराये ही रहते हैं, सारे क सारे अपनेवाले भी अपनेवाले नहीं रह पाते। इन्हीं बातों के चलते मैं इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि मेरे धार्मिक आग्रह सामनेवाले को जाने-अनजाने आहत न कर दें।

यह बात मैं अपने साथी बीमा अभिकर्ताओं को निरन्तर कहता रहता हूँ। अभिकर्ताओं के प्रशिक्षण सत्रों मे जब भी मुझे बोलने का अवसर मिलता है तो मैं यह बात विशेष रूप से उल्लेखित करता हूँ। मैं बार-बार कहता हूँ हम हम अभिकर्ता व्यापारी/व्यवसायी हैं। हमारी जमात में और ग्राहकों में सभी धर्मों, जातियों के लोग शामिल हैं। इसलिए हमें पानी की तरह बने रहना चाहिए - जिसमें मिलें, हमारा रंग वैसा ही हो जाए। हमारे साथियों और ग्राहकों को लगना चाहिए कि हम उनके ही जैसे हैं। वे हमें अपने जैसा ही अनुभव करें। कुछ बरस पहले जब ‘कॉलर ट्यून’ का फैशन उफान पर था तब मेरे अनेक अभिकर्ता साथियों ने अपने-अपने धर्मों से जुड़े गीत, सबद, आरतियाँ आदि को अपनी कॉलर ट्यून बना रखी थीं। मैं उनसे कहता था कि ऐसा करना उनके लिए फायदेमन्द हो न हो, नुकसानदायक जरूर हो सकता है। लेकिन मेरी बात सुनने को न तब कोई तैयार था न अब है। लेकिन अभी-अभी वह हो ही गया। धार्मिक आग्रहों के आक्रामक प्रकटीकरण ने एक अभिकर्ता से दो बीमे छीन लिए।

एक रविवार सुबह एक अपरिचित ने, मेरे एक परिचित का हवाला देते हुए फोन किया। वे मुझसे फौरन ही मिलना चाहते थे। मैं फुरसत में तो नहीं था किन्तु जो काम हाथ में था, उसे बाद में भी किया जा सकता था। मैंने कहा - ‘फौरन पधार जाइए।’ बीस मिनिट बीतते-बीतते वे मेरे सामने थे। लेकिन अकेले नहीं, अपने दो बेटों के साथ। 

मुझे लगा, कोई सिफारिश का मामला होगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्होंने मुझे ऐसा सुखद आश्चर्य दिया कि मैं अन्दर से हिल गया। आते ही बोले - ‘हम लोग बहुत जल्दी में हैं। दोनों बच्चों को अपनी-अपनी नौकरियों पर जाना है। आप फटाफट इन दोनों के बीमे कर दीजिए।’ मैंने कहा कि मुझे दोनों बच्चों से बात करनी पड़ेगी, उनका जानकारियाँ लेनी पड़ेंगी, थोड़ा वक्त तो लगेगा। उन्होंने कहा - ‘दोनों प्रायवेट कम्पनियों में नौकरी कर रहे हैं। एक तीन साल से दूसरा साढ़े चार साल से। बीमारी के बहाने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है। दोनों का कोई अंग-भंग नहीं है। कोई शारीरिक विकृति नहीं है। हमारी फेमिली हिस्ट्री बढ़िया है। इनकी कोई बहन नहीं है। हम पति-पत्नी और ये दोनों पूर्ण स्वस्थ और सामान्य हैं। और क्या जानना है आपको?’ जिस तेजी से और धाराप्रवाह रूप से वे बोले और तमाम जानकारियाँ एक साँस में दे दीं, मुझे लगा, मैं बीमा प्रशिक्षण केन्द्र में एक कुशल व्याख्याता को सुन रहा हूँ। तनिक कठिनाई से, लगभग हकलाते हुए मैंने कहा - ‘लेकिन इन्हें कौन सी पालिसी देनी है, यह तो तय करना पड़ेगा।’ उसी अन्दाज में उन्होंने फटाफट दो बीमा योजनाओं के नाम बता दिए। कितने का बीमा करना है, यह भी बता दिया। बात जारी रखते हुए बोले - ‘मुझे किश्त की रकम भी मालूम है। आप तो फार्म निकालिए और फटाफट दोनों के सिगनेचर लीजिए। सारे कागज पूरे के पूरे साथ हैं।’ मैं चक्कर में पड़ गया था। कहाँ तो एक-एक ग्राहक के लिए पाँच-पाँच चक्कर लगाने पड़ते हैं, उसे और उसके पूरे परिवार को पॉलिसी के ब्यौरे बार-बार समझाने पड़ते हैं। तब भी, जब तक दस्तखत न कर दे और प्रीमीयम की रकम न दे-दे, तब तक धुकधुकी बनी रहती है कि कहीं आखिर क्षण में इंकार न कर दे और कहाँ ये सज्जन हैं जो खरीदने की उतावली में बेचनेवाले के घर चलकर आए हैं! 

मेरे लिए बोलने की तनिक भी गुंजाइश नहीं रही थी। मैंने दोनों के कागज देखे। सब बराबर थे। मैंने दोनों के शारीरिक माप लिए, वजन लिया, दस्तखत कराए और कहा - ‘इन दोनों का काम तो हो गया। आप चाहें तो इन्हें भेज दें और इनकी जानकारियाँ लिखवाने के लिए आप रुक जाएँ।’ उन्होंने ऐसा ही किया। 

बच्चों के जाने के बाद मैंने ब्यौरे लिखने शुरु किए तो नाम और पिता का नाम लिखने के बाद जैसे ही पता लिखने लगा तो मेरा हाथ रुक गया। मैं बीमा अभिकर्ताओं का छोटा-मोटा नेता भी हूँ। अधिकांश अभिकर्ताओं की फौरी जानकारियाँ मुझे हैं। जैसे ही उन्होंने पता बताया, मुझे याद आया कि उनके मकान के ठीक दो मकान आगे ही एक अभिकर्ता का निवास है। मैंने कहा - ‘आपके पड़ौस में ही एक बीमा ऐजेण्ट रहता है। उसे छोड़ आप करीब दो किलो मीटर दूर मेरे पास आए! क्या उसने आपसे कभी सम्पर्क नहीं किया?’ वे तनिक उग्र होकर बोले - ‘देखिए मैं तो आपको जानता भी नहीं। आपका नाम-पता तो मुझे उन्होंने (मेरे परिचित का नाम लिया) बताया। उन्होंने आपके काम की तारीफ भी। मैं आप पर नहीं, उन पर भरोसा करके आपके पास आया। हाँ! आपने सही कहा कि मेरे पास ही एक एजेण्ट रहता है। सच्ची बात तो यह है कि ये दोनों बीमे उसी से करवाने थे। सारी बातें और पॉलिसियाँ मुझे उसी ने समझाईं। लेकिन उसकी बार-बार की एक हरकत ने मुझे चिढ़ा दिया। इसी कारण आपके पास आया।’

मैं सतर्क हो गया। बीमा एजेण्ट में क्या खूबियाँ होनी चाहिएँ और कौन-कौन सी बातें नहीं होनी चाहिएँ, इसकी न तो कोई अन्तिम सूची होती है न ही कोई सीमा। ऐसी बातें जानने के लिए मैं सदैव उत्सुक और उतावला बना रहता हूँ। ऐसी जानकारियाँ मुझे सुधारने और बेहतर बनाने में बड़ी मददगार होती हैं। बीमे तो मुझे मिल ही गए थे, अब जो मिलनेवाला था वह मेरे लिए अतिरिक्त लाभ था। मैंने अपना पूरा ध्यान अब उनकी बात पर लगा दिया। बड़ी ही उग्रता और खिन्नता से बोले - ‘मैंने उसको बार-बार इशारों ही इशारों में समझाया लेकिन वह समझने को तैयार ही नहीं हुआ। मैं उसे नमस्कार करूँ और वह जवाब में अभिवादन करने के बजाय अपने धर्म-देव का जयकारा लगाए। मैंने कम से कम पाँच बार उससे नमस्कार किया लेकिन उसने जवाब में एक बार भी नमस्कार नहीं किया। हर बार अपने धर्म-देव की जय बोलता रहा। मैंने देखा कि इसमें इतनी भी सूझ-समझ और कॉमन सेंस नहीं कि ग्राहक की भावना की चिन्ता करे। उसे तो अपने धर्म की और अपने भगवान की ही चिन्ता है। तो मैंने तय किया कि जो मेरी, मेरी भावना की चिन्ता नहीं करे, उससे मुझे बीमे नहीं कराना। फिर मैं भी क्यों नहीं किसी अपने धर्मवाले से बीमा कराऊँ? इसलिए मैंने उन्हें (मेरे परिचित को) फोन किया। उन्होंने आपका नाम, अता-पता बताया और मैं आपके पास चला आया।’

मुझे काटो तो खून नहीं। बिना कोशिश के, घर बैठे बीमे (और बीमे भी अच्छे-खासे, बड़े) मिलने की खुशी उड़ गई। ये बीमे मुझे मेरे व्यावसायिक कौशल, ज्ञान, मेरे व्यवहार, मेरी उत्कृष्ट ग्राहक सेवाओं के दम पर नहीं, धर्म के नाम पर मिले थे। और वह भी अपने धर्म के प्रति प्रेम-भाव से नहीं, किसी और के धर्म के प्रति उपजी चिढ़, वितृष्णा के कारण मिले थे। उन्हें अपना धर्म याद नहीं आया था, किसी ने अपने धार्मिक आग्रहों का निरन्तर प्रकटीकरण कर, उन्हें उनका धर्म याद दिला दिया। वे पड़ोसी-धर्म के अधीन उससे बीमे कराना चाह रहे थे लेकिन वह पड़ोसी धर्म के मुकाबले अपने रूढ़ धर्म पर अड़ा रहा और न केवल दो बीमे खो दिए बल्कि एक अच्छे पड़ोसी की सद्भावनाएँ भी खो दीं। 

सच कह रहा हूँ, मुझे घर बैठे मिले इन दो बीमों की खुशी उतनी नहीं हो रही जितना कि एक बीमा एजेण्ट द्वारा अपना व्यावसायिक धर्म भूलने का और इसी कारण धन्धा खोने का दुख हो रहा है। पता नहीं, उस एजेण्ट ने धर्म की कीमत चुकाई या अपने धर्म की रक्षा की।

पता नहीं हम कब समझेंगे कि धर्म हमारा नितान्त व्यक्तिगत मामला होता है। जब हम अपने धार्मिक आग्रह सार्वजनिक करते हैं तो उसके नकारात्मक प्रभाव हमारी सार्वजनिकता पर होता है। यह बहुत बड़ा नुकसान है - व्यक्ति का भी, समाज का भी और देश का भी।
-----   

ये तो लगाए ही जाते हैं तोड़ने के लिए

आज थोड़ी लम्बी बात कर लेने दीजिए।

कम से कम पैंतालीस बरस पहले की बात है यह। उम्र के छब्बीसवें बरस में था। मन्दसौर में काम कर रहा था। एक शुद्ध शाकाहारी, अहिंसक परिवार का, मुझसे नौ-दस बरस छोटा एक किशोर मेरे परिचय क्षेत्र में था। प्रायः रोज ही मिलना होता था उससे। मैंने अनुभव किया कि कुछ दिनों से वह अनमना, उचाट मनःस्थिति में चल रहा है। हम लोग अच्छी-भली बात कर रहे होते कि अचानक ही उठ खड़ा होता - ‘चलूँगा भैया।’ मैं रोकता तो नहीं किन्तु लगता, मेरी किसी बात से अचानक ही खिन्न हो गया होगा। मैं अपनी कही बातों को याद करने की कोशिश करता। सब ठीक-ठाक लगता। फिर भी एक अपराध-भाव मुझे घेर लेता। ऐसा लगातार कई बार हुआ। धीरे-धीरे उसने मिलना बन्द कर दिया। मैंने गम्भीरता से नहीं लिया ध्यान ही नहीं दिया। सोचा, किसी काम में लग गया होगा। जिस तरह से मिलना बन्द किया है उसी तरह से, फुरसत मिलते ही मिलना शुरु कर देगा।

कोई तीन महीनों बाद एक दिन उसके पिता आए। मुझ पर खूब नाराज हुए। डाँट-डपट तो नहीं की किन्तु खूब उलाहने दिए। पूरी बात तो समझ नहीं पड़ी किन्तु अनुमान लगाया कि अपने बेटे के व्यवहार को लेकर दुःखी और क्रुद्ध हैं। मैंने कहा कि यदि वे मुझे अपराधी मानते हैं तो मुझे सजा दे दें लेकिन पूरी बात तो बताएँ। मेरी बात सुनकर वे एकाएक रोने लगे। रोेते-रोते ही उन्होंने बताया कि उनका बेटा मांसाहार करने लगा है। उन्हें मुझसे दोहरी शिकायत थी कि मुझसे रोज मिलने के बाद भी मैं यह बदलाव भाँप नहीं सका और यदि भाँप लिया था तो मैंने उसे ‘बिगड़ने’ से रोका क्यों नहीं। एक दिन खबर मिलने पर वे उसके अड्डे पर गए। उसे रंगे हाथों पकड़ा। वह अन्दर था। उसे बाहर बुलाया तो वह हाथ में एक हड्डी लेकर आया। यह दृष्य पिता के लिए गहरा सदमा था। उसे खरी-खोटी सुनाते हुए बोले - ‘मैं जानता था तू एक न एक दिन ऐसा करेगा।’ उसने दुगुने गुस्से से जवाब दिया - ‘जब आप जानते थे तो परेशान क्यों हुए? यहाँ आए क्यों?’ मेरे लिए भी यह पेरशान कर देनेवाली सूचना थी। मैंने बताया कि महीनों से उसने मुझसे मिलना बन्द कर रखा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ लेकिन मेरी शकल देख कर कुछ नहीं कहा। उन्होंने कहा कि पूरे समाज में उनकी थू-थू हो रही है। मैं उसे समझाऊँ और रास्ते पर लाऊँ। मैंने कहा कि मैं वादा तो नहीं करता लेकिन खुद मुझे ही यह सब बुरा लग रहा है तो मैं उसे समझाऊँगा जरूर और अपनी तईं पूरी-पूरी कोशिश करूँगा कि वह मांसाहार छोड़ दे।

अगले दिन, अपना काम छोड़ कर उससे मिला। पूरी बात बताई और पूछा कि आखिर वह इस रास्ते पर कैसे चल पड़ा। उसने बताया कि उसके पिताजी दिन में पाँच-सात बार हिदायत देते रहते थे - ‘देख! तू रोज दो-दो, चार-चार घण्टे बाहर रहता है। पता नहीं किन-किन के साथ घूमता, उठता-बैठता है। ध्यान रखना। हमारा मुँह काला मत करवाना। बीड़ी-सिगरेट, दारू-गोश्त के चक्कर में मत पड़ जाना।’ वह कहता कि वे बेफिक्र रहें, वह ऐसा कुछ भी नहीं करेगा। उसने कहा - ‘लेकिन भैया! मैं पूछता कि इसमें बुराई क्या है? तो वे जवाब में मुझे डाँटने लगते, सवाल पूछने पर नाराज होते और कहते कि मुझे जानने-समझने की कोई जरूरत नहीं। वे कह रहे हैं इसलिए नहीं करना है। बस।’ पिता की इस बात में मुझे कोई खराबी नजर नहीं आई। मैंने कहा - ‘तो इसमें गलत क्या है? अपने को तो वैसे भी माँ-बाप का कहना मानना ही चाहिए। वे जो भी कहते हैं, हमारे भले के लिए ही कहते हैं।’ वह बोला - ‘यह तो मैं भी समझता हूँ भैया लेकिन रोज दिन में पाँच-सात बार यह सब सुन-सुन कर मेरे मन में सवाल उठने लगा कि देखना चाहिए कि आखिर बीड़ी-सिगरेट, दारू-गोश्त में आखिर ऐसा है क्या कि बाबूजी बार-बार टोकते हैं। और भैया! इसी चक्कर में मैं यह करने लगा। पहली सिगरेट पी तो जोर की खाँसी आई। इतनी जोर से कि मेरी साँस घुटने लगी। लगा कि आज तो जान गई। बस! उसके बाद कभी सिगरेट पीने का विचार ही नहीं आया। इसी तरह गोश्त खाना शुरु  किया। अभी दो-तीन बार ही खाया है। मुझे तो अच्छा नहीं लगा। जिस दिन बाबूजी ने पकड़ा उस दिन ही सोच रखा था कि अब आज से नहीं खाना है। वे कुछ नहीं कहते तो भी मुझे तो छोड़ना ही था। उसी दिन से छोड़ भी दिया है।’ मैंने कहा - ‘अपनी मन-मर्जी से यह सब कर लिया। कम से कम एक बार मुझसे भी तो बात करता!’ वह बोला - ‘सोचा तो था लेकिन लगा कि आप भी डाँट देंगे।’ अब मेरे लिए कहने-सुनने को कुछ भी नहीं बचा था। उसे समझाया कि ये बातें वह अपने पिताजी को इसी तरह बता दे। उन्हें अच्छा लगेगा। उसने ऐसा ही किया भी। सब कुछ पटरी पर आ गया। उसके पिताजी आकर मुझे असीस गए।

यह कोई तीस बरस पहले की बात है। मेरा बड़ा बेटा वल्कल  (शायद) तीसरी कक्षा में पढ़ता था। एक दिन उसने अचानक ही पूछा - ‘पापा! अपन अण्डे क्यों नहीं खाते?’ मैंने अनुमान लगाया कि उसके सहपाठी अपने टिफिन में अण्डे लाते होंगे। वह उन्हें खाते देखता होगा। इसीलिए उसने यह सवाल किया। पूछने पर उसने मेरे अनुमान की पुष्टि की। मैंने उसे अपनी समझ के अनुसार विस्तार से समझाया। पूरी बात सुनकर वह बिना कुछ कहे उठने लगा। मैंने उसे रोका और कहा - ‘लेकिन तेरा मन हो तो खा लेना। लेकिन ऐसा करने की बात सबसे पहले तेरी मम्मी को और मुझे बताना।’ उसने वादा किया। अभी वह अड़तीसवें बरस में चल रहा है। विभिन्न आई टी कम्पनियों में काम करते हुए त्रिवेन्द्रम, चैन्नई, हैदराबाद, इन्दौर, मुम्बई, पुणे जैसे महानगरों में निवास कर चुका है। मैं उसे यदा-कदा पूछता रहता हूँ - ‘अण्डा शुरु किया?’ वह मुस्कुराते हुए कहता है - ‘अभी तक तो नहीं। करूँगा तो सबसे पहले मम्मी को और आपको बताऊँगा।’ विश्वास करता  हूँ कि वह सच ही बोल रहा होगा।

मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू मीरु (नीरजा) ने प्रेम विवाह किया है। यह अन्तरधर्मी तो नहीं लेकिन अन्तर्जातीय विवाह है। मेरी माँ और पिताजी इसके लिए बिलकुल ही तैयार नहीं थे। दादा (श्री बालकवि बैरागी) धर्म संकट में थे। वे माता-पिता और बेटे के बीच फँस गए थे। हमारा परिवार घोर पारम्परिक। उस पर तुर्रा यह कि पिताजी अपने इलाके में बैरागियों के महन्त। दादा ने बई-दा‘जी (हम अपने माता-पिता को इन्हीं सम्बोधनों से पुकारते थे) से कहा कि वे दोनों बच्चों को समझाने की कोशिश करेंगे। गोर्की उस समय बीस-इक्कीस बरस का था और मीरू पन्द्रह-सोलह बरस की। दादा ने पहले गोर्की से बात की। उसने कहा कि परिवार यदि सहमत नहीं है तो वह भी यह शादी नहीं करेगा। लेकिन फिर उससे कोई शादी की बात न करे। वह शादी करेगा ही नहीं। करेगा तो मीरू से नहीं तो आजीवन कुँवारा रहेगा। सुन कर दादा निरुत्तर हो गए। कुछ दिनों बाद वे मीरू से मिले। पहले तो समझाया फिर, अन्तिम कोशिश की तरह कहा - ‘ऐसा तुमने उस उल्लू के पट्ठे में क्या देख लिया जो उस पर मरी जा रही हो?’ मीरू ने लापरवाही से कहा - ‘अरे अंकल! यह जानने के लिए तो आपको, गोर्की को, नीरजा लाल की नजरों से देखना पड़ेगा।’ सरस्वती पुत्र पुकारे जानेवाला, मालवी का राजकुमार, शब्दों का धनी, तालियों की गड़गड़ाहट से मंचों का लूटनेवाला, राष्ट्रीय स्तर का एक लोकप्रिय कवि मुँह बाये उस ‘प्रेम पगी’ किशोरी को देखता रह गया। पहले तो सम्पट ही नहीं बँधी। कुछ क्षणों बाद उनका कवि मन इस उत्तर पर निहाल हो गया। फिर भी उन्होंने एक कोशिश और की - ‘तुम अभी नाबालिग हो। कम से कम दो-ढाई बरस तक इन्तजार करना पड़ेगा। कर लोगी?’ अपने सपनों में गुम उस किशोरी ने उसी लापरवाही से कहा - ‘अंकल! आप बेफिकर रहिए। दो-ढाई बरस तो क्या, गोर्की के लिए तो जनमों तक इन्तजार कर लूँगी।’ और दादा ने हथियार डाल दिए। यह जनवरी 1980 की बात होगी। जहाँ तक मेरी याददाश्त काम कर रही है, दोनों का ब्याह कोई ढाई बरस बाद, 21 जून 1983 को हो पाया। आज दादा परपोतियों को खेला रहे हैं,  मीरू-गोर्की, नाना-नानी बनने की राह पर हैं। जब भी पूरा कुनबा जुटता है तो ये बातें याद कर-कर सब खिलखिलाते हैं।

गोर्की और मीरू अपनी बेटियों मीकू (अभिसार) (एकदम बाँये) और माही (अनमोल) (एकदम दाहिने) के साथ

ये बातें अचानक ही और बिना कारण, बिना प्रसंग याद नहीं आईं। मालूम हुआ कि भोपाल की हिन्दू उत्सव समिति ने निर्णय लिया है कि नवरात्रि में होनेवाले गरबों में प्रवेश के लिए आधार कार्ड दिखाना जरूरी कर दिया है। समिति का मानना है कि गैर हिन्दू लोग ऐसे उत्सवों में हिन्दू लड़कियों को लुभाने के लिए आते हैं। इस स्थिति से (हिन्दू लड़कियों को बचाने) निपटने के लिए समिति ने यह रास्ता निकाला। इतना ही नहीं, जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई शान्ति समिति की बैठक में भी समिति ने प्रस्ताव रखा कि तमाम गरबा मण्डलों के पाण्डालों भी प्रवेश के लिए यही व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

मुझे याद आया, इन्दौर में भी कुछ गरबा समितियों ने गैर हिन्दू लोगों के प्रवेश से रोकने की व्यवस्था की थी। नहीं पता कि यह व्यवस्था अब भी जारी है या नहीं। और यह भी अब तक प्रकट नहीं किया गया है कि अन्तरधर्मी विवाहों पर इसका कितना प्रभाव हुआ है। इसके विपरीत, अन्तरधर्मी-अन्तर्जातीय प्रेमियों के, घर से चुपचाप चले जाने के समाचार लगभग गत वर्षों के समान ही आ रहे हैं।

भोपाल के समाचार ने यह सब याद दिला दिया। मुझे विश्वास है कि यह प्रतिबन्ध लगानेवाले लोग भी ‘प्रेम पीड़ित’ रहे ही होंगे। न रहे हों तो वे इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि प्रेम का कीट उन पर हमला नहीं कर पाया। लेकिन इतना तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि भविष्य में भी ऐसा न होने की खातरी वे शायद ही दे सकें।

प्रेम अजीब शै है। इसकी न तो परिभाषा अब तक की जा सकी है न ही व्याख्या। सबके अपने-अपने अनुभव हैं। यह सौ टका समानतावादी है। धर्म, जात, वर्ण, वर्ग किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करता। पता ही नहीं चलता कि इसकी गन्ध कब लपेटे में लेकर मद-मस्त कर गई। इसका कीड़ा कब काट गया। मालूम होता है तब तक दुनिया बदल चुकी होती है। रोम-रोम महबूब के साथ रहने को मचल रहा होता है। आदमी न तो पागल होता है न ही सन्निपात का रोगी। वह दीवाना हो जाता है। दुनियादारी की बातें, इस तरह से उड़ जाती है जैसे तपते तवे पर पड़ पानी की बूँद छन्न से भाप बन जाती है। कृष्ण के कहने पर गापियों को ईश आराधना की सलाह देनेे गए उद्धव मूक हो गए गोपियों की बात सुन - ‘ऊधौ! मन न भए दस-बीस। एक हुतो ऊ गयो स्याम संग। कौन आराधे ईस?’ तत्व ज्ञानी होने का दर्प पाले उद्धव, प्रेम मगन गोपियों के सामने नतमस्तक हो गए। 

सुगन्ध को मुट्ठियों में कैद नहीं किया जा सकता। शरीर को कैद किया जा सकता है लेकिन मन को कैद करना आज तक मुमकिन नहीं हो पाया है। खुशबू के झोंके को कौन सी दीवारें रोक पाई हैं? इत्र की छोटी सी  शीशी, विशाल प्रासाद के एक कमरे के कोने में खुलती है तो पूरा प्रासाद महमह कर उठता है। इश्क और मुश्क तो छुपाए न छुपे। 

ऐसे निषेध आरोपित कर वाहवाही लूटी जा सकती है। खुद की पीठ ठोकी जा सकती है। लेकिन इतिहास गवाह है, प्रेम ऐसे तमाम निषेधों, ऐसी तमाम पाबन्दियों को नटखट बच्चे की तरह, टिली ली ली कहता, अँगूठा दिखाता ‘यह जा, वह जा’ हो जाता है। प्रेम से बडा कोई धर्म नहीं होता। और वह धर्म, धर्म नहीं जो प्रेम को अपराध माने। प्रेम तो मनुष्‍य को ईश्‍वर का अनुपम उपहार है। प्रेम तो प्रकृति है। बकौल कबीर, 'प्रेम न खेती नीपजै, प्रेम न हाट बिकाय।'  इसे अस्‍वीकार करना, इसका निरादर करना  ईश्‍वर का अपमान ही नहीं, ईश्‍वर को अस्‍वीकार करना है। 

निषेध सदैव ललचाते हैं। आकर्षित करते हैं। मनुष्‍य मन को उकसाते हैं। जिज्ञासु बनाते हैं। प्रेरित करते हैं। तोड़े जाने के लिए। प्रत्येक युग में।
----- 


धर्म की समानता और जाति-वर्ण का भेद साथ-साथ नहीं निभता

यह इसी जुलाई के पहले सप्ताह की बात है। भोपाल से कोई चालीस किलो मीटर दूर स्थित जिला मुख्यालय सीहोर की। दलित युगल पंकज जाटव और वैजयन्ती ने, गंज इलाके में स्थापित डॉक्टर अम्बेडकर की मूर्ति के फेरे लेकर विवाह किया। दोनों के परिवारों के पास इतने पैसे नहीं थे कि विवाह आयोजन कर सके। जाटव समाज यूँ तो हिन्दू समाज है लेकिन इन दोनों ने पवित्र अग्नि और हिन्दू देवताओं की अदृष्य साक्ष्य में फेरे नहीं लिए। अम्बेडकर को गवाह बनाया।

बसन्त पंचमी पर सरस्वती पूजन के आयोजन व्यापक स्तर पर किए जाते हैं। यह दिन इसी प्रसंग के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बरस की बसन्त पंचमी पर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड के अनेक गाँवों में सरस्वती पूजन नहीं हुआ। लोगों ने देवी सरस्वती के चित्र के स्थान पर सावित्री बाई फुले के चित्रों की पूजा कर बसन्त पंचती मनाई। उन्होंने कहा कि वही उनकी सरस्वती है। खबर है कि 2018 में ऐसे आयोजन अधिकाधिक स्थानों पर, अधिकाधिक भव्यता से किए जाने की तैयारी है।

घड़कौली, सम्भवतः बिहार का एक छोटा सा गाँव है। चमारों की बस्ती है। वहाँ के लोगों ने अपने गाँव का नाम बदल कर ‘डॉ. भीमराव अम्बेडकर ग्राम’ रख लिया है। वे यहीं नहीं रुके। गाँव के नामवाले बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘दा ग्रेट चमार’ लिख कर अपनी सामाजिक प्रताड़ना, उपेक्षा को अपना गर्व घोषित किया है।

2014 में दिल्ली में बड़ा हंगामा हुआ था।  मासिक पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ के सम्पादक, दलित लेखक-विचारक प्रमोद रंजन को कुछ महीने भूमिगत रहना पड़ा था। वे तभी बाहर आए थे जब उनकी अग्रिम जमानत हो गई। पत्रिका के इस अंक में, हिन्दू देवी दुर्गा और महिष का एक चित्र छपा था जिसमें, महिष वध के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं द्वारा आदिवासी नायकों, देवी-देवताओं पर किए गए अत्याचारों का उल्लेख किया गया था। कट्टर हिन्दू समाज ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की थी और अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर प्रमोद रंजन तथा उनके सहयोगियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई की थी। हिन्दू समाज की इस कार्रवाई की प्रतिक्रिया में बिहार, झारखण्ड के अन्तरवर्ती इलाकों में अनेक स्थानों पर महिष महात्सवों की खबरें आई थीं।

गए दिनों एक आई ए एस अधिकारी का भाषण फेस बुक और वाट्स एप पर ‘वायरल’ हुआ। दलित समुदाय से जुड़े ये अधिकारी स्थिर चित्त और शान्त भाव से श्रोताओं का आह्वान कर रहे थे - ‘गीता को समुद्र में फेंक दो।’ (क्योंकि यह मनुष्य-मनुष्य में भेद करती है।) लेकिन यह आह्वान महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है, हिन्दू समाज में हुई इसकी प्रतिक्रिया। कोई सामान्य आदमी यह आह्वान करता तो देशव्यापी हंगामा हो जाता। किन्तु इस मामले में ‘आहत भावनाएँ’ आक्रामक स्वरों में गर्जन-तर्जन करने के बजाय मिमिया कर रह गईं। निश्चय ही यह ‘आई ए एस’ के प्रभाव से ही हुआ होगा।

बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के अनेक समुदायों के वैवाहिक निमन्त्रण-पत्रों का स्वरूप बदल गया है। इन पर अब किसी हिन्दू देवी-देवता का न तो नाम छप रहा है न ही चित्र। इनके स्थान पर अम्बेडकर, ज्योति बा फुले, काशीराम, विवेकानन्द, गौतम बुद्ध, मायावती, स्थानीय दलित नेताओं के चित्र और इन्हीं के उद्धरण छप रहे हैं। ऐसे निमन्त्रण-पत्र छपवानेवालों में उच्च शिक्षित और अशिक्षित समान रूप से शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश में ‘धम्म सम्मेलनों’ की मानो बाढ़ आ गई है। बाढ़ नहीं तो फैशन तो आ ही गया है। छोटे-छोटे गाँवों से लेकर बड़े कस्बों, नगरों में धम्म सम्मेलनों के आयोजन एक के बाद एक होने की खबरें निरन्तर आ रही हैं। 

‘सेनाओं’ के मामले अब तक बिहार और राजस्थान से ही मुख्यतः जुड़े रहे हैं। लेकिन ‘भीम सेना’ या कि ‘भीम आर्मी’ अचानक ही एक धूमकेतु की तरह उभरी और छा गई। इसकी मौजूदगी अब गाँव-गाँव में नजर आने लगी है। चन्द्रशेखर ‘रावण’ के रूप में दलित युवकों को आवेशित, ऊर्जित करनेवालाएक नया नायक मिल गया। 

अभी-अभी, दो ही दिन पहले किन्हीं प्रो. जयराम (यही नाम या आ रहा है मुझे) का, तेरह मिनिट का एक भाषण देखने/सुनने को मिला। इसका विषय था - ‘एससी, एसटी, ओबीसी का हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं है।’ ऐसे व्याख्यान महानगरों के बड़े-बड़े आडिटोेरियमों में हो रहे हैं जिनमें खड़े रहने की जगह नहीं मिलती। आदिवासियों को याद दिलाया जा रहा है कि भारत के ‘मूल वासी’ वे ही हैं, हिन्दू नहीं। हिन्दू तो हमलावर बन कर यहाँ आये। 

ये सारी बातें, ये सारी घटनाएँ न तो अचानक हुई हैं न ही एक साथ हुई हैं। लेकिन इनका ‘कोलॉज’ अपने आप में एक सन्देश देता है। नहीं जानता कि आप इसका क्या अर्थ लेते हैं किन्तु मेरे तईं इसका सन्देश है - यदि सब कुछ ऐसा ही चलता रहा जैसा कि इस क्षण चलता नजर आ रहा है तो जल्दी ही इस देश में हिन्दू, अल्प संख्यक हो जाएँगे। और यह किसी ‘अल्पसंख्यकों के षड़यन्त्र’ के कारण नहीं, खुद हिन्दू समाज के कारण होगा। 

भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के मकसद से, गए तीन बरसों से देश में जो हो रहा है, यह उसी की प्रतिक्रिया है। हिन्दू राष्ट्र निर्मातओं को यह अन्तिम अवसर अनुभव हो रहा है और वे अपने जीते-जी अपना सपना-संकल्प पूरा करने के लिए पण-प्राण से जुटे हुए हैं। हिटलर का ‘रक्त शुद्धता और नस्लीय श्रेष्ठता’ उनका आदर्श और आधार है। लेकिन वे, परिणाम को आमूलचूल बदलदेनेवाली एक छोटी सी अनदेखी कर रहे हैं। जर्मनी में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था नहीं है। वहाँ जर्मन और यहूदी ही एकमात्र अन्तर था। भारत में वर्ण और जाति व्यवस्था के चलते इसका हिन्दू राष्ट्र बन पाना, उपरोल्लेखित तमाम घटनाओं के लिहाज से असम्भव ही है। धर्म सबको समान मानता है लेकिन जाति और वर्ण पूरी तरह से भेदभाव आधारित हैं। ऐसे में यदि हिन्दू राष्ट्र बनाना है तो सबको केवल हिन्दू मानकर ही व्यवहार करना पड़ेगा। धर्म की समानता और जाति-वर्ण का भेद साथ-साथ नहीं निभाया जा सकता। ऊना में जिन दलितों को नंगा करके पीटा गया वे हिन्दू थे। रोहित वेमुला भी हिन्दू था। वर्ण और जाति के नाम पर देहातों में आज भी हिन्दुओं पर भरपूर अत्याचार हो रहे हैं। वे जूते-चप्पल पहन कर नहीं निकल सकते। वे अपने बच्चों के विवाह की बनोरियाँ, बारातें गाजे-बाजे से नहीं निकाल सकते। दलित दूल्हों को पुलिस संरक्षण में, हेलमेट पहन कर निकलना पड़ रहा है। दलित हिन्दू महिलाएँ निर्वस्त्र कर, गाँवों में घुमाई जा रही हैं। दलित हिन्दू युवाओं, पुरुषों को मल-मूत्र खिलाया-पिलाया जा रहा है। धर्म, वर्ण और जाति के नाम पर नृशंसता और क्रूरता के चरम दृष्य आज भी देखने को मिल रहे हैं। अंग्रेजी कहावत ‘सम्पूर्ण सत्ता सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’ बदल कर ‘सम्पूर्ण सत्ता चरम अमानवीयता, नृशंसता और क्रूरता सहित सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’ में बदल गई है।

दलित, शोषित, पीड़ित समाज को विश्वास हो चला है कि वह केवल वोट लेने तक के लिए हिन्दू है, समानता और अवसरों के लिए नहीं। इस बार हुई और हो रही प्रतिक्रिया ने न्यूटन का, गति का तीसरा नियम बदल सा दिया है। इस बार प्रतिक्रिया विपरीत तो हो रही है किन्तु समान नहीं, समान से कहीं अधिक तेज। दीवार पर फेंकी जा रही रबर की गेंद इस बार दुगुनी ताकत से लौटती नजर आ रही है। यह देखना रोचक होगा कि अगली जनगणना में देश के कितने समुदाय खुद को हिन्दू लिखवाने से इंकार करते हैं।

धर्म सदैव ही नितान्त निजी मामला रहा है। वह जब भी सामूहिक होता है तब ध्वस्त करता भी है और  ध्वस्त होता भी है।
------    

(दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल में 13 जुलाई 2017 को प्रकाशित)

भेस से धर्म रक्षक काम से धर्म बैरी

त्रिपोलिया गेट से घर लौट रहा था। रास्ते में उत्तमार्द्धजी का फोन आया - ‘पपीता लेते आईएगा।’ मैं असहज हो जाता हूँ। ‘गृहस्थ’ बने इकतालीस बरस से अधिक हो गए लेकिन घर-गिरस्ती की अकल अब तक नहीं आई। एक ठेले पर पपीते नजर आए। रुक गया। बिना भाव-ताव किए ठेलेवाले से बोला - ‘भई, तेरे हिसाब से, ढंग-ढाँग के दो पपीते दे दे।’ दो-चार पपीते टटोल कर, दो पपीते निकाल, तराजू पर रखने लगा। मैंने ‘यूँ ही’ कहा - ‘मुझे सामान खरीदने की अकल नहीं है। तू जाने और तेरा राम जाने।’ सुनकर वह चिहुँक गया। उसके हाथ रुक गए। बोला - ‘अरे! आपने तो बात राम-ईमान पर ला दी बाबूजी!’ हाथ के दोनों पपीते रख दिए। पाँच-सात पपीतों को थपथपाया, सूँघा और खूब सावधानी से दूसरे दो पपीते निकाल, तराजू पर रख दिए। उसके चिहुँकने ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। उसका नाम पूछा। बोला - ‘भूरिया।’ मुझे लगा, झाबुआ जिले का आदिवासी है। वहाँ ‘भूरिया’ कुल नाम (सरनेम) बहुत सामान्य है। मैंने कहा - ‘वो तो है पर तेरा नाम क्या है भैया?’ बोला - ‘भूरिया खान’। अब मैं चिहुँका- खान और राम के नाम पर डर गया?  पहनावे, बोल-चाल से वह कहीं से ‘खान’ नहीं लग रहा था। मैंने उसे धन्यवाद दिया और चल पड़ा।

अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तमार्द्धजी मधुमेही हैं। उन्होंने जामुन की फरमाइश की। माणक चौक में महालक्ष्मी मन्दिर की दीवारे के सहारे कुछ महिलाएँ जामुन ले कर बैठती हैं। पहली नजर में मुझे जामुन अच्छे नहीं लगे। आधे-आधे लाल, आधे-आधे काले। मैंने आधा किलो जामुन माँगे। उसने लापरवाही से जामुन तराजू पर रखे। अचानक ही मुझे कलवाली बात याद आ गई। मैंने कहा -‘मुझे जामुन की परख नहीं है। मरीज के लिए ले जा रहा हूँ। तू जाने और तेरा राम जाने।’ सुनते ही उसने, मानो घबराकर सारे जामुन वापस टोकरी में उँडेल दिए और घबरा कर बोली -‘अरे! राम! राम! बाबूजी। पहले ही कह देते!’ और एक-एक जामुन छाँट कर तराजू पर रखे। मैंने उसका नाम पूछा तो बोली - ‘गरीब का क्या नाम बाबूजी! आप किसी भी नाम से बुला लो।’

ये बातें यूँ तो रोजमर्रा की हैं लेकिन इन दिनों धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है और राज्याश्रय में होने दिया जा रहा है, उन सन्दर्भों में मौजूँ और विचारणीय हैं। ये दोनों ‘छोटे लोग’ मुझे सर्वाधिक धार्मिक लगे। धर्म के नाम पर और धर्म रक्षा के नाम पर दंगा करनेवाले और निरपराध, निर्दोष लोगों के प्राण लेनेवाले यदि इन दोनों को देख लें तो उन्हें निश्चय ही अपने कुकर्मों पर शर्मिन्दगी हो। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि जो कुछ वे कर रहे हैं वह खूब सोच-विचार कर, सोद्देश्य, सुनियोजित तरीके से कर रहे हैं। ‘धर्म’ उनकी चिन्ता बिलकुल ही नहीं है।

मेरे कस्बे के लोकव्यवहार पर श्वेताम्बर जैन समाज का भरपूर प्रभाव है। इतना कि मेरे कस्बे के निजी और सार्वजनिक आयोजनों की रसोइयों में प्याज-लहसुन का उपयोग नहीं होता। अपने जैन आमन्त्रितों की चिन्ता करते हुए, अजैनी भी अपने यहाँ जनम-मरण-परण पर बननेवाले भोजन में प्याज-लहसुन नहीं वापरता। श्वेताम्बर जैन समाज, पूरी सतर्कता और चिन्ता से ‘धर्म-पालन’ का ध्यान रखता है। मैंने एक बार पूछा - ‘धर्म-पालन से क्या अभिप्राय है? धर्म को पालना-पोसना या धर्म के निर्देशों का पालन करना?’ बहुत ही सुन्दर जवाब मिला - ‘दोनों। धर्म के निर्देशों का पालन होगा तो ही तो धर्म पलेगा-पुसेगा!’ सुनते ही मुझे जिज्ञासा हो आई - ‘कौन अधिक धार्मिक है? अपने धर्म के निर्देशों का पालन करनेवाला जैन या जैन की धार्मिक भावनाओं की चिन्ता करनेवाला अजैन?’ लेकिन अगले ही पल अपनी मूर्खता पर झेंप आ गई। धार्मिक होना तो बस धार्मिक होना होता है। कम धार्मिक या ज्यादा धार्मिक से क्या मतलब? जाहिर है, अपने धर्म के साथ ही साथ अपने साथवाले के धर्म की चिन्ता करना भी अपना धर्म है। इसी बात को गाँधी ने अपना आदर्श बनाया था - ‘जो सब धर्मों को माने वही मेरा धर्म।’ लेकिन गाँधी ने तो बहुत बाद में कहा। गोस्वामीजी बहुत पहले ही कह गए -

‘परहित सरिस, धरम नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।’

जाहिर है, धर्म के नाम पर हत्याएँ करनेवाले केवल हत्यारे हैं, धर्म रक्षक बिलकुल नहीं। प्रत्येक धर्म, धर्म पर मर जाने की बात करता है, मारने की नहीं। किसी के प्राण लेना धर्म हो ही नहीं सकता। मैं जब भी धर्म के नाम हत्या का कोई समाचार पढ़ता हूँ तो हर बार मुझे, मरनेवाला ही धार्मिक लगता है। वह अपने धर्म के कारण, अपने धर्म के लिए ही मरा। उसे मारनेवाले तो अपने ही धर्म के दुश्मन हैं। वे अपने धर्म को ‘हत्यारा धर्म’ साबित करते हैं। लेकिन केवल हत्या करनेवाले ही क्यों? वे तमाम लोग भी हत्यारे ही हैं जो अपने धर्मानुयायियों का हत्या करते हुए चुपचाप देखते रहते हैं, मरनेवाले को बचाने आगे नहीं आते। पूछो तो मासूम जवाब मिलता है - ‘कैसे बचाते? वे मुझे भी मार देते।’ जाहिर है, किसी को बचाने का अपना धर्म उन्हें याद नहीं रहता और वे भी हत्यारों में शामिल हो जाते हैं। धर्म के लिए जान देनेवाले अब नहीं रहे। अब तो धर्म के नाम पर जान लेनेवाले, हत्यारे, अपराधी ही बचे हैं।

यह सब देख-देख कर मुझे लगता है, अब धर्म स्थलों में धर्म नहीं रह गया है। वहाँ तो केवल दिखावा और चढ़ावा रह गया है। चढ़ाई गई सामग्री को बाजार में बेच कर अपनी जेब भारी करने के व्यापार केन्द्र बन कर रह गए हैं। आठ-आठ, दस-दस दिनों तक चलनेवाले धार्मिक आयोजन/उपक्रम मुझे निष्प्राण, निरर्थक लगने लगते हैं। इनका कोई असर होता नजर नहीं आता। लगता है, ऐसे आयोजनों/उपक्रमों में और अपराधों में कोई प्रतियोगिता चल रही हो - देखें! कौन आग बढ़ता है?

जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तभी मुझे समाचार मिला कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के दो जत्थे रास्ते से ही लौट आए हैं। चीन ने बाधा पैदा कर दी और अपने ही द्वारा जारी वीजा खारिज कर दिया। लेकिन लौटे हुए जत्थों के सदस्यों ने कोई हुड़दंग नहीं किया। और तो और, धर्म की ठेकेदारी करनेवालों की भी बोलती बन्द रही। किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत नहीं हुईं। सबको मालूम है कि यह दो राष्ट्रों के बीच का मामला है। यहाँ सचमुच में ‘राष्ट्र प्रथम’ है, धर्म नहीं। धर्म की दुकानदारी करनेवाले भली-भाँति जानते हैं कि वे कुछ भी कर लें, कुछ होना-जाना नहीं। लेकिन, अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में ‘राष्ट्र’ की विवशताएँ अनुभव कर, अपनी जबानों पर ताला लगानेवालों को आन्तरिक सन्दर्भों में ‘राष्ट्र धर्म’ या कि ‘राष्ट्र प्रथम’ याद नहीं रहता। धर्म के नाम पर दंगे और हत्याएँ करनेवाले तमाम लोग भूल जाते हैं कि भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य’ है और उनके इन दुष्कृत्यों से पूरी दुनिया में भारत की यह छवि भंग होती है, बदनामी होती है, भारत के माथे पर कलंक लगता है, भारत का सिर शर्म से झुकता है।

देश का अपना कोई धर्म नहीं होता। यदि होता भी है तो केवल ‘लोक-कल्याण’। इससे कम या ज्यादा कुछ नहीं। धर्म के नाम पर उपद्रव करनेवाले चाहे जितने खुश हो लें लेकिन वे ‘धर्म रक्षक’ नहीं ‘धर्म के दुश्मन’ हैं। धर्म रक्षा का भार तो पपीता बेचनेवाले तमाम भूरिया खान और अनाम रहनेवाली जामुन बेचनेवाली तमाम महिलाओं के जिम्मे है। जिसे वे निष्ठापूर्वक उठा रहे हैं, निभा रहे हैं।
-----

(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 29 जून 2017 को प्रकाशित)

धर्म मूल्यवान बनाता है, बिक्री-मूल्य नहीं बढ़ाता

आनन्द अभी-अभी गया है। मुझे फटकार कर। उम्र में मेरे बड़े बेटे से बरस-दो बरस ही बड़ा होगा, किन्तु डाँटता-फटकारता है बड़े भाई की तरह। आते ही शुरु हो गया - ‘आपका तो भगवान ही मालिक है। पता नहीं, क्या-क्या सनकें पाल लेते हैं! अब यह भी कोई बात हुई कि अखबार-टीवी का बॉय काट किए बैठे हैं! इन्हें क्या फरक पड़ेगा? फरक पड़ेगा तो केवल आपको। दीन-दुनिया से कटे रहेंगे। लीजिए! एक खबर है। आपके मिजाज की। तबीयत खुश हो जाएगी। अखबार पढ़ रहे होते तो पाँच-सात दिन पहले ही खुश हो जाते।’ कहते हुए एक अखबार मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं कुछ नहीं बोला। मुस्कुराते हुए, हाथ बढ़ाकर अखबार ले लिया।

अखबार आठ दिन पुराना है-पाँच जून, सोमवार का। पहले पृष्ठ पर सदैव की तरह विज्ञापनी-नकाब (जेट) है। मैं मुखपृष्ठ खोलता हूँ।  समाचार देखने की कोशिश करूँ, उससे पहले ही आनन्द बोला - ‘यहाँ नहीं। अच्छा समाचार है। मुखपृष्ठ पर कैसे मिलेगा? अन्दर है। ग्यारहवें पेज पर।’ और खुद ने ही खोलकर पन्ना मेरे सामने फैला दिया। समाचार का शीर्षक पढ़कर तबीयत वाकई में खुश हो गई - ‘गांव वालों ने मंदिर-मस्जिद से खुद उतारे लाउडस्पीकर, बोले- झगड़े जड़ खत्म’। समाचार रंगीन और सचित्र है। चार कॉलम समाचार को तीन कॉलमों में, पन्ने के निचलेवाले हिस्से में, प्रमुखता से छापा है। 

समाचार के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के थाना भगतपुर के गाँव थिरियादान के हिन्दुओं-मुस्लिमों ने खुद ही मन्दिर और मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार कर पुलिस को सौंप दिए और तय किया कि गाँव में होनेवाले किसी भी धार्मिक काम-काज मे लाउडस्पीकर नहीं लगाया जाएगा। लाउडस्पीकर को लेकर गाँव में प्रायः ही विवाद होता और हर बार मामला गर्मा जाता। गाँववाले परेशान हो गए। गाँव के ही कुछ बुजुर्गों ने फैसला लिया कि ‘झगड़े की इस जड़ को ही खत्म कर दिया जाए’। ‘आनेवाले समय में कोई विवाद न हो, आनेवाली पीढ़ियाँ कोई मनमुटाव नहीं रखें और भाईचारा निभता रहे।’ 30 मई शनिवार को ग्राम प्रधान सुनीता रानी की मौजूदगी में सर्वानुमति से फैसला लिया और लिखित रूप में पुलिस थाने में दिया ताकि ‘सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आए’। पंचायत में कहा गया गीता या कुरान, किसी में नहीं लिखा कि ऊपरवाले की इबादत लाउडस्पीकर से ही होनी चाहिए।

मैंने गूगल पर तलाशा तो पाया कि थिरियादान प्रायः ही साम्प्रदायिक विवादों में रहता आया है। जिला मुख्यालय मुरादाबाद से 25 किलो मीटर दूर है। गाँव की आबादी लगभग दो हजार है। हिन्दू आबादी 70 प्रतिशत और शेष 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। 

समाचार मैंने दो-तीन बार पढ़ा और विचार में पड़ गया। इन दो हजार लोगों ने बहुत जल्दी ‘झगड़े की जड़’ तलाश कर ली। संकट शायद आदमी को बुद्धिमान बना देता होगा क्योंकि वह सब पर समान रूप से आता है। वह हिन्दू-मुसलमान में फर्क नहीं करता। बार-बार के साम्प्रदायिक विवादों से उपजे संकटों ने इन लोगों को समझदार बना दिया। इन्हें समझ आ गई कि लाउडस्पीकर पूजा-इबादत के लिए जरूरी नहीं और न ही इनका उपयोग धार्मिक है। ‘क्योंकि भगवान की आराधना करने का यह तरीका पौराणिक नहीं है।’ और यह कि ‘किसी भी धर्म में नहीं लिखा कि लाउडस्पीकर से ही पूजा होगी।’  इन लोगों को अपने धार्मिक दबदबे के मुकाबले भावी पीढ़ियों की, उनके भाईचारे से रहने की चिन्ता अधिक हुई। उन्हें मालूम तो पहले से था लेकिन अनुभव अब किया कि लाउडस्पीकर से पूजा-इबादत करना धार्मिक-पौराणिक प्रावधान नहीं है,  ऊपरवाला तो अपने बन्दों का मौन भी साफ-साफ सुन लेता है। थिरियादान के, गिनती के इन लोगों ने अपनी भावी सन्ततियों की शान्ति, सुख, कुशल की चिन्ता की। 

तो क्या थिरियादान के ये लोग अब धार्मिक नहीं रहे? अधर्मी हो गए? निश्चय ही नहीं। ये सब धार्मिक तो पहले भी थे ही किन्तु तब ‘कट्टर धार्मिक’ या ‘धर्मान्ध कट्टर’ थे। इन्होंने अपनी-अपनी धर्मान्धता या कि कट्टरता छोड़ी। धर्म नहीं। समाचार की शब्दावली ध्यान देने योग्य है। गाँववालों ने लाउडस्पीकर को ‘झगड़े की जड़’ कबूल किया। कबूल किया कि देव-आराधना या कि इबादत के लिए लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं। अनुभव किया कि गाँववालोें में मनमुटाव का कारण उनका ईश्वर, उनका खुदा, उनका धर्म या उनकी पूजा पद्धति नहीं, यह लाउडस्पीकर ही है। उन्होंने  अनुभव किया कि वे अपने धर्म के साथ ही सुख से रह सकते हैं, लाउडस्पीकर या ऐसे ही किसी अन्य बाहरी उपकरण के साथ नहीं।

वस्तुतः, धर्म तो मनुष्य को अधिक मूल्यवान बनाता है लेकिन मनुष्य अपने मूल्यवान होने को जता कर, उसके कारण और उसके आधार पर अपनी पहचान जताना चाहता है। तब वह ‘धार्मिक होने’ के मुकाबले ‘धार्मिक दीखने’ को सर्वोच्च प्राथमिकता जितना महत्वपूर्ण मान बैठता है। यहीं से मुसीबत शुरु होती है। मनुष्य जैसे ही अपने ‘मूल्यवान होने’ को जताना चाहता है वैसे ही खुद को ‘बिक्री योग्य’ घोषित कर बिकने के लिए बाजार में आ बैठता है। लेकिन बाजार का अपना चलन है। वहाँ तो ‘बेहतर’ या फिर ‘सस्ता’ ही खरीदा जाता है। बाजार में तो हर आदमी से बेहतर और हर आदमी से सस्ता आदमी उपलब्ध होता है। ऐसे में, हर कोई खुद को सर्वाधिक धार्मिक दिखाने के चक्कर में सबसे सस्ता होने की प्रतियोगिता में आ जाता है। तब पाखण्ड और प्रदर्शन की प्रतियोगिता अपने आप शुरु हो जाती है। ऐसे में उसका मूल्यवान होना अपना मूल्य खो देता है। इसके साथ ही साथ एक प्रक्रिया और शुरु हो जाती है - अनुयायियों के आचरण के आधार पर धर्म का मूल्यांकन। तब ही दुनिया किसी धर्म को अच्छा या बुरा तय करती है। यह सचमुच में रोचक विसंगति है कि जो धर्म मनुष्य को मूल्यवान बनाता है वही मनुष्य अपने (आचरण से) धर्म को लोकोपवाद की विषय वस्तु बना देता है।

धर्म आदमी को मूल्यवान बनाता है, उसका ‘बिक्री मूल्य’ नहीं बढ़ाता। धर्म यदि ‘बिक्री मूल्य’ बढ़ाता होता तो थिरियादान का यह समाचार देश के तमाम अखबारों में पहले पन्ने पर जगह पाता और तमाम चेनलों पर कई दिनों तक छाया रहता। किन्तु निश्चय ही ऐसा नहीं हुआ होगा। वर्ना आनन्द के बताने से पहले ही यह सब मुझे बहुत पहले ही मालूम हो चुका होता। 

धर्म आत्म-शुद्धि का, आत्मोन्नयन का उपकरण है, मुनाफे का नहीं। यह न तो खुद बिकता है न ही किसी का बिक्री मूल्य बढ़ाता है। बिक्री मूल्य और बिक्री तो दिखावे से ही बढ़ती है। उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में ‘विज्ञापन’ यह दिखावा है और धर्म के मामले में ‘पाखण्ड’ और ‘प्रदर्शन’। अधिकांश सरकारी स्कूलों में न तो बिजली है न पीने के पानी की व्यवस्था और न ही शौचालयों की।  भण्डारे पर लाखों रुपये खर्च करनेवाले किसी ‘धार्मिक-दानी’ से अनुरोध कीजिए कि वह यह रकम किसी एक स्कूल पर खर्च कर, समस्याओं का स्थायी निदान करने का पुण्य लाभ ले ले। वह तत्क्षण इंकार कर देगा। क्योंकि स्कूल में दिया पैसा किसी को नजर ही नहीं आएगा और उसकी वाह वाही नहीं होगी। यह इसलिए कह रहा हूँ कि धार्मिकों-दानियों से ऐसा अनुरोध कर इंकार सुन चुका हूँ। 

वस्तुतः, थिरियादान के लोगों को ‘आचरण’ और ‘प्रदर्शन’ का अन्तर समझ में आ गया। उन्होंने महसूस कर लिया कि ‘आचरण’ से ही उद्धार है, ‘प्रदर्शन’ से नहीं। धार्मिक कट्टरता या कट्टर धर्मान्धता से मुक्ति पाकर, उन्होंने आचरण को अपनाया। उन्होंने अपने लिए सुख-शान्ति ही नहीं जुटाई, अपने-अपने धर्म का मान भी बढ़ाया।

यही तो धर्म है! 
-----

(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 15 जून 2017 को प्रकाशित)

सतत् निष्ठापूर्ण आचरण से ही संस्कृति का बचाव

14 फरवरी की दोपहर होने को थी। मेरे एक उदारवादी मित्र के धर्मान्ध बेटे का फोन आया - ‘अंकल! पापा आपके यहाँ हैं क्या?’ मैं दहशत में आ गया। अपनी कट्टरता और धर्मान्धता के अधीन वह मुझे तो ‘निपटाता’ ही रहता है, अपने पिता को भी मेरी उपस्थिति में एकाधिक बार लताड़ चुका। 14 फरवरी को ऐसे ‘हिन्दू बेटे’ को अपने, ‘हिन्दू धर्म के दुश्मन’ पिता को तलाशते देख मन में आशंकाओं और डर की घटाएँ घुमड़ आईं। मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा - ‘क्यों? सब ठीक तो है? कोई गड़बड़ तो नहीं?’ खिन्न स्वरों में उत्तर आया - ‘हाँ। सब ठीक ही है।’ मैंने पूछा - ‘कोई काम आ पड़ा उनसे?’ उसी उखड़ी आवाज में बेटा बोला - ‘हाँ। उनके पाँव पूजने हैं।’ डरे हुए आदमी को हर बात में धमकी ही सुनाई देती है। ‘पाँव पूजने’ का अर्थ मैंने अपनी इसी मनोदशा के अनुसार निकाला और घबरा कर पूछा - ‘अब क्या हो गया तुम दोनों के बीच?’ वह झल्ला कर बोला - ‘ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा आप सोच रहे हो। आज सच्ची में उनके पाँव पूजने हैं। वेलेण्टाइन डे के विरोध में आज हम लोग मातृ-पितृ दिवस मना रहे हैं।’ सुनकर, अनिष्ट की आशंका से मुक्त हो मैंने आश्वस्ति की लम्बी साँस तो ली लेकिन हँसी भी आ गई। बोला - ‘जिस बाप को हिन्दू विरोधी मानते हो, जिसे यार-दोस्तों के सामने, बीच बाजार हड़काते रहते हो, हिन्दुत्व की रक्षा के लिए आज उसी बाप को तलाश रहे हो?’ वह झुंझलाकर बोला - ‘मैं इसीलिए आपसे नहीं उलझता अंकल! आप सब जानते, समझते हो। पापा के दोस्त हो इसलिए चुप रहता हूँ। फालतू बात मत करो। पापा आपके यहाँ हो तो बात करा दो। बस!’ अगले ही पल हम दोनों एक-दूसरे से मुक्त हो गए।

समर्थन हो या विरोध, पाखण्ड के चलते प्रभावी नहीं हो पाता है। इसके विपरीत, ऐसी हर कोशिश अन्ततः खुद की ही जग हँसाई कराती है। किसी एक खास दिन या मौके के जरिए पूरी संस्कृति को, सामूहिक रूप से खारिज या अस्वीकार करने की कोई भी कोशिश कभी कामयाब नहीं हो पाती। चूँकि निषेध सदैव आकर्षित करते हैं और प्रतिबन्ध सदैव उन्मुक्त होने को उकसाते हैं इसलिए ऐसी हर कोशिश हमसे हर बार उसी ओर ताक-झाँक करा देती है जिससे आँखें चुराने को कहा जाता है।

ऐसे ‘दिवस’ (‘डे’) मनाना पाश्चात्य परम्परा है। शुरु-शुरु मैं ऐसे प्रत्येक ‘डे’ पर चिढ़ता, गुस्सा होता था। किन्तु एक बार जब मैंने विस्तार से समझने की कोशिश की तो पाया कि मेरी असहमति तो ठीक है लेकिन मेरा चिढ़ना गैरवाजिब है। पश्चिम में सामूहिक परिवार की अवधारणा नहीं है। वहाँ बच्चों के सयाने होते ही माँ-बाप का घर छोड़ना बहुत स्वाभाविक बात होती है। इसके विपरीत, हम संयुक्त परिवार से कहीं आगे बढ़कर संयुक्त कुटुम्ब तक के विचार को साकार करने मेें अपना जीवन धन्य और सफल मानते हैं। एकल परिवार का विचार ही हमें असहज, व्यथित कर देता है। बेटे का माँ-बाप से अलग होना हमारे लिए पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर अपमानजक लगता है। यह मनुष्य स्वभाव है कि वह उसीकी तलाश करता है जो उसके पास नहीं है। पराई चीज वैसे भी सबको ही ललचाती ही है। इसी के चलते हमारी अगली पीढ़ी को एकल परिवार की व्यवस्था ललचाती है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के रास्ते पर चल पड़ने के बाद यह हमारे बच्चों की मजबूरी भी बनती जा रही है। ऊँचे पेकेजवाली नौकरियाँ अपने गाँव में तो मिलने से रहीं! बच्चों को बाहर निकलना ही पड़ता है। बचत की या माँ-बाप को रकम भेजने की बात तो दूर रही, महानगरों में जीवन-यापन ही उन्हें कठिन होता है। सीमित जगह वाले, किराये के छोटे मकान। माँ-बाप को साथ रख सकते नहीं और माँ-बाप भी अपने दर-ओ-दीवार छोड़ने को तैयार नहीं। हमारी जीवन शैली भले ही पाश्चात्य होती जा रही हो किन्तु भारतीयता का छूटना मृत्युपर्यन्त सम्भव नहीं। 

हमारी सारी छटपटाहट इसी कारण है। त्यौहारों पर बच्चों का घर न आना बुरा समझा जाता है। उनके न आ पाने को हम लोग बीसियों बहाने बना कर छुपाते हैं। पश्चिम में सब अपनी-अपनी जिन्दगी जीते हैं। बूढों की देखभाल की अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए ‘राज्य’ ने ‘ओल्ड होम्स’ की व्यवस्था कर रखी है। क्रिसमस वहाँ का सबसे बड़ा त्यौहार। बच्चे उस दिन अपने माँ-बाप से मिलने की भरसक कोशिश करते हैं। शेष तमाम प्रसंगों के लिए ‘डे’ की व्यवस्था है। होली-दीवाली पर हम जिस तरह अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते हैं, उसी तरह ‘मदर्स/फादर्स/पेरेण्ट्स डे’ पर वहाँ माँ-बाप बच्चों के बधाई कार्ड की प्रतीक्षा करते हैं। बच्चे भी इस हेतु अतिरिक्त चिन्तित और सजग रहते हैं। कार्ड न आने पर माँ-बाप और न भेज पाने पर बच्चे लज्जित अनुभव करते हैं।

‘डे’ मनाने का यह चलन हम उत्सवप्रेमी भारतीयों के लिए अनूठा तो है ही, आसान भी है और प्रदर्शनप्रियता की हमारी मानसिकता के अनुकूल भी। ‘कोढ़ में खाज’ की तर्ज पर ‘बाजारवाद’ ने हमारी प्रदर्शनप्रियता की यह ‘नरम नस’ पकड़ ली। अब हालत यह हो गई है कि ऐसे प्रत्येक ‘डे’ पर हर साल भीड़-भड़क्का, बाजार की बिक्री, लोगों की भागीदारी बढ़ती ही जा रही है। पहली जनवरी को नव वर्ष की शुरुआत को सर्वस्वीकार मिल चुका है। केक और ‘रिंग सेरेमनी’ भारतीय परम्परा का हिस्सा बन गई  समझिए। बाबरी ध्वंस की जिम्मेदारी लेनेवाली, एकमात्र भाजपाई, हिन्दुत्व की प्रखर पैरोकार उमा भारती ने तो एक बार किसी हनुमान मन्दिर में केक काटा था।

वस्तुतः कोई भी परम्परा लोक सुविधा और लोक स्वीकार के बाद ही संस्कृति की शकल लेती है। सांस्कृतिक आक्रमण को झेल पाना आसान नहीं होता। हमलावर संस्कृति का विरोध कर अपनी संस्कृति बचाने की कोई भी कोशिश कभी कामयाब नहीं हो पाती। सतत् निष्ठापूर्ण आचरण से ही कोई संस्कृति बचाई जा सकती है। लेकिन हमारे आसपास ऐसी कोशिशों के बजाय अपनेवालों को ही मारकर भारतीय संस्कृति बचाने के निन्दनीय पाखण्ड किए जा रहे हैं। ऐसी कोशिशों से प्रचार जरूर मिल जाता है और दबदबा भी कायम हो जाता है किन्तु संस्कृति हाशिए से भी कोसों दूर, नफरत के लिबास में कूड़े के ढेर पर चली जाती है। पश्चिम के लोग अपनी धारणाओं, मान्यताओं पर दृढ़तापूर्वक कायम रहते हैं। उन्हें वेलेण्टाइन डे मनाना होता है। मना लेते हैं। अपने वेलेण्टाइन डे के लिए वे हमारी होली, हमारे बसन्तोत्सव का विरोध नहीं करते। अपने फादर्स डे के लिए हमारे पितृ-पक्ष का, अपने क्रिसमस के लिए हमारी दीपावली का, अपने ‘न्यू ईयर’ के लिए हमारी चैत्र प्रतिपदा का विरोध नहीं करते। 

पश्चिम के लोगों में और हममें बड़ा और बुनियादी फर्क शायद यही है कि वे अपनी लकीर बड़ी करने में लगे रहते हैं जबकि हम सामनेवाले की लकीर को छोटी करने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इतनी ही मेहनत हम यदि अपनी लकीर बड़ी करने में करें तो तस्वीर कुछ और हो। उनकी लकीर छोटी करने की हमारी प्रत्येक कोशिश का सन्देश अन्ततः नकारात्मक ही जाता है। हमारी छवि आतंकी जैसी होती है। हम अपनों से ही नफरत करते हैं, अपनों की नफरत झेलते हैं।

बेहतर है कि हम तय कर लें कि हमें क्या बनना है, कैसा बनकर रहना है और तय करके, जबड़े भींच कर, वैसा ही बनने में जुट जाएँ। कहीं ऐसा न हो जाए कि हम वह भी नहीं रह पाएँ जो हम हैं। 
-----
(भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में, 16 फरवरी 2017 को प्रकाशित। )

अपने-अपने रुह अफजा

देवेन्द्र दीपावली मिलने आया तो शिकायत की - ‘आपका ब्लॉग ध्यान ये देख रहा हूँ। महीनों बीत गए, आपने मेरावाला लेख नहीं छापा।’ मैं तो भूल ही गया था। देवेन्द्र ने याद दिलाया तो याद आया। मैंने सस्मित कहा-‘लेकिन उसमें तो तुम्हारा मजाक उड़ाया गया है!’ देवेन्द्र ने संजीदा होकर जवाब दिया-‘अव्वल तो मेरा मजाक नहीं है। लेकिन अगर है भी तो बात आपने सही कही थी। उस बात ने मेरी नजर और नजरिया बदल दिया। उसे जरूर छापिए। और भी लोगों पर असर होगा। जरूर होगा।’

देवेन्द्र मेरा हमपेशा है। बीमा एजेण्ट। जन्मना ब्राह्मण तो है ही ‘ब्राह्मण-गर्व’ और ‘ब्राह्मणत्व’ के श्रेष्ठता-बोध का स्वामी भी है। ब्राह्मण संघ की गतिविधियों में अतिरिक्त उत्साह और ऊर्जा से, बढ़-चढ़कर भाग लेता है। ‘दुराग्रह’ की सीमा तक हिन्दुत्व का समर्थक होने के बावजूद, सम्भवतः स्कूल-कॉलेज के दिनों के  ‘शब्द-सम्पर्क’ का प्रभाव अब तक बना होने के कारण ‘कट्टर’ या ‘अन्ध’ नहीं है। कभी-कभार मेरे घर चला आता है तो कभी फोन कर मुझे बुला लेता है। कहता है-‘आपसे मिलना, बतियाना  अच्छा लगता है।’

अभी-अभी उसके साथ जोरदार और मजेदार वाकया हो गया। लेकिन वह वाकया सुनने से पहले यह वाकया जानना-सुनना जरूरी है।

मुझसे मिलने के लिए बाहर से आए दो कृपालुओं को मुझ तक पहुँचाने के लिए वह, वैशाख की चिलचिलाती गर्मी की एक दोपहर मेरे घर आया था। उन्हें बैठाकर, ठण्डा पानी पेश कर पूछा - ‘क्या लेंगे? चाय या शरबत?’ जवाब आया - ‘इस गर्मी में चाय तो रहने ही दें। शरबत पिला दीजिए।’ पर्दे के पीछे खड़ी मेरी उत्तमार्द्ध ने यह सम्वाद सुन ही लिया था। सो, आवाज लगाने या कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। थोड़ी ही देर में, शरबत के चार गिलास वाली ट्रे थमा गई। ग्लास देखकर देवेन्द्र ने मुँह बिगाड़ा। मानो मुँह में कड़वाहट घुल गई हो कुछ इस तरह बोला - ‘ये तो रुह अफजा है!’ मैंने कहा - ’हाँ। यह रुुह अफजा ही है।’ क्षुब्ध स्वरों में, मानो हम सबको हड़का रहा हो कुछ इस तरह  देवेन्द्र बोला - ‘मैं रुुह अफजा नहीं पीता।’ कारण पूछने पर बोला - ‘रुह अफजा बनाने वाला अपनी कम्पनी में हिन्दुओं को नौकरी पर नहीं रखता। इसलिए।’ बिना किसी बहस-मुबाहसा, देवेन्द्र के लिए नींबू का शरबत आ गया।   

न तो मुझे पता था और न ही खुद देवेन्द्र को कि दो ही महीनों बाद, उसका यह तर्क उसकी बोलती बन्द कर देगा। हुआ यूँ कि सावन के महीने में ब्राह्मण संघ ने एक अकादमिक आयोजन का जिम्मा देवेन्द्र को दे दिया। उसने भी खुशी-खुशी, आगे बढ़कर जिम्मा ले लिया।  आयोजन चूँकि अकादमिक था सो उसने व्याख्यान के लिए, बड़े ही सहज भाव से मजहर बक्षीजी को न्यौता दे दिया। उद्भट विद्वान् बक्षीजी मेरे कस्बे के कुशल और प्रभावी वक्ता हैं। अपनी विद्वत्ता और वक्तृत्व के कारण दूर-दूर तक पहचाने और बुलाए जाते हैं। कभी-कभी तो उनके कारण मेरा कस्बा पहचाना जाता है। बक्षीजी ने बड़ी ही सहजता से न्यौता स्वीकार कर लिया। देवेन्द्र ने यह खबर देते हुए मुझे भी आयोजन का निमन्त्रण दिया। मेरा जाना तय था किन्तु ‘मेरे मन कुछ और है, कर्ता के मन कछु और’ वाली उक्ति चरितार्थ हो गई। मैं नहीं जा पाया।

आयोजन की जानकारी मुझे अखबारों से मिली। उम्मीद से अधिक उपस्थिति थी। आयोजकों को तो आनन्द आया ही, बक्षीजी भी परम प्रसन्न हुए। याने, अयोजन उम्मीद से अधिक कामयाब रहा। तीन-चार दिनों बाद देवेन्द्र से मिलना हुआ। वह बहुत खुश था। आशा से अधिक सफल आयोजन के लिए ब्राह्मण समाज ने उसे अतिरिक्त धन्यवाद दिया था। उसका रोम-रोम पुलकित-प्रसन्न था। उसने विस्तार से आयोजन की जानकारी दी। किन्तु ब्यौरों का समापान करते-करते तनिक खिन्न हो गया - ‘कैसे-कैसे लोग हैं सरजी! कुछ लोग केवल इसलिए नहीं आए कि हिन्दू आयोजन में मुसलमान वक्ता क्यों बुला लिया। यह भी कोई बात हुई सरजी? भला ज्ञान और विद्वत्ता का जाति-धर्म से क्या लेना-देना?’ उसकी बात सौ टका ठीक थी। मैं कुछ कहने ही वाला था कि अचानक ही, बिजली की तरह मेरे मानस में ‘रूह अफजा’ कौंध गया। मेरी हँसी चल गई। देवेन्द्र को अच्छा नहीं लगा। असहज हो बोला - ‘क्यों? मैंने तो कायदे की बात कही थी। आप हँसे क्यों? ऐसा क्या कह दिया मैंने?’ अब मैं खुल कर हँसा। बोला - ‘क्या गलत किया उन्होंने? जिस आधार पर तुम रुह अफजा को खारिज करते हो उसी आधार पर उन्होंने बक्षीजी को खारिज किया। यदि तुम अपनी जगह सही हो तो वे भी अपनी जगह सही हैं और यदि वे गलत हैं तो तुम भी गलत हो। यदि ज्ञान और विद्वत्ता की कोई जाति-धर्म नहीं होता है तो शरबत की भी कोई जाति-धर्म नहीं होता। वह भी अपनी मिठास और शीतलता से ही जाना-पहचाना जाता है। तुम भी तो उसे धर्म के आधार पर अस्वीकार किए बैठे हो!’

देवेन्द्र को इस उत्तर की कल्पना नहीं थी। होती भी कैसे? खुद मुझे ही कहाँ थी? दो ही महीनों पहले दिया गया उसका तर्क बूमरेंग बनकर उसे ही आहत कर चुका था। अपने ही तीर का शिकार हो चुका था वह। पैमाने न तो दोहरे होते हैं न ही किसी के सगे। देवेन्द्र कसमसाता, अनुत्तरित बैठा रह गया। मानो मुँह पर लकवा मार गया हो। सब कुछ अकस्मात्, अनायास हो  वातावरण को बोझिल और असहज कर चुका था। मैं रस्मी राम-राम कर उठ आया।

नहीं जानता कि देवेन्द्र ने इस घटना को कैसे लिया होगा। यह भी नहीं जानता कि वह रुह अफजा पीना शुरु करेगा या नहीं। लेकिन मैं अनायास ही इतना भर जान गया कि हम सब भी अपने-अपने रुह अफजा तय किए बैठेे हैं - खुद को भरपूर रंगीनी, अकूत मिठास और गहरी शीतलता से दूर किए।
-----

धर्म: मेरा और पराया

सनातन और जैन धर्म से जुड़े कुछ संगठनों में सक्रिय मेरे कुछ मित्र इन दिनों मुझ पर कुपित और मुझसे नाराज हैं। वे लोग ईदुज्जुहा के मौके पर दी जाने वाली, बकरों की कुर्बानी के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान में मेरी भागीदारी चाहते थे। मैंने इंकार कर दिया। उनमें से एक ने मुझे हड़काते हुए पूछा - ‘आप बकरों की बलि के समर्थक हैं?’ मैंने कहा कि मैं केवल बकरों की बलि का ही नहीं, ऐसी किसी भी बलि-प्रथा का विरोधी हूँ। ऐसी किसी प्रथा को मैं न तो धर्म के अनुकूल मानता हूँ और न ही सामाज के। यदि कोई धर्म या समाज ऐसा करने की सलाह देता है तो मैं उस धर्म को धर्म नहीं मानता और न ही ऐसे समाज को समाज ही मानता हूँ। ऐसी परम्पराओं के समर्थक मुझे मनुष्य ही नहीं लगते। 

आज यदि सर्वाधिक अधर्म हो रहा है तो धर्म के नाम पर ही। धर्म के नाम पर किए किसी आह्वान का विरोध करना तो दूर, उससे असहमति जताना भी आज सर्वाधिक जोखिम भरा काम होग या है। ऐसे आह्वान के औचित्य पर जिज्ञासा जताना ही आपको धर्म विरोधी घोषित करने के लिए पर्याप्त है। और आप यदि स्थानीय स्तर पर कोई छोटे-मोटे ‘सेलिब्रिटी’ हैं तो आपके विरुद्ध वक्तव्यबाजी, नारेबाजी, और आपके निवास पर तोड़-फोड़ अवश्यम्भावी है। मैं ऐसी तमाम दुर्घटनाओं (या कहिए कि सार्वजनिक सम्मान) से बच गया। 

धर्म मेरे लिए कभी भी सार्वजनिक, सामूहिक विषय नहीं रहा। मैं पहले ही क्षण से इसे नितान्त व्यक्तिगत मामल मानता हूँ। मेरी सुनिश्चित धारणा है कि सामूहिक, सामाजिक या कि सांगठानिक धर्म कभी किसी का भला नहीं करता-न व्यक्ति का, न समाज का और न ही खुद का। ऐसे में बात यदि किसी समाज या धर्म से जुड़ी हो तो मेरी सुनश्चित धारणा है कि ऐसी किसी भी कुरीति या कुपरम्परा से मुक्ति का संघर्ष उस धर्म या समाज से जुड़े लोगों को ही करना पड़ता है। इसलिए, इदुज्जुहा पर बकरों की बलि बन्द करने को लेकर यदि कोई अभियान चलाया जाना है तो यह इस्लाम मतावलम्बियों द्वारा ही चलाया जाना चाहिए। मुझ जैसे बाकी लोग उनके समर्थन में मैदान में आ सकते हैं किन्तु आगे तो उन्हीं लोगों को आना पड़ेगा और आगे बने रहना भी पड़ेगा।

सनातन धर्म या कि हिन्दू धर्म की सती प्रथा, बाल विवाह, पशु बलि जैसी अनेक कुरीतियों, कुपरम्पराओं का विरोध करने के लिए इस धर्म के लोग ही सामने आए। दक्षिण भारत में चल रही ऐसी ही कुछ परम्पराओं का विरोध भी इस धर्म के ही लोग कर रहे हैं। वे लोग न्यायालय में भी जा रहे हैं। किसी धार्मिक परम्परा का विरोध जब उस धर्म से इतरधर्मी लोग करते हैं तो वह पहली ही नजर में अनुचित हस्तक्षेप होता है। इसीलिए मैंने इदुज्जहा पर दी जाने वाली, बकरों की बलि प्रथा के विरोधी अभियान से जुड़ने से मना कर दिया। 
मेरे इस जवाब पर मुझे हड़कानेवाले मित्र ने तृप्ति देसाई का हवाला दिया जिसने मुम्बई की बन्दर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई लड़ी और जीती। मैंने समझाने की कोशिश की कि तृप्ति का अभियान केवल हिन्दू या मुसलमान महिलाओं के लिए नहीं था। तृप्ति की लड़ाई, धार्मिक आधार पर महिलाओं के साथ किए जा रहे भेदभाव को लेकर थी। बन्दर मस्जिद से पहले वह शनि मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सफल-संघर्ष कर चुकी थी। इसीलिए बन्दर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उसके अभियान को धर्मिक हस्तक्षेप नहीं माना गया। 

जुलाई महीने में भी ऐसा ही हुआ था। स्कूली बच्चों को, मध्याह्न भोजन में अण्डा भी दिया जाता है। निस्सन्देह, अण्डा उन्हीं बच्चों को दिया जाता है जो अण्डा खाते हैं। जो बच्चे अण्डा नहीं खाते, उन्हें नहीं दिया जाता। मेरे हिसाब से यह अच्छी व्यवस्था है। मेरे कस्बे के अनेक लोगों को यह अच्छा नहीं लगता।  मैं खुद चूँकि मांसाहार विरोधी हूँ इसलिए मुझे भी अच्छा नहीं लगता। किन्तु दूसरे क्या खाएँ, यह निर्धारण भी नहीं करता। ‘जीव दया’ के पक्षधर कुछ लोग मेरे पास आए। वे स्कूलों में अण्डा दिए जाने पर प्रतिबन्ध लगवाने के अभियान में मेरी भागीदारी चाहते थे। मैंने विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। मैं अपना धर्म मानूँ, यह मेरी इच्छा। किन्तु सामनेवाला मेरा धर्म माने, यह आग्रह मैं भला कैसे कर सकता हूँ? मेरा धर्म और नियन्त्रण मुझ तक सीमित है। दूसरों पर अपना धर्म आरोपित करना या अरोपित करने का आग्रह करना ही अपने आप में अधर्म है। मैंने कहा-‘मैं खुद अण्डा नहीं खाता हूँ। खाऊँगा भी नहीं। किन्तु आपके अभियान में शरीक नहीं होऊँगा।’ वे नाराज होकर, मुझे नफरतभरी नजरों से देखते हुए लौटे। वे सब मुझे अधर्मी घोषित कर गए। मेरी हँसी चल गई। जो कृपालु मेरे पास आए थे, उनमें से तीन के परिजन मांसाहर करते हैं। यह बात वे खुद भी जानते हैं। वे अपने परिजनों से मांसाहार त्याग का आग्रह नहीं कर पा रहे। अपने राजनीतिक प्रभाव और वोट बैंक की राजनीति के तहत उन्होंने, मुख्यमन्त्री से आश्वासन हासिल कर लिया कि मेरे कस्बे के स्कूली बच्चों को अण्डा नहीं दिया जाएगा। वे सब खुश हैं किन्तु मुझे अभी भी यह अधार्मिक कृत्य ही लग रहा है।

कोई धर्म ऐसा नहीं है जिसमें कुछ न कुछ अनुचित, आपत्तिजनक न हो। इदुज्जुहा पर बकरों की बलि भी मुझे ऐसी ही एक अनुचित, आपत्तिजनक बात लगती है। मैंने अपने कुछ इस्लाम मतावलम्बी मित्रों से बात की थी। मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि उनमें से अधिकांश लोग इस कुर्बानी को अनुचित मानते हैं और इससे मुक्ति के लिए, समाज की जाजम पर अपने स्तर पर, जूझ रहे हैं। इसके साथ ही साथ यह भी मालूम हुआ कि मुहर्रम के अवसर पर ताजिये निकालने के विरोध में भी एक अभियान मुसलमानों में चल रहा है। इस अभियान के समर्थकों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे सारे लोग आपस में मिलकर एक काम लगातार कर रहे हैं-निराश होकर, थककर न बैठने का। वे सब जानते हैं कि ऐसे बदलाव आसानी से, जल्दी नहीं आते। धर्मान्धता और कट्टरता आसानी से छूटनेवाले व्यसन नहीं। इनसे मुक्ति पाने में पीढ़ियाँ खप जाती हैं। तीन तलाक के विरोध में उठनेवाली आवाजें मुसलिम समुदाय में आज बढ़ती भी जा रही हैं और अधिक प्रगाढ़ भी होती जा रही हैं। किसी (इस्लाम मतावलम्बी) ने कभी सोचा था कि महिलाएँ अपना खुद का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनाएँगी? लेकिन हम देख रहे हैं आज यह संस्था अस्तित्व में आ गई है। 

दरअसल, गुलामी से मुक्ति के अभियान का विचार किसी गुलाम के मन में ही आ सकता है। वही ऐसा कोई मुक्ति अभियान चला सकता है है क्यों उसमें अनुभूत सचाई का ताकत होती है। वह लड़ाई बनावटी नहीं, सौ टका ईमानदार होती है। उसमें मुक्ति की छटपटाहट होती है, किसी के प्रति नफरत नहीं होेती। और इतिहास गवाह है कि ईमानदारी और प्रेम से चलाए अभियान अपनी मंजिल तक पहुँचते हैं।
-----
(भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ के दिनांक 15 सितम्बर के अंक में छपा)