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कवि नहीं, मेरे अग्रज : सरोज भाई


(यह आलेख, सरोज भाई के 75वें जन्म दिन, 02 जनवरी 2013 पर प्रकाशन हेतु, आग्रह पर लिखा था।)  

अब तो यह भी याद नहीं आ रहा कि सरोज भाई से पहली बार कब मिला था या कि कब उन्हें पहली बार देखा था। बस, इतना याद पड़ रहा है कि उनके ‘नवोदित काल में, उनकी कविताओें के बराबर ही होती रही उनकी सुरुचि, सुघड़ता, नजाकत की चर्चाओं ने अतिरिक्त रूप से आकृष्ट किया था, उनके प्रति अतिरिक्त जिज्ञासा जगाई थी। अब अखबार या पत्रिका का नाम तो याद नहीं आ रहा किन्तु उनकी सुन्दरता और नजाकत का उल्लेख करते हुए सपरिहास कल्पना की गई थी कि उन्हें कभी ‘सरोज कुमार’ के स्थान पर ‘उरोज कुमार’ न लिख दिया जाए। अपने नाम के साथ ‘कुल नाम’ (सरनेम) न लिखना भी उन्हें सबसे अलग कर रहा था। इन्हीं सब बातों के कारण, उनसे ‘मिलने’ से अधिक उन्हें ‘देखने’ की जिज्ञासा हुई थी।

सो, उन्हें ‘देखा’, उनसे मिला और उसके बाद शुरु हुआ सिलसिला आज इस मुकाम पर है कि मैं उन पर कुछ लिखने की स्थिति में आ गया।

उनसे परिचय का कारण निस्सन्देह उनका कलमकार होना ही था किन्तु आज वे ‘मेरे प्रिय कवि’ को कोसों पीछे छोड़कर अग्रज बन गए हैं। ऐसे अग्रज जिनसे मैं खुलकर बात करता हूँ और अपनी गलती/मूर्खता के कारण उनसे डरता भी हूँ। मैं कबूल करता हूँ कि मुझे उनकी एक भी कविता कण्ठस्थ नहीं है किन्तु उनका व्यक्तित्व मुझे नींद में भी याद रहता है। मेरे तईं उनका ‘भला मानुष’ होना उनके ‘कलमकार’ को पीछे छोड़ चुका है। इतना पीछे कि मैं उनसे ‘प्रभावित’ नहीं, ‘सम्मोहित’ हूँ। मन्त्र बिद्ध की तरह।

उनका, अकारण न बोलना, कम बोलना, धीमी आवाज में बोलना मुझे, उनसे परिचय के पहले ही क्षण से आकर्षित और प्रभावित करता रहा है - इस क्षण तक भी। किन्तु इससे आगे बढ़कर उनकी जो बात मुझे आत्म-बल देती है, वह है - इसी धीमी आवाज में, शान्त और संयत रहते हुए दृढ़ता से प्रतिकार करना, असहमति जताना और ऐसा करने में निमिष मात्र का भी विलम्ब न करना। प्रतिकार और असहमति जताते हुए अच्छे-अच्छों को मैंने आवेशित होते देखा है। किन्तु सरोज भाई इस मामले में मुझे तो ‘अपवादों में अपवाद’ ही लगे। मुझे जब-जब भी ऐसे क्षणों का सामना करना पड़ा, तब-तब मैंने सरोज भाई की नकल करनी चाही किन्तु नहीं कर सका और हर बार गुस्से का गुलाम बन कर अपना नुकसान करवा बैठा। मुझे उनसे ईर्ष्या होती है, उन पर गुस्सा आता है - वे गुस्सा क्यों नहीं करते? चिल्ला कर डाँटते-डपटते क्यों नहीं?

उनके होठों पर अपना साम्राज्य बनाए बैठी उनकी ‘भुवन मोहिनी मुस्कान’ भी मुझे पेरशान करती है। मैंने जब भी अपना कोई दुखड़ा उनके सामने रोया तो उन्होंने मेरी बात ध्यान से सुनी तो जरूर किन्तु एक बार नहीं लगा कि वे गम्भीरता से सुन रहे हैं। मैं मरा जा रहा हूँ, अपना रोना रोए जा रहा हूँ और वे हैं कि मुस्कुराए जा रहे हैं! उस पर कठिनाई यह कि लिहाज में मैं अपनी यह मनोदशा उन्हें बता भी नहीं सकता! हर बार लगा कि मैंने बेकार में ही उनके सामने अपना रोना-गाना गाया। वे कोई मदद नहीं करेंगे। हर बार नाउम्मीद ही लौटा। किन्तु उन्होंने हर बार मेरी ऐसी ‘नाउम्मीदी’ को निरस्त कर दिया। दो-चार दिनों बाद उनका फोन आता - ‘अरे! विष्णु! सुनो! तुमने वो काम बताया था ना.......।’ और वे सिलसिलेवार, पूरा ब्यौरा दे कर, काम हो जाने की सूचना दे देते हैं। नितान्त एकान्त में उनकी बात सुन रहा मैं, खुद पर शर्मिन्दा होने लगता हूँ। इतना साहस भी नहीं जुटा पाता कि कह दूँ कि इस काम को लेकर मैंने उनके बारे में क्या सोचा था। उनके प्रति ऐसी असंख्य मूक शर्मिन्दिगियों और मूक क्षमा याचनाओं का बड़ा ढेर मेरे अन्तर्मन की शोभा बढ़ा रहा है।

माँगने पर नेक सलाह तो वे देते ही हैं किन्तु कुछ अनुचित करने पर उतनी ही चिन्ता और जिम्मेदारी से टोकते भी हैं। ऐसी टोका-टाकी करते हुए उनके स्वरों की व्यथा मुझे ठेठ भीतर तक हिला देती है। निश्चय ही उन्हें मुझसे ऐसी अपेक्षा नहीं रही होगी। मेरे कारण वे आहत-व्यथित हुए किन्तु अपनी दशा अव्यक्त रखते हुए मेरे सुधार की चिन्ता की।

मैं एक स्थानीय साप्ताहिक (‘उपग्रह’) में एक स्तम्भ लिखता हूँ। ‘उपग्रह’ उन्हें भी भेजा जाता है। दो-चार महीनों में उनका फोन आ ही जाता है। खूब प्रशंसा करते हैं। सराहते हैं। कभी-कभार ऐसा हुआ कि स्तम्भ नहीं लिख पाया। ऐसे प्रत्येक मौके पर उनका फोन आया। स्तम्भ न छपने की चर्चा कभी नहीं की। हर बार घुमा-फिरा कर पूछा - ‘‘तबीयत खराब तो नहीं? ‘उपग्रह’ वालों से झगड़ा तो नहीं हो गया?’’ मैं हँस देता हूँ। कहता हूँ - ‘साफ-साफ क्यों नहीं पूछते सरोज भाई?’ वे कहते हैं - ‘वही तो पूछ रहा हूँ।’ मैं, स्तम्भ न छपने का कारण बताता हूँ। वे कहते हैं - ‘हाँ। ठीक है। झगड़ा मत करना और लिखना कभी भी बन्द मत करना। लिखते रहना।’    

उनकी एक और बात जो मुझे ‘प्रभावित’ से आगे बढ़कर ‘विस्मित’ करती है, वह है उनके ठहाके। धीमी आवाज में बोलनेवाला कोई आदमी ऐसे आकाश-भेदी ठहाके कैसे लगा लेता है भला? उनके ठहाके देर तक नहीं, दिनों तक कानों में गूँजते रहते हैं।

पता नहीं, यह कामना मैं सरोज भाई के लिए कर रहा हूँ या खुद के लिए कि ये गगन-भेदी ठहाके यूँ ही गूँजते रहें और उनके शतायु-प्रसंग पर एक बार फिर ऐसा ही कुछ करने/कहने का अवसर मिले।

बिना शीर्षक : सरोजकुमार


                                 मेरे बारे में
                                 किसने किससे
                                 क्या क्या कहा,


                                 यह जान लेने पर
                                 मेरा कोई दोस्त
                                 नहीं रहा!


ये पंक्तियाँ, ‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह के पहले पन्ने पर दी गई हैं। मैंने जानबूझकर इन्हें सबसे अन्त में दिया है।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.
 

प्रदर्शनी के गुलाब : सरोजकुमार

श्वेत, लाल, पीले, नीलाभ
गुलाब ही गुलाब ही गुलाब!
घुँघराली, दल पर दल पंखुरियाँ!
काँटों की सीढ़ियाँ, हरी-हरी पत्तियाँ!
एक-एक पौधे से एक-एक डाली
कटी-छँटी सज-धज नखराली!
श्रंगों की रति का मनचीता त्यौहार
नयनाभिराम मोहक अलौकी संसार!


मैंने प्रदर्शनी के गुलाबों से पूछा:
कैसा लग रहा है?
कोई टिप्पणी?
बोले-यहाँ क्या निहारते हो
बन्द-बन्द हॉल में, पण्डाल में,
वहाँ आओ, जहाँ हम चहकते हैं
महकते हैं, क्यारियों के थाल में!
पर आप वहाँ क्यों आएँगे
हमको ही टहनियों से काट-छाँट लाएँगे,
सुन्दर होने की सजा देंगे,
फिर सजाएँगे!


अब हम हैं भी क्या?
आपके सौन्दर्यबोध की सेवा में
आपके अवलोकनार्थ
अपने ताजा शव हैं!
आप हमें निहारकर अपने घर जाएँगे
पर हम तो अब
अपने घर नहीं लौट पाएँगे!


अपनी जड़ों से कटने के बाद
कोई कहीं का नहीं रहता!
देखना दिखाना कुछ घण्टों का
फिर आप ही हमें
घूरे पर पटक आएँगे!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

आत्मसम्वाद : सरोजकुमार

मैं जब-जब अपने से
बातें करना चाहता हूँ
न जाने कौन-कौन
बीच में आ जाता है
आत्म-सम्वाद बाधित करते हुए!


उन्हें दूर तक धकियाता हूँ
मुक्त होता हूँ!
पर जब वापस लौटता हूँ अपनी जगह
तब स्वयम् को वहाँ नहीं पाता
जहाँ अभी-अभी
छोड़कर गया था!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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वाहन और सापेक्षतावाद : सरोजकुमार

मैं जब मोटर में बैठता हूँ
मुझे ताँगे-बुर्जुआ
ऑटोरिक्शे फड़तूस
टेम्पो सड़कछाप
और साइकिलें सर्कसिया लगती हैं!


मैं जब ताँगे में बैठता हूँ
मुझे मोटरें सफेद हाथी
रिक्शे आवारे
टेम्पो भोंडे
और साइकिलें छिछोरी लगती हैं!


ऑटोरिक्शे में बैठने पर
मुझे मोटरें स्नॉब
ताँगे ऐतिहासिक
टेम्पो रिडक्शन-सेल
और साइकिलें कंजूस लगती हैं!


मुझे टेम्पो में बैठने पर
मोटरें दुश्मन
ताँगे तमाशा
रिक्शे फिजूल खर्च
और साइकिलें दयनीय लगती हैं!


जब मैं साइकिल पर होता हूँ
मुझे मोटरें वर्ग-भेद
ताँगे सामन्ती
रिक्शे चोंचले
और टेम्पो यमदूत लगते हैं!


मुझे पाँव-पाँव होने पर
मोटरें, ताँगे, रिक्शे, टेम्पो या सइकिलें
खरगोशी आपाधापी के नुमाइन्दे
और फुटपाथ, कछुआ दौड़ की
सुरक्षित गैलरी सा लगता है!


कभी, मन गति को
कभी मन, दृश्यों को ठगता है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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ये शीर्षक मेरी कविता का नहीं : सरोजकुमार

ये हाथ:
मेरी चेतना ने नहीं उठाया है!
ये मुस्कान:
मेरी प्रसन्नता की नहीं है!
ये आभार:
किसी अनुग्रह का नहीं है!
ये प्रशंसा:
किसी करतब की नहीं है!
ये नारे:
मेरे संकल्प के नहीं हैं!
ये आवाज:
मेरी आत्मा की नहीं है!
ये हड़बड़ी:
मेरे आवेश की नहीं है!
 
ये मुस्कान, ये प्रशंसा,
ये हड़बड़ी, ये आवाजें
ये नारे, ये नजारे
मेरे जीवन की शैली हैं
‘‘शैली ही जीवन है’’-
शेष सभी कुछ कालपात्र में गाड़ दो
जिसे मेरे विरोधी जरूर उखाड़ेंगे
और रोएँगे मेरे नाम को!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

गुस्सा कविता नहीं बन पा रहा है : सरोजकुमार

मेरा गुस्सा नहीं बदल पा रहा है
कविता में!
कविता की नस-नस में
व्याप जाए लावा
कविता की धड़कनों में
खड़कने लगे शंखध्वनि-
तब तो बात बने!
शायद मेरे बस का नहीं
कि लपलपाता गुस्सा
उतार सकूँ कविता में!


लोग वाह-वाह करें
और गुस्सा उन्हें उबाल न पाए,
यह मुझे बरदाश्त नहीं!
क्विता पहले और गुस्सा बाद में
मुझसे नहीं होगा!


मैं पालकी का नहीं
प्रतिमा का जुलूस चाहता हूँ!


आखिर गुस्सा लेकर
मुझे कविता में
घुसना ही क्यों चाहिए,
यह भी सोचता हूँ!
गुस्से के कपड़ों में
पगलाती कविता के
गाल लाल हो जाते हैं
भुजाएँ फड़कने लगती हैं
आँखें बरसाती हैं अंगारे
पर
उन्हें सुनकर
श्रोता मजा लेने लगते हैं
वीर रस का!


और-और मजा चाहते हुए
वंस मोर, वंस मो चीखते हैं
पर खलनायकों के खिलाफ
खड़े होते नहीं दीखते हैं!


कविता को छोड़कर
क्या शस्त्रागार में घुसना
ठीक होगा?
पर वहाँ इन दिनों
योग की कक्षाएँ लग रही हैं!


गुस्सा कविता नहीं बन पा रहा है,
और मेरे पास
कविता के अलावा कोई शस्त्रागार
नहीं है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

आत्मरति : सरोजकुमार

बगीचे की बेंच पर निराश बैठ गया
तय किया, अब कुछ नहीं लिखूँगा!
क्ला-वला, साहित्य-वाहित्य बकवास है
इनके औसारे अब नहीं दिखूँगा!


हाशियों में पड़े-पड़े
कब तक मुरझाऊँगा
आराम से जिऊँगा, फिल्मी गाने गाऊँगा!
दुनिया भर की, मुझे क्यों पड़ना चाहिए?
फटाफट नसैनियाँ चढ़ना चाहिए!


मेरी बात गुलाब ने सुनी
चमेली ने सुनी
गुलदावदी ने सुनी और सबको सुनाई
सबने फटकारा:
जब-जब हमें दुनिया ने नोंचा है
हमने भी, तुझ जैसा ही सोचा है!
दुनिया से हमने भी बचना चाहा है
फूलों की जगह
कुछ और रचना चाहा है!
पर जब-जब कोशिश की,
फूलो के सिवाय
कुछ रचना नहीं आया,
अपने अभिशापों से बचना नहीं आया।

फूलों का सिरजन ही हमारी नियति है!
तू भी घर लौट जा
यह वैराग्य नहीं, आत्मरति है।

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

चादर : सरोजकुमार

चादर के हिसाब से
पाँव वह पसारे
जो अपने नाप की चादर
बुन नहीं सकता हो!


पर वह जो नया-नया उभरा है
जिसकी अस्थियाँ और मज्जा
अभी रास्ते में हैं
उसे मत सिखाओ
चादर का गणित!


उसने यदि पाँव
अभी से सिकोड़े,
वह चल भी नहीं पाएगा
कभी अपने पाँवों पर!
उसे अपनी चादर के बाहर
फैलने दो,
फटने दो चादर को!


चादर का क्या है
वह तो
सफलता की दासी है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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सपाट संसार : सरोजकुमार

जो झूठ को झूठ नहीं कह पाता,
वह सच को सच क्या कहेगा!
जो दुश्मन को दुश्मन नहीं कह पाता,
वह दोस्त को दोस्त क्या कहेगा!
जो काँटे को काँटा नहीं कह पाता,
वह फूल को फूल क्या कहेगा!


जिसे बुरा, बुरा नहीं लगता,
उसे भला, भला क्या लगेगा?
जिसे अन्याय, अन्याय नहीं लगता,
उसे न्याय, न्याय कैसे लगेगा?
जिसे गुलामी, गुलामी नहीं लगती,
उसे आजादी, आजादी कैसे लगेगी?


जिसके लिए पाप, पाप नहीं है,
उसके लिए पुण्य, पुण्य कैसे होगा?
जिसके लिए आग, आग नहीं है,
उसके लिए पानी, पानी कैसे होगा?
जिसके लिए धरती, धरती नहीं है,
उसके लिए आकाश, आकश कैसे होगा?


ज्ञान और साहस है-
तो जीवन है, ठाठ है!
जड़ता है, भय है-
तो संसार सपाट है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
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पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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खिड़कियाँ : सरोजकुमार

सवाल सिर्फ खिड़कियों का नहीं
                    उनके खुली रहने का है!


खिड़की होने भर से
                    खिड़की नहीं हो जाती,
काल-कोठरियों में भी होती हैं
बन्द रखी जाने के लिए खिड़कियाँ!


दीवारें जनम से सबके साथ हैं
सख्त से सख्ततर होती हुईं
खिड़कियाँ
दीवारों को भेद कर ही सम्भव हैं!


ताजी हवा फेफड़ों के लिए
और संसार
सपनों की सेहत के लिए
जरूरी है!

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पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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दीदी : सरोजकुमार

भैया विदेश से लौटे नहीं
वहीं की शादी
                    और बस गए!
पैसे भेजते रहे!
पैसे आते रहे! पैसे भाते रहे!


पढ़-लिख कर मुन्नी कुसुम हुई
फिर सबकी दीदी!
दीदी ने नौकरी की
भैया ने बधाई भेजी
और पैसे भेजना बन्द कर दिया!
बूढ़े बाबूजी कहते:
                    कुसुम हमारी
बेटी नहीं, बेटा है!


दीदी ने छोटी कुन्दा की
शादी की!
छीदी की शादी नहीं हुई
शायद की नहीं!
अम्मा कहतीं:
                    भगवान बेटी दे, तो ऐसी दे!


बाबूजी चल बसे
अम्मा बस हैं ही हैं!
‘दीदी’ शब्द से
काफी बड़ी हो गई दीदी!
चश्मा पहनी तो
और बड़ी लगती हैं!


चुप रहने लगी हैं!
लोग कहते हैं
शादी नहीं होने के
                    सदमे से चुप्पी है!


कुन्दा, लड़कर
                    घर लौट आई
डेड़ साल की बच्ची ले!
माँ नाराज हुई
                    दीदी  आहत!
कुन्दा कहती है
विवाह नहीं कर दीदी ने
सुख ही सुख भोगा है,
उसे दुख सहने को भेजा
था रौरव में!
वह दीऽऽदीऽऽऽ अलापती
लिपट गई दीदी से
                    लिपटी रहने के लिए!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।
 
सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।
 
पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
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कार्टून : सरोजकुमार

तुम्हारे आगे आगे
विज्ञान
जासूसी कुत्ते की तरह
चल रहा है
रहस्यों को टटोलते
सूँघते!


वह यहाँ-वहाँ
चक्का काटकर
ठीक तुम्हारी ही बैठक में
लौटेगा
अपने ही हाथों
तुम्हारी गिरफ्तारी
सुनिश्चित है!


जीवन और जगत की
एक-एक परत उधेड़ना,
कमाल कहा जाएगा,
उपलब्धि नहीं!


नाप से बड़े कपड़े ही
हमारा कार्टून नहीं बनाते
जरूरत से ज्यादा
चमक अन्धा,
धन बावला और
अकल पागल बना देती है!


दूरबीन से अधिक कीमत
आँख की होती है,
मुट्ठी भी बँधी हुई
लाख की होती है।

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पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

बयान : सरोजकुमार

मुझे नहीं पता, वे क्यों पढ़ने आते हैं
मुझे नहीं पता, मैं क्या उन्हें पढ़ाता हूँ
मुझे नहीं पता, वे इतने खुश कैसे हैं
मुझे नहीं पता, मैं अब तक दुखी क्यों नहीं!


मुझे नहीं पता, वे क्यों तिनके से बहते हैं
मुझे नहीं पता, क्यों तूफान से उफनते हैं
इस पल में मेमने उस पल में तेंदुए
किस रिंग मास्टर का खेल वे दिखाते हैं!


कक्षा के बाहर मैं, क्यों दर्शक बन जाता हूँ
कक्षा के भीतर क्यों नाटक दिखाता हूँ!
मुझ पर वे टिक हैं, यह उनका भ्रम है
डन पर टिके रहना, मेरा कार्यक्रम है!


मुझे नहीं पता, वे कहाँ से आए हैं
मुझे नहीं पता, वे कहाँ चले जाएँगे!
घाट की तरह बस मैं लहरों को गिनता हूँ
मुझे नहीं पता, नदी मेरी क्या लगती है!


मुझे नहीं पता, यह युद्ध या तमाशा है
ज्ञान और अज्ञान, कौन गोगियापाशा है!

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पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।
 
अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।
 
पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.
 

बागडोर : सरोजकुमार

हम प्यार नहीं करते
हमारी शादी हो जाती है
शादी के बाद की करनी को
हम प्यार कहते हैं!
हमारा प्यार
हमारे माता-पिता तय करते हैं
माता-पिता का प्यार
उनके माता-पिता ने तय किया था!



खुफिया आँखों से
जँचा हुआ प्यार
कभी अन्धा नहीं होता!


! वयस्क युवक-युवतियों,
तुम मनपसन्द विधायक चुनो
मनपसन्द संसद बनाओ
देश की बागडोर तुम्हारे हाथ में है,
उसी हाथ में,
जिसे अपने प्यार को
वोट देने की इजाजत नहीं है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

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अपने ही फासले : सरोजकुमार

सपनों के पैताने अमलतास
बिस्तर पर सिरहाने च्यवनप्राश!

तन-मन की दूरी को
जीवनभर नापते
घाव हुए पैर रिसे
हाँफते-हाँफते!


सपनों में मेघदूत आवारे
जीवन में खिड़की भर हरी घास!


दूर-दूर पहुँच गए
मंजिल पर काफिले,
मिटे नहीं अपने से
अपने ही फासले!


सपनों में इन्द्रधनुष, कार्निवाल
कालिज में हिन्दी की वही क्लास!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

कविता फरमाइशी प्रोग्राम नहीं है : सरोजकुमार

कवि नहीं है पंसारी
कि उसकी तराजू
तौले, ठीक
वैसा ही
जैसा मण्डी में तुलता है!


उसके एक पलड़े में सूरज
और दूसरे में
तितली हो सकती है,
एक में कबूतर
और दूसरे में
पिस्तौल हो सकती है!


दरअसल जिसे आप
पंसारी मान रहे हैं
ये आपको ही तौल देगा
और आपके वजन की
पोल खोल देगा!


इसकी दूकान पर, आप
यों ही
घूमते-फिरते निकल आया करें
उससे
खरीद फरोख्त न करें!
कहीं आप चाहें भजन
और वे आपको
ईश्वर के नाम का
मर्सिया दे दें!
टाप माँगें लोरी
और ये आपको
टूटे सपनों का
कनस्तर बजाती हुई
नींद दे दे,
आपकी ख्वाहिश हो राष्ट्रगीत
और ये आपको
घूरे में से बीनकर
सम्विधान के पन्ने दे दे!


माँगना मत उससे कुछ
वही अगर कुछ दे दे
तो ले लेना,
इस पंसारी का धन्धा
आम नहीं है,
और कविता:
फरमाइशी प्रोग्राम नहीं है!

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सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

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रास्ते : सरोजकुमार

सबसे बचते, बचाते
टकराते, लाँघते
नदी
अपना रास्ता खुद
बनाती है!


कभी सीधे नहीं होते
नदी के रास्ते!

सीधे होते हैं
जिनके रास्ते
वे खुद के बनाए
नहीं होते!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

बिकने की आजादी : सरोजकुमार

सरकार ने उसे खरीद लिया है
कहने से बेहतर होगा कहना-
कि उसने स्वयम् को बेच दिया है!
जो चीज बिकाऊ नहीं होती
उसे उड़ाया चाहे जा सकता हो
खरीदा नहीं जा सकता!

वह चालाक जरूर रहा होगा,
उसने आसामी बड़ा चुना!
इतने बड़े ग्राहक को देखकर ही
शायद, उसे बिकने की सूझी हो!
अन्यथा वह
स्वतन्त्रचेता, बुदिजीवी, सृजनकर्मी जैसे
आत्मकथ्य से
नीचे नहीं उतरता!


सरकार को क्या मिला?
कुछ कटे हुए नाखून
कुछ टूटी हुई रीढ़ें
झुकी हुई कलमें
और कूचियाँ!
और उसे पद, प्रतिष्ठा
बंगला और रौब!


वह जब यह समझाने की
कोशिश करता है
कि वह बिका नहीं है कतई
तब उस पर दया आती है
जिसकी उसे जरा भी जरूरत नहीं है!
और वे तो ईर्ष्यावश
उसे कोसते फिरते हैं,
जो उससे काफी कम दामों पर
उपलब्ध थे!


उसका सवाल भी गलत नहीं है
कि बिका भी है वो अगर
तो ऐसा क्या कर डाला है,
कि उसे कीचड़ से पोता जाए?
किसी विदेशी या दुश्मन को तो नहीं बिका!
-अपनी सरकार
-अपने लिए
-अपने द्वारा,
-उसने बेचा अपने को
-अपने लिए
-अपने द्वारा,
बिकने की आजादी
सम्वैधानिक है!


फिर, बिक सकेगा वही
जिसकी डिमाण्ड होगी,
आप बिकने की कोशिश कर देखिए
सरकार तो दूर
म्युनिसिपैलिटी भी घास नहीं डालेगी!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

शुभचिन्तक : सरोजकुमार

मेरा मित्र स्वस्थ होकर
अस्पताल से घर लौट आया!
मैं अफसोस मना रहा हूँ,
यह सोचते हुए
कि मैं उसकी मिजाजपुर्सी को
पहुँच पाता
उसके बाद वह स्वस्थ होकर
घर लौटता
तो कितना अच्छा होता!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.