सनातन कर्म



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की पाँचवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


सनातन कर्म

कितना बदगुमान है अँधेरा
कि
रोज बढ़ा कर अपना घेरा
धौंस देता है मुझे
और डाँट कर पूछता है
‘कहाँ है तेरा सवेरा?’
और मैं कहता हूँ
‘बुलाऊँ सवेरे को?’
तो फिर ये छोटा करके उस घने घेरे को
अपने पिता पश्चिम को पुकारता है
चीखता है सहायता के लिये
मैं पूरब की ओर मुँह भर करता हूँ
कि ये भाग चलता है
और इसकी कायरता पर
सूरज मेरा भाई
दिन भर जलता है
सनातन है अँधेरे से मेरी लड़ाई।
इसमें जो मेरा साथ दे
उसे हार्दिक बधाई ।
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संग्रह के ब्यौरे

रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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8 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२०-०९-२०२१) को
    'हिन्दी पखवाड़ा'(चर्चा अंक-४१९३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. बहुत-बहुत धन्‍यवाद। कल का अंक अवश्‍य देखूँगा। 'चर्चा अंक' में एक साथ कई ब्‍लॉग देखने को मिल जाते हैं।

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  2. बहुत ही बेहतरीन सृजन!

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    1. टिप्‍पणी के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  3. अच्छी प्रस्तुति

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    1. टिप्‍पणी के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  4. बैरागी जी की अनुपम कृति को पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार ।

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    1. टिप्‍पणी के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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