ये जो धुँधलका है, काफी है: सरोजकुमार

उतने ही दिखो और देखो
जिसमें जिन्दगी निरापद चली चले,
रोशनी की और जरूरत नहीं है
ये जो धुँधलका है
काफी है!

अपनी सुनिश्चित मौत को
अफवाह मानते रहने में
जिन्दगी का लुत्फ है!


रोशनी सम्भावनाओं के माँडने लील कर
जो आँगन लीपती है
उस पर चलने से पैर जलते हैं!


ईश्वर कभी नहीं मिला
पण्डितों को रोशनी में,
वह रीझता रहा
फकीरों पर
गुफाओं-बियाबानों में!


रोशनी से झकाझक
दोपहर कैसी खाली-खाली है,
पर सुबह कितनी रसभरी!
शाम कितनी लुभावनी!
आँखें बन्द करने पर
जो दीखता है
वहाँ नहीं जा पाती
दूरबीन की आँख!


तुम फिर उड़ रहे हो
ऊँचे और ऊँचे
रोशनी के शिकार को,
वह फिर तुम्हारे पंख
जला डालेगी!
जिन्दगी एक पहेली है
रोशनी एक उत्तर है,
पहेली का मजा
उत्तर की मौजूदगी में नहीं
उसकी अनबूझ में छुपा हुआ है!


वह जो धुँधली-धुँधली
दिखाई दे रही है
वही जिन्दगी है
और वह जो एकदम साफ है
मौत है!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

पहले बलात्कार किया, अब बदचलन कह रहे हैं

मेरे प्रिय चिदम्बरमजी,

पहले ही आपको काफी कुछ कह चुका हूँ फिर भी लग रहा है, और भी कुछ कहना शेष  रह गया है। वस्तुतः ऐसा  मेरी इच्छा के कारण नहीं,  आपके द्वारा स्वअर्जित पात्रता के कारण हो रहा है। मैं तो प्रतिक्रया मात्र व्यक्त कर रहा हूँ। मूल क्रिया का ‘पुण्य-यश’ तो आपके खाते मे ही जमा है।

गेहूँ-चावल जैसे, आम आदमी के अनाज के मूल्य में एक रुपया प्रति किलो की वृद्धि को सहन कर लेने की नेक सलाह देते हुए आपने उलाहना दिया कि ‘मैं’ जब पानी की बोतल खरीदने के लिए पन्द्रह रुपये खर्च कर लेता हूँ तो एक रुपया किलो की यह बढ़ोतरी सहन और स्वीकार करने में मेरी नानी नहीं मरनी चाहिए। यह नेक सलाह देते हुए आपकी मुख मुद्रा दर्शनीय थी। आप आक्रोश से तमतमा रहे थे। यह मेरा सौभाग्य ही था कि उस समय ‘मैं‘ आपकी पहुँच में नहीं था वर्ना आप मेरी शकल, निश्चत रूप से बिगाड़ देते। अपनी शक्ति और क्षमता का उपयोग इस तरह करने में आप और आपके तमाम साथी ‘प्रवीण’ और ‘निष्णात’ हैं।

हाँ चिदम्बरमजी! आपका यह कहना सही है कि मैं पानी की बोतल खरीदने के लिए पन्द्रह रुपये चुकाता हूँ किन्तु यह मैं प्रसन्नता से नहीं करता। यह ‘उदाहरणीय’ काम करने के लिए आपने ही मुझे अभिशप्त कर रखा है।

आप (गलती से या कि आपके दुर्भाग्य से) भारत में पैदा भले ही हुए हों किन्तु आपकी बातों और व्यवहार से पहले ही क्षण अनुभव हो जाता है कि आप ‘भारत’ को नहीं जानते। जान भी नहीं सकते। आप तो विदेशों में शिक्षित-दीक्षित हैं। आप तो ‘इण्डिया’ को जानते और उसी में रहते हैं।

भविष्य में आपको काम आएगी, इसलिए एक बात आपको बता रहा हूँ। पानी का व्यापार करना मेरे भारत में सबसे घिनौने कामों में से एक माना जाता है - गौ हत्या के बराबर। हम किसी को पानी नहीं पिलाते, ‘जल सेवा’ करते हैं। इस व्यंजना को आप अनुभव कभी नहीं कर सकेंगे क्योंकि आपके यहाँ तो पानी ‘सर्व’ होता है। यह ‘सर्व’ भले ही अंग्रेजी के ‘सर्विस’ याने ‘सेवा’ से आया है किन्तु ‘जल सेवा करने’ और ‘वाटर सर्व करने’ में पूरब-पश्चिम का अन्तर है।

आपको तो यह भी पता नहीं होगा कि मेरा ‘भारत’ बैसाख के महीने में, गाँव-गाँव, गली-गली प्याऊ खुलवाता है और यथा सम्भव प्रत्येक प्याऊ के साथ एक नाँद रखवाता है ताकि चिलचिलाती धूप और प्राणलेवा गरमी के कारण सूखे हलक वाले मनुष्य और पशु अपनी प्यास बुझा सकें। प्याऊ खुलवानेवाला और नाँद रखवानेवाला उनमें से किसी को नहीं जानता, किसी की शकल नहीं देखता जो (मनुष्य या चौपाया) वहाँ आकर अपनी प्यास बुझाता है। इसी के समानान्तर, प्यास बुझानेवाला भी नहीं जानता कि उसके लिए ठण्डे पानी की व्यवस्था किसने की है। आप इस बात को कभी अनुभव नहीं कर सकेंगे क्योंकि आपतो ‘वाटर स्टाल’ जानते हैं जहाँ अपनेवाले को भी बिना कीमत के पानी की बोतल नहीं दी जाती।

लेकिन यह तो बहुत ही छोटी बात कही है मैंने। बड़ी बात बाकी है और मुझे पूरा भरोसा है कि वह सुनने पर आपको, क्षणांश को ही सही, अपने आप शर्म जरूर आएगी।

आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि ‘जल सेवा’ के माध्यम से ‘भारत’ के निस्सन्तान दम्पत्ति अपना वंश चलाते हैं। ‘भारत’ के गाँव-गाँव में आपको ऐसे कुए मिल जाएँगे जो किसी निस्सन्तान दम्पत्ति ने खुदवाए हैं - सार्वजनिक उपयोग के लिए।

चिदम्बरमजी! मैंने शास्त्र नहीं पढ़े और नहीं जानता कि यह बात कितनी सच है। किन्तु मुझे सनातन से बताया जा रहा है कि ‘पितृ-ऋण’ से मुक्त होने का एक ही उपाय है - सन्तानोपत्ति। किन्तु दुर्भाग्य या ईश्वर की अकृपा से यदि कोई दम्पति इस सुख-सौभाग्य से वंचित रह जाता है तो वह लोकोपयोग हेतु कुआ खुदवाता है क्योंकि लोक मान्यता है कि ऐसा करने से उसकी वंश-बेल बढ़ गई।

चिदम्बरमजी! पन्द्रह रुपये की पानी की बोतल खरीदने का उदाहरण देने की सीनाजोरी बरतते हुए आप भूल रहे हैं कि ‘भारत’ के इस ‘लोक संस्कार’ को आपने ही भ्रष्ट और नष्ट किया है। यह आपकी ही सरकार थी जिसने ‘जल सेवा’ को ‘पानी का व्यापार’ बना दिया। गिनती के लोगों को पूँजीपति बनाने के लिए आपने करोड़ों लोगों का पानी छीन लिया। मशीन से एक बोतल पानी हासिल करने के लिए दस-बारह बोतल पानी बेकार जाता है। यह सब आपने तब किया जब सारी दुनिया चेतावनी दे रही थी कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर लड़ा जाएगा। आपने हालत यह कर दी है कि रतलाम से इन्दौर के बीचके स्टेशनों पर जहाँ पहले लोग हाथों में लोटे-बाल्टियाँ लेकर ‘जल सेवा! जल सेवा!’ की गुहार लगा कर रेल के डिब्बों में बैठे यात्रियों के प्यासे-तरसे कण्ठों को तृप्त कर स्वयम् को उपकृत और धन्य अनुभव करते थे उन्हीं स्टेशनों पर अब छोटे-छोटे बच्चे, कन्धों पर, अपने वजन के बराबर वजनवाले, भारी-भरकम थैले लादे ‘पाउच ले लो! ठण्डे पानी के पाउच ले लो!’ की आवाजें लगा कर पानी बेच रहे हैं।

चिदम्बरजी! पहले तो आपने ‘भारत’ की मौजूदा पीढ़ी को ‘जल सेवा’ के संस्कार से च्युत कर ‘पानी का व्यापारी’ बनाने का पाप किया और अब अपने उसी पाप को अपने अगले अत्याचार का औचित्य प्रतिपादित करने का हथियार बना रहे हैं। यह बिलकुल वैसा ही है कि पहले तो आपने बलात्कार किया और फिर बलात्कार की शिकर स्त्री को बदचलन कह रहे हैं। अपने एक आपराधिक दुष्कृत्य को दूसरे आपराधिक दुष्कृत्य को जायज ठहराने की ऐसी मिसाल दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

यह सब मैंने राजी-खुशी, प्रसन्नता से नहीं कहा चिदम्बरजी! आपने मजबूर कर दिया यह सब कहने को। आपने रबर की गेंद दीवार पर मारी थी। वही गेंद, लौट-लौट कर आपके मुँह पर लग रही है।

किन्तु सुधरने के मौके हमेशा उपलब्ध रहते हैं। आप ही तय करेंगे कि आप सुधरना चाहते हैं या नहीं।

शुभ-कामनाएँ।

आपका,

एक प्यासा-तरसा भारतीय

जरूरी था तूफान : सरोजकुमार

तूफान बहुत जरूरी था
समुन्दर में!
बड़ी-बड़ी मछलियों के गिरोह
उत्पात में मशगूल थे,
सतहें भूल चुकी थीं
अपने ताल्लुकात
गहराइयों से!
न ज्वार, ज्वार रहे थे
न भाटे, भाटे!
ऐसे में प्रकृति
अपना जीवन कैसे काटे?



तूफान ने
खँगाल कर समुन्दर को
भीतर से बाहर तक
हिला दिया,
जिसका जो छीना था
दिला दिया!
उभर रहे द्वीपों को
ढहा दिया,
मरी हुई सीपों को
बहा दिया!


तूफान बहुत जरूरी था
समुन्दर में!
तूफान बहुत जरूरी है
जरूरत में!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

पहुँचा दिया पनघट पर

शीर्षक ही आप सबके लिए खुश खबर  है। खुश खबर भी दोहरी। पहली तो यह कि आप सबकी भावनाओं ने यथेष्ठ प्रभाव डाला और ‘वे दोनों’ न केवल निर्णय पर पहुँच गए अपितु जैसा आपमें से अधिसंख्य ने चाहा था, उसी निर्णय पर पहुँचे। दूसरी यह प्रतीति कि ब्लॉग का उपयोग, किसी उलझन को सुलझाने में भी किया जा सकता है।

कल मैं लगभग तीन घण्टे ‘उन दोनों’ के साथ रहा। गया तो साथ में ‘पनघट की कठिन डगर’ का, इस पर प्रकाशित सारी टिप्पणियो का और श्रीरमाकान्त सिंह की इस पोस्ट का प्रिण्ट आउट भी लेता गया। सारी सामग्री देखकर वे हैरत में पड़ गए - इतने सारे लोग उनकी समस्या का निदान पाने में लगे! मुहावरों में कहूँ तो यह सब देखकर ‘वे दोनों’  बाग-बाग हो गए, शुरुआती कुछ कुछ क्षणों में भावुक और विगलित होते हुए।

सारी सामग्री उन्हें सौंपते हुए मैंने स्पष्ट किया कि वे दोनों मुझसे कुछ नहीं पूछें, आपस में ही तय करें,  अभी  ही  तय करें  और भले ही उनकी बातों से मुझे उनका निर्णय मालूम हो जाए किन्तु अपना निर्णय वे अपने मुँह से मुझे बताएँ। मैंने यह भी कहा कि उनका निर्णय मैं उसी प्रकार सार्वजनिक करूँगा जिस प्रकार उनका विवाद   सार्वजनिक किया था।

कागज-पत्तर फैलाकर वे दोनों काम पर लग गए। एक-एक टिप्पणी को जोर-जोर से पढ़कर उस पर बात विस्तार से की। दोनों ने खूब तर्क-कुतर्क-वितर्क किए। खूब नोंक-झोंक हुई। बीच-बीच में, पाँच-सात बार, प्रश्नाकुल नजरों से मेरी ओर देखा। मैंने हर बार, हँसते हुए इंकार में अपनी मुण्डी हिलाई।

लगभग दो-सवा दो घण्टों के उनके इस ‘विमर्श’ में एक बात ने मेरा ध्यानाकर्षण किया। शुरुआत दोनों ने की, अपनी-अपनी बात को सही साबित करने की कोशिशों से। किन्तु बहुत जल्दी (इस ‘बहुत जल्दी’ से भी ‘बहुत जल्दी’) ‘वे दोनों’ अपनी बेटी की बेहतरी की चिन्ता करने लगे और अपनी बात को सही साबित करने की कोशिशें भूल बैठे।
अन्ततः ‘वे दोनों’ निर्णय पर पहुँच ही गए। जो कुछ ‘उन दोनों’ ने मुझे सुनाया, उसमें ऐसी बातें भी शरीक हो गईं जिनकी कल्पना मैंने नहीं की थीं। जाहिर हैं, आपने भी नहीं की होगी। ‘उनका’ निर्णय आप भी सुन लीजिए -

- रिश्ता कहाँ किया जाए, इसका अन्तिम निर्णय उनकी बेटी ही करेगी।

-इस निर्णय में, लड़के के परिवार के आर्थिक स्तर को पैमाना नहीं बनाया जाएगा। याने, लड़की किसी गरीब को भी पसन्द कर लेगी तो स्वीकार होगा।

- ‘वे दोनों’ यद्यपि दुराग्रह नहीं करेंगे किन्तु लड़के के समुचित शिक्षित होने पर ध्यान रखा जाए, यह आग्रह अवश्य रहेगा।

- लड़के के परिवार में यदि पहले से कोई बहू है तो उसकी दशा, परिवार में उसकी स्थिति और उसके साथ किए गए/किए जा रहे व्यवहार को भी ध्यान में रखा जाएगा।

- अन्तर्जातीय सम्बन्ध स्वीकार नहीं कर पाएँगे।

अपनी बात सुना कर ‘दोनों’ ने पूछा - ‘अब तो आप खुश?’ अपने-अपने अहम् को (अनायास ही) परे धकेल कर, अपनी बेटी की बेहतरी की चिन्ता करने के लिए उन्हें विशेष रूप से धन्यवाद देते हुए मैंने कहा - ‘यह सवाल अपनी बेटी से पूछिएगा।’

चलने से पहले मैंने ‘उन दोनों’ का चित्र लेना चाहा तो पिता ने हाथ जोड़ कर, क्षमा याचना करते हुए कहा - ‘मेरी बेटी और बेटे का विवाह हो जाने दीजिए। मैं अपने पूरे परिवार का फोटू आपका दे दूँगा। आपकी नियत पर मुझे कोई शक नहीं है किन्तु गाँव छोटा है और मेरा जाति-समाज तो और भी छोटा। आप तो जानते ही हो कि कुछ लोग हमेशा फुरतस में रहते हैं और उन्हें फजीते (लोगों की किरकिरी करने) में मजा आता है। क्या पता, कौन-कब-क्या कर बैठे और मेरा परिवार तथा बच्चे परेशानी में आ जाएँ। इसलिए आप मुझे माफ कर दें।’

‘दोनों’ मुझे छोड़ने के लिए दरवाजे तक आए। मैं नमस्कार कर उनसे विदा लूँ उससे पहले ‘पिता’ ने अपने हाथों में मेरे दोनों लेकर, रुँधे गले से कहा - ‘आप तो मेरे परिवार के ही हैं। किन्तु आपके लेख पर जिन-जिन लोगों ने अपनी राय दी है, उन सबको, हम दोनों की ओर से बार-बार और खूब सारे धन्यवाद दीजिएगा। उन सबने किसी अनजान और पराए की बेटी की चिन्ता की और रास्ता दिखाया। भगवान उन सबका भला करे। हम दोनों, आत्मा से उनकी बेहतरी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे।’

और, जैसा कि ऐसे क्षणों में मेरे साथ होता है, मुझे रोना आ गया। हम तीनों, निःशब्द थे। मैं लौट आया - बिना बोले।

मुझे लग रहा है, ‘लोक कल्याण’ लिए अनायास ही आयोजित किसी यज्ञ में मैंने, ब्लॉग के जरिए आप सबके साथ, आहुति दी है - ‘उनके’ और मेरे आँसुओं से भीगी आहुति।

आप सबको धन्यवाद। बधाइयाँ  और अभिनन्दन भी।

तेरी जरूरत हर किस्से में है : सरोजकुमार

कितने सारे बहाने हैं मरने को,
कितने सारे काम हैं करने को,
सौ-सौ पहेलियाँ हैं बूझने को
सच्ची-झूठी बातें हैं सूझने को!


कितने रहस्य हैं जानने के लिए
पचीसों धर्म हैं मानने के लिए,
रिश्ते हजारों हैं अगर तू निभाए
गीत हैं सुरीले, अगर तू गाए!


जो भी हैं, ढेर ढेर में है
तू ही न जाने किस फेर में है,
सारा संसार तेरे हिस्से में है
तेरी जरूरत हर किस्से में है!


तुझको तो सबका सब
बेमानी लगता है,
खून हो, पसीना हो
बस पानी लगता है!
पैदा हुआ है तो
उम्र भर जिएगा भी,
तार तार सपनों को
जाग कर सिएगा भी?

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक।  लम्बे समय  तक  महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

चिदम्बरमजी! यह भिखारी आपको क्षमा करता है

                                                                                                         
अब तो ‘सारिका’ को बन्द हुए ही बरसों हो गए। बन्द होने के बरसों पहले उसमें छपी एक लघु कथा याद आ गई।

गाँव से सटे जंगल में एक लड़की अपनी माँ के साथ, जलावन के लिए लकड़ियाँ बीन रही थी। कुछ ही दूरी पर, अमराई में, पिकनिक मनाने के लिए शहर से आई,  कुछ लड़कियाँ खेल रही थीं। खेलती हुई वे शहरी लड़कियाँ बिना बात ही जोर-जोर से हँस रही थीं। उन्हें इस तरह हँसते देख, जलावन बीन रहीं लड़की ने अपनी माँ से पूछा - ‘माँ! ये लड़कियाँ बिना बात क्यों हँस रही हैं?’ माँ ने जवाब दिया - ‘बेटा! जब जवानी आती है तो ऐसा ही होता है।’ सुनकर लड़की ठिठक गई। कुछ याद करते हुए बोली - ‘हाय माँ! मैं भी गए साल बिना बात के खूब हँसती थी।’

एक और कहानी याद आ गई। महादेवी वर्मा की यह कहानी हायर सेकेण्डरी कक्षाओं में हमारे पाठ्यक्रम में थी। कहानी का शीर्षक, कहानी की नायिका के नाम पर ही था - ‘लछमा।’ अभावों में जी रही, गाँव की लड़की लछमा को अत्यधिक खुश देख कर महादेवीजी को अचरज हुआ। उन्होंने लछमा से विस्तार से बात की तो मालूम हुआ कि उसने आज तक लड्डू नहीं खाया है। बात-बात में लछमा कहती है कि उसने लड्डू नहीं खाया तो क्या हुआ, वह लड्डू का स्वाद तो जानती है। महादेवीजी हैरत से पूछती हैं - कैसे? लछमा कुछ ऐसा जवाब देती है - ‘पीली मिट्टी का गोला बनाकर मुँह में रख लिया और सोच लिया कि लड्डू रखा है और इस तरह लड्डू का स्वाद आ जाता है।’

और विश्व इतिहास का वह सर्वविदित वाकया भी याद आया जिसमें, रोटी माँग रही भीड़ को आश्चर्य से देखती, फ्रांस की रानी ने सलाह दी थी कि इन्हें रोटी नहीं मिल रही तो ये लोग केक क्यों नहीं खा लेते।

अब वे लोक कथाएँ भी याद आ रही हैं जिनमें, प्रजापालक राजा, भेस बदल कर रात में घूम कर अपनी प्रजा का हाल जानने की कोशिशें किया करते थे। वे गुंजाइश रखते थे कि उनके मन्त्री उन्हें भ्रमित रख सकते हैं, उनसे वास्तविकताएँ छुपा सकते थे। जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के लिए की गई अपनी इल कोशिशों में उन्हें ‘प्रजा में फैली, राजा के प्रति नफरत’ की जानकारी बखूबी हो जाती थी और वे खुद को तथा अपनी व्यवस्था को सुधार लिया करते  थे।

देश और राजा का नाम तो याद नहीं रहा किन्तु याद आ रहा है कि अपने रथ पर सवार वह राजा जब नगर-यात्रा पर था तो रास्ते किनारे खड़े एक भिखारी ने टोप उतार कर, झुक कर राजा को नमस्कार किया। प्रत्युत्तर में राजा ने भी खड़े होकर, टोप उतार कर, झुक कर भिखारी को नमस्कार किया। यह देख, साथ बैठे मन्त्री ने जिज्ञासा प्रकट की तो राजा ने कहा - ‘जिस देश का भिखारी इतना नम्र हो उस देश के राजा को तो और अधिक नम्र होना चाहिए।’

रहीम का एक दोहा भी याद आ गया -

दीन सबन को लखत है, दीनहि लखे न कोय।
जो रहीम दीनहि लखै, दीनबन्धु सम होय।।

कैसे भूल सकता हूँ कि ‘भीख माँगना’ मेरे परिवार का ‘व्यवसाय’ हुआ करता था और भीख माँगने का बरतन इस व्यवसाय का उपकरण। दादा और जीजी को तो भीख माँगते नहीं देखा किन्तु उनकी करुण-गाथाएँ उनसे और अन्य परिजनों/परिचितों से अनेक बार सुनी। सातवीं कक्षा तक मैंने भी, दरवाजे-दरवाजे जाकर मुट्ठी-मुट्ठी आटा माँगा। रोटियाँ माँगने के लिए माँ के साथ कई बार गया और ‘रामजी ऽ ऽ ऽ ऽ की जय’ की गुहार लगा कर गृहस्वामिनियों को माँ की और अपनी उपस्थिति सूचित की। बरसों तक यह क्रम चला किन्तु एक बार भी, किसी एक भी ‘दाता’ के चेहरे पर हिकारत या नफरत की एक शिकन नहीं देखी। उपकृत करने का भाव भी कभी नजर नहीं आया। जिसने, जो भी दिया, या तो आदरपूर्वक दिया या सहानुभूतिपूर्वक या फिर सहायता करने के भाव से। उस काकी का नाम तो याद नहीं आ रहा किन्तु शकल इस क्षण भी मेरी धुँधलाती आँखों के सामने नाच रही है जो माँ के बर्तन में गरम-गरम रोटी रखते हुए, लगभग रोज ही मेरी माँ से कहती थी - ‘लाड़ी! (लाड़ी याने बहू) भगवान तेरा भला करे जो तू हमें यह सेवा करने का मौका दे रही है।’

ये और ऐसी अनेक अच्छी बातें आज सुबह-सुबह याद आ गई। लगा, भगवत्-भजन कर लिया। आत्मा निर्मल होती लगी। इस सबके लिए चिदम्बरमजी को धन्यवाद। उन्होंने गरीब और गरीबी का मजाक नहीं उड़ाया होता तो इतनी अच्छी बातें याद कैसे आतीं? हमारे परिवार को जीवित बनाए रखनेवाले दाताओं के प्रति कृतज्ञता भाव मन में कैसे उपजता? अपनी हकीकत एक बार फिर कैसे याद आ पाती?

शासक अपनी विफलता की जिम्मेदारी जब अपने नागरिकों पर डालता है तो वह चिदम्बरम हो जाता है। सुनता आया था कि वे अच्छे अर्थशास्त्री हैं किन्तु  अब सन्देह हो रहा है। अब तो  उनके  ‘विवेकवान, सभ्य, शालीन’ होने पर भी सन्देह हो रहा है। भारत का मध्यवर्ग ही भारत की ताकत है। मध्यमवर्गीयों की इतनी बड़ी तादाद दुनिया के और किसी देश में नहीं। इसी मध्यमवर्ग ने सारी दुनिया को भारत के प्रति आकर्षित किया है, ललचाया है। भारत दुनिया का सबसे बाजार यदि बना है तो इसी मध्यमवर्ग कारण।

यह चिदम्बरम का दुर्भाग्य ही है कि वे चाहकर भी इस मध्यमवर्ग को देश निकाला नहीं दे सकते, अपने लिए अनुकूल नागरिक आयात नहीं कर सकते। जाना होगा तो चिदम्बरम को ही जाना होगा।

चिदम्बरमजी! आपने (ऐसे में कोई गरीब ही आपको ‘आप’ कह सकेगा। किसी अमीरजादे का मजाक उड़ाया होता तो वह ‘ऐ! चिदम्बरम’ कहता) गरीब और गरीबों का मजाक उड़ाने की अक्षम्य मूर्खता की है, ईश्वर के प्रति अपराध किया है।

हाँ! एक बात याद रखिएगा। यह गरीबों का अमीर देश है। गरीब ही इसकी परिसम्पत्तियाँ और सम्‍पदा हैं। आपकी अमीरी और यह ‘गुस्ताख अदा’ बनी रहे, इसके लिए गरीबों का बना रहना अनिवार्य और अपरिहार्य है। इसलिए, गरीबों की चिन्ता करना सीखिए। कोशिश कीजिए कि गरीब प्रसन्नतापूर्वक जी सकें। याद रखिए - गरीब के पास खोने के लिए अपनी गरीबी के सिवाय और कुछ नहीं है। यह भी याद रखिए कि भूखा आदमी कोई भी अपराध कर सकता है - यह हमारे धर्मशास्त्र कहते भी हैं और ऐसा करने को सहज स्वाभाविक भी मानते हैं।

आपकी शिक्षा-दीक्षा विदेश में हुई है। भारतीय साहित्य-वाहित्य की जानकारी तो आपको होगी नहीं। इसलिए तुलसी का एक दोहा लिख रहा हूँ। इसे लिखवा कर अपने टेबल के काँच के नीचे लगवा लीजिएगा -

तुलसी हाय गरीब की, कबहुँ व्यर्थ न जाय।
मरी खाल की स्वाँस से, लौह भसम हुई जाय।।

आप मेरे नहीं, ईश्वर के अपराधी हैं। मैं, एक जन्मना भिखारी, ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ आपको सद्बुद्धि दे और इस देश के असंख्य गरीबों की ओर से, आपको क्षमा करता हूँ।

आपके लिए इससे अधिक कठोर और उपयुक्त कोई और सजा मुझे इस समय नहीं सूझ रही।

(आज इण्‍टरनेट सेवाऍं देर तक बाधित रहीं इसीलिए पोस्‍ट देर से प्रकाशित हुई।)


अनिर्णय : सरोजकुमार

अलग-अलग पाँवों की
अलग-अलग पगडण्डी,
इस पर मैं निकल पड़ूँ
या उस पर हो लूँ?

अलग-अलग आँखों का
अलग-अलग सुख-सपना,
किसको मैं बन्द रखूँ
किसको मैं खोलूँ?


अलग-अलग पर्दों के
अलग-अलग कान हैं,
इधर फुसफुसा दूँ मैं
या उधर बोलूँ?


अलग-अलग हाथों में
अलग-अलग पलड़े हैं,
इस पर बिठाऊँ तुम्हें
या उस पर तौलूँ?

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर)  में  साहित्य  सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

पनघट की कठिन डगर

मुझे आपकी मदद चाहिए।

हर बात के कम से कम दो पक्ष तो होते ही हैं। सबकी अपनी-अपनी नजर होती है और सबको अपनी नजर ही सही लगती है। ‘उन’ दोनों के साथ भी यही स्थिति है। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। दोनों ने मुझे  ‘पंच’ बना दिया है। बोले हैं - ‘आप ही फैसला करो।’ कहा ही नहीं, हिदायत (जो मुझे ‘धमकी’ लगी) भी दी - ‘बीच का रास्ता मत बताईएगा। साफ-साफ बताईएगा कि हम दोनों में से कौन सही है।’

‘दोनों’ याने पति-पत्नी। उनसे मेरा, रोज का मिलना। पारिवारिक स्तर पर। किसी एक को सही बताने का मतलब, किसी न किसी की नाराजी मोल लेना और दीर्घावधि के लिए न सही, अल्पावधि के लिए तो किसी एक की ‘कुट्टी’, निष्कासन झेलना और ‘सत्संग’ से वंचित रहना। मेरी कठिनाई यह कि मिलना-जुलना मुझे ऊर्जा देता है, बतरस मेरी जिन्दगी है और अड्डेबाजी एक मात्र व्यसन। याने, इस मामले में मुझे ‘कुछ न कुछ’ तो खोना ही है।
इसीलिए मुझे आपकी मदद चाहिए।


एक बेटे, एक बेटी के माता-पिता, यह दम्पति अपनी बेटी के विवाह को लेकर असहमत हैं। नहीं, विवाह करने को लेकर नहीं, रिश्ता कहाँ तय किया जाए - यह मुद्दा है। ‘कहाँ’ से मतलब गाँव का गाँव में ही या किसी दूसरे गाँव में। जिस जाति-समाज से सम्बद्ध यह दम्पति है, उसमें, गाँव के गाँव में ही विवाह करने का मानो चलन बन गया है। इस जाति-समाज के लगभग अस्सी प्रतिशत रिश्ते, गाँव के गाँव में ही हैं। सुना है कि एक परिवार ने तो 6 पीढ़ियों के बाद, पहली बार गाँव से बाहर रिश्ता किया। सो, पत्नी का कहना है कि एक ही लड़की है, गाँव में ही पचासों उपयुक्त वर हैं, गाँव में ही रिश्ता कर लेना चाहिए। लड़की चौबीसों घण्टे, बारहों महीने, नजर के सामने रहेगी। मिलने को तरसना नहीं पड़ेगा।

पति का सोचना एकदम विपरीत है।  कहता है - गाँव के गाँव में रिश्तों की कदर नहीं होती। सम्बन्धों की ऊष्मा क्षण भर भी अनुभव नहीं होती। महत्व भी अनुभव नहीं होता। प्रतीक्षा और मनुहार जैसी बातें तो ध्यान में ही नहीं रह पातीं। सब कुछ नीरस और बोझिल खानापूर्ति बन कर रह जाता है। दामाद, दामाद न रह कर रास्ते चलता आदमी नजर आने लगता है। सुसर-दामाद एक ही व्यापार में हुए और संयोगवश एक ही बाजार में आमने-सामने के दुकानदार हो गए तो न चाहते हुए भी प्रतियोगिता भाव मन में आएगा और उससे जुड़ी खिन्नता अपने आप चली आएगी।


पति का कहना है कि दामाद को दामाद का और समधी को समधी का सम्मान मिलना चाहिए। कोई आए तो लगना चाहिए कि कोई आया है। उसके आने की प्रतीक्षा का अपना आनन्द होता है। पति का निश्चित मत है कि सम्बन्धों की मधुरता, आनन्द और परस्पर मान-सम्मान के लिए ‘दूरी’ अनिवार्य है। वह मालवी कहावत उद्धृत करता है - ‘डूँगर दूर ती रण्यावरा लागे।’ याने, पर्वत दूर से ही सुन्दर/नयनाभिराम/मनोहारी लगते हैं। कहता है - ढोल भी दूर के ही सुहावने लगते हैं। अड़ा हुआ है - ‘छोरी को भले ही नामली, धराड़ (रतलाम से क्रमशः 12 और 10 किलोमीटर दूर) दे दूँगा लेकिन गाँव की गाँव में नहीं दूँगा।’ दामाद बेशक बेटे की तरह होता है किन्तु दामाद आए तो पूरे परिवार को लगना चाहिए कि दामाद आया है। राखी पर बेटी के आने की प्रतीक्षा का सुख और आनन्द तभी भोगा जा सकता है जब वह गाँव से बाहर हो। यह क्या कि शाम को, ऐन मुहूर्त के मौके पर आई, राखी बाँधी और चली गई! कहता है - ‘मेरा समधी आए या मैं समधी के यहाँ जाऊँ तो लगना तो चाहिए कि समधियाने में आना-जाना हो रहा है! यह क्या कि रास्ते चलते समधी की दुकान पर बैठ कर चाय पी ली या उसे पिला दी? दूरी से इज्जत और प्रेम बना रहता है। वर्ना गाँव का दामाद तो घर-जमाई जैसा लगता है जिसकी कदर कुत्ते से ज्यादा नहीं होती।’


उधर माँ है जो अपनी इकलौती बेटी को आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहती। कहती है - ‘बेटे को आँखें फेरते देर नहीं लगती। जमाने भर को देख लो! मुश्किल में बेटियाँ ही माँ-बाप की सेवा कर रही हैं। छोरी को गाँव में देंगे तो बुढ़ापा बिगड़ेगा नहीं।’


ऐसे ‘हठीलों’ ने मुझे पंच बना दिया है। मैं दोनों में से किसी की नाराजी मोल लेना नहीं चाहता जबकि जानता हूँ कि बिना खोए, कुछ पाया नहीं जाता।


मेरी बौद्धिकता, सयानापन, वरिष्ठता, परिपक्वता, अनुभव - सबने घुटने टेक दिए हैं। ईश्वर की अकृपा से मैं ‘बेटी का बाप’ नहीं बन पाया। सो, कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरा सोच अपने आप में अधूरा और एक पक्षीय ही है।


सूझ नहीं रहा कि क्या करूँ? ‘अश्वत्थामा हतो’ कहने की न तो स्थिति है न ही गुंजाइश। मुझे दो टूक फैसला सुनाना है। 


इसीलिए आपकी मदद चाहिए।


मदद करेंगे ना?

याद आना याद आया : सरोजकुमार

फिर तुम्हारी याद आई
और पहले का तुम्हारा
याद आना
याद आया!


खिड़कियों से, गन्ध
बह आना अलग है,
और चम्पा खोंस
साँसों में रखा जाना अलग है!


फिर तुम्हारी गन्ध आई
और पहले का तुम्हारा
पास आना
याद आया!


अब नहीं वह बात
सब कुछ यथावत-सा
कि जैसे
कुछ नहीं हो!


बुझ गया मन आँख रोई
और पहले का तुम्हें
रह-रह मनाना
याद आया!

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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर)  में  साहित्य  सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

सच और केवल सच ही कहा

5 जुलाई वाली अपनी यह पोस्ट प्रकाशित करते समय ही इसके अधूरेपन का अहसास मन में था। इसमें, वकील साहब बाबूलालजी जैन का उल्लेख तो था किन्तु न तो उनका चित्र था और न ही उनका कोई सम्पर्क सन्दर्भ।  ऐसे में, इस पोस्ट की विश्वसनीयता संदिग्ध होनी ही थी। चूँकि (जैसाकि मैंने पोस्ट में उल्लेख किया था) बाबूलालजी जैन साहब से मेरा जीवन्त सम्पर्क नहीं था इसलिए, मेरे पास न तो उनका मोबाइल नम्बर था और न ही उनका चित्र। ऐसे में, इन दोनों कमियों के साथ ही पोस्ट प्रकाशित कर दी।

किन्तु धन्यवाद अनामिकाजी को जिन्होंने अपनी टिप्पणी के जरिए न केवल इस अधूरेपन को इंगित किया अपितु उनकी इस टिप्पणी के कारण ही मैं, अपनी उस पोस्ट का अधूरापन दूर कर पा रहा हूँ। मैंने, जैसे-तैसे बाबूलालजी जैन वकील साहब से सम्पर्क कर मदद माँगी। परिणाम सामने है। उनका का चित्र तो यहाँ दे ही रहा हूँ, उनका मोबाइल नम्बर भी प्रस्तुत है - 094254 91063.

अपना चित्र और मोबाइल नम्बर उपलब्ध कराते हुए वकील साहब ने अपनी एक पीड़ा और लिख भेजी है। उन्हें इस बात का तो दुःख है ही कि अपने ही लोग उनका साथ नहीं दे रहे। इससे अधिक दुःख उन्हें इस बात का है कि लोग उन्हें समझाइश दे रहे हैं कि उन्हें यह सब करने की क्या जरूरत थी और क्यों उन्होंने (वकील साहब ने) बैठे-बैठाए पत्थर फेंक कर माथा माँड लिया? वकील साहब की पीड़ा उनके इस वाक्य से समझा जी सकती है  - ‘यदि गाँधी ने भी यही सोचा होता तो हम आज भी गुलाम ही होते।’

मेरा अनुरोध है कि मेरी पोस्ट की विश्वासनीयता की पुष्टि के लिए नहीं, वकील साहब का मनोबल बढ़ाने के लिए उनसे एक बार सम्पर्क करने के बारे में विचार अवश्य करें।

इस बहाने एक बात और।

केवल यह पोस्ट ही नहीं, विभिन्न टेगों के अन्तर्गत प्रकाशित मेरी तमाम पोस्टें सौ टका सच हैं। सारी घटनाएँ, उनका विवरण  और उनका क्रम - सब कुछ जस का तस, सच है। भाषा का, शब्दों का और वाक्यावली का फेर हो सकता किन्तु एक भी पोस्ट काल्पनकि या कि ‘गल्प कथा’ बिलकुल नहीं है। मैंने सच और केवल सच ही प्रस्तुत किया है। बीमा एजेन्सी के कारण मुझे, समाज के तमाम वर्गों, श्रेणियों के लोगों से सम्पर्क करना पड़ता है। उसी वजह से मैं जीवन के इन्द्रधनुष के रंगों को साकार करने वाले संस्मरणों से समृद्ध हो पाया हूँ।

हाँ, एक सावधानी मैंने अवश्य बरती है। प्रेरक और प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय प्रसंगों में मैंने संस्मरण के नायक का वास्तविक नाम तो दिया ही है, उनके चित्र और सम्पर्क सन्दर्भ भी देने की पूरी-पूरी कोशिश की है। लेकिन ऐसा भी हुआ है कि ऐसे कुछ प्रेरक और प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय प्रसंगों के नायकों के नाम मुझे, उनके विशेष अनुरोधों के कारण छुपाने पड़े। किन्तु जिन सस्मरणों में नायकों की आलोचना या निन्दा होने की आशंका अनुभव हुई, वहाँ उनकी पहचान छुपा दी। अपनी बात की सम्प्रेषणीयता की चिन्ता करते हुए, मैं परिहास तो कर लेता हूँ किन्तु कोशिश करता हूँ कि किसी का उपहास न हो। मेरा मानना है कि उपहास और अवमानना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों की विभाजन रेखा बहुत ही धुंधली है। उपहास के अवमानना में बदल जाने का खतरा बराबर बना रहता है और यह मेरी न्यूनतम जिम्मेदारी बनती है कि यदि मैं किसी का सम्मान बनाए नहीं रख सकता, बढ़ा नहीं सकता तो किसी का असम्मान भी नहीं होना चाहिए। किसी की अवमानना/असम्मान कर मैं अपना मान कैसे बढ़ा सकता हूँ? अवमानना बो कर मान की फसल कैसे काट सकता हूँ?

सो, अनामिकाजी को पुन: धन्यवाद कि उन्होंने न केवल मेरी उस पोस्ट का अधूरापन दूर करने में मेरी मदद की अपितु अपनी मानसिकता एक बार फिर उजागर करने का अनुपम अवसर भी मुझे दिया।

यही नजर और यही कृपा भाव बना रहे।

अभिलाषा : सरोजकुमार

 प्रभु,
तुम्हें प्रणाम करते हुए
क्या मैं अपने ही सपनों को प्रणाम नहीं करता?


तुम तो शाश्वत हो
पर क्या मैं अनन्त काल
मात्र भक्त बना रहने को अभिशप्त हूँ?
तुम निश्चित ही शाश्वत हो
पर क्या मेरी नियति भी शाश्वत है
जैसा हूँ वैसा ही बने रहने की?


तुम मानो या न मानो प्रभु,
तुम्हें प्रणाम करते हुए
मैं वहाँ नहीं रह जाता
जहाँ प्रणाम के पहले था!
मेरे प्रणाम
तुम्हारी मेरी दूरियाँ कम करते चलते हैं!
और तुम देखना
मैं एक दिन
अपने प्रणामों की ताकत से
तुम्हारे-मेरे फासले कम करते-करते
ठीक तुम्हारे निकट आकर खड़ा हो जाऊँगा!


बताओ, तब भी क्या मुझे
हमेशा की तरह
केवल आशीर्वाद ही दोगे
या गले भी लगा लोगे?
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम्  विश्व  विद्यालय  में प्राध्यापन। म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

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आईए! एक उठावना आयोजित कर लेते हैं

उठावने के लिए जुटे, हम ढाई-तीन सौ लोगों को जमावड़ा, कुल जमा तीन-चार मिनिटों मे ही मन्दिर से शोकग्रस्त घर पहुँच गया तो मुझे हैरत हुई। इसी घर से, इसी मन्दिर तक पहुँचने के लिए हम ढाई-तीन सौ लोगों को पूरे कस्बे में घूम कर, कोई डेड़ किलोमीटर चलना पड़ा था। वापसी में यह दूरी मुश्किल से सौ मीटर रह गई थी। मैंने पूछताछ की तो शोकग्रस्त परिवार के एक शुभचिन्तक ने कहा - ‘हमारा दुःख कम करने के लिए आप हमारे यहाँ पधारे हैं, यह हमें तो मालूम है लेकिन गाँववालों को तो मालूम नहीं! उन्हें भी तो हमार व्यवहार मालूम होना चाहिए! इसीलिए ऐसा करना पड़ा।’ गोया, उठावना, मृत्योपरान्त की महत्वपूर्ण उत्तरक्रिया से अलग हटकर, आगे बढ़कर, ‘कुछ और’ भी है जो ‘शोक भाव’ को परे धकेल कर ‘कुछ और’ करने को उकसाता है। यह जानकारी मेरे लिए यह ‘ज्ञान प्राप्ति’ से कम नहीं थी।

बात भेजे में घुसी तो मानो घुस कर ही रह गई। कुछ इस तरह कि निकलने को तैयार ही नहीं। अब जब निकल नहीं रही तो कुलबुलाएगी तो सही! सो, इसी कुलबुलाहट के चलते एक के बाद एक, उठावने और उनसे जुड़ी बातें याद आने लगीं। इतनी तेजी से कि पहली आकर निकले उससे पहले दूसरी उसे धक्का देकर घुसने के लिए मचलने लगे। कुछ ऐसी भीड़भाड़ होने लगी, ऐसा कोहराम मचने लगा जैसे बावलों के गाँव में ऊँट घुस आया हो। स्थिति यह हो गई कि जिस उठावने में बैठा था, वहाँ बैठकर भी वहाँ नहीं था। एक उठावने में बैठे-बैठे अनेक उठावनों में बैठता जा रहा था।

याद आया, जगत भाई को बीमा के कुछ कागज पहुँचाने थे। सोचा, जाने से पहले पूछ लूँ कि कहीं बाहर तो नहीं? फोन किया तो बोले - ‘हूँ तो यहीं लेकिन हनुमान रुण्डी जा रहा हूँ, एक उठावने में।’ मैंने कहा - ‘वहाँ तो मुझे भी जाना है।’ जगत भाई सहज भाव से बोले - ‘तो फिर परेशान क्यों होते हैं? कागज साथ लेते आईएगा। वहीं ले लूँगा।’ और उठावने के जरिए हम दोनों का एक-एक काम निपट गया।

ऐसा तो एकाधिक बार हुआ जब साथ चल रहे सज्जन ने पूछा - ‘आजकल नजर नहीं आ रहे! क्या चल रहा है?’ मेरा जवाब होता - ‘कहाँ जाऊँगा? यहीं हूँ। चलने के नाम पर बस, बीमा चल रहा है।’ सज्जन बोले - ‘अरे हाँ, याद आया। थोड़ी फुरसत निकाल कर शाम को घर आईए। टैक्स प्लानिंग को लेकर कुछ इंश्योरेन्स की बात करनी है।’ अब याद आ रहा है कि जब-जब भी ऐसी बात हुई, हर बार बीमा मिला।

उठावने में शामिल लोगों की मुख मुद्राएँ और उनका व्यवहार देखा तो हर बार किन्तु कभी ध्यान नहीं दिया। अब सब, तनिक अतिरिक्त रूप से याद आ रहा है। घर से मन्दिर जाते हुए और मन्दिर से घर लौटते हुए, सबसे आगे चल रहे, शोक संतप्त परिजनों के और उनके साथ चल रहे कुछ लोगों के चेहरे गमगीन और धीर-गम्भीर नजर आते हैं। किन्तु जमावड़े के अन्तिम छोर का नजारा सर्वथा विपरीत होता है। अन्तिम छोर बने हुए लोगों का व्यवहार और सम्वाद देख/सुन कर लगता है मानो कोई ‘चुटकुला सम्मेलन’ या ‘चुटकुला प्रतियोगिता’ चल रही हो। जमावड़े का पहला छोर यदि शोकग्रस्त होता है तो अन्तिम छोर ‘हर्षोल्लासपूर्वक उठावने में भाग लिया’ जैसा लगता है।

एक उठावने में ‘लिफ्ट’ लेकर गया। लौटते में ‘लिफ्ट’ देनेवाले ने कहा - ‘भैयाजी! दस मिनिट रुकना पड़ेगा।’ मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी। मुझे लेकर वे एक दुकान पर पहुँचे जहाँ पहले से ही आठ-दस सज्जन बैठे हुए थे। वे सब भी उसी उठावने से लौटे थे। सबके सब निश्चिन्त भाव से बतरस में लगे थे। थोड़ी ही देर में, अखबार में बँधी कचौरियाँ लिए एक सज्जन पहुँचे। वे भी इसी उठावने में शामिल थे। उन्होंने अखबार खोला और एक के बाद एक, सबके सामने कचौरियाँ बढ़ाने लगे। कचौरियाँ ‘गरमागरम’ थीं - ऐसी और इतनी मानो कढ़ाई में से सीधे अखबार में डाल दी गई हों। एक-एक करके सबने कचौरियाँ लीं और सहज भाव से खाने लगे। कचौरियाँ लानेवाले से एक ने पूछा - ‘देर कैसे हो गई?’ लानेवाले ने कहा - ‘आज भीड़ ज्यादा थी। नम्बर देर से आया।’ मुझे कुछ भी समझ नहीं पड़ा। पूछा तो मालूम हुआ कि जब-जब भी चौमुखी पुल या हनुमान रुण्डी पर कोई उठावना होता है तो आठ-दस लोगों का यह समूह हर बार, इसी तरह ‘कारू मामा की प्रसिद्ध कचौरी’ खाकर ही लौटता है। लौटते में, सब कहाँ रुकेंगे, कौन कचौरियाँ लाएगा - सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है। किसी को कुछ भी कहना-पूछना नहीं पड़ता। ‘कचोरी सेवन’ को किसी उठावने की उत्तरक्रिया का हिस्सा बनते मैंने पहली बार देखा। हाँ, मैंने भी कचौरी खाई।

इसी तरह ‘लिफ्ट’ लेकर लौटते हुए, एक बार और रुकना पड़ा था। यहाँ भी, आठ-दस लोग बैठे थे। चाय-पान चल रहा था। मालूम हुआ, प्रत्येक उठावने के बाद यह समूह उठावने की समीक्षा करता है। कस्बे के प्रमुख/अग्रणी लोगों में से कौन शामिल हुआ, कौन नहीं। कोई नहीं आया तो क्यों नहीं आया और आया तो अकेला आया या किसी को साथ लेकर आया। साथ लाए आदमी के हिसाब से अर्थ, निहितार्थ, अन्यार्थ तलाशे जाते हैं और मेरे कस्बे की राजनितिक भविष्यवाणियाँ की जाती हैं। और हैरत की बात यह कि अधिकांश भविष्यवाणियाँ सच ही होती हैं।

एक सज्जन ने अपनी माँ का उठावना, सैलानावालों की हवेली (मोहन टॉकीज) में किया। खूब बड़ा सभागार है यहाँ। पूरा सभागार खचाखच भर गया। इन सज्जन ने व्यावहारिकता बरती और मन्दिर जाने-आने की परम्परा तोड़कर, वहीं शान्ति-पाठ करवा कर उठावने का समापन कर दिया। सबने राहत की साँस ली। समीक्षकों ने खूब तारीफ की। कहा, इनका मन्दिर दूर था, जाते तो सबको तकलीफ होती, बाजार में ट्राफिक जाम होता, जिनका उठावने से कोई लेना-देना नहीं, वे लोग भी परेशान होते। याने,  कुल मिलाकर प्रशंसनीय निर्णय घोषित किया गया। किन्तु समीक्षकों में से एक ने कहा - ‘यार! बाकी सारी बातें तो ठीक हैं लेकिन कुछ भी कहो, उठावने का मजा नहीं आया।’

हमारे विधायक ‘निर्दलीय’ हैं। 2008 के विधान सभा चुनावों से, दो-एक साल पहले से उन्होंने मेरे कस्बे के लगभग शत प्रतिशत दाह संस्कारों और उठावनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कुछ इस तरह मानो प्रत्येक मृत्यु, प्रत्येक उठावना इनके घर से ही जुड़ा हो। लोग भी जानते थे और अन्तरंग हलकों में वे खुद भी कबूल करते थे कि यह सब ‘विधान सभा की तैयारी’ है। तब लोग उन पर हँसते थे और मजाक उड़ाते थे। चुनाव परिणाम इनके पक्ष में रहा। अब उनके कार्यकाल का चौथा साल चल रहा है और लोग कहते हैं - ‘मरे हुओं ने इन्हें राजनीतिक जीवन दे दिया।’

अब यह भी याद आ रहा है कि मेरे कई महत्वपूर्ण कामों के लिए मुझे जिन लोगों से मिलना था, उन्होंने मुझे उठावनों में ही ‘अप्वाइण्टमेण्ट’ दिए थे और मेरे काम सलटाए थे।

तय नहीं कर पा रहा हूँ कि उठावने को क्या मानूँ? यह तो तय है कि यह रस्म अब, मृत्योपरान्त की महत्वपूर्ण उत्तरक्रिया से अलग हटकर, ‘कुछ और’ भी है। कभी यह शोक संतप्त परिवार का ‘प्रतिष्ठा प्रतीक’ (स्टेटस सिम्बॉल) हो सकता है तो बाकी लोगों के लिए यह ‘सामुदायकि मिलन आयोजन’ भी लगने लगता है जहाँ लोग अपनी खुशियाँ बाँटते हैं, अपनी समस्याओं के निदान हासिल करते हैं, पूरे कस्बे का मिजाज भाँपकर भविष्यवाणियाँ करते हैं, नए व्यापार-धन्धे की योजनाएँ बनाते हैं।

यहाँ तक आते-आते अचानक ही मन में बात आ गई - ऐसा न हो कि जिन्दगी को  खिलन्दड़पने से जीनेवाले किसी जिन्दादिल मित्र का सन्देश मिले - ‘बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई है। आओ! यार! एक उठावना आयोजित कर लेते हैं।’

स्वाति दर्शन : सरोजकुमार

कागज तो ऐसा चौराहा है
जहाँ कलम से, किसने
क्या-क्या नहीं चाहा है!

पर कविता फरमाइशी लेखन नहीं है
और अगर है भी
तो सिर्फ मेरा!


जैसा मुझे दिखा,
वैसा मैंने लिखा!
जैसा मुझे सूझा,
वैसा मैंने बूझा!


स्वाति के बादल को
क्या फर्क पड़ता है-
बूँद सीपी में गिरे
या गटर में!


व्यवस्था की जिम्‍मेदारी म्युनिसिपैलिटी की है!

मुझसे जब टकराईं हकीकतें
मैंने उन्हें शब्दों में गा दिया!

अब मेरे शब्दों को दुहरा कर
चाहे वेश्याएँ
पटाएँ अपने ग्राहक
चाहे देवांगनाएँ रिझाएँ
अपने प्रभु को!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन।    म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

उन्‍होंने अण्‍णा का ईलाज कर दिया

यमुना ब्रिज-रतलाम यात्री गाड़ी से रतलाम आने के जिए मैं नीमच रेल्वे स्टेशन पर खड़ा था। गाड़ी आई। एक स्लीपर डिब्बे के सामने पहुँच, कोच-कण्डक्टर से बैठने की जगह माँगी। उसने कहा - ‘साठ रुपये लगेंगे। रसीद बनेगी।’ यह शर्त मेरे मनोनुकूल थी। ना करने का सवाल ही नहीं था। कण्डक्टर ने कहा - ‘कहीं भी बैठ जाईए। मैं मन्दसौर में आकर रसीद बना दूँगा।’ लगभग पूरा डिब्बा खाली था। मैंने खिड़कीवाली एक सीट पर अपना झोला फैला दिया।

मन्दसौर में कई लोग डिब्बे में चढ़े। तीन लोग मेरे वाले खाँचे (कूपे) में आकर बैठ गए। उनकी बातों ने पहले ही क्षण जता दिया कि वे, सरकारी विभागों से जुड़े, या तो ठकेदार थे या सप्लायर। सरकारी अधिकारियों और बाबुओं की रिश्वतखोरी को लेकर वे उनकी आलोचना भी कर रहे थे और परस्पर परिहास भी। उनकी बातों का निष्कर्ष था कि तमाम सरकारी अधिकारी और बाबू ‘बिकाऊ’ हैं जिनका मूल्य चुका कर उनसे कोई भी काम कराया जा सकता है। उनमें से एक, झबरीली मूँछोंवाला, शायद किसी अधिकारी या कर्मचारी से तनिक अधिक परेशान था। उसका, मोटी रकम का बिल अटक गया था। उसने गुस्से से कहा - ‘स्साले! इन्हें बिलकुल ही शरम नहीं आती। नाजायज पैसा ऐसे माँगते हैं जैसे इनके बाप का माल हो। दीमक की तरह देश को चूस रहे हैं। अण्णा हजारे को आने दो। सबका ईलाज हो जाएगा।’ उसके दोनों साथियों ने उससे सहमति भी जताई और सहानुभूति भी।

गाड़ी सरकी ही थी कि कोच-कण्डक्टर आ गया। सबसे पहले मेरे पास आकर मेरी रसीद बनाई और उन तीनों की तरफ मुड़ा। तीनों ने बीस-बीस रुपये उसकी ओर बढ़ा दिए जो उन्होंने, कण्डक्टर के आते ही अपनी-अपनी जेब से निकाल लिए थे। कण्डक्टर ने कहा - ‘यह क्या है?’ झबरीली मूँछोंवाला खुलकर मुस्कुराते हुए बोला - ‘आपका सेवा शुल्क।’ मेरी ओर इशारा करते हुए कण्डक्टर उनसे बोला - ‘अभी आपने देखा नहीं? इन साहब की, साठ रुपयों की रसीद बनाई है।’ जवाब आया - ‘हाँ। देखा। तो?’ कण्डक्टर ने जवाब दिया - ‘तो क्या? आप भी साठ-साठ रुपये निकालिए। रसीद बनेगी।’ इस बार दूसरा बोला - ‘आज सवेरे ही तो बीस-बीस रुपये देकर आए हैं!’ कण्डक्टर ने कहा - ‘सुबह आपने किसके साथ क्या किया, आप जानो। मैं अपनी बात कर रहा हूँ। साठ-साठ रुपये निकालिए और रसीद बनवा लीजिए वर्ना पाँच-पाँच सौ रुपयों का फाइन भी भरना पड़ जाएगा।’ सुनकर तीनों सहम गए। सौ रुपयों का नोट बढ़ाते हुए, इस बार तीसरा बोला - ‘चलिए! न आपकी और न हमारी। यह रखिए।’ कण्डक्टर ने घूर कर, तनिक कठोरता से कहा - ‘आपको बात समझ में नहीं आ रही? रसीद बनेगी। बस।’ तीनों तनिक अधिक सहम गए। कुछ क्षणों के मौन के बाद झबरीली मूँछोंवाला मन्द स्वरों में ऐसे बोला जैसे मिमिया रहा हो - ‘चलिए! आप खुश हो जाईए। दो की रसीद बना दीजिए।’ कह कर उसने, तीसरे के हाथ से सौ का नोट लिया और अपनेवाले बीस रुपयों के नोट के साथ, एक सौ बीस रुपये कण्डक्टर की ओर बढ़ा दिए। कण्डक्टर ने नोट लिए, जेब में रखे और आगे बढ़ने लगा। झबरीली मूँछोंवाले ने कहा - ‘रसीद?’ कण्डक्टर ने उसकी ओर देखे बिना, लापरवाही से जवाब दिया - ‘रसीद तो तीनों की बनेगी। बोलो! बनाऊँ?’ झबरीली मूँछोंवाला मानो सकते में आ गया। कोई जवाब देते नहीं बना। कण्डक्टर ने एक  पल प्रतीक्षा की और तीनों की चुप्पी  अपनी पीठ पर लादे आगे बढ़ गया। जब वह हमारेवाले खाँचे (कूपे) से तीसरेवाले खाँचे में में चला गया, इतनी दूर कि यहाँ की बात वहाँ सुनाई न दे, तो झबरीली मूँछोंवाला आपे से बाहर हो गया। भुनभुनाते हुए बोला - ‘स्साला। भ्रष्ट। देखा? एक सौ बीस रुपये जेब में रखते हुए और रसीद बनाने से इंकार करते हुए उसके चेहरे कहीं शरम नजर आई? रुपये जेब में ऐसे रख लिए जैसे उसके बाप का माल हो।’ उसके दोनों साथी, उससे पहले ही उससे सहमत थे। तीनों के तीनों गुस्से में भी थे और हतप्रभ भी। उन्हें लग रहा था कि कण्डक्टर उन्हें बेवकूफ बना गया है। उन्हें कुछ भी समझ नहीं पड़ रहा था। तीनों ही, कसमसाते हुए चुप हो गए थे।

गाड़ी जावरा पहुँची तो भीड़ का रेला डिब्बे में चढ़ आया। कोई सीट खाली नहीं रह गई थी। गाड़ी चली तो झबरीली मूँछोंवाला ऊँचा-नीचा होने लगा। उसे असहज देख दूसरे ने पूछा - ‘क्या बात है? क्या हुआ?’ झबरीली मूँछोंवाला बोला - ‘कण्डक्टर को देख रहा हूँ। देखता हूँ, किस-किसकी रसीद बनाता है? नहीं बनाता है तो परेड ले लूँगा स्साले की। अपन ही मिले थे भ्रष्टाचार की वसूली के लिए?’ दूसरा उससे तनिक अधिक समझदार निकला। हँसकर बोला - ‘अपन भी तो बीस-बीस रुपयों की बेईमानी करके बैठे हुए हैं। तुझे बुरा इस बात का लग रहा है कि तेरे हिसाब से उसने अपने से बीस-बीस रुपये ज्यादा ले लिए। चुपचाप बैठा रह वर्ना सबकी रसीद बनवाने के चक्कर में अभी साठ रुपये और लग जाएँगे।’ झबरीली मूँछोंवाले को बात तो समझ में आ गई, वह चुप भी हो गया किन्तु उसका गुस्सा कम नहीं हो रहा था। वह बार-बार गर्दन घुमा-घुमा कर कोच-कण्डक्टर को तलाश करता रहा।

गाड़ी ने रतलाम से ठीक पहलेवाला स्टेशन, धौंसवास पार किया और फिर भी कोच-कण्डक्टर नहीं आया तो झबरीली मूँछोंवाले का धैर्य छूट गया। अपना दाँव (बारी) आते ही खेल खत्म हो जाने की घोषणा सुनकर कोई बच्चा जिस तरह से चिल्लाता और झल्लाता है, बिलकुल उसी तरह, झबरीली मूँछोंवाला मानो चित्कार उठा - ‘अपन तीनों के तीनों बड़े शाणे (सयाने/चतुर) बनते हैं लेकिन हैं गधे। अरे! थोड़ी देर और उस भ्रष्ट कण्डक्टर को बहलाते रहते तो जावरा आ जाता और फिर उसके बाप की हिम्मत नहीं होती अपने से पैसे लेने की। अपन देख ही रहे हैं कि जावरा से पूरा डिब्बा स्लीपर से जनरल कोच बन गया है। वह किस-किस से पैसे लेता? सब मिल कर उस स्साले की शकल बिगाड़ कर रख देते। ऐसी हालत कर देते उस हरामखोर की कि बाकी जिन्दगी भर रसीद बनाना भूल जाता।’

कुछ ही मिनिटों में गाड़ी रतलाम स्टेशन पहुँची। सब जल्दी-जल्दी उतरने लगे। अपने दोनों साथियों के साथ झबरीली मूँछोंवाला भी उतरा किन्तु इस तरह मानो उसकी दुनिया लुट गई हो या कि उसे सबके सामने मूर्ख साबित कर दिया गया हो।

मैं सबके बाद उतरा। प्लेटफार्म पर पाँव रखते ही मुझे लगा - पता नहीं, अण्णा किस-किसका ईलाज कब करेंगे। फिलहाल तो इन्होंने अण्णा का ईलाज कर दिया।
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माँ : सरोजकुमार

माँ, जिसने मुझे जन्म दिया
मेरे लिए
जरूरत बेजरूरत
मरने को भी तैयार हो
जाएगी
बिना एक पल खोए!



पिता नहीं!

मैं कृति हूँ माँ की
ऐसी चित्र-कृति
जिसमें उँडेल दिए थे उसने
अपने सारे रंग
सारी साँसें, सारे सपने!


पिता तो बस
ईजल रख कर जा चुका था!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन।    म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

लीक पर न चलने के कष्ट

ऐसा क्यों होता है कि बात नई न होने पर भी कचोटती, ध्यानाकर्षित करती है? यह बात का प्रभाव है या अनदेखी न करने की आदत का दुःख? पता नहीं। किन्तु हर बार की तरह ही, बात बहुत छोटी तो है ही, कचोटनेवाली और ध्यानाकर्षित करनेवाली भी है ही।

रविवार, 24 जून को मैं अवधेशजी के घर बैठा था। वे एक शासकीय विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं। हम दोनों बातों में मगन थे कि किसीने दरवाजा खटखटाया। अवधेशजी ने हाँक लगाई - ‘दरवाजा  खुला है। आ जाईए।’ दरवाजा खुला। एक सज्जन अन्दर आए। हम दोनों को देखकर तय नहीं कर पाए कि गृहस्वामी कौन है। सो, नमस्कार किया और कहा - ‘मुझे अवधेश सर से मिलना है। बात करनी है।’ अवधेशजी ने उन्हें सादर खाली कुर्सी पर बैठाया और कहा - ‘मैं अवधेश हूँ। कहिए?’ मेरी उपस्थिति आगन्तुक को असहज करती लगी। अवधेशजी ने कहा - ‘ये अपनेवाले ही हैं। कहिए! क्या बात करनी है?’

कुछ ‘कहने‘ के बजाय आगन्तुक ने ‘पूछा’ - ‘सर! आपके स्कूल में लेट्रीन बनवाने के लिए 45 हजार का अलॉटमेण्ट आया है। आप कब बनवा रहे हैं?’ अवधेशजी चौंके। बोले - ‘आपको कैसे मालूम? आप कौन हैं?’ आगन्तुक ने बताया कि वह सरकारी ठेकेदार है और उसे केवल अवधेशजी के स्कूल के ही नहीं, नगर के तमाम स्कूलों के आबण्टन की जानकारी है। उसने यह भी बताया कि ऐसे काम करने में वह ‘एक्सपर्ट’ है और उसके काम से आज तक कोई ‘नाराज’ नहीं हुआ है। यदि अवधेशजी उसे ‘सेवा’ का मौका देंगे तो वह सबको साध लेगा और अवधेशजी को भी नाराज होने का मौका नहीं देगा।

ठेकेदार की बात सुनकर मुझे उस पर दया आ गई। वह अवधेशजी को जानता होता तो यह ‘मूर्खता’ कदापि नहीं करता। मैं साँस रोक कर किसी ‘अनहोनी’ के घटित होने की प्रतीक्षा करने लगा। किन्तु इस बार अवधेशजी ने मुझे निराश कर दिया। हँसते हुए बोले - ‘यार! ठेकेदारजी! जितना काम होना है, वह इन 45 हजार में होगा नहीं। जब ये 45 हजार मूल काम में ही कम पड़ रहे हैं तो आप शौचालय बनाने के साथ, सबको ‘खुश’ कैसे कर लेंगे?’ ठेकेदारजी ने सहजता से कहा - ‘वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए सर। सब हो जाएगा। इसी बात के तो पैसे लेते हैं हम लोग!’ अवधेशजी को अब शायद मजा आने लगा था। बोले - ‘जरा खुलकर समझाओ यार!’ अवधेशजी की जिज्ञासा शान्त करते हुए ठेकेदार ने पूरा हिसाब बता दिया जिसमें अवधेशजी से लेकर, निरीक्षण करने और वित्तीय स्वीकृती देने तक की पूरी श्रृंखला के अधिकारियों/कर्मचारियों के ‘परसेण्टेज’ का खुलासा था। सुनकर अवधेशजी ने पूछा - ‘यार! इतना सब बाँट दोगे तो बननेवाला शौचालय कितने दिन चलेगा?’ ठेकेदार ने ‘सहज लापरवाही’ से कहा - ‘जितने दिन चलना होगा, चल जाएगा। उसकी फिकर किसी को नहीं करनी है। बस! एक बार बना हुआ नजर आ जाना चाहिए। फायनल इन्स्पेक्शन हुआ और बात खतम।’ अवधेशजी बोले - ‘यार! यह शौचालय तो एक महीना भी नहीं चलेगा। मुझे तो इसके बनने से पहले ही इसकी मरम्मत कराने की तैयारी करनी पड़ेगी।’ ठेकेदार ने अवधेशजी को ढाढस बँधाया - ‘हाँ। वो तो है। लेकिन उसकी फिकर आप क्यों करते हैं। मैं हूँ ना! रिपेयरिंग के लिए आपको अलग से बजट मिल जाएगा। मेरा तो काम ही यही है। आप एक बार सेवा का मौका तो दीजिए!’

अवधेशजी तनिक असहज हुए। बोले - ‘अभी तो मैंने अलॉटमेण्ट लेटर भी ध्यान से नहीं देखा है। आप अपना मोबाइल नम्बर दे जाइए। मैं आपको बाद में खबर कर दूँगा।’ ठेकेदार को मानो अवधेशजी का जवाब मालूम  था। उसने फौरन अपना विजिटिंग कार्ड दिया और बोला - ‘मैं आपके फोन की राह देखूँगा। लेकिन जरा जल्दी कीजिएगा। बरसात का मौसम आ गया है। काम तेजी से निपटाना पड़ेगा।’

अवधेशजी ने ‘हाँ’ में अपनी मुण्डी हिलाई और नमस्कार कर, ठेकेदार को विदा करने हेतु दरवाजे तक गए। ठेकेदार ने ‘विनयावनत’ मुद्रा में हाथ जोड़कर नमस्कार किया और कहा - ‘सर! एक रिक्वेस्ट है। आपके पास और ठेकेदार भी आएँगे। लेकिन आप याद रखिएगा कि सबसे पहले मैं आया था। आपके काम पर पहला हक मेरा है। आप सेवा का मौका दीजिए। मेरा वादा है कि मुझसे डील करने के बाद आप किसी और को याद नहीं करेंगे।’

ठेकेदार चला गया। मैं अवधेशजी की शकल देख रहा था। वे सबसे अलग, सबसे हटकर हैं। उनकी ‘कार्य शैली’ से उनके तमाम अधिकारी दुखी, अप्रसन्न, क्षुब्ध और तनिक आतंकित भी रहते हैं। वे, ईश्वर आराधना की तरह नौकरी करते हैं। तबादला कल होता हो तो आज हो जाए, लेकिन अनुचित न तो किया और न ही होने दिया। मैंने पूछा - ‘अवधेशजी! क्या करेंगे?’ वे खुलकर हँसे और बोले - ‘आपको कुछ पता नहीं। कुछ बरस पहले मैं अपनी शाला का भवन बनवा चुका हूँ। कागजी कार्रवाई और निर्धारित प्रक्रिया पूरी की। भवन निर्धारित समयावधि में बना। एक पैसा इधर से उधर नहीं जाने दिया। इंजीनीयर ने और दफ्तर के बाबुओं, साहबों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑडिट में पचासों रोड़े अटकाए। लेकिन सबको धूल चटा दी।  मेरे शाला भवन के साथ बने तमाम शाला भवन खण्डहर हो गए हैं लेकिन मेरा शाला भवन वैसा का वैसा खड़ा हुआ है। मरम्मत के नाम पर अब तक एक पैसा भी नहीं लगा। मेरे यहाँ इन्स्पेक्शन के लिए कोई नहीं आता। सब जानते हैं कि क्या पता, पानी भी मिले, न मिले। मेरे यहाँ एक ही काम होता है - पढ़ाई और केवल पढ़ाई।’

वे अपनी रौ में बह रहे थे, मेरी उपस्थिति से बेखबर। मानो छत को भेद कर शून्य में देख रहे हों, कुछ इस तरह देखते हुए बोले - ‘आप देखना! इसी रकम में मैं यह शौचालय भी बनवाऊँगा और ऐसा बनवाऊँगा कि मेरे बच्चों-बच्चियों को जिन्दगी भर का आराम हो जाएगा।’

और इसके बाद अवधेशजी ने जो कहा, उसने मुझे मथ दिया। आहत स्वरों में बोले - ‘शर्म और तकलीफ इस बात की है कि मेरे रास्ते में वे ही लोग बाधाएँ खड़ी करते हैं जो दिन भर बच्चों को ‘सदा सच बोलो’ का पाठ पढ़ाते हैं।’

हमारी गप्प गोष्ठी अब शोक सभा में बदल गई थी। और शोक सभा तो दो मिनिट के मौन के साथ ही समाप्त हो जाती है!

हो गई।

रोशनी: सरोजकुमार

हिमालय की काँख में भी
जल सकती है
अगर हो;
जरूरी तो आग है!
सूर्य की बपौती नहीं है
दियासलाई के सिरे
पर भी सम्भव है!


क्या कबीर
किताबों से पटे, जिन्दगी से कटे
मिमियाते मदरसों में/भर्ती ले ले;
क्या जरूरी है, कि पहलवान
दण्ड अखाड़े में ही पेले?


बुद्ध को नाचीज मुर्दे ने
वह कह दिया,
जो सम्भव नहीं होता
धर्माचार्यों की पीढ़ियों से!


रोशनी
रेलिंग पकड़कर नहीं उतरती
और न सीढ़ियों से!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन।    म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

शुक्र है! कोई न कोई बाबूलाल है

मेरे लिए यह तय कर पाना लगभग असाध्य हो रहा था कि वकील साहब हँसते-हँसते रुँआसे हो रहे हैं या रुँआसे होते हुए हँस रहे हैं। बस, वे कहे जा रहे थे और मैं ‘मूढ़ मति’ की तरह ‘हाँ! हूँ!’ करता हुआ सुनता जा रहा था। एकाधिक बार कह चुके थे - ‘आपकी भाषा और कहने के तरीके पर मैंने कई बार आपको टोका और असहमत हुआ। खिन्नता भी जताई। पर आज मुझे कहना पड़ रहा है कि आप सही थे और हर बार सही थे।’ मुझे खुश हो जाना चाहिए था किन्तु उनके स्वरों की पीड़ा मुझे खुश नहीं होने दे रही थी।

वकील साहब याने श्री बाबूलालजी जैन। रतलाम जिले के अनुभाग (सब डिविजन) मुख्यालयवाले कस्बे आलोट के निवासी और वहाँ के अग्रणी, वरिष्ठ वकील। मेरे नियमित पाठक और लगभग उतने ही नियमित रूप से प्रतिक्रिया जतानेवाले। उनके बारे में मैं कुछ नहीं जानता सिवाय इसके कि वे आलोट के अग्रणी, वरिष्ठ वकील हैं। दो-तीन बार उनसे भेंट हुई भी किन्तु वह सब भी उनके ही सौजन्यवश। वे जब-जब भी रतलाम आए, मुझ पर कृपा कर, खुद चलकर मुझसे मिले। उनकी प्रशंसा मुझे हर बार चौंकाती है क्योंकि वैचारिकता के स्तर पर हम या तो एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं या फिर, एक सौ अस्सी अंश के कोण वाली लम्बी रेखा के अन्तिम बिन्दुओं पर आमने-सामने बैठे हुए।

वकील साहब मेरे लिखे की, सामान्यतः प्रशंसा ही करते हैं किन्तु कभी-कभार, मेरी भाषा और ‘कहन की चुभन’ से असहमति भी जताते हैं। यह ‘कभी-कभार’, ‘अनेक बार’ हो चुका है। ऐसे अवसरों पर वे साफ-साफ तो कुछ नहीं कहते किन्तु ‘कुशल और दक्ष वकील’ की तरह अन्ततः यही कहते हैं कि मैं भाषागत व्यवहार में क्रूरता और  अमानवीयता की सीमाएँ छू कर लोगों पर अत्याचार कर उन्हें पीड़ित करता हूँ। मेरे ऐसे अत्याचारों से पीड़ित मेरे आलेखों के पात्रों के प्रति सहृदयता बरतते हुए मुझे, तनिक नम्र, मानवीय और अघातक भाषा प्रयुक्त करने की ‘अमूल्य निःशुल्क सलाह’ (कोई ‘अनुभवी और दक्ष’ वकील निःशुल्क सलाह दे, यह अपने आप में ध्यानाकर्षक और महत्वपूर्ण तथ्य है - गुदगुदानेवाला तथ्य) देते हुए कहते हैं - ‘कई बार चुप रह कर भी तो अपनी बात कही जा सकती है!’ उनकी बात सौ टका सच होती है किन्तु मैं अपना क्या करूँ? यह तो ‘निर्मिति दोष’ (मेन्यूफेक्चरिंग डिफेक्ट) की तरह मेरे व्यक्तित्व के हिस्से से आगे बढ़कर मेरी पहचान बन गया है। मैं कहता हूँ - ‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। अपने इस दोष से मैं खुद भी परेशान हूँ। किन्तु क्या करूँ? अब मेरा सुधरना नामुमकिन है।’ बात को हलकी करने के लिए मैं परिहास करता हूँ - ‘वकील साहब! अब आखिरी उम्र में क्या खाक मुसलमाँ होंगे।’ वे कुछ नहीं कहते। बड़ापन और बड़प्पन बरतते हुए, चुपचाप मेरी इस अशिष्टता तो सुन लेते हैं, सहन कर लेते हैं।

वे ही वकील साहब, मेरी उसी भाषा को आज सही बता रहे थे! लेकिन जैसा कि मैंने कहा - पीड़ा भरे उनके स्वर मुझे खुश नहीं होने दे रहे थे। बात ही कुछ ऐसी थी।

जैसा कि वकील साहब ने बताया, आलोट की गौ शाला को लेकर लोगों में क्षोभ और आक्रोश था। कुछ को गौ शाला की संचालन शैली से असन्तोष था तो कुछ को पदाधिकारियों के आचरण से। आलोट के लोगों को लग रहा था कि गौ शाला के पदाधिकारी न केवल मनमानी और पद का दुरुपयोग कर रहे हैं अपितु अनुचित रूप से व्यक्तिगत लाभ भी उठा रहे हैं। वकील साहब को भी ऐसा ही अनुभव हुआ। उन्होंने कुछ लिखा पढ़ी की। सूचना के अधिकार का उपयोग कर कुछ जानकारियाँ माँगी। वकील साहब की लिखा पढ़ी से मिले कागजों ने, आलोट के लोगों की बातों को सच साबित किया। इसका सीधा असर हुआ और जैसा कि वकील साहब ने बताया, सब कुछ तो दुरुस्त नहीं हुआ किन्तु कुछ अनुचित बातों पर तुरन्त रोक लग गई।

ठहरे पानी में वकील साहब के फेंके कंकर ने आशा से अधिक और ऊँची लहरें उठाईं। लोगों में खुशी फैली। लोग वकील साहब को धन्यवाद और बधाई देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। लेकिन बात केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं रही। किसी ने कुछ और मुद्दे शामिल करने का सुझाव दिया तो किसी ने धरने पर बैठने की सलाह दी। आशा-अपेक्षा से अधिक जन-प्रतिसाद से वकील साहब को खुश होना ही था। किन्तु उन्हें खुशी के साथ धक्के भी लगे। वकील साहब ने कहा - ‘‘बैरागीजी! क्या बताऊँ? मैंने लोगों से कहा कि यदि वे वाकई में इतने खुश हैं तो कम से कम मेरी कार्रवाई की प्रशंसा करते हुए दो लाइनें मुझे लिख कर दे दें। लेकिन सबने मना कर दिया। कहने लगे - ‘वकील साहब! गौ शाला के संचालकों को तो आप जानते ही हो। जबरे लोग हैं। हम अपने बाल-बच्चे और धन्धा लेकर बैठे हैं। आपके पक्ष में ‘ओपन’ में नहीं आ सकते। लेकिन आप लगे रहिए। आप वाकई में अच्छा काम कर रहे हैं।’’ वकील साहब ने आगे कहा - ‘‘मुझे धरने पर बैठने की सलाह देनेवालों से मैंने कहा कि आप भी मेरे साथ बैठते हों तो मैं अभी धरने पर बैठ जाता हूँ। लेकिन एक भी माई का लाल सामने नहीं आया। सबके सब हें-हें करके, ‘क्या वकील साहब!  आप भी क्या मजाक करते हो!’ कह कर, हाथ जोड़ कर चले गए।’’ और इसीके बाद उन्होंने वह सब कहा जिसे सुनते हुए मैं तय नहीं कर पा रहा था कि रुँआसे हुए जा रहे हैं या खुश। बार-बार कह रहे थे - ‘बैरागीजी! आप ही सही थे। मैं आपको गलत ही टोकता रहा। लोग वास्तव में उसी भाषा और व्यवहार के काबिल हैं जैसा आप लिखते और करते हैं।‘

मैं कुछ भी नहीं कह पा रहा था। वे आयु, दुनियादारी, परिपक्वता, अनुभव आदि में मुझसे कोसों आगे हैं। मैंने अपनी सूझ-समझ के अनुसार उन्हें ढाढस बँधाने की कोशिश की। नहीं जानता कि मैं कामयाब हुआ या नहीं। किन्तु पीड़ा में भीगी, वकील साहब की आवाज अब तक मेरा पीछा कर रही है। वे पहले और अकेले आदमी नहीं है जिसके साथ ऐसा हुआ। न ही आलोट वह पहला और अकेला कस्बा है जहाँ यह हुआ। पूरा देश आलोट बना हुआ है।

मेरी बात कड़वी लग सकती है किन्तु मुझे कहने दीजिए कि हम एक आत्म-केन्द्रित, निर्लज्ज, स्वार्थी समाज में तब्दील हो गए हैं। राष्ट्र-प्रेम, सदाचरण, ईमानदारी हमारे लिए केवल दुहाइयाँ देने और आदर्श बघारने की चीजें बन कर रह गई हैं। पाकिस्तान की कारगुजारियों को लेकर हम चौबीसों घण्टे परेशान रहते हैं और इस सन्दर्भ में अपनी सरकार को ‘नपुंसक’ कहने में न तो देर करते हैं और संकोच। किन्तु इण्डियन एयर लाइन्स के अपहृत विमान काण्ड को याद कीजिए। अपने-अपने परिजनों को बचाने और सुरक्षित लौटा लाने के लिए अपहृत विमान के यात्रियों के तमाम परिजनों ने सरकार की नींद हराम कर दी थी। केवल एक लड़की ने कहा था कि सरकार उसके माता-पिता की चिन्ता न करे और विमान अपहर्ताओं के सामने घुटने नहीं टेके। उस लड़की को छोड़ कर सारे के सारे लोगों की चिन्ता में देश कहीं नहीं था। सबको अपने-अपने परिजनों की पड़ी थी।

ऐसे में, बाबूलालजी जैन वकील साहब के साथ अनोखा और अनपेक्षित क्या हुआ? कुछ भी तो नहीं! लेकिन तसल्ली की बात यह है कि सारे देश में, कहीं न कहीं, कोई न कोई बाबूलाल जैन है जो इस सबके बावजूद हरकत में बना हुआ है।

यह देश और समाज ऐसे ही बाबूलालों के दम पर बचा हुआ और बना हुआ है।

बाना: सरोजकुमार

जी, पढ़ाई लिखाई की कौन बात
कोई नौकरी कराना नहीं!


जी, मिलनसार की कौन बात
कोई चुनाव तो लड़ाना नहीं!


जी, नृत्य-गान की कौन बात
कोई मंच पे नचाना नहीं!

जी, शक्ल-सूरत की कौन बात
कोई फिल्म तो बनाना नहीं!


जी, लेन-देन की करें बात
उसके बिना बाना नहीं!


चूल्हा फुँकवाना है
खाना पकवाना है
बर्तन मँजवाना हैं
कपड़े धुलवाना हैं
झाड़ू लगवाना है
बिस्तर बिछवाना है
बच्चे जनवाना हैं
आखिर को जनाना है!


जी, ये कोई बहाना नहीं-
अभी हमारी
हाँ.....
ना.....
नहीं!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन।    म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

पाँच साला हासिल

स्थिति -1:  22 मई 2007
‘‘बीस मई को मैं ने पहली बार लिखा और चुपचाप बैठ गया। बाईस मई को चिट्ठा खोला तो भौंचक्का रहा गया। एक, दो नहीं, पूरी नौ टिप्पणियाँ! मैं बौरा गया। रोमांच का चरम क्या होता है यह पहली बार जाना।’’
(अपने ही ब्‍लॉग पर मेरी टिप्‍पणी।)

स्थिति - 2:  21 अप्रेल 2012

‘‘पापा! बधाई हो! आपका ब्लॉग 50000 पेज व्यू पार कर गया है।’’ - वल्कल। (मेरा बड़ा बेटा)

‘‘अच्छा लगा तुम्हारा यह सन्देश पाकर। किन्तु क्या  यह वाकई में इतनी बड़ी बात है?’’ - मैं

सन्तोष हो रहा है, दोनों स्थितियों के अन्तर को देखकर।

20 मई 2012 को, जब ब्लॉग जगत में मेरा छठवाँ साल शुरु हुआ तो पाँच बरस पहलेवाला रोमांच, नाम मात्र को भी, दूर-दूर तक अनुभव नहीं हुआ। खुद से बेहतर लोगों के पास बैठने का यही फायदा होता है - भ्रम दूर हो जाते हैं। वास्तविकता की जानकारी भले न हो, कोई बात नहीं, किन्तु भ्रमों का दूर हो जाना आदमी के स्वास्थ्य के लिए अच्छा ही होता है। सो, ब्लॉग जगत की कृपा से, मैं ‘स्वस्थ’ हूँ।

अपने शुरुआती दिनों को याद करता हूँ तो अपनी मूर्खता पर जोर से हँसी आती है। उन दिनों किसी की एक सौ पोस्टें होने की सूचना चकित करती थी। लगता था, कैसे लिख लेते हैं भाई लोग इतना? ऐसे ‘शतक वीरों’ के प्रति आदर भाव तो पैदा होता ही था, कहीं न कहीं ईर्ष्या भी पैदा होती थी और विचार आता था - ‘हाय! राम! कब मेरी सौ पोस्टें पूरी हों और कब मैं भी ऐसी ही घोषणा करूँ?’
आज स्थिति यह है कि यह पोस्ट लिखने से पहले टटोला तो पता लगा कि पाँच सौ पोस्टें पूरी हो गईं - पता नहीं कब! इतराना तो दूर रहा, खुश होने की कोशिश की तो खुद पर ही झेंप हो आई। हाँ, अपनी इस झेंप पर जरूर खुशी हुई। ऐसी बातों की व्यर्थता का बोध एकान्त में भी आनन्द ही देता है।

यह सच है कि सुखी जीवन के लिए भ्रम जरूरी होते हैं। किन्तु निर्भ्रम होने का सुख उससे कहीं अधिक बड़ा होता है। ब्लॉग जगत ने मुझे यही सुख दिया है।

ब्लॉग जगत से मिला यह ‘पाँच साला हासिल’ मेरी  ‘अनमोल निधि’ है।

शुक्रिया मित्रों, मुझे सेहतमन्द और सुखी बनाने के लिए, बनाए रखने के लिए।

यही कृपा बनी रहे।
 


लड़की को बड़ी मत होने दो : सरोजकुमार

तुम इधर क्या ऊँघ रहे हो?
उधर लड़की बड़ी होने लगी है-
धीरे-धीरे
पाँव पर खड़ी होने लगी है!
धरती को हिलाओ,
लड़की को डिगाओ,
अगर वह सचमुच खड़ी हो जाएगी
तो हमसे भी बड़ी हो जाएगी!

फिर हाथ पसारती
राखियों का क्या होगा?
हमारी सौंपी
बैसाखियों का क्या होगा?


वह पाँव खड़ी हो गई,
तो चलने भी लगेगी
नया-नया देखेगी,
मचलने भी लगेगी!
सम्विधान देख लेगी,
तो अधिकार माँगेगी
पिता की पास-बुक से
कार माँगेगी!

फिर सनातन पगडण्डियों का
क्या होगा?
होनहारों की मण्डियों का
क्या होगा?


उसे कंचे, पाँचे और
कौड़ियाँ ही झिलाओ,
सिलाई-बुनाई के
झुनझुनों से खिलाओ!


उसे देवरानी, जिठानी की
कहानी ही कहने दो
आँचल में दूध,
पानी आँखों में रहने दो!


चादर को
माथे की पगड़ी मत होने दो,
लड़की है,
लड़की को बड़ी मत होने दो!
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‘शब्द तो कुली हैं’ कविता संग्रह की इस कविता को अन्यत्र छापने/प्रसारित करने से पहले सरोज भाई से अवश्य पूछ लें।

सरोजकुमार : इन्दौर (1938) में जन्म। एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. की पढ़ाई-लिखाई। इसी कालखण्ड में जागरण (इन्दौर) में साहित्य सम्पादक। लम्बे समय तक महाविद्यालय एवम् विश्व विद्यालय में प्राध्यापन।
 म. प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (भोपाल), एन. सी. ई. आर. टी. (नई दिल्ली), भारतीय भाषा संस्थान (हैदराबाद), म. प्र. लोक सेवा आयोग (इन्दौर) से सम्बन्धित अनेक सक्रियताएँ। काव्यरचना के साथ-साथ काव्यपाठ में प्रारम्भ से रुचि। देश, विदेश (आस्ट्रेलिया एवम् अमेरीका) में अनेक नगरों में काव्यपाठ।

पहले कविता-संग्रह ‘लौटती है नदी’ में प्रारम्भिक दौर की कविताएँ संकलित। ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) में प्रति शुक्रवार, दस वर्षों तक (आठवें दशक में) चर्चित कविता स्तम्भ ‘स्वान्तः दुखाय’। ‘सरोजकुमार की कुछ कविताएँ’ एवम् ‘नमोस्तु’ दो बड़े कविता ब्रोशर प्रकाशित। लम्बी कविता ‘शहर’ इन्दौर विश्व विद्यालय के बी. ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में एवम् ‘जड़ें’ सीबीएसई की कक्षा आठवीं की पुस्तक ‘नवतारा’ में सम्मिलित। कविताओं के नाट्य-मंचन। रंगकर्म से गहरा जुड़ाव। ‘नई दुनिया’ में वर्षों से साहित्य सम्पादन।

अनेक सम्मानों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ट्रस्ट का ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ (’93), ‘अखिल भारतीय काका हाथरसी व्यंग्य सम्मान’ (’96), हिन्दी समाज, सिडनी (आस्ट्रेलिया) द्वारा अभिनन्दन (’96), ‘मधुवन’ भोपाल का ‘श्रेष्ठ कलागुरु सम्मान’ (2001), ‘दिनकर सोनवलकर स्मृति सम्मान’ (2002), जागृति जनता मंच, इन्दौर द्वारा सार्वजनिक सम्मान (2003), म. प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा ‘माणिक वर्मा व्यंग्य सम्मान’ (2009), ‘पं. रामानन्द तिवारी प्रतिष्ठा सम्मान’ (2010) आदि।

पता - ‘मनोरम’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर - 452018. फोन - (0731) 2561919.

आलस्यग्रस्त की क्षमा-याचना

अठारह मई के बाद वाले आठ-दस दिनों के बाद, जब-जब भी फोन घनघनाया, तब-तब, हर बार, भयभीत हुआ - ‘कहीं रविजी का फोन न हो। मेरी आयु का लिहाज कर, वे डाँटें भले ही नहीं, अप्रसन्नता और खिन्नता अवश्य जताएँगे।’ किन्तु हर बार मेरा भय निर्मूल निकला और हर बार राहत की साँस ले, मैं खुश हुआ। किन्तु अचानक ही लगा कि कहीं वे इतने अधिक अप्रसन्न और खिन्न तो नहीं कि फोन ही नहीं कर रहे? इस विचार ने और अधिक भयभीत कर दिया। इस क्षण तक भयभीत हूँ - यह भली प्रकार जानते हुए कि हम दोंनों के बीच ऐसा कोई सम्बन्ध, ऐसी कोई स्थिति नहीं कि वे मुझे कोई हानि पहुँचाएँ। फिर भी भय बना हुआ है।

सत्रह मई के बाद से मेरा ब्लॉग लेखन बन्द पड़ा है। आलस्य के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं। खराब से खराब मनोदशा में भी लिखना जारी रखा जा सकता है - यह मेरा अनुभूत सत्य है। समय भी भरपूर रहता है और विषय भी। आयु का और थकान का भी कोई प्रतिकूल प्रभाव ऐसा और इतना नहीं होता कि इतने दिनों तक जड़ता छाई रहे। ले-दे कर आलस्य ही इसका एकमात्र कारण होता है और मैं इसी के अधीन ‘जड़’ बना रहा।

इस बीच एक बार रविजी से बात हुई। उनका सन्देश मिला था तो बात तो करनी ही थी। डरते-डरते ही फोन किया था। काम की बात होने के बाद भी जब उन्होंने कुछ नहीं कहा तो लगा, वे ‘तनिक अधिक’ से कहीं आगे ‘अत्यधिक’ की सीमा तक अप्रसन्न और खिन्न हैं। सो, अपनी ओर से ही, डरते-डरते स्पष्टीकरण शुरु किया। किन्तु उन्होंने बीच में ही मेरी बात रोक दी। साँत्वना बँधाते हुए (यहाँ मैं ‘साँत्वना बँधाते हुए’ के स्थान पर ‘पुचकारते हुए’ या फिर ‘लाड़ से सहलाते हुए’ जैसी शब्दावली प्रयुक्त करना चाह रहा था) बोले - ‘‘ऐसा होता है। इसे ‘रायटर्स ब्लॉक’ कहते हैं और कोई भी इसका शिकार हो सकता है। आप तो बस कोशिश कीजिए कि इस जकड़न से जल्दी से जल्दी मुक्त हो जाएँ। लिखना शुरु का दें।’

मैं आश्वस्त ही नहीं, चकित भी हुआ था यह सुनकर। उनके स्वरों में उलाहना, क्षोभ जैसा कुछ भी नहीं था। था तो बस मेरा ‘हित चिन्तन।’ उस क्षण लगा था, माँ के बाद गुरु ही, उदारमना हो, शरण दे सकता है और क्षमा कर सकता है।

रविजी मेरे ब्लॉग गुरु हैं। आलसी होने के मेरे अपराध को, मेरी याचना से पहले ही क्षमा कर चुके हैं। ऐसे में, लिखने की शुरुआत के लिए आज, ‘गुरु पूर्णिमा’ से अच्छा दिन और क्या हो सकता है?

'ब्‍लॉगअड्डा' को दिए अपने इस साक्षात्कार में रविजी ने, ‘ब्लॉग’ की बेहतरी के लिए ‘नियमित ब्लॉग’ लेखन आवश्यक बताया था। नहीं जानता कि मैं कितना नियमित रह सकूँगा किन्तु यथा सम्भव प्रयत्न अवश्य करूँगा कि नियमित रह सकूँ।

सो, आज के पवित्र प्रसंग पर, अपने ब्लॉग गुरु श्री रवि रतलामी को प्रणाम करते हुए, फिर से शुरु हो रहा हूँ।

तस्मै श्री गुरवै नमः।