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गाँधी का नाम और गाँधी टोपी पर्याप्त नहीं

‘विचार’ का वृत्ति में आना, ‘वैचारिकता’ होता होगा और यही वैचारिकता जब मनुष्य के आचरण में उतर आती है तभी वह आदमी की पहचान होती है। इसीलिए केवल ‘विचार’ या ‘वैचारिकता’ की पर्याप्त नहीं होती। इन दोनों का अन्तरण, आचरण में हुए बिना ये दोनों अमूर्त ही रह जाते हैं। इनकी वास्तविकता का अनुभव या कि इनका परीक्षण एक ही दशा में सम्भव हो पाता है और वह दशा होती है - ‘आचरण।’ आचरण के बिना कोई भी विचार या वैचारिकता खोखले नारे से अधिक नहीं होती।
 
यह अनुभूति मुझे आज सुबह-सुबह, चम्पारण आन्दोलन में गाँधी के व्यवहार को पढ़कर हुई। इसी के समानान्तर मुझे अण्णा जैसे उन तमाम लोगों की विफलताएँ समझ में आई जो गाँधी के नाम की दुहाई देकर और गाँधी प्रतीकों को धरण कर, ताल ठोक कर मैदान में उतरते हैं लेकिन देर तक ठहर नहीं पाते। वे फैशन के एक दौर की तरह, कुछ देर परिदृष्य पर दिखाई देते हैं - केवल अगले दौर के आने तक।
 
चम्पारण में गाँधी का लक्ष्य था - ‘रोगी को नहीं, रोग को मारना।’ रोगी थे - अंग्रेज नीलगर और रोग था - नील की खेती की अनिवार्यतावाला कानून। एक बीघा जमीन में कम से कम तीन कट्ठा जमीन में नील की खेती करने
की अनिवार्यता का कानून अंग्रेजों ने चम्पारण के किसानों पर लाद रखा था। इसका पालन कराने में अंग्रेज लोग मनुष्यता भूल कर पाशविक क्रूरता/नृशंसता बरतते थे। अंग्रेज नीलगरों के बंगलों के बाहर मजबूत बाड़े बने हुए थे जिनमें चम्पारण के किसानों को, पशुओं की तरह कैद रखा जाता था - नील की खेती करने से बचने के लिए वे, कहीं भाग न जाएँ। चम्पारण के त्रस्त किसानों ने गाँधी से  गुहार लगाई। गाँधी ने रोग पहचाना और इसी के निर्मूलन को लक्ष्य बनाया।
 
इस हेतु वे निमत्ति मात्र बने। मुख्य भूमिका चम्पारण के शिक्षित लोगों और किसानों ने ही निभाई। पीड़ित किसानों की संख्या थी लगभग चार हजार। गाँधी ने तय किया - ‘प्रत्येक किसान का आवेदन प्रस्तुत किया जाएगा।’ गाँधी के नेतृत्व में ये सब लोग दिन-रात लिखा-पढ़ी में लगे रहते। संख्या की अधिकता के चलते, लिखा-पढ़ी में चौबीस घण्टे भी कम अनुभव होते थे। लेकिन गाँधी ने यह असम्भवप्रायः काम करवा ही लिया।
अंग्रेज सरकार को अन्ततः बात सुननी पड़ी। नील-कानून की समीक्षा हेतु सात लोगों की समिति बनाई गई। इस समिति में किसानों का एक ही प्रतिनिधि था - गाँधी। शेष 6 प्रतिनिधि या तो अंग्रेज सरकार के थे या अंग्रेज नील व्यापारियों (नीलगरों) के। अंग्रेज-बहुल इस समिति ने नील की खेती करने की अनिवार्यता समाप्त करने की सिफारिश की। चौंकानेवाली और उल्लेखनीय बात थी - यह सिफारिश बहुमत से नहीं, ‘सर्वानुमति’ से की गई थी।
 
हवाओं में एक ही सवाल था - यह कैसे हुआ? जवाब गाँधी ने दिया - ‘मेरा मकसद रोग को मारना था, रोगी को नहीं। रोग था - नील की खेती करने की अनिवार्यता। यदि मैं अंग्रेज नीलगरों के अत्याचारों पर कार्रवाई करने और उन्हें सजा देने की बात करता तो न तो उन्हें सजा मिलती और न ही यह अनिवार्यता खत्म होती।’
 
यही वह बिन्दु है जहाँ से, गाँधी की दुहाइयाँ देनेवाले और गाँधी प्रतीकों को सजावट की तरह इस्तेमाल करनेवाले, अण्णा और उन जैसे तमाम लोगों की विफलताओं की त्रासदियों के कारण साफ नजर आने लगते हैं।
 
इन सबने ‘व्यक्तियों’ को निशाने पर लिया, ‘वृत्ति’ को नहीं। रोग को नहीं, रोगियों को मिटाना चाहा। अण्णा जब गर्वपूर्वक सूचित करते हैं कि उन्होंने इतने-इतने मन्त्रियों की कुर्सियाँ छीन लीं तो लगता है, वे अपनी उपलब्धियाँ नहीं, अपनी हीन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की मसालेदार, मनोरंजक कथाएँ सुना रहे हैं। ऐसा करते हुए वे भूल जाना चाह रहे होते हैं कि इने-गिन भ्रष्टों को हटा देने के बाद भी भ्रष्टाचार तो जस का तस बना हुआ है। ऐसे में, वे यह भी भूल जाते हैं कि एक व्यक्ति की विफलता, उद्वेलित-आन्दोलित जन-मेदिनी की विफलता में बदल गई है। करोड़ों लोगों की आशाएँ/अपेक्षाएँ, अपने पहले ही चरण में काल-कवलित हो गई हैं।
 
‘विचार’ जब ‘नारा’ और ‘वैचारिकता’ ‘जुगली का चारा’ बना ली जाए, आचरण जब प्रदर्शन के प्रतीकों बदल लिया जाए और ‘रोग’ को मारने का अभियान ‘रोगी’ को मारने के अभियान में बदल जाए तो वही सब होता है जिसे आज हम सब भुगत रहे हैं।
 
गाँधी, इसलिए प्रासंगिक नहीं, अनिवार्य और अपरिहार्य हैं।

अण्णा को पता तो चले

भ्रष्टाचार के प्रति हमारी मानसिकता का सामान्य उदाहरण है यह।

शुक्रवार शाम साढ़े चार बजे मैं, भारत सरकार के एक उपक्रम के स्थानीय कार्यालय पहुँचा। सन्नाटा छाया हुआ था। कर्मचारियों के बैठनेवाला पूरा हॉल खाली था। पंखे चल रहे थे और बत्तियाँ जल रही थीं। कार्यालय प्रबन्धक और उनके दो सहायक, प्रबन्धक के कमरे में बैठे कागज निपटा रहे थे। दूर, एक कोने में, चतुर्थ श्रेणी के दो कर्मचारी, माथा झुकाए कागजों के ढेर में उलझे हुए थे। नगद लेन-देन का समय यद्यपि समाप्त हो चुका था किन्तु शायद हिसाब बराबर मिला नहीं होगा, सो खजांची अपने पिंजरे में बैठा कभी रुपये गिन रहा था तो कभी सामने रखे कागज पर लिखे आँकड़े देख रहा था। पूरे कार्यालय में सन्नाटा पसरा हुआ था। कुल जमा 6 लोग कार्यालय में थे किन्तु कोई भी आपस में बात नहीं कर रहा था। सब, अपने-अपने काम में लगे हुए थे।

अनुमति लेकर कार्यालय प्रभारी के कमरे में गया। पूछताछ के जवाब में मालूम हुआ कि सारे कर्मचारी अपने एक सहकर्मी के परिवार में हुई मौत पर शोक प्रकट करने गए हैं। यह पूछने का कोई अर्थ नहीं था कि वे वापस काम पर लौटेंगे भी या नहीं? स्पष्ट था कि कार्यालय का समय भले ही शाम सवा पाँच बजे तक का है किन्तु सबके सब, शोक संतप्त परिवार को साँत्वना बँधा कर अपने-अपने घर चले जाएँगे। अगले दिन शनिवार है - अवकाश का दिन। सो, अब मेरे काम के बारे में सोमवार को ही कुछ मालूम हो सकेगा। मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। बुझे मन से लौट आया।

इस कार्यालय में मेरा आना-जाना बना रहता है। इतना कि, अण्णा हजारे के समर्थन में जब इस कार्यालय के कर्मचारियों ने जुलूस निकाला तो उन्होंने मुझसे भी शरीक होने का आग्रह किया। मैं भी राजी-राजी शरीक हुआ। जुलूस में केवल पुरुष कर्मचारी थे। महिला कर्मचारी शरीक नहीं हुईं। जुलूस में शामिल सारे कर्मचारियों ने ‘मैं अण्णा हूँ’ वाली सफेद टोपियाँ पहन रखी थीं। उन्होंने लाख कहा किन्तु मैंने टोपी नहीं पहनी। कोई आधा किलोमीटर घूम कर जुलूस समाप्त हुआ तो भाषणबाजी हुई। मैंने भी अण्णा के समर्थन में भाषण दिया और सराहना पाई।

वे ही सारे के सारे, लगभग पचीस कर्मचारी, निर्धारित समय से पौन घण्टे पहले कार्यालय से तड़ी मार कर, अपने सहकर्मी के शोक में शरीक होने का अपना व्यक्तिगत फर्ज निभाने चले गए थे। किसी ने अनुभव करने की कोशिश नहीं कि वे आम आदमी के समय पर डाका डाल कर अपनी व्यावहारिकता निभा रहे हैं। किसी ने नहीं सोचा कि इस पौन घण्टे में, अपना काम लेकर आनेवाले लोगों को कितना कष्ट होगा? किसी ने नहीं सोचा कि प्रत्येक कर्मचारी के इस पौन घण्टे का भुगतान, उन लोगों ने किया है जिन्हें इन कर्मचारियों की अकस्मात अनुपस्थिति के कारण अपने काम के लिए अड़तालीस घण्टों की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

सारे कर्मचारियों को पता था कि मृत्यु वाले परिवार ने अगले दिन, शनिवार शाम पाँच बजे उठावना (तीसरे की बैठक) रखा है। किन्तु उस दिन तो छुट्टी है! सबको अपने-अपने काम निपटाने हैं। काम नहीं हो तो भी इस काम के लिए अलग से समय निकालना, तैयार होना, अपने घर से, अपना समय नष्ट करके आना पड़ेगा! कौन करे और क्यों करे यह सब? इसलिए, शुक्रवार को ही हो आया जाए और वह भी आम आदमी के पौन घण्टे पर डाका डाल कर, उसके काम, कार्यालय में अधूरे छोड़ कर। सवा पाँच बजे तक की प्रतीक्षा कौन करे और क्यों करे? वह समय तो अपने-अपने घर जाने का होता है! शोक प्रकट करना जितना जरूरी, उससे अधिक जरूरी है - समय पर अपने घर पहुँचना। आज तो और जल्दी पहुँच जाएँगे। शायद सवा पाँच बजे तो घर लग जाएँगे।


इन सबने अण्णा के समर्थन में जुलूस निकाला था। भ्रष्टाचार के विरोध में और अण्णा के समर्थन में जोर-शोर से नारे लगाए थे। सबने सफेद टोपियाँ पहनी थीं जिन पर लिखा था - मैं अण्णा हूँ।

अपनी यह करनी इनमें से किसी को भ्रष्टाचार नहीं लगी होगी। लगे भी कैसे? भ्रष्टाचार तो केवल आर्थिक होता है और आर्थिक भी वह जो नेता, अधिकारी, बड़े लोग करते हैं। इन्होंने तो एक पाई का भी भ्रष्टाचार नहीं किया। कर भी कैसे सकते हैं? ये तो सबके सब खुद ही अण्णा जो हैं!

अण्‍णा का अधूरा आह्वान

कोई सप्ताह भर की, हाड़-तोड़, शरीर को निचोड़ देनेवाली भागदौड़भरी व्यस्तता से मुक्त हो आज शाम बुद्धू बक्सा खोला तो पहला ही समाचार देखकर हतप्रभ रह गया। विभिन्न समाचार चैनलों में, नीचे पट्टी में बताया जा रहा था कि अण्णा ने, मतदाताओं से, हिसार लोकसभा उपचुनाव में फौरन ही और पाँच प्रदेशों के विधान सभा चुनावों में, संसद के शीतकालीन सत्र के बाद, स्थिति अनुसार, काँग्रेस को वोट न देने का आह्वान किया है। लगा कि समाचार को संक्षिप्त रूप में देने की विवशता के अधीन समाचार आधा ही दिया गया है। अत्यधिक अधीरता से एक के बाद एक, मेरे बुद्धू बक्से पर उपलब्ध, हिन्दी-अंग्रेजी के तमाम समाचार चैनल देख मारे किन्तु समाचार इतना ही था। थोड़ी देर में दो-तीन चैनलों पर अण्णा को यही आह्वान करते देख भी लिया। वहाँ भी बात काँग्रेस को वोट न देने तक ही सीमित रही।

अण्णा का यह आह्वान मुझे न केवल अधूरा और नकारात्मक अपितु उनके आन्दोलन के लिए सांघातिक लग रहा है। काँग्रेस को वोट न देने की अपील तो अपनी जगह ठीक है किन्तु यह नहीं बताया गया कि काँग्रेस को वोट न दें तो फिर किसे दें। यदि विकल्प नहीं सुझाया जा रहा है तो यह आह्वान सवालों के घेरे में आ जाएगा। होना तो यह चाहिए था कि अण्णा-समूह, मतदाताओं को बताता कि फलाँ-फलाँ उम्मीदवार अथवा पार्टी ने, अण्णा-समूह के जनलोकपाल को शब्दशः समर्थन दिया है, इसलिए उसे ही वोट दें। किन्तु विकल्प नहीं बताया जा रहा है और केवल काँग्रेस को वोट न देने का आह्वान किया जा रहा है। इस ‘अनकही’ का सन्देश तो यही जाएगा कि काँग्रेस को धूल चटा कर, उसके निकटतम प्रतिद्वन्द्वी दल को विजयी बनाया जाए।


उधर, किरण बेदी को यह कहते हुए प्रस्तुत किया गया कि भाजपा और लोक दल ने,

अण्णा-समूह के जनलोकपाल के पक्ष में पत्र दे दिए हैं। किन्तु ये दोनों पत्र सार्वजनकि नहीं किए जा रहे हैं। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा में सुषमा स्वराज घोषित कर चुकी हैं कि अण्णा के जनलोकपाल के अनेक बिन्दुओं से भाजपा सहमत नहीं है।

अण्णा, काँग्रेस को वोट न देने का आह्वान अवश्य करें किन्तु अपनी निष्पक्षता और सदाशयता जताने के लिए उन्हें किसी विकल्प (यह विकल्प कोई पार्टी भी हो सकती है और/या अलग-अलग दलों के अलग-अलग उम्मीदवार भी) का सुझाव भी अवश्य देना चाहिए। ऐसा न होने पर एकमेव निष्कर्ष यही निकलेगा कि अण्णा-समूह निश्चय ही किन्हीं निहित राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति में सीधे-सीधे सहायक हो रहा है।


यदि यह आह्वान यूँ ही अधूरा बने रहने दिया गया तो आज भले ही काँग्रेस को पराजित करवा कर अण्णा-समूह आत्म-सन्तुष्ट होकर उत्सव मना ले। किन्तु इसके साथ ही अण्णा के आन्दोलन की निष्पक्षता और सदायता संदिग्ध ही नहीं अविश्वसनीय हो जाएगी। उस दशा में यह,एक मजबूत जन आन्दोलन के निराशाजनक अन्त का कारुणिक आरम्भ होगा।


मैं इस कल्पना मात्र से ही भयभीत हूँ। मैं अण्णा को असफल होते नहीं देखना चाहता।

भ्रष्टाचार: एक अण्णा बनाम चार ‘ना’

अण्णा ने तो सब गुड़ गोबर कर दिया। उनके चाहनेवाले और प्रशंसक हम चार बूढ़ों को तो उन्होंने निराश कर ही दिया यह कहकर कि उनके जन लोकपाल मसवदे के शब्दशः लागू होने के बाद भी कम से कम 35-40 प्रतिशत भ्रष्टाचार तो बना ही रहेगा। इस 35-40 प्रतिशत भ्रष्टाचार का आयतन और घनत्व, समाप्त होनेवाले 60-65 प्रतिशत भ्रष्टाचार के मुकाबले अधिक हुआ तो? तो फिर यह ताण्डव और उठा-पटक क्यों और किसलिए?

दादा से नीमच में और जीजी से (निम्बाहेड़ा से मंगलवाड़ के रास्ते पर स्थित) निकुम्भ में मिलने के लिए इसी रविवार को कोई चार सौ किलोमीटर की यात्रा की। दादा के साथ कच्चा-पक्का एक घण्टा बिताया। दादा ने मेरी उदासी का कारण जानकर मुझे ढाढस बँधाते हुए कहा - ‘‘मेरा शब्द चयन अटपटा हो सकता है किन्तु तू समझने की कोशिश करना कि मन्दिरों की बहुलता और ‘सबका काम छोड़कर मेरा काम सबसे पहले हो’ की मानसिकतवाले नागरिकों के देश में भ्रष्टाचार कैसे समूल नष्ट हो सकता है?’’ बात ‘बाउंसर’ की तरह सनसनाती हुई मेरे सर के ऊपर से गुजर गई और मैं अकबकाया, बौड़म की तरह दादा की ओर देखने लगा। दादा ने कहा - ‘नहीं! मैं और कुछ नहीं कहूँगा। तू खुद ही इन दोनों बातों का भाष्य और व्याख्या करने और मन ही मन समझने की कोशिश करना।

आज चौथा दिन है। ज्यों-ज्यों सोच रहा हूँ, त्यों-त्यों दोनों सूत्र वाक्य मानो अपना-अपना बखान खुद करने लगे। पहली नजर में देखूँ तो भला, मन्दिरों का भ्रष्टाचार से क्या वास्ता? लेकिन एक बिजली कौंधी और बात ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ की तरह दाने-दाने बिखर कर खुलती गई।

मन्दिर याने देवालय, हमारे देवताओं, आराध्यों, इष्टों का निवास स्थान। मनुष्यों की बस्ती में वह स्थान जहाँ खुद ईश्वर रह रहा हो। ईश्वर याने वह अजर, अमर, अगम, चिरन्तन तत्व जो सारी दुनिया को देता ही देता हो, जिसके यहाँ कोई कमी नहीं, जिसे मनुष्य की भक्ति-भावनाओं के सिवाय और किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं। मनुष्य यह भी न दे तो भी ईश्वर खिन्न/कुपित नहीं होता। सस्मित, दोनों हाथों से मनुष्य को असीसता रहता है, अपना कृपा-प्रसाद अनवरत लुटाता रहता है। लेकिन मनुष्य ने अपनी कमजोरी, अपनी लोलुपता ईश्वर पर थोप दी - अपनी मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए चढ़ावा चढ़ाने लगा। किसे? जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, उसी ईश्वर को। चढ़ावा किस बात का? तू मेरा यह काम कर दे, मैं तेरी कथा करवाऊँगा, तेरे मन्दिर में सोने/चाँदी का छप्पर चढ़ाऊँगा आदि-आदि। यह चढ़ावा क्या है? यह चढ़ावा कभी-कभी अग्रिम होता है तो कभी-कभी काम हो जाने के बाद। ईश्वर और मनुष्य के सम्पर्क सेतु के रूप में पण्डितजी विराजमान रहते हैं। उन्हीं के मुँह से हमें भगवान बोलता अनुभव होता है और उसी के माध्यम से हमारी बात ईश्वर तक पहुँचती है।

यही सब और ऐसा ही कुछ-कुछ सोचते-सोचते अनायास ही याद हो आए हमारे लोक कुम्हार के चाक पर गढ़े गए तीन शब्द - नजराना, शुकराना और जबराना। इन तीन शब्दों में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का संसार समाया हुआ है। ‘नजराना’ याने मुझे याद रखने की, जरूरत पड़ने पर मेरा काम सर्वोच्च प्राथमिकता से करने के लिए एडवांस बुकिंग। यादों की अपनी कोठरी को तनिक झाड़ेंगे-बुहारेंगे तो अनायास ही, ‘मिठाई’ के लिए नोटों की गड्डियाँ लेकर उन्हें ड्राअर में रखते हुए लक्ष्मण बंगारू याद आ जाएँगे। ‘तहलका’ के स्टिंग ऑपरेशन के तहत यह ‘नजराना’ ही था। ‘शुकराना’ याने आपने मेरा काम कर दिया। आपको धन्यवाद। मेरी ओर से यह छोटी सी (या जो तय हुई थी, वह) भेंट स्वीकार करें।

मन्दिरों का चढ़ावा इन दो श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी में आता है। राजस्थान के प्रख्यात तीर्थ क्षेत्र ‘साँवरियाजी’ में तो डकैत और तस्कर मनौतियाँ लेकर जाते हैं और अभियान सिद्ध होने पर भगवान का हिस्सा दान पेटी में डाल जाते हैं। यहाँ की दान पेटी में से अफीम निकलने के समाचार आए दिनों अखबारों में पढ़ने को मिल जाते हैं। तिरुपति की दान पेटियाँ जो समृद्धि उगलती हैं उनकी गणना और मूल्यांकन करने के लिए तो तिरुमला देवस्थान ट्रस्ट ने एक पूरा विभाग ही बना रखा है। कहने की जरूरत नहीं कि वह सब या तो नजराना है या शुकराना। कोई ताज्जुब नहीं कि तिरुपति का वार्षिक बजट गोवा, झारखण्ड, उत्तराखण्ड जैसे किसी छोटे राज्य के वार्षिक बजट के बराबर बैठ जाए!

नजराना और शुकराना में तो फिर भी, ‘प्रसन्नता का भाव’ रहता है किन्तु तीसरा ‘ना’ याने ‘जबराना’ कम से कम एक पक्ष को तो दुखी करता ही है। ‘जबराना’ सुनते ही हममें से प्रत्येक को किसी न किसी नेता, अधिकारी, कर्मचारी का चेहरा याद आ जाएगा। ये भी किसी भगवान से कम नहीं। सरकारी मन्दिरों में बैठे भगवान। तीर्थ क्षेत्रों के पण्डे/पुजारी भी इसी श्रेणी में शामिल होने की आधिकारिक पात्रता रखते हैं। जरा, दिलीप कुमार, संजीव कुमार, वैजयन्तीमाला अभिनीत फिल्म ‘संघर्ष’ को याद करें जिसमें यजमान से वसूली के लिए पण्डे हत्या करने में भी चूकते। गोया, ‘जबराना’ न केवल दुखी कर सकता है अपितु प्राण भी ले सकता है। माँगी गई रिश्वत की रकम जुटाने में असमर्थ लोगों द्वारा आत्महत्या करने के समाचारों की संख्या और आवृत्ति साल-दर-साल बढ़ रही है।

चौथे ‘ना’ का नामकरण मैंने किया है और तुकबन्दी मिलाने के लिए यह ‘ना’ मैंने ठेठ मालवी बोली से लिया है - ‘छानामाना’ जिसके लिए आप हिन्दी में ‘गुपचुप’ या फिर ‘चुपचाप’ प्रयुक्त कर सकते हैं। इस चौथे ‘ना’ को हम सब, चौबीसों घण्टे पालते-पोसते रहते हैं, अनजाने में भी। कर चोरी, मोल में भी मारना और तोल में भी मारना, बताना कुछ और बेचना कुछ आदि-आदि रूपों में यह ‘छानामाना’ विद्यमान रहता है।

साल में पाँच-सात बार मैं भी इस ‘छानामाना’ में शरीक होता हूँ। जब-जब भी भाड़े की टैक्सी लेकर जाता हूँ, तब-तब हर बार इस ‘छानामाना’ में भागीदारी करता हूँ। सारी की सारी टैक्सियाँ, निजी कारें होती हैं। एक भी कार का पंजीयन टैक्सी के रूप में नहीं होता। एक की भी नम्बर प्लेट पीली नहीं होती। टैक्सी में रजिस्ट्रेशन कराओ तो दुगुना/तिगुना टैक्स देना पड़ेगा और ड्रायवर भी ‘वाणिज्यिक लायसेंसधारी’ होगा। वह भी अपने आप में अलग से खर्चा माँगता है। सो, सब कुछ ‘छानामाना’ चल रहा है।

दादा से मिले दो सूत्रों पर हुए इस निठल्ले चिन्तन ने अण्णा के वक्तव्य से उपजा मेरा संत्रास कम कर दिया। अब अण्णा असफल भी हो जाएँ तो कष्ट नहीं। अण्णा का बेचारा एक ‘ना’ और उधर एक साथ चार-चार ‘ना’ और चारों में से प्रत्येक ‘ना’ अण्णा के इकलौते ‘ना’ पर भारी! आखिर बेचारा ‘एक ना’ कब तक ‘चार ना’ से जूझेगा?

अब मैं बेफिकर हूँ। ‘अण्णा तुम संघर्ष करो’ वाले नारे का अर्थ मुझे अब समझ पड़ा। हे! अण्णा!! केवल ‘तुम’ संघर्ष करो। हम नहीं करेंगे। हम तो केवल साथ रहेंगे। तुम अपने इकलौते ‘ना’ के साथ मरो-मिटो। हम अपने चारों ‘ना’ के साथ राजी-खुशी रहेंगे।

तीन सौ की जगह केवल तीस!

मेरे कस्बे (रतलाम) में, भारतीय जीवन बीमा निगम के तीन शाखा कार्यालय हैं जिनके अभिकर्ताओं और कर्मचारियों की सकल संख्या लगभग 900 है।


गुरुवार की सुबह जब मैं अपने शाखा कार्यालय पहुँचा तो मुझे बताया गया कि शाम सवा पाँच बजे, तीनों शाखाओं के कर्मचारी और अभिकर्ता, अण्णा हजारे के समर्थन में पहले तो हमारे शाखा कार्यालय के सामने एकत्र होकर नारे लगाएँगे और बाद में जुलूस की शकल में, धरना स्थल पर पहुँच कर सभा करेंगे।

मैं निर्धारित समय से पन्द्रह मिनिट पहले ही पहुँच गया। सवा पाँच बजते-बजते लोगों का आना शुरु तो हुआ किन्तु संख्या उत्साहजनक नहीं थी। नारेबाजी शुरु करने से लेकर जुलूस की शकल में रवाना होने तक हम लोग मुश्किल से तीस की संख्या तक ही पहुँच पाए।


नारे लगाते हुए हम लोग दो बत्ती पर बने धरना स्थल पर पहुँचे और थोड़ी सी देर के लिए छोटी सी सभा की। मुझे भी बोलने का अवसर दिया गया।


मैं अत्यधिक उत्साहित होकर पहुँचा था किन्तु मेरा उत्साह बहुत देर तक नहीं टिक पाया। हमारी संख्या अधिक होनी चाहिए थी - कम से कम तीन सौ तो होनी ही चाहिए थी।


लेकिन कोई क्या कर सकता है? जबरन तो किसी को लाद कर नहीं लाया जा सकता!


मेरी हाँडी का यह चाँवल अच्छी दावत के संकेत नहीं दे रहा। मैं दुःखी हूँ।

यह अनूठा स्वर्ण पदक

सोलह अगस्त का मेरा दिन बहुत खराब रहा। नींद तो जल्दी खुल गई थी किन्तु बुद्धू बक्सा खोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सरकारों के चाल-चलन को थोड़ा-बहुत जानता हूँ। आशंका लग रही थी सूर्योदय से पहले ही अण्णा और उनके साथियों को पकड़ न लिया हो। लेकिन अपने आप को कब तक धोखा देता? हिम्म्त करके, आठ बजे बुद्धू बक्सा खोला तो समाचार जाना कि सुबह 7.25 पर अण्णा को पुलिस घर से उठा ले गई। जी खट्टा हो गया। एकाएक ही माथा चढ़ने लगा, आँखें भारी होने लगी, कनपटियाँ चटखने लगीं और जी मिचलाने लगा। लगा, चक्कर खाकर गिर पड़ूँगा। देर तक बुद्धू बक्सा नहीं देख सका।

अत्यधिक कठिनाई से, मानो खुद से जबरदस्ती कर रहा होऊँ, नित्य-कर्म से निवृत्त हुआ। स्नानोपरान्त ठाकुरजी के सामने बैठा तो पूजा-पाठ में मन लगा ही नहीं। मंगलवार था। सुन्दरकाण्ड पाठ करना था। लेकिन नहीं किया। कर पाना सम्भव ही नहीं हुआ।दस बीस पर उत्तमार्द्ध को नौकरी पर छोड़ा। वहाँ से मुझे अण्णा के समर्थन में धरनास्थल पर जाना था। जलजजी (आदरणीय श्रीयुत डॉक्टर जय कुमार जलज) से तय हुआ था कि हम दोनों साथ जाएँगे। जलजजी मेरे कस्बे में खरेपन का प्रतीक हैं। उनकी उपस्थिति किसी भी जमावड़े का न केवल सम्मान बढ़ाती है अपितु उसकी पवित्रता और विश्वसनीयता भी प्रमाणित करती है। किन्तु जलजजी ने कहा था - ‘पहले देखिएगा कि आयोजन किसके नियन्त्रण में है, आयोजक कौन है। ठोक बजा कर देखकर फिर मुझे बताइएगा। उसके बाद ही धरने पर बैठने पर विचार करेंगे।


धरनास्थल जाकर देखा तो निराशा हुई। साधनों की शुचिता वहाँ थी ही नहीं। मैंने जलजजी को विसतार से बताया तो खिन्न हो गए। बोले - ‘ऐसे लोगों के साथ बैठना तो क्षण भर को भी उचित नहीं। भगवान अण्णा की रक्षा करे।’ मैंने पूछा - ‘तो बताएँ, क्या करना है?’ जलजजी ने अत्यधिक दुःखी मन से कहा - ‘अपने-अपने घर में ही बैठ कर प्रभु स्मरण करें और अण्णा के लिए प्रार्थना करें। वैसे, आप क्या कहते हैं?’ मैंने कहा - ‘विवेक कहता है कि आपकी बात मान लूँ और हृदय कहता है कि जाकर बैठ जाऊँ।’ जलजजी ने उसी खिन्न स्वर में कहा - ‘निर्णय तो आप ही करें किन्तु विवेकसंगत निर्णय बेहतर और श्रेयस्कर होते हैं।’ लिहाजा, मैं दूर से देखकर ही लौट आया। एक छोटी सी रकम लेकर गया था। एक परिचित के हाथों, आयोजकों तक पहुँचाई और हसरत भरी नजरों से देखता हुआ, ‘दुःखी-मन, खिन्न वदन’ लौट आया।
लौट तो आया किन्तु मन उचटा रहा। माथा जस का तस चढ़ा हुआ था, आँखों का भारीपन, कनपटियों का चटखना और जी मिचलाना यथावत् बन हुआ था। दो बजे से, हमारी शाखा के बीमा अभिकर्ताओं की एक बैठक थी। वहाँ पहुँचा तो सही किन्तु मन कहीं और था। ऐसी बैठकों में मैं सबसे आगे, पहली पंक्ति में बैठता हूँ। किन्तु आज सबसे पीछे बैठा। सब कुछ भारी-भारी था, अनमनपना बना हुआ था, मन की उदासी तनिक भी कम नहीं हो रही थी। साढ़े चार बजे के आसपास वहाँ से निकल भागा। उत्तमार्द्ध को लिया। उन्हें कुछ खरीदी करनी थी। उन्हें बाजार ले गया। वे खरीदी में व्यस्त हुईं और मैं लस्त-पस्त दशा में दुकान में पसर गया। जी का मिचलाना अब घबराहट में बदल गया था। मुझे अपनी धड़कन की गति और आवाज तेज होती लगने लगी। लगा, यहाँ से उठ नहीं पाऊँगा। मेरी दशा देख दुकानदार घबरा गया। उसने तबीयत की पूछताछ की, पानी की मनुहार की। मैंने संकेतों से ही मना किया। उसकी घबराहट और बढ़ गई। बोला - ‘बाबूजी! आपको घर पर छोड़ दूँ?’ मेरी आँखें खुलने से मना कर रही थीं। मैंने हाथ से इशारा किया - नहीं। तब तक मेरी उत्तमार्द्ध अपनी खरीदी पूरी कर चुकी थीं। मैं उठने लगा तो बोली - ‘कुछ देर और रुकिए। मैं सब्जी भी खरीद लूँ।’ मैंने तत्क्षण मना कर दिया और कहा - ‘फौरन घर चलिए। मुझे अच्छा नहीं लग रहा। आपको छोड़ कर डॉक्टर साहब के पास जाऊँगा।’ वे घबरा गईं। चलने से पहले मैंने कैलाश शर्मा को फोन किया। वह अभिकर्ताओं की बैठक में ही था। उससे कहा - ‘बैठक खत्म होते ही मेरे घर पहुँचो। मेरी तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर के पास चलना है।’ उत्तमार्द्ध को लेकर घर पहुँचा और डॉक्टर सुभेदार साहब के सहायक डॉक्टर समीर को फोन लगाया। मेरी दशा सुनते ही बोले - ‘फौरन आ जाईए। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ।’ तब तक कैलाश भी पहुँच गया।


मुझे बिलकुल ही अच्छा नहीं लग रहा था। डॉक्टर के पास अकेले जाने का आत्म विश्वास नहीं था। कैलाश के साथ अस्पताल पहुँचा। डॉक्टर सुभेदार साहब और डॉक्टर समीर को कुछ कहता, उससे पहले ही डॉक्टर समीर ने कहा - ‘हजारेजी की गिरफ्तारी का तनाव ले बैठे हैं?’ हाँ करने की हिम्मत नहीं हुई और इंकार कर पाना मुमकिन नहीं था। सुभेदार साहब ने मेरी जाँच-परख की। दो बार रक्त-चाप जाँचा और कहा - ‘आपको तो हाई बीपी है!’ पूछने पर बताया - 150/120. इस बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं है। अपनी ओर मुझे ताकता देख सुभेदार साहब बोले - ‘ऊपरवाला 150 दुखदायी नहीं है किन्तु नीचेवाला 120 तो चिन्ताजनक है। आप लापरवाही बिलकुल मत बरतिएगा।’ उन्होंने ईसीजी भी हाथों-हाथ करवाया। रिपोर्ट देखी तो बोले - ‘आपकी धड़कन भी बढ़ी हुई है।’ उन्होंने दवाइयाँ लिखीं, उन्हें लेने के निर्देश समझाए और सख्ती से किए जाने वाले परहेज विस्तार से बताए।मैं चलने को हुआ तो सुभेदार साहब ने रोका और कहा - ‘एक बात याद रखिएगा! इस भ्रम में मत रहिएगा कि बीपी ठीक हो जाएगा। बीपी और डाइबीटीज एक बार हो जाने पर इनसे मुक्ति पाना असम्भवप्रायः ही होता है। नियमित रूप से दवाइयाँ लेकर आप इन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं, इनसे मुक्त नहीं हो सकते।’


मैं चेम्बर से बाहर निकला। पीछे-पीछे कैलाश भी। दो कदम भी नहीं चला होऊँगा कि कैलाश ने कहा - ‘अण्णा हजारे की गिरफ्तारी से आप इतने परेशान हो गए? आप तो हमें समझाते हैं! मैं आपको क्या समझाऊँ। ऐसा तो होता रहता है। दिल पर मत लीजिए। भूल जाईए।’


मैं हँस नहीं पाया। मैं अण्णा से कई बातों पर असहमत हूँ किन्तु उनके अभियान का समर्थक हूँ। मैं अपने आपको ‘अण्णा का असहमत समर्थक’ कहता हूँ। नहीं जानता कि आज मेरा रक्त चाप क्यों बढ़ा। किन्तु यदि इसका कारण सचमुच में अण्णा की गिरफ्तारी ही है तो यकीन मानिए, मुझे बहुत खुशी है।


अण्णा के इस ‘असहमत समर्थक’ को यह प्राप्ति किसी स्वर्ण पदक से कम नहीं लग रही है।

यह छोटा सा बदलाव समाप्त कर सकता है भ्रष्टाचार

‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ वाली उक्ति इन दिनों बार-बार याद आने लगी है। होना तो यह चाहिए था कि जन भावनाओं का प्रकटीकरण, विधायी सदनों में, हमारे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के माध्यम से होता। किन्तु यह बात ‘कर्मण्योवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन्’ की तरह ही, केवल कहने भर को (वह भी आदर्श बघारने के लिए) ही रह गई है - मात्र एक किताबी बात। आज तो न्यायपालिका और ‘निमले’ (‘सीएजी‘ के मुकाबले, ‘नियन्त्रक एवम् महा लेखाकार’ का यह ‘प्रथमाक्षररूप’ मैंने बनाया है।) के श्रीमुख और मसि-कलम से ही जन भावनाएँ प्रकट हो रही हैं। ऐसा करने में इन दोनों को अतिरिक्त श्रम करना पड़ रहा है। मजबूरी है। परिवार के चार में से दो सदस्य यदि निकम्मापन बरतने लगें या अपना काम छोड़ कर दूसरे काम करने लगें तो उन दोनों के हिस्से का काम शेष दोनों सदस्यों को ही करना पड़ेगा न! यही तो हो रहा है आज हमारे देश में! हमारी विधायिका और कार्यपालिका ने अपना मूल काम करना छोड़ दिया तो यह तो होना ही था! सारा देश इन दोनों (न्याय पालिका और ‘निमले’) की वाहवाही करे तो इसमें विचित्र और आपत्तिजनक क्या? लोग तो उन्हीं के पास जाएँगे जो उनकी बात सुनें और उनकी इच्छाओं को साकार करने की कोशिशें करें! चार का बोझा ढो रहे इन दोनों की वाहवाही से परेशान निकम्मे, इन दोनों पर ‘अतिरिक्त सक्रियता’ का आरोप लगाएँ, चीखें-चिल्लाएँ और बकौल राजेन्द्र यादव ‘राँड रोवना’ करें तो हँसी ही आएगी।

सो, निकम्मों की इस (दुः)दशा पर सारा देश ‘मुदित मन’, तालियाँ बजा रहा है और निकम्मों को चपतियाते, लतियाते, जुतियाते देखकर गहरा सन्तोष अनुभव कर रहा है। दिल्ली के वृत्ताकार विधायी भवन से लेकर प्रदेशों की विधान सभाओं में, ये दोनों निकम्मे पूरे देश में समान रूप से छाए हुए हैं। इन निकम्मों में सारे झण्डे, सारे रंग, सारे नेता समान रूप से शामिल हैं। कोई नहीं बचा है। बेशर्मी की हद यह कि प्रत्येक निकम्मा, सामनेवाले को निकम्मा, भ्रष्ट, चोर बताता है। जबकि लोग दोनों की हकीकत बखूबी जानते हैं।


सत्तर की दशक के अन्तिम वर्षों से लेकर अस्सी की दशक के प्रथम सात वर्षों में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी। तब केवल न्यायपालिका पर ‘अतिरिक्त सक्रिय’ (प्रोएक्टिव) होने के आरोप लगे थे। किन्तु ये आरोप न तब सच थे न अब सच हैं। उम्मीद की जा रही थी कि न्याय पालिका की इस अतिरिक्त सक्रियता को सबक और चुनौती की तरह लेकर हमारे निर्वाचित जन प्रतिनिधि और प्रशासन तन्त्र अपना उतरा हुआ पानी और उतरने से बचाएँगे भी तथा पानीदार बने रहेंगे भी। किन्तु सबक सीखना तो दूर रहा, इन्होंने तो ‘कोढ़ में खाज’ वाली स्थिति ला दी। पहले केवल न्याय पालिका तमाचे मारती थी। आज तो ‘निमले’ भी शरीक हो गया है। निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और प्रशासकीय अधिकारियों ने दशा यह कर दी है कि तय करना मुश्किल हो गया है कि हड़काने की इस जुगलबन्दी में मुख्य कलाकार कौन है और संगतकार कौन - न्याय पालिका या ‘निमले’? कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा जब दोनों ही, जबड़े भींचकर, बराबरी से चौके-छक्के न मार रहे हों।

ऐसे में, किसी ‘आविष्कार’ की भले ही न हो किन्तु तनिक ‘प्रक्रियागत बदलाव’ की प्रबल सम्भावनाएँ तो बनती ही हैं।


क्यों नहीं, ‘निमले’ की भूमिका का स्थान बदल दिया जाए? शासन-प्रशासन के वित्तीय निर्णयों की जाँच-परख तो ‘निमले’ अभी भी करता ही है! अभी यह जाँच-परख, निर्णय ले लिए जाने और उनके क्रियान्वयन के बाद की जाती है। क्यों नहीं यह जाँच-परख, निर्णय लेने से पहले ही कर ली जाए? अर्थात् ‘निमले’ को निर्णय लेने की प्रक्रिया के अन्तिम चरण का, अन्तिम निर्णय लेने से ठीक पहले का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए? काम तो वही का वही रहेगा किन्तु इसका वह असर होगा कि अखबारों के पन्ने और चैनलों के कई-कई घण्टे खाली हो जाएँगे। इसके लिए अतिरिक्त अमले की भी जरूरत नहीं होगी क्योंकि अभी भी यह सारा काम मौजूदा अमला ही कर रहा है।

एक और बदलाव पर विचार करना बुरा नहीं होगा। वित्तीय मामलें के तमाम निर्णय, बन्द कमरों में न लेकर, बड़े सभागारों में लिए जाएँ। ऐसे सभागार देश और प्रदेशों की राजधानियों में होते ही हैं। सारी निविदाएँ इन्हीं सभागारों में खोली जाएँ और उस समय, अधिकारियों तथा निविदाकारों अथवा उनके प्रतिनिधियों के साथ ही साथ जन-सामान्य और मीडिया को भी उपस्थित रहने की छूट दी जाए। अर्थात्, अभी ‘अँधेरे-बन्द कमरों में गुड़ फोड़ने’ की पारम्परिक शैली के स्थान पर सारे निर्णय ‘चौड़े-धाले’ लिए जाएँ। वैसे भी, पारदर्शिता की माँग और आवश्यकता दिन प्रति दिन बढ़ ही रही है।


पूरा देश देख रहा है कि बात तो कोई छुपती नहीं। यत्नपूर्वक छुपाए गए सारे ‘काले-धोले’, एक के बाद एक, रिस-रिस कर सामने आ ही रहे हैं! यदि पहले ही सब कुछ जाँच-परख लिया जाएगा तो लोग जरूर तमाशे से वंचित हो जाएँगे किन्तु हेराफेरी की आशंकाएँ समाप्त भले ही न हों, न्यूनतम तो होंगी ही। कल्पना कीजिए कि कितनी बचत होगी - जन-धन की लूट समाप्त होगी, मलेनि की रिपोर्टों के कारण विधायी सदनों में हंगामे समाप्त हो जाएँगे, अनेक जाँच समितियाँ गठित नहीं करनी पड़ेंगी, अखबारों और समाचार चैनलों पर समाचारों के लिए अधिक जगह और समय उपलब्ध रहेगा। हाँ, तब हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं को कोई नया काम तलाश करना पड़ेगा। तब, मलेनि की रिपोर्ट के आधार पर वे किससे त्याग पत्र माँगेंगे?

‘निमले’ की भूमिका में यह बदलाव, इस समय मुझे तो ‘लाख दुःखों की एक दवा’ लग रहा है।


आपको?

शहादत की प्रतीक्षा में ठिठका हुआ देश

आसार अच्छे नहीं हैं। अण्णा विफल होते नजर आ रहे हैं। उनकी शब्दावली और शैली, उनकी विफलता की पूर्व घोषणा करती लग रही है।

अण्णा के नाम के साथ गाँधी का नाम सहज ही जुड़ जाता है। किन्तु आज ‘गाँधी तत्व’ अण्णा के अभियान के आसपास तो क्या, कोसों दूर तक भी नजर नहीं आ रहा। अण्णा को किसी हीन महत्वाकांक्षी, सड़कछाप राजनेता की तरह पेशेवर आरोप लगाते देखना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं लग रहा। वे (सिब्बल पर) व्यक्तिगत आरोप-प्रतिरोप में व्यस्त हो गए हैं, (मनमोहनसिंह सहित अन्य नेताओं की) खिल्ली उड़ाने में अपार आनन्द का अनुभव करते नजर आ रहे हैं। विनम्रता का स्थान दम्भोक्तियाँ लेती नजर आ रही हैं। उन्होंने मानो अपने आप को अभी से ही ‘शहीद’ मान लिया है और इसी ‘शहीदाना मुद्रा’ में वे बातें कर रहे हैं। उनका ‘आग्रह’, ‘हठ’ में बदल गया है। ‘जन लोकपाल’ के अपने मसवदे की पैरवी के बजाय सरकार की आलोचना पहली प्राथमिकता पर आ गई है। ‘गाँधी’ में यह सब तो क्या, इनमें से कुछ भी नहीं है! ‘गाँधी’ में तो आत्म चिन्तन, आत्म मन्थन, आत्म विश्लेषण, आत्म शुद्धि और आत्मोत्थान के सिवाय और कुछ है ही नहीं! लेकिन अण्णा में फिलवक्त तो इनमें से कुछ भी नजर नहीं आ रहा।


अण्णा वही कहने लगे हैं और करने लगे हैं जो सरकार उनसे कहलवाना और करवाना चाहती थी। सरकार ने अण्णा के आन्दोलन का उद्ददेश्य, सरकार के विरुद्ध वातावरण निर्मित करना बताया था। ताज्जुब है कि अण्णा ने सरकार की इस धारणा को सार्वजनिक रूप से सच साबित कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका आन्दोलन आन्दोलन सरकार के वरुद्ध है। संसद की अवमानना से बचने के लिए अण्णा ने यह बात कही थी। काँग्रेस और संप्रग के विरोधी दलों की सहानुभूति प्राप्त करने की रणनीति के तहत भले ही अण्णा ने ऐसा कहा हो किन्तु वास्तविकता तो यही है कि अण्णा का विरोध संसद से ही है!

अण्णा यदि यह माने बैठे हैं कि काँग्रेस और संप्रग के घटक दलों को छोड़ कर तमाम दल उनके, जन लोकपाल के मसवदे का आँख मूँदकर समर्थन करने को उतावले बैठे हैं तो अण्णा की इस मासूमियत पर सहानुभूति ही जताई जा सकती है। जन लोकपाल मसवदे के जिन 6 मुद्दों को अण्णा ने अपनी नाक का सवाल बना लिया है, उन छहों मुद्दों पर, प्रतिपक्षी दलों में से एक भी दल अण्णा के साथ नहीं है। प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे में लानेवाले केवल एक मुद्दे पर भाजपा सहित गिनती के कुछ दल अवश्य अण्णा के साथ हैं किन्तु यह उनकी सदाशयता और ईमानदारी नहीं, राजनीतिक मजबूरी (या कि राजनीति की ‘रणनीतिक धूर्तता’) है। ध्यान से देखें तो साफ नजर आ जाता है कि इस माँग का समर्थन करनेवाले किसी भी दल का प्रधानमन्त्री इस देश में कभी नहीं बन सकता।


यह सच है कि केन्द्र सरकार इस समय ‘सर्वाधिक भयभीत और कमजोर सरकार’ है किन्तु अण्णा के अभियान का दिशा परिवर्तन उसकी ताकत बनता जा रहा है। रामदेव की तरह ही अण्णा भी बड़बोलेपन के शिकार हो रहे हैं, दम्भोक्तियों/गर्वोक्तियों सहित आरोप लगा रहे हैं, अपनी बात कम और सरकार की खिंचाई ज्यादा कर रहे हैं। अण्णा ‘अतिरेकी आत्म मुग्धता’ के शिकार लग रहे हैं। वे यह भूल जाना चाह रहे हैं जिस संसद का विरोध न करने की दुहाई वे दे रहे हैं, उस संसद में एक भी दल, उनके जन लोकपाल के मसवदे के छहों विवादास्पद मुद्दों पर उनके साथ नहीं है।

वास्तविकता यह है कि तनिक धूर्तता बरतते हुए केन्द्र सरकार यदि, अण्णा के जन लोकपाल मसवदे को ज्यों का त्यों संसद में पेश कर दे और व्हीप का प्रतिबन्ध हटा कर सांसदों को ‘आत्मा की आवाज’ पर मतदान करने की छूट दे दे तो कोई ताज्जुब नहीं कि इस मसवदे के पक्ष में एक भी मत न पड़े।


अण्णा को वास्तविकताएँ समझने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए वे तैयार न हों तो उनके आसपासवालों को यह कोशिश करनी चाहिए। जन लोकपाल का मसवदा जस का तस स्वीकार हो न हो, इसके जरिए अण्णा ने, भ्रष्टाचार के प्रति केन्द्र सरकार की बेशर्मी, नंगई और नंगापन अत्यन्त प्रभावशीलता से प्रमाणित कर दी है। अभियान अपने मुकाम पर भले न पहुँचे किन्तु इसका मकसद तो पूरा हो गया है। यह जन उद्ववेलन अब शान्त होनेवाला नहीं है। किन्तु अण्णा को यह हकीकत माननी ही पड़ेगी कि उनके मसविदे को कानून बनाने का रास्ता सरकार से होकर नहीं, संसद से होकर जाता है। इस अभियान को, संसद में ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनाने की दिशा में मोड़ने पर विचार किया जाना चाहिए। अण्णा मानें, न मानें, चाहें, न चाहें, हकीकत तो यही है। परोक्षतः (संसद की अनिवार्यता की) इस बात को अण्णा खुद स्वीकार भी कर रहे हैं। सिब्बल और राहुल गाँधी के निर्वाचन क्षेत्रों सहित देश के अन्य नगरों में वे जन लोकपाल पर सार्वजनिक मतदान करवा कर लोगों की राय ले रहे हैं। एक ओर तो सार्वजनिक मतदान के जरिए अपने मसविदे के पक्ष में (और सिब्बल तथा राहुल गाँधी के विपक्ष में) जन भावना की बात कहना और दूसरी ओर संसद से बचने की कोशिश करना, समूचे अभियान की मंशा को कटघरे में खड़ा करता है।

यह बात याद रखी जानी चाहिए कि इस अभियान से जुड़ने के लिए अण्णा खुद चल कर ‘सिविल सोसायटी’ के पास नहीं आए थे। केजरीवाल, भूषण, बेदी आदि उनके पास गए थे क्योंकि इन्हें ऐसा व्यक्ति और व्यक्तित्व चाहिए था जिस पर लोग विश्वास कर सकें। अण्णा को न्यौतनेवाले सारे लोग इस बात से बखूबी वाकिफ थे कि इनमें से एक के भी पास न तो ‘जनाकर्षण’ (मास अपील) है और न ही जन विश्वास (मास फेथ)। अण्णा में ‘जनाकर्षण’ (मास अपील) भले ही कम रह हो किन्तु जन विश्वास (मास फेथ) भरपूर था और अब भी है। हम ‘आदर्श अनुप्रेरित समाज’ हैं। हम खुद शहीद हों न हों, गर्व करने के लिए हमें ‘शहीद’ चाहिए होते हैं। सारा देश अत्यधिक उत्सुकता और अधीरता से एक शहादत की प्रतीक्षा कर रहा है। विडम्बना है कि इस प्रतीक्षा को अण्णा अपने पक्ष में प्रचण्ड जन समर्थन मान कर चल रहे हैं।


भविष्य के गर्त में क्या छुपा है, कोई नहीं जानता। ईश्वर अणा को शतायु प्रदान करे। किन्तु यदि दुर्भाग्यवश अण्णा को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा तो वे शहीद हों न हों, केजरीवालों, भूषणों, बेदियों आदि की इच्छा-वेदी के बलि-पुरुष अवश्य बन जाएँगे।

‘अण्णा’ ही बने रहिए अण्णा

शुक्रवार, 8 जुलाई की रात 8 बजे मैंने फेस बुक पर, अपने पन्ने पर लिखा - ‘हे भगवान! अण्णा को शहीद होते देखने को उतावले मूर्ख मित्रों से बचाना। हमें अण्णा की आवश्यकता है।’ मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इस टिप्पणी पर (मेरी ‘प्रति प्रतिक्रियाओं’ सहित) 20 से अधिक प्रतिक्रियाएँ दर्ज हुईं। मैं आत्म-मुग्ध होने ही वाला था कि मेरे विवेक ने टोका - ‘अपने कपड़ों में रहो! विषय की महत्ता के चलते तुम्हें ये प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, तुम्हारी बात पर नहीं।’ और मैं खुद पर इतराने की आत्मघाती मूर्खता से बच गया।

तीन प्रतिक्रियाएँ मुझे महत्वपूर्ण लगीं। मेरी टिप्पणी दर्ज होने के 22 मिनिट बाद ही डॉक्टर प्रदीपजी त्रिवेदी (ई-मेल pk_trivedi@rediffmail.com मोबाइल नम्‍बर 9425106549) ने दो हिस्सों में लिखा -‘ये बात मुझे समझ में नहीं आती कि अण्णा और उनकी टीम तथा बाबा रामदेव चुनाव क्यों नहीं लड़ना चाहते? यदि बदलाव लाना है तो संसद से बेहतर कोई रास्ता नहीं है। बजाय अनशन करने के।’

प्रसंगवश उल्लेख है कि डॉक्टर त्रिवेदी नीमच के हैं और मेरे पॉलिसीधारक भी। ‘प्रति प्रतिक्रिया’ में मैंने लिखा - ‘डॉक्टर त्रिवेदी साहब! यह सवाल केवल आपका नहीं, असंख्य लोगों का है। लेकिन यह सवाल सबसे अन्त में पूछे जानेवाला है। मौजूदा चुनाव प्रणाली में केवल बाहुबली, धनबली और ऐसे ही अन्य बली ही जीत सकते हैं। अण्णा की माँग और नीयत पर मुझे कोई सन्देह नहीं है किन्तु मैं यह भी मान रहा हूँ कि लोकपाल से पहले चुनाव सुधारों पर काम किया जाना चाहिए। लोकपाल तो भ्रष्टाचार हो जाने के बाद हरकत में आएगा जबकि यदि वाजिब चुनाव सुधार हो जाएँ तो मुमकिन है, लोकपाल की आवश्यकता ही नहीं रहे। किन्तु इसके बाद भी, मैं अण्णा के साथ इस नीयत से हूँ कि लोगों ने इस बारे में सोचना तो शुरु किया। बहुत जल्दी मैं चुनाव सुधारों पर अपने मन की बात लिखनेवाला हूँ। आप पढेंगे तो शायद मेरी बात अधिक स्पष्ट हो सकेगी। मुझ पर नजर बनाए रखिएगा।’

लम्बे समय से मैं चुनाव सुधारों पर अपनी बात लिखना चाह रहा हूँ किन्तु हर बार आलस्य का शिकार हो रहा हूँ। ‘जन लोकपाल मसविदे’ को लेकर देश में जो उद्वेलन छाया हुआ है, उसे देखते हुए मैं तेजी से अनुभव कर रहा हूँ कि यदि वांच्छित चुनाव सुधार हो जाते तो परिदृष्य कुछ दूसरा ही होता। तब, लोकपाल और लोकपाल का कार्यालय उपेक्षित (और लगभग अनावश्यक) रहता। कोई पूछनेवाला शायद ही मिलता। यह मेरी ऐसी धारणा है जिस पर आज खुल कर हँसने का अधिकार और सुविधा सबको उपलब्ध है किन्तु मुझे विश्वास है कि चुनाव सुधारों से सम्बन्धित मेरे मन्तव्य निश्चय ही सबको अपना दृष्टिकोण बदलने को विवश करेंगे। किन्तु यह तभी हो सकेगा जब मैं आलस्य से मुक्ति पाऊँ।

दूसरी प्रतिक्रिया श्री अनीक गुप्ता( http://facebook.com/ANEEKGUPTA) की आई। यह भी दो अंशों में रही। पहला भाग सीधा-सपाट, दो-टूक था - ‘क्षमा करें श्रीमान्! वे (अण्णा) संसदीय लोकतन्त्र को नकारते हैं।’ दूसरा हिस्सा तनिक आक्रोशभरा और अण्णा तथा उनके साथियों की बखिया उधेड़नेवाला है। गुप्ताजी ने जो कुछ लिखा, उसकी अधिकांश बातें मैं पहले से ही जानता हूँ। यह दूसरा हिस्सा मैं यहाँ उद्धृत नहीं कर रहा। क्योंकि गुप्ताजी से सहमत और अण्णा से आंशिक रूप से असहमत होने के बावजूद मैं अण्णा की नीयत पर सन्देह नहीं करना चाह रहा। चाह रहा हूँ कि अण्णा के अभियान को पूरी न सही, आंशिक सफलता तो मिले ही मिले। इसलिए मैंने गुप्ताजी से उनका ई-मेल पता और फोन नम्बर माँगा जो उन्होंने उपलब्ध करा दिया। उनसे, अलग से अपनी बात कहूँगा।

किन्तु आशीष कुमार ‘अंशु’ (ई-मेल ashishkumaranshu@gmail.com मोबाइल - 9868419453) ने मानो मेरे मन का चोर पकड़ लिया। अगले दिन, शनिवार को दोपहर लगभग दो बजे उन्होंने लिखा - जिस अन्ना की आपको आवश्यकता है, वह ‘अन्ना’ बने रहें, इस बात की अधिक आवश्यकता है। ‘बहुत मुश्किल है दुनियाँ में बड़े बनकर बने रहना।’ उन्हें मेरा जवाब था - ‘दोपहर तक तो मैं आपसे सहमत न होता किन्तु दोपहर बाद समाचार चैनलों पर अण्णा को सिब्बल को मन्त्रिमण्डल से बाहर करने की माँग करते हुए देख कर मुझे आपसे सहमत होना पड़ रहा है। अण्णा को खुद को लोकपाल मसविदे तक सीमित रखना चाहिए।’

ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा है, त्यों-त्यों अण्णा अनावश्यक, अप्रासंगिक, असम्बद्ध वक्तव्य देते नजर आ रहे हैं। वे सरकार और मन्त्रियों पर आरोप लगा रहे हैं, व्यंग्योक्तियाँ कर रहे हैं, उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। वे सिब्बल को मन्त्रिमण्डल से बाहर करने की माँग कर रहे हैं और 65 वर्ष से अधिक के राजनेताओं को स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का परामर्श दे रहे हैं। अनायास ही लगने लगता है कि असम्बद्ध-अप्रासंगिक-अनावश्यक वक्तव्यबाजी करने का ‘रामदेव प्रभाव’ कहीं अण्णा पर तो नहीं आ गया? इन सब बातों से ‘जन लोकपाल मसविदे’ का क्या लेना-देना? मुझे डर लग रहा है कि ये तमाम बातें, अण्णा के अभियान को गम्भीर क्षति पहुँचा सकती हैं। ऐसी बातें सुन-सुन कर सरकार और उसके मन्त्री खुश ही होते होंगे। ऐसी बातें, मुद्दे को पीछे धकेलने में और विषय को बदलने में अत्यधिक सहायक होंगी। सरकार और उसके मन्त्री यही तो चाहते हैं!

सिब्बल को मन्त्रिमण्डल से निकालने की, अण्णा की माँग चौंकानेवाली है। सिब्बल के प्रति व्यक्तिगत अरुचि के सिवाय और कोई कारण इस माँग पीछे नजर नहीं आता। अण्णा को याद रखना पड़ेगा कि लोग उन्हें गाँधी से जोड़ते हैं और उनमें गाँधी की न केवल छवि देखते हैं अपितु अपेक्षा भी करते हैं कि अण्णा का आचरण गाँधी जैसा हो। गाँधी ने निजी बैर भाव को अपने चिन्तन, मनन, वचन, आचरण में कभी स्थान नहीं दिया। उन्होंने जब भी, जो कुछ भी कहा, सदैव ही वृत्ति को केन्द्र में रखकर ही कहा। नील की खेती को लेकर चलाए अपने आन्दोलन में गाँधी ने किसानों के लिए न्याय माँगा था - नीलगर किसानों को बन्दी बनाकर और उन पर अत्याचार करनेवाले अंग्रेजों के विरुद्व किसी कार्रवाई की माँग नहीं की थी। यहाँ अण्णा जब सिब्बल को मन्त्रिमण्डल से बाहर करने की माँग करते हैं तो वे गाँधी को परे धकेल कर, निजी घृणा-अप्रसन्नता को परवान चढ़ाते नजर आते हैं।

ऐसी बातें और ऐसी स्थितियाँ अण्णा और उनके साथियों के विरुद्ध व्यक्तिगत मोर्चे खोलेंगी। होना तो यह चाहिए कि मामले को केवल जन लोकपाल मसविदे तक ही सीमित और उसी पर केन्द्रित रखा जाए। यदि मन्त्रियों पर व्यक्तिगत छींटाकशी की जाएगी, उनकी जग हँसाई की जाएगी और सरकार तथा मन्त्रियों को गरियाया जाएगा तो अण्णा के साथियों की कमजोरियों को मुख्य विषय बनाकर लोकपाल को पार्श्व में धकेल दिया जाएगा। तब, व्यापक जनहितों को लेकर चल रहे आन्दोलनों से इन लोगों की दूरी, इन लोगों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता के स्रोतों की शुचिता, केवल सरकारी भ्रष्टाचार पर हमला करना और कार्पोरेट भ्रष्टाचार से आँखें चुराना आदि को मुख्य विषय बनाकर वह दशा कर दी जाएगी कि इन लोगों को बोलना मुश्किल हो जाएगा। तब, अभियान की दिशा भले ही न बदले, ‘दशा’ बदलने का खतरा अवश्य पैदा हो जाएगा।

इसलिए यह केवल जरूरी नहीं, अनिवार्य है कि अण्णा खुद को केवल लोकपाल मसविदे तक ही सीमित रखें। कोई कुछ भी कहे, कुछ भी करे, उन्हें कितना ही उकसाए, उत्तेजित करे, करने दें। कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करें। मुद्दे को भटकने न दें। याने जैसा कि भाई आशीष कुमार ‘अंशु’ ने कहा है - अण्णा केवल ‘अण्णा’ ही बने रहें। वे यदि रंचमात्र भी अण्णा से इतर कुछ और हो गए बेड़ा गर्क और सब कुछ तो बण्टाढार हो जाएगा।

नाव की दिशा में यदि एक अंश (डिग्री) का अन्तर आ जाए तो उसके गन्तव्य में कुछ मीटरों का ही अन्तर होगा। किन्तु दिशा में एक अंश (डिग्री) का यही बदलाव, जहाज के गन्तव्य में सैंकड़ों मीलों का अन्तर ला देता है। तब, ‘जाते थे जापान, पहुँच गए चीन’ वाली स्थिति हो जाती है।

सो! अण्णा!! मेरी नहीं, ‘अंशु’ की सुनिए। अण्णा ही बने रहिए।

नहीं अण्णा! 16 से अनशन बिलकुल नहीं

सरकार द्वारा ‘अच्छा लोकपाल विधेयक’ प्रस्तुत न करने की दशा में, 16 अगस्त से, अण्णा के अनशन पर बैठने का निर्णय, अण्णा-समूह को, निम्नांकित कुछ ‘जग जाहिर’ कारणों से, फिलहाल स्थगित कर देना चाहिए -


- चार जुलाई की सर्वदलीय बैठक में यह बात साफ हो गई है कि जिन 6 मुद्दों पर अण्णा-समूह और केन्द्र सरकार में असहमति बनी हुई है, उनमें से, कम से कम 5 मुद्दों पर लगभग सारे के सारे दल, केन्द्र सरकार के साथ हैं। केवल, लोकपाल के दायरे में प्रधानमन्त्री को लाए जानेवाले (एक ही) मुद्दे पर कुछ दल सहमत हैं।

- यह भी साफ है कि ‘अच्छे लोकपाल विधेयक’ की बात करनेवाली काँग्रेस और केन्द्र सरकार वैसा विधेयक तो नहीं ही लाएगी जैसा कि अण्णा-समूह चाहता है।


- कोई भी (एक भी) दल, उस मसविदे के शब्दशः समर्थन में नहीं है जो अण्णा-समूह ने प्रस्तुत किया है।

- रोचक, विसंगत और हास्यास्पद बात यह है कि भाजपा सहित प्रत्येक राजनीतिक दल ‘मजबूत लोकपाल विधेयक’ की बात तो कर रहा है किन्तु कोई भी नहीं बता रहा कि ‘मजबूत लोकपाल विधेयक’ से उसका आशय क्या है।


- जाहिर है, प्रत्येक राजनीतिक दल इसकी आड़ में अपनी-अपनी राजनीति रोटियाँ सेकने की सुविधा अपने पास सुरक्षित रख रहा है।

- यदि इन सबकी नीयत साफ है तो ये सब, ‘मजबूत लोकपाल विधेयक’ की अपनी-अपनी व्याख्या स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे?


- जाहिर है कि इनमें से कोई भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के लिए गम्भीर और ईमानदार नहीं है। राष्ट्रहित की रक्षा और भ्रष्टाचार का विरोध इनका लक्ष्य बिलकुल ही नहीं है।

- केन्द्र सरकार और काँग्रेस की मजबूरी नहीं होती तो वह भी अपने मसविदे के मुख्य बिन्दु सार्वजनिक नहीं करती।


- हम सबको भले ही बुरा लगे और हमें चिढ़ छूटे, यह बात तो सच है कि बड़बोले सिब्बल समेत तमाम सत्ताधारियों ने, विधेयक को मानूसन सत्र में प्रस्तुत करने की बात कही थी। इसी सत्र में पारित कराने की बात तो किसी ने, कभी नहीं कही।

- ऐसे में (जबकि एक भी दल, अण्णा-समूह के ‘जन लोकपाल मसविदे’ के शब्दशः समर्थन में नहीं है) सामान्य समझ वाला प्रत्येक आदमी भली प्रकार जानता-समझता है कि सरकार तो वही मसविदा प्रस्तुत करेगी जो उसे (और तमाम राजनीतिक दलों को) अनुकूल तथा सुविधाजनक होगा।


- इस मसविदे के आधार पर यदि अण्णा 16 अगस्त से अनशन पर बैठ गए तो तमाम राजनीतिक दल, अण्णा का नाम लेकर, अण्णा की दुहाई दे-दे कर सरकार की खटिया खड़ी करके अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने में लग जाएँगे।

- इस स्थिति में, अण्णा पर यह आरोप चस्पा कर दिया जाएगा कि वे सरकार के विरोध में, विरोधी दलों के हाथों में खेल रहे हैं।


- सरकार यही चाहती है कि अण्णा के अभियान को विरोधी दलों का अभियान साबित घोषित कर दिया जाए।

- अण्ण-समूह, सरकार की यह ‘शुभेच्छा’ पूरी होनेे का सुनहरा मौका उपलब्ध न कराए।


- अच्छा होगा कि, सरकारी प्रस्ताव पर, संसद में बहस होने दी जाए। तब प्रत्येक राजनीतिक दल के पत्ते जाजम पर सामने आ जाएँगे।

- तब हम भौंचक्के होकर देखेंगे कि वे तमाम लोग, जो आज अण्णा की आड़ लेकर सरकार और काँग्रेस पर हमला कर रहे हैं, ‘अण्णा-लाइन’ के बजाय ‘पार्टी लाइन’ पर बोल रहे हैं।


- इसके बाद ही अण्णा-समूह की ‘मूल पूँजी’ सामने आ सकेगी।

- पूरा चित्र स्पष्ट होने के बाद ही अगले कदम के बारे में विचार किया जाना बेहतर और श्रेयस्कर होगा।


- इसलिए, इस क्षण तो यही उचित अनुभव हो रहा है कि 16 अगस्त से, अण्णा के अनशन पर बैठने के निर्णय को, अण्णा-समूह स्थगित करे।

लगे हाथों कुछ बातें और।


- यह स्पष्ट है कि अण्णा-समूह वाला प्रस्तावित ‘जन लोकपाल मसविदा’ भी यदि शब्दशः लागू हो जाए तो भी इस देश से भ्रष्टाचार मिटेगा नहीं। ‘लोकपाल’ कैसा भी हो, वह भ्रष्टाचार हो जाने के बाद ही हरकत में आ सकेगा। याने, ‘लोकपाल’ भ्रष्टाचार की जड़ो पर प्रहार नहीं करता। वह तो भ्रष्टाचार की फुनगियों की छँटाई मात्र करता है।

- ऐसे में, भ्रष्टाचार को जड़ों से नष्ट करने के लिए, चुनाव सुधारों सहित अन्य उपायों पर ध्यान देना और उन्हें लागू कराना अनिवार्य होगा।


- ‘मजबूत लोकपाल मसविदे’ के साथ-साथ इन ‘अन्य उपयों’ पर भी अभी से विचार शुरु करना श्रेयस्कर होगा।

अण्णा! आरोप को सच होने से बचाइए

‘अण्णा समूह’ के आन्दोलन को मैं ‘हमारा आन्दोलन’ मानता/कहता हूँ। किन्तु आज (यह पोस्ट मैं 02 जुलाई की रात को लिख रहा हूँ) मैं असहज और घबराया हुआ हूँ।

अपनी असहजता और घबराहट का कारण बताऊँ, उससे पहले एक जरूरी बात।

लोकपाल के अपने मसविदे के लिए समर्थन जुटाने के लिए, ‘अण्णा समूह’ द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं से मिलने पर कई लोग असहमत/अप्रसन्न हैं तो कुछ लोग उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं - यह कह कर कि कल तक जिन्हें अपने मंच से दूर रखते थे, आज उन्हीं की खुशामद कर रहे हैं। यह धारणा सिरे से ही गलत है। अण्णा समूह ने तब भी ठीक किया था और अभी भी ठीक कर रहे हैं। जन्तर-मन्तर पर नेता लोग अण्णा के प्रभा मण्डल से अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाह रहे थे। इसे यूँ कहना अधिक अच्छा होगा कि उमा भारती, चौटाला जैसे तमाम लोग अण्णा के जरिए अपना राजनीति कद भी ऊँचा करना चाह रहे थे और राजनीतिक स्वार्थ भी सिद्ध करना चाह रहे थे। तब अण्णा समूह ने उन्हें ‘भगाकर’ (या कि ‘खदेड़कर’) खुद की और अपने आन्दोलन की शुचिता बचाए और बनाए रखी। ऐसा करना अनिवार्य ही नहीं, अपरिहार्य था।


हर कोई जानता है कि अण्णा समूह के लोकपाल मसविदे को संसद में पारित कराने के लिए तमाम राजनीतिक दलों के समर्थन की आवश्यकता होगी। इसलिए, इन सब दलों और नेताओं को अपनी बात समझाने, इनसे अपने मसविदे के लिए समर्थन जुटाने के लिए इनसे मिलना भी अनिवार्य ही नहीं अपरिहार्य था। अण्णा समूह के इस कदम से किसी भी दल और नेता को कोई राजनीतिक लाभ न तो मिला है, न मिल रहा है और न ही मिलता लग रहा है। इसके ठीक उलट, कोई भी दल और कोई भी नेता खुलकर कुछ भी नहीं बोला है और न ही बोल रहा है। सबके सब गोलमोल भाषा में अण्णा की, उनके आन्दोलन की, उनके मुद्दों की तारीफ कर जैसे-तैसे अपनी जान छुड़ा रहे हैं। इसलिए, राजनीतिक दलों से और इनके नेताओं से सम्पर्क करने को लेकर अण्णा समूह से असहमत, अप्रसन्न होना और उनकी खिल्ली उड़ाना सिरे से ही गैरवाजिब है। इसके उल्टे, मेरा तो मानना रहा कि यह नेक काम अण्णा समूह ने बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था।

अब मेरी असहजता और घबराहट की बात।


जबसे अण्णा समूह ने राजनीतिक दलों और नेताओं से मिलना शुरु किया तबसे मैं बराबर ध्यान से देखता रहा कि प्रत्येक मुलाकात के बाद अण्णा समूह के लोग इन मुलाकातों का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं या नहीं। वस्तुतः मैं ‘देख’ नहीं रहा था, इस बात की ‘प्रतीक्षा’ कर रहा था। लेकिन एक भी मुलाकात के ब्यौरे किसी ने भी स्पष्ट नहीं किए। मैंने इस चुप्पी को आन्दोलन की रणनीति का हिस्सा ही माना (क्यों कि मैं होता तो मैं भी यही करता) कि युद्ध के सारे मोर्चे एक साथ नहीं खोलने चाहिए। एक के बाद एक मोर्चा फतह करना चाहिए।

किन्तु आज (02 जुलाई को) मैं यह देखकर हतप्रभ रह गया कि सोनिया गाँधी से मिलने के फौरन बार अण्णा ने न केवल इस मुलाकात के विस्तृत ब्यौरे दिए बल्कि यह धमकी भी दे दी कि यदि सरकार ने ‘अच्छा लोकपाल विधेयक’ संसद में पेश नहीं किया तो वे 16 अगस्त से अनशन शुरु कर देंगे।


यह देख-सुनकर मैं असहज हुआ। अपने आप को थोड़ा समझा/सम्हाल रहा था कि रात नौ बजे से समाचार चैनल ‘न्यूज 24’ पर अण्णा का लोगों से सीधा सम्वाद देखा-सुना। इस कार्यक्रम में अरविन्द केजरीवाल और एक अन्य सज्जन भी अण्णा के साथ थे। लगभग डेड़ घण्टे के इस पूरे कार्यक्रम में अण्णा, केजरीवाल और साथवाले तीसरे सज्जन ने पूरे समय तक सरकार को ही निशाने पर बनाए रखा। कार्यक्रम के सूत्रधार ने एक बार अण्णा से जानना चाहा कि अण्णा समूह के लोकपाल मसविदे पर विभिन्न नेताओं की राय क्या रही? किसी ने मसविदे का शब्दशः समर्थन किया या नहीं? अण्णा ने केवल अपने ‘पुराने साथी’ नीतिश कुमार (अण्णा ने इसी तरह नीतिश कुमार को उल्लेखित किया) द्धारा जताए समर्थन का उल्लेख तो किया किन्तु अन्य दलों और नेताओं के मन्तव्य पर एक शब्द भी नहीं बोले।

बात यहीं समाप्त नहीं हुई। अण्णा, केजरीवाल और तीसरे सज्जन ने बार-बार (इसे ‘लगातार’ कहना अधिक अच्छा होगा) कहा कि यदि उनके मसविदे की, असहमतिवाली 6 बातों को सरकार ने अपने मसविदे में शरीक नहीं किया तो सरकार के विरुद्ध अनशन पक्का।

इसी बात और व्यवहार ने मुझे असहज किया और मैं घबराया।

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि जब कोई भी दल और उनका कोई भी नेता, अण्णा के मसविदे के समर्थन में एक शब्द नहीं बोल रहा है तो केवल सरकार को निशाने पर लेने का क्या मतलब हुआ? अपने मुद्दों को सरकार के प्रस्ताव में शामिल कराने का यह ‘अतिआग्रह’ (अण्णा से असहमत लोग इसे ‘दुराग्रह’ कह कर तसल्ली करना चाहेंगे) क्यों? आज की तारीख में (नीतिश कुमार को छोड़ कर) तमाम दल और नेता अण्णा के विरुद्ध ही हैं! अण्णा समूह इन सब को निशाने पर क्यों नहीं ले रहा? अनशन यदि करना ही है तो केवल सरकार के विरुद्ध ही क्यों? जन लोकपाल के मसविदे पर चुप्पी साधनेवाले या आंशिक सहमति देनेवाले राजनीतिक दलों के विरुद्ध भी क्यों नहीं? इन दलों और नेताओं का नाम भी नहीं लेना और सरकार को (तथा केवल सरकार को ही) निशाने पर लिए रहना समूचे आन्दोलन की नीयत पर सन्देह करने के अवसर उपलब्ध कराता है। फिर, यदि सरकार असहमतिवाले मुद्दों को अपने प्रस्ताव में शामिल नहीं करे तो अण्णा समूह को चाहिए कि संसद में सरकार के प्रस्ताव पर बहस के दौरान, किसी भी सांसद के माध्यम से संशोधन प्रस्तुत कराए। सरकारी प्रस्ताव पर संशोधन रखने की सुविधा प्रत्येक दल और सांसद को है। असहमति वाले मुद्दों पर संशोधन रखवा कर, उन पर बहस करवा कर अण्णा समूह तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं की असलियत देश के लोगों को बता सकता है। क्या अण्णा समूह को ऐसा एक भी सांसद नहीं मिलेगा? यदि नहीं मिले तो यह तो अण्णा समूह के पक्ष में अपने आप ही बहुत बड़ा हथियार होगा। जन लोकपाल के अपने मसविदे से असहमत (या कि समर्थन न देकर गोलमोल बातें करनेवाले) दलों और नेताओं का उल्लेख अण्णा समूह सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं कर रहा? ‘इस चुप्पी’ का तो एक ही मतलब निकाला जाएगा कि अण्णा समूह केवल सरकार की फजीहत करने और कराने पर तुला हुआ है। इसका दूसरा (और तब ‘एकमात्र’) मतलब यही होगा कि अण्णा समूह तमाम प्रतिपक्षी दलों और नेताओं को राजनीतिक सुविधा उपलब्ध करा रहा है, उनके राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने में सहायक हो रहा है।


ऐसे में, यह जरूरी क्यों किया जा रहा है कि यदि सरकार, अण्णा समूह के मनोनुकूल मसविदा प्रस्तुत नहीं करती तो फौरन अनशन शुरु कर दिया जाए? क्या यह मुमकिन नहीं कि संसद में लोकपाल प्रस्ताव की अन्तिम दशा तय होने के बाद ही अनशन पर विचार किया जाए? यह मान भी लिया जाए कि संसद में पारित लोकपाल वैसा ही होगा जैसा कि सरकार चाहती है (बकौल अरविन्द केजरीवाल ‘जोकपाल’)। तो क्या वह ऐसा मसविदा होगा जिसमें भविष्य में कभी कोई संशोधन नहीं किया जा सकता? तब सरकारी प्रस्ताव पर तमाम राजनीतिक दलों की असलियत सामने आ जाएगी और अण्णा समूह सारे देश को, अधिक आसानी से यह विश्वास दिला सकेगा कि उसकी आशंकाएँ शब्दशः सच साबित हुई हैं और संसद द्वारा पारित मसविदे को सिरे से ही खारिज किया जाना चाहिए। मेरी निजी धारणा है कि ऐसा करना अधिक अच्छा होगा।

अण्णा समूह की उपरोक्त बातों से मुझे लग रहा है कि समूचे आन्दोलन पर प्रतिपक्ष के राजनीति स्वार्थ सिद्ध करने का आरोप बहुत ही आसानी से मढ़ दिया जाएगा या कि अभी जो आरोप लगाया जा रहा है, उस पर मुहर लगाने में लोगों को आसानी होगी।


इसलिए मेरी (बिना मॉंगी) राय है कि -

अण्णा समूह यदि 16 अगस्त से अनशन पर आमादा है तो वह अनशन (जन लोकपाल के मसविदे को शब्दशः समर्थन न देनेवाले) तमाम राजनीतिक दलों के विरुद्ध हो - केवल सरकार के विरुद्ध नहीं।


और/या


संसद में सरकार के प्रस्ताव की अन्तिम दशा तय होने के बाद ही अनशन करने पर विचार किया जाए।

मुमकिन है, मेरा सोचना और मेरी बातें किसी ‘घबराए हुए दिग्भ्रमित व्यक्ति’ का सोच और बातें हों। किन्तु मेरी यह दशा अपने आप नहीं हुई है। उन्हीं बातों से हुई हैं जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया है।

क्या ‘ऐसा’ मैं अकेला होऊँगा?


तसल्ली और उम्मीद की बात यही है कि आज, 03 जुलाई को रही, सर्वदलीय बैठक में

काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा।

जन लोकपाल : संघर्ष की शुरुआत तो अब हुई है

जन लोकपाल को लेकर परिदृष्य रोचक होता जा रहा है। मुमकिन है कि ‘अण्णा समूह’ को तो शुरु से ही पता रहा हो किन्तु जन सामान्य को अब धीरे-धीरे मालूम होने लगा है कि -

- ‘अण्णा समूह’ का रास्ता आसान नहीं है। और


- केवल काँग्रेस या केन्द्र सरकार नहीं बल्कि तमाम राजनीतिक दल ‘अण्णा समूह’ के विरोध में एक जुट खड़े हुए हैं।

- और यह भी कि ‘अण्णा समूह’ और उनके अभियान को हथियार बनाकर भाजपा सहित तमाम प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों ने खुलकर और जी भरकर अपनी-अपनी राजनीति कर ली और ‘अण्णा समूह’ को मझधार में छोड़ दिया। दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। ठेंगा दिखा दिया।


जन लोकपाल के अपने मसविदे पर समर्थन जुटाने के लिए ‘अण्णा समूह’ ने एक के बाद एक, सारे राजनीतिक दलों से मिलने का क्रम शुरु किया। यह काफी पहले ही कर लिया जाना चाहिए था। क्योंकि सरकार जैसा भी मसविदा पेश करेगी, जाएगा तो वह अन्ततः संसद के सामने ही जहाँ ये सारे राजनीतिक दल अपनी-अपनी तलवारों की धार तेज किए बैठे हैं। ‘अण्णा समूह’ की यह शुरुआत, ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ ही कही जाएगी।

इस शुरुआत के बाद से जो कुछ भी सामने आ रहा है वह हमारे तमाम राजनीतिक दलों की असलियत उजागर कर रहा है। जिस-जिस भी राजनीतिक दल और उनके नेताओं से अण्णा और उनके लोग मिले हैं उन सबने अण्णा की और अण्णा के अभियान की खुलकर तारीफ की और कहा कि वे सब, 16 अगस्त से शुरु होनेवाले अण्णा के अनशन को समर्थन देंगे। किन्तु एक भी दल और एक भी नेता ने, ‘अण्णा समूह’ के ‘जन लोकपाल मसविदे’ का समर्थन नहीं करने की चतुराई भरी सावधानी बरती। यह सचमुच में रोचक अजूबा है कि अण्णा के अभियान और उनके अनशन का तो समर्थन किया जा रहा है किन्तु उनके मसविदे के समर्थन में गलती से भी एक शब्द भी नहीं कहा जा रहा है। जाहिर है कि अण्णा के चाहे न चाहे, अण्णा के जाने-अनजाने, उन्हें हथियार बनाकर केवल राजनीति की गई और यह क्रम जारी है।


‘अण्णा समूह’ ने एक मामले में अवश्य चौंकाया। मन्त्रियों और ‘सिविल सोसायटी’ की संयुक्त मसविदा समिति की बैठकों के बाद, ‘सिविल सोसायटी’ की ओर से अण्णा, केजरीवाल, भूषण आदि जिस प्रकार बैठकों की कार्रवाई की विस्तृत जानकारी मीडिया को देते थे और सरकार को कटघरे में खड़ा करते थे, वैसा कुछ भी इन्होंने, इन दलों और नेताओं से मिलने के बाद एक बार भी नहीं किया। अच्छा होता कि प्रत्येक दल और उनके नेताओं से मुलाकात के बाद अण्णा और/या उनके साथी, इन चर्चाओं की विस्तृत जानकारी भी सार्वजनिक करते। तब, देश के लोगों को अधिक जल्दी तथा अधिक स्पष्टता से ‘हमाम के नंगों’ की असलियत मालूम हो पाती। लेकिन शायद अण्णा और उनके साथियों ने जानबूझकर, (सम्भवतः, सारे मोर्चे एक साथ न खोलने की) किसी रणनीति के तहत यह ‘भलमनसाहत और उदारता’ बरती हो।

‘अण्णा समूह’ को तमाम राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से मिलकर अब तक जो कुछ मिलता नजर आ रहा है, अण्णा और उनके साथियों के चेहरों पर जो उदासियाँ नजर आ रही हैं उससे साफ लग रहा है कि शेष दलों और उनके नेताओं से इन्हें आगे भी ‘शून्य’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलनेवाला।

समूचा परिदृष्य पल प्रति पल रोचक होता जा रहा है। संघर्ष का वास्तविक स्वरूप और वास्तविक साथियों की शकलें तो अब सामने आएँगी।

राजनीतिक हथियार तो नहीं बना लेंगे सिविल सोयायटी को?

यह बात कल रात मन में अचानक ही आई। मुझे ‘सिविल सोसायटी’ का रास्ता आसान नहीं लग रहा। कहीं ऐसा तो नहीं भाई लोग इसके कन्धों पर अपनी राजनीति कर रहे हैं?


‘जन लोकपाल’ के अपने मसौदे के एक-एक बिन्दु को स्वीकार कराने के लिए जूझ रही सिविल सोसायटी की बातों को सरकार भोथरा करे और इसकी विश्वसनीयता को संदिग्ध करे, यह तो समझ में आता है। किन्तु शेष राजनीतिक दलों में से कोई भी खुलकर ‘सिविल सोसायटी’ को ‘बिना शर्त समर्थन’ देता नजर नहीं आ रहा।

‘सिविल सोसायटी’ के ‘जन लोकपाल ड्राफ्ट’ के नाम पर, सरकार के तमाम विरोधी दल सरकार को निशाने पर लिए हुए हैं। जी भर उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, उसकी फजीहत कर रहे हैं और अपनी सारी राजनीतिक भड़ास निकाल रहे हैं। किन्तु अचानक ही इस बात ने मेरा ध्यानाकर्षण किया कि ‘जन लोकपाल बिल’ की आड़ में सरकार की धज्जियाँ उड़ा रहे राजनीतिक दलों और नेताओं में से एक ने भी नहीं कहा कि वह ‘सिविल सोसायटी’ के ‘जन लोकपाल ड्राफ्ट’ को जस का तस स्वीकार करता है और संसद में आँख मूँदकर इसका समर्थन करेगा।

रह रह कर मुझे यह सवाल कचोट रहा है कि ‘सिविल सोसायटी’ का नाम लेकर सरकार की धज्जियाँ उड़ा रहे राजनीतिक दल, संसद में इसके ‘जन लोकपाल ड्राफ्ट’ का समर्थन करेंगे भी या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये सब, ‘सिविल सोसायटी’ की दुहाइयाँ देकर अपने-अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने की चेष्टा मात्र कर रहे हैं?

ईश्वर करे कि मेरा यह सन्देह झूठा साबित हो। किन्तु यदि वह सच साबित हो गया तो ‘सिविल सोसायटी’ तो संसद में पूरी तरह से अकेली पड़ जाएगी! सरकार तो उसका विरोध कर ही रही है, बाकी राजनीतिक दल भी उसे मझधार में छोड़ देंगे!
तब, पूरे देश की आशाओं का क्या होगा?


क्या सबके सब, संसद में एकजुट होकर ‘सिविल सोसायटी’ (और उसके जरिए देश के तमाम लोगों) को ठग लेंगे?


मुझे आसार अच्छे नहीं लग रहे।

‘सिविल सोसायटी’ इस पर विचार करे

सम्भव है, जो कुछ कहने जा रहा हूँ वह पहले ही कहा जा चुका हो। तब, मेरे इस लिखे की अनदेखी कर दी जाए। किन्तु यदि ऐसा नहीं है तो निवेदन है कि मेरी इस बात को ‘सिविल सोसायटी’ तक पहुँचाने का उपकार करें।

मैं इतनी गुंजाइश रख कर चल रहा हूँ कि ‘सिविल सोसायटी’ की सारी बातें जस की तस मानने जैसी न हों। साफ लग रहा है कि ‘सिविल सोसायटी’ के मुद्दे को भोथरा करने के लिए सरकार हर जुगत भिड़ा रही है। अपने स्तर पर वह यथा सम्भव कोशिश करती नजर आ रही है कि ‘सिविल सोसायटी’ के लोग ‘समिति’ की बैठकों का बहिष्कार कर दें, सरकार को खुल कर खेलने का मौका मिल जाए और ठीकरा ‘सिविल सोसायटी’ के माथे फोड़ दिया जाए।

ऐसे में मेरा विचार है कि ‘सिविल सोसायटी’, ‘समिति’ की बैठक का बहिष्कार करने की बात सिरे ही निरस्त कर दे। प्रत्येक बैठक में पूरी तैयारी से भाग ले। अपनी बातें मनवाने का पूरा-पूरा प्रयास करे। जिस मुद्दे पर सफलता न मिले उस पर अपनी असहमति, बैठक के कार्रवाई विवरण में दर्ज कराए और प्रत्येक बैठक के तत्काल बाद मीडिया को विस्तृत जानकारी इस तरह दे कि लोगों को बैठक के ‘लाइव कवरेज’ की कमी अनुभव न हो।

‘समिति’ की अन्तिम बैठक के बाद ‘सिविल सोसायटी’ के सामने पूरा चित्र स्पष्ट होगा। इस सुविधा का समुचित लाभ उठाते हुए ‘सिविल सोसायटी’ व्यापक जनमानस तो बनाए ही, विभिन्न दलों और सांसदों को अपनी बात विस्तार से लेखी में सौंप कर, सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले लोकपाल विधेयक में ‘समिति’ के लोकपाल बिल के प्रारूप के उन समस्त प्रावधानों को संशोधन के रूप में शामिल कराने की कोशिश करे जो बैठकों में सरकार द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं।

एक रास्ता और अपनाया जा सकता है।

‘समिति’ की अन्तिम बैठक की समाप्ति वाले क्षण से ‘सिविल सोसायटी’ को सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जानेवाले विधेयक की रूपरेखा लगभग पूरी की पूरी मालूम हो चुकी होगी। उस दशा में ‘सिविल सोसायटी’, किसी दल अथवा किसी सांसद की ओर से ‘व्यक्तिगत विधेयक’ के रूप में, विधेयक के अपने प्ररूप को विचार के लिए संसद में प्रस्तुत करवा दे। ऐसा करने का अधिकार और सुविधा प्रत्येक राजनीतिक दल और सांसद को प्राप्त है।

यदि ऐसा किया गया तो सब दलों की और सांसदों की सचाई सामने आ जाएगी। मालूम हो जाएगा कि लोकपाल बिल के, ‘सिविल सोसायटी’ के प्रारूप को कौन समर्थन दे रहा है और कौन नहीं।

अपना अनुरोध दोहरा रहा हूँ - ‘सिविल सोसायटी’ इस पर विचार अवश्य करे।