हाथी



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की ग्यारहवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।



हाथी

गाँव में आया है हाथी।
उठा-उठा कर सूँड
सलाम कर रहा है तमाशबीनों को
हर उम्र के लोग ले रहे हैं यह सलामी -
खश हैं उसे पालनेवाले
महावत, महन्त और पण्डे।

नीलाम हो रही है हाथी की पीठ
पाँच-पाँच मिनिट के लिये।
बच्चों की नजर है हौदे पर
मैं मुग्ध हूँ इस सौदे पर ।
जो बढ़ेगा सो पायेगा
वरना वहीं खड़ा रह जायेगा ।

माँएंँ उतार रहीं हैं आरती
बहिनें चढ़ा रहीं हैं फूल
और हाथी?
बराबर उड़ा रहा है धूल।

धूल उड़ाना उसका चरित्र है
वैसे हाथी सभी का मित्र है।
झूमता हुआ आया है
झूमता हुआ चला जायेगा
जो बढ़ेगा सो पायेगा।

सिवाय महावत या महन्त के
कोई नहीं टिक पाता इसके हौदे में
फिर भी बड़ा प्रलोभन है इस पाँच मिनिट के
सौदे में।

हाथी आखिर हाथी है
और इसकी ऊँचाई पर
नीचाई ललक ही जाती है।
ये पण्डे, ये महन्त अब इसे
गाँव-गाँव ले जायेंगे
इसका खाली हौदा गली-गली दिखायेंगे
जो ऊँची बोली लगायेगा
उसे इसमें बिठायेंगे। 

आपके हमारे लिये हाथी पालना
एक बला है
पर कुछ लोगों के लिए यह एक कमाऊ
कला है।
हाथी और पण्डे एक दूसरे को
पाल रहे हैं
दोनों का वजन कलात्मक तरीके से
तमाशबीनों पर डाल रहे हैं।

हाथी सलाम करे
यह भी तुष्टि है अधकचरे अहम् की
खुद को तुष्ट करने में
क्या जरूरत है शरम की?
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















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