अपनी ब्याणजी (समधनजी) को दी गई अनूठी शब्‍द-चित्र-श्रद्धांजलि

दादा के कागज-पत्तर उलटते-पुलटते यह एक पत्र ऐसा हाथ में आ गया जिसे एक ही साँस में पढ़ गया। एक बार पढ़कर जी नहीं भरा तो दूसरी बार, फिर तीसरी बार पढ़ा। पहली बार पढ़ते हुए ही मन में पहला विचार आया कि यह पत्र सार्वजनिक किया जाना चाहिए। फिर, हर बार पढ़ते हुए यह विचार दृढ़ से दृढ़तर होता गया और अन्ततः यह पत्र यहाँ दे रहा हूँ।

यह एक नितान्त निजी और पारिवारिक पत्र है। किन्तु इसमें हमारी ब्याणजी (समधनजी) सुन्दरबाई का जो स्वरूप दादा ने सहजता से (लेखकीय चमत्कार जताने के लिए तो दादा ने यह सब नहीं ही लिखा होगा) उकेरा है, वह लेखकीय दृष्टि से तो अद्भुत है ही किन्तु गिनती के घरों/परिवारों वाले एक छोटे से गाँव की, वैधव्य भोग रही, एक  अशिक्षित, युवा, औसत स्त्री के संघर्ष, जीवट और जीजिविषा का ब्यौरा दादा ने जिस तरह से दिया है, उससे, यह पत्र पढ़ते-पढ़ते, हमारी ब्याणजी सुन्दरबाई के प्रति मैं नतमस्तक होता चला गया। मुझे ताज्जुब बिलकुल ही नहीं होगा, यदि मुझ जैसी ही दशा कुछ और पाठकों की भी हो जाए।

इस पत्र में कुछ पारिवारिक उल्लेख ऐसे हैं जिन्हें पढ़ते ही, ‘बुद्धि’ ने सम्पादित करने को कहा। लेकिन अगले ही क्षण ‘विवेक’ ने इस विचार को निरस्त कर दिया। लोकप्रियता और लोकप्रतिष्ठा में ‘ईर्ष्यास्पद’ स्थिति जी रहे लोग भी पारिवारिक और व्यक्तिगत स्थितियों में कितने विवश, कितने लाचार हो जाने को अभिशप्त रहते हैं! ऐसे लोगों के ‘अन्दर और बाहर’ के संघर्षों का अनुमान, ये पारिवारिक उल्लेख आसानी से उजागर कर देते हैं। अपनी एक मुक्त कविता-पंक्ति में दादा ने खुद के लिए ‘मैं असाधरण रूप से साधारण हूँ’ कहा है। ये पारिवारिक उल्लेख मुझे इस पंक्ति के भाष्य अनुभव हुए।

‘पीपल्या रावजी’ गाँव का नाम है। मेरी गीता जीजी की ससुराल। यह चन्द्रावतवंशी घराने का ठिकाना (रावला) है। हमारे समधीजी इस रावले में ‘कामदार’ के पद पर थे। 

इस पत्र में आए नामों/व्यक्तियों का परिचय क्रमानुसार इस तरह है -

बब्बू - मैं, विष्णु बैरागी। बब्बू मेरा, घर का नाम है।
गीता - दादा से छोटी और मुझसे बड़ी बहन। मेरी गीता जीजी। अब स्वर्गवासी।
चतुर्भुजजी - हमारी ब्याणजी के बडे़ बेटे। गीता जीजी के पति। मेरे जीजाजी।
गोवर्द्धनजी - हमारी ब्याणजी के छोटे बेटे। गीता जीजी के देवर।
निर्मल - हमारा छोटा भानेज। गीता जीजी का सबसे छोटा बेटा।
श्याम - हमारा बड़ा भानजा। गीता जीजी का बड़ा बेटा।
कोमल - हमारा मझला भानजा। गीता जीजी का दूसरा बेटा।
गोर्की- दादा का छोटा बेटा। मेरा छोटा भतीजा।
कला - गोवर्द्धनजी की अर्द्धांगिनी। गीता जीजी की देवरानी। अब स्वर्गवासी।
रूपा - दादा की छोटी बहू। नीरजा बैरागी। गोर्की की पत्नी।
हीरा - दादा की पोती। गोर्की-नीरजा की बडी बेटी। यह उसका घर का नाम है। वास्तविक नाम अभिसार।
सुशील - दादा की अर्द्धांगिनी। मेरी भाभीजी - श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी। अब स्वर्गवासी।
सोना - दादा की बड़ी बहू। बड़े बेटे मुन्ना की अर्द्धांगिनी।
वीणा - मेरी अर्द्धांगिनी।
वल्कल - मेरा बड़ा बेटा।
तथागत - मेरा छोटा बेटा। 
‘पीपल्या रावजी’ गाँव का नाम है। 

हमारी ब्याणजी का चित्र उपलब्ध कराने में मेरे कक्षापाठी प्रिय रमेश सोनी (मनासा) ने अत्यधिक परिश्रम किया। मैं रमेश का आभारी हूँ। 

मेरे इस अनावश्यक ‘बौद्धिक’ के बाद अब पत्र पढ़िए।
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मनासा

15 अगस्त 1991

प्रिय बब्बू

प्रसन्न रहो

यह पत्र मैं नीमच से लिख रहा हूँ। सुशील और मैं कल शाम को यहाँ पहुँचे हैं। एक-दो दिन यहाँ ठहर कर वापस मनासा निकल जाएँगे।

मनासा में सब ठीक ही है। पिताजी स्वस्थ हैं। घर में सब कृपा है भगवान की।

समाचार मिला ही होगा कि 10/8/91 (हरियाली अमावस्या) को पीपल्या रावजी में गीता की सास का अचानक देहान्त हो गया। वे दो ही मिनिट में चल बसीं। प्रातः दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर चाय पी। फिर स्नान किया। बाल सँवारे। कपड़े बदले। ओढ़ना सूखने को फैलाया। गीला लँहगा निचोड़ ही रही थीं कि गिर पड़ीं और चल बसीं। गनीमत है कि दरवाजा खुला था सो सामनेवाले पड़ौसियों ने देख लिया। यदि बन्द रहा होता तो पता नहीं, कब तक, क्या होता रहता? नितान्त अकेली थीं। हम लोग उसी शाम तक उनका दाह संस्कार करके घर लौट आये थे। 12/8 को उठावना हुआ। चतुर्भुजजी 13/8 को पहुँचे। जैसी कि सम्भावना थी, कई सारे विवाद उनके आते ही हो गये हैं।

अब 20/8 को घाटा और 21/8 को पगड़ी है। गोवर्द्धनजी सारा काम मनासा चाहते हैं। परिवार उनके साथ है। चतुर्भुजजी सब कुछ पीपल्या में ही करने बैठे हुए हैं। अन्ततः आवास और खेती-बाड़ी को पराया होना है। इस पारिवारिक विवाद में हम लोग कहीं नहीं हैं। निर्मल की मृत्यु के समय इन लोगों ने जो कुछ व्यवहार किया था, मैं तभी से इन लोगों से स्वयं को परे रखता चला आ रहा हूँ। श्याम समझदार है और जिम्मेदार भी। कोमल मेहनती और अन्ततः समझाया जा सकता है। इन बच्चों से मेरा मानसिक जुड़ाव है और ये ही बच्चे मुझे जरा समझते भी हैं। शायद ‘प्रतिष्ठा’ का मतलब भी इन्होंने समझ लिया है।

चूँकि सारे काम 20 और 21 को हैं, सो मेरे सभी कार्यक्रम ध्वस्त हो गये हैं। 20/8 राजीवजी का जन्म दिन है। भाई श्री गुलामनबी ‘आजाद’ मुझे दिल्ली में ढूँढ रहे हैं और मैं इस पारिवारिक गाँठ में बँधा बैठा हूँ। शिकायत मुझे किसी से नहीं है। कल गोर्की को लिखा है। आज तुझे लिख रहा हूँ। तुम लोग इस अवसर पर अपनी दिनचर्या को असहज मत करना। जो भी नेग-दस्तूर होगा, वह यहाँ हो जायेगा। हाँ, इतना सब होने पर भी पिताजी की अप्रसन्नता मुझे सहनी ही है। मैं बिना किसी तनाव के इस सारे आल-जाल में बराबर सहज और अपनी कलम को लेकर सक्रिय भी हूँ। ईश्वर का सहारा और प्रसाद ही है सब।

यह जानना बहुत जरूरी है कि गीता की सास को एक शानदार और शान्त मृत्यु मिली है। जिसकी मृत्यु सुधर जाती है, उसका जीवन सुधर गया माना जाता है। उनका नाम सुन्दरबाई था और थीं भी वे अपने समय की एक सुन्दर महिला। मृत्यु के समय वे करीब 70 वर्ष की थीं। सम्वत् 2002 में प्रभु ने उहें वैधव्य दे दिया। पूर 46 वर्षों तक वे विधवा रहीं। जब उनकी माँग पुँछी, वे 34 वर्ष की युवा महिला थीं किन्तु उनके बारे में एक शब्द भी गरिमा से नीचे का नहीं सुना गया। वे चर्चित ही इसलिए रहीं कि वे सर्वथा अचर्चित थीं। एक ‘वनफूल’ जैसा उनका समूचा जीवन रहा। एक-एक करके लड़के उनसे अलग होते चले गये। तीनों बेटियाँ ससुराल चली गईं। बीचवाला बेटा किशोर वय में चल बसा। ‘कामदार’ कहा जानेवाला रुतबेदार पति स्वर्गवासी हो गया। गीता मेरे पास है और कला मनासा में अपनी गृहस्थी देख रही है। न वे किसी के पास रह सकती थीं, न कोई उनके पास रह सकता था। आज से 50 साल पहले उस मकान को जैसा मैंने देखा था, वैसा का वैसा आज है। ठीक सामनेवाले खड्डे में जो रोड़ियाँ आधी शताब्दी पूर्व थीं, वे यथावत् हैं। बस, भीतरवाले आँगन में एक नीम का पेड़ जरूर नया पनपा है जो गीता ने लगाया था। बड़ा और भरपूर वृक्ष हो गया है। पर मकान में आज भी बिजली तक नहीं ले सके ये लोग। वे ही बाँस-बल्ली और वे ही खपरैल। कोई बदलाव नहीं। यह जड़ता है, ठिठकाव है, उदासीनता है, अकर्मण्यता है या कि विपन्नता? समझ नहीं पड़ता। एक अस्तव्यस्त, अवज्ञाकारी और उद्दण्ड सदस्यों का छोटा-बड़ा समूह यदा-कदा वहाँ जुटता रहा होगा और सभी एक-दूसरे पर खीजकर अपने-अपने घरों की ओर चल पड़ते होंगे। न कुछ सहनीय, न कुछ उल्लेखनीय। महत्वाकांक्षी कोई नहीं और स्वयं को सर्वोपरि मानने की पालित कुण्ठा का शिकार एक परिवार। अपने आप को छोड़कर बाकी सबकी नजरों में सब दोषी। सभी असन्तुष्ट। सभी आक्रोशयुक्त। जिससे बात करो, वही उल्का-पिण्ड की तरह जलता-भुनता। भभूका। ईश्वर के क्या-क्या खेल और कैसे-कैसे निर्णय?

तब भी बब्बू! इस महिला की मृत्यु के बाद देखा  कि उसका रसोई घर भरा-पुरा था। दोपहर की चाय तक का दूध सुरक्षित था। अन्न का एक दाना भी नहीं खरीदना पड़ा। सब कुछ सुरक्षित। सब कुछ व्यवस्थित। अपने-आप में मग्न और आत्म-मुग्ध जीवन का अद्भुत समायोजन और समापन था यह। बेशक, बर्तन आदि एकाकी सदस्य पुर्ते ही थे। तब भी स्नान-ध्यान के तत्काल बाद तुलसी पूजन करके, सम्पन्न अन्नपूर्णा की गोद में इस तरह चिर विश्राम करने का क्षण किसे मिलता है? यदि चाहते तो मृत्यु-स्नान भी अनावश्यक जैसा ही था। स्नान करके तो उन्होंने शरीर छोड़ा ही। इतनी शान्त, सुन्दर और ईर्ष्यास्पद मृत्यु का ‘उत्सव’ भी परिजन नहीं मना पा रहे हैं। कब, किस सीमा तक, कौन बढ़ जायेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है। ईश्वर सभी को सद्बुद्धि दे। सहारा दे। सम्हाले। मैं प्रभु से अपनी प्रतिष्ठा का नैवेद्य हाथ में लेकर प्रार्थना कर रहा हूँ। तुझे यह सब इसलिए लिख दिया कि शायद तू मेरी मनःस्थिति को समझ सके।  मृत्यु शाश्वत है। जीवन सनातन। मृत्यु निश्चित है। जीवन अनिश्चित। निश्चित की प्रयोगशाला हमें, अनिश्चित को सुन्दर बनाने के हल सुझाती है। आखिर मनुष्य सीखता किससे है? भगवान अपनी कक्षाएँ और किस तरह लेता है? अस्तु,

20 अगस्त से सम्बद्ध 4/5 आलेख मैंने देश के करीब 30-32 अखबारों को भेजे हें। एक आलेख तो मैंने 28 अखबारों को दिया है।

तुझे पता होगा कि 4 अगस्त को मैं श्रीपेराम्बुदूर भी हो आया हूँ। यदि अखबारों में कुछ छपे तो तू देख ही लेगा।

तूने उस दिन शिकायत की थी कि लम्बे समय से मैं इन्दौर के किसी पत्र में नहीं छपा। शायद ‘ऋतुपर्व चौमासा’ (नईदुनिया-इन्दौर-4/8/91) तूने देख लिया होगा। पूरा पृष्ठ घेरा है इस सांस्कृतिक आलेख ने। लोग अच्छे पत्र लिख रहे हैं। वैसे 4/8/91 को मैं ‘सण्डे मेल’ में भी हूँ। 3/8 को भोपाल के ‘नव भारत’ में हूँ। 5/8 को इन्दौर के ‘नव भारत’ में हूँ। 3 या 4 अगस्त को भोपाल की ‘दैनिक नईदुनिया’ में भी था।

पहिली अगस्त’91 को भोपाल के राजभवन मेें महामहिम राज्यपालजी ने अन्ततः मेरे कन्धों पर शाल डाल कर श्रीफल दे ही दिया। मुझे इतनी जानकारी नहीं थी। उस क्षण मुझे माँ बहुत याद आई। गोर्की, रुपा, हीरा थे मेरे साथ। कोई भी तो तुम में से नहीं था वहाँ। सुशील भी नहीं थी। जानकारी ही नहीं थी कि ऐसा भी हो जायेगा।

पिताजी दिनानुदिन कमजोर होते चले जा रहे हैं। बिना बात के भी झल्ला पड़ते हैं। परिवार उनको अत्यन्त पूज्य-भाव से देख रहा है। सोना बहू की सेवाएँ हमारा ऋण चुका रही हैं।

वीणा और वल्कल को हमारा स्नेह, सम्मान और आशीष देना। तथागत को प्यार। मित्रों को स्मरण।

भाई

बालकवि बैरागी


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