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तोड़ दो यह बाँध


दादा की यह कविता इसलिए तनिक अनूठी है कि यह उनके किसी संग्रह में नहीं है किन्तु यू ट्यूब पर इसके ढेरों वीडियो उपलब्ध हैं। इतने वीडियो, उनकी और किसी कविता के उपलब्ध नहीं हैं। 


                                            जब धरा पर धाँधली
                                            करने लगे पागल अँधेरा।
                                            और मावस धौंस देकर
                                            छीन ले तुमसे सवेरा।
                                            तब तुम्हारा हार कर, 
                                            यूँ बैठ जाना
                                            बुजदिली है, पाप है
                                            आज की इन पीढ़ियों का
                                            बस यही सन्ताप है।

                                            अब भी समय है
                                            आग को अपनी जलाओ।
                                            बाट मत देखो सुबह की
                                            प्राण का दीपक जलाओ।

                                            मत करो परवाह
                                            कोई क्या कहेगा
                                            इस तरह तो वक्त का दुश्मन
                                            सदा निर्भय रहेगा।

                                            सब्र का यह बाँध तुमने
                                            पूछ कर किससे बनाया?
                                            वह कौन है जिसने तुम्हें
                                            इतना सहन करना सिखाया?

                                            तोड़ दो यह बाँध
                                            बहने दो नदी को।
                                            दाँव पर खुद को लगा कर
                                            धन्य कर दो इस सदी को।
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महल से नीचे पधारो

 

बालकवि बैरागी

महल से नीचे पधारो, देश फिर वन्दन करेगा
फिर वही अर्चन करेगा, और अभिनन्दन करेगा
महल से नीचे पधारो.....

00000

बहुत दिन पहले कहा था, फाँस गहरी गड़ रही है
नाव डगमग हो रही है, औ’ भँवर में पड़ रही है
घाव बहने लग गये हैं, ओज सब ढलने लगा है
बेबसी बढ़ने लगी है, हर रुँआ जलने लगा है
किन्तु तुमने मुँह सिकोड़ा, औ’ मुझे दी गालियाँ
और सत्ता की सुरा की, खूब ढाली प्यालियाँ

किन्तु अब मेरा कहा, फरमान बनने जा रहा है
अब सिकोड़ो नाक-भौंह, वो काल सिर पर आ रहा है

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

आग में रख दो, कमीनी कुर्सियों को तोड़ दो
हद से ज्यादह हो गया है, मेनका को छोड़ दो
संगठन सब सड़ गया है, कोढ़ कितनी गल रही है
तुम समझते हो कि गाड़ी, पटरियों पर चल रही है
आँख तो खोलो जरा, , देखो हकीकत और है
महल जो तुमने बनाया, किस कदर कमजोर है

पुण्य जितना था पुराना, सब भुना कर खा गये हो
तुम कहाँ पर जा रहे थे, औ’ कहाँ पर आ गये हो

इसलिए फिर कह रहा हूँ
महल से नीचे पधारो.....

00000

ये महल, ये कुर्सियाँ, गर देश है तो सब रहेंगे
बात कुछ नीची हुई तो, सब बुरा तुमको कहेंगे
इस तरह इन आँधियों में, तुम अड़े कैसे रहोगे?
पाँव ही जब तोड़ लोगे, फिर खड़े कैसे रहोगे?
अफसोस! सत्ता के नशे में, किस कदर तुम खो गये हो
सौ नरक बस जायें, इतने पाप तुम खुद कर गये हो

मैं कसम से कह रहा हूँ, अब सहा जाता नहीं है
क्या कहूँ? कैसे कहूँ, कुछ भी कहा जाता नहीं है

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

किस कदर तुम हो गये हो, दूर इस आवाम से
कर रही हैं पीढ़ियाँ थू-थू तुम्हारे नाम से
उफ! शहीदों का चमन, सारा उजड़ता जा रहा है
तुम बनाने जा रहे हो, पर बिगड़ता जा रहा है
हज्म तक होता नहीं है, पेट इतने भर लिये
यादवों से हाल तुमने, आप अपने कर लिये

वरदान जनने थे तुम्हें, तुम श्राप जनते जा रहे हो
तुम पतन के दूसरे पर्याय बनते जा रहे हो

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

आज भी विश्वास मेरा, तुम बहुत हो काम के
तुम बदल सकते हो नक्शे, आज फिर आवाम के
पर जरा नीचे पधारो, और पश्चात्ताप कर लो
फिर नई ताकत जुटाओ, देश का विश्वास लो

आस्था का देश है यह, सौ गुना फिर पाओगे
यह मुहूरत टल गया तो, देखना पछताओगे

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....
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झुँझनू (राजस्थान)
19 अगस्त 1963 

नेपथ्य का सच

 

बालकवि बैरागी

मेरी पगडण्डी पर बिछाने के लिए
उन्होंने बेरी से बबूलों तक,
कैर से करौंदियो तक से
उधार लिए काँटे
और बड़ी सावधानी से
मेरे रास्ते में बिछाए,
फिर मन ही मन मुस्काए
पर वे परिचित नहीं थे
आजन्म नंगे, मेरे पाँवों की सख्ती से।
मेरी एड़ियों और पगतलियों की
                                    बेलिहाज, फौलादी चोटों से।

जब धूल में मिल गए
उधार के काँटे
तब वे चिढ़े बेरी पर,
गुस्साए बबूलों पर,
खीजे कैर पर,
कोसने लगे करौंदियों को,
गरियाते रहे काँटों को।

अपनी प्रयोगशालाओं में
परीक्षण करने ले गए
मेरी पगडण्डी की धूल को।

पूछा मैंने उनकी परेशानी का सबब
तो लाल होकर बोले -
तुम्हारे लिए हमने छोड़ा राज-पथ
चले तुम्हारी राह पर
कर्जदार बने न जाने किस-किस के
और तुम इतने काँटों पर चलकर भी
न रोए, न सिसके।

कहीं-कहीं तुम्हारी पगडण्डी
अचानक काट देती है
हमारे राज-पथ को।
उन चौराहों पर कहीं तुम
रोक न दो हमारे राज-रथ को।

नेपथ्य का सच यह है कि
हमारा सारथी तुम्हें पहचानता है।
तुम्हारे पाँवों की सख्ती का लोहा मानता है।

हमें उतार कर, कहीं बैठा न ले तुम्हें
अपने राज-रथ में।
इसलिए, जहाँ से भी लाना पड़े
लाएँगे हजार तरह के काँटे
और बिछाएँगे तुम्हारे पथ में।

यह हमारी लाचारी है।
पता नहीं क्यों, हमारा राज-पथ
तुम्हारी पगडण्डी का आभारी है।
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यह कविता, रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक उपलब्ध कराई।

दाँव लगा तो राजघाट तक को नीलाम करेंगे।।



बालकवि बैरागी

 

बापू तेरे जनम दिवस पर, कवि का मन भर-भर आता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

चूर-चूर हो गए सपन सब, बापू तेरे मन के।
सुमन सभी निर्गन्ध हो गए, बापू इस उपवन के।।
तेरे आदर्शों की बापू, होती है अवहेला।
तेरे राम-राज का पावन, चित्र हुआ मटमैला।।

दिन-दिन बात बिगड़ती बापू,कोई नहीं बनाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

जिन की खातिर रहा जनम भर, बापू तू अधनंगा।
जिन की खातिर लाया था तू, आजादी की गंगा।।
अब भी वे भूखे हैं बापू, अब भी हैं वे प्यासे।
वे ही सूनी-सूनी आँखें, वे ही उखड़ी साँसें।।

भूमिहीन है अब तक बापू, दुनिया का अन्नदाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

राजनीति ने लोकनीति का, आज किया मुँह काला।
धूर्तनीति ने रहा-सहा भी, सब स्वाहा कर डाला।।
राम-भरत में सिंहासन की, होती खींचातानी।
त्याग-तपस्या की बातें अब, लगतीं बड़ी पुरानी।।

माता पर शासन करती है बापू, आज विमाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

हम भाषा के लिए झगड़ते, लड़ते, खून बहाते।
नये प्रान्त बनवाते बापू, हम नारे लगवाते।।
आज राष्ट्र से बड़ा हो गया, बापू पेट हमारा।
सचमुच हमसे कहीं भला था, बापू! वो हत्यारा।।

अब तक तो तू खुद ही उसको, दे आवाज बुलाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

बात-बात में चलती गोली, जगती है रणचण्डी।
सर्वोदय के दल्लालों ने, मँहगी कर दी मण्डी।।
अलग-अलग दुकानें बापू, अलग-अलग वादों की।
देख लगी क्या बापू, गुण्डों और दादाओं की।।

जयचन्दों ने जोड़ लिया है, परदेसी से नाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

देशभक्ति को दे डाला है, दिल से देश निकाला।
अब भी लड़वाते हैं बापू, मस्जिद और शिवाला।।
तन पर आई है चिकनाई, लेकिन मन हैं रूखे।
सरहद पर तपती दोपहरी, ताण्डव होते लू के।।

ढाई अरब भुजाओं पर भी, गीदड़ है गुर्राता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

आजादी के गुड़ पर बापू, लगे हुए हैं चींटे।
तुझको तक दे सकते हैं हम, भाषण मीठे-मीठे।।
लाभ न जाने कहाँ गया है, दिखता है बस घाटा।
पता नहीं किसने अमृत को, कहाँ बैठ कर बाँटा।।

नीलकण्ठ! यह कालकूट तो तुझको भी तड़पाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

राह दूर तक नहीं दीखती, दिखता नहीं उजाला।
तेरे तन पर पोत रहे हैं, हम सब मिल कर काला।।
खा पी कर चुकती कर दी है, तेरी सकल कमाई।
आलस के आलिंगन में है बापू, अब भारत की तरुणाई।।

दर-दर झोली फैलाती है बापू! तेरी भारत माता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

सभी बुझाने, लगे हुए हैं, अपनी-अपनी दाढ़ी।
एक जवाहरलाल कहाँ तक, खींचे सारी गाड़ी?
उसे दाँव पर लगा-लगा कर, रोज खेलते जुआ।
इधर खोद दी खाई हमने, उधर बनाया कुआ।।

कुर्बानी का नारा बापू, झूठा समझा जाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

दिन भर में चल पाये बापू! केवल कोस अढ़ाई।
कर लेते हैं मन बहलाने, अपनी आप बढ़ाई।।
बहुत अधिक खोया है बापू, क्या-क्या तुझे गिनाऊँ?
आँसू ले-ले कर आँखों में, गीत कहाँ तक गाऊँ?

गीत वतन के गानेवाला, चापलूस कहलाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

तुझे पता तो होंगे ही सब, उलटे काम हमारे।
आये दिन सुनता ही होगा, तू भी नाम हमारे।।
कहने को तो हमने बापू, सारी बात बना ली।
लेकिन दिल की बात है बापू! राम करे रखवाली।।

जुल्म हुआ जो आज सत्य पर, नहीं बताया जाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

*        *        *        *        *        *        *

घाटे की दुकानें बापू, हमने बीसों खोलीं।
तेरे फूल-कफन तक पर हम, बोल लिए हैं बोली।।
या तो नोचेंगे नेहरू को, या आराम करेंगे।
दाँव लगा तो राजघाट तक को नीलाम करेंगे।।

तुझ से छिपा हुआ ही क्या है, खुला पड़ा सब खाता।
इस वेला में तू होता तो, तड़प-तडप कर मर जाता।।

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दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की यह दुर्लभ कविता, उनकी पोती, हम सब की प्रिय रूना (रौनक) बैरागी ने उपलब्ध कराई। 

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मैं देश हूँ तुम्हारा

 

मुझे आश्चर्य है कि दादा का यह गीत उनके किसी (प्रकाशित) संग्रह में नहीं है। जैसा कि मेरे साथ होता आया है, सन्-सम्वत् तो मुझे याद नहीं किन्तु किसी जमाने में यह गीत, आकाशवाणी के इन्दौर केन्द्र से, सुबह के शुरुआती कार्यक्रमों में आए दिनों बजता रहता था। केन्द्र के, उस समय के संगीत निदेशक श्री भाईलाल बारोट ने इसे संगीतबद्ध किया था और प्रिय भाई प्रकाश पारनेरकर ने इसे स्वर दिया था। यह गीत अब भी कभी-कभार इन्दौर केन्द्र से प्रसारित हो जाता है।
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                        मैं देश हूँ तुम्हारा

                                                ये उम्र, ये जवानी, पाओगे कब दुबारा।
                                                मुझे प्यार से सँवारो, मैं देश हूँ तुम्हारा।

                                                किससे करूँ उम्मीदें, किससे करूँ मैं आशा।
                                                मुझको नहीं सुहाता, घर फूँक ये तमाशा।
                                                कुछ फूँकने की जिद है
                                                तो फूँक दो निराशा
                                                आए नहीं तबाही
                                                जाए न भाईचारा
                                                मुझे प्यार से....

                                                मेरे सिवा तुम्हारा, ईमान और क्या है?
                                                सौभाग्य और क्या है, सम्मान और क्या है?
                                                अपने ही दिल से पूछो
                                                भगवान और क्या है
                                                जब भी पुकारा मैंने
                                                केवल तुम्हें पुकारा
                                                मुझे प्यार से.....

                                                धरती नहीं हूँ केवल, आकाश भर नहीं हूँ।
                                                भूगोल या कि केवल, इतिहास भर नहीं हूँ।
                                                पूजा, नमाज या फिर
                                                अरदास भर नहीं हूँ
                                                मानो न मानो बेशक
                                                सर्वस्व हूँ तुम्हारा
                                                मुझे प्यार सो....
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जब



जब
शब्द खो दें अर्थ
वाक्य खो दें व्यंजना
अभिधा और लक्षणा
हो जाएँ निरर्थक।

व्यवस्था खो दे चरित्र
तब मेरे मित्र!

लोकतन्त्र हो जाता है लिप्सा की मण्डी
पदासीन लगने लगते हैं
पाखण्डी।

तब
आप और हम
हवा में करते रहते हैं
प्रहार।

किन्तु यह प्रहार 
करें किस पर?
क्या, चाहे जिस पर?
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(साप्ताहिक आउटलुक के 14 से 20 जनवरी 2003 के अंक में प्रकाशित)

अमर जवाहर


दादा से जुड़े कागजों का पुट्टल उलटते-पलटते अचानक ही यह गीत सामने आ गया। जाहिर है, जवाहरलालजी के निधन के बाद ही यह गीत लिखा गया होगा। 
  
होना तो यह चाहिए था कि इसे, जवाहरलालजी की पुण्य तिथि, 27 मई को दिया जाता। लेकिन क्या पता, तब तक मैं ही न जीयूँ! यह संयोग ही है कि आज जवाहरलालजी की जयन्ती है और आज ही यह गीत सामने आ गया। 
सो, 27 मई की प्रतीक्षा किए बिना, आज ही इसे दे रहा हूँ।
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अमर जवाहर
- बालकवि बैरागी

जिसने अपनी राख बिछा दी, खेतों में, खलिहानों में।
जिसने अपने फूल बिछाए, ऊसर रेगिस्तानों में।
जिसने अपनी पाँखुरियाँ दीं, ऐटम के शमशानों को।
जिसने अपनी मुसकानें दीं, तीन अरब इंसानों को।
जिसने अपनी बाँहें दे दीं, मानवता की आहों को,
जिसने अपनी आँखें दे दीं, भटकों को, गुमराहों को।
जिसने अपनी आहुति दे दी, संकल्पों की ज्वाला में।
चमक रहा है जो सुमेरु सा, जननी की मणि माला में।
उसका यश गायेगा अम्बर, धरती और पाताल रे!
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-1-

निर्मोही ने राजघाट से, ये जो नाता जोड़ा है।
यमुना-तट की ओर हठी ने, ये जो रथ को मोड़ा है।
ये जो माँ से अनपूछे ही, अमर तिरंगा ओढ़ा है।
ये जो तीन अरब लोगों को, नीर बहाते छोड़ा है।
ज्यों की त्यों रख कर के चादर, कर गया और कमाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-2-

आजीवन जो रहा हँसाता, क्यों-कर भला रुलायेगा?
मन कहता है, यहीं, कहीं है, अभी यहाँ आ जाएगा।
मेघ स्वरों में अगत-जगत के, हाल-हवाल बतायेगा।
भारत माता की जय हमसे, वो बार-बार बुलवायेगा।
शोर न करना वरना खुद को, कर लेगा बेहाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-3- 

अमन दिया, ईमान दिया और, जिसने हमें जवानी दी।
नये खून को राहें देकर, जिसने नई रवानी दी।
इतिहासों को नई दिशा दी, जिसने नई कहानी दी।
चन्दन में जल कर भी जिसने, माँ को अमर निशानी दी।
हमसे दूर करेगा कैसे, उसे बिचारा काल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-4-

नस-नस में भिद गया तुम्हारी, अपना खून टटोलो तुम।
कुछ तो सोचो, आँसू पोंछो, मोती और न रोलो तुम।
भावुकता भी भाषा साथी, और अधिक मत बोलो तुम।
तन की आँखें बन्द करो और, मन की आँखें खोलो तुम।
छूटी है माटी की ममता, बिछड़ा है कंकाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-5-

प्यार एक सा किया निठुर ने, बेला और बबूलों से।
पुजवा लिया स्वयं को जिसने, परबत जैसी भूलों से।
जिसने पावन कर दी गंगा, अपने पावन फूलों से।
वो आँसू से नहीं पुजेगा, पूजो उसे उसूलों से।
नहीं चाहिए उसको केसर, कुंकुम और गुलाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-6-

रोना-धोना बन्द करो और मस्तक जरा उठाओ रे!
भुजदण्डों पर ताल ठोेक कर, अंगद-चरण बढ़ाओ रे!
पीर पराई पी कर उसको, सच्चा सुख पहुँचाओ रे।
नीलकण्ठ के वंशज बेटों! कुछ तो जहर पचाओ रे।
उसका सरगम छूट न जाए, टूट न जाए ताल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-7-

खेत-खेत में उगे जवाहर, नीलम फसलें लहरायें।
नहर-नहर की लहर-लहर में, श्रम का अमृत घुल जाये।
बाग-बगीचे, वन-उपवन में, नहीं कभी पतझर आये।
नये पसीने की नदियों से, रीते सागर भर जायें।
प्राण भले ही छूटें लेकिन, छूटे नहीं कुदाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-8-

होनी ने अनहोनी कर ली, बिगड़ी बात सँवारेंगे।
कर्मक्षेत्र को पीठ न देंगे, उसका कर्ज उतारेंगे।
उसके पद-चिह्नों पर चलकर, बाकी उम्र गुजारेंगे।
चाहे जो हो जाए लेकिन हा! हा! नहीं पुकारेंगे।
हम ही गौतम, हम ही गाँधी, हमीं जवाहरलाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।
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यहाँ प्रस्तुत चित्र गाँधी सागर बाँध के उद्घाटन समारोह (19 नवम्बर 1961) का है। 19 नवम्बर इन्दिराजी की जन्म तारीख है। उद्घाटन की यह तारीख डॉक्टर कैलाशनाथ काटजू ने तय की थी। उद्घाटन समारोह का संचालन दादा ने ही किया था।