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एके साधे सब सधे

(भारतीय जीवन बीमा निगम के अधिकारियों, कर्मचारियों और अभिकर्ताओं को समृद्ध करने के लिए ‘निगम’ अपनी मासिक गृह-पत्रिका ‘योगक्षेम’  प्रकाशित करता है। उसी में प्रकाशनार्थ मैंने दिनांक 13 दिसम्बर 2013 को यह आलेख भेजा था। उसके बाद एक बार याद भी दिलाया था किन्तु अब तक कोई जवाब नहीं मिला। निश्चय ही इसे प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया होगा। मेरे मतानुसार यह आलेख मुझ जैसे छोटे, कस्बाई अभिकर्ताओं के लिए तनिक सहयोगी और उपयोगी हो सकता है। इसी भावना से इसे अब अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ। इसके अतिरिक्त इसका न तो कोई सन्दर्भ है, न उपयोगिता और न ही प्रसंग।)




एक लोकोक्ति है कि लोग अपनी गलतियों से सीखते हैं। किन्तु समझदार वे होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। मैं, भारतीय जीवन बीमा निगम के मुझ जैसे तमाम अभिकर्ताओं को न्यौता दे रहा हूँ - मेरी गलतियों से सीखकर समझदार होने के लिए। 

महानगरों की स्थिति तो मुझे नहीं पता किन्तु कस्बाई स्तर पर हमारे अभिकर्ता साथी एकाधिक संस्थाओं की एजेन्सियाँ लिए होते हैं। ‘निगम’ का अभिकर्ता बनने के शुरुआती कुछ बरसों तक मैं भी यही करता था। किन्तु मैंने, एक के बाद एक बाकी सारे काम छोड़ दिए और केवल ‘एलआईसी एजेण्ट’ ही बन कर रह गया। 

मैंने पाया कि ऐसा करने के बाद न केवल मेरी आय बढ़ी बल्कि मेरी सार्वजनिक पहचान और प्रतिष्ठा (वह जैसी भी है) में मेरी अपेक्षा से अधिक बढ़ोतरी हुई। 
मेरे पास भारतीय यूनिट ट्रस्ट, डाक घर और साधारण बीमा (जनरल इंश्योंरेंस) कम्पनी की भी एजेन्सी थी। मेरी बात को किसी संस्था की आलोचना न समझी जाए किन्तु मेरा अनुभव रहा है कि ग्राहक सेवाओं के मामले में ‘निगम’ से बेहतर कोई संस्था नहीं। हर कोई जानना चाहेगा कि मैंने शेष तीनों एजेन्सियाँ क्यों छोड़ीं। मैं भी बताने को उतावला बैठा हुआ हूँ।

मैंने काम शुरु किया उस समय मेरे कस्बे में भारतीय यूनिट ट्रस्ट का कार्यालय नहीं था। तब यह इन्दौर में था - मेरे कस्बे से सवा सौ किलोमीटर दूर। एक निवेशक के नाम की वर्तनी (स्पेलिंग) दुरुस्त कराने में मुझे सात महीनों से अधिक का समय लग गया और इस दौरान मैंने  प्रति माह कम से कम चार-चार पत्र लिखे। याने प्रति सप्ताह एक पत्र। ग्राहक का नाम तो आखिरकार दुरुस्त हो गया किन्तु ग्राहक की नजरों में मेरे लिए विश्वास भाव में बड़ी कमी आई। वह जब भी मिलता, कहता - ‘क्या! बैरागी सा’ब! मेरा नाम दुरुस्त कराने में यह हालत है तो अपना भुगतान लेने में तो मुझे पुनर्जन्म लेना पड़ जाएगा! ऐसे में आपसे बीमा कैसे लें?’ ऐसे प्रत्येक मौके पर मुझे  चुप रह जाना पड़ता था। अन्ततः नाम ही दुरुस्त नहीं हुआ, मैं भी दुरुस्त हो गया।  मैंने वह एजेन्सी छोड़ दी।

डाक घर के साथ मेरा अनुभव तनिक विचित्र रहा। डाक घर के बचत बैंक पोस्ट मास्टर मेरे पड़ौसी थे। हम दोनों रोज सुबह, अपना-अपना अखबार बदल कर पढ़ते थे। कभी मेरे यहाँ नल में पानी नहीं आता तो मैं उनके नल का उपयोग करता और कभी उनके नल में पानी नहीं आता तो वे मेरे नल से पानी लेते। किन्तु मेरे अचरज का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे सगे भतीजे के एक निवेश की परिपक्वता राशि का भुगतान मुझे करने से उन्होंने इंकार कर दिया - वह भी तब जबकि मेरे पास मेरे भतीजे द्वारा मेरे पक्ष में दिया गया आवश्यक, औपचारिक अधिकार-पत्र था। कुछ देर तो मुझे लगा कि वे मुझसे परिहास कर रहे हैं। किन्तु वे तो गम्भीर थे! स्थिति यह हो गई कि मुझे लिहाज छोड़ कर, शिकायत करने की धमकी देनी पड़ी। मुझे भुगतान तो मिल गया किन्तु इस घटना के बाद से हम दोनों के बीच की अनौपचारिकता, सहजता समाप्त हो गई और हम अपने-अपने अखबार से ही काम चलाने को मजबूर हो गए। मेरे मन में विचार आया कि जो साहब मुझे और मेरे बारे में व्यक्तिगत रूप से भली प्रकार जानते हैं, जब वे भी मुझे, मेरे भतीजे का भुगतान करने में कठिनाई अनुभव कर रहे हैं तो किसी सामान्य ग्राहक का भुगतान कराने में, एक अभिकर्ता के रूप में मेरी दशा क्या होगी? ऐसी घटनाओं का प्रभाव मेरे दूसरे कामकाज पर अच्छा नहीं पड़ेगा। मुझे ग्राहकों से हाथ धोना पड़ जाएगा। मेरा मोह भंग हो गया और मैंने उस एजेन्सी को नमस्कार कर लिया।

साधारण बीमा (जनरल इंश्योरेंस) कम्पनी से मेरा ऐसा कोई अप्रिय अनुभव तो नहीं रहा किन्तु दावा भुगतान को लेकर वहाँ की कार्यप्रणाली ने मुझे निरुत्साहित कर दिया। मैंने देखा कि अपने दावों का भुगतान प्राप्त करने के लिए ग्राहकों को बार-बार चक्कर काटने पड़ते हैं। कुछ मामलों में मैंने पाया कि ग्राहक जब भी अपना भुगतान लेने आता तब उसे कोई न कोई कागज लाने के लिए कह दिया जाता। इसके सर्वथा विपरीत, ‘निगम’ ने मेरी आदत खराब कर रखी थी। मेरी इस बात से तमाम अभिकर्ता और अन्य लोग भी सहमत होंगे कि दावा भुगतान को ‘निगम; सर्वाेच्च प्राथमिकता देता है और स्थिति यह है कि हम ग्राहकों को ढूँढ-ढूँढ कर भुगतान करते हैं। कई बार तो ग्राहक को पता ही नहीं होता कि उसे कोई बड़ी रकम मिलनेवाली है। ऐसे पचासों भुगतान का माध्यम तो मैं खुद बना हूँ जो पालिसियाँ मैंने नहीं बेचीं और जिनका अता-पता मेरे शाखा कार्यालय ने मुझे दिया, मैंने सारी औपचारिकताएँ पूरी करवाईं और ग्राहक को भुगतान कराया। ऐसे प्रत्येक मामले में ग्राहक ने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया तो दिया ही, दुआएँ भी दीं। मुझे लगा कि एक ओर कहाँ तो हम भुगतान करने के लिए उतावले रहते हैं और कहाँ दूसरी ओर ग्राहक चक्कर लगाता रहता है! मुझे लगा कि कभी मेरा कोई ग्राहक नाराज हो गया तो उसका प्रतिकूल प्रभाव मेरी, जीवन बीमा एजेन्सी पर पड़ सकता है और मुझे व्यावसायिक नुकसान हो सकता है। यह ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। यह विचार आते ही मैंने चुपचाप वह एजेन्सी भी छोड़ दी।

अब मैं केवल एलआईसी का काम कर रहा हूँ। शुरु में तो मुझे लगा था कि मुझे नुकसान हुआ है किन्तु मेरी आय के आँकड़े मेरी इस धारणा पर मेरा मुँह चिढ़ाते हैं। मेरी आय प्रति वर्ष बढ़ी। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राहक सेवाओं को लेकर मेरे ग्राहक मुझसे असन्तुष्ट नहीं हैं।

सारे काम छोड़कर एक ही काम करने के दो प्रभाव मैंने सीधे-सीधे अनुभव किए। पहला तो यह कि मैं अपने काम में अधिक दक्ष हुआ और दूसरा यह कि मेरे परिचय क्षेत्र में मुझे अतिरिक्त सम्मान से देखा जाने लगा। ग्राहकों से मेरा जीवन्त सम्पर्क बढ़ा और आज स्थिति यह है कि प्रति वर्ष मेरे ग्राहक बुला कर मुझे बीमा देते हैं। अपना परिचय देते हुए जब मैं कहता हूँ ‘‘मैं एलआईसी एजेण्ट हूँ और यही काम करता हूँ। इसके सिवाय और कोई काम नहीं करता।’ तो सामनेवाले पर इसका जो अनुकूल प्रभाव होता है उसे शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं हो रहा।

यह सब देखकर और अनुभव कर मुझे अनायास ही कवि रहीम का दोहा याद आ गया -

         एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।
         जो तू सींचौ मूल को, फूले, फले, अघाय।।

अर्थात् थोड़े-थोड़े पाँच-सात काम करने की कोशिश में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। इसके विपरीत यदि कोई एक ही काम हाथ में लिया जाए तो वह पूरा होता है उसके समस्त लाभ भी मिलते हैं और इस सीमा तक मिलते हैं कि हमारी सारी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। 

इसी क्रम में मुझे कवि गिरधर की एक कुण्डली याद आ रही है जो हमारी मातृसंस्था ‘एलआईसी’ पर पूरी तरह लागू होती है। कुण्डली इस प्रकार है -

         रहिये लटपट काटि दिन, अरु घामे मा सोय।
         छाँह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय।।
         जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा दैहे।
         जा दिन बहे बयारी, टूटी तब जर से जैहे।
         कह गिरधर कविराय, छाँह मोटे की गहिये।
         पाता सब झरि जाय, तऊ छाया में रहिये।।

अर्थात्, ‘चाहे तकलीफ में दिन काट लीजिए, चाहे धूप में सोना पड़े लेकिन किसी कमजोर-पतले वृक्ष की छाया में मत बैठिए। पता नहीं कब धोखा दे दे! किसी दिन आँधी में जड़ से उखड़ जाएगा। इसलिए किसी विशाल, मोटे, घनी वृक्ष की छाया में बैठिए। ऐसे वृक्ष के सारे पत्ते भी झड़ जाएँगे तो भी सर पर छाया बनी रहेगी।’ मुझे लगता है कि ‘आर्थिक सुरक्षा और संरक्षा’ के सन्दर्भों में कवि गिरधर एलआईसी की ओर ही इशारा कर रहे हैं।

पूर्णकालिक (फुल टाइमर) अभिकर्ता के रूप में काम करने का सुख और सन्तोष अवर्णनीय है। इससे क्षमता और दक्षता में वृद्धि होती है जिसका अन्तिम परिणाम होता है - आय में वृद्धि। लेकिन इससे आगे बढ़कर एक और महत्वपूर्ण काम होता है - अधिकाधिक लोगों तक पहुँचकर उन्हें बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने का। 

यही तो ‘निगम’ का लक्ष्य है!
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(सर्वाधिकार लेखकाधीन।)


घटती ब्याज दरों की दहशत

आदमी खुद से अधिक किसी को प्यार नहीं करता। निश्चय ही इसीलिए, नोट बन्दी के तुमुल कोलाहल के बीच अपने कल की चिन्ता मेरी धड़कन बढ़ा रही है। तसल्ली है तो केवल यही कि मेरा भय, मुझ अकेले का नहीं, अधिसंख्य बूढ़ों का है।

सरकार का सारा ध्यान और सारी कोशिशें विकास दर बढ़ाने की हैं। उद्योगों को बढ़ावा देने और व्यापार को अधिकाधिक आसान बनाकर ही यह किया जा सकता है। इसके लिए अधिकाधिक पूँजी, कम से कम कठिनाई से इन क्षेत्रों को उपलब्ध कराना पहली शर्त है। सो, सरकार यही कर रही है। उर्जित पटेल के, भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनने के बाद सबसे पहला काम इसी दिशा में हुआ। फलस्वरूप बैंकों ने अपनी ब्याज दरें घटा दीं। तमाम अखबार और चैनलों पर मकान और कारों की ईएमआई कम होने की शहनाइयाँ बजीं। अब सुन रहे हैं कि नोट बन्दी के के कारण तमाम बैंकों के पास अतिरिक्त पूँजी आ जाएगी और वे एक बार फिर अपनी ब्याज दरें घटा देंगे। 

लेकिन ये घटती ब्याज दरें मुझ जैसे बूढ़ों के दिल बैठा रही है। हम बूढ़े विचित्र से नैतिक संकट में हैं। अपने बच्चों को कम दर पर पूँजी मिलने की खुशी मनाएँ या बुढ़ापे में कम होती अपनी आमदनी पर दुःखी हों? आँकड़े और तथ्य तो ऐसा ही कहते लग रहे हैं।
केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय की महानिदेशक सुश्री अमरजीत कौर ने 22 अप्रेल 2016 को रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि 2001 से 2011 के बीच देश में 60 वर्ष से अधिक आयुवाले नागरिकों की  वृद्धि दर अभूतपूर्व रही है। वर्ष 2001 में देश की सकल जनसंख्या में वृद्धों की संख्या 7.6 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 8.6 प्रतिशत (कुल 10.39 करोड़) हो गई। यह वृद्धि दर 35.5 प्रतिशत है जो न केवल अब तक की सर्वाधिक है बल्कि राष्ट्रीय जनसंख्या वृध्दि दर से दुगुनी भी है। तब से अब तक के पाँच वर्षों में इस संख्या में निश्चय ही वृद्धि हुई ही होगी। 

छोटे होते परिवार, बच्चों का घर से दूर रहकर नौकरी करना और छिन्न-भिन्न हो रहा हमारा सामाजिक ताना-बाना। इस सबके चलते बूढ़े लोग अकेले होते जा रहे हैं। पूँजीवाद हमें लालची बना रहा है। हमारी सम्वेदनाएँ भोथरी होती जा रही हैं। बच्चों द्वारा अपने माता-पिता की जिम्मेदारी से पल्ला झटकने के समाचार अब आम होने लगे हैं। अपने भरण-पोषण के लिए और अपने ही बनाए मकान में जगह पाने के लिए बूढ़े लोग अदालतों के दरवाजे खटखटाते मिल रहे हैं। वृद्धाश्रमों की और उनमें रहनेवालों की संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है। पूर्णतः निराश्रितों के बारे में सोेचने की हिम्मत नहीं होती। लेकिन सेवानिवृत्त बूढ़े भी अब अपनी आय में होती कमी से भयभीत हैं।

बैंकों द्वारा ब्याज में कमी करने का सीधा असर इन बूढ़ों पर पड़ने लगा है। अगस्त 2016 के आँकड़ों के मुताबिक रेल, रक्षा, अर्द्ध सैनिक बलों, सार्वजनिक उपक्रमों, परिवार पेंशनधारियों और केन्द्र सरकार के पेंशनरों की कुल संख्या एक करोड़ से ज्यादा थी। राज्य सरकारों के और निजी क्षेत्र के पेंशनर इनमें शामिल नहीं हैं। ये तमाम लोग बैंक एफडी और डाक घर की विभिन्न लघु बचत योजनाओं से मिलनेवाले ब्याज की रकम पर आश्रित हैं। कम हुई (और निरन्तर कम हो रही) ब्याज दरों का सीधा प्रभाव इन सब पर पड़ेगा ही। आय में कमी और मँहगाई में वृद्धि इन बूढ़ों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लेगी। म्युचअल फण्डों में बेहतर आय मिल सकती है किन्तु वहाँ, बैंकों और डाकघर जैसी पूँजी की सुरक्षा और निश्चिन्तता नहीं। उम्र भी ऐसी नहीं कि अपनी रकम खुले बाजार में ब्याज पर लगाने की जोखिम ले सकें। ऐसे में ये बूढ़े अपने चौथे काल में राम-नाम भूल कर जीने के अधिक ठोस आधार की तलाश में लग जाएँगे। लेकिन सुरक्षित निवेश की विकल्पहीनता इन्हें निराश ही करेगी। मैं भी इन्हीं में से एक हूँ। अपने बेटों की संस्कारशीलता पर भरोसा होते हुए भी मुझे भी घबराहट हो रही है। लेकिन करूँ क्या? इस यक्ष प्रश्न का सामना करने में पसीने छूट रहे हैं।

किन्तु कम होती ब्याज दरों का यह असर केवल बूढ़ों पर ही नहीं होगा। मुझे एक खतरा और नजर आ रहा है। जैसा कि मैं बार-बार कहता हूँ, मैं अर्थ शास्त्र का विद्यार्थी नहीं हूँ किन्तु बीमा व्यवसाय के कारण फौरी तौर पर कुछ बातें समझ में आने लगी हैं। मुझे लग रहा है कि कम होती ब्याज दरों का सीधा असर हमारी अल्प बचत पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हमारी लघु बचतों में सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू बचत का है। जो लोग जोखिम लेने की उम्र और दशा में हैं वे तमाम लोग बैंक एफडी और डाकघर की लघु बचत योजनाओं से पीठ फेर कर म्युचअल फण्डों की ओर मुड़ जाएँगे। हम सब जानते हैं कि बैंकों और डाक घर में जमा रकम का सीधा लाभ सरकार को मिलता है। लोक कल्याणकारी योजनाओं में यह रकम बड़ी सहायता करती हैं। किन्तु म्युचअल फण्डों की रकम पर सरकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता। वर्ष 2008 में हमारा बचत का राष्ट्रीय औसत 38.1 प्रतिशत था जो 2014 में घटकर 31.1 रह गया। आज यह और भी घटकर 30.1 प्रतिशत रह गया है।  गए तीस वर्षों में यह सबसे कम प्रतिशत है। हम भारतीय भूलने में विशेषज्ञ हैं इसलिए शायद ही किसी को याद होगा कि 2007 और 2008 के वर्षों में जब दुनिया मन्दी के चपेट में आ गई थी, दुनिया की सबसे ताकतवर अमरीकी अर्थ व्यवस्था अस्त-व्यस्त-ध्वस्त हो गई थी, लोगों की नौकरियाँ चली गई थीं तब भी हमारी अर्थ व्यवस्था जस की तस बनी रही। तनिक भी नहीं लड़खड़ाई। यह हमारी, अल्प बचतों में जमा पूँजी के दम पर ही सम्भव हुआ था। आज वे ही लघु बचतें मौत की ओर धकेली जा रही हैं। मैं डर रहा हूँ। लेकिन यह डर क्या मुझ अकेले का है?

मैं भारतीय जीवन बीमा निगम का अभिकर्ता हूँ। इसी कारण देश की प्रगति और विकास में इसके योगदान की और इसके महत्व की जानकारी हो पाई है। अपनी शाखाओं के जरिए यह ‘निगम’ प्रतिदिन तीन सौ करोड़ रुपये संग्रहित करता है। 1956 में इसकी स्थापना के समय भारत सरकार ने इसे पाँच करोड़ रुपये दिए थे। यह ‘निगम’ प्रति वर्ष अपने मुनाफे की पाँच प्रतिशत रकम भारत सरकार को देता है। अपनी स्थापना से लेकर अब तक यह संस्थान इस तरह अब तक भारत सरकार को एक पंचवर्षीय योजना के आकार की रकम भुगतान कर चुका है। अपने कोष का 75 प्रशित भाग इसे भारत सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्यतः देना पड़ता है। यह वस्तुतः भारत सरकार का कुबेर है। घटती ब्याज दर का असर इसकी पालिसियों के बोनस पर भी पर पड़ेगा। 1991 में बीस वर्षीय मनी बेक पालिसी की बोनस दर 67 रुपये प्रति हजार, प्रति वर्ष और बन्दोबस्ती पालिसी की बोनस दर 72 रुपये प्रति हजार, प्रति वर्ष थी। 1997 के आसपास ब्याज दरों में कमी शुरु हुई। आज यह बोनस दर 42 रुपये प्रति हजार, प्रति वर्ष रह गई है। जाहिर है यह दर और कम होगी। केवल निवेश के लिए बीमा पालिसियाँ लेनेवाले तमाम लोग इससे दूर जाएँगे। जाहिर है, सरकार का कुबेर दुबला होगा ही। बढ़ते पूँजीवाद के समय में, इसकी इस भावी दशा को सरकार की ‘निजीकरण प्रियता’ से भी जोड़ा जा सकता है।

बात बूढ़ों से शुरु हुई थी और दूर तलक, अगली पीढ़ियों तलक चली गई। मेरा डर आपको वाजिब लगता है? और क्या यह डर मुझ अकेले का है?
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1000 दफ्तर बन्द कर दिए निजी जीवन बीमा कम्पनियों ने

जीवन बीमा उद्योग के निजीकरण की कलई धीरे-धीरे खुलने लगी है।


इस उद्योग में निजी कम्पनियों के लिए लाल कालीन बिछाने के लिए दिए गए तर्कों में एक तर्क यह भी था कि बीमा करने योग्य लोगों का बीमा करने के मामले में भारत सरकार का उपक्रम ‘भारतीय जीवन बीमा निगम’ अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है इसलिए निजी बीमा कम्पनियों के जरिए ऐसे लोगों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने का मौका दिया जाना चाहिए। तब, इस उद्योग के जरिए रोजगार के नये आयाम खुलने के दावे भी किए गए थे। किन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा है, इन दावों की हवा निकलने लगी है और यह बात तेजी से सामने आने लगी है कि बीमा योग्य लोगों का बीमा करने और लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में निजी बीमा कम्पनियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। इनकी दिलचस्पी केवल मुनाफा कमाने में है।


देश की, अग्रणी 6 निजी बीमा कम्पनियों के, दो वर्षों के तुलनात्मक आँकड़े साबित करते हैं कि मुनाफा कमाने के अपने एकमात्र लक्ष्य को हासिल करने के लिए इन कम्पनियों ने छोटे कस्बों/शहरों के अपने लगभग 1,000 से अधिक शाखा कार्यालय बन्द कर दिए, कर्मचारियों की संख्या में 27 प्रतिशत की कमी कर दी और लगभग 1,74,000 अभिकर्ताओं को विदा कर दिया।


किन्तु इन दो वर्षों में इन बीमा कम्पनियों का मुनाफा खूब बढ़ा। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ और बजाज अलियांज बीमा कम्पनियों ने वित्तीय वर्ष 2010-11 में 650 शाखा कार्यालय बन्द किए, लगभग 12,000 कर्मचारी निकाले और क्रमशः 810 करोड़ और 160 करोड़ रुपयांे का शुद्ध मुनाफा कूटा। मैक्स न्यूयार्क और टाटा एआईजी बीमा कम्पनियों ने इस वित्तीय वर्ष में पहली बार मुनाफा कमाया जबकि एचडीएफसी लाइफ तथा रिलायंस लाइफ ने अपने नुकसान में बड़ी हद तक कमी की। किन्तु शाखाएँ बन्द करने और कर्मचारियों को निकालने के मामले में ये भी पीछे नहीं रहीं। हाँ, रिलायंस लाइफ ने अपना कोई शाखा कार्यालय बन्द नहीं किया। इसके विपरीत इस कम्पनी ने इस संख्या में एक की बढ़ोतरी की।


कार्यालय बन्द करने, कर्मचारियों को निकालने और अभिकर्ताओं को रास्ता दिखाने के पीछे इन कम्पनियों का एक ही तर्क था कि अपना कारोबार बचाए रखने के लिए इनके पास इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा था।


निजी बीमा कम्पनियों के इस चलन को मात देने का करिश्मा केवल एक बीमा कम्पनी ने किया लेकिन वह कोई निजी बीमा कम्पनी नहीं थी। वह सार्वजनिक क्षेत्र की, एसबीआई लाइफ बीमा कम्पनी थी जिसने 135 नई शाखाएँ खोलीं और कर्मचारियों की संख्या में 1,313 की वृद्धि की।


निजी बीमा कम्पनियों के ‘चाल-चलन’ की संक्षिप्त हकीकत इस प्रकार है -


शाखाओं की संख्या (क्रमशः 2009-10 और 2010-11) -


आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ - 1,923 थी, 519 बन्द कर दी गईं। 1,404 रह गईं।

बजाज अलियांज - 1,151 थी, 151 बन्द कर दी गईं, 1,050 रह गईं।

मैक्स न्यूयार्क लाइफ - 705 थी, 200 बन्द कर दी गईं, 505 रह गईं।

टाटा एआईजी लाइफ - 433 थी, 75 बन्द कर दी गई, 358 रह गईं।

एचडीएफसी लाइफ - 568 थी, 70 बन्द कर दी गईं, 498 रह गईं।

रिलायंस लाइफ - 1,247 थी, एक नई खोली, 1,248 कार्यरत हैं।

एसबीआई लाइफ - 494 थी, 135 नई खोलीं, 629 कार्यरत हैं।
बन्द किए गए शाखा कार्यालयों की कुल संख्या - 1,015


मुनाफा कूटने के लिए इन बीमा कम्पनियों ने, बन्द किए गए कार्यालयोंवाले कस्बों/शहरों के ग्राहकों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जबकि इन ग्राहकों को यह कह कर बीमे बेचे गए थे कि इन सबको, इनके अपने गृहनगर में ही विक्रयोपरान्त ग्राहक सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी। अब इन ‘अनाथ ग्राहकों’ को, अपनी बीमा पॉलिसियों पर सेवाएँ प्राप्त करने के लिए, उन शहरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे जहाँ इन कम्पनियों के शाखा कार्यालय काम कर रहे हैं।


यहाँ यह सवाल स्वाभाविक रूप् से उठता है कि छोटे कस्बों/शहरों के अपने दफ्तर बन्द कर ये बीमा कम्पनियाँ, बीमा योग्य अधिकाधिक लोगों का बीमा कैसे कर पाएँगी? इस काम के लिए दिन-ब-दिन नए शाखा कार्यालय खोलने पड़ते हैं!


कर्मचारियों की संख्या - (क्रमशः 2009-10 और 2010-11) -
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ - 20,000 थे, 7,000 निकाले, 13,000 कार्यरत हैं।

बजाज अलियांज - 20,000 थे, 5,062 निकाले, 14,938 कार्यरत हैं।

मैक्स न्यूयार्क लाइफ - 10,454 थे, 3,454 निकाले, 7,000 कार्यरत हैं।

टाटा एआईजी लाइफ - 8,100 थे, 2,700 निकाले, 5,400 कार्यरत हैं।

एचडीएफसी लाइफ - 14,397 थे, 2,303 निकाले, 12,994 कार्यरत हैं।

रिलायंस लाइफ - 16,656 थे, 2,473 निकाले, 13,183 कार्यरत हैं।

एसबीआई लाइफ - 5,985 थे, 1,313 नए भर्ती किए, 7,298 कार्यरत हैं।
निकाले गए कर्मचारियों की कुल संख्या - 22,992


शुद्ध मुनाफा/घाटा (करोड़ रुपयों में) (क्रमशः 2009-10 और 2010-11) -
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ - मुनाफा 260 करोड़ से बढ़कर 810 करोड़ हो गया, 550 करोड़ की वृद्धि हुई।

बजाज अलियांज - मुनाफा 540 करोड़ से बढ़कर 1,060 करोड़ हो गया, 520 करोड़ की वृद्धि हुई।

मैक्स न्यूयार्क लाइफ - 20 करोड़ का घाटा था जो 190 करोड़ के मुनाफे में बदल गया। याने, 210 करोड़ की वृद्धि।

टाटा एआईजी लाइफ - 400 करोड़ का घाटा, 52 करोड़ के मुनाफे में बदला। याने, 452 करोड़ की वृद्धि।

एचडीएफसी लाइफ - 280 करोड़ का घाटा कम होकर 100 करोड़ रह गया। याने, 180 करोड़ का मुनाफा।

रिलायंस लाइफ - 280 करोड़ का घाटा कम होकर 130 करोड़ रह गया। याने, 150 करोड़ का मुनाफा।

एसबीआई लाइफ - 276 करोड़ का मुनाफा बढ़ कर 366 करोड़ हो गया। याने 90 करोड़ की वृद्धि।


आँकड़े सारी हकीकत बयान कर रहे हैं। किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं रह जाती।

(ऑंकडों का स्रोत : बिजनेस स्‍टैण्‍डर्ड दिनांक 06 जुलाई 2011)

आयतन ही नहीं, अपना घनत्व भी बढ़ाया भारतीय जीवन बीमा निगम ने

भारत सरकार के कुबेर, भारतीय जीवन बीमा निगम ने, जीवन बीमा कारोबार में एक बार फिर न केवल अपना पहला स्थान पूर्ववत बनाए रखा है अपितु इसने जीवन बीमा का कारोबार कर रही निजी क्षेत्र की तमाम बीमा कम्पनियों को धक्का देकर बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा कर 73.02 प्रतिशत कर ली है जो गत वर्ष 70.52 प्रतिशत थी। प्रथम प्रीमीयम आय के सन्दर्भ में यह हिस्सेदारी 64.86 प्रतिशत कर ली जो गए वर्ष 60.79 प्रतिशत थी।

पॉलिसियाँ बेचने के मामले में भारतीय जीवन बीमा निगम ने गत वर्ष के मुकाबले 8.21 प्रतिशत की शानदार वृध्दि करते हुए कुल 3.88 करोड़ पॉलिसियाँ बेच कर अपनी सकल ग्राहक संख्या 28 करोड़ से अधिक कर ली जो दुनिया के (तीन देशों को छोड़कर) किसी भी देश की जनसंख्या से अधिक है।

भारतीय जीवन बीमा निगम ने कामकाज के प्रत्येक पक्ष में अपनी कीर्ति पताका की ऊँचाई में बढ़ोतरी ही की है। वर्ष 2008-09 में ‘निगम’ की सकल प्रीमीयम आय 1,57,186 रुपये थी जो वर्ष 2009-10 मे बढ़कर 1,85,985 रुपये हो गई। अर्थात् ‘निगम’ ने सकल प्रीमीयम आय में 49.15 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की। प्रथम प्रीमीयम आय में भी निगम ने 33.87 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 70,891 करोड़ रुपये संग्रह किए जो गत वर्ष 52,964 करोड़ रुपये थी।

किसी भी बीमा कम्पनी की विश्वसनीयता का पैमाना उसका भुगतान प्रदर्शन होता है। इस मामले में भारतीय जीवन बीमा निगम ने न केवल निजी क्षेत्र की तमाम बीमा कम्पनियों को चारों कोने चित्त कर दिया बल्कि खुद से ही प्रतियोगिता कर अपना पिछला रेकार्ड तोड़ दिया। वर्ष 2009-10 में ‘निगम’ ने, मृतक बीमाधारकों के परिजनों द्वारा प्रस्तुत कुल 6,64,619 मृत्यु दावों पर 7033.68 करोड़ रुपयों का भुगतान किया। वर्ष के दौरान प्राप्त सकल मृत्यु दावों के और निपटाए गए मृत्यु दावों के अन्तिम आँकड़े यद्यपि अभी आने बाकी हैं किन्तु विश्वास किया जा रहा है कि अपनी कीर्तिमानी परम्परा को बनाए रखते हुए ‘निगम’ ने 99 प्रतिशत से अधिक मृत्यु दावों का निपटान किया है। यहाँ यह उल्लेख समीचीन होगा कि लम्बित दावों में ऐसे दावे भी शामिल हैं जो मार्च 2010 के अन्तिम दिनों में प्रस्तुत किए गए हैं और जिन्हें निपटाने के लिए ‘निगम’ को न्यूनतम अनिवार्य समयावधि भी प्राप्त नहीं हुई होगी।

इसी क्रम में ‘निगम’ ने 2,05,17,870 पूर्णावधि दावों (अर्थात् पॉलिसी अवधि पूरी होने पर भुगतान की जानेवाली रकम) तथा प्रत्याशित दावों (अर्थात् विभिन्न मनी बेक तथ अन्य पॉलिसियों की अवधि के दौरान निर्धारित समय पर भुगतान की जानेवाली रकम) पर अपने पॉलिसीधारकों को 46921.22 करोड़ रुपयों का भुगतान किया।

बीमा करोबार करते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम को अतिशेष (सरप्लस) के रूप में 23478 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जिसकी 5 प्रतिशत रकम, 1029 करोड़ रुपये, लाभांश (डिविडेण्ट) के रूप में ‘निगम’ ने भारत सरकार को सौंप दी । भारत सरकार को दी गई डिविडेण्ट की यह रकम, गत वर्ष की रकम के मुकाबले 18.32 प्रतिशत अधिक है। अतिशेष (सरप्लस) की शेष रकम 22,449 करोड़ रुपये, ‘निगम’ के पॉलिसीधारकों को बोनस के रूपमें अर्पित कर दिए गए हैं।

वर्ष 2009-10 के वित्तीय परिणामों के अनुसार, भारत सरकार के इस कुबेर की सकल परिसम्पत्तियाँ, गत वर्ष के मुकाबले 31.88 प्रतिशत बढ़कर 11,52,057 करोड़ रुपये हो गई है।

किन्तु इससे भी अच्छी खबर अभी बाकी है। भारतीय जीवन बीमा निगम के एजेण्टों ने ‘अहर्निशं सेवामहे’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए, चालू वित्त वर्ष 2010-11 की पहली तिमाही (अप्रेल'10 से जून'10) में 18740 करोड़ रुपये प्रथम प्रीमीयम आय अर्जित कर दिखाई है। यह रकम, गत वर्ष की इसी तिमाही के मुकाबले 107.57 प्रतिशत अधिक तो है ही, पूरे देश में कार्यरत, तमाम बीमा कम्पनियों की प्रथम प्रीमीयम आय का 73.43 प्रतिशत है। अर्थात् देश के महानगरों से लेकर गाँव-खेड़ों की गलियों-पगडण्डियों में सक्रिय, भारत सरकार के इस कुबेर के कर्मठ एजेण्टों ने अपनी शानदार संस्था के कीर्तिमान को अक्षुण्ण बनाए रखने की पीठिका अभी से ही रच दी है।

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अनूठा देनदार


कल की मेरी पोस्ट पर श्रीयुत अज्ञात (एनोनीमस) ने अपनी टिप्पणी के चैथे बिन्दु में वह बात कह दी है जिसे विषय बना कर मैं कल की पोस्ट लिखना चाहता था । मेरी तकदीर अच्छी है कि वे केवल सूत्र प्रस्तुत कर रह गए । अज्ञातजी को धन्यवाद कि उन्होंने न केवल मेरे लिए ठोस भूमिका बना दी बल्कि मेरी कल की पोस्ट की कुछ तथ्यात्मक भूलों की मरम्मत भी कर दी ।


अपनी रकम वसूली के लिए लोगों को लेनदार के दरवाजे पर जाकर तकादे करने पडते हैं । वित्तीय संस्थाएं अपनी बकाया वसूली के लिए ‘रिकवरी एजेण्ट‘ नियुक्त करती हैं जो ‘रिकवरी‘ के नाम पर डकैती या फिरौती वसूली करते नजर आते हैं । लेकिन भाजीबीनि इस मामले में ‘अनूठा देनदार’ है । अपने ग्राहकों को भुगतान करने के लिए यह दर-दर भटकता है और अखबारों में विज्ञापन देता है - आईए ! अपनी रकम ले जाइए और हमें कृतार्थ कीजिए ।

भाजीबीनि की योजनाओं में ‘मनी बेक पालिसी‘ सम्‍भवत: सर्वाधिक लोकप्रिय योजना है । इसके अन्तर्गत ग्राहक को प्रति पांच वर्ष बाद एक सुनिश्चित रकम मिलने का प्रावधान है । कुछ मनी बेक योजनाओं में यह अवधि चार वर्ष भी होती है । यह रकम प्राप्त करने के लिए ग्राहक को न तो कोई पत्र लिखना होता है और न ही भाजीबीनि कार्यालय के चक्कर काटने पडते हैं । भाजीबीनि पर्याप्त समय पूर्व (इन दिनों, लगभग एक माह पूर्व) ही अपने ग्राहकों को इस रकम का चेक भेज देता है । यह चेक पंजीकृत डाक से या स्पीड पोस्ट से भेजा जाता है । भाजीबीनि के रेकार्ड में ग्राहक का जो पता होता है, उसी पते पर चेक भेजा जाता है । ऐसा प्रायः ही होता है कि बीमा लेते समय ग्राहक का जो पता होता है वह चार-पांच वर्ष बीतते-बीतते बदल जाता है । ऐसे में, कई बार चेक, अवितरित होकर, भेजने वाले कार्यालय के पास लौट आता है । ऐसी दशा में कार्यालय, सम्बन्धित एजेण्ट को, अवितरित चेक पहुंचाने की जिम्मेदारी देता है । एजेण्ट को अपने ग्राहक का अता-पता मालूम होता है । सो, अवितरित होकर लौटने के बाद भी अधिकांश चेक सम्बन्धित ग्राहक तक, ठीक समय पर पहुंच ही जाता है ।


इतना सब होने के बाद भी कई लोग चेक को भूल जाते हैं । कई बार ऐसा होता है कि पंजीकृत डाक, परिवार के किसी सदस्य ने प्राप्त कर ली और वह लिफाफा रख कर भूल गया । ऐसे तमाम मामलों वाले चेक, बासी (स्टेल) होकर अपनी वैधता खो देते हैं । उधर, बैंक से मिलने वाले स्टेटमेण्ट के कारण भाजीबीनि कार्यालय को जल्दी ही मालूम हो जाता है कि ग्राहक के पास चेक पहुंचने के बाद भी वह बैंक में जमा नहीं हुआ है और ग्राहक की रकम, कार्यालय में जमा पडी रह गई है । ऐसे चेकों की संख्या हजारों तक और रकम का आंकड़ा (कम से कम) लाखों तक तो पहुंच ही जाता है ।


भाजीबीनि की जिस शाखा से मैं सम्बध्द हूं वहां ऐसे बासी चेकों की रकम 20 लाख रुपयों से अधिक हो गई है । मेरे कस्बे में भाजीबीनि की तीन शाखाएं हैं । उनमें से एक शाखा में यह रकम 25 लाख रुपये हो गई है । तीसरी शाखा की रकम का आंकडा न तो मुझे मालूम है और न ही मैं ने जानने की कोशिश की है ।

जैसा कि मैं ने अपनी पोस्ट में कल बताया था, देश भर में भाजीबीनि की 2048 शाखाएं हैं । मेरे कस्बे की दो शाखाओं के, बासी चेकों की रकम के आंकड़े के आधार पर यदि प्रति शाखा 15 लाख रुपयों का औसत मान लें तो 2048 शाखाओं का आंकड़ा 30,720 लाख रुपये बैठता है । इसे और अधिक आसान शब्दावली में कहा जाए तो यह रकम 30 अरब 72 लाख रुपये होती है । कृपया इसे ‘निगम’ का अधिकृत आंकड़ा बिलकुल न मानें, मेरे कस्बे की दो शाखाओं के आंकड़ों के आधार पर यह मेरा अनुमान है ।

कानून का तकाजा तो केवल इतना ही है कि बीमा कम्पनी, सम्बन्धित ग्राहक को, कम्पनी के पास उपलब्ध (ग्राहक के) पते पर चेक भेज दे । यदि चेक अवितरित होकर लौट आता है तो बीमा कम्पनी की जिम्मेदारी यहीं समाप्त हो जाती है । समझदार और चतुर व्यापारी ऐसी रकम को अपने व्यापार में प्रयुक्त करता रहेगा और ग्राहक को दूसरी बार याद दिलाने के बारे में सोचेगा भी नहीं ।


लेकिन भाजीबीनि ऐसे मामलों में यहीं पल्ला झाड कर नहीं रह जाता । चेक के बासी हो जाते ही वह अतिरिक्त रुप से सक्रिय हो जाता है । प्रत्येक शाखा का दावा विभाग ऐसे बासी चेकों की सूची लेकर ताक में बैठा रहता है कि कोई एजेण्ट आए और उसके सामने सूची रख कर अधिकाधिक ग्राहकों का भुगतान उसके जिम्मे किया जाए । जरूरी नहीं कि जिन ग्राहकों की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है वे उस एजेण्ट के ग्राहक हों या वह बीमा उसी एजेण्ट ने बेचा हो । ‘निगम’ की प्रत्येक शाखा का प्रयास होता है कि ऐसे अवितरित चेकों की रकम का भुगतान जल्दी से जल्दी कर दिया जाए । इसके पीछे कोई कानूनी आग्रह या बाध्यता बिलकुल ही नहीं है । इसके पीछे है ‘निगम‘ की मानसिकता - ‘ग्राहक का पैसा ग्राहक को मिलना ही चाहिए और जल्दी से जल्दी मिलना चाहिए ।’ इस मानसिकता के चलते ही ‘निगम’ का दावा भुगतान प्रतिशत 98 तक पहुंच पाया है, जैसा कि अज्ञातजी ने अपनी टिप्पणी में बताया है । प्रत्येक शाखा के दावा विभाग का प्रयास होता है कि उसकी सूची जल्दी से जल्दी ‘निरंक‘ की स्थिति में आ जाए ।


ऐसा भुगतान कराने में हम एजेण्टों को बडा आनन्द आता है । कोई सात-आठ वर्ष पूर्व मैं लगभग पौने चार लाख रुपयों का ऐसा ही भुगतान एक सज्जन को कराने का निमित्त बना था । वे सज्जन रतलाम के ‘श्री सज्जन मिल्स लि.’ के कर्मचारी थे और सेवा निवृत्त होकर, उत्तराखण्ड स्थित अपने पैतृक गांव चले गए थे । उन्हें तो पता भी नहीं था कि उनकी पालिसी परिपक्व हो चुकी है । उनका सरनेम तनिक असामान्य था और मैं अपने स्वभावानुसार, उनके अटपटे सरनेम का अर्थ जानने के लिए उनसे एक बार मिला था । दावा विभाग ने जब उनका नाम मेरे सामने रखा तो मुझे यह तो याद आ गया कि मैं उनसे मिला था, लेकिन यह याद नहीं कर पाया कि कहां मिला था । अपनी लिखा पढ़ी का काम करते हुए एक रात लगभग तीन बजे अकस्मात ही सज्जन मिल में हुई उनसे मुलाकात याद हो आई । मारे प्रसन्नता के मैं सवेरे तक सो नहीं पाया । साढ़े दस बजे तक का समय मैं ने बहुत ही बेचैनी में गुजारा । कार्यालय खुलने पर मालूम हुआ कि वे तो सेवा निवृत्त होकर अपने गांव चले गए । किसी को भी उनके गांव का नाम और उनका पता नहीं मालूम । एक सज्जन ने उनके एक भानजे का फोन नम्बर दिया । वह चण्डीगढ़ में था । उसने अपने मामा का फोन नम्बर दिया । मैं ने उन सज्जन से बात की तो वे फोन पर ही रोने लगे । उन्होंने कहा - ‘उत्तराखण्ड के दूर-दराज के गांव में बैठे एक रिटायर्ड आदमी के लिए पौने चार लाख रुपयों का महत्व आप तभी अनुभव कर सकेंगे जब आप मेरे गांव आएं ।‘ उन्होंने अपने गांव के निकटतम भाजीबीनि कार्यालय से विमुक्ति पत्र (डिस्चार्ज वाउचर) प्राप्त किया और पालिसी सहित भिजवाया । उस पालिसी से मेरा कोई लेना-देना नहीं था । उन्होंने जब वह पालिसी ली थी तब तो मैं भाजीबीनि का एजेण्ट भी नहीं था । जब उन्हें उनका भुगतान मिला तो उन्होंने मुझे फोन पर प्राप्ति सूचना दी । उनसे बोला नहीं जा रहा था । आंसुओं में भीगे और हिचकियों में सने उनके आशीष आज भी मुझे मेरे माथे पर सुरक्षा-छत्र की तरह अनुभव होते हैं । स्थानीय स्तर पर ऐसे पचासों किस्से प्रत्येक एजेण्ट के पास सुनने को मिल जाएंगे ।


लेने के लिए कोई पचास चक्कर लगाए यह नई और बड़ी बात नहीं । लेकिन देने के लिए कोई इतनी चिन्ता करे, इतनी सक्रियता बरते - यह असमान्य और अनूठी बात है ।

मुझे लगता है, दुनिया की बड़ी से बड़ी बीमा कम्पनियों से टक्कर लेने वाला ‘भारतीय जीवन बीमा निगम’ अपने नाम के ‘भारतीय‘ शब्द की व्‍यंजना को पूरी तरह सार्थक करता है । हम भारतीय आज भी अपना कर्ज चुकाने को सर्वोच्च वरीयता देते हैं । हममें से प्रत्येक, जल्दी से जल्दी कर्ज मुक्त हो जाना चाहता है । एक मालवी कहावत के अनुसार जिन नौ तरह के लोगों को रात में नींद नहीं आती उनमें वह व्यक्ति भी शरीक होता है जिसके माथे पर कर्ज होता है । ‘कर्ज युक्त‘ बने रहना पाश्‍चात्य अवधारणा है (जहां दिवालिया होना भी एक कानूनी-तकनीकी खानापूर्ति होती है) जबकि ‘कर्ज मुक्त‘ रहना, भारतीय अवधारणा है । इस लिहाज से भारतीय जीवन बीमा निगम न केवल एक जिम्मेदार वित्तीय उपक्रम बनकर सामने आता है अपितु वह ‘भारतीयता‘ को साकार और सार्थक भी करता है । जरा कल्पना कीजिए - कोई निजी बीमा कम्पनी ऐसा भुगतान करने के बारे में कभी सोचेगी भी ?


कहिए ! है न यह अनूठा देनदार ?

मैं इस अनूठे देनदार का एक छोटा सा, बहुत ही छोटा सा मुनीम हूं ।

मुझे अपने सेठ पर गर्व है ।

भारत सरकार का कुबेर : भाजीबीनि

भारतीय जीवन बीमा निगम देश के सबसे बड़े वित्तीय उपक्रमों में अग्रणी है । इसे लेकर आए दिनों अखबारों में ‘कुछ न कुछ’ छपता ही रहता है । इस ‘कुछ न कुछ’ में आलोचना और उपहास अधिक होता है । लेकिन जिस संस्था के ग्राहकों की संख्या 23 करोड़ से भी अधिक हो, उसे लेकर ऐसा छपना न तो अनूठी बात है और न ही अनपेक्षित । लेकिन यह देखकर दुख अवश्‍य होता है कि इसकी विशेषताओं, उपलब्धियों और अनोखेपन को लेकर कभी कुछ नहीं छपा । यह शायद इसलिए कि हर कोई यह मानकर चलता है कि चूँकि इस संस्था को इतना अच्छा, इतना अनूठा, इतनी उपलब्धियों वाली तो होना ही चाहिए और यदि यह ऐसी ही है तो इसमें कहने की क्या बात है ? इस मायने में यह घर का जोगी जोगडा, आन गांव का पीर' वाली कहावत का शिकार हो रहा है । लेकिन ‘बाजारवाद और मार्केटिंग’ के इस समय में यदि अच्छी बातें सामने नहीं लाई जाएँ तो नकारात्मक छवि के प्रगाढ़ होने का खतरा बढ़ता ही जाता है । चूँकि मैं इसी संस्थान से सम्बध्द हूँ और इसीने मुझे यह स्थिति दी है कि मैं ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ की चिन्ताओं से मुक्त होकर अपने शौक पूरे कर सकूँ इसलिए मुझे लगता है कि इसकी अच्छाइयाँ, अनूठापन, उपलब्धियाँ मैं ने उजागर करनी ही चाहिए ।


अनेक सन्दर्भों में अनूठा यह उपक्रम देश का एकमात्र ऐसा वित्तीय संस्थान है जिसके निवेश पर भारत सरकार ने शत प्रतिशत ग्यारण्टी दे रखी है । इसीलिए यह संस्थान अपनी विशाल धनराशि को भारत सरकार के निर्देशों के अनुरूप ही निवेश करने को बाध्य है । सराकर के इस कड़े नियन्त्रण के कारण, बीमाधारकों की रकम के दुरुपयोग की आशंका शून्यवत हो जाती है । इसे अपनी धनराशि अनिवार्यतः केन्‍द्रीय और राज्‍यों की शासकीय परियोजनाओं, योजनाओं, उपक्रमों में ही निवेश करनी पड़ती है । स्टाक मार्केट में भारतीय जीवन बीमा निगम, बहुत बड़ा निवेशक है जबकि इसके द्वारा निवेश की जाने वाली रकम इसके सकल फण्ड का बहुत ही छोटा हिस्सा होती है । लेकिन यह छोटा सा हिस्सा भी इतना बड़ा और इतना भारी होता है कि स्टाक मार्केट जब भी स्थानीय कारणों से संकट में आता है तो सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम को मैदान में उतार कर बाजार के मिजाज को बनाए रखती है ।

1956 में भारत सरकार द्वारा 50 करोड रुपयों की पूँजी से यह शासकीय उपक्रम शुरु हुआ था । प्रतिवर्ष, अपनी अतिशेष (सरप्लस) रकम का 95 प्रतिशत भाग ग्राहकों के बोनस के लिए रखकर शेष 5 प्रगतिशत रकम इसे अनिवार्यतः भारत सरकार को देनी ही होती है । अपनी स्थापना से लेकर अब तक यह उपक्रम इस 5 प्रतिशत रकम के रूप में एक पंचवर्षीय योजना की रकम के बराबर का योगदान भारत सरकार को कर चुका है । भाजीबीनि के बीमाधारक ग्राहकों को यह जानकर अतिरिक्त आत्म सन्तोष और गर्व होगा कि प्रीमीयम के रूप में चुकाई गई उनकी रकम सीधे-सीधे राष्‍ट्र निर्माण में प्रयुक्त होती है ।

देश भर में इसकी 2048 शाखाएँ काम कर रही हैं । देश का यह ऐसा एकमात्र वित्तीय संस्थान है जिसके धन संग्रहण के आँकड़े प्रतिदिन भारतीय संसद को नियमित रूप से अनिवार्यतः सूचित किए जाते हैं । इसके दैनिक संग्रहण आँकड़े के बारे में जनसामान्य को कोई जानकारी नहीं है । यह जानकर लोगों को अविश्‍वसनीय आश्‍चर्य होता है कि यह उपक्रम लगभग डेड़ सौ करोड़ रुपये प्रतिदिन संग्रहण करता है । इस आँकड़े को एक विशेष सन्दर्भ में देखने पर इसका महत्व अनुभव हो सकेगा । देश में कोई भी बीमा कम्पनी प्रारम्भ करने के लिए एक सौ रुपयों की ग्यारण्टी मनी जमा करानी पड़ती है । अर्थात्, भाजीबीनि प्रतिदिन डेड़ बीमा कम्पनी की ग्यारण्टी मनी संग्रहण करता है ।
किसी भी वित्तीय संस्थान की साख उसकी भुगतान स्थिति से ही बनती-बिगड़ती है । यह जानकर हर

कोई अविश्‍वास ही करेगा कि दावों के भुगतान के मामले में यह उपक्रम बरसों से अन्तरराष्‍ट्रीय स्तर पर प्रथम बना हुआ है । दुनिया की कोई भी बीमा कम्पनी अब तक इसके रेकार्ड को छू नहीं पाई है । यह उपक्रम प्रतिवर्ष, इसे मिलने वाले दावों में से 95 से 97 प्रतिशत दावों का भुगतान करता है । लम्बित दावों का प्रतिशत सामान्यतः केवल 3 से 5 तक रहता है । यहाँ यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कई दावे इसे मार्च महीने में (अर्थात् वित्तीय वर्ष के अन्त में) प्राप्त होते हैं जो सामान्यतः लम्बित ही रहते हैं । हम भारतीय जब एक बार पलक झपक रहे होते हैं तब यह ‘निगम‘ एक दावे का भुगतान कर रहा होता है ।
इसकी टोपी का एक पंख सबसे शोख, चटकीले और गहरे रंग का ऐसा है जो इसे एक बार फिर सबसे अलग और सबसे ऊपर स्थापित करता है । निगमित क्षेत्र में यह सर्वाधिक आय कर चुकाने वाला संस्थान् है ।
ऐसी और कई विशेषताओं और अनूठेपन के कारण इस संस्थान् को ‘भारत सरकार का कुबेर‘ कहने में मुझे कोई संकोच नहीं होता ।
लेकिन अपने ग्राहकों की देनदारियाँ चुकाने के मामले में जो अनूठापन इसे दुनिया भर की समस्त वित्तीय संस्थाओं में सिरमौर बनाता है और जिसे प्रस्तुत करने के लिए ही मैं ने यह पोस्ट लिखनी शुरु की थी, वह अब आज नहीं, कल ।
तब तक, यदि आपने अब भारतीय जीवन बीमा निगम की इन विशेषताओं पर गौर नहीं किया हो तो अब गौर कर इस पर गर्व कीजिए और यदि आपने इसकी कोई बीमा पालिसी ले रखी है तो अतिरिक्‍त गर्व कीजिए कि देश की विभिन्‍न योजनओं को पूरा करने में आप भी परोक्षत: भागीदार हैं