ताकि तोड़ी जा सके

इन दिनों मेरे कस्बे में शपथ ग्रहण समारोहों की बहार आई हुई है। प्रतिदिन एक के औसत से, समारोह हो रहे हैं। कभी किसी सेवा संगठन का तो कभी सामाजिक संगठन का। लगता है, सावन में केवल ‘जल वर्षा’ नहीं, ‘शपथ ग्रहण समारोह वर्षा’ भी होती है। ऐसे आयोजनों के बुलावे कभी-कभी मुझे भी आते हैं। कुछ में जा पाता हूँ। कुछ में नहीं। एक-दो संगठनों के सदस्य के रूप में शामिल हुआ हूँ तो एक-दो समारोहों में अतिथि या अध्यक्ष बन कर भी गया हूँ किन्तु भरपूर समय पहले। अब भी कभी-कभार (मुख्य अतिथि/अध्यक्ष बनने के) ऐसे बुलावे आते हैं किन्तु सविनय अस्वीकार कर देता हूँ।

ऐसे समारोहों का औचित्य और आवश्यकता मुझे अब तक समझ नहीं पड़ी है। जब-जब भी विचार किया तब-तब, हर बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि ऐसे समारोह न हों तो भी संगठन की सेहत और उसके कामकाज पर कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा कि शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करने को लेकर जितनी चिन्ता, गम्भीरता, सतर्कता बरती जाती है उस सबका सहस्त्रांश भी यदि शपथ निभाने में लग जाए तो देश की काया पलट जाए।

बानगी के लिए, शपथ ग्रहण समारोह के ठीक बाद, शपथ ग्रहण करनेवाले कुछ ‘शपथ गृहिताओं’ से शपथ के बारे में पूछा तो सबके सब बगलें झाँकते मिले। एक भी नहीं बता पाया कि उसने क्या शपथ ली है। मेरी बात पर भरोसा बिलकुल मत कीजिए किन्तु अपने स्तर पर इसे आजमाइए अवश्य। मुझे आकण्ठ विश्वास है कि आपका अनुभव भी मेरे अनुभव से मेल खाएगा।

ऐसा सम्भवतः केवल इसलिए हो रहा है कि हम समारोहीकरण और खानापूर्ति में ही विश्वास करने लगे हैं। यह स्थिति शिखर से लेकर धरातल तक समान है। हमारे विधायी पदों के लिए शपथ लेना अनिवार्यता है। कोई सम्विधान के नाम पर तो कोई ईश्वर के नाम पर शपथ लेता है। सेवा/सामाजिक संगठनों में किसी का नाम लेना आवश्यक नहीं होता। सम्भवतः इसलिए कि वहाँ शपथ ग्रहण करने का प्रावधान ही नहीं होता। कुछ संगठनों में यह स्वतः मान लिया जाता है कि निर्धारित दिनांक से नए पदारूढ़ व्यक्ति ने अपना काम शुरु कर दिया है।

‘शपथ’ के प्रति हम लेशमात्र भी शायद ही ईमानदार हों। सम्विधान या ईश्वर के नाम पर शपथ लेनेवाले किस निर्लज्जता से सम्विधान की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं और ईश्वर की शपथ लेनेवाले किस सीनाजोरी से ईश्वर को झक्कू टिका रहे हैं - यह हम प्रतिदिन देख ही रहे हैं। हम अपने आसपास ही नजर डालें तो पाएँगे कि चारों ओर लगभग यही दशा है। बैंक मे कार्यरत मेरे एक मित्र, वादा करके उसे न निभाने में विशेषज्ञ हैं। उनसे मित्रता के शुरुआती दिनों में, उन पर विश्वास कर मेरे कई काम अत्यधिक विलम्ब से पूरे हो पाए। वे वादा करते। मैं विश्वास कर उनकी प्रतीक्षा करता। थोड़े अन्तराल के बाद उन्हें याद दिलाता। वे खेद प्रकट कर, वादा दुहराते। मैं फिर प्रतीक्षा करता। लेकिन उन्होंने एक बार भी मेरी प्रतीक्षा को मंगल सूत्र नहीं पहनाया। अनेक अनुभवों के बाद मुझे समझ आया कि वे हमारे नेताओं के ‘मित्र संस्करण’ हैं - वादा करो, भूल जाओ, निभाओ कभी मत। अकल आने पर मैं उन्हें ‘यूबीएम साहब’ कह कर पुकारने लगा। मैंने उनसे कहा - ‘अब मैं आपको वही काम बताऊँगा जो मुझे किसी से नहीं करवाना होगा।’ ताकि तोड़ी जा सके ‘यूबीएम’ का मतलब आप भी जान लें - उल्लू बनाने की मशीन।

मेरे एक और मित्र हैं। मुख्य बाजार के मुख्य चौराहे पर उनकी अच्छी-भली दुकान है। सन्त स्वभाव के हैं। लालची और स्वार्थी बिलकुल नहीं। निजी आचरण में शत प्रतिशत सात्विक। किन्तु वादा करने और उसे न निभाने में वे भी ‘जूनीयर यूबीएम साहब’ हैं। इनको समझने में भी मुझे अपने अनेक काम विलम्बित करने पड़े। मुझे कहीं से एक शे’र मिला जो मैंने ताबड़तोड़ इन्हें लिख भेजा -


ये तेरी फितरत है कि वादा कर ले
मेरी हिम्मत है कि भरोसा करता हूँ

हमारे यहाँ तीन ‘भय’ बताए गए हैं - देव-भय, राज-भय और लोक-भय। ‘देव-भय’ अर्थात् ईश्वर का भय। जिससे सबसे पहले डरना चाहिए, उसे तो हम घोल कर पी गए। कल ही एक अभिकर्ता मित्र ने एक कथन (सम्भवतः विवेकानन्द का) सुनाया - ‘मैं केवल ईश्वर से डरता हूँ और ईश्वर के बाद उस आदमी से डरता हूँ जो ईश्वर से नहीं डरता।’ मुझे लगता है, हमारे चारों ओर अब (मुझ सहित )ऐसे ही लोग हैं जिनसे विवेकानन्द को डरना पड़ेगा। ‘राज-भय’ की क्या बात की जाए? जिस देश का प्रधानमन्त्री ‘गठबन्धन की मजबूरी’ की दुहाई देकर भ्रष्टाचार होते रहने का औचित्य सिद्ध करे, वहाँ कौन सा राज-भय? रही बात ‘लोक-भय’ की, अर्थात् ‘लोग क्या कहेंगे’ की तो, यह तो प्राथमिक शालाओं के बच्चों के चुटकुले से भी कमतर लगता है। ऐसे में, ‘शपथ ग्रहण’ को इतनी गम्भीरता से लेना अपनी मूर्खता का सहज प्रमाण देने से अधिक और है ही क्या?

वादा करने और उसे न निभाने की आदत को लेकर मेरे गुरु स्वर्गीय हेमेन्द्र कुमारजी त्यागी ये पंक्तियाँ सुनाया करते थे -

तौबा मेरी जाम-ए-शिकन
जाम-ए-मेरी तौबा शिकन
सामने है ढेर
टूटे हुए पैमानों का।

जब आदमी खुद से किए गए वादे, अकेले में ली गई शपथ ही नहीं निभाए तो उसे सार्वजनिक स्तर पर शपथ-भंग अथवा वादा खिलाफी करने में न तो पल भर की देर लगेगी और न ही रंच मात्र असुविधा होगी।

सोच रहा हूँ - कितना अच्छा हुआ कि सूरज, चाँद, धरती, प्रकृति ने अपना-अपना काम करते रहने के लिए कोई शपथ ग्रहण नहीं की और न ही, ऐसा करने के लिए कोई समारोह आयोजित किया। यदि ये सब भी वैसा ही करते जैसा हम कर रहे हैं तो?

6 comments:

  1. जिनको किसी भी प्रकार की लाज नहीं, उनके लिये शपथ का कोई मूल्य नहीं।

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  2. भुलक्कडी का ज़माना है। मुझे तो आप ही ऐसा कोई वादा याद नहीं रहता जिसे मैं डायरी में लिखता नहीं। और डायरी साथ रखने का वादा कम्बख्त कभी याद ही नहीं रहता।
    बहुत प्रभावी लेखनी है आपकी!

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  3. मेरे जिये शहरों में चर्चा सुनता था, अध्‍यक्ष/मुख्‍य अतिथि बनने के लिए लोग चंदा दिया करते हैं, सो आयोजन होता है. सब नहीं लेकिन संभव है कुछ ऐसे ही स्‍पांसर्ड किस्‍म के होते हों, लेकिन जाना-आना बनाए रखें, जमाने के चाल-चलन पर नजर बनी रहनी चाहिए.

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  4. काश सभी लोग रिटायर होने तक अपनी शपथ याद रखें और शपथ को केवल एक बार ही नहीं दिलाया जाना चाहिये, यह हर वर्ष के कार्य का अनिवार्य अंग होना चाहिये जिससे वे अपनी शपथ को याद रख सकें और उस पर अमल करने की हिम्मत जुटा सकें।

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  5. आप का ये अनुभव हमारे भी हैं। इस से पता लगता है कि ईश्वरवादी ईश्वर की कितनी परवाह करते हैं। मैं मुतमइन हूँ कि अधिकांश ईश्वरवादी ईश्वर का इस्तेमाल एक तमगे के रूप में करते हैं। उन सब से तो मेरे जैसा अनीश्वरवादी अधिक दुरुस्त है। जो खुद भी मानता है और जो उस की मानते हैं उन्हें मानने को भी कहता है कि वादा पत्थर (बुत) से भी करो तो जरूर निभाओ, ऐसा वादा कभी न करो जिसे निभाने में जरा भी संदेह हो।

    हम तो रोज लोगों को अदालत में शपथ ले कर झूठ बोलते देखते हैं। हमारा पेशा ही यह है कि झूठ बोलने वाले से सच उगलवाया जाए। ये झूठ बोलने वाले इतने कच्चे होते हैं कि तीन-चार सवालों के बाद ही उन की कलई खुलने लगती है। हमारा अपना गवाह हम से पूछता है कि मुझे अदालत में क्या बोलना है? यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे पास ऐसे मुकदमे हैं ही नहीं कि मुझे अपने गवाहों से मिथ्या कहलवाना पड़े। यह गुण भी एक साख की तरह काम करने लगा है। अब झूठ बुलवाने की इच्छा रखने वाला मुवक्किल अपनी देहरी पर पैर रखता ही नहीं है।

    शपथग्रहण (शपथगृहण नहीं) समारोह कोई शपथ लेने के लिए आयोजित नहीं किए जाते। वे सिर्फ अपना महत्व प्रदर्शित करने के लिए किए जाते हैं। आप चाहें तो मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपतिभवन में शपथग्रहण करने का समारोह दूरदर्शन पर लाइव देख सकते हैं। वहाँ जो शपथग्रहीता जितने महत्वका होता है। उतनी ही तालियाँ बजती हैं। यह भी देखा जाता है कि किस के लिए सोनिया गांधी ने ताली बजाए और किस के लिए मनमोहन सिंह ने या किसी अन्य व्यक्ति ने।

    ईश्वर अब जुबान, कपड़ों,मंदिरों, घरों की अलमारियों में रह गया है। उस के अस्तित्व और उस के न्याय पर शायद ही कोई विश्वास करता हो। फिर उस के नाम की शपथ लेकर जो जो न करना कहा जाए उसे करने और जो जो करने को कहा जाए उसे न करने में कहाँ दोष है? अच्छा है जो मेरे जैसे लोग ईश्वर के नाम की शपथ नहीं ले कर स्वयं की सत्यनिष्ठा की शपथ लेते हैं और उसे निभाते हैं।

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  6. aapne mudda badi shiddat ke satha uthaya hai. jo pravaha, jo ridma, jo nirantarta harbar dikhati hai, uski isbar kami hai...

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