आँसुओं में डूब मरो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की चौथी कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


आँसुओं में डूब मरो

मैं ऐसा कर दूँगा
मैं वैसा कर दूँगा
और इस देश को
क्या कहते हैं वो
स्वर्ग-जैसा कर दूँगा
ये लफ्फाजियाँ अब छोड़ो
और कुछ हकीकत से रिश्ता जोड़ो ।

गाल बजा-बजा कर तुमने
करोड़ों गालों की ललाई छीन ली
हर पेट पतला और
हर पीठ पगडण्डी रह गई है
चेहरे का नमक
आँखों की चमक
और पसीने की गमक
सब कुछ गायब है।

क्ये, कतारें और लाइनें
वे भी अन्तहीन
क्षितिज तक पहुँच गई हैं
अब और क्या मर्जी है आपकी
यार सीमा होती है
हर अभिशाप की।

वरदान की तरह आश्वस्त होकर
नोचे जा रहे हो शिरा-शिरा
हाँ, सच तो है
देश तुम्हारे लिये अभी कहाँ गिरा।

तुम अभी भी
तरक्की, प्रगति और प्राणवत्ता की प्रशंसा में
दे सकते हो लच्छेदार भाषण,
पर सब जानते हैं कि तुममें
और टेप-रेकार्डर में कितना अन्तर है।
मजाक नहीं, सच बोलो यार
क्या कभी तुमने किसी
हलवाले, फलवाले या अकलवाले से
इन दिनों बात की है?
नहीं की हो, तो अब करके देखो
अपनी गैरत में उतर के देखो
तुम्हारे पुरखों का किया-कराया
सब चौपट हो गया है
इस सत्यानाश में सौ-दो सौ साल भी नहीं लगे
देखते-देखते आनन-फानन
सब चट-पट हो गया है।
अभी भी कुछ करना चाहते हो तो
इतना-सा अहसान करो
कि उल्लू-शुल्लू या चुल्लू-वुल्लू की कहावत से बचो
और अपनी ही पीढ़ियों के
आँसुओं में डूब मरो।
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संग्रह के ब्यौरे

रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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