अभिलाषा





 श्री बालकवि बैरागी के पाँचवें काव्य संग्रह 
‘गौरव गीत’ का पहला गीत

.....मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। .....मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। .......न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। .....मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। 



अभिलाषा

हे भगवान!
हम वासी इस भारत भू के
सदा माँगते यह वरदान
हे भगवान!

गगन मिले तो आजादी का
वतन मिले तो श्री गाँधी का
कफन मिले तो बस खादी का
और नहीं कुछ हमें चाहिये
विनय हमारी लेना मान
हे भगवान!

हमें स्वर्ग की चाह नहीं है
और नरक से डाह नहीं है
सुख-दुःख की परवाह नहीं है
माता के हित जीवन दे दें
पूरा करना यह अरमान
हे भगवान!

नहीं मृत्यु से कभी डरें
जन सेवा में जियें, मरें
नाम हिन्द का अमर करें
भारत माँ को हम युवकों पर
सदा रहे सच्चा अभिमान
हे भगवान!
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‘गौरव गीत’ की भूमिका, कवि का आत्म-कथ्य, सम्मतियाँ, सन्देश यहाँ पढ़िए

‘गौरव गीत’ का दूसरा गीत ‘सेवादल के सबल सिपाही’ यहाँ पढ़िए


मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

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‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ
गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,
प्रकाशन वर्ष - 1966
मूल्य - 1.50 रुपये
मुद्रक - रतनलाल जैन,
पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म.
प्र.) 

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दीप बेला


श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की दूसरी कविता

यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।











दीप बेला

और फिर यह दीप बेला
और फिर यह दीप माला
ज्योति की अँगनाइयों में
झिलमिलाता यह उजाला
लग रहा शायद सभी कुछ
ठीक है और स्वस्थ है
किन्तु मेरे बन्धु!
चिन्तक मात्र चिन्ताग्रस्त है।
कालिमा अब भी बराबर
कर रही षड़यन्त्र है
राम जाने किस खुशी में
मस्त सारा तन्त्र है।
जो अमावस के जुलूस में
कल तलक थे मुब्तिला
रोशनी को गालियाँ देना था
जिनका सिलसिला
आज वे सब घुस गये हैं
इस जुलूस में शान से
रोशनी को ये मिटायेंगे
यकीनन जान से।
बीस रुपहले कमल जो
कल खिले हैं ताल में
ये उन्हें ही ले रहे हैं
आज अपने जाल में
तुम मूक दर्शक ही रहे तो
क्या कहेंगी पीढ़ियाँ
पाँव इनके तोड़ दो
तुम खींच लो सब सीढ़ियाँ।
ज्योति के उद्धार का
संकल्प अब तुम ही करो
ज्योति पुत्रों!
वर्ण संकर विषधरों से
मत डरो।
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‘वंशज का वक्तव्य’ की पहली कविता ‘अब’ यहाँ पढ़िए


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वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053

सरस्वती वन्दना

श्री बालकवि बैरागी के, मालवी कविता संग्रह ‘चटक म्हारा चम्पा’ की पहली कविता

यह संग्रह श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को समर्पित किया गया है।




सरस्वती वन्दना

दो सुख साता म्हारी सुरसत माता
घर घर सुख सम्पत पोंचावों
गीत को चन्दन गीत को वन्दन
गीत को दिवलो गीत की बाती
गीत को गजरो गीत को नेवज
थाल सजई लाया म्हारा संगाती
निर्धन चाकर ने गीताँ ती
पग धोवा को हुकम हुणावो
 
दो सुख साता म्हारी सुरसत माता

छन्‍द न्‍ही जाणू, बन्द नही जाणू
सुर की महिमा न्‍ही जाणी
न्‍ही जाणूँ कतरा मोती है
कतरो दूध है कतरो पाणी?
राज पँखेरू हंसा कन ती
जामण म्हारो न्‍याव करावो

दो सुख साता म्हारी सुरसत माता

मेरो भरो व्यों तरसा को
दुनियाँ तरसी बैठी है
तरसा तीरे आया जामण
फेर काँ अमरत छेटी है
वीणा का दो बोल हुणई ने
जगदम्‍बा या तरस बुझावो

दो सुख साता म्हारी सुरसत माता

हगरा के, के लछमी माँ ती
था रे राड़ चली अईरी 
अणी बले थारा जाया ती
लछमी माता रीसई री
करपण जग को  भरम मिटावा
लछमीजी ने लारे लावो

दो सुख साता म्हारी सुरसत माता

विद्या को दो दान धराणी
शरणो लेईल्यो है थारो
ज्ञान का चन्दर-भाग उगाओ
मेटी दो यो अन्‍‍धारो
हिरदे बिराजो, घट-घट बैठो
 सब ने हाँचो पंथ वतावो

दो सुख साता म्हारी सुरसत माता
 
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‘चटक म्हारा चम्पा’ की दूसरी कविता ‘चम्पा ती’ यहाँ पढ़िए


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‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिल

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संग्रह के ब्यौरे 
चटक म्हारा चम्पा (मालवी कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज प्रकाशन, 4 हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन
मूल्य - 20 रुपये
चित्रांकन - डॉ. विष्णु भटनागर
प्रकाशन वर्ष - 1983
कॉपी राइट - बालकवि बैरागी
मुद्रक - विद्या ट्रेडर्स, उज्जैन

कार आने से पहले स्कूटर पर बैठ गए, बोले- ‘चल! अकादमी छोड़ दे।’

-डॉ. शिव चौरसिया

यह सितम्बर 2011 की बात है। दादा कालिदास अकादमी के ‘संजा लोकोत्सव’ का शुभारम्भ करने आए हुए थे। फ्रीगंज की एक होटल में उन्हें ठहराया गया था। भोजन के बाद उन्हें अकादमी पहुँचना था। ड्राइवर कार लाता इसके पहले वे मेरे स्कूटर पर बैठ गए। बोले - ‘चल! अकादमी छोड़ दे।’  शहर के साहित्यकारों ने इस मौके के फोटो भी खींचे जो सोशल मीडिया पर खूब चर्चित रहे। 

बैरागीजी सरलता के मानवाकर थे। करीब दस साल पहले की बात है। वे मेरे घर आए। उन्हें अन्दर बैठने को कहा तो बोले - ‘दरी लेकर आओ। बाहर धूप में बैठेंगे।’ वे बाहर, धूप में दरी पर ही बैठे। जब नाश्ता आया तो बोले- ‘ये बाजारू चीजें नहीं, घर का बना जो हो वह लेकर आओ।’

तत्कालीन मुख्यन्त्री कैलाशनाथ काटजू के सामने भी उन्होंने कविताएँ गाईं थी। एक बार काटजूजी ने उनकी अनुपस्थिति में लोगों से पूछा- ‘अरे वह बाल कवि कहाँ है?’ बस उसी दिन से वे नन्दरामदास बैरागी से ‘बालकवि बैरागी’ हो गए। 

1967 में हम लोग मनासा गए थे। उस समय उनका मकान बन रहा था तब बिना प्लास्टर का मकान दिखाते हुए बोले- ‘सरस्वती की कृपा से ही यह घर बन पाया है।’ वे हमेशा कहते थे- ‘इस देश ने मुझ मँगते को मन्त्री बना दिया।’ 

बैरागी समाज का होने से बचपन में ‘सीताराम’ कहते घर-घर जाते थे। इसी दौरान कविता लिखनी और गानी शुरु की। संसद में वे अपनी बात कविताओं में रखते थे। राजमाता सिन्धिया ने संविद सस्कार बनने पर उन्हें मन्त्री पद देने के लिए बुलाया। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।

1977 के पाकिस्तान युद्ध के समय उनकी कविता ‘जबकि नगाड़ा बज ही गया है, सरहद पर शैतान का, नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का’ को खूब पसन्द किया गया। 

वे विधायक, संसदीय सचिव, मन्त्री, लोक सभा सदस्य, राज्यसभा सदस्य जैसे पदों पर रहे लेकिन उनका मालवीपन और सरल सौम्य स्वभाव हमेशा बना रहा। उन्हें मिलनेवाले हर पत्र का वे हाथ से लिख कर जवाब देते थे। उन्होंने फिल्मों में भी गीत लिखे लेकिन जीवन, रहन-सहन का स्तर वही बना रहा। कवि सम्मेलन के लिए यदि तारीख देदी तो फिर वे, कितना भी पैसा मिले, दूसरे को वह तारीख नहीं देते थे। यही उनकी प्रामाणिकता थी।

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(डॉक्टर शिव चौरसिया उज्जैन में रहते हैं। दादा के आत्मीय रहे हैं। दादा जब-जब भी उज्जैन की बात करते थे तब-तब, हर बार मैंने,दादा को शिव दादा का उल्लेख करते ही करते हुए ही सुना। मालवी के प्रति शिव दादा का समर्पण अनुपम है। वे मालवी में लिखते तो हैं ही, परस्पर संवाद भी मालवी में ही करते हैं।

दादा श्री बालकवि बैरागी के ‘बालकवि’ नामकरण को लेकर सबके पास अपने-अपने संस्मरण हैं। वास्‍तविकता यह है कि उनका यह नामकरण किया तो काटजूजी ने ही लेकिन किया, मनासा में, एक आम सभा में।

दैनिक भास्कर में, 2011 में छपे इस संस्मरण की कतरन उज्जैन से श्री प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने उपलब्ध कराई है। शैलेन्द्रजी उज्जैन में विक्रम विश्व विद्यालय में प्रोफेसर, हिन्दी अध्ययनशाला के अध्यक्ष, कला संकायाध्यक्ष और कुलानुशासक हैं। स्‍कूटर पर शिव दादा के पीछे बैठे दादा श्री बालकवि बैरागी का यह फोटू भी शैलेन्द्रजी ने ही लिया था।

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श्री बालकवि बैरागी का पाँचवा काव्य संग्रह: गौरव गीत

 


बालकवि बैरागी: शंख भी, वीणा भी

‘बालकवि बैरागी’ कवि सम्मेलन का केसरी भी है कि दहाड़े और कोकिला भी कि कूके। कहूँ, उसके एक फेफड़ में शंख तो दूसरे में वीणा - झंकार भी, हुँकार भी। वह जीवन का गायक है - न जीवन का भाट, न जीवन का क्लर्क। जीवन का गायक इसलिए कि उसने जीवन पाया नहीं, बनाया है। उसकी तड़फ में कल्पना की कान्ति नहीं, सीधी क्रान्ति है। यह बहुत से लोग जान गए हैं कि वह भिखारी से विचारी बना है, पर यह कम लोग जानते हैं कि उसके विचार छन्द में कूकते हैं तो गद्य में भी निशाना चूकते नहीं।

                                            - पं. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

(प्रभाकरजी की यह टिप्पणी, ‘गौरव गीत’ के अन्तिम आवरण पृष्ठ पर छपी है। किन्तु इसे यहाँ, सबसे पहले देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया।)

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कल से दादा के गीत संग्रह ‘गौरव गीत’ के गीतों का प्रकाशन शुरु कर रहा हूँ। यह दादा का पाँचवाँ संग्रह है। यद्यपि ये गीत काँग्रेस सेवादल के लिए लिखे गए हैं किन्तु इनमें कई गीत ऐसे मिल जाएँगे जो राष्ट्रीय उत्सवों पर प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

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संग्रह की सामान्य जानकारियाँ

‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ

गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह

कवि - बालकवि बैरागी

प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)

आवरण - मोहन झाला, उज्जैन

कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)

प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,

प्रकाशन वर्ष - 1966

मूल्य - 1.50 रुपये

मुद्रक - रतनलाल जैन,

पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 

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समर्पण

काँग्रेस सेवादल की कर्मठ स्वयं सेविका

स्वर्गीया पीलू सिधवा

को

जिसे हम भुवनेश्वर से वापस नहीं ला सके

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सन्देश

राष्ट्रीय गौरव को मुखरित कर राष्ट्र की एकता का शंखनाद करने वाले राष्ट्रीय कवि बालकवि बैरागी का कविता संग्रह ‘गौरव गीत’ देखकर स्वयं गौरव से भर उठा।

बैरागी मध्य प्रदेश की अमूल्य सम्पत्ति हैं जो कि अपनी राष्ट्रीय रचनाओं को ‘गौरव गीत’ के द्वारा सौंप कर राष्ट्रीय जागरण की इस बेला में महान् कार्य कर रहे हैं।

मेरी हार्दिक कामना है कि ‘गौरव गीत’ जन-जन के मुख से मुखरित हो। मेरे समस्त आशीर्वाद उनकी सफलता के लिये प्रस्तुत हैं।

लालाराम बाजपेयी
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

प्रिय बैरागीजी,

यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि आप अपनी सुरुचिपूर्ण, ओजस्वी और प्रेरणास्पद रचनाओं का संग्रह ‘गौरव गीत’ के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं।

मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि ‘गौरव गीत’ की रचनाएँ नगर-नगर और ग्राम-ग्राम में गूँजें और हमारे कार्यकर्ता इनसे प्रेरणा प्राप्त कर देश भक्ति की भावना से ओत-प्रोत रहें।

समस्त शुभ-कामनाओं सहित।

आपका,
शंकरलाल तिवारी,
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

भाई बैरागीजी हमारे प्रान्त के ‘गौरव’ हैं। बैरागीजी की रचनाओं से अब पूरा देश परिचित हो चुका है। इनकी रचनाओं में काफी ओज और जोश है। राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत ‘गौरव गीत’ नयी पीढ़ी को प्रोत्साहित करनेवाला एक अत्यन्त उपयोगी एवं सरस कविता संग्रह है।

‘गौरव गीत’ पढ़कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ‘गौरव गीत’ का कवि इस परिश्रम के लिए हार्दिक बधाई का पात्र है।

समस्त शुभ-कामनाओं के साथ।

सवाईसिंह सिसौदिया,
प्रधान मन्त्री,
मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी

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सन्देश

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि आप काँग्रेस सेवादल के गीतों का संग्रह ‘गौरव गीत’ के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं।

आज जबकि हमारा देश कठिन समस्याओं का सामना कर रहा है, ऐसे समय में भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावनाओं को उत्पन्न करना अत्यन्त आवश्यक है।

मझे आशा है कि ‘गौरव गीत’ के प्रकाशन के रूप में आपका यह प्रयास भारतीय जनता में नया उत्साह और नया जोश उत्पन्न करेगा।

मैं आपकी पूर्ण सफलता की कामना करता हूँ।

वृन्दावनसिंह तोमर,
जी. ओ. सी.
काँग्रेस सेवादल, मध्य प्रदेश

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सन्देश

श्री बालकवि बैरागी से मेरा घनिष्ठ परिचय बरसों से है। वह बचपन से ही सेवादल के एक कर्मठ सदस्य रहे हैं। छोटी सी उम्र से ही कविता लिखना आरम्भ कर दिया और सेवादल के लिये कितनी ही कविताएँ लिखीं। तभी वह बालकवि कहलाया। धीरे-धीरे उनकी कविताओं में ओज आना शुरु हुआ। उनका कविता पठ का ढंग अति आकर्षक है। कोयल सा मीठा स्वर और सेनानी जैसी हुँकार। उनकी कविताएँ बम्बई तथा अन्य सभी स्थानों पर सेवादल के हर सेवक-सेविका की जबान पर हैं। सेवादल की अखिल भारतीय रैली भोपाल के अवसर पर बालकवि बैरागी की कविता ‘सेवादल के सबल सिपाही उमड़-घुमड़ कर आये हैं’ आज भी कानों में गूँज रही है।

स्वर्गीय प्रधान मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने जिन्होंने रैली का उद्घाटन किया था बालकवि की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

बालकवि बैरागी आज कवियों के गगन मण्डल में एक निहायत चमकते सितारे हैं। आपको अखिल भारतीय प्रसिद्धि प्राप्त है। जिस अ. भा. कवि सम्मेलन में बालकवि न हो, फीका सा दिखता है। श्रोतागण बालकवि को सुनने के बार-बार इच्छुक रहते हैं। आजकल बालकवि कवियों की सबसे अग्रिम पंक्ति में हैं।

उनकी सेवादल के गीतों की किताब ‘गौरव गीत’ का निश्चय ही सर्वत्र स्वागत होगा और सेवादल के हर सेवक-सेविका इसकी प्रतियाँ अपनाकर गौरव का अनुभव करेंगे।

‘परवाना’,
सूचना अधिकारी, काँग्रेस सेवादल
7, जन्तर मन्तर रोड़, दिल्ली

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भूमिका

अपनी लौह लेखनी से राष्ट्र की एकता और प्रगति के चरण पखार कर जन-जन के मन में राष्ट्रीय जागरण का उद्घोष करने वाले राष्ट्रीय कवि बालकवि बैरागी का कविता संग्रह ‘गौरव गीत’ इस देश के राष्ट्र भक्तों के लिए प्रेरणादायी अमूल्य थाती होगा।

‘गौरव गीत’ में उन्हीं रचनाओं का समावेश है जो राष्ट्र की वेदी पर बलि जाने वाले लौह लाड़लों का मार्ग दर्शन करती हे।

वे ‘गौरव गीत’ के माध्यम से राष्ट्र के गौरव को अक्षुण्ण रखेंगे।

इन्हीं शुभ-कामनाओं के साथ।

श्यामसुन्दर नारायण मुश्रान
अध्यक्ष, मध्य प्रदेश काँग्रेस कमेटी,
भोपाल दिनांक 17-7-66

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मेरा पृष्ठ

मेरे गीतों का एक और संग्रह ‘गौरव गीत’ आपके हाथों में है। यह प्रकाशित नहीं भी होता तो किसी का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं था। न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। निश्चित ही ये गीत मैंने समय-समय पर काँग्रेस सेवादल के लिये लिखे हैं। भारत भर में लाखों स्वयं सेवक इन गीतों को गाते हैं और इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में भी इनका प्रकाशन हो चुका है। लेकिन सेवादल के मेरे साथियों का आग्रह साकार करने में मुझे कई गीत निकालकर अलग रखने पड़े हैं। जो भी गीत इसमें दे रहा हूँ वे बहु-प्रचारित हैं। साफ-साफ कहूँ कि मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। काँग्रेस संस्था और सेवादल के लिये बेशक इन गीतों का कोई महत्व नहीं हो सकता है। पर मेरे लिये तो इन गीतों का महत्व है। और चूँकि मेरे कवि को यश दिलाने वाले प्रथम सोपान के रूप में ये गीत अहमियत रखते हैं अतः इनको भी पुस्तकाकार देकर मैंने सेवादल का कर्ज चुकाने का रंच भर प्रयास किया है। मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। अब तो आप भी इस प्रकाशन के औचित्य को स्वीकार करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।

अ. भा. सेवादल के सहायक संगठक भाई साहब श्री एस. एन. सुब्बराव का मैं जितना आभार मानूँ उतना ही कम है। इन रचनाओं तथा ऐसी मेरी पचासों रचनाओं के पीछे उनकी अपार प्रेरणा रही है। म. प्र. काँग्रेस सेवादल के जी. ओ. सी. भाई श्री वृन्दावनसिंहजी तोमर का भी मैं हृदय से उपकार मानता हूँ। मेरी सफलताओं को वे अपना निजी गौरव मानते हैं। यह उनकी महानता है। सेवादल के लाख-लाख भाई-बहनों का मैं वन्दन करता हूँ जो मेरी इन रचनाओं को गाते हैं और हर बार मुझसे नई रचना माँगते हैं। उनका एहसान है कि वे इनको गाते भी हैं और खरीदते भी हैं। सही अर्थों में इन गीतों पर उनका ही अधिकार है।

म. प्र. काँग्रेस सेवादल के अध्यक्ष माननीय श्री श्यामसुन्दर नारायणजी मुश्रान ने इस संग्रह की भूमिका लिखकर इन गीतों की प्राण रक्षा की है। उनकी मुझ पर अपार कृपा रही है और वे वात्सल्य का भाव सदा-सदा मेरे प्रति रखते आये हैं। उनका मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। जिन-जिन महानुभावों ने इस संग्रह को अपनी शुभ-कामनाएँ दी हैं, मैं उनको धन्यवाद देता हूँ।

पंचशील छापेखाने के मालिक बापू दादा और मुद्रक रतन दादा तथा वहाँ के कर्मचारियों को धन्यवाद नहीं दूँगा तो बात अधूरी रह जायेगी। इनकी कृपा से ही यह संग्रह इतनी जल्दी छप सका है।

दो नाम और हैं जो इस समय मुझे लेने हैं। एक तो भाई श्री पूरन सहगल ‘मधु’ जिनकी जिद इस किताब के प्रकाशन के लिये बलवती रही है और एक है बावरी ‘छाया’ जो उसके भैया की पाँचवी पोथी देखते ही रोमांचित हो जायेगी। मेरी रचनाओं को वह सिर्फ पढ़ती ही नहीं, ममता भरे हाथों से सहलाती रहती है और मेरे लिये पूजाएँ करती रहती है। उसका ममत्वपूर्ण स्पर्श ही मेरे गीतों को वाचाल बना देता है।

सुशील ‘पिया’ ने चुरा-चुरा करके जोड़े हुए पैसे ‘गौरव गीत’ के प्रकाशन के लिये मेरे हाथ में रख दिये। इससे मुझे लगा कि पत्नी की चोरियाँ भी उपयोगी होती हैं। वह चाहती तो इन रुपयों का किनारी-गोटा खरीद सकती थी, जेवर बनवा सकती थी या उसके बेटों के लिये कपड़ा खरीद सकती थी। पर, ‘सेवादल के लिये गीतों की किताब छप रही है’ यह सुनते ही उसने अपना काला पैसा बाहर ला दिया। यह सेवादल के सिद्धान्तों और आदर्शों का ही प्रभाव है। ‘पिया’ का ‘पियापन’ अलबेला है। उसको धन्यवाद देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

आपका तो आभारी हूँ ही

बालकवि बैरागी
मनासा (म. प्र.), जिला मन्दसौर
दिनांक 15 अगस्त 1966

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छन्द

तुम्हें वतन से प्यार नहीं तो
भाई तुम इंसान नहीं।
माँ का दूध लजा कर जीये
उस सा बेईमान नहीं।


छन्द

जब तक ऊमर है, साँसे हैं
गीत वतन के गाये जा।
मानव बन कर आया है तो
मानव धर्म निभाये जा।

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अनुक्रम

1. अभिलाषा

2. सेवादल के सबल सिपाही

3. हम सिपाही सेवादल के

4. हौसला हमारा

5. आज तो गूँजेगी धरती

6. श्रम का मंगल मोहरत

7. हम भारत माँ के पूत

8. हँसते-गाते

9. आगे-आगे बढ़ रहे हैं

10. आई नई हिलोर

11. हम भारत के मतवाले हैं

12. नौजवानों आओ रे

13. नेहरू के सिपाहियों

14. चलो चलें सीमा पर मरने

15. त्यौहार है

16. यह मशाल है आजादी की

17. ज्योति जले

18. जो भी कोई साथ हमारे आयेगा

19. मत घबराओ

20. नई बेला आई रे

21. नौजवान आ गये सारे जहान के

22. विविध भारती

23. असन्तुष्ट काँग्रेसियों से

24. यह प्यारा दिन

25. सेवादल के आदि पुरुष

26. सेवादल में आवो रे

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गौरव गीत’ का पहला गीत ‘अभिलाषा’ यहाँ पढ़िए


मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी। 

‘दरद दीवानी’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  





‘चटक म्‍हारा चम्‍पा’ - भूमिका, समर्पण और संग्रह के ब्यौरे



संग्रह के ब्यौरे 

चटक म्हारा चम्पा (मालवी कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज प्रकाशन, 4 हाउसिंग शॉप, शास्त्री नगर, उज्जैन
मूल्य - 20 रुपये
चित्रांकन - डॉ. विष्णु भटनागर
प्रकाशन वर्ष - 1983
कॉपी राइट - बालकवि बैरागी
मुद्रक - विद्या ट्रेडर्स, उज्जैन

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समर्पण
दादा श्री नरेन्द्र सिंह तोमर
को सादर सविनय समर्पित

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छन्द
                                    म्हारी आँखाँ का आँसू ती, उफणी री है जलझारी
                                    म्हारा सपना की सेजाँ पर, बरसीग्यो सावन भारी।
                                    म्हारा ने म्हारा हिवड़ा का हिवड़ा-जिवड़ा मसरी रे
                                    म्हारा छाला को गंगाजल देईरी सबने पणिहारी।
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भूमिका

देसिल बअना सब जन मिट्ठा

शब्द हमारी वाणी के वाहक हैं, वहीं मानव हृदय की अपार भाव-सम्पदा का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा और राजदूत भी हैं।  व्याकरण शब्दों को अनुशासन में बाँधने का प्रयास अवश्य करता है किन्तु शब्दों की स्वच्छन्द प्रकृति एक सीमित अर्थ-सत्ता के बन्धन को स्वीकारने को तैयार नहीं होती। अनेक लोकभाषा और बोलियों के शब्दों में विभिन्न भावलहरियों एवं मनस्थितियों की ऐसी झाँकी देखने को मिलती है, जो किसी शब्दकोश की रूढ़ और निर्धारित परम्परा से एकदम

भिन्न होती है। एक कुशल शब्द-शिल्पी, कवि की काव्य-भाषा के सन्दर्भ में तो उक्त धारणा को बल मिलेगा।

बालकवि बैरागी के इस काव्य-संकलन की भाषा मालवी है। मालवी पर भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से काफी लिखा जा चुका है। मालवा की उत्पत्ति एवं स्वरूप् पर यहाँ विस्तृत चर्चा करना अनावश्यक है, केवल कवि की भाषा विषयक मान्यताओं का विवेचन तथा उनकी काव्य-भाषा मालवी पर विचार करना ही वांछनीय है। “मालवी” के विषय में कवि के अपने विचार हैं- (1) वैसे भी मालवी बोली के निर्माण में छः भाषाओं का योगदान माना जाता है। इसमें राजस्थानी, गुजराती, हिन्दी, मराठी, पंजाबी और उर्दू के शब्द आपको आसानी से मिल जायेंगे। मेरी मालवी को आप “मन्दसौरी मालवी” भी कह सकते हैं। यह मालवी का एक उपभेद हुआ। रतलाम की तरफ मालवी की मुख्य धारा का आँचल इसका सिर-पैर रहा है ।

उक्त दोनों प्रकार की भ्रान्तियों पर भी पर्याप्त विचार हुआ है । स्थान-विशेष एवं जातियों को लेकर मालव जैसे विस्तुत एवं विभिन्न संस्कृतियांे से युक्त प्रदेश में भाषा के अनेक भेद और उपभेद माने जा सकते हैं। ग्राम और नगर, स्त्री और पुरुष, शिक्षित और अशिक्षित की बोली में कुछ भेद या अन्तर तो मिल जाता है किन्तु एक सीमित क्षेत्र में बसने वाली विभिन्न जातियों के आधार पर बोली के अनेक भेदोपभेदों की कल्पना कर लेने में न तो कोई तथ्य है और न भाषा-विज्ञान की दृष्टि से उनका सबल आधार ही है ।

डॉ. श्याम परमार ने मन्दसौ, रतलामी आदि स्थानों के नाम पर मालवी के भेदों में ‘मन्दसौर’, ‘रतलामी’ आदि  नामकरण किये हैं। वस्तुतः रतलाम और मन्दसौर क्षेत्र की बोली में कोई अन्तर नहीं है। मन्दसौर जिले के अन्तर्गत सौंधवाड़ का कुछ क्षेत्र सम्मिलित हैं। मन्दसौर जिले के पूर्वी क्षेत्र की ग्रामीण जनता की बोली

की दृष्टि से मन्‍दसौर की बोली और सौंधवाड़ी में भी पर्याप्त समानता है। सौंधवाड़ी मालवी का एक प्रमुख उपभेद है। बालकवि की मालवी भाषा को ‘रजवाड़ी’ के अन्तर्गत माना जायेगा। हाँ, यदि उनकी भाषा को हम ‘रांगड़ी’ कहें तो वे आपत्ति

कर सकते हैं। स्वभाव और संस्कार से वे ने तो रांगड़ हैं और न ही उनकी भाषा रांगड़ी। भले ही प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डॉ. गियर्सन ने रजवाड़ी या रांगड़ी कहकर जन-प्रवाह से बचने की चेष्टा की हो। 

काव्य लेखन में भावों की पकड़ के साथ, उनको प्रकट करने की कला का सर्वाधिक महत्व होता है। बालकवि बैरागी इस मामले में बेजोड़ हैं। शब्द चयन में उनकी भालवी का सौन्दर्य और भाव-बोध की कला को स्पष्ट देखा जा सका है--


‘आम्बा लगईग्यो ने हाँठा उगईग्यो
काँटा का नखल्या तोड़ीग्यो
भूखा ने धाणी गूँगा ने वाणी
देह ने हठीलो पोढ़ी ग्यो।’


हार्‌या  ने हिम्मत’ शीर्षक कविता का अंश है - आम के वृक्ष को जिसने लगाया, गन्ने को जिसने उगाया, काँटों के नखों को जिसने तोड़ा, जिसने भूखों को भोजन और गूँगे लोगों को वाणी दी। निष्ठा और आग्रहपूर्वक ऐसे काम करने वाला व्यक्ति अनन्त की गोद में सो गया। यह जवाहरलालजी की मृत्यु पर प्रकट की गई भावाभिव्यक्ति है ।

सौन्दर्य से अभिभूत होने के लिए - 

‘नैण वणी का घणा हत्यारा’

आनन्दभाव की अतिशयता को प्रकट करने के लिये - 

‘आँगणा में म्हारे रोज वँटे रे पतासाँ’

‘दुःख परायो जाणी लेणो मोटी बात है’


उपेक्षा भाव के लिये -

‘होकड़ली म्हारी घणी नखरारी ;

नकटी, नसेड़ी जावे रे उधारी।’

जैसी उक्तियाँ उल्लेखनीय हैं । 


इस संग्रह में मालवी कविताओं और गीतों के साथ ही गीतांजलि के दो गीत, पुर्तगाली कविता ‘झील’ और अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि जान कीट्स की कविता हृदयहीन रूपसी’ जैसी रचनाओं को मालवी में अनुवाद प्रस्तुत करना विशेष उल्लेखनीय है। बैरागी की कविता लोकधुनों और लोकगीतों से प्रभावित है। यह उनके पिता और भजन मण्डलियों की देन है।

वस्तुतः बैरागी भूमि और जनजीवन का कवि है। जननी और जन्मभूमि से उसे लगाव है। विषय चयन में भी उसकी अपनी विशेषता है।

‘चटक म्हारा चम्पा’, ‘पनिहारी’, ‘नणदल’, ‘कामणगारा की याद’, ‘लेवा पधार्‌या’ जैसी रचनाएँ सामान्य जीवन की प्रवृत्ति को प्रकट करते हुए भी उद्दाम श्रृंगार की भावना से पूर्ण हैं। देश भक्ति की भावना के लिये ‘खादी की चुनरी’, ‘लखारा’, ‘हार्या ने हिम्मत’ जैसी रचनाओं को नहीं भुला सकते। ‘बेटी की बिदा’ जैसी कविताएँ कठोर हृदय व्यक्ति को भी रुलाने के लिये पर्याप्त हैं। श्रृंगार-वीर-करुण भाव को व्यक्त करने के लिये बैरागी ने अपनी अभिव्यक्ति को साध लिया है, यहीं उसका भाषा की शक्ति और प्रभाव भी बढ़ जाता है। उसके मंचजयी होने का यही कारण है। मैं उसे ‘श्रृंगार और अंगार’ का बेजोड़ कवि मानता हूँ। बालकवि की मालवी कविताओं का यह पहला संग्रह प्रकाशित हो रहा है। मझे बड़ी प्रसन्नता है

और कवि की तरह मैं असन्तुष्ट हूँ कि भूमिका ‘मालवी’ में नहीं लिख सका।


डॉ. चिन्तामणि उपाध्याय
आजाद नगर, उज्जैन
गणतन्त्र दिवस 1983

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‘चटक म्हारा चम्पा’ की पहली कविता ‘सरस्वती वन्दना’ यहाँ पढ़िए


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अब


श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की पहली कविता

यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।



अब

अब छँटे तो छँटे नारों का कुहासा
और अब बदले तो बदले मेरे बेटे की भाषा
राम जाने
किसने झटक दी है शेर की वह खाल
बिलकुल मेरी ही तरह सीधा सादा
निकल आया है भीतर से ।
स्कूल से घर
और घर से स्कूल
.पटरी उखाड़ना और शीशे तोड़ना तो ठीक,
.अब नहीं तोड़ता खुद अपने ही बगीचे के फूल ।
हो न हो
अब यह फिर कोई न कोई नेट या
आर्यभट्ट बनायेगा
और हो न हो
अपने बेसुरे सुर से
सामवेद नहीं तो
कोई मेरा ही बेतुका गीत गायेगा ।
एकाध नये पोकरण में फिर से करेगा धमाका
हो न हो, यह फिर से
उजलायेगा दूध ।
इसकी माँ का
लौट रहा हए मेरा विश्वास कि
अव यह वैसा नहीं करेगा
जैसा कि कल तक कर रहा था
और आश्वस्त कर देगा मुझे कि
मैं इसका बाप इससे
यूँ ही डर रहा था ।
‘आशा अमर है’
मुहावरा बुरा नहीं है
पहिली बार देख रहा हूँ कि
आज इसके हाथ में कोई
चाकू या छुरा नहीं है ।
पता नहीं
यह कैसे सुधर गया है
समझ नहीं पा रहा हूँ कि
इसका भूत
बोतल में कैसे उतर गया है!
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‘वंशज का वक्तव्य’ की दूसरी कविता ‘दीप बेला’ यहाँ पढ़िए


मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

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वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053





‘भावी रक्षक देश के’ - पाँचवाँ/अन्तिम बाल-गीत





सहगान

हम पर है उपकार कितना तेरा
हाँ तेरा,
अरे ओ! मिट्टी के कण!
कैसे इतना कर्ज उतारे
छोटा सा जीवन
हमारा छोटा सा जीवन
ओ मिट्टी के कण!

                            -1-

जननी के आँचल में तू ही दूध बना प्यारे
तूने ही ममता के सारे खोल दिये द्वारे
(पर) दो किलकारी में ही सारा बीत गया बचपन
(अब) कैसे इतना कर्ज उतारे छोटा सा जीवन
अरे ओ मिट्टी के कण!
हम पर है उपकार कितना तेरा.....हाँ तेरा.....।।

                            -2- 

तू ही खून पसीना बन कर यौवन कहलाया
तूने ही दी भरपूर उमंगें दी कंचन काया
(पर) दो सपने देखे ना देखे बीत गया यौवन
(अब) कैसे इतना कर्ज उतारे छोटा सा जीवन
ओ मिट्टी के कण!
हम पर है उपकार कितना तेरा..........हाँ तेरा.....।।

                            -3- 

मिला बुढ़ापा झुकी कमरिया झुकी नजरिया रे
मानो झुक कर ढूँढ रही है गई उमरिया रे
ढूँढ-ढँूढ कर काया हो गई मरघट का ईंधन
(अब) कैसे इतना कर्ज उतारे छोटा सा जीवन
ओ मिट्टी के कण!
हम पर है उपकार कितना तेरा..........हाँ तेरा.....।।

                            -4-

आज नहीं तो कल या परसों कर्ज चुकायेंगे
तेरा यह अहसान चुकाने फिर से आयेंगे
लाख जनम माँगेंगे तुझसे ऐसा ही जीवन
(अब) कैसे इतना कर्ज उतारे छोटा सा जीवन
ओ मिट्टी के कण!
हम पर उपकार कितना तेरा..........हाँ तेरा.....।। 
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भावी रक्षक देश के - चौथा बाल-गीत ‘प्रतिज्ञा’ यहाँ पढ़िए








भावी रक्षक देश के (कविता)
रचनाकार - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली 
मुद्रक - शिक्षा भारती प्रेस, शाहदरा, दिल्ली
मूल्य -  एक रुपया पचास पैसे
पहला संस्करण 1972 
कॉपीराइट - बालकवि बैरागी
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‘भावी रक्षक देश के’ - चौथा बाल-गीत ‘प्रतिज्ञा’



                            प्रतिज्ञा

                जननी! तेरे सिंह-सुवन हम,
                बाल बहादुर बलिदानी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा
                करते हैं हम सेनानी।

                            - 1-

                तेरा ये हरियाला आँचल,
                सदा रखेंगे हरियाला।
                झुलसा नहीं सकेगी इसको,
                युद्धों की भीषण ज्वाला।

                हीरे-मोती जैसी फसलें,
                झूमेंगी लहरायेंगी।
                अमराई में कोयल रानी,
                मीठे गीत सुनायेगी।

                पनघट पर राधा की गागर,
                कान्हा सदा उठाएगा।
                सारा भारत एक बार फिर,
                वृन्दावन बन जायेगा।

                दूघ-दही की नदियाँ फिर से,
                हम गोपाल बहायेंगे।
                माखन मिसरी के गोवर्द्धन,
                लाखों नये बनायेंगे।

                सबके सुख में सुखी रहेंगे,
                सबकी पीर बँटायेंगे।
                विश्व शान्ति की माँग हमीं माँ!
                ऐटम से भरवायेंगे।

                छिड़केंगे सारी धरती पर,
                गंगा का पावन पानी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा,
                करते हैं हम सेनानी।

                            -2-

                सब धर्मों का मान करेंगे,
                सबको नमन हमारे हैं।
                सब देवालय पूज्य हमारे,
                हम सबके रखवारे हैं।

                सब ग्रन्थों का अर्चन करके,
                सबको शीश झुकायेंगे।
                मजहब के झूठे झगड़ों को,
                जननी! हम दफनायेंगे।

                सबसे बड़ा हमारा ईश्वर,
                प्यारा देश हमारा है।
                सौ-सौ स्वर्ग निछावर इस पर,
                अर्पित जनम हमारा है।

                एक जनम या कोटि जनम तक,
                इसकी खातिर लेंगे हम।
                एक इंच भी इस धरती का,
                नहीं किसी को देंगे हम।

                जो भी आँख उठेगी इस पर,
                या जो भी ललचायेगी।
                जननी! तेरी कसम उसी क्षण,
                तुरत फोड़ दी जायेगी।

                तेरे आगे उठ न सकेगा,
                कोई भी सिर अभिमानी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा, 
                करते हैं हम सेनानी।

                            -3-

                सारा भारत एक रखेंगे,
                भाषा से और भावों से।
                सदा-सदा संघर्ष करेंगे,
                शोषण और अभावों से।

                आजादी को शहरों से अब,
                गाँवों तक ले जायेंगे।
                प्रजातन्त्र का महामन्त्र हम,
                जन-जन को सिखलायेंगे।

                बलिदानों के गौरव कुल का,
                जननी! मान बढ़ायेंगे।
                तेरे अमर शहीदों का यश,
                पल-भर नहीं भुलायेंगे।

                तेरे लिये जियेंगे जननी।
                तेरे लिये मरेंगे हम।
                तेरे तने हुए मस्तक को,
                ऊँचा और करेंगे हम।

                चाँद सितारों तक हम तेरी,
                महाध्वजा फहरायेंगे।
                जब-जब तू माँगेगी तब-तब,
                हँसकर शीश चढ़ाएँगे।

                तिल भर नहीं झुकेगी तेरी,
                पुण्य पताका कल्याणी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा, 
                करते हैं हम सेनानी।

                            -4-

                यौवन को वापस लायेंगे,
                मेहनत के उजियारों में।
                नहीं देश को उलझायेंगे,
                हड़तालों और नारों में।

                नहीं कभी भी आयेंगे हम,
                बहकावे की बातों में।
                अनुशासन का अस्त्र रखेंगे,
                हरदम अपने हाथों में।

                राजनीति से धूर्तनीति को,
                देंगे देश निकाला हम।
                लोकनीति का सूर्य उगा कर,
                देंगे नया उजाला हम।

                नव समाज के निर्माता हम,
                श्रम का मान बढ़ायेंगे।
                तेरा सपना हँसे-गाते,
                सच करके दिखलायेंगे।

                तेरी आस पुरायेंगे माँ,
                तेरा कर्ज चुकायेंगे।
                तेरी माटी में मिल कर फिर,
                तेरा आँचल पायेंगे।

                तेरी कोख उजागर करके,
                कहलायेंगे सद्ज्ञानी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा,
                करते हैं हम सेनानी।

                            -5-

                चाहे जितनी आफत आयें,
                कभी नहीं घबरायेंगे।
                अमर तिरंगा लेकर जननी!
                आगे बढ़ते जायेंगे।

                कच्ची ऊमर, कच्ची काया,
                लेकिन धुन के सच्चे हैं।
                बाधाएँ क्या कर लेंगी माँ!
                हम भी तेरे बच्चे हैं।

                सागर जैसा मन पाया है,
                इस छोटी-सी काया में।
                मंजिल तक हम पहुँचेंगे ही,
                जननी! तेरी छाया में।

                सारा जग परिवार हमारा,
                सबसे भाईचारा है।
                जियो और जीने दो सबको,
                जीवन मन्त्र हमारा है।

                गीत अमन के गाते-गाते,
                तेरा यश फैलायेंगे।
                तेरे गौरव बन कर अपना,
                जीवन सफल बनायेंगे।

                मानवता को नयी जिन्दगी,
                देंगे हम औढर दानी।
                भुजा उठा कर आज प्रतिज्ञा,
                करते हैं हम सेनानी।

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भावी रक्षक देश के - तीसरा बाल-गीत ‘प्रेरणा’ यहाँ पढ़िए

भावी रक्षक देश के - पाँचवाँ/अन्तिम बाल-गीत ‘सहगान’ यहाँ पढ़िए


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भावी रक्षक देश के (कविता)
रचनाकार -
बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली 
मुद्रक - शिक्षा भारती प्रेस, शाहदरा, दिल्ली
मूल्य -  एक रुपया पचास पैसे
पहला संस्करण 1972 
कॉपीराइट - बालकवि बैरागी
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उस दिन दादा रोते ही रहे

 

नेहरूजी के अवसान दिनांक 27 मई 1964 को दादा, घर पर, मनासा में ही थे। उन्हें खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ था। खबर सुनकर ही वे धार-धार रोने लगे थे। हम सब उन्हें देखे जा रहे थे। कोई भी उन्हें समझाने या ढाढस बँधाने की स्थिति में नहीं था। वे तो हम सब का ढाढस थे! उन्हें हम क्या ढाढस बँधाते! उन्हें रोते देख-देख कर दुःखी हुए जा रहे थे। उस दिन दादा ने भोजन नहीं किया। किसी से बात भी नहीं की। 

नेहरूजी की शवयात्रा का आँखों देखा हाल आकाशवाणी से प्रसारित हो रहा था। दादा खुद के लिए तो रेडियो नहीं खरीद पाए थे लेकिन पिताजी के लिए उन्होंने एक ट्रांजिस्टर खरीद दिया था। ठीक-ठीक तो याद नहीं किन्तु शायद फिलिप्स का ‘बहादुर’ मॉडल ट्रांजिस्टर था। पिताजी की बैठक, मकान के अगले हिस्से में बनी छोटी सी कोठरी में थी जिसे हम सब ‘ओऽरी’ कहते थे। दादा, वहीं ओऽरी में, पिताजी के पास बैठकर शवयात्रा का आँखों देखा हाल सुन रहे थे और निरन्तर रोए जा रहे थे। मैं भी ओऽरी में ही बैठा हुआ था। 

पिताजी भी उन्मन-मन आँखों देख हाल सुन रहे थे। लेकिन उनकी नजर बराबर दादा पर बनी हुई थी। बड़ी देर बाद पिताजी ने धीर-गम्भीर स्वर में दादा से कहा - ‘जावा वारो चल्यो ग्यो बेटा! अबे रोवो मती। रोवा ती जावा वारो तो पाछो नी आवेगा। खुद ने हमारो ने जावा वारा काम हाथ में लो ने वणी ने आगे बढ़ाओ। पूरो करो।’ (जानेवाला चला गया बेटा! अब रोओ मत। रोने से, जानेवाला वापस नहीं आएगा। खुद को सम्हालो और जानेवाले का काम हाथ में लो और उसे आगे बढ़ाओ। पूरा करो।) 

दादा ने कोई जवाब नहीं दिया। पिताजी की ओर देखा भी नहीं। रोते-रोते ही, चुपचाप सुन लिया।

कुछ ही दिनों बाद दादा के दो गीत सामने आए - एक हिन्दी में और एक मालवी में। पहले कौन सा लिखा गया, यह तो दादा ही जाने। किन्तु मुझे लगता है कि दादा के मन मे मालवी गीत पहले उगा होगा क्योंकि वे मालवी में ही सोचते थे। 

दादा के ये दोनों गीत यहाँ प्रस्तुत है। पहले मालवी गीत और बाद में हिन्दी गीत। मालवी गीत, दादा के मालवी गीतों के संग्रह ‘चटक म्हारा चम्पा’ में ‘हार्‌या ने हिम्मत’ शीर्षक से और हिन्दी गीत ‘मत घबराओ’ शीर्षक से, ग्रीत संग्रह ‘गौरव गीत’ में संग्रहित है। 



हार्‌या ने हिम्मत

भरी रे दुपेरी में सूरज डूब्यो
वेईग्यो घुप्प अँधारो रे राम
तो मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम

घरती को धीरज धक-धक घूजे
गगन वसीका ताणे रे
इंडो फूटीग्यो टींटोड़ी को
जिवड़ा की जिवड़ो जाणे रे
तो बीती बिसारो ने धीरज धारो
यूँ मती हिम्मत हारो रे राम!
मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में.....

आँबा लगईग्यो ने हाँटा उगईग्यो
काँटा का नखल्या तोड़ीग्यो
भूखा ने धाणी ने गूँगा ने वाणी
देई ने हठीलो पोढ़ीग्यो
या तितली पे बिजली पड़ी अण वीती
गायाँ ने छोड़ीद्यो चारो रे राम!
तो मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में.....

मन्दर रोवे ने मज्जित रोवे
रोवे है गुरुद्वारा रे
गिरजाघर का आँसू न्ही टूटे
रोवे धरम हजाराँ रे
मनकपणा ने नींदड़ली अईगी
वेईग्यो बन्द हुँकारो रे राम!
तो मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में.....


तीरथ अपणो ते करीग्यो है
जग ने मोवणहारो रे
दरसण करवा ने पाछे अईर्‌यो
आखो ही जग दुखियारो रे
पाछे वारा की पीड़ा जाणो ने
आगे पंथ बुहारो रे राम!
मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में.....


पग पग पर पँतवार॒याँ वणई ने
पंथ वणईग्यो पाको रे
सत का सरवर और सरायाँ
बाँधीग्यो बेली थाँको रे
(अब) काँधा की कावड़ छलकी न्‍ही जावे
बिछड़े न्ही संग यो रुपारो रे राम!
तो मन का दिवला संजोवो म्हारा सँगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में..... 

वेगा-वेगा चालो तो पंथ कटेगा
रात कटेगा अँधारी रे
आँसूड़ा पोंछो तो आँखा में उतरे
पूनम की असवारी रे
ठेठ ठिकाणे पोंची ने अपणा
काँधा को बोझ उतारो रे राम!
मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में

एक असते है तो एक उगे है
मत यो नेम बिसारो रे
सूरज डूब्यो तो चाँद उगेगा
न्हीं तो उगेगा तारो रे
नछंग अँधारो कदी भी नही रेगा
पूरब आड़ी  नाऽरो रे राम!
मन का दिवला संजोवो म्हारा संगवी
करी लो नी फेर उजारो रे राम
भरी रे दुपेरी में.....
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अब पढ़िए हिन्दी गीत
 

मत घबराओ

भरी दुपहरी
सूरज डूबा, मत घबराओ
अपने मन का दिया जला कर
जैसे-तैसे कदम बढ़ाओ
मत घबराओ.....

- 1 -

यदा-कदा ही इतिहासों में, ऐसा अवसर आता है
जब कि धरा का जलता सूरज, अनायास बुझ जाता है
इसे अँधेरा मान-मान कर
मत प्रकाश का मान घटाओ
मत घबराओ, सूरज डूबा.....

- 2 - 

जानेवाला चला गया तो, क्या होगा यूँ रोने से
नया उजाला फूट रहा है, देखो कोने-कोने से
उसके आदर्शों पर चलकर
तुम खुद ही सूरज बन जाओ
मत घबराओ, सूरज डूबा.....

- 3 - 

अपने पैरों खड़ा कर दिया उसने, भरी जवानी को
नये सिरे से पूरी लिख दी, उसने मिटी कहानी को
अब तो बस शीर्षक देना है
इतना तो तुम भी कर जाओ
मत घबराओ, सूरज डूबा.....

- 4 -

इतिहासों में अमर नहीं है, आज तलक अँधियारा रे
सूरज डूबा, चाँद उगेगा, या उभरेगा तारा रे
नये सूर्य के जनम दिवस तक
तारों से ही काम चलाओ
मत घबराओ, सूरज डूबा.....
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यहाँ प्रस्तुत चित्र गाँधी सागर बाँध के उद्घाटन समारोह (19 नवम्बर 1961) का है। 19 नवम्बर इन्दिराजी की जन्म तारीख है। उद्घाटन की यह तारीख डॉक्टर कैलाशनाथ काटजू ने तय की थी। उद्घाटन समारोह का संचालन दादा ने ही किया था। मन्दसौर संसदीय क्षेत्र के तत्कालीन लोक सभा सदस्य श्री माणक भाई अग्रवाल भी मंच पर उपस्थित थे।  आयोजन की बिजली और ध्वनि व्यवस्था का जिम्मा, मन्दसौर के ख्यात, पीढ़ियों पुराने, साखदार प्रतिष्ठान ‘दवे ब्रदर्स’ ने लिया था।  यह चित्र, दादा की पोती, हम सबकी रूना (रौनक बैरागी) ने उपलब्ध कराया है।

रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी रहे श्री कैलाश व्यास ने 'चटक म्‍हारा चम्‍पा' संग्रह उपलब्ध कराया है। वे मध्य प्रदेश शासन के विधि (न्याय) विभाग के, उप संचालक अभियोजन जैसे प्रतिष्ठित पद से सेवा निवृत्त हैं।
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