धार्मिक आयोजनों की अपनी-अपनी प्राप्तियाँ

इन्दौर को मध्य प्रदेश की आर्थिक और पत्रकारिता की राजधानी माननेवाले अपनी जानकारी में बढ़ोतरी कर लें। इन्दौर, दो-दो ज्योतिर्लिंगों (महाकालेश्वर और औंकारेश्वर) वाले मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी की हैसियत भी हासिल कर चुका लगता है। इसके साथ ही साथ, अपने मौलिक मालवी जायकों के लिए विश्वप्रसिद्ध इस शहर ने, धार्मिक मादकता युक्त जायकेदार मिठाई का आविष्कार भी किया है। 

कोई एक पखवाड़े से इन्दौर में हूँ तो ऐसी बातें मालूम हो पाईं। वर्ना, प्रोन्नत तकनीकी विस्फोट के कारण, तमाम ‘अखिल भारतीय’ अखबार ‘स्थानीय’ होकर रह गए हैं। इन्दौर की खबरें रतलाम के अखबारों में नहीं मिलतीं और रतलाम की खबरें इन्दौर के अखबारों में नहीं। रतलाम-इन्दौर तो बहुत दूर की बात हो गई, जिले की खबरें भी पूरे जिले में नहीं पहुँच पाती। इन्दौर में पूरी तरह से फुरसत में हूँ। ‘जो नहीं पढ़ा, वह नया’ की तर्ज पर पुराने अखबार भी नए लग रहे हैं। 

धार्मिक गतिविधियाँ यूँ तो हर कस्बे, गाँव में चलती रहती हैं। लेकिन इन्दौर में कुछ इस तरह चलती हैं मानो ‘बम्बई का बच्चा’ यह शहर इन्हीं गतिविधियों के कारण अपनी साँसें लेता है। पुराने अखबारों की ताजी खबरें यह कि अप्रेल में यहाँ तीन कथाएँ हुईं। एक कथा के निमित्त पाँच किलो मीटर लम्बी कलश यात्रा निकली जिसमें लगभग चालीस हजार महिलाओं ने भाग लिया। हमारे देश में धर्म, महिलाओं के जरिए शक्ति पाता है। इसे अनुभव कर, कथा के यजमान ने घर-घर जाकर महिलाओं को न्यौता। खाली हाथ नहीं, प्रत्येक महिला को एक साड़ी भेंट कर। यजमान को इस बात का कष्ट रहा कि लक्ष्य एक लाख साड़ियों का था लेकिन अस्सी हजार ही पहुँचा पाए।  कथा के लिए एक लाख वर्ग फुट का पाण्डाल बना। तीस हजार वर्ग फुट की भोजनशाला अलग से बनाई गई। महिलाओं को घर जाकर भोजन बनाने की चिन्ता से मुक्त रखने के लिए, कथा के बाद तमाम श्रोताओं के लिए भोजन की व्यवस्था थी। सारे व्यंजन शुद्ध देशी घी से बने जिन्हें बावन काउण्टरों के माध्यम से श्रद्धालुओं तक पहुँचाया गया। अब यह यजमान आभार प्रदर्शन करते हुए सवा लाख घरों में  प्रसाद पहुँचाने घर-घर जा रहा है।  

समाचार ने मुझे चकित किया। एक के बाद एक अखबार पलटे तो मालूम हुआ कि यह कथा का यजमान, 2019 के विधान सभा चुनावों में एक पार्टी की उम्मीदवारी का दावेदार है। यह भी मालूम हुआ कि गए चुनावों में अपनी पार्टी से टिकिट न मिलने से असन्तुष्ट हो, निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़, एक पार्टी का विद्रोही उम्मीदवार खुद हार कर और अपनी पार्टी को हराने के बाद फिर चुनाव लड़ने की मंशा से इस सबमें जुटा हुआ है। इस सूचना ने मुझे जिज्ञासु बना दिया। अनूठी जानकारियाँ मिलने लगीं। हर जानकारी एक नई जिज्ञासा जगाए। मित्रों से पूछा तो सब मेरे अज्ञान पर हँसे। मालूम हुआ कि इन्दौर की राजनीति में तो यह सब ‘बुनियादी अनिवार्यता’ है। इस ‘संस्कार’ के बिना तो कोई राजनीति में प्रवेश कर ही नहीं सकता। 

मित्रों ने बताया कि इन्दौर में पाँच विधायक हैं। इस समय, सारे के सारे भाजपा के हैं। विकास कार्यों के लिए किसकी, कितनी-कैसी पहचान है, इस पर दो राय हो सकती है किन्तु इस बात पर सब एक मत हैं कि कम से कम तीन विधायकों की पहचान, अपनी-अपनी धार्मिक गतिविधियों के कारण बनी हुई है। किसी की पहचान चुनरी यात्रा से है तो किसी की कथा-प्रवचन आयोजन से तो किसी की भोजन-भण्डारे से। एक विधायक लड़कियों के विवाह कराते हैं तो एक विधायक से ‘आप कुछ भी धार्मिक आयोजन करवा लो’ से है। जो दो विधायक धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों से दूर रहते आए हैं उनमें से एक अब मजबूर होकर धार्मिक हो चले हैं। लोगों की नजरें अब पाँचवें पर हैं - ‘देखते हैं! कब तक टिके रहते हैं।’ इन्दौर वह शहर है जहाँ किसी न किसी धार्मिक आयोजन का विशाल पाण्डाल बारहों महीने-सातों दिन-चौबीसों घण्टे तना रहता है।

कुछ पुराने पत्रकार मित्रों से बात करता हूँ तो मालूम होता है, कोई भी आयोजन करोड़ों से कम का नहीं होता। हर आयोजन भरपूर समय, भरपूर तैयारियाँ और भरपूर धन बल-जन बल माँगता है। मैं पूछता हूँ - ‘इतना खर्चा ये लोग कहाँ से लाते होंगे और इस सबसे इन्हें क्या मिल जाता है?’ मेरे कन्धे पर धौल टिकाते हुए एक मित्र ने समझाया - ‘यह खर्चा नहीं। इन्वेस्टमेण्ट है। ऐसा इन्वेस्टमेण्ट जो बीसियों गुना होकर लौटता है।’

मित्र के जवाब ने मुझे विचारक बना दिया। ऐसे धार्मिक उपक्रम पूरे देश में बारहों महीने चलते रहते हैं। गए दिनों उज्जैन में चक्रतीर्थ श्मशान घट पर ग्यारह दिवसीय, पाँचवाँ ‘सह सुधार महायज्ञ’ हुआ जिसमें इक्कीस फुट गहरे कुए में, 11 किलो चाँदी के कलश से, सूखे मेवे और  एक घण्टे में 90 किलो, एक दिन में 22 क्विंण्टल के मान से शुद्ध देशी घी की आहुतियाँ दी गईं। अभी-अभी पूरे मालवा में साँई-सप्ताह मनाया गया। सात मई को सब जगह भण्डारे हुए। मेरे कस्बे में कम से कम करोड़ रुपये तो इस पर खर्च हुए ही होंगे। देश भर में खर्च होनेवाले इन अरबों रुपयों से कितने स्कूल, कितने अस्पताल साधन-सम्पन्न बनाए जा सकते थे? कितने कुपोषित बच्चों को आहार उपलब्ध कराया जा सकता था? पाँच वर्ष की उम्र तक पहुँचने से पहले ही काल कवलित हो जानेवाले कितने शिशु बचाए जा सकते थे? प्रसव के दौरान होनेवाली कितनी मौतें रोकी जा सकती थीं? कितने बच्चों को उच्च शिक्षित किया जा सकता था? कितनी बच्चियों को उनका हक दिलाया जा सकता था? कितने लोगों को भिक्षा वृत्ति से मुक्त कराया जा सकता था? ये सब बातें सबके (खर्च करनेवालों के और श्रध्दालुओं के) मन में भी आई ही होंगी! लेकिन ऐसा क्या हुआ कि किसी ने अपने मन की नहीं सुनी? 

इन धार्मिक उपक्रमों का सामाजिक अवदान क्या है?अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे। इसके विपरीत लगता है मानो धर्मिक आयोजनों और अपराधों की गति और संख्या में प्रतियोगिता बनी हुई है। लोगों के बीच झगड़े कम नहीं हो रहे। प्रेम के बजय नफरत फैल रही है। समस्याएँ कम नहीं हो रहीं। भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा। लगता है, हमारे दैनन्दिन जीवन की इन सारी बातों से धर्म का कोई लेना-देना है ही नहीं। इन्दौर में पहली बार कथा बाँचने आई किशोरीजी ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा कि कथा सुननेवालों में से दस प्रतिशत पर ही कथा-प्रवचन का असर होता है। मुझे लगता है, ये दस प्रतिशत लोग भी वे ही होंगे जो पहले से ही धर्म को जी रहे होंगे। याने, पहले से ही धार्मिक व्यक्ति अधिक धार्मिक हो रहा है और बाकी सब वैसे के वैसे बने हुए हैं।

धर्म को मनुष्य की आत्मा की उन्नति का श्रेष्ठ माध्यम कहा गया है। ऐसा होता भी होगा। लेकिन वह व्यक्तिगत स्तर पर ही होता होगा। धर्म जब सामूहिक होता है तो वह अपना मूल स्वरूप और अर्थ खोकर केवल दिखावा बन कर रह जाता है।

आज तो नजर आ रहा है कि राजनीति और धन-बल ने धर्म को बैल की तरह जोत रखा है। श्रद्धालुओं को हलों की मूठें थमा दी है। बैल और हलवाहे अपना काम कर रहे हैं। राजनीति और धन-बली इसकी फसल से अपनी कुर्सियों के पाए मजबूत कर रहे हैं, अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं। हलवाहे और उनके परिजन, चलते बैल का गोबर एकत्र कर, उसके ऊपले थाप कर खुद को धन्य और कृतार्थ कर अनुभव कर रहे हैं।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 10 मई 2018                


3 comments:

  1. आप इस प्रसंग पर एक शानदार पुस्तक लिखेंगे तो आपकी लेखन को प्रबल बल एंव ज्ञानविदों के समक्ष उचित स्थान भी मिलेगा और धर्मांधों की आंखे भी खुलेगी ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-05-2017) को "देश निर्माण और हमारी जिम्मेदारी" (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. राजनेता वहीं पर धन का विनियोग करते है,जहां वापसी की सम्भावनाये अपार हो और धर्म के नाम पर विनियोग से 1000 गुना वापसी की संभावना रहती है । धर्म नाम की लूट है,लूट सके तो लूट ।

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