मैं उपस्थित हूँ यहाँ - शुरुआती 23 छन्द/छोटी कविताएँ




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ 

शुरुआती 23 छन्द/छोटी कविताएँ


यह कविता संग्रह
पाठकों को समर्पित किया गया है।

इस संग्रह के शुरुआती 24 पृष्ठों में एक-एक कर तेईस (23) छन्द/छोटी कविताएँ ‘दीवट’ शीर्षक अध्याय में दी गई हैं। व्यावहारिकता को अनुभव करते हुए इन्हें एक-एक छन्द/कविता प्रतिदिन देने के बजाय, एक साथ, एक ही दिन यहाँ दिया जा रहा है। 
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सूर्य उवाच 

आज मैंने सूर्य से बस ज़रा सा यूँ कहा। 
“आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा?” 
तमतमा कर वह दहाड़ा-“ मैं अकेला क्या करूँ? 
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ? 
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो। 
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लडूँ कुछ तुम लड़ो।।”
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हैं करोड़ों सूर्य 

हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के। 
जो न दें हमको उजाला वे भला किस काम के? 
जो रात भर लड़ता रहे उस दीप को दीजे दुआ। 
सूर्य से वो श्रेष्ठ है तुच्छ है तो क्या हुआ? 
वक्त आने पर मिला ले हाथ जो अँधियार से। 
सम्बन्ध उनका कुछ नहीं है सूर्य के परिवार से।।
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दीपनिष्ठा को जगाओ 

यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शान्ति और सन्तोष की। 
‘सूर्यनिष्ठा’ सम्पदा होगी गगन के कोष की।। 
यह धरा का मामला है घोर काली रात है। 
कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है।। 
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे। 
‘दीपनिष्ठा’ को जगाओ अन्यथा मर जाओगे।।
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दीप ने मुझसे कहा

मैं धरा पर धर्म हूँ
संचेतना का
हूँ मनुज का समर-साथी
शस्त्र भी हूँ-शास्त्र भी
या अलौकिक सर्जना
लौकिक जगत् की
घोर तम से युद्ध का
पैदल सिपाही
दीप स्तम्भों का
सुकोमल गीत हूँ
देहरी पर अल्पना का
भाष्य हूँ
और मैं ही हूँ
मुँडेरों का महाजन।
हूँ तमिस्रा से
समर-संयोजना का
भूमि-पूजन।
अर्घ्य हूँ अन्तर्जगत् में अहर्निश
जाग्रत क्षितिज का
ज्वलित ज्योतित-जगमगाते
पितृवत् नक्षत्रगण का
ऋण चुकाने आ गया हूँ
आपके संसार में।
हूँ समर्पित मैं
प्रबल संकल्प को
क्या हुआ जो हूँ लघुत्तम
देह के आकार में।
ज्योति-सुत हूँ ज्योति माँ का
हूँ निडर, निर्भीक हूँ
भूमिका मेरी मुझे देकर
कभी भी देख लो
मंच पर काली अमावस के
बहुत ही ठीक हूँ।
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नये सिरे से कोई 

अँधियारे को पाल रहा है, नये सिरे से कोई।
इसीलिए किरणें बैठी हैं, फिर से खोई-खोई।।
लगता है फिर कस जाएगा, अन्धकार का घेरा।
लगता है फिर छिन जाएगा, हमसे नया सवेरा।।
दीपदान क्या, प्राण दान तक, करना होगा फिर से।
सोच रहा हूँ हमको, तुमको, मरना होगा फिर से।।
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शुभ कामना

एक दीपक लड़ रहा है, अनवरत अँधियार से।
लड़ रहा है कालिमा के, क्रूरतम परिवार से।।
सूर्य की पहली किरण तक, युद्ध यह चलता रहे।
इसलिए अनिवार्य है कि, दीप यह जलता रहे।।
आपकी आशीष का, सम्बल इसे दे दीजिए।
प्रार्थना-शुभ कामना, इस दीप की ले लीजिए।
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शायद 

कुछ-कुछ घना है कोहरा, कुछ रात है अँधेरी
(क्योंकि) मौसम के घर हुई है, गम्भीर हेरा-फेरी,
दिखती नहीं दिशाएँ, सारा सफर पड़ा है
जलने की जिद में दीपक, दम साध कर खड़ा है
सूरथ के सारथी ने, रथ अपना जोता होगा
शायद सुबह से पहले, ऐसा ही होता होगा।।
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रात भर मैं ही जला

सूर्य की अनुपस्थिति में, आयु भर मैं ही जला।
टल गये दिक्पाल लेकिन, मैं नहीं व्रत से टला।।
सोचता था, तुम सवेरे, शुक्रिया मेरा करोगे।
फूल की एक-आध पँखुरी, देह पर मेरी धरोगे।।
किन्तु होते ही सवेरा, छीन ली मेरी कमाई।
इस कृपा (?) का शुक्रिया, खूब दीवाली मनाई!
लीजिये फिर भी बधाई।
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प्रार्थना-शुभ कामना

एक दीपक लड़ रहा है, अनवरत अँधियार से।
लड़ रहा है कालिमा के, क्रूरतम परिवार से।।
सूर्य की पहली किरण तक, युद्ध यह चलता रहे।
इसलिए अनिवार्य है कि, दीप यह जलता रहे।।
आपकी आशीष का, सम्बल इसे दे दीजिए।
प्रार्थना-शुभ कामना, इस दीप की ले लीजिए।
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रोम-रोम कर के हवन

रोम-रोम करके हवन, देता अमल उजास।
कुछ भी तो रखता नहीं, अपना अपने पास।।
जलते रहना उम्र भर, अरुणिम रखना गात।
सहना अपने शील पर, तम का हर उत्पात।।
सोचो तो इस बात के, होते कितने अर्थ!
बाती का बलिदान यह, चला न जाए व्यर्थ।।
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आओ! जुगनू ही बन जाएँ

सूरज से कह दो वो बेशक, अपने घर आराम करे।
चाँद-सितारे जी-भर सोयें, नहीं किसी का काम करें।।।
आँख मूँद लो दीपक! तुम भी, दियासलाई! जलो नहीं।
अपना सोना, अपनी चाँदी, गला-गला कर मलो नहीं।।
अगर अमावस से लड़ने की, जिद कोई कर लेता है।
तो, एक जरा सा जुगनू सारा, अन्धकार हर लेता है।।
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धन्यवाद

इन हवाओं की हकीकत, आप भी पहिचानते हैं
ताश महलों की फजीहत, आप ज्यादह जानते हैं
सूरमा खुद कह रहे हैं, ये किले ढह जायेंगे
वक्त के मारे भटकते, काफिले रह जायेंगे
अवसाद तिल भर भी नहीं, उल्लास ही उल्लास है
पतझर की पदचाप में, मधुमास ही मधुमास हैं।।
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पूत-सपूत

अन्धकार के घर में घुसकर, सूर्योदय तक लड़ना।
महातिमिरि के सर पर चढ़कर, माँ गायत्री पढ़ना।।
तन-मन-धन सब स्वाहा करके, दीप्त धर्म पर मरना।
धन्यवाद या यश-अपयश की, चिन्ता कभी न करना।।
सिवा दीव के ऐसा जीवन, बोलो! किसने पाया?
इसीलिये तो यह लछमी का, पूत-सपूत कहलाया।।
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1996

नये वर्ष की कुछ हुई, ऐसी बढ़िया भोर
पटना में सामान सब, उठा ले गये चोर
यह भी है प्रभु की कृपा, है यह परम प्रसाद
फिर अभाव सहचर बना, मिला अनूठा स्वाद
ऐसे में जब आपने, दिया स्नेह का दान
‘बैरागी’ फिर से हुआ, धन्य और धनवान।।
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अँधियार से भी दोस्ती

अँधियारसे भी दोस्ती, उजियार से भी दोस्ती
इस पार से भी दोस्ती, उस पार से भी दोस्ती
दीप! ऐसे ठग-लुटेरे, हैं बड़े शातिर जुआरी
दाँव पर तुमको लगाकर, जान ले लेंगे तुम्हारी
तुम धरम अपना निबाहो, और वे अपनी करें
इन लुटेरों के लिए, रोशनी क्यों-कर मरे?
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मैं उपस्थित हूँ यहाँ 

है अमावस से लड़ाई, युद्ध है अँधियार से। 
इस लड़ाई को लड़ें अब कौन से हथियार से? 
एक नन्हा दीप बोला-“ मैं उपस्थित हूँ। 
रोशनी की खोज में आप जाते हैं कहाँ? 
आपके परिवार में नाम मेरा जोड़ दें। 
(बस) आप खुद अँधियार से यारी निभाना छोड़ दें।।”
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जब गिरेंगी बिजलियाँ

जो बाँधते हैं राखियाँ, घोर काली रात को
वे बुलाते हैं स्वयम् ही, अलख उल्कापात को
जब गिरेंगी बिजलियाँ, तो नीड़ उनके ही जलेंगे
सिर पटक कर रोयेंगे, और आँखें मलेंगे
परिणाम सारे सामने हैं, कौन समझाये उन्हें
दीप के ‘बलिदान-पथ’ पर आप ही लायें उन्हें।।
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बलिदानी की यही नियति है

सूरज तक जब कतरा जाये, होकर अन्तर्ध्यान
महातिमिर को मिल जाये, जब खुला हुआ मैदान
तब जो अँधियारे से लड़कर के, देता अपनी जान
उस दीपक को बड़े सवेरे, कहाँ मिला सम्मान?
जलकर लड़ना, लड़कर मरना, पीना हर अपमान
बलिदान की यही नियति है, शायद यही विधान।।
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प्रतिबद्ध प्रदीप

आप मुझको स्नेह देकर, चैन से सो जाईये।
स्वप्न के संसार में, आराम से खो जाईये।।
आपकी खातिर लड़ूँगा, मैं घने अँधियार से।
रंच भर विचलित न हूँगा, मौसमों की मार से।।
जानता हूँ, तुम सवेरे, माँग ऊषा की भरोगे।
जान मेरी जायेगी पर, ऋण अदा उसका करोगे।
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निर्माण आखिर आपका हूँ

कर्तव्य मेरा है यही, रात भर जलता रहूँ।
कालिमा के गाल पर, लालिमा मलता रहूँ।।
दाँव पर सब कुछ लगे जब, दीप के दिव्यार्थ का।
(तब) कर्म यह छोटा नहीं, जब पर्व हो पुरुषार्थ का।।
ज्योति का जय-गीत हूँ, आरोह का आलाप हूँ।
निर्माण आखिर आपका हूँ, इसलिए चुपचाप हूँ।
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विश्व की शुभ कामना-माँ 

मैं धरा का धैर्य हूँ
ज्योति हूँ मैं ही गगन की।
अग्नि की मैं ही लपट हूँ
तीव्र गति हूँ मैं पवन की।।
नीर का गम्भीर स्वर हूँ,
वत्सला हूँ, वन्दना हूँ।
मैं जननि हूँ, जन्मदात्री
विश्व की शुभकामना हूँ।।
लोरियाँ गा कर सुलाया,
अब जगाती हूँ तुम्हें,
भैरवी गाओ-उठो!
रस्ता दिखाती हूँ तुम्हें।।
मत मुझे टालो, सम्हालो,
होश से कुछ काम लो,
जब कभी आए मुसीबत
सिर्फ माँ का नाम लो।।
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आपका आदेश

मैं तुम्हारी देहरी का, दीप हूँ, दिनमान हूँ
घोर तम से मानवी, संग्राम का प्रतिमान हूँ
उम्र भर लड़ता रहा, मुँह की कभी खाई नहीं,
आज तक तो हूँ विजेता, पीठ दिख्लाई नहीं
दीनता औ’ दम्भ से, रिश्ता कभी पाला नहीं
आपका आदेश मैंने, आज तक टाला नहीं।।
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समरांगण में शीश चढ़ाता

समरांगण में शीश चढ़ाता, देता गौरमय बलिदान
इधर पसीना बहा रहा है, भरता हीरों से खलिहान
शान्ति कपोत उड़ाता नभ में, लिये हुए दायित्व महान्
तप-मन-धन से कदम-कदम पर, जूझ रहा है हिन्दुस्तान
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जैसा कि दादा श्री बालकवि बैरागी ने ‘आत्म-कथ्य’ में कहा है, इस संग्रह ‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की कई रचनाएँ अन्य संग्रहों में पूर्व प्रकाशित हैं। इसलिए यहाँ, उन सब कविताओं को एक बार फिर से देने के बजाय उनकी लिंक यहाँ दी जा रही हैं। सम्बन्धित कविता की लिंक क्लिक करने पर कविता पढ़ी जा सकती है।

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठाईसवी कविता ‘हम हैं सिपहिया भारत के’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनतीसवी कविता ‘आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तीसवी कविता ‘दो-दो बातें’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतीसवी कविता ‘गोरा-बादल’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बत्तीसवी कविता ‘मेरे देश के लाल हठीले’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तैंतीसवी कविता ‘हम बच्चों का है कश्मीर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंतीसवी कविता ‘नई चुनौती जिन्दाबाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पैंतीसवी कविता ‘नये पसीने की नदियों को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छत्तीसवी कविता ‘अन्तर का विश्वास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतीसवी कविता ‘मधुवन के माली से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तीसवी कविता ‘देख ज़माने आँख खोल कर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनचालीसवी कविता ‘छोटी सी चिनगारी ही तो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चालीसवी कविता ‘ऐसा मेरा मन कहता है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतालीसवी कविता ‘काफिला बना रहे’ यहाँ पढ़िए

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‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियालीसवी कविता ‘एक गीत ज्वाला का’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतालीसवी कविता ‘जो ये आग पियेगा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तालीसवी कविता ‘फिर चुपचाप अँधेरा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनपचासवी कविता ‘तरुणाई के तीरथ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचासवी कविता ‘अधूरी पूजा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यावनवी कविता ‘अंगारों से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बावनवी कविता ‘एक बार फिर करो प्रतिज्ञा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तरेपनवी कविता ‘अग्नि-वंश का गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौपनवी कविता ‘चिन्तन की लाचारी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचपनवी कविता ‘कोई इन अंगारों से प्यार तो करे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छप्पनवी कविता ‘इस वक्त’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तावनवी कविता ‘उनका पोस्टर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठावनवी कविता ‘घर से बाहर आओ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसाठवी कविता ‘मरण बेला आ गई त्यौहार है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की साठवी कविता ‘चलो चलें सीमा पर मरने’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इसठवी कविता ‘आई नई हिलोर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बासठवी कविता ‘हौसला हमारा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरसठवी कविता ‘युवा गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंसठवी कविता ‘हिन्दी अपने घर की रानी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासठवी कविता ‘ज्ञापन: अतिरिक्त योद्धा को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सड़सठवी कविता ‘बन्द करो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़सठवी कविता ‘क्रान्ति का मृत्यु-गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसत्तरवी कविता ‘ठहरो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तरवी कविता ‘आस्था का आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकहत्तरवी कविता ‘समाजवाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बहत्तरवी कविता ‘रात से प्रभात तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिहत्तरवी कविता ‘सीधी सी बात’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौहत्तरवी कविता ‘आत्म-निर्धारण’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचहत्तरवी कविता ‘आलोक का अट्टहास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियोत्तरवी कविता ‘माँ ने कहा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अठहत्तरवी कविता ‘महाभोज की भूमिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्यासीवी कविता ‘चिन्तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अस्सीवी कविता ‘गन्ने! मेरे भाई!’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यासीवी कविता ‘जीवन की उत्तर-पुस्तिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बयासीवी कविता ‘पर्यावरण प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरयासीवी कविता ‘एक दिन’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौरियासीवी कविता ‘एक और जन्मगाँठ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पिच्यासीवी कविता ‘जन्मदिन पर-माँ की याद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासीवी कविता ‘पेड़ की प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सित्यासीवी कविता ‘रामबाण की पीड़ा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इट्ठ्यासीवी कविता ‘पर जो होता है सिद्ध-संकल्प’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्नब्बेवी कविता ‘उठो मेरे चैतन्य’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इठ्यानबेवी कविता ‘वंशज का वक्तव्य: दिनकर के प्रति’ यहाँ पढ़िए






संग्रह के ब्यौरे -
मैं उपस्थित हूँ यहाँ: छन्द-स्वच्छन्द-मुक्तछन्द-लय-अलय-गीत-अगीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - डायमण्ड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि.
एक्स-30, ओखला इण्डस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110020
वर्ष - 2005
मूल्य - रुपये 95/-
सर्वाधिकार - लेखकाधीन
टाइप सेटिंग - आर. एस. प्रिण्ट्स, नई दिल्ली
मुद्रक - आदर्श प्रिण्टर्स, शाहदरा

 


रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
 

 























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