धन्यवाद
ताश महलों की फजीहत आप ज्यादह जानते हैं
सूरमा खुद कह रहे हैं ये किले ढह जाएँगे
वक्त के मारे भटकते काफिले रह जायेंगे
अवसाद तिल भर भी नहीं उल्लास ही उल्लास है
पतझार की पदचाप में मधुमास ही मधुमास है।।
हम सबके प्रिय-आत्मन् रज्जू (और दुनिया के लिए डॉक्टर राजीव सिंह) ने दादा का यह धन्यवाद पत्र आज ही मुझे भोपाल से भेजा है। मुझे इसका सन्दर्भ-प्रसंग कुछ समझ नहीं आया। रज्जू से पूछा तो जवाब मिला - ‘मुझे तो मालूम नहीं। कागजों में मिला तो आपको भेज दिया।’
मैं उलझन में पड़ गया। बढ़ती उमर और साथ छोड़ती याददाश्त। देर तक घुटनों पर मालिश की तो बात पल्ले पड़नी शुरू हुई।
प्रधान मन्त्री राजीव गाँधी और उनके मन्त्री विश्वनाथ प्रतापसिंह आमने-सामने आ चुके थे। काँग्रेस छोड़ने से पहले, काँग्रेस में रहते हुए ही वी. पी. सिंह ने ‘जन मोर्चा’ बना लिया था। अन्ततः उन्होंने काँग्रेस छोड़ दी।
यह 1989 का साल था। लोक सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी थी। राजीव गाँधी की ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि ध्वस्त हो चुकी थी। चुनावी आम सभाओं में वी पी सिंह अपने कुर्ते की जेब थपथपा कर लोगों से कहते थे कि स्विस बैंक में जमा, बोफोर्स कमीशन की रकम के बैंक खाते का नम्बर उनकी जेब में रखा है। 22 और 26 नवम्बर को मतदान हुआ था। मतगणना के बाद 27 नवम्बर तक अधिकांश सीटों के नतीजे आ चुके थे। ‘बोफोर्स’ की आँधी में राजीव गाँधी सरकार का तम्बू उखड़ चुका था। ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ के तुमुल लोक-नाद के बीच उत्तर प्रदेश की माँडा रियासत के राजा बहादुर विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधान मन्त्री बनना तय था ही। 01 दिसम्बर 1989 को उन्हें प्रधान मन्त्री बनने का न्यौता मिला। उन्होंने 02 दिसम्बर 1989 को प्रधान मन्त्री पद की शपथ ली।
लेकिन सरकार बनने से पहले ही उसके समापन की भविष्यवाणियाँ होने लगी थीं। अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। 10 नवम्बर 1990 वी पी सिंह के कार्यकाल का अन्तिम दिन था। याने, ‘देश की तकदीर बना फकीर’ सरकार साल भर भी प्रधान मन्त्री नहीं रह पाया।
मुझे पक्का पता तो कुछ भी नहीं लेकिन दादा के इस छन्द से अब अनुमान कर रहा हूँ कि सरकार बनने से पहले ही कुर्सी की खींचतान जमकर शुरू हो गई थी। अस्थिर सरकार की सुनिश्चितता सतह पर आ चुकी होगी।
दादा, राजीव गाँधी के प्रधान मन्त्रित्व काल में लोक सभा के सदस्य थे। राजीव गाँधी की सरकार का जाना और नई सरकार का आना। ऐसे माहौल में दादा के प्रशंसकों ने निश्चय ही या तो सहानुभूति जताई होगी या हास-परिहास करते हुए चिकोटियाँ काटी होंगी। उनका मन्तव्य जानना चाहा होगा। अपने स्वभाव के मुताबिक दादा ने अपने चाहनेवालों का निराश नहीं किया और इस छन्द के जरिए जवाब दिया।
अब, इस जवाब की तारीख पर ध्यान दीजिए। चुनाव परिणाम आए 27 नवम्बर को। वी पी सिंह ने शपथ ली 02 दिसम्बर को। इस जवाब की तारीख है 28 नवम्बर। याने, चुनाव परिणाम आने के अगले ही दिन और वी पी सिंह के प्रधान मन्त्री बनने से चार दिन पहले।
छन्द तो आपने यह ब्यौरा पढ़ने से पहले ही पढ़ लिया। लेकिन यह सब जानने के बाद अब एक बार फिर इस छन्द को पढ़िए और ‘पतझार की पदचाप में मधुमास’ की व्यंजना का आनन्द लीजिए। एक प्रसंग में दिनकरजी ने जवाहरलालजी को कहा था - ‘राजनीति जब भी लड़खड़ाती है तब साहित्य ही उसे सहारा देता है।’
इस छन्द में वही बात सामने आती है - ‘कवि’ ने ही ‘राजनेता’ को और उसके आशावादी आकलन को मुखर किया।
-----


No comments:
Post a Comment
आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.