वे आँखें परेशान करती हैं

1977 का वह दिन और आज का दिन। उस चाँटे की आवाज कानों में जस की तस गूँज रही है और तपिश अभी भी गाल पर महसूस हो रही है। खास बात यह कि वह चाँटा मुझे नहीं पड़ा था।

मेरे ब्याह को डेढ़ बरस भी नहीं हुआ था। नौकरी करना फितरत में नहीं था और न थी कमा-खाने की जुगत भिड़ाने की अकल। मन्दसौर में सक्रिय पत्रकारिता में था। उस समय दैनिक ‘दशपुर-दर्शन’ का सम्पादक था। लेकिन पत्रकारिता के उच्च नैतिक आदर्श निभाते हुए कमाई कर लेने का करिश्मा मेरे बस के बाहर की बात थी। गृहस्थी चलाना तो कोसों दूर, अकेले का पेट पालना भी कठिन था। तभी एक अपराह्न, बाबू (यादवेन्द्र भाटी) रतलाम से आया। उसके साथ जैन साब (विजय कुमार जैन) भी थे। वे थे तो मूलतः सागर के लेकिन रतलाम में ही, ग्लुकोज/सलाइन बोतलें बनानेवाली इकाई में मेन्यूफेक्चरिंग केमिस्ट के पद पर नौकरी कर रहे थे। दोनों रतलाम में, दवाइयाँ बनानेवाली इकाई स्थापित करने की योजना बनाए हुए थे। जैन साब से मेरा कोई परिचय नहीं था। बाबू मेरा हितचिन्तक रहा है। उसने मुझसे पूछे बिना और मुझे बताए बिना मुझे तीसरा भागीदारी बना लिया था। वह भागीदारी अनुबन्ध टाइप करवा कर लाया था। दोनों आए उस समय मैं दफ्तर में बैठा अखबार के मुख पृष्ठ की तैयारी शुरु कर रहा था। बाबू ने जैन सा‘ब से मेरा परिचय कराया और कहा कि कुछ जरूरी बात करनी है जो दफ्तर में नहीं हो सकती। हम तीनों नयापुरा से निकल कर सुचित्रा टाकीज के सामनेवाली होटल पर आए। बाहर लगी बेंच पर बैठे। बाबू ने वह भागीदारी अनुबन्ध मेरे सामने रखा और कहा कि जहाँ-जहाँ मेरा नाम लिखा है, वहाँ-वहाँ हस्ताक्षर कर दूँ। मैंने हस्ताक्षर कर प्रश्नाकुल आँखों से उसे देखा। वह हँसते हुए बोला - ‘तुम एक फार्मास्युटिकल यूनिट में पार्टनर हो गए हो। रतलाम शिफ्ट होने की तैयारी करो।’ मैं घबरा गया। मेरी जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। बाबू फिर हँसा और बोला - ‘तुम्हें कुछ नहीं करना है। तुम वर्किंग पार्टनर हो।’ और तेरह अगस्त 1977 को मैं रतलाम आ गया। 

कच्चा खाका बना हुआ था। काम-काज का बँटवारा हो चुका था। प्रबन्धकीय/प्रशासकीय और वित्तीय व्यवस्था बाबू के जिम्मे थी। जैन सा‘ब दवाइयों का निर्माण देखेंगे। बाहर की भाग-दौड़ मैं करूँगा। हमें म. प्र. वित्त निगम (एम.पी.एफ.सी.) से लोन लेना था। इसका मुख्यालय इन्दौर में था। इन्दौर आना-जाना मेरे जिम्मे ही हुआ। मुझे न तो पैसे-कौड़ी की अकल न ही धन्धे की सूझ। उस पर पत्रकारिता की अकड़ बनी हुई। मुझे तो सवाल पूछने की आदत। जबकि यहाँ छोटी से छोटी बात का भी जवाब देना होता था। वह भी विस्तार से और याचक मुद्रा में। मुझे तो पल-पल अपने आप से जूझना पड़ता था - ‘मेरी किसी मूर्खता से बाबू का और जैन सा‘ब का कोई नुकसान न हो जाए।’ खास-खास मौकों पर बाबू साथ आता लेकिन छोटे-मोटे कामों के लिए मैं ही जाता था। ये ‘छोटे-मोटे काम’ मेरे लिए हर बार हिमालय पार करने जैसे होते थे।

रतलाम से इन्दौर की दूरी 135 किलो मीटर है। उन दिनों बसें बहुत ज्यादा नहीं चलती थीं। पूरी सड़क ‘सिंगल रोड़’ और बहुत खराब। बस को लगभग चार घण्टे लगते थे इन्दौर पहुँचने में। पहली बस सुबह छः बजे निकलती थी। दफ्तरों का काम निपटानेवालों के लिए यही बस अनुकूल होती थी - दफ्तर खुलने से पहले पहुँच जाओ और काम निपटा कर शाम को वापस रतलाम के लिए चल दो। लेकिन मेरे लिए यही सबसे बड़ी प्रतिकूलता थी। मैदानी पत्रकारिता के कारण मेरी कोई नियमित दिनचर्या नहीं थी। अनियमित दिनचर्या ही मेरी नियमित दिनचर्या थी। आज भी वही दशा है। सुबह जल्दी उठना मेरे लिए सबसे कड़ी सजाओं में से एक है। मुझे रात भर जगवा लीजिए, लेकिन सुबह जल्दी उठने की मत कहिए। सो, उन दिनों, रतलाम से इन्दौर तक की पूरी यात्रा मैंने हर बार सोते/ऊँघते हुए ही पूरी की। 

रतलाम से चालीस किलो मीटर की दूरी पर, बदनावर में बस का पहला पड़ाव होता है। बदनावर की कचोरी इस अंचल में बहुत प्रसिद्ध है। इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस अंचल के केटररों के मेनू में ‘बदनावरी कचोरी’ एक व्यंजन के रूप में शामिल है। इमली की चटनी और दही के साथ हींग-काली मिर्च वाले जायकेदार सिंगदानों से सजी गरम-गरम बदनावरी कचोरी की तेज गन्ध अच्छे-अच्छे विश्वामित्रों की तपस्या भंग कर देती है। घर से खाली पेट चले लोग, नाश्ते के नाम पर यहाँ की कचोरियों के साथ ‘असल मालवी चरित्र’ के तहत ‘सम्पूर्ण न्याय’ करते हैं। तले-गले के कड़े परहेजी लोग, अपने डॉक्टरों, परिजनों की सारी हिदायतें, चेतावनियाँ ताले में बन्द कर इन कचोरियों पर टूट पड़ते हैं। एक कचोरी से किसी का काम नहीं चलता। एक नमूने से बात शायद आसानी से और अधिक प्रभावी ढंग से समझ में आ जाएगी।

श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति (इन्दौर) के वर्तमान प्रधान मन्त्री श्री सूर्यप्रकाशजी चतुर्वेदी रतलाम कॉलेज में प्रोफेसर हुआ करते थे। तब से आज तक वे बदनावरी कचोरी के दास बने हुए हैं। वे इन्दौर के हैं। आज वे अस्सी बरस के आसपास होंगे। उन्हें वे बीमारियाँ घेरे हुए हैं जिनमें तला-गला खाना निषिद्ध है। लेकिन उन्हें जब भी इन्दौर से रतलाम, मन्दसौर, नीमच इलाके में जाने का काम पड़ता है तो वे अनिवार्यतः बदनावर होकर ही यात्रा करते हैं और परिवार में घोषणा करके आते हैं कि वे आते-जाते, बदनावर में कम से कम दो-दो कचोरियाँ तो खाएँगे ही खाएँगे। बदनवारी कचोरी के व्यसनी, ऐसे अनगिनत चतुर्वेदीजी बदनावर से रोज गुजरते हैं। 

बदनावर तब तहसील मुख्यालय हुआ करता था। अब शायद उप सम्भाग हो गया हो। यह इस इलाके का अच्छा-भला व्यापार केन्द्र है। कपास और अनाज मण्डी है। अंचल के कई गाँवों, कस्बों का मुख्य बाजार यही है। यहाँ का बस अड्डा यदि बहुत बड़ा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं है। वहाँ कोई न कोई बस आती-जाती रहती है। बस के रुकते ही, होटलों पर काम करनेवाले बच्चे इन बसों में चढ़कर यात्रियों को आवाजें देने लगते हैं। इन आवाजों से मुझे बहुत परेशानी होती थी। मेरी नींद में व्यवधान जो पड़ता था! 

उस दिन भी यही हुआ। बस बदनावर बस अड्डे पर रुकी। लोग फटाफट उतरे। बस में हम गिनती के यात्री रह गए थे: पाँच-सात महिलाएँ और दो-एक बूढ़े। आठ-नौ बरस की उम्रवाले तीन बच्चे अन्दर आकर, अपनी आदत और जिम्मेदारी के अनुरूप जोर-जोर से ‘कचोरी-पोहे! गरम गरम कचोरी-पोहे!’ की आवाजें लगाने लगे। दो बच्चे तो थोड़ी देर में चले गए लेकिन एक बच्चा बराबर आवाज लगाता रहा। मुझे परेशानी होने लगी। मैंने अधखुली आँखों से, गुस्से से उसे देखा। मुझे अपनी ओर देखते देख वह अधिक उत्साह से आवाज लगाने लगा। मैंने उसे टोका। लेकिन वह चुप नहीं हुआ। मैंने तनिक डाँटते हुए कहा - ‘गिनती के लोग यहाँ बैठे हैं। सबने तेरी बात सुन ली। अब भाग जा।’ लेकिन उसने मेरी बात नहीं सुनी। आवाज लगाता रहा। मैंने जोर से कहा - ‘सुना नहीं? मैंने कहा ना! भाग जा। चल भाग!’ उसने पलट कर कहा - ‘मैं अपना काम कर रहा हूँ। आपको क्या? आप अपना काम करो।’ मुझे गुस्सा आ गया। चिल्लाया - ‘सामने बोलता है? जाता है या चाँटा टिकाऊँ?’ मेरी शकल देख और चिल्लाना सुन वह सहमा। लेकिन कुछ ही पलों में सामान्य हो बोला - ‘क्यों नाराज होते हो बाबूजी? मैं आपका क्या ले रहा हूँ? मुझे अपना काम करने दो।’ यह सुनना था कि मैं अपने बस में नहीं रहा। मेरा धैर्य छूट गया और मैंने जोर से, उसे चाँटा मार दिया। बच्चा हतप्रभ हो गया। उसके साथ ऐसा शायद पहली बार हुआ था। उसे मानो विश्वास ही नहीं हुआ। अपने गाल पर हाथ रख कर मुझे ताकने लगा। मुझे लगा था, वह रोना शुरु कर देगा और रोते-सुबकते बस से उतर जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह, उसी मुद्रा में मुझे ताकता रहा। कुछ इस तरह कि मैं असहज हो गया। नजरें चुराने लगा। उसकी आँखों में न तो गरीबी की लाचारी थी न ही बच्चा होने का, शरीरिक दुर्बलता का भाव। इस क्षण भी मुझे उसकी वे, ताब भरी, मुझे घूरती आँखें साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। वे ही आँखें मुझ पर गड़ाए हुए बोला - ‘बस! मार दिया झापट? हो गई तसल्ली? अब बाबूजी! मैं भी आपको एक झापट मार दूँ तो? क्या इज्जत रह जाएगी आपकी? यहाँ अभी भले ही कोई नहीं देख रहा है। लेकिन आप क्या कभी मेरे झापट को भूल जाओगे?’ कह कर वह, बिना रोए-सिसके बस से उतर गया।

उसका उतरना था कि मुझे मानो कँपकँपी छूट गई। मैं समझ ही नहीं पाया कि मैंने क्या कर दिया और वह बच्चा क्या कर गया। मेरी उम्र तीस बरस और उसकी आठ-नौ बरस। झापट नहीं मार पाता लेकिन मारने की कोशिश तो कर ही सकता था! प्रतिशोधग्रस्त आदमी को न तो उम्र की बाधा होती है न ही शारीरिक बल की। वह तो कुछ भी कर गुजरता है। लेकिन वह बच्चा न तो गुस्से में आया न ही बदले की भावना में बहा। वह संयत बना रहा और मुझे क्षमा कर चला गया। 

थोड़ी देर में बस इन्दौर के लिए चल दी। लेकिन मैं उसके बाद, पल भर नहीं सो पाया। और केवल उस दिन ही क्यों? उसके बाद बरसों तक, मैं जब भी उस बस से गया, कभी नहीं सो पाया। कभी बदनावर में उतरा भी नहीं। बस बदनावर के ज्यों-ज्यों पास पहुँचती, मेरा दिल बैठने लगता - कहीं उस बच्चे से सामना न हो जाए। वह सामने आ गया तो मेरा क्या हाल होगा? जब तक बस बदनावर से चल नहीं देती, मैं इस तरह से बस में बैठा रहता मानो कोई अपराधी पुलिस से बचने के लिए छिपा-बैठा हो।

आज भी जब-जब भी यह सब याद आता है तो घबरा जाता हूँ। पसीना-पसीना हो जाता हूँ। उस चाँटे की आवाज कानों में गूँजने लगती है। उसकी तपिश अपने गाल पर महसूस होने लगती है। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी होती है, उस लड़के की ताब भरी आँखों से। वे आँखे अब भी मेरी आँखों में गड़ी हुई हैं।
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देश पहली इण्टरनेट साहित्य पत्रिका ‘रचनाकार’ ने  
इस संस्मरण को 26 मार्च 2018 को प्रकाशित किया।


नया भारत पाने की कीमत केवल डी. रूपा ही चुकाए?

मध्य प्रदेश के, वााणिज्यिक कर विभाग के पूर्व अतिरिक्त आयुक्त श्री शमशेर बहादुरजी सिंह (जिन्हें एस. बी. सिंह के नाम से ज्यादा जाना जाता है) ने गए दिनों मुझे एक वीडियो भेजा था। लगभग नौ मिनिट के इस वीडियो में एक महिला आईपीएस अधिकारी पुलिस अधिकारियों को सम्बोधित करती अनुभव हो रही थी। भाषण के अन्दाज से लग रहा था कि ये अधिकारी या तो आईपीएस बन चुके थे या बननेवाले हैं। वीडियो का सम्पादन इतना चुस्त था कि लगता था मानो यह अधिकारी बिना साँस लिए बोल रही हो। भाषण के साथ-साथ पर्दे पर, अंग्रेजी में भी लिखित में दिया जा रहा था। भाषण का सार मुझे समझ में आया और लगा कि यह भाषण अधिक व्यापकता का अधिकारी है। किन्तु मेरी अंग्रेजी ऐसी नहीं कि एक बार सुनकर शब्दशः समझ सकूँ। न ही अंग्रेजी पढ़ने का ऐसा अभ्यास कि वीडियो पर आ रही इबारत पढ़ सकूँ। लिहाजा मैंने सिंह सा‘ब से अनुरोध किया कि वे मुझे इस भाषण की इबारत अंग्रेजी में उपलब्ध करा दें। उन्होंने मुझ पर कृपा की और अत्यधिक परिश्रम कर मुझे  यथासम्भव पूरा भाषण उपलब्ध कराया। मैंने अपनी सूझ-समझ के अनुसार और शब्दकोश का सहारा ले, इसका हिन्दी भावानुवाद किया। मैंने कोशिश की कि बात पूरी भले ही न आए किन्तु कुछ गलत न हो जाए। नहीं जानता कि मैं अपनी कोशिश में कितना कामयाब हुआ। यदि कोई चूक अनुभव हो तो कृपया उसे सदाशयतापूर्वक हुई चूक समझें और मुझे सूचित करें ताकि मैं सुधार कर सकूँ।

मेरे अनुरोध पर, ‘सुबह सवेरे’ (भोपाल) के स्थानीय सम्पादक भाई पंकज शुक्ला ने न केवल तलाश कर बताया कि भाषण देनेवाली अधिकारी  कर्नाटक केडर की आईपीएस अफसर दिवाकर रूपा मौद्गिल (डी. रूपा) हैं बल्कि इस सामग्री को, दिनांक 15 मार्च 2018 को ‘सुबह सवेरे’ में मेरे स्तम्भ ‘खरी-खरी’ में भी छापा। तकनीकी विवशताओं के कारण मैं वह कतरन प्राप्त नहीं कर पाया।

“जब लोग आईपीएस सेवाओं में आते हैं तो उनकी आँखों में
सितारों की चमक और दिल-दिमाग में आदर्श के रूप में ‘सिंघम’ की छवि होती है। लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता है और वे तन्त्र के पुरजे बनते जाते हैं तो ये आदर्श मोम की तरह पिघलने लगते हैं। तब वह कानून की मंशा के बजाय अपने आका राजनेता की मंशा के बारे में सोचने लगता है। 

“राजनेता से मेरा पहला साबका 2004 में पड़ा। तब मैं धारवाड़ जिले की स्वतन्त्र प्रभारी थी। मुझे एक महीना ही हुआ था कि कोर्ट ने, म. प्र. की तत्कालीन मुख्यमन्त्री के विरुद्ध गैर जमानती वारण्ट जारी किया। याने, मुझे उन्हें गिरफ्तार करना था। यकीन कीजिए, ऐसे भारी-भरकम नेता को गिरफ्तार करना मुझे सबसे आसान चुनौती लगा।

“वीआईपी कल्चर नामक भयानक और खतरनाक बीमारी ने भारत में गहरी जड़ें जमा रखी हैं। इन्हें, खासकर नेताओं को विभिन्न विशेष व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। सशस्त्र जवान (गन मेन) ऐसी ही एक व्यवस्था है। नेताओं को, सामान्यतः कोई खतरा नहीं होता। ये गन मेन इनके ‘प्रतिष्ठा प्रतीक’ होते हैं - जितने अधिक गन मेन, उतनी अधिक प्रतिष्ठा। हकीकत यह है कि इन गन मेनों से चिट्ठी या सामान लाने-ले जानेवाले हरकारों का काम लिया जाता है। 

“मैं बेंगलुरु में उपायुक्त (सशस्त्र बल) थी। वीआईपी के लिए सशस्त्र जवानों की तैनाती का प्रबन्धन मेरे जिम्मे था। मैंने पाया कि विधायक, सांसद जैसे जनप्रतिनिधियों के यहाँ, पात्रता से अधिक गन मेन तैनात हैं। मैंने इन्हें हटाना शुरु किया। पहला प्रतिरोध मेरे बॉस से आया। उन्होंने मेरे अधीनस्थों के सामने मुझे, किसी नृत्य नाटिका (बैले) की मुख्य नृत्यांगना बना दिया। लेकिन मैं अविचलित रही और अन्तिम अधिक गन मेन को वापस बुला कर ही दम लिया। इसी क्रम में मैंने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमन्त्री से 8 यूएसवी गाड़ियाँ वापस बुलवा लीं जिनकी पात्रता उन्हें नहीं थीं। मुझे ताज्जुब है कि मेरे पूर्ववर्तियों ने यह काम क्यों नहीं किया? यह सही काम करने से उन्हें किसने रोका? मुझे बाद में मालूम हुआ कि इस सही काम को पुलिसिया भाषा में ‘गन्दा काम’ कहा जाता है। यह ऐसा अप्रिय काम है जिससे नेता नाराज होते हैं। इसीलिए इसे कोई नहीं करना चाहता।

“बहुत दिन नहीं हुए, मैं बेंगलुरु में जेल डीआईजी बनाई गई थी। इस पद पर मैं, रविवार और छुट्टियों को छोड़कर मुश्किल से 17 दिन रही। इस दौरान मैंने देखा कि एक सजायाफ्ता को ऐसा ही वीआईपी ट्रीटमेण्ट दिया जा रहा है। वे तमिलनाडु की मुख्यमन्त्री, जिनका अभी-अभी ही निधन हुआ है की निकट सहयोगी थीं। इन्हें तमिलनाडु का अगला मुख्यमन्त्री माना जा रहा था। आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक सम्पत्तियों के भ्रष्टाचार के मामले में न्यायालय ने इन्हें सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खिल्ली उड़ाते हुए इन्हें विशेष सुविधाएँ इस तरह उपलब्ध कराई जा रही थीं मानो मुआवजे का भुगतान किया जा रहा हो। मैंने इस अनियमितता की सूचना ‘ऊपर’ दी। सूचना देते ही अनेक लोगों ने मुझसे पूछा - ‘यह तुमने सोच-समझकर किया या क्षणिक मनःस्थिति में?’ सच कहूँ, मैंने परिणामों के बारे में सोचा ही नहीं था। सोचने की जरूरत ही नहीं थी। मेरे दिमाग में यह बात साफ थी कि मैंने पारदर्शिता और जिम्मेदारी से यह किया है जिसकी अपेक्षा किसी भी लोकसेवक से की जाती है। 

“इस सूचना की प्रतिक्रिया में मुझे मानहानि मुकदमे का नोटिस मिला। मतलब क्या? यदि आप बर्र के छत्ते को छेड़ते हैं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहें। कानून और नियम एकदम साफ हैं कि यदि कोई जनप्रतिनिधि, भले ही वह विधायक या सांसद क्यों न हो, किसी प्राथमिकी में आरोपी के रूप में नामजद किया जाता है तो वह ऐसी सुविधाओं का हकदार नहीं है। हालाँकि ऐसी कार्रवाई, जैसी कि मैंने की थी, करनेवाले के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई नहीं बनती किन्तु मुझे विधानसभा की विशेषाधिकार समिति के सामने कई बार हाजिर होना पड़ा। यह मामला बरसों तक खिंचा। लेकिन आखिरकार मिला क्या? मनमानी करनेवाला नेता एक अधिकारी को सबक सिखा रहा है - तुम मेरे माथे आओगे तो तुम्हें तुम्हारी औकात बता दूँगा। वह केवल उस एक अधिकारी को नहीं, समूची अफसर कौम को मानसिक रूप से भयभीत कर रहा है। ऐसे में यदि वह अधिकारी भयभीत हो जाता है तो उस नेता का मकसद पूरा हो जाता है। अफसर ऐसे नोटिसों से बचना चाहते हैं। क्योंकि जिम्मेदारी निभाने के बदले में ऐसे नोटिस अत्यधिक असुविधाजनक होते हैं। यदि इन मामलों में कोर्ट में जाना पड़े तो आपका वक्त, ऊर्जा, मानसिक शक्ति और जेब का पैसा लगाना पड़ता है। इसीलिए कोई भी ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना चाहता। लेकिन मेरा मानना है कि दूसरे तमाम व्यवसायों की तरह, ये नोटिस, विशेषाधिकार हनन के, मानहानि के मामले हमारे व्यवसाय के ऐसे ही जोखिम हैं जिनका मुकाबला अधिकारियों को हिम्मत से करना चाहिए।

“अब कुछ उन चुनौतियों के बारे में जो हमारे पुरुष प्रधान समाज में एक महिला होने के कारण मैंने झेलीं। महिला होना सबसे बड़ा खतरा है। औरत होने के कारण आपकी उपेक्षा, अनदेखी कर दी जाती हैं आपको हलकेपन से लिया जाता है, कई बार आपके निर्देशों को हवा में उड़ा दिया जाता है। ऐसा ही एक दहला देनेवाला अनुभव मुझे गडग जिले में हुआ। मैं वहाँ 2008 में जिला पुलिस अधिकारी थी। एक पूर्व मन्त्री वहाँ के बड़े ताकतवर नेता थे। उनके एक भड़काऊ भाषण से प्रेरित हो उनके समर्थकों ने तीन सरकारी बसें जला दीं। सरकारी बस याने करदाताओं के पैसों से खरीदी गई जन सम्पत्ति। मैंने अपने अधीनस्थ पुलिस उप अधीक्षक को निर्देश दिया कि उन नेताजी को गिरफ्तार करे क्योंकि वे लोगों को भड़काने के प्रथमदृष्टया दोषी थे। इस भड़काऊ भाषण के वीडियो सबूत भी थे। मुझे यह देखकर गहरा धक्का लगा कि मेरे उस अधीनस्थ ने न केवल इंकार कर दिया बल्कि मुझसे बहस भी करने लगा और झूठ बोल दिया कि वह नेता शहर छोड़ गया है। लेकिन मैं भी टस से मस नहीं हुई। मैं सुबह-सुबह ही थाने पहुँच गई और पूरे दिन भर वहीं डटी रही। शाम हुई। रात हुई। घड़ी ने नौ बजाए। फिर सवा नौ, साढ़े नौ। दस बज गए। अन्ततः, जब देखा कि मैं डटी हुई हूँ तो उन नेताजी को पकड़कर लाए। मैंने थाना प्रभारी को निर्देश दिए कि नेताजी की गिरफ्तारी की कानूनी खानापूर्ति कर उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें। 

“यह सब हो जाने के बाद मैंने उस डीएसपी पर जाँच बैठाई तो मालूम हुआ कि जब वह मुझसे उस नेता के, शहर से बाहर चले जाने और शहर में कहीं नहीं मिलने की झूठी बात कह रहा था उस समय वह उस नेता से फोन पर पल-पल सम्पर्क बनाए हुए था। मैंने पूरी रिपोर्ट सरकार को तथा निर्वाचन आयोग को भेजी क्योंकि तब तक निर्वाचन प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी। सरकार ने उस डीएसपी को निलम्बित किया। वह साल भर तक निलम्बित रहा।

“इन दिनों चुनौतियाँ विभिन्न स्वरूपों में सामने आने लगी हैं। लेकिन यदि अधिकारी जोखिम लेने का हौसला रखे, कुछ न छुपाए, पारदर्शिता से, चौड़े-धाले अपना काम करे, यदि उसका दिल-दिमाग साफ है और वह कानून के मुताबिक काम करे, सुविधाओं और मलाईदार पोस्टिंगों के लिए नेताओं का पिछलग्गू न बने और कहीं भी तबादले पर जाने के लिए अपना बोरिया-बिस्तर चौबीसों घण्टे तैयार रखे तो वह अफसर, औरत हो या मर्द, अपने आप में एक ताकत होता है। 

“यह कोई अनूठी जानकारी नहीं है कि विधायक, सांसद जैसे पद संविधान निर्मित हैं। लेकिन इसके समानान्तर यह भी उतना ही सच है कि राज्य प्रशासकीय सेवाओं सहित आईएएस, आईपीएस जैसी सेवाएँ भी संविधान निर्मित ही हैं और इसके अनुच्छेद 311 के अधीन प्रत्येक अधिकारी को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए सुरक्षा प्राप्त है।

“इसलिए, अधिकारी समुदाय जिस दिन तबादलों और नेताओं के भय से मुक्त हो जाएगा उस दिन हम दुनिया का श्रेष्ठ प्रशासकीय तन्त्र बन जाएँगे। कार्ल मार्क्स ने अफसरशाही को ‘लोहे का पिंजरा’ कहा है। लेकिन मैंने तो पाया है कि हम अफसरों ने खुद ही खुद को जंजीरों से बाँध लिया है।

“जिस दिन हम अपनी ही इस जंजीर से मुक्त हो जाएँगे, जिस दिन हम अपनी शक्ति का वास्तविक उपयोग शुरु करेंगे, उस दिन हम एक नया भारत देखेंगे।”

डी. रूपा की बात खत्‍म हुई। अब मेरी बात -

मुझे विश्वास है कि यह सब पढ़ने के बाद हम सब अपेक्षा करने लगे होंगे कि हमारे तमाम अधिकारी डी. रूपा  के आह्वान को कबूल कर, साहसी, निडर, भयमुक्त हो, सुविधाओं और मलाईदार पोस्टिंगों की चिन्ता छोड़, जोखिम मोल लेकर काम करने लगें। लेकिन केवल अफसर ही क्यों? हम भी क्यों नहीं यह सब करते? आखिरकार अन्तिम प्रभावित व्यक्ति तो हम ही हैं! हम क्यों नहीं नेता की नाराजी की, अपना काम तनिक देर से होने की, गैरवाजिब काम न हो पाने की जोखिम उठाते? क्या हम बिना कोई कीमत चुकाए, बिना कोई जोखिम उठाए नया भारत देख सकेंगे? 

एक तरफा व्यवहार कहीं नहीं चलता। कीमत चुकाइए और अपना नया भारत पाइए।
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......हम नहीं, बेकवर्ड तो आप हो

आज मुझे एक उलाहना मिला। इस उलाहने ने मेरे जाले झाड़ दिए। 

मैं खुद को प्रगतिशील मानता, कहता हूँ और यथासम्भव तदनुसार ही व्यवहार करने की कोशिश भी करता हूँ। किन्तु अवचेतन में जड़ें जमाए बैठी ग्रन्थियाँ शायद ही निर्मूल हो पाती हों। मैं भी इसका शिकार निकला और रंगे हाथों पकड़ा गया।


इन्दौर के सान्ध्य दैनिक ‘प्रभातकिरण’ का यह समाचार पढ़िए। मुझे यह अत्यधिक प्रेरक और प्रभावी लगा। मैं, भा. जी. बी. नि. अभिकर्ताओं के संगठन ‘लियाफी’ (लाइफ इंश्योरेंस एजेण्ट्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया) का काम भी देखता हूँ। मैंने, पहली फरवरी की सुबह, मेरी शाखा के अभिकर्ताओं के वाट्स एप ग्रुप पर इस समाचार की कतरन लगाई और अभिकर्ता साथियों का आह्वान किया - ‘इन आदिवासियों से सीखो! बचना है, अपना हक हासिल करना है तो एकजुट रहो और एक साथ, एक बात बोलो।’

मेरा  सन्देश बहुत पसन्द किया गया। खूब प्रशंसा हुई। मुझे दूर-दूर से खबरें मिलीं कि अभिकर्ताओं के अनेक ग्रुपों में इसे साझा किया गया है। दो-एक दिन मैं इसी प्रशंसा की गुनगुनी धूप का आनन्द लेता रहा। लेकिन आज मुझ पर ओले बरस गए।

अपराह्न कोई तीन बजे मेरा मोबाइल घनघनाया। कोई अनजान नम्बर था। मैंने ‘हेलो’ किया। जवाब में नमस्कार के उत्तर के साथ जवाब आया - ‘सर! आप मुझे नहीं जानते। मैं भी आपको नहीं जानता। लेकिन आपका नाम खूब सुना है। जिस ग्रुप में मैं हूँ उसमें आपके ब्लॉग भी पढ़े हैं। बहुत अच्छे लगते हैं। लेकिन सर! आज आपका एक मेसेज पढ़ा तो मेरे मन में जो आपकी इमेज थी वह टूट गई। आप भी दूसरे लोगों की तरह बस बातें ही अच्छी करते हो। आप भी सर! दकियानूस ही हो।’ मैं अचकचा गया। काटो तो खून नहीं। उसकी बात खत्म होने से पहले ही मैं पस्त हो गया। हिम्मत करके पूछा - ‘आप कौन हैं? कहाँ से बोल रहे हैं? मैंने ऐसा क्या कर दिया?’ उसने जवाब दिया - ‘सर! आपके पड़ौस के झाबुआ जिले का हूँ। भील हूँ और ग्रेजुएट हूँ। मुझे नौकरी नहीं करनी। इसलिए एलआईसी की एजेंसी ली है। अभी दो वर्ष ही हुए हैं। बहुत छोटा एजेण्ट हूँ। लियाफी के बारे में सुना है और सुना है कि आप लियाफी के बड़े नेता हो। लेकिन सर! आज आपका वो इन आदिवासियों से सीखो वाला मेसेज देखा तो बहुत दुःख हुआ। अच्छा नहीं लगा सर। आप भी हम आदिवासियों को नासमझ, नादान ही समझते हो। आप हमें बेकवर्ड, बेवकूफ समझते हो। लेकिन ऐसा नहीं है सर! हम नासमझ, नादान, बेवकूफ नहीं हैं। आपने हम लोगों को दूर से ही देखा है और अखबारों, मैगजिनों में छपी बातों के सिवाय और कुछ नहीं जाना है। आप कभी हम लोगों के पास, हमारे बीच बैठो सर! हमसे बात करो, हमारी बात सुनो तो आपको मालूम होगा कि बेकवर्ड हम नहीं, आप लोग हो सर!’ 

वह मुझे बोलने का मौका नहीं दे रहा था। उसकी बात सुनते-सुनते मैं अपने सन्देश की इबारत याद करने की कोशिश करता रहा। मैंने टोका - ‘मैंने अपने मेसेज में आदिवासिों के बारे में ऐसा तो कुछ नहीं लिखा जैसा कि तुम कह रहे हो।’ तनिक भी विचलित, उत्तेजित हुए बिना वह बोला - ‘हर बात लिखी थोड़े ही जाती है सर? कई बातें तो बिना लिखे ही कह दी जाती हैं। अपने एक ब्लॉग में आपने ही लिखा है सर कि बिटविन द लाइन्स काफी कुछ कह दिया जाता है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। मैंने आपके इस मेसेज में वही बिटविन द लाइन्स पढ़ा है सर।’ मैं हकला गया। मेरे बोल नहीं फूट रहे थे। मैं कुछ भी कहूँ, सच तो वही है जो उसने कहा था। अपने सन्देश में मैंने आदिवासियों को परोक्षतः नासमझ, नादान ही तो कहा था! मैंने घिघियाते हुए कहा - ‘मेरा इरादा ऐसा कुछ भी नहीं था भाई! यह सच में बिलकुल अनजाने में हो गया। मैं माफी माँगता हूँ। लेकिन आपने अब तक अपना नाम नहीं बताया।’ उसकी आवाज में ‘विजेता’ की खनक आ गई। बोला - ‘नाम क्या बताना सर! रतलाम से दो घण्टे की दूरी पर हूँ। आता-जाता रहता हूँ। अगली बार आऊँगा तो आपसे जरूर मिलूँगा। लेकिन आपने जिस तरह से फौरन माफी माँग ली सर, उसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। आप उतने भी खराब नहीं हैं जितना मैंने वह मेसेज पढ़ कर मान लिया था। जल्दी ही मिलूँगा सर! थैंक्यू। नमस्ते।’ और उसने फोन बन्द कर दिया।  मैं कई क्षणों तक फोन कान से लगाए रहा। शायद फिर से उसकी ‘हेलो’ सुनाई पड़ जाए। लेकिन नहीं। वह फोन वास्तव में बन्द कर चुका था।

मैं संज्ञा शून्य की दशा में आ गया था। धीरे-धीरे अपने आसपास की दुनिया में लौटा तो सबसे पहले मुझे, यादव सा’ब के ‘अन्नपूर्णा दाल बाटी भण्डार’ पर काम करनेवाला वह आदिवासी युवक याद आया जो एक अपराह्न यह कह कर छुट्टी पर गया था कि उसे एक दाह संस्कार में उसके गाँव जाना है। यादव सा’ब ने मान लिया था कि अब वह अगले दिन नहीं आएगा। लेकिन वह रोज की तरह अगली सुबह, दुकान पर हाजिर था। यादव सा’ब ने पूछा तो उसने बताया कि दाह संस्कार रात को ही हो गया। रुक कर क्या करता? इसलिए सुबह लौट आया। यादव सा’ब ने पूछा - ‘रात को? सूर्यास्त के बाद तो मुर्दा नहीं जलाते!’ वह युवक बोला था - ‘वो तो आप लोग नहीं जलाते। हमारे तड़वी (मुखिया) का कहना है कि सूरज तो कभी अस्त नहीं होता। वो तो अटल है। अपनी धरती उसके सामने से हट जाती है। इसलिए रात हो जाती है। इसलिए हमारा सूरज तो बारहों महीने, सातों दिन, चौबीसों घण्टे उजासमान रहता है।’

इसके साथ ही साथ मुझे, यादव सा’ब की दूसरी दुकान,
‘शंकर स्वीट्स’ पर काम कर रहा ईश्वर सिंगाड़ याद आ गया। वह पास ही के गाँव में रहता है। अपनी ग्राम पंचायत का उप सरपंच भी रह चुका है। बात अभी-अभी ही की है। मल मास चल रहा था। मेरे कस्बे में त्रिवेणी मेला चल रहा था। उसने कहा कि वह अगले दिन काम पर नहीं आएगा। उसे एक विवाह में शरीक होने जाना है। विवाह त्रिवेणी मेले में ही होनेवाला था। मैं वहीं बैठा था। मैंने टोका - ‘मल मास में तो विवाह नहीं होते!’ ईश्वर ने सहज भाव से कहा - ‘हमारे में मल मास नहीं होता। हम तो इसी महीने में माँडा (विवाह) करते हैं और त्रिवेणी के मेले में ही करते हैं।’ मैंने पूछा - ‘त्रिवेणी मेले में ही क्यों?’ ईश्वर ने जवाब दिया था - ‘वो इसलिए बाबूजी कि यहाँ हमें कुछ नहीं करना पड़ता। सब कुछ तैयार, रेडीमेड मिलता है। लम्बा-चौड़ा मैदान, खूब सारे लोग, भोजन-भण्डारे की व्यवस्था। चाहे जितने लोग आओ, सबके लिए भोजन की व्यवस्था। हम लोग फालतू प्रपंच में नहीं पड़ते। हमें पण्डित भी नहीं चाहिए। हमारे यहाँ दूल्हे का जीजा माँडा करा देता है। दोनों तरफ के लोग आ जाते हैं। पाँचों पकवान जीमते हैं और हो गया माँडा।’ मैं और यादव सा’ब एक दूसरे का मुँह देखने लगे थे।

आज के उलाहने के चाबुक ने ये दोनों घटनाएँ याद दिला दी और याद आते ही मुझे मानना पड़ा कि ‘उसने’ सच ही कहा था। मैं अभी-अभी अपने छोटे बेटे का विवाह निपटा कर बैठा हूँ। यादव सा’ब के कुटुम्ब में एक विवाह दस्तक दे रहा है। मुझे क्या-क्या खटकरम नहीं करने पड़े? यादव सा’ब के यहाँ अभी विवाह की तारीख तय नहीं है लेकिन वे ही नहीं, उनका पूरा कुटुम्ब अभी से व्यस्त हो गया है। 

एक के बाद एक, बातें मन में आ रही हैं। एक जाती नहीं कि दूसरी आ धमक रही है। इस सबके बीच ‘उसकी’ आवाज कानों में गूँज रही है - ‘...... बेकवर्ड हम नहीं, आप लोग हो सर!’ 

मेरे अनजान, अनाम दोस्त! तुमने सच कहा। ‘बेकवर्ड’ तुम नहीं, हम ही हैं। बिना विचारे कही अपनी बात के लिए मैं माफी माँगता हूँ। केवल तुम से नहीं, तुम्हारे पूरे समुदाय से। तुम जल्दी रतलाम आओ। मुझसे मिलो ताकि मैं यह सब तुमसे रु-ब-रु कह सकूँ।
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यह सन्‍देश दिया था मैंने, अभिकर्ताओं के अपने वाट्स एप ग्रुप पर।

ये चमत्कारी प्रेरणा-पुंज


(दिनांक 18 मार्च  2016 को मैंने यह आलेख, भारतीय जीवन बीमा निगम की गृह पत्रिका ‘योगक्षेम’ में प्रकाशनार्थ भेजा था। अब तक इस पर किसी निर्णय की सूचना नहीं है। शायद इसे प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया। यहाँ केवल इसलिए दे रहा हूँ ताकि सुरक्षित रह सके और वक्त-जरूरत काम आए।)

क्या है ‘एमडीआरटी’?
(इस आलेख में ‘एमडीआरटी’ शब्द प्रयुक्त किया गया है। ‘मिलियन डॉलर राउण्ट टेबल’ के प्रथमाक्षरों से बना संक्षिप्त रूप है। यह बीमा एजेण्टों के उत्कृष्ट विक्रय कौशल का पैमाना है और इस पात्रता के धारक एजेण्टों को पूरी दुनिया में विशिष्ट हैसियत तथा अतिरिक्त महत्व प्राप्त है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस समय समूची दुनिया में लगभग 32000 एजेण्ट ही यह पात्रता अर्जित किए हुए हैं जो दुनिया के एजेण्टों का लगभग एक प्रतिशत है। वर्ष 2014 में भारतीय जीवन बीमा निगम ने इस सूची में पहला स्थान पाया था। उस वर्ष इसके 6730 एजेण्ट एमडीआरटी बने थे। 
इसकी सदस्यता प्राप्त करने के लिए एजेण्ट को केलेण्डर वर्ष में (याने, पहली जनवरी से 31 दिसम्बर की अवधि में) एक निश्चित रकम की कमीशन आय अर्जित करनी पड़ती है या इन बारह महीनों में एक निश्चित रकम की ‘प्रथम प्रीमीयम आय’ (वर्ष के दौरान बेचे गए नए बीमों की, पहले वर्ष की प्रीमीयम) का आँकड़ा पार करना होता है। यदि कोई ‘एकल प्रीमीयम’ (सिंगल प्रीमीयम) पालिसी बेची जाती है तो उस प्रीमीयम की 6 प्रतिशत रकम ही ‘प्रथम प्रीमीयम आय’ गिनती में ली जाती है। केलेण्डर वर्ष 2019 के लिए पहले वर्ष की कमीशन आय 9,34,400 रुपये तथा पहले वर्ष की प्रीमीयम आय 37,37,600 रुपये निर्धारित है। 
दुनिया के लगभग अस्सी देशों की लगभग 430 बीमा तथा वित्तीय कम्पनियों/संस्थानों के इस संगठन की स्थापना 1927 में हुई थी।)

मंजिल उन्हीं को मिलती है,
जिनके सपनों में जान होती है।
सिर्फ पंखों से कुछ नहीं होता,
हौसलों से उड़ान होती है।

ये पंक्तियाँ हम सबने कम से कम एक बार तो सुनी ही होंगी। कोई ताज्जुब नहीं कि परस्पर चर्चाओं के दौरान या समूह चर्चाओं में हममें से कुछ ने इन्हें प्रयुक्त भी किया हो। लेकिन इन पंक्तियों को सच करनेवाले कितने कर्मठों को कितने लोगों ने देखा होगा? दूसरों की तो कह नहीं सकता किन्तु अपनी कह रहा हूँ - हाँ! मैंने इन पंक्तियों को साकार करनेवाले तीन कर्मठों को देखा है। उनसे मिला भी हूँ। 

उनचालीस वर्षीय अभिकर्ता जयदीप ने 2015 में एमडीआरटी की पात्रता अर्जित की। यह उनका लगातार आठवीं बार एमडीआरटी था। उल्लेखनीय बात यह कि उन्होंने अगस्त 2015 में ही एमडीआरटी कर लिया था और वे अपने मण्डल में शीर्ष स्थान पर रहे। अभिकर्ताद्वय जी. चन्द्रशेखर और दिलजीतसिंह ने भी वर्ष 2015 में एमडीआरटी पात्रता अर्जित की। चन्द्रशेखर ने लगातार तीसरी बार और दिलजीतसिंह ने एक वर्ष के व्यवधान के बाद तीसरी बार एमडीआरटी किया। लेकिन इसमें अनोखा क्या? शायद कुछ भी नहीं। क्योंकि एमडीआरटी करनेवाले अभिकर्ताओं का कारवाँ देश  में प्रति वर्ष बढ़ता ही जा रहा है। किन्तु इन तीनों अभिकर्ताओं की यह उपलब्धि, देश के बाकी तमाम अभिकर्ताओं से तनिक हटकर है। ये तीनों ही अभिकर्ता, ‘निगम’ की अण्डमान-निकोबार शाखा से हैं। इस शाखा में काम करते हुए यह उपलब्धि हासिल करना ही इन्हें देश के अन्य एमडीआरटी अभिकर्ताओं से तनिक अलग ही पहचान दिलाता है।

अण्डमान-निकोबार को हममें से अधिकांश ने नक्षे में ही देख होगा और किताबों/पत्र-पत्रिकाओं में इसके बारे में पढ़ा होगा। मुमकिन है, हममें से कुछ ने यू-ट्यूब पर इससे जुड़ी कुछ फिल्में भी देखी हों। लेकिन हकीकत इन सब की रुमानियत का आनन्द एक झटके में लगभग खत्म ही कर देती है। वहाँ गए बिना इन अभिकर्ताओं की इस उपलब्धि को महसूस कर पाना निश्चय ही असम्भव है।

अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह देश के सात केन्द्र शासित प्रदेशों में से एक है। यह 572 द्वीपों का प्रदेश है। 2011 की जनगणना के मुताबिक समूचे द्वीप समूह की आबादी लगभग 3,80,500 है। लेकिन इसकी सारी गतिविधियाँ दक्षिण अण्डमान में, राजधानी पोर्ट ब्लेयर में केन्द्रित हैं जिसकी जनसंख्या लगभग एक लाख है। सड़क मार्ग का यातायात बहुत ही कम है। जल मार्ग ही यातायात का मुख्य और एकमात्र साधन है। वायु यात्रा काफी मँहगी पड़ती है इसलिए यहाँ के लोग जल मार्ग पर ही निर्भर रहते हैं। जल मार्ग से पोर्ट ब्लेयर से कोलकोता (जहाँ अण्डमान-निकोबार शाखा का मण्डल कार्यालय है) की दूरी 1,255 किलो मीटर, विशाखापटनम से 1,200 किलो मीटर और चैन्ने (चैन्‍नई) से 1,190 किलो मीटर है। पोर्ट ब्लेयर से कोलकोता जाने के लिए, यदि भाग्य से, तेज गति वाला (पानी का) जहाज मिल जाए तो ढाई दिन में पहुँचा जा सकता है। अन्यथा चार या पाँच दिन लग जाते हैं। पड़ौसी द्वीपों के लिए छोटे जहाज चलते हैं जिन्हें ‘फेरी’ कहा जाता है। इनकी संख्या भी सीमित होती है और इनमें यात्री संख्या भी सीमित होती है। उदाहरणार्थ पोर्ट ब्‍लेयर से नील द्वीप के लिए सुबह एक फेरी मिलती है जो शाम को लौटती है। हेवलॉक द्वीप के लिए दो या तीन फेरियाँ मिलती हैं। पहले ओव्हर लोडिंग कर लिया जाता था किन्तु एक दुर्घटना के बाद क्षमता से अधिक यात्री बैठाने पर सख्त पाबन्दी है। इस सीमित यात्री संख्या के कारण प्रायः प्रत्येक फेरी एडवांस बुकिंग के कारण सदैव भरी हुई ही मिलती है। इसीलिए किसी आकस्मिक स्थिति में चाह कर भी उसी दिन कहीं पहुँच पाना असम्भवप्रायः ही होता है। वास्तविकता का अनुमान अभिकर्ता कृष्णमूर्ति की इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार वे बीमा करने पड़ौस के द्वीप गए तो बारहवें दिन घर लौट पाए। 

अभिकर्ता जयदीप से जिस दिन मेरी मुलाकात हुई उसके अगले दिन उन्हें एक बीमा के लिए दिगलीपुर जाना था। इसके लिए उन्हें सुबह चार बजे घर से निकल कर, 48 किलोमीटर दूर झिरकाटाँग चौकी पर कोई दो घण्टों की प्रतीक्षा करनी थी। वहाँ से बाराटाँग तक का, लगभग पचास किलो मीटर का इलाका ‘जारवा जनजाति इलाका’ है जहाँ कोई अकेला यात्री या वाहन नहीं जा सकता। वहाँ वाहनों का काफिला (केनवाय) बनाकर एक निश्चित अन्तराल से दिन में (स्थितियों के अनुसार) तीन-चार बार वाहन छोड़े जाते हैं। वाहनों की गति भी चालीस किलो मीटर प्रति घण्टा के मान से बनाए रखनी पड़ती है। बाराटाँग से जयदीप को अपनी कार समेत फेरी से दूसरे द्वीप पर पहुँचकर शेष यात्रा सड़क मार्ग से कर, शाम चार बजे  दिगलीपुर पहुँचना था। ग्राहक से बात उसके बाद ही होनी थी।  

पोर्ट ब्लेयर की आबादी में एक तिहाई आबादी सरकारी कर्मचारियों की है। उद्यम, व्यापारिक प्रतिष्ठान/संस्थान गिनती के हैं। आधी से अधिक आबादी की आय अनियमित और अनिश्चित है। जाहिर है, बीमा अभिकर्ताओं के लिए यह नौकरीपेशा वर्ग ही सबसे बड़ा सम्भावना क्षेत्र है। सबसे मँहगी चीज है - जमीन। चौंसठ वर्ग फीट जगह में दफ्तर चला रहे एक अभिकर्ता को तीन हजार रुपये प्रति माह किराया चुकाना पड़ रहा है।

इतनी प्रतिकूलताओं, अनिश्चितताओं और सीमित सम्भावना क्षेत्र के बीच कोई अभिकर्ता लगातार आठ बार या तीन-तीन बार एमडीआरटी करे, केलेण्डर वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में ही एमडीआरटी कर ले, मण्डल में प्रथम स्थान हासिल करे तो यह किसी ‘चमत्कार’ से कम नहीं माना जाना चाहिए। यह कठोर परिश्रम का मामला तो है ही, सुविचारित, सुनियोजित रणनीति और ग्राहक प्रबन्धन के कौशल का मामला भी है। इस लिहाज से अण्डमान-निकोबार शाखा के ये अभिकर्ता ‘प्रशंसनीय’ से कही आगे बढ़कर ‘अभिनन्दनीय’ हैं और इस सबसे कहीं आगे बढ़कर पूरे देश के अभिकर्ताओं के लिए ‘प्रेरणा-पुंज’ से कम अनुभव नहीं होते।

हम, देश के मैदानी इलाकोंवाले अभिकर्ता प्रायः ही बीमा न मिलने की शिकायत करते रहते हैं। मैं भी इनमें शरीक रहा हूँ। लेकिन अण्डमान-निकोबार जाकर अपनी इस शिकायत की हकीकत पर हमें निश्चित रूप से झेंप आ जाएगी। 

मेरे मित्र कवि-शायर विजय वाते की पंक्तियाँ हैं -

अवसरों में मुश्किलें मत देखना,
हाथ से अवसर निकलते जाएँगे।
मुश्किलों में देखना अवसर नये,
रास्ते खुद आप खुलते जाएँगे।

ये चमत्कारी प्रेरणा-पुंज हमें कुछ इसी तरह एक मौका दे रहे हैं - खुद की नजरों में झेंपने से बचने का।
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सम्बन्ध काम में आते हैं

(यह लेख मैंने, 27 सितम्बर 2014 को, भारतीय जीवन बीमा निगम की गृह पत्रिका ‘योगक्षेम’ में प्रकाशनार्थ भेजा था। अब तक इस पर किसी निर्णय की सूचना नहीं है। शायद इसे प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया।  इसे यहाँ केवल इसलिए दे रहा हूँ ताकि सुरक्षित रह सके और वक्त जरूरत काम आए।)  

‘बीमा’ ऐसा व्यापार-व्यवहार है जो पूरी तरह भावनाओं पर आधारित है। हम कोई भौतिक वस्तु नहीं बेचते। हम ‘भावी’ (भविष्य) की अच्छी-बुरी स्थितियों की कल्पना को अनुभूति में बदल कर उसके प्रभावों को उकेरते हैं और लोगों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराते हैं। यह सचमुच में कठिन काम है। इसका सर्वाधिक रोचक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अपना बीमा हमें देकर ग्राहक समझता है कि वह हमें उपकृत (या सहयोग) कर रहा है जबकि वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत होती है। जाहिर है कि हमारे व्यवसाय का चरित्र और इसकी आवश्यकताएँ और इसका व्यवहार अन्य व्यापारों/व्यवसायों से सर्वथा भिन्न है। अन्य व्यापारों/व्यवसायों में तो सामान की गुणवत्ता के आधार पर ग्राहक अपनी राय बना सकता है किन्तु हमारे व्यवसाय का एकमात्र आधार ‘ग्राहक सम्बन्ध’ ही होता है। इसीलिए, अन्य व्यापारों/व्यवसायों की तुलना में हमारा काम, सबसे हटकर, अनूठा है।

अभिकर्ता के रूप में कस्बाई स्तर पर मेरा अनुभव है कि बीमा बेचने के बाद यह समझ लिया जाता है कि हमारा काम पूरा या समाप्त हो गया है। मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगता। कभी लगा ही नहीं। मेरी तो यह सुनिश्चित धारणा है कि बीमा विक्रय पूरा होने के क्षण से हमारा काम शुरु होता है। जितनी अवधि की पॉलिसी हमने ग्राहक को बेची है, कम से कम उतनी अवधि के लिए उस ग्राहक से हमारा नाता-रिश्ता जुड़ जाता है। हम उसके प्रति प्रतिबद्ध हो जाते हैं। कुछ इस तरह कि मानोे, (पॉलिसी अवधि के लिए) हम या तो उसकी बेटी अपने घर में ले आए हैं या अपनी बेटी उसके घर में दे दी है। निजी स्तर पर यह भावना ही मेरे ग्राहक सम्बन्ध का आधार होती है। 

हमारा एक ग्राहक केवल ‘एक ग्राहक’ नहीं होता। वह ‘ग्राहकों की लम्बी श्रृंखला का सूत्र’ होता है। एक ग्राहक हमें असंख्य ग्राहक दिला सकता है। वस्तुतः हमारा प्रत्येक ग्राहक, ‘ग्राहकों की खदान’ होता है। किन्तु यह सब तभी सम्भव हो सकता है जब हम ग्राहक से निरन्तर और जीवन्त सम्पर्क बनाए रखें। ‘निगम’ के अभिकर्ता के रूप में काम करते हुए मुझे चौबीस बरस पूरे हो रहे हैं। अपने ग्राहक-सम्बन्धों को सुदीर्घ और स्थायी बनाने के लिए मैंने कुछ ‘उपक्रम’ प्रायोगिक रूप से आजमाए। इनसे मुझे खूब सहायता और सफलता मिली। वही यहाँ परोस रहा हूँ।

अपने ग्राहक के और उसके परिजनों (पति/पत्नी, पुत्री/पुत्र, माता-पिता, भाई-बहनों) के जन्म वर्ष-गाँठवाले प्रसंग पर उन्हें बधाई-अभिनन्दन और शुभ-कामना सन्देश अवश्य दीजिए। आज के समय में यह काम फोन, एसएमएस, वाट्स एप के जरिए किया जा रहा है। किन्तु ये सारे माध्यम केवल सम्बन्धित व्यक्ति तक ही सीमित होकर रह जाते हैं और कुछ समय बाद इन्हें ‘डिलिट’ किया जा सकता या भुलाया जा सकता है। इसलिए यह सब तो करें ही किन्तु डाक से अथवा कूरीयर से एक पत्र अवश्य भेजें। इसके लिए मँहगा कार्ड भेजना जरूरी नहीं। पचास पैसोंवाला पोस्टकार्ड भी चलेगा। यह पत्र, प्रसंग निकल जाने के बाद भी ग्राहक के ड्राइंग रूम में पड़ा रहेगा और केवल उसके परिजन ही नहीं, उसके मिलनेवाले भी इसे देखेंगे। यह पत्र, हमारी अनुपस्थिति में भी हमारी उपस्थिति दर्ज कराता रहेगा। सम्भव हो तो पत्र देने का यह काम व्यक्तिगत रूप से जाकर देने की कोशिश की जानी चाहिए। विवाह वर्ष-गाँठ प्रसंग को भी इसमें शरीक किया जाना चाहिए।

हमारे किसी ग्राहक ने यदि कोई उपलब्धि हासिल की हो या कोई प्रशंसनीय काम किया हो तो इसके लिए भी उसे बधाई देने में न तो देर करें और न ही कंजूसी। यह काम अकेले में कभी न करें। उसके या अपने परिजनों/परिचितों की उपस्थिति में करें। यह बधाई/प्रशंसा लिखित में भी दें। हमारे यहाँ तो देवता तक प्रशंसा के भूखे होते हैं। ऐसे में सामान्य मनुष्य की बात ही क्या! अपनी प्रशंसा सबको अच्छी लगती है, गुदगुदाती है। यह प्रशंसा यदि अपने मिलनेवालों के बीच हो तो इसका आनन्द हजार गुना बढ़ जाता है। अपने ग्राहक की इस उपलब्धि का जिक्र और प्रशंसा, उसकी गैरहाजिरी में, उसके मिलनेवालों से भी करें। लेकिन प्रशंसा और चापलूसी में जमीन-आसमान का अन्तर होता है और सामनेवाला इस अन्तर को खूब अच्छी तरह समझता है। इसलिए, आपकी प्रशंसा, प्रश्ंासा ही होनी चाहिए। चापलूसी नहीं।

किसी मोहल्ले में जाएँ तो वहाँ रहनेवाले अपने पूर्व ग्राहक से मिलने की जतन अवश्य करें। कोई पूर्व ग्राहक न हो और कोई सम्भावित ग्राहक हो तो उससे भी जरूर मिलें। कहिए कि केवल मिलने के लिए आए हैं। काम से मिलनेवाले को कोई याद नहीं करता लेकिन आज के जमाने में उन लोगों को अवश्य याद किया जाता है जो बिना काम के, केवल सद्भावनावश मिलते हों। बिना काम के इस तरह मिलना, खूब काम भी दिलाता है और सद्भावना भी।

आपके ग्राहक के परिवार में उपस्थित ‘जनम-मरण-परण’ (जन्म-मृत्यु-विवाह) प्रसंगों पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और कम से कम बार जरूर कहिए - ‘मुझ जैसा कोई काम हो तो अवश्य बताइएगा।’ अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि काम तो शायद ही कोई बताता हो लेकिन यह कभी नहीं भूलता कि आपने उसकी सहायता करने की इच्छा जताई थी।

अपने ग्राहक के रिश्तेदारी वाली जगह (खास कर तब जबकि वह किसी दूसरे कस्बे/शहर में हो) जाएँ तो पूछिए कि आपके ग्राहक को कोई सामान/सन्देश तो नहीं भिजवाना है? मेरा अनुभव है कि निन्यानबे प्रतिशत से भी अधिक मामलों में ‘नहीं! नहीं! कुछ नहीं भेजना है।’ वाला जवाब ही मिलता है। आपके द्वारा की गई यह पूछ-परख, ग्राहक के मन में आपकी पूछ-परख बढ़ाती है।

ग्राहक हमारी पूँजी और मूल्यवान परिसम्पत्ति ही नहीं, ‘अपरिमित सम्भावना’ भी है। इस सबकी दूखभाल खूब अच्छी तरह, पूरी चिन्ता और सतर्कता से की जानी चाहिए। हमारी बेची गई पॉलिसी, एक फाइल बनकर ग्राहक की आलमारी में बन्द हो जाएगी। ऐसे में हमारी मुख्य चिन्ता और मुख्य काम यही है कि हमारी अनुपस्थिति में भी हमारी उपस्थिति ग्राहक के परिवार में अनुभव की जाती रहे। इसका एक रास्ता और है - ‘सम्बन्ध’ को ‘सम्बन्धी’ में बदलना। इस समय मुझे, कोई चालीस बरस पहले छपा, ‘निगम’ का एक विज्ञापन याद आ रहा है। यह उस विज्ञापन की विशेषता ही थी कि उसने मेरा ध्यान तब आकर्षित किया था जब मैं ‘निगम’ से मेरा कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था और इस क्षण भी याद आ रहा है जब मैं ‘निगम’ का एक छोटा सा, ध्वज-वाहक हूँ। इस विज्ञापन ने एक परिवार का चित्र (फेमिली फोटोग्राफ) छपा हुआ होता था और शीर्षक होता था - ‘इस चित्र में बीमा एजेण्ट को पहचानिए।’ विज्ञापन-शीर्षक के जरिए पूछा गया यह सवाल ही मुझे ‘ग्राहक सम्बन्ध’ का सूत्र थमाता अनुभव हो रहा है। ग्राहक के साथ हमारा सम्बन्ध और व्यवहार ऐसा हो कि वह हमें अपने परिवार का हिस्सा समझने लगे। गोया, ‘सम्बन्ध’ को ‘सम्बन्धी’ में बदल दिया जाए। लेकिन इसके समानान्तर, तब हमें यह वास्तविकता भी चौबीसों घण्टे याद रखनी है कि हम अपने ग्राहक के ‘सम्बन्धी’ नहीं हैं, उसके ‘सम्बन्धी’ होने की सीमा तक व्यवहार कर रहे हैं। यह बात इसलिए भी याद रखना जरूरी है कि ‘सम्बन्धी’ से सम्बन्ध बनाए रखना हमारी पारिवारिक/सामाजिक विवशता होती है। हममें से अधिसंख्य लोग अपने अनेक ‘सम्बन्धियों से त्रस्त’, उनसे मुक्ति की कामना करते हुए मिल जाएँगे। इसलिए हम खुद को ‘सम्बन्ध’ तक ही सीमित रखें। ‘सम्बन्धी’ होने की अनुभूति अवश्य कराते रहें किन्तु ‘सम्बन्धी’ कभी नहीं बनें। हम व्यवसायी हैं और व्यवसाय में जहाँ एक ओर ‘सम्पर्कों/सम्बन्धों की घनिष्ठता’ जरूरी है वहीं ‘न्यूनतम दूरी’ भी जरूरी है। हमें अपने ग्राहक से सम्बन्ध बनाना है, बनाए रखना है, दीर्घावधि तक बनाए रखना और मधुरता, आत्मीयता तथा सौहार्द्रता के साथ बनाए रखना है। ‘सम्बन्धी’ काम आएँ, न आएँ, ‘सम्बन्ध’ अवश्य काम में आते हैं। मेरे बड़े भाई साहब ने यही बात इस तरह कही है -

जीवन की फटी चदरिया में, पैबन्द काम में आते हैं।
सम्बन्धी काम नहीं आते हैं, सम्बन्ध काम में आते हैं।।
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एके साधे सब सधे


(दिनांक 20 दिसम्बर 2013 को मैंने यह लेख, भारतीय जीवन बीमा निगम की गृह पत्रिका ‘योगक्षेम’ में प्रकाशनार्थ भेजा था। अब तक इस पर किसी निर्णय की सूचना नहीं है। शायद इसे प्रकाशन योग्य नहीं समझा गया।  यहाँ केवल इसलिए दे रहा हूँ ताकि सुरक्षित रह सके और वक्त-जरूरत काम आए।)


एक लोकोक्ति है कि लोग अपनी गलतियों से सीखते हैं। किन्तु समझदार वे होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। मैं तमाम अभिकर्ताओं सहित सबको न्यौता दे रहा हूँ - मेरी गलतियों से सीखकर समझदार होने के लिए। 

महानगरों की स्थिति तो मुझे नहीं पता किन्तु कस्बाई स्तर पर हमारे अभिकर्ता साथी एकाधिक संस्थाओं की एजेन्सियाँ लिए होते हैं। ‘निगम’ का अभिकर्ता बनने के शुरुआती कुछ बरसों तक मैं भी यही करता था। किन्तु मैंने, एक के बाद एक बाकी सारे काम छोड़ दिए और केवल ‘एलआईसी एजेण्ट’ ही बन कर रह गया। 

मैंने पाया कि ऐसा करने के बाद न केवल मेरी आय बढ़ी बल्कि मेरी सार्वजनिक पहचान और प्रतिष्ठा (वह जैसी भी है) में मेरी अपेक्षा से अधिक बढ़ोतरी हुई। 

मेरे पास भारतीय यूनिट ट्रस्ट, डाक घर और साधारण बीमा (जनरल इंश्योंरेंस) कम्पनी की भी एजेन्सी थी। मेरी बात को किसी संस्था की आलोचना न समझी जाए किन्तु मेरा अनुभव रहा है कि ग्राहक सेवाओं के मामले में ‘निगम’ से बेहतर कोई संस्था नहीं। हर कोई जानना चाहेगा कि मैंने शेष तीनों एजेन्सियाँ क्यों छोड़ीं। मैं भी बताने को उतावला बैठा हुआ हूँ।

मैंने काम शुरु किया उस समय मेरे कस्बे में भारतीय यूनिट ट्रस्ट का कार्यालय नहीं था। तब यह इन्दौर में था - मेरे कस्बे से सवा सौ किलोमीटर दूर। एक निवेशक के नाम की वर्तनी (स्पेलिंग) दुरुस्त कराने में मुझे सात महीनों से अधिक का समय लग गया और इस दौरान मैंने  प्रति माह कम से कम चार-चार पत्र लिखे। याने प्रति सप्ताह एक पत्र। ग्राहक का नाम तो आखिरकार दुरुस्त हो गया किन्तु ग्राहक की नजरों में मेरे लिए विश्वास भाव में बड़ी कमी आई। वह जब भी मिलता, कहता - ‘क्या! सा’ब। मेरा नाम दुरुस्त कराने में यह हालत है तो अपना भुगतान लेने में तो मुझे पुनर्जन्म लेना पड़ जाएगा! ऐसे में आपसे बीमा कैसे लें?’ ऐसे प्रत्येक मौके पर मुझे  चुप रह जाना पड़ता था। अन्ततः नाम ही दुरुस्त नहीं हुआ, मैं भी दुरुस्त हो गया।  मैंने वह एजेन्सी छोड़ दी।

डाक घर के साथ मेरा अनुभव तनिक विचित्र रहा। डाक घर के बचत बैंक पोस्ट मास्टर मेरे पड़ौसी थे। हम दोनों रोज सुबह, अपना-अपना अखबार बदल कर पढ़ते थे। कभी मेरे यहाँ नल में पानी नहीं आता तो मैं उनके नल का उपयोग करता और कभी उनके नल में पानी नहीं आता तो वे मेरे नल से पानी लेते। किन्तु मेरे अचरज का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे सगे भतीजे के एक निवेश की परिपक्वता राशि का भुगतान मुझे करने से उन्होंने इंकार कर दिया - वह भी तब जबकि मेरे पास मेरे भतीजे द्वारा मेरे पक्ष में दिया गया औपचारिक अधिकार-पत्र था। कुछ देर तो मुझे लगा कि वे मुझसे परिहास कर रहे हैं। किन्तु वे तो गम्भीर थे! स्थिति यह हो गई कि मुझे लिहाज छोड़ कर, शिकायत करने की धमकी देनी पड़ी। मुझे भुगतान तो मिल गया किन्तु इस घटना के बाद से हम दोनों के बीच की अनौपचारिकता, सहजता समाप्त हो गई और हम अपने-अपने अखबार से ही काम चलाने को मजबूर हो गए। मेरे मन में विचार आया कि जो मुझे और मेरे बारे में व्यक्तिगत रूप से भली प्रकार जानते हैं, जब वे भी मुझे, मेरे भतीजे का भुगतान करने में कठिनाई अनुभव कर रहे हैं तो किसी सामान्य ग्राहक का भुगतान कराने में, एक अभिकर्ता के रूप में मेरी दशा क्या होगी? ऐसी घटनाओं का प्रभाव मेरे दूसरे कामकाज पर अच्छा नहीं पड़ेगा। मुझे ग्राहकों से हाथ धोना पड़ जाएगा। मेरा मोह भंग हो गया और मैंने उस एजेन्सी को नमस्कार कर लिया।

सधारण बीमा (जनरल इंश्योरेंस) कम्पनी से मेरा ऐसा कोई अप्रिय अनुभव तो नहीं रहा किन्तु दावा भुगतान को लेकर वहाँ की कार्यप्रणाली ने मुझे निरुत्साहित कर दिया। मैंने देखा कि अपने दावों का भुगतान प्राप्त करने के लिए ग्राहकों को बार-बार चक्कर काटने पड़ते हैं। कुछ मामलों में मैंने पाया कि ग्राहक जब भी अपना भुगतान लेने आता तब उसे कोई न कोई कागज लाने के लिए कह दिया जाता। इसके सर्वथा विपरीत, ‘निगम’ ने मेरी आदत खराब कर रखी थी। मेरी इस बात से तमाम अभिकर्ता और अन्य लोग भी सहमत होंगे कि दावा भुगतान को ‘निगम; सर्वाेच्च प्राथमिकता देता है और स्थिति यह है कि हम ग्राहकों को ढूँढ-ढूँढ कर भुगतान करते हैं। कई बार तो ग्राहक को पता ही नहीं होता कि उसे कोई बड़ी रकम मिलनेवाली है। ऐसे पचासों भुगतान का माध्यम तो मैं खुद बना हूँ जो पालिसियाँ मैंने नहीं बेचीं और जिनका अता-पता मेरे शाखा कार्यालय ने मुझे दिया, मैंने सारी औपचारिकताएँ पूरी करवाईं और ग्राहक को भुगतान का चेक दिया। ऐसे प्रत्येक मामले में ग्राहक ने मुझे बार-बार धन्यवाद दिया तो दिया ही, दुआएँ भी दीं। मुझे लगा कि एक ओर कहाँ तो हम भुगतान करने के लिए उतावले रहते हैं और कहाँ दूसरी ओर ग्राहक चक्कर लगाता रहता है। मुझे लगा कि कभी मेरा कोई ग्राहक नाराज हो गया तो उसका प्रतिकूल प्रभाव मेरी, जीवन बीमा एजेन्सी पर पड़ सकता है और मुझे व्यावसायिक नुकसान हो सकता है। यह ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। यह विचार आते ही मैंने चुपचाप वह एजेन्सी भी छोड़ दी।

आज, कोई आठ-दस बरसों से मैं केवल एलआईसी का काम कर रहा हूँ। शुरु में तो मुझे लगा था कि मुझे नुकसान हुआ है किन्तु मेरी आय के आँकड़े मेरी इस धारणा पर मेरा मुँह चिढ़ाते हैं। मेरी आय प्रति वर्ष बढ़ी। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राहक सेवाओं को लेकर आज मेरा एक भी ग्राहक मुझसे असन्तुष्ट नहीं है।

सारे काम छोड़कर एक ही काम करने के दो प्रभाव मैंने सीधे-सीधे अनुभव किए। पहला तो यह कि मैं अपने काम में अधिक दक्ष हुआ और दूसरा यह कि मेरे परिचय क्षेत्र में मुझे अतिरिक्त सम्मान से देखा जाने लगा। ग्राहकों से मेरा जीवन्त सम्पर्क बढ़ा और आज स्थिति यह है कि प्रति वर्ष मेरे ग्राहक बुला कर मुझे बीमा देते हैं। अपना परिचय देते हुए जब मैं कहता हूँ ‘‘मैं एलआईसी एजेण्ट हूँ और यही काम करता हूँ। इसके सिवाय और कोई काम नहीं करता।’ तो सामनेवाले पर इसका जो अनुकूल प्रभाव होता है उसे शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं हो रहा।

यह सब देखकर और अनुभव कर मुझे अनायास ही कवि रहीम का दोहा याद आ गया -

एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।
जे तू सींचौ मूल को, फूले, फले, अघाय।।

अर्थात् थोड़े-थोड़े पाँच-सात काम करने की कोशिश में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। इसके विपरीत यदि कोई एक ही काम हाथ में लिया जाए तो वह पूरा होता है उसके समस्त लाभ भी मिलते हैं और इस सीमा तक मिलते हैं कि हमारी सारी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। 

इसी क्रम में मुझे कवि गिरधर की एक कुण्डली याद आ रही है जो हमारी मातृसंस्था ‘एलआईसी’ पर पूरी तरह लागू होती है। कुण्डली इस प्रकार है -

रहिये लटपट काटि दिन, अरु घामे मा सोय।
छाँह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय।।
जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा दैहे।
जा दिन बहे बयारी, टूटी तब जर से जैहे।
कह गिरधर कविराय, छाँह मोटे की गहिये।
पाता सब झरि जाय, तऊ छाया में रहिये।।

अर्थात्, ‘चाहे तकलीफ में दिन काट लीजिए, चाहे धूप में सोना पड़े लेकिन किसी कमजोर-पतले वृक्ष की छाया में मत बैठिए। पता नहीं कब धोखा दे दे! किसी दिन आँधी में जड़ से उखड़ जाएगा। इसलिए किसी विशाल, मोटे, घनी वृक्ष की छाया में बैठिए। ऐसे वृक्ष के सारे पत्ते भी झड़ जाएँगे तो भी सर पर छाया बनी रहेगी।’ क्या आपको नहीं लगता कि ‘आर्थिक सुरक्षा और संरक्षा’ के सन्दर्भों में कवि गिरधर हमारी एलआईसी की ओर ही इशारा कर रहे हैं?

पूर्णकालिक (फुल टाइमर) अभिकर्ता के रूप में काम करने का सुख और सन्तोष अवर्णनीय है। इससे क्षमता और दक्षता में वृद्धि होती है जिसका अन्तिम परिणाम होता है - आय में वृद्धि। लेकिन इससे आगे बढ़कर एक और महत्वपूर्ण काम होता है - अधिकाधिक लोगों तक पहुँचकर उन्हें बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने का। 

यही तो ‘निगम’ का लक्ष्य है!
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‘अधिक’ को बेचने के बजाय बाँट कर भी कृतज्ञ

आज मेरा दिन जब शुरु हुआ तब तक मुहल्ले में, सब्जियों के बघार और सिकती रोटियों की गन्ध ने कुनकुनी धूप के साथ चहलकदमी शुरु कर दी थी। मैं लेण्डलाइन फोन पर एक ग्राहक से बात कर ही रहा था कि कि मोबाइल घनघनाया। उधर से पूरब, रवि का बेटा पुकार रहा था। ग्राहक से बात कर पूरब से फोन मिलाया। मेरे ‘हेलो’ कहते ही पूरब, सवा सौ किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से बोला - ‘अंकल! जैसे हो, चले आओ। आपके लिए बढ़िया ह्यूमन स्टोरी है। आपके मिजाज की है। आप गार्डन-गार्डन हो जाएँगे।’ 

रवि का मकान बहुत दूर नहीं है। पैदल-पैदल, सात-आठ मिनिटों में पहुँचा जा सकता है। कपड़े बदल कर तनिक तेजी से पहुँचा। घर में घुसने से पहले, किसी पकवान के तलने की, जबान को हरकत में ला देनेवाली, तेज गन्ध ने स्वागत किया। अन्दर गया तो देखा, उसकी गली में रहने वाला कैलाश तनिक गुमसुम बैठा है। आँखें गीली हैं। मानो अभी-अभी ही आँसू पोंछे हों। पूरब पास में खड़ा है। सामने, प्लेट में, धुँआ छोड़ रहे, गरम-गरम समोसे और एक बड़े बाउल में धनिये की चटनी रखी हुई है। मैं इस चटनी ‘पुष्पा स्पेशल चटनी’ कहता हूँ। है तो यह सामान्य चटनी ही लेकिन पता नहीं, पुष्पा भाभी इसे किस विधि से, क्या-क्या डाल कर बनाती हैं कि यह ‘कृष्ण की मथुरा’ की तरह ‘तीन लोक से न्यारी’ हो जाती है। यह इतनी स्पेशल है कि मैं पुष्पा भाभी से बार-बार कहता हूँ कि वे इस नुस्खे का पेटेण्ट करवा लें और इसकी व्यपारिक गुंजाइश पर सोचें। 

‘आईए! आईए! भाई सा’ब।’ गर्मजोशी से अगवानी करते हुए रवि बोला - ‘आपकी फेवेरिट चटनी के साथ गरम-गरम समोसे खाईए। लेकिन आज यह चटनी आपके लिए नहीं, कैलाश के लिए बनी है।’ कैलाश की दशा और रवि की इस बात ने मुझे चौकन्ना कर दिया। पूछा - ‘क्यों? आज कोई खास बात हो गई?’ कैलाश की तरफ इशारा करते हुए रवि बोला - ‘हाँ। लेकिन यह खास बात कैलाश ही बताएगा।’ मैं कुछ पूछूँ, उससे पहले ही कैलाश बोला - ‘ऐसा कुछ भी नहीं दादा। ये तो रवि भैया का बड़प्पन है जो ऐसा कह रहे हैं।’ फिर जो कुछ उसने बताया वह सब सुनकर लगा, रवि ने ठीक ही किया। ठीक ही कहा।

कैलाश पास के ही गाँव का रहनेवाला है। गाँव इतना पास है कि दिन में दो बार जाया-आया जा सकता है। ढंग-ढांग की खेती बाड़ी है। दो बेटों की खातिर इस कस्बे में आ बसा। बेटे बड़े हैं। दोनों का ब्याह हो चुका है। बड़ा बेटा खेती सम्हालता है। छोटा बेटा नौकरी में है। अच्छा, खाता-पीता, हैसियतवाला, भरा-पूरा परिवार है। घर का दो मंजिला मकान है। लेकिन मुहल्लेवाले उसे ‘भाव’ नहीं देते। रहन-सहन और खान-पान पर गाँव की छाप लगी हुई है। मकान के सामने खेती-किसानी का साज-ओ-सामान पड़ा रहता है। इसलिए मकान ‘चकाचक’ नहीं है। वार-त्यौहार पर तो कैलाश का परिवार मुहल्ले के समागम में शरीक किया जाता है लेकिन रोजमर्रा के व्यवहार में मुहल्लेवाले मानो कन्नी काटते हैं। कैलाश के मुताबिक - ‘मेरी नमस्ते का जवाब भी ऐसे देते हैं कि कहीं मैं घर आने की न कह दूँ।’ थोड़े में कहें तो कैलाश अपने ही मुहल्ले में दोयम दर्जे की नागरिकता जी रहा है।

बड़ा बेटा कल रात खेत पर ही था। आज, बड़े सवेरे लौटा तो हरा धनिया लेता आया। कुछ ज्यादा ही ले आया। इतना ज्यादा कि फेंकने को मन नहीं माना। इतना ज्यादा भी नहीं कि किसी सब्जीवाले को बेचा जा सके। ‘तो दादा! सोचा कि किसी को दे दूँ।’ कैलाश ने बताना शुरु किया - ‘लेकिन किसे दूँ? सब तो मुझसे बिचकते हैं। तभी मुझे रवि बाबू का ध्यान आया। एक ये रवि बाबू ही हैं जो हमेशा, मार्निंग वाक से आते हैं तो आगे रह कर मुझसे नमस्ते करते हैं। इनका ध्यान आते ही याद आया कि अभी ये मार्निंग वाक से लौटने ही वाले हैं। मैं इनकी राह देखते हुए घर के बाहर खड़ा हो गया। ये आए तो हिम्मत करके पूछा कि अपने खेत से आज ज्यादा धनिया आ गया है। आप ले लोगे क्या? मेरी बात सुनकर इन्होंने फौरन कहा - ‘हाँ! हाँ। ले लेंगे। लाओ।’ मैं भागा-भागा घर में गया और जितना धनिया ज्यादा था, सब का सब ले आया। देख कर रवि बाबू बोले - ‘इतना? ये तो बहुत ज्यादा है कैलाश!’ तो मैंने कहा कि आप किसी और अपनेवाले को दे देना। मेरी बात सुनकर रवि बाबू ने खुशी-खुशी धनिया ले लिया। मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ। मुझे तो लगा था कि ये इंकार कर देंगे। लेकिन इन्होंने ले लिया। मैं नहा-धो कर घर से निकलने ही वाला था कि पूरब आ गया। बोला कि चलिए, पापा नाश्ते के लिए बुला रहे हैं। मेरी समझ में नहीं आया। मैं कुछ बोलता उससे पहले ही पूरब आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे।’ 

आगे की बात रवि ने बताई - ‘ढेर सारा धनिया देख कर श्रीमती अचरज में पड़ गईं। इतनी सुबह, इतना सारा धनिया कहाँ से ले आए? मैंने पूरी बात बताई तो खुश हो गईं। बोली कि तो फिर आज चटनी बना लेती हूँ। सुनते ही मैंने कहा कि फिर तो अभी नाश्ते में समोसे बना लो और विष्णु भाई सा’ब को बुला लो। तो श्रीमतीजी बोली कि साथ में कैलाश भैया को भी बुला लो। धनिया उन्हीं ने दिया है। तो आज के नाश्ते का चीफ गेस्ट अपना यह कैलाश है। कैलाश को यह सब मालूम हुआ तो रोने लगा। कहने लगा कि मुहल्ले में पहली बार किसी ने उसे इतना मान-सम्मान दिया।’

रवि की बात सुनकर मेरी आँखों की कोरें भी भीग गईं। रवि की कॉलोनी से लगी कॉलोनी में ही मैं रहता हूँ। मेरी गली में बीस-बाईस मकान हैं। लेकिन मिलने-मिलाने के नाम पर कोई किसी के घर नहीं आता-जाता। बाहर, सड़क पर, घरों के सामने दो-दो, चार-चार इकट्ठे होकर, खड़े-खड़े बात कर लेते हैं। आमने-सामने होने पर मुस्कुरा कर अभिवादन कर लेते हैं। किसी से परहेज करना तो दूर, अनदेखी भी नहीं करते। जानता हूँ कि आदमी भीड़ में भी अकेला हो जाता है। लेकिन ऐसा उसकी अपनी पसन्दगी और मनःस्थिति के कारण होता है। वैसे भी ‘कॉलोनी कल्चर’ के शिकार हम सब, कांक्रीट के जंगल में रह रहे हैं। लेकिन कैलाश तो उपेक्षा और परहेज का भी शिकार है! किसी अस्पृश्य की तरह। उसकी मनोदशा का तो अनुमान भी नहीं किया जा सकता। वह ठहरा गाँव का आदमी। गाँव, जहाँ एक का दुख, सबका दुख होता है। किसी के मकान की नींव खुदाई शुरु होने पर पूरा गाँव गुड़-धनिया खाता है। एक घर का जमाई आता है तो पूरा मोहल्ला उसे चाय पिलाने के लिए घर-घर बुलाता है। कैलाश तो आज भी अपने गाँव में ही रह रहा है। कस्बाई नहीं हो पाया। हो पाता तो अतिरिक्त धनिये से दो पैसे खड़े कर लेता। लेकिन वह समझदार नहीं बन पाया। निपट देहाती ही रहा। अपना ‘अधिक’, बेचने के बजाय बाँटना ही सूझा। सामाजिक स्तर पर उसके साथ की जा रही क्रूरता का आंतक यह कि वह लेनेवाले के प्रति आभारी और कृतज्ञ है।

हम सब हरी चटनी के साथ समोसे खा रहे हैं। ‘पुष्पा स्पेशल चटनी’ मुझे आज कुछ अधिक और अतिरिक्त स्पेशल लग रही है। कैलाश के धनिये की खुशबू और उसके कृतज्ञ आँसुओं का खारापन इसमें समा गया है।
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‘सुबह सवेरे’,भोपाल, 08 फरवरी 2018



तनुजा और काजल की सुन्दरता: औरत की नजर

सुन्दरता की कोई सुनिश्चित और सुस्पष्ट परिभाषा अब तक तय नहीं हो पाई है। सबके पास अपनी-अपनी परिभाषा है। वह उक्ति ही ठीक लगती है कि सुन्दरता की परिभाषा तो वस्तुतः देखनेवाले की आँख की पुतली में ही समाई हुई है। आज शाम, पुरानी फिल्म ‘अनुभव’ देखने के दौरान मेरी उत्तमार्द्धजी की एक टिप्पणी ने यह बात दिला दी।

‘अनुभव’ नाम की दो फिल्में बनी हैं। पहली 1971 में, तनूजा, संजीव कुमार, ए. के. हंगल, दिनेश ठाकुर अभिनीत। बसु भट्टाचार्य इसके निदेशक और रघु रॉय संगीतकार हैं। दूसरी ‘अनुभव’ 1986 में बनी जिसमें पद्मििनी को ल्हापुरे, शेखर सुमन, ऋचा शर्मा मुख्य भूमिकाओं में थे। काशीनाथ इसके निर्देशक और राजेश रोशन संगीतकार हैं। यह फिल्म, कन्नड़ में बनी ‘अनुभव’ की हिन्दी प्रतिकृति है। मैं बात कर रहा हूँ पहली, 1971 में बनी ‘अनुभव’ की। 

आज शाम ‘एवरग्रीन क्लासिक’ चेनल पर यह फिल्म शुरु हुई तो हम पति-पत्नी अपने सारे काम छोड़ कर इसे देखने बैठ गए। फिल्म देखते-देखते उत्तमार्द्धजी ने कहा - ‘ये तनूजा कितनी सुन्दर है? काजल (या कि काजोल) इसी की बेटी है ना? लोग उसकी खूबसूरती पर मरे जाते हैं लेकिन तनूजा के सामने तो काजल कुछ भी नहीं।’ मैं फिल्म देखने में मगन था। कोई व्यवधान नहीं चाह रहा था। सो एक छोटी सी ‘हूँ’ करके रह गया। लेकिन ‘हूँ’ करते ही कोई तीस-चालीस बरस पीछे चला गया।

ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन यह 1980 के आसपास की बात होगी। मेरे कस्बे के नेहरू स्टेडियम में बहुत बड़ा मुशायरा हुआ था। बिलकुल ही याद नहीं कि उसमें कौन-कौन शायर आए थे। लेकिन संचालक का नाम मैं अब तक नहीं भूल पाया हूँ। उनका नाम सकलैन हैदर था। किसी मुशायरे/कवि सम्मेलन का वैसा संचालक मैं उसके बाद अब तक नहीं देख/सुन पाया हूँ। शायर अपनी रचना पढ़ कर जैसे ही बैठते, सकलैन हैदर उनकी पूरी की पूरी रचना ऐसे दोहरा देते थ। केवल दोहराते ही नहीं, इतनी सहजता, धाराप्रवहता और समुचित शब्दाघात से दहराते मानो यह उन्हीं ने लिखी हो।

संचालन के दौरान उन्होंने हिन्दी-उर्दू को लेकर चल रही बातों पर टिप्पणी करते हुए उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं को ‘हिन्दी की बेटियाँ’ बताते हुए जो कहा था वह मुझे अब तक शब्दशः याद है। उन्होंने कहा था - ‘ उर्दू और दूसरी हिन्दी जबानें यकीनन हिन्दी की बेटियाँ हैं। लेकिन इस सच का क्या कीजै कि बेटियाँ हमेशा माँ से ज्यादा जवान और ज्यादा खूबसूरत होती हैं।’ समूचा श्रोता समुदाय अश्-अश् कर तालियों से आसमान गुँजा रहा था। बाद के बरसों में, सकलैन सा‘ब की यह टिप्पणी मैंने कई बार, बार-बार काम में ली और प्रशंसा पाई। लेकिन सकलैन सा‘ब का हवाला देने की ईमानदारी मैंने हर बार बरती। 

मेरी उत्तमार्द्धजी की टिप्पणी के जवाब में ‘हूँ’ करते ही मुझे सकलैन साब  और उनकी टिप्पणी की याद हो आई। तनूजा को देखते हुए उत्तमार्द्धजी यदि (तनुजा की सुन्दरता को लेकर) कुछ नहीं कहती तो कोई बात नहीं होती। तब यह अनुमान लगाया जा सकता था कि वे ‘नारी न मोहे नारी के रूपा’ की ईर्ष्या भावना के अधीन चुप हैं। लेकिन वे माँ के मुकाबले बेटी को कम सुन्दर बता रही थीं। मैं विचार में पड़ गया। दशकों पहले सकलैन साब की बात मुझे स्वाभाविक और प्राकृतिक सच लगी थी। अब भी लग रही है। लेकिन उत्तमार्द्धजी की बात सुनकर मैं असमंजस में पड़ गया। अब, सकलैन साब की बात मुझे एक शायर की साहित्यिक उक्ति लग रही थी और उत्तमार्द्धजी की बात (एक औरत द्वारा दूसरी को अधिक सुन्दर बताना) ज्यादा सच।

फिल्म समाप्त हुए दो घण्टे से अधिक का वक्त हो रहा है। मैं असमंजस से बाहर नहीं आ पा रहा हूँ। मैंने तनूजा और उनकी बेटी काजल को कभी इस तरह, सुन्दरता के पैमाने पर नहीं तौला। 

लिहाजा, मैं सबसे पहले सुनी उक्ति पर ही अन्तिम भरोसा कर रहा हूँ - सुन्दरता देखनेवाले की आँख की पुतली में ही समाई हुई है।
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(पोस्ट तो यहीं खत्म हो गई लेकिन इस पुछल्ले का आनन्द ले लीजिए। तनुजा अपने समय की सर्वाधिक ‘बिन्दास’, चुलबुली और अपनी मनमर्जी की मालिक अभिनेत्री के रूप में पहचानी जाती थी। आज से कोई चार दशक पहले ‘हॉट पेण्ट’ पनहन कर उन्होंने फिल्मी दुनिया में सनसनी मचा दी थी। अपनी फिल्मों की नायिकाओं के साथ करने के अनुभव सुनाते हुए संजीव कुमार ने कहा था - ‘तनुजा के साथ काम करते हुए बराबर लगता रहा कि फिल्म में दो हीरो हैं।’)
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खुशियों की खीर में ‘पुरवाई’ का नींबू

नगर निगमों, नगर पालिकाओं, नगर परिषदों और ग्राम पंचायतों के कर्मचारी बने हुए लगभग पौने तीन लाख अध्यापक अब पक्के सरकारी कर्मचारी बन गए। अब ये सब शिक्षा विभाग के अधीन, अध्यापक हो गए। मुख्यमन्त्री शिवराज ने घोषणा कर दी। ये सब खुश तो हैं लेकिन इसे सरकार की महरबानी न मानें तो ताज्जुब क्या? ये लोग इस प्राप्ति को अपने लम्बे संघर्ष के दौरान भुगती उपेक्षा, प्रताड़ना, वेतन कटौती, अवमानना, पिटाई, जेल यात्राओं जैसी पीड़ाओं का प्रतिफल क्यों न मानें? यह सब इन्हें मुफ्त नहीं मिला। इसके लिए इन्होंने क्या कुछ नहीं झेला? क्या कुछ नहीं सहा? ये लोग खुश भी हैं और सन्तुष्ट भी।

मेरी उत्तमार्द्धजी अध्यापक रही हैं। वर्ष 2012 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली। लेकिन उससे पहले ही प्रबुद्ध मुनीन्द्र दुबे और जुझारू सुरेश यादव से मरा सम्पर्क बन गया। सुरेश इस संघर्ष में, प्रदेश स्तर पर पहली पंक्ति के योद्धाओं में शरीक रहा है। बाद में मुनीन्द्र और सुरेश जैसे और लोगों से सम्पर्क बन गया। इसीलिए मुझे इस समूचे संघर्ष की दैनिक जानकारी ‘आँखों देखा हाल’ की तरह मिलती रही। इन अध्यापकों की खुशी मैं भली प्रकार अनुभव कर पा रहा हूँ। कच्चे गारे से  बनाई अपनी काली-भूरी ईंटों को ताम्बई रंग में, भट्टे से निकलते देख कर कुम्हार जिस तरह खुश होता है, उसी तरह ये लोग खुश हैं। 

1995 में, दिग्विजय सिंह काल में, शिक्षाकर्मियों की नियुक्तियाँ शुरु हुई थीं। तब इन्हें वर्गानुसार क्रमशः 500, 800 और 1000 रुपये वेतन (केवल 10 महीनों का) मिलता था। गुरुजी योजना के अधीन, 500 सौ रुपये मानदेय वाले स्कूल खोले गए।  2001 में संविदा शाला शिक्षकों की भर्ती, पूर्णतः अस्थायी भर्ती हुई। महिलाओं को प्रसूति अवकाश नहीं मिलता था।  एक अप्रेल 2007 में अध्यापक संवर्ग बनाकर सबको अध्यापक नाम दिया गया। तब शिक्षाकर्मी नियमित थे। संविदा शिक्षकों को नियमित किया गया। गुरुजी को पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने पर नियमित किया गया। तभी, 1995 की, शिक्षाकर्मियों की भर्ती को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया। वर्ष 1998 में, 2256 रुपये मासिक वेतन पर शिक्षाकर्मियों की नियमित भर्ती हुई। 2007 आते-आते यह वेतन 2550 रुपये मासिक हुआ। अपनी कुछ माँगों को लेकर इन लोगों ने 1998 में तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री अर्जुनसिंह और मुख्यमन्त्री दिग्विजयसिंह की मौजूदगी में बड़ी रैली निकाली। तेरह दिनों के आकस्मिक अवकाश के लिए इन्होंने 1998 के बाद फिर प्रदर्शन किया। 

2002 और 2003 में इन लोगों ने  हड़तालें की जो एक-एक महीने चलीं लेकिन दोनों ही बार हाथ खाली रहे। तब भाजपा विपक्ष में थी। 2003 के अपने चुनावी घोषणा-पत्र में भाजपा ने वादा किया कि यदि उसकी सरकार बनी तो वर्ग भेद समाप्त कर समान वेतन दिया जाएगा। लेकिन जैसा कि होता है, सरकार बनने के बाद भाजपा अपना वादा भूल गई। तब ये लोग 2004 में 23 और 2005 में 53 दिनों तक आन्दोलनरत रहे। हजारों अध्यापकों ने दिल्ली में तीन दिन तक प्रदर्शन किया। तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह से एक घण्टा बात हुई। उनसे मिले आश्वासन के बाद दिल्ली में तो आन्दोलन खत्म हो गया लेकिन भोपाल में चलता रहा।

भोपाल में बड़ी रैली निकलनी थी। इन्हें भोपाल पहुँचने से रोकने के लिए घरों, बस स्टैण्डों, रेल्वे स्टेशनों से गिरफ्तार किया गया। करीब 500 महिला-पुरुष शिक्षाकर्मियों को भोपाल केन्द्रीय जेल में अपराधियों के साथ तीन दिन बन्द रखा गया। शिवराज की मध्यस्थता से आन्दोलन खत्म हुआ। रिटायर्ड आईएएस डीपी दुबे वाली एक सदस्यीय समिति बनाई गई। समिति ने अनेक सिफारिशें कीं लेकिन एक भी नहीं मानी गई। 2007 में भोपाल के सुभाष मैदान में करीब 50 हजार शिक्षाकर्मियों, संविदा शिक्षकों, गुरुजियों से, शिवराज ने दुबे समिति की सभी माँगें मानने का वादा किया। लेकिन कुछ ही मानी गईं। 

अपनी माँगों के लिए ये लोग मानो सपनों में भी रणनीति ही बनाते रहे। 2009 में ऐन शिक्षक दिवस के दिन भोपाल में प्रदर्शन के दौरान महिला-पुरुष अध्यापकों को पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। 40 को गिरफ्तार किया गया। प्रदेश भर में 200 को निलम्बित किया गया। (वे 6 महीने निलम्बित रहे।) उस दिन मेरे कस्बे रतलाम में, शिक्षामन्त्री का पुतला जलाते हुए तीन अध्यापक झुलस गए थे। 2013 में ये लोग 23 दिनों तक आन्दोलनरत रहे। प्रदेश में कई जगहों पर अनशन किए गए। देवास में, अनशनरत एक महिला अध्यापक इलाज के दौरान चल बसी।

सरकार ने 2013 से छठा वेतनमान देने की घोषणा की जिसमें कई कमियाँ थीं। इसे लेकर 2015 में 13 दिन की हड़ताल हुई। तब भोपाल में हुई रैली पर भीषण लाठीचार्ज हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों में से एक ने कहा था -‘ऐसा लग रहा था सर! मानो पुलिस किसी को जिन्दा वापस नहीं जाने नहीं देगी।’ ‘लाज बचाने’ के मुकाबले ‘जान बचाने’ की चिन्ता में महिलाएँ अधनंगी दशा में भागीं। सरकार के मुताबिक 12000 लोगों पर धारा 110 की कार्रवाई की गई। प्राण बचाने के लिए भाग रही अधनंगी महिलाओं के चित्र देखकर मेरी उत्तमार्द्धजी उस दिन खूब रोई थीं।

22 जनवरी को मैं कोई 23 शिक्षाकर्मियों से मिला। वे सब खुश तो थे लेकिन उनकी खुशी में खनक कम और कसक, पीड़ा,  कराहें अधिक थी।  एक ने कहा - ‘सर! 1995 में शिक्षाकर्मी की नौकरी कहने को जरूर नियमित थी लेकिन सुविधा कुछ नहीं थी। एक दिन का अवकाश लेने पर वेतन कटता था।’ दूसरे ने कहा - ‘2005 और 2015 में जब पुलिस घरों पर दबिश देकर हमें पकड़ रही थी तो आस-पड़ोसवाले हमें अपराधी समझते थे।’ तीसरे ने तनिक उग्र होकर कहा - ‘सर! आज शिवराजजी भले ही कुछ भी कहें। लेकिन मेरे कुछ साथी उस दौर में एक समय भोजन करते थे ताकि बच्चों को दूध पिला सकें।’ एक और ने कहा - ‘यह लड़ाई हमने अपनी एक-एक साँस होम कर जीती है सर! हमारे कई साथी चले गए। उनके अन्तिम संस्कार के लिए अनुग्रह राशि भी नहीं मिली।’ एक और ने कहा - ‘बैरागी सर! हमारी दशा देख-देख कर लोग हमारा मजाक उड़ाते थे। किसी अफसर से बहस करते हुए कभी अखबार में फोटू छप जाता तो घरवाले ही डाँटते-फटकारते थे।’ एक बहुत ही धीर-गम्भीर और प्रबुद्ध अधेड़ शिक्षक ने कड़वाहटभरी फीकी हँसी हँसते हुए कहा - ‘यह क्षण हमारी पीड़ाओं, हम पर हुए जुल्मों का आनन्द लेने का क्षण है सर! हमें याद है कि प्रदर्शन के लिए भोपाल जाते हुए हमें बसों, रेलों में छापामारी कर डाकुओं, आतंकियों की तरह उतार लिया गया, कोसों दूर जंगलों में छोड़ दिया गया था। रेकार्ड पर लिए बिना हमें गिरफ्तार रखा गया। अंग्रेज भी यही करते थे। हमारे कई लोग सप्ताहों तक लापता रहे जो रोते-गाते, जैसे-तैसे अपने घरों पहुँचे।’ शादी लायक हो रही बेटी के बाप एक अध्यापक ने कहा - ‘मुख्यमन्त्रीजी इस तरह बात कर रहे हैं जैसे उन्होंने हमारे खानदानों पर उपकार कर दिया हो। वे कह रहे हैं कि 21 वर्षों का यह अन्याय खत्म करने का सौभाग्य उन्हें मिला। लेकिन सर! 21 वर्षों के इस अन्याय में 12 वर्ष तो उनके अन्याय के ही हैं! यह उन्हें याद नहीं आता? कोई न्याय-व्याय नहीं सर! ये तो चुनाव में हमारे वोट लेने के लिए किया गया है। वर्ना उनका बस चलता तो वो तो अभी कुछ नहीं देते।’ एक और ने कहा - ‘हम शिवराजजी की इस देन की खुशियाँ मनाना चहते हैं सर! लेकिन उनकी ऐसी बातें हमारी खुशियों की खीर में नींबू निचोड़ देती हैं सर!’

इस अन्तिम टिप्पणी से मुझे नीरजा (मेरे छोटे भतीजे गोर्की की उत्तमार्द्ध) द्वारा सुनाया किस्सा याद आ गया जो उसके पिताजी ने उसे सुनाया था। उत्तर प्रदेश के पहले मुख्य मन्त्री (और भारत के चौथे गृह मन्त्री) पण्डित गोविन्द वल्लभ पन्त के हाथ और गरदन लगातार काँपते-हिलते रहते थे। 1928 में, साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठियों से उनकी पिटाई की थी। यह उसीका परिणाम था। एक दौरे में, एक पुलिस दरोगा उनके सामने आया तो वे मुस्कुरा पड़े। दरोगा खुश हो, जोरदार सेल्यूट देकर बोला - ‘सरकार! आपने हमें पहचाना?’ पन्तजी की मुस्कुराहट चौड़ी हो गई। बोले - ‘आपको तो चाह कर भी नहीं भूल सकते भाई! जब-जब पुरवाई चलती है, आप याद आ जाते हो।’ दरोगा झेंप गया। पन्तजी पर लाठियाँ भाँजनेवाला वही था।

सोच रहा हूँ, विधान सभा के चुनावों ने दस्तक दे दी है। ये चुनाव शिवराज और भाजपा के लिए जीवन-मरण जैसी लड़ाई है। खुद शिवराज या उनके सिपहसालार भाषणों, वक्तव्यों में जब शिक्षकों पर किया गया यह ‘उपकार’ याद दिलाएँगे तो इन अध्यापकों की दशा, मनोदशा क्या होगी? ‘पुरवाई’ इन्हें सताएगी या गुदगुदाएगी?

सच में, इन पौने तीन लाख अध्यापकों के विवेक, बुद्धि, संयम और संस्कारों की परीक्षा लेंगे ये चुनाव।
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वह धर्म जताता रहा, बीमे चले गए

और आखिकार वह हो ही हो गया जिसके लिये मैं मन ही मन मना रहा था कि ऐसा न हो। कभी न हो।

अपने धार्मिक आग्रहों का आक्रामक प्रकटीकरण आदमी को भले ही आत्म-सन्तुष्ट करे किन्तु वह अन्ततः हानिकारक ही होता है। इसका प्रभाव व्यापक होता है। आदमी का दायरा सिकुड़ता जाता है। वह अपने धर्म के अनुयायियों के बीच ही सिमटता जाता है। अपनों के बीच ही रहना आदमी की लोकप्रियता कम करता है। उसके चाहनेवालों की संख्या अपवादस्वरूप ही बढ़ती है। इसके विपरीत उसके न चाहनेवालों की संख्या बढ़ती जाती है। एक तो अपनेवालों को अपनेवाले की कमियाँ और अवगुण मालूम होते हैं और दूसरे, अपनेवालों के बीच एक अघोषित प्रतियोगिता सदैव बनी ही रहती है। ऐसे में, पराये तो पराये ही रहते हैं, सारे क सारे अपनेवाले भी अपनेवाले नहीं रह पाते। इन्हीं बातों के चलते मैं इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि मेरे धार्मिक आग्रह सामनेवाले को जाने-अनजाने आहत न कर दें।

यह बात मैं अपने साथी बीमा अभिकर्ताओं को निरन्तर कहता रहता हूँ। अभिकर्ताओं के प्रशिक्षण सत्रों मे जब भी मुझे बोलने का अवसर मिलता है तो मैं यह बात विशेष रूप से उल्लेखित करता हूँ। मैं बार-बार कहता हूँ हम हम अभिकर्ता व्यापारी/व्यवसायी हैं। हमारी जमात में और ग्राहकों में सभी धर्मों, जातियों के लोग शामिल हैं। इसलिए हमें पानी की तरह बने रहना चाहिए - जिसमें मिलें, हमारा रंग वैसा ही हो जाए। हमारे साथियों और ग्राहकों को लगना चाहिए कि हम उनके ही जैसे हैं। वे हमें अपने जैसा ही अनुभव करें। कुछ बरस पहले जब ‘कॉलर ट्यून’ का फैशन उफान पर था तब मेरे अनेक अभिकर्ता साथियों ने अपने-अपने धर्मों से जुड़े गीत, सबद, आरतियाँ आदि को अपनी कॉलर ट्यून बना रखी थीं। मैं उनसे कहता था कि ऐसा करना उनके लिए फायदेमन्द हो न हो, नुकसानदायक जरूर हो सकता है। लेकिन मेरी बात सुनने को न तब कोई तैयार था न अब है। लेकिन अभी-अभी वह हो ही गया। धार्मिक आग्रहों के आक्रामक प्रकटीकरण ने एक अभिकर्ता से दो बीमे छीन लिए।

एक रविवार सुबह एक अपरिचित ने, मेरे एक परिचित का हवाला देते हुए फोन किया। वे मुझसे फौरन ही मिलना चाहते थे। मैं फुरसत में तो नहीं था किन्तु जो काम हाथ में था, उसे बाद में भी किया जा सकता था। मैंने कहा - ‘फौरन पधार जाइए।’ बीस मिनिट बीतते-बीतते वे मेरे सामने थे। लेकिन अकेले नहीं, अपने दो बेटों के साथ। 

मुझे लगा, कोई सिफारिश का मामला होगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्होंने मुझे ऐसा सुखद आश्चर्य दिया कि मैं अन्दर से हिल गया। आते ही बोले - ‘हम लोग बहुत जल्दी में हैं। दोनों बच्चों को अपनी-अपनी नौकरियों पर जाना है। आप फटाफट इन दोनों के बीमे कर दीजिए।’ मैंने कहा कि मुझे दोनों बच्चों से बात करनी पड़ेगी, उनका जानकारियाँ लेनी पड़ेंगी, थोड़ा वक्त तो लगेगा। उन्होंने कहा - ‘दोनों प्रायवेट कम्पनियों में नौकरी कर रहे हैं। एक तीन साल से दूसरा साढ़े चार साल से। बीमारी के बहाने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है। दोनों का कोई अंग-भंग नहीं है। कोई शारीरिक विकृति नहीं है। हमारी फेमिली हिस्ट्री बढ़िया है। इनकी कोई बहन नहीं है। हम पति-पत्नी और ये दोनों पूर्ण स्वस्थ और सामान्य हैं। और क्या जानना है आपको?’ जिस तेजी से और धाराप्रवाह रूप से वे बोले और तमाम जानकारियाँ एक साँस में दे दीं, मुझे लगा, मैं बीमा प्रशिक्षण केन्द्र में एक कुशल व्याख्याता को सुन रहा हूँ। तनिक कठिनाई से, लगभग हकलाते हुए मैंने कहा - ‘लेकिन इन्हें कौन सी पालिसी देनी है, यह तो तय करना पड़ेगा।’ उसी अन्दाज में उन्होंने फटाफट दो बीमा योजनाओं के नाम बता दिए। कितने का बीमा करना है, यह भी बता दिया। बात जारी रखते हुए बोले - ‘मुझे किश्त की रकम भी मालूम है। आप तो फार्म निकालिए और फटाफट दोनों के सिगनेचर लीजिए। सारे कागज पूरे के पूरे साथ हैं।’ मैं चक्कर में पड़ गया था। कहाँ तो एक-एक ग्राहक के लिए पाँच-पाँच चक्कर लगाने पड़ते हैं, उसे और उसके पूरे परिवार को पॉलिसी के ब्यौरे बार-बार समझाने पड़ते हैं। तब भी, जब तक दस्तखत न कर दे और प्रीमीयम की रकम न दे-दे, तब तक धुकधुकी बनी रहती है कि कहीं आखिर क्षण में इंकार न कर दे और कहाँ ये सज्जन हैं जो खरीदने की उतावली में बेचनेवाले के घर चलकर आए हैं! 

मेरे लिए बोलने की तनिक भी गुंजाइश नहीं रही थी। मैंने दोनों के कागज देखे। सब बराबर थे। मैंने दोनों के शारीरिक माप लिए, वजन लिया, दस्तखत कराए और कहा - ‘इन दोनों का काम तो हो गया। आप चाहें तो इन्हें भेज दें और इनकी जानकारियाँ लिखवाने के लिए आप रुक जाएँ।’ उन्होंने ऐसा ही किया। 

बच्चों के जाने के बाद मैंने ब्यौरे लिखने शुरु किए तो नाम और पिता का नाम लिखने के बाद जैसे ही पता लिखने लगा तो मेरा हाथ रुक गया। मैं बीमा अभिकर्ताओं का छोटा-मोटा नेता भी हूँ। अधिकांश अभिकर्ताओं की फौरी जानकारियाँ मुझे हैं। जैसे ही उन्होंने पता बताया, मुझे याद आया कि उनके मकान के ठीक दो मकान आगे ही एक अभिकर्ता का निवास है। मैंने कहा - ‘आपके पड़ौस में ही एक बीमा ऐजेण्ट रहता है। उसे छोड़ आप करीब दो किलो मीटर दूर मेरे पास आए! क्या उसने आपसे कभी सम्पर्क नहीं किया?’ वे तनिक उग्र होकर बोले - ‘देखिए मैं तो आपको जानता भी नहीं। आपका नाम-पता तो मुझे उन्होंने (मेरे परिचित का नाम लिया) बताया। उन्होंने आपके काम की तारीफ भी। मैं आप पर नहीं, उन पर भरोसा करके आपके पास आया। हाँ! आपने सही कहा कि मेरे पास ही एक एजेण्ट रहता है। सच्ची बात तो यह है कि ये दोनों बीमे उसी से करवाने थे। सारी बातें और पॉलिसियाँ मुझे उसी ने समझाईं। लेकिन उसकी बार-बार की एक हरकत ने मुझे चिढ़ा दिया। इसी कारण आपके पास आया।’

मैं सतर्क हो गया। बीमा एजेण्ट में क्या खूबियाँ होनी चाहिएँ और कौन-कौन सी बातें नहीं होनी चाहिएँ, इसकी न तो कोई अन्तिम सूची होती है न ही कोई सीमा। ऐसी बातें जानने के लिए मैं सदैव उत्सुक और उतावला बना रहता हूँ। ऐसी जानकारियाँ मुझे सुधारने और बेहतर बनाने में बड़ी मददगार होती हैं। बीमे तो मुझे मिल ही गए थे, अब जो मिलनेवाला था वह मेरे लिए अतिरिक्त लाभ था। मैंने अपना पूरा ध्यान अब उनकी बात पर लगा दिया। बड़ी ही उग्रता और खिन्नता से बोले - ‘मैंने उसको बार-बार इशारों ही इशारों में समझाया लेकिन वह समझने को तैयार ही नहीं हुआ। मैं उसे नमस्कार करूँ और वह जवाब में अभिवादन करने के बजाय अपने धर्म-देव का जयकारा लगाए। मैंने कम से कम पाँच बार उससे नमस्कार किया लेकिन उसने जवाब में एक बार भी नमस्कार नहीं किया। हर बार अपने धर्म-देव की जय बोलता रहा। मैंने देखा कि इसमें इतनी भी सूझ-समझ और कॉमन सेंस नहीं कि ग्राहक की भावना की चिन्ता करे। उसे तो अपने धर्म की और अपने भगवान की ही चिन्ता है। तो मैंने तय किया कि जो मेरी, मेरी भावना की चिन्ता नहीं करे, उससे मुझे बीमे नहीं कराना। फिर मैं भी क्यों नहीं किसी अपने धर्मवाले से बीमा कराऊँ? इसलिए मैंने उन्हें (मेरे परिचित को) फोन किया। उन्होंने आपका नाम, अता-पता बताया और मैं आपके पास चला आया।’

मुझे काटो तो खून नहीं। बिना कोशिश के, घर बैठे बीमे (और बीमे भी अच्छे-खासे, बड़े) मिलने की खुशी उड़ गई। ये बीमे मुझे मेरे व्यावसायिक कौशल, ज्ञान, मेरे व्यवहार, मेरी उत्कृष्ट ग्राहक सेवाओं के दम पर नहीं, धर्म के नाम पर मिले थे। और वह भी अपने धर्म के प्रति प्रेम-भाव से नहीं, किसी और के धर्म के प्रति उपजी चिढ़, वितृष्णा के कारण मिले थे। उन्हें अपना धर्म याद नहीं आया था, किसी ने अपने धार्मिक आग्रहों का निरन्तर प्रकटीकरण कर, उन्हें उनका धर्म याद दिला दिया। वे पड़ोसी-धर्म के अधीन उससे बीमे कराना चाह रहे थे लेकिन वह पड़ोसी धर्म के मुकाबले अपने रूढ़ धर्म पर अड़ा रहा और न केवल दो बीमे खो दिए बल्कि एक अच्छे पड़ोसी की सद्भावनाएँ भी खो दीं। 

सच कह रहा हूँ, मुझे घर बैठे मिले इन दो बीमों की खुशी उतनी नहीं हो रही जितना कि एक बीमा एजेण्ट द्वारा अपना व्यावसायिक धर्म भूलने का और इसी कारण धन्धा खोने का दुख हो रहा है। पता नहीं, उस एजेण्ट ने धर्म की कीमत चुकाई या अपने धर्म की रक्षा की।

पता नहीं हम कब समझेंगे कि धर्म हमारा नितान्त व्यक्तिगत मामला होता है। जब हम अपने धार्मिक आग्रह सार्वजनिक करते हैं तो उसके नकारात्मक प्रभाव हमारी सार्वजनिकता पर होता है। यह बहुत बड़ा नुकसान है - व्यक्ति का भी, समाज का भी और देश का भी।
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