विविध भारती



श्री बालकवि बैरागी के पाँचवें काव्य संग्रह 
         ‘गौरव गीत’ का बाईसवाँ गीत

.....मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। .....मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। .......न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। .....मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। 


विविध भारती
अ. भा. काँग्रेस सेवादल की बम्बई रैली 
दिनांक 24, 25, 26 अक्टोबर सन् 1961 के लिए विशेष रूप से लिखित

विशेष उल्लेखनीय - तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने इस रैली के लिए जुटे स्वयं सेवकों की परेड का निरीक्षण किया था। वे खुली जीप में थे। तब दादा ने यह गीत गाया था। देश भर से आये स्वयं सेवकों की टुकड़ियाँ, गीत में उल्लेखित क्रम से प्रदेशवार खड़ी थीं। प्रदेशों से आये स्वयं सेवकों की संख्या असमान थी - किसी प्रदेश से ज्यादा तो किसी प्रदेश से कम। इसलिए, प्रत्येक टुकड़ी के सामने से, नेहरूजी की जीप के गुजरने का समय असमान था। दादा की जिम्मेदारी  थी कि टुकड़ी के सामने से नेहरूजी के गुजरते समय में उस प्रदेश के उल्लेखवाला छन्द पूरा हो जाए। गीत के सारे छन्द समान पंक्तियों के हैं। दादा ने अपने कौशल से यह समय साधा था। समान पंक्तियो को, अधिक संख्यावाली टुकड़ी के लिए अधिक समय तक गा कर और कम संख्यावाली टुकड़ी के लिए कम समय में पूरा गाकर नेहरूजी का निरीक्षण पूरा करवाया था। दादा के इस कौशल की प्रशंसा नेहरूजी ने, मंच पर दादा की पीठ थपथपा कर की थी। 

प्रसंगवश उल्लेख है कि मैं इस घटना का चक्षु-साक्षी हूँ। मैं भी इस रैली में शरीक हुआ था।    
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समूह गान

                        एक देश के, एक वेश के, आये नये जवान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                    तन से भ ऽ ले अनेक हैं
                                    लेकिन मन से एक हैं
                                    भाषा बेशक न्यारी है
                                    लेकिन क्या फुलवारी है
                        साँस-साँस में समा रहा है, सेवा का सन्मान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे

काश्मीर प्रदेश

                        कदमों में तूफान छिपाये, ये आया कश्मीर है
                        बच्चा-बच्चा बोल रहा है, हम भारत के वीर हैं
                        सबसे पहले हम हिन्दी हैं, कश्मीरी हैं बाद में
                        गीदड़ कैसे घुस आयेगा, अब शेरों की माँद में
                        कफन उगाते हैं अब तक भी, झेलम के मैदान रे

                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

हिमाचल प्रदेश

                        हिम्मत से भरपूर हिमाचल, ठाठ-बाट से आया है
                        सेवादल का नेजा हमने, हिमगिरी पर लहराया है
                        साहस के पुतले हैं देखो, सरहद के रखवाले हैं
                        बर्फों में रहते हैं फिर भी, जलती हुई मशालें हैं

                        प्राण गँवा कर भी रक्खेंगे, हम जननी की शान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

पंजाब प्रदेश

                        भगतसिंह के भाई हम सब, आये हैं पंजाब से
                        लिपटी हैं गाथाएँ जिनकी, झेलम और चिनाब से
                        जागरूक प्रहरी हैं हम सब, भारतवर्ष महान् के
                        छुड़ा दिये हैं छक्के हमने, लाख बार शैतान के

                        आठों पहर लिये बैठे हैं, हम हाथों पर जान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

राजस्थान प्रदेश

                        संस्कृतियों की घूमर लेता, आया राजस्थान है
                        आन-मान, अभिमान की धरती, सचमुच बड़ी महान है
                        गाँव-गाँव में पंचायत का हमने राज लुटाया है
                        प्रजातन्त्र के महामन्त्र को, घर-घर तक पहुँचाया है

                        सबसे पहले महाक्रान्ति को, दिया हमीं ने मान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

गुजरात प्रदेश

                        हम गरबीले गुजराती हैं, गाँधी और सरदार के
                        शीश हथेली पर रखकर हम, गाते गीत दुलार के
                        शीश कटाकर पाटी हमने, जाति-पाँति की खाई को
                        कौन भला भूलेगा ‘रज्जब’, और ‘बसन्त’ से भाई को

                        भारत ही है खुदा हमारा, भारत ही भगवान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

दिल्ली प्रदेश

                        ये दिल्ली का दल है देखो, रजधानी के राही हैं
                        राजघाट पर कर्तव्यों की, कसमें हमने खाई हैं
                        सेवादल की नींव में हमने, खून हमारा डाला है
                        दिल्ली ने ही दुनिया भर में, आज किया उजियाला है

                        हमने गाड़ा लाल किले पर, युग का अमर निशान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

उत्तर प्रदेश

                        हम उद्भट उत्तर प्रदेश के, सबसे आगे चलते हैं
                        अनुशासन और आदर्शों की छाायाओं में पलते हैं
                        गंगा-जमना की धरती में, हम सैनिक उपजाते हैं
                        दूघ, दही, घी, मक्खन, मिसरी, जन-जन तक पहुँचाते हैं

                        शिक्षा, दीक्षा लेते हमसे, बड़े-बड़े गुणवान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

बिहार प्रदेश

                        हम बिहार के बाँके बेटे, सेवादल के सेनानी
                        इतिहासों को गौरव हम पर, सेवक, साधक, बलिदानी
                        ‘राजेन्दर बाबू’ सा सैनिक, सबसे प्रथम बिहार का
                        सेवादल को सौंपा हमने, रत्न सकल संसार का

                        युग-युग तक रक्खेगी जननी, उस पर गरब गुमान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

बंगाल प्रदेश

                        ‘रवि बाबू’ की पुण्य भूमि के, हम प्यारे बंगाली हैं
                        गीतों की माटी में देखो, अंगारों की लाली है
                        नेताजी के पद चिह्नों पर, हमने कदम बढ़ाये हैं
                        उस माटी ने सकल विश्व से, अपने पग पुजवाये हैं

                        दिया हमीं ने नये देश को, राष्ट्रगीत का गान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

आसाम प्रदेश

                        हम असाम के अलबेले हैं, अमन-चमन के रखवाले
                        बात-बात में काम अनोखे, हम वीरों ने कर डाले
                        भाषा की दीवारें हमने, हँसते-गाते तोड़ी हैं
                        अन्तर से अन्तर की कड़ियाँ, हमने ही तो जोड़ी हैं

                        अमर एकता के दावों पर, हमने रखे प्राण रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

उड़ीसा प्रदेश

                        ये उत्कल की टुकड़ी देखो, नया, निराला खून है
                        पंचवर्ष के आयोजन का, ये प्यारा मजमून है
                        हीरा कुँड को बाँध दिया है, हमने इन दो हाथों से
                        भर डाला है आँचल माँ का, इस्पाती सौगातों से

                        बना रहे हैं हम भारत में, नये-नये इन्सान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....


मध्य प्रदेश

                        श्रम-साहस के गीत गुँजाता, आया मध्य प्रदेश है
                        ‘नया पसीना, देश बनाये’, देता ये सन्देश है
                        थाम कुदाली, कजरी गाओ, नया देश निर्माण करो
                        खून बहाने वाले बेटों! चलो पसीना दान करो

                        चलो गुँजाओ श्रम गीतों से, परबत और खदान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

महाराष्ट्र प्रदेश

                        हम मर्दाने महाराष्ट्र के, पलते हैं तलवारों में
                        राह बनाते हँसते-गाते, काँटों में, अंगारों में
                        रक्त सना इतिहास हमारा, देता रोज दुहाई है
                        कंगाली, भुखमरी, गरीबी, इनसे आज लड़ाई है

                        नव-भारत के निर्माता हम, करते नव निर्माण रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

बम्बई प्रदेश

                        हम बम्बई के बलिदानी हैं, इतिहासों के निर्माता
                        आज हमारे कंचनपुर का, कण-कण देखो इतराता
                        आजादी के रण में हमने, अपने लाल चढ़ाये हैं
                        आँसू नहीं बहाये हमने, नेजे नहीं झुकाये हैं

                        इसकी माटी में लिपटे हैं, लाख-लाख बलिदान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

आन्ध्र प्रदेश

                        हम आन्ध्रा के मतवाले हैं, हमको बड़ा गुमान है
                        शहर हमारा ‘काकिनाड़ा’, सचमुच तीरथ स्थान है
                        सेवादल का जनम हुआ है, इसी निराले गाँव में
                        चली वहीं से अमर-बेलि यह, काँग्रेस की छाँव में

                        सबसे पहले हमने गाये, सेवादल के गान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

मैसूर प्रदेश

                        हम मैसूरी महावीर हैं, चन्दन-वन से आये हैं
                        सेवादल की सौरभ में हम, गन्ध मलय की लाये हैं
                        सेवादल का पहिला प्रशिक्षण केन्द्र चला जिस  धूल में
                        आज पँखुरियाँ सभी लगी हैं, उस ही प्यारे फूल में

                        ये सारा परिवार हमारे, गौरव की पहिचान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                  तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

तामिलनाड़ प्रदेश 

                        तामिलनाड़ तिलक करता है, माँ के ऊँचे भाल पर
                        हमने उत्तर दिया देश को, सबसे बड़े सवाल पर
                        नव-समाज की नव-रचना का, घोष हमीं ने उच्चारा
                        भेद-भाव के महादैत्य को, हमने ही तो ललकारा

                        देख हमारे महाचरण को, दुनिया है हैरान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

केरल प्रदेश

                        हम केरल के कुँवर-कन्हाई, प्रजातन्त्र के रखवाले
                        जयचन्दों के मन्सूबों को, हमने नंगे कर डाले
                        सेवादल की वर्दी पहिने, बैठे हम हुशियार हैं
                        हर कीमत पर गद्दारों से, लड़ने को तैयार हैं

                        नहीं सहेंगे आजादी का, तिल भर भी अपमान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....

उपसंहार

                        आज विदेशों में भी फैला है, यह प्यारा परिवार है
                        पल-पल, छिन-छिन होता इसका, अधिकाधिक विस्तार है
                        देश-देश के भाई आते, हमसे हाथ मिलाने को
                        हम भी जाते हैं दुनिया में, यह सौरभ फैलाने को

                        मिलते ही जाते हैं दिन-दिन, नये-नये वरदान रे
                        सब सन्तानें भारत माँ की, सबका हिन्दुस्तान रे
                                                तन से भ ऽ ले अनेक हैं.....
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‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ यहाँ पढ़िए।

‘गौरव गीत’ का इक्कीसवाँ गीत ‘नौजवान आ गये सारे जहान के’ यहाँ पढ़िए

‘गौरव गीत’ का तेईसवाँ गीत ‘असन्तुष्ट काँग्रेसियों से’ यहाँ पढ़िए

मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिल

‘दरद दीवानी’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  


गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,
प्रकाशन वर्ष - 1966
मूल्य - 1.50 रुपये
मुद्रक - रतनलाल जैन,
पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 
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विनोबाजी ने नोतो

श्री बालकवि बैरागी के, मालवी कविता संग्रह 
‘चटक म्हारा चम्पा’ की तेईसवीं कविता

यह संग्रह श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को समर्पित किया गया है।








विनोबाजी ने नोतो

वे गो अईजा रे म्हारा सन्‍त विनोबा
निरधन रोवे रे
वे गो अईजा रे

मरे पचे ने धान कमावे पेट भरे दुनियाँ को
ऊ धरती को पूत कमाऊ बेटो राणी माँ को
रे बाबा बेटो भारत माँ को
लगा बारकाँ ने छाती तो भूखो होवे रे
निरधन रोवे रे
वे गो अईजा रे म्हारा सन्‍त विनोबा

पगॉं जातरा करो जातरी व्‍यऊँ (बिवाई) पेटे दुख देवे
घरती माँ की माँग को हिंगरू थाराँ पगाँ ती बेवे
रे बाबा थाराँ पगाँ ती बेवे
चुनरी फाड़ पग पाटा बाँधू जद सुख होवे रे
निरधन रोवे रे
वे गो अईजा रे म्हारा सन्‍त बिनोबा

गया बरस कामण में उपण्‍यॉं गहूँ की लापसी राधूँ
वागड़िया नारेर वधारूँ गोरी-गोरी चटकाँ मिलादूँ
रे बाबा गोरी-गोरी चटकाँ मिला दूँ
र्‌या  मूॅूँग ने वाला-वाला चँवरा गेलो जोवे रे
निरधन रोवे रे
वे गो अईजा रे म्हारा सन्‍त बिनोबा
 
सकरकन्‍द को खेत खुदाऊँ, बाफूँ ताता पाणी में
भैंस बाकडी तुरन्‍त बाकड़ी तुरन्त दुहाड़ूँ, दही जमाऊ मथणी में
रे बाबा दही जमाऊं मथणी में
रुच-रुच खावे, थारी दाड़ी भरावे, म्हारो भमर्‌यो धोवे रे
निरधन रोवे रे
वे गो अईजा रे म्हारा सन्‍त विनोबा

हिलमिल म्‍हाने सड़क बणई दी, पगडण्‍डी मत आजे
जण का दुख से तू दुबरो है वण की पीर मिटाजे
रे बाबा वण की पीर मिटाजे
देर करी तो जमीं को भूखो, सत-पत खोवे रे
निरधन रोवे रे
वेगो अईजा रे म्हारा सन्‍त विनोबा
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‘चटक म्हारा चम्पा’ की चौबीसवीं कविता ‘आयो बुलावो’ यहाँ पढ़िए






संग्रह के ब्यौरे 
चटक म्हारा चम्पा (मालवी कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज प्रकाशन, 4 हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन
मूल्य - 20 रुपये
चित्रांकन - डॉ. विष्णु भटनागर
प्रकाशन वर्ष - 1983
कॉपी राइट - बालकवि बैरागी
मुद्रक - विद्या ट्रेडर्स, उज्जैन

क्या कहें

श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की तेईसवीं कविता
यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।




क्या कहें

उजालों के दावेदार
उजाला लाकर उसे पीने बैठ गये
भले मानस.! अपनी ही शर्तों पर
जीने बैठ गये।
अब उन्हें कौन समझाये कि
उजाला पीने की नहीं
जीने की चीज है।
पीने की चीज है अँधेरा
और लो, दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है
उसका घेरा।
गाँवों के पाँवों पर रेंगता हुआ वह
अलावों तक जा पहुँचा है
वे कभी नहीं स्वीकारेंगे कि
यह शुरु हुआ है उन्हीं की परछाइयों से
जैसे कि अंगद-चरण तक लड़खड़ा जाते हैं
निकम्मे हाथों की अँगड़ाइयों से।
जब सूरज अपने ही उजाले के दम्भ से
त्रस्त हो जाता है
तो यार! चार ही घड़ी में अस्त हो जाता है।
यह उजाला, यह सवेरा
तुम हम सबको मुबारक हो
पर इसे निर्लज्ज बन कर इस तरह पीना छोड़ो
कछुए की तरह अपने ही खोल में
जीना छोड़ो
अपने-अपने उजालों की तरह
अपना-अपना अँधेरा भी होता है
तुम इसे स्वीकार कर लो तो
सदियों के द्वारा दुलारे जाआगे
वर्ना गुदवा लो अपने माथों पर कि
तुम उनसे भी बुरी मौत
मारे जाओगे।
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‘वंशज का वक्तव्य’ की चौबीसवीं कविता ‘भाई मेरे’ यहाँ पढ़िए









वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053



नौ जवान आ गये सारे जहान केे



श्री बालकवि बैरागी के पाँचवें काव्य संग्रह 
         ‘गौरव गीत’ का इक्कीसवाँ गीत

.....मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। .....मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। .......न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। .....मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। 


नौजवान आ गये सारे जहान के
(विश्व-युवक-संघ के लिए एक गीत)

नौजवान आ गये सारे जहान के
नौजवान.....नौजवान.....
नौजवान आ गये सारे जहान के

                                - 1 - 

जाति, धर्म, देश की दीवार तोड़ दी
वर्ग, वर्ण की गगरिया, जी हाँ फोड़ दी
दूरियाँ बढ़ाए, उस जुबाँ को छोड़ दी
            सबका एक दीन है, एक है जबान
                        नौजवान.....नौजवान.....
                        नौजवान आ गये सारे जहान के.....

                                - 2 -

हम अमन के गीत हर कदम पे गायेंगे
सत्य और न्याय का नेजा उठायेंगे
एटमों की आग को हँसकर बुझायेंगे
            सबकी ये जमीन है, सबका आसमान
                        नौजवान.....नौजवान.....
                        नौजवान आ गये सारे जहान के.....

                                - 3 -

कह रहे हैं आज हम सारे जहान से
हक्क है मनुष्य को, जिये वो शान से
युद्ध से घृणा करे, रहे ईमान से
            दर्द सबका एक है, एक जैसी शान
                        नौजवान.....नौजवान.....
                        नौजवान आ गये सारे जहान के.....

                                - 4 -

बार-बार इस तरह मिला करेंगे हम
मंजिलों की ओर यूँ, चला करेंगे हम
हँसते-गाते फूल से खिला करेंगे हम
            सब यहाँ समान हैं, सब यहाँ महान
            नौजवान.....नौजवान.....
            नौजवान आ गये सारे जहान के.....
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‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ यहाँ पढ़िए।

‘गौरव गीत’ का बीसवाँ गीत ‘नई बेला आई रे’ यहाँ पढ़िए

‘गौरव गीत’ का बाईसवाँ गीत ‘विविध भारती’ यहाँ पढ़िए

मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

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गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,
प्रकाशन वर्ष - 1966
मूल्य - 1.50 रुपये
मुद्रक - रतनलाल जैन,
पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 
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मेंहदी मती लगाव

श्री बालकवि बैरागी के, मालवी कविता संग्रह 
‘चटक म्हारा चम्पा’ की बाईसवीं कविता

यह संग्रह श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को समर्पित किया गया है।





मेंहदी मती लगाव

मेंहदी  मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में
बेन हुँवारा हाथाँ में
तू मेंहदी मती लगाव

जावद की मेंहदी घोरी ने बैठी है गोरी-गोरी राताँ में
जाणूँ हूँ थारा दो ई हाथ है थारी नणदी का हाथाँ में
जीवड़ो थारो अरझी र॒यो है तरे-तरे की भाँताँ में
पण खम्मा म्हारी बेन
वाटको परमों तो हरकाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ  म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

गाम गोयरे आजादी की अई पोंची है असवारी
देख-देख ने करे अचम्‍भो भोरा-ढारा नर-नारी
गावो बधावा, चढ़ा चढ़ावा अबे परीक्षा है थारी
हाथ पकड़ अणी आजादी को
घर-घर में पोंचाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

थारा देस का नवा महल की नींव भरवा लागी रे
अणी नींव के मुट्ठी-मुट्ठी मेहनत सबती माँगी रे
अणी घड़ी में पड्यो सेज पर देख थारो बड़ भागी रे
छैल भमर ने झकझोरी ने
नारी धरम निभाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

जगाँँ-जगाँ कामे लागीग्या थारा जामण जाया रे
मेहनत को मद माथे चमके मस्ती में मस्ताया रे
होंठ हुकावे, पाणी चावे, चावे ठण्‍डी छाया रे
जलझारी देई आ वीरा ने
पालव छन्‍यो छवाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

मेहनत को मोरत अईग्‍यो है सोरत वेईगी है भारी
आज पसीनो अणपूजो है माँगी र॒यो पूजा थारी
तोक फावडो तोक कुदारी पग पग कर दे पँतवारी
मेंहदी, फूँँ,दी काजर में
यू मोरत मती चुकाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रुपारा हाथाँ में

खेत-खेत और नद्दी-नद्दी मगरे-मगरे जाणों है
दिशा- शा में दारिद्दर ती जंगी जुद्ध मचाणो है
हाथ- थेरी में छाला को अद्भुुत ब्‍याव रचाणों है
खुशहाली की लाड़ी लई ने
पेलाँ सास केवाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

थारा दन आया है, थारी राताँ अम्मर रेणी है
खूब रचेगा थारी मेंहदी पण दो वाताँ केणी है
अपणी सुध ले वण से पेलाँ जामण की सुध लेणी है
न्हीतर सब झूठा है थारा
रकड़ी, रतन, जड़ाव
तू मेंहदी मती लगाव ऐ म्हारी बेन रूपारा हाथाँ में

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संग्रह के ब्यौरे 
चटक म्हारा चम्पा (मालवी कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज प्रकाशन, 4 हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन
मूल्य - 20 रुपये
चित्रांकन - डॉ. विष्णु भटनागर
प्रकाशन वर्ष - 1983
कॉपी राइट - बालकवि बैरागी
मुद्रक - विद्या ट्रेडर्स, उज्जैन

सुझाव

श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की बाईसवीं कविता

यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।




सुझाव

जटिलतम जिन्दगी को तुम
सरलता से लो तो सही
मेरी बात पर नहीं तो
अपने ही आईने पर
ध्यान दो तो सही।
जटिलता
कोई अंगद का चरण नहीं है
न ही तुम हो कोई रावण
कहाँ चुराई है तुमने कोई सीता?
फिर यह जटिलता-जटिलता
कथन मात्र है
तुम्हारे निराश क्षणों का।
महायोग मत लगाओ
अपने घावों का, व्रणों का।
रिसने दो उन्हें
अविरल बहने दो।
राह के रोड़ों से
तन के पसीने को
मन के संकल्पों को
‘राम-राम’ कहने दो ।
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वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053



नई बेला आई रे



श्री बालकवि बैरागी के पाँचवें काव्य संग्रह 
          ‘गौरव गीत’ का बीसवाँ गीत

.....मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। .....मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। .......न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। .....मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। 


नई बेला आई रे

                                    ओ.....
                                    नई बेला आई रे
                                    नई बेला आई रे, नया बलिदान दो
                                    निछराने देश पर, अपने जवान दो
                                                नई बेला आई रे.....

- 1 -

                                    नैनों के तारों को जननी! सँवार दो
                                    टीका लगा दो और आरती उतार दो
                                    एक बार चूम कर ममता बिसार दो
                                                ओ.....नई बेला आई रे.....
                                    बल खाते हाथों में, नागिन-कृपाण दो
                                    निछराने देश पर, अपने जवान दो
                                    नया बलिदान दो.....
                                                नई बेला आई रे.....

- 2 -

                                    दे दे री सजनी! तू पी को बिदाई
                                    तुझको मुबारक हो ये शुभ जुदाई
                                    पोंछ दे हाथों से माँग की ललाई
                                                ओ.....नई बेला आई रे.....
                                    कुंकुम दो, कंगन दो, सेजों की शान दो
                                    निछराने देश पर, अपने जवान दो
                                    नया बलिदान दो.....
                                                नई बेला आई रे.....

- 3 -

                                    बहिनाँ! तू भैया को पहिना दे बाना
                                    रण भूमि में आज कर दे रवाना
                                    हँस-हँस के गा दे, शहीदों का गाना
                                                ओ.....नई बेला आई रे.....
                                    राखी की लाज रखें, ऐसा गुमान दो
                                    निछराने देश पर, अपने जवान दो
                                    नया बलिदान दो.....
                                                नई बेला आई रे.....
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‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ यहाँ पढ़िए।

‘गौरव गीत’ का उन्नीसवाँ गीत ‘मत घबराओ’ यहाँ पढ़िए

‘गौरव गीत’ का इक्कीसवाँ गीत ‘नौजवान आ गये सारे जहान के’ यहाँ पढ़िए

मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिल

‘दरद दीवानी’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  


गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,
प्रकाशन वर्ष - 1966
मूल्य - 1.50 रुपये
मुद्रक - रतनलाल जैन,
पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 
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