बापू कथा - पहली शाम (9 अगस्त 2008)
नारायण भाई देसाई ने, पांच दिवसीय ‘बापू कथा’ के पहले दिन, कथा के नायक महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के मूल तत्व प्रस्तुत किए । आज के व्याख्यान को गांधी के व्यक्तित्व की निर्मिति का सांगोपांग आख्यान कहा जा सकता है । वे क्या कारण या कि तत्व रहे जिनके दम पर गांधी अप्रतिम साहस कर सके और खुद अप्रतिम बन गए ।
आज उन्होंने समझाया कि मोहनदास करमचन्द गांधी कैसे मोहन से महात्मा बने । इस प्रक्रिया की प्रस्तुति उन्होंने गांधीजी के शुरुआती जीवन की विभिन्न घटनाओं और अपने संस्मरणों के जरिये जिस आत्मपरकता से दी, वह इसके एक-एक शब्द को ‘असंदिग्ध विश्वसनीय’ बनाने वाली अद्भुत प्रस्तुति थी । नारायण भाई ने न तो आलंकारिक भाषा वापरी और न ही भाषा के चमत्कार प्रस्तुत किए । इसके बावजूद, सभागार की उपस्थिति अन्तिम क्षण तक जस की तस बनी रही । सादगी किस सीमा तक प्रभावी और आकर्षक हो सकती है-यह आज की प्रस्तुति के प्रत्यक्षदर्शियों/श्रोताओं से मिलकर ही अनुभव किया जा सकता है । नारायण भाई का आज का व्याख्यान सुन कर मुझे विश्वास हो गया कि अब गांधी के अभियानों, आन्दोलनों, कार्य प्रणाली और उन्हें प्राप्त उपलब्धियों को समझने में तनिक भी असुविधा नहीं होगी ।
कथा में मैं तनिक देर से पहुंचा, सो जहां से मैं ने सुना वहीं से शुरु कर रहा हूं ।
गांधी एक-एक क्षण का उपयोग करते थे । वायसराय से वार्ता के लिए शिमला पहुंचने पर मालूम हुआ कि वे सप्ताह भर बाद आएंगे । गांधी ने तत्काल सेवाग्राम लौटने का कार्यक्रम बनाया । तब, सेवाग्राम से शिमला यात्रा में दो दिन और सेवाग्राम से शिमला यात्रा में दो दिन, इस तरह चार दिन लगते थे । लेकिन गांधीजी शिमला मे प्रतीक्षारत रहने के बजाय सेवाग्राम पहुंचे क्यों कि परचुरे शास्त्री वहां थे जिनकी देख-भाल और सेवा-टहल गांधीजी खुद करते थे । परचुरेजी कुष्ठ रोगी थे और उस समय कुष्ठ रोग को प्राणलेवा तथा छूत की बीमारी माना जाता था । गांधीजी शिमला से लौटे उस दिन परचुरेजी को मालिश करने की बारी थी । आते ही गांधीजी इस काम में लग गए ।वे प्रत्येक काम को ईश्वर का काम मानते थे किसी भी काम को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे ।
उन्होंने सत्य को सदैव उसकी सम्पूर्णता में देखा । यही कारण रहा कि उन्होंने जीवन को भी अखण्डित रूप में ही देखा ।
उन्होंने व्यक्तिगत मूल्यों और सामाजिक मूल्यों को कभी भी अलग-अलग नहीं माना । जो मूल्य परिवार में हैं वे ही मूल्य समाज में भी होंगे । उनका कहना था कि सारे शास्त्र मनुष्य के लिए बने हैं इसलिए शास्त्रों की सामूहिकता ही मनुष्य पर लागू होगी । अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र यदि अलग-अलग होंगे तो इससे अनीतिशास्त्र उपजेगा ।मन, वचन, कर्म की एकरूपता ही सत्य है । बापू की सत्य की परिभाषा चूंकि एक गतिशील (डायनेमिक) परिभाषा थी इसीलिए उनका जीवन भी गतिशील (डायनेमिक) बना रहा । उन्होंने जड़ता को कभी स्वीकार नहीं किया । इसीलिए वे यह कहने का साहस कर सके कि यदि उनकी दो बातों में मतभेद पाया जाए तो उनकी पहले वाली बात को भुला दिया जाए और बाद वाली बात को ही माना जाए ।
सत्य को उसकी सम्पूर्णता और गतिशीलता में स्वीकार करने के कारण ही ‘‘रात के अंधरे में घर से बाहर निकलने में डरने वाला ‘मोहन्या’ दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यसे टकराने का साहस कर पाया ।’’ - नारायण भाई ने कहा ।
अपने अपवाद नहीं होते
अपने निर्णयों को बापू सब पर समान रूप से लागू करते थे । उन्होंने निर्णय कर लिया था कि वे उसी विवाह समारोह में नव-युगल को आशीर्वाद देने जाएंगे जब एक सवर्ण और दूसरा हरिजन हो । बापू के इस निर्णय के बाद नारायण भाई देसाई का विवाह तय हुआ । वर-वधू, दोनों सवर्ण थे । तब तक महादेव भाई देसाई (नारायण भाई के पिताजी) का देहावसान हो चुका था । मां दुर्गाबाई की चिन्ता थी - आशीर्वाद तो बापू का ही चाहिए । उन्होंने नरहरि भाई परिख को बापू से बात करने भेजा । सारी बात सुनकर बापू बोले - ‘‘बाबला (नारायण भाई देसाई) तो अपने परिवार का बच्चा है । उसके लिए अपवाद नहीं हो सकता । दुर्गा से कहना, मेरे आशीर्वाद तो बच्चों को मिलेंगे लेकिन उपस्थिति नहीं ।’ और बापू विवाह में नहीं गए । ठीक विवाह वाले दिन उनका आशीर्वाद पत्र वहां जरूर पहुंच गया ।
बापू का कहना था - ‘जो सोचो वही बोलो और जो बोलो वही करो ।’ मन-वचन-कर्म में एकरूपता इसी का तो पर्याय है ।
लालच, मोह, स्वार्थ दिमाग में चढ़ने पर आदमी के मन पर भय का आवरण चढ़ जाता है । बापू निरावरण थे और यही उन्हें हम सबसे अलग करता है । उन्होंने बड़ी ही सहजता से कहा है - ‘सत्य मेरे लिए सहज था । बाकी गुणों के लिए मुझे प्रयत्न करने पड़े ।’
सत्यप्रियता के संस्कार
नारायण भाई ने कहा - सत्यप्रियता के गुण के आंशिक संस्कार बापू को उनके दादा उत्तमचन्द गांधी से मिले । शेषांश बापू ने स्वयम् अर्जित किए । एक बार पोरबन्दर की रानी अपने भण्डारी से नाराज हो गई । भण्डारी, उत्तमचन्दजी की शरण में आया । उन्होंने उसकी रक्षा का वादा किया । रानी को मालूम हुआ तो उसने उत्तमचन्दजी के घर पर तोप लगवा दी । उत्तमचन्दजी ने अपने परिवार के तमाम सदस्यों को (बच्चे, बूढ़े, आदमी, औरतें) को मकान के अगले कमरे में एकत्रित किया । उन्हें अपने साथ गोलाकार बैठाकर बीच में भण्डारी को बैठाया और कहा कि यदि मरने वाली बात आई तो पहले उत्तमचन्द के घर के लोग मारे जाएंगे ।
नारायण भाई ने एक और रोमांचक घटना सुनाई । बांकानेर के राजा ने करमचन्दजी गांधी (वे ‘कबा गांधी’ के रूप में जाने-पहचाने जाते थे) को दीवान बनाने का प्रस्ताव किया । कबा गांधी ने शर्तें रखीं - आपको मेरी हर सलाह माननी पड़ेगी, नौकरी कम से कम पांच साल की होगी, यदि मुझे पांच साल से पहले नौकरी से निकाला गया तो भी मुझे पूरे पांच साल का वेतन दिया जाएगा और ये सारी बातें कागजों में लिखित में रखी जाएंगी । राजा ने सब शर्तें मान लीं और कागजी खानापूर्ति कर कबा गांधी को दीवान नियुक्त कर दिया । लेकिन धीरे-धीरे, राजा कबा गांधी की सलाह की अवहेलना करने लगे । यह देख कबा गांधी ने लिखा - चूंकि आपने नियुक्ति की शर्तों का उल्लंघन किया है इसलिए मैं नौकरी छोड़ता हूं । राजा ने कहा - नौकरी भले ही छोड़ो लेकिन शर्तों का उल्लंघन करने वाली बात स्तीफे में से निकाल दो । कबा गांधी ने कहा - वह बात निकाल दी तो स्तीफे का मतलब ही क्या रहा ? राजा ने कहा - मैं पूरे दस हजार रुपये दूंगा, यह बात काट दो । कबा गांधी ने कहा - लिखी बात नहीं काटूंगा । तब राजा ने कहा - आपने अपने अब तक के जीवन में दस हजार रुपये एक साथ नहीं देखें होंगे । कबा गांधी ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया - हां, यह सच है कि मैं ने दस हजार रुपये एक साथ नहीं देखे हैं । लेकिन आपने भी इससे पहले, दस हजार रुपये ठुकराने वाला आदमी नहीं देखा होगा ।
दो पहले पाठ
नारायण भाई के मुताबिक, बापू ने अहिंसा का पहला पाठ अपने पिता से और सविनय अवज्ञा का पहला पाठ कस्तूर बा से सीखा ।
चोरी-छुपे लिए गए कर्जे को चुकाने के लिए उन्होंने भाई के हाथ का सोने का कड़ा काट कर बेच दिया । किसी को मालूम नहीं हुआ लेकिन मोहनदास को तो मालूम था । सहन नहीं कर पाया । माता पुतली बाई से कहा तो उन्होंने कहा - अपने पिताजी को ही सब-कुछ तुम खुद बताओ । मोहनदास ने पत्र में सारी बात लिखी और तीन बातें खास तौर पर लिखीं - मैं ने गलती की है, ऐसी गलती अब नहीं करूंगा और इस गलती की जो भी सजा आप देंगे, भुगतने को तैयार हूं । पिता करमचन्द गांधी उस समय बीमार थे, बिस्तर में । पत्र उन्हें देकर मोहनदास गया नहीं, दरवाजे में खड़ा होकर पिता की ओर देखता रहा । पिता ने पत्र पढ़ा, उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह चली, उन्होंने पत्र फाड़ दिया, एक शब्द भी नहीं कहा । नारायण भाई ने कहा - बापू के लिए यह अहिंसा का पहला पाठ था ।
बापू, कस्तूर बा पर पति भाव का अधिकार जताते थे । कहीं जाओ तो मुझसे पूछकर जाओ । मैं मना कर दूं तो मत जाओ आदि, आदि । बा ने न तो प्रतिवाद किया, न कोई विवाद, न झगड़ा और न ही बहस की । वे प्रतिदिन मन्दिर जाती थीं । उन्होंने बापू से एक बार भी अनुमति नहीं ली और यह क्रम बनाए रखा । बापू ने कहा - उसने जिस साहस और शालीनता से मेरी अवहेलना की, वह मेरे लिए सबक था ।
बकौल नारायण भाई, बापू सिध्द नहीं साधक थे और यही हम सबके लिए सबसे बड़ा आश्वासन है । सारी दुनिया उन्हें ‘महात्मा’ कहती थी लेकिन उन्होंने खुद को कभी भी महात्मा न तो माना और न कहा । वे कहते थे - ‘महात्मा नाम से मुझे बू बाती है । मैं गलतियां करता था और मैंने गलतियां की है ।’
मोहन से महात्मा
नारायण भाई ने कहा - ‘मोहन के महात्मा बनने की यात्रा में कुछ सीढ़ियां महत्वपूर्ण रहीं ।’ पहली सीढ़ी रही - आत्म निरीक्षण, आत्म परीक्षण और आत्म शोधन । इसी के चलते यह मुमकिन हो पाया कि उन्होने गलतियां तो खूब की लेकिन कोई भी गलती दूसरी बार नहीं की ।
दूसरी सीढ़ी रही - अपनी गलती को बढ़ा-चढ़ा कर देखना और दूसरे की गलती को सन्देह का लाभ देना ।अपनी गलती से उपजी वेदना, इस वेदना से उपजे परिताप और इस परिताप के शमन के लिए किया गया अनुताप बापू के जीवन को असाधारण बनाता है । इसके लिए नारायण भाई ने रोचक प्रसंग सुनाया ।
तब बापू की अवस्था दस-ग्यारह वर्ष की थी । उन्होंने राजकोट में अपने जन्म दिन की पार्टी दी । अगले दिन उन्हें अपना एक पुराना प्रिय मित्र मिला । उसे पार्टी की खबर थी । बापू ने कोई बहाना नहीं बनाया । स्वीकार किया कि वे उसे बुलाना भूल गए । इस गलती ने बापू को बेध दिया । वे विकल हो गए । उन्हें आम अत्यन्त प्रिय थे । लेकिन उस वर्ष आम के मौसम में उन्होंने एक भी आम नहीं खा कर अपनी इस गलती की वेदना से उपजे परिताप का अनुताप किया ।
नारायण भाई ने कहा - वेदना, परिताप और अनुताप की इस यात्रा ने मोहन को महात्मा बनाया ।
बापू और नेहरु को लेकर अलग-अलग मिजाज की अनेक बातें चारों ओर सुनाई देती हैं । लेकिन बकौल नारायण भाई, नेहरु के मन में बापू के प्रति जो आदर भाव था उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । बापू से मिलने नेहरू जब-जब भी सेवाग्राम जाते तो लौटते समय सचमुच में उल्टे पांव आते ताकि बापू को पीठ दिखाने का अपराध न हो जाए ।
बापू की सुनिश्चिचत धारणा थी कि राजनीति और रचनात्मकता के बीच केवल लोगों की उनकी अपनी भाषा ही सेतु का काम कर सकती है । इसीलिए बापू आजीवन देश की विभिन्न भाषाएं सीखते रहे और अपने आस-पास के लोगों से भी ऐसा ही करने को कहते रहे ।
(कल, नारायण भाई, बापू के दक्षिण अफ्रीका प्रवास वाले काल खण्ड के बारे में विस्तार से बताएंगे । मैं कोशिश करूंगा कि बापू कथा की दूसरी शाम भी आप तक पहुंचा सकूं ।यह आयोजन, इन्दौर में, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय ट्रस्ट, इन्दौर द्वारा स्व. श्री जयन्ती भाई संघवी की स्मृति में, बास्केटबाल स्टेडियम में किया जा रहा है ।)
