बात जरूर कर, लेकिन ‘यूँ ही’ मत कर

रतलाम में होता हूँ तो अखबार पढ़ने का मन नहीं होता। लेकिन जब इन्दौर में होता हूँ तो अखबार की तलाश रहती है। काम-धाम कुछ रहता नहीं। फुरसत ही फुरसत रहती है। वहाँ अखबार मुश्किल से मिल पाता है। दो-तीन दिनों के लिए जाता हूँ। बन्दी के अखबार बाँटनेवाले हॉकर के पास अतिरिक्त प्रतियाँ नहीं होतीं। रिंग रोड़ पर सिन्धिया प्रतिमा चौराहे पर अखबारवाला आता तो है लेकिन अपने मन का राजा है। उसके बाद अखबार मिलता है ठेठ पलासिया चौराहे पर। इतनी दूर कौन जाए? इसलिए, सुबह-सुबह सड़क पर आ खड़ा होता हूँ। इस उम्मीद से कि कभी, कोई हॉकर महरबान हो जाए। 

इसी ‘कृपाकांक्षा’ में परसों, मंगलवार की सुबह कनाड़िया मार्ग पर आ खड़ा हुआ। सामनेवाली मल्टी के नीचेवाली होटल की सर्विस रोड़ के लिए बनी दो-फुटी दीवाल पर टिक गया। सात बज रहे हैं। होटल खुली नहीं है। एक ऑटो खड़ा है। दो सज्जन बैठे हुए हैं। बतिया रहे हैं। कड़ाके की सर्दी है - तापमान सात डिग्री। मैं उनकी बातें सुनने लगता हूँ। अपनी तरफ मेरा ध्यान देखकर वे अपनी बातों का सिलसिला तोड़ देते हैं। पूछते हैं - ‘कहीं बाहर से आए हैं? नए लगते हैं। पहले कभी नजर नहीं आए।!’ मैं अपना परिचय देता हूँ और वहाँ बैठने का मकसद बताता हूँ। एक कहता है - ‘आपको अखबार शायद ही मिले। लेकिन थोड़ी देर राह देख लीजिए। पाँच-सात रुपयों के लालच में कोई हॉकर किसी बन्दी वाले का अखबार आपको दे-दे।’ मैं मौन मुस्कुराहट से जवाब दे देता हूँ। उनकी बातों का टूटा सिलसिला जुड़ जाता है -

‘बहू को अच्छी नहीं लगी कैलाश की बात।’

‘कौन सी बात?’

‘वही! प्रियंका को चिकना चेहरा कहनेवाली बात।’

‘हाँ। वो तो अच्छा नहीं किया कैलाश ने। ऐसा नहीं कहना चाहिए था। शोभा नहीं देता। लेकिन सज्जन ने भी तो वही किया! उसे क्या जरूरत थी जवाब देने की? चुप रह जाता!’

‘हाँ। सज्जन ने भी घटियापन का जवाब घटियापन से दिया।’
‘हाँ। पता नहीं इन लोगों को क्या हो गया है! इन्हें न तो अपनी इमेज की चिन्ता है न अपनी पार्टी की इमेज की। पता नहीं, इनकी ऐसी बातें सुन कर इनके टीचर लोग क्या सोचते होंगे!?’

‘क्या सोचते होंगे! अपना माथा कूटते होंगे। यही पढ़ाया हमने इनको? पता नहीं राजनीति में आते ही इन लोगों को क्या हो जाता है!’

‘ऐसी बातों से ही लोग राजनीति को गन्दी मानते हैं।’

‘हाँ। राजनीति के कारण ही सज्जन बोला होगा। सोचा होगा, चुप रह जाऊँगा तो लोग बेवकूफ समझेंगे।’

‘हो सकता है। लेकिन बोल कर बेवकूफ साबित होने से तो अच्छा है कि चुप रह बेवकूफ साबित हुआ जाए। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता।’

सन्दर्भ मुझे समझ में आ जाता है। कैलाश याने कैलाश विजयवर्गीय और सज्जन याने मध्य प्रदेश सरकार के मन्त्री सज्जन सिंह वर्मा। हमारे राज नेता भाषा की शालीनता से दूरी बढ़ाने की प्रतियोगिता करते नजर आ रहे हैं। उन्हें रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं। लेकिन यह वार्तालाप सुनकर मेरी सुबह अच्छी हो गई - लोग हमारे नेताओं पर न केवल नजरें बनाए हुए हैं बल्कि उनकी भाषा पर भी ध्यान दे रहे हैं। आज अकेले में बात कर रहे हैं, कल मुँह पर बोलेंगे। बात निकलती है तो दूर तलक जाती ही है। बेवकूफी का जवाब बेवकूफी नहीं होता। खून के दाग खून से नहीं धोए जा सकते।

अब तक एक भी हॉकर इधर से नहीं निकला है। वे दोनों खड़े होते हैं। मुझे सलाह देते हैं - ‘अच्छा होगा कि आप माधव राव के पुतलेवाले चौराहे पर चले जाओ।’ उनके साथ-साथ मैं भी उठ जाता हूँ। 

रिंग रोड़ चौराहे पर खूब भीड़ है। बॉम्बे हास्पिटल की ओर से आ रहा एक ट्रक उलट गया है। नुकसान तो कुछ नहीं हुआ लेकिन यातायात अस्तव्यस्त हो गया है। जाम लगा हुआ है। शीत लहर के कारण कलेक्टर ने स्कूलों की छुट्टी कर दी है। स्कूलों के वाहन गलती से ही नजर आ रहे हैं। उद्यमों/संस्थानों के वाहन सड़कों पर हैं। उनके कर्मचारी अपने-अपने वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सबको जल्दी है। ट्रेफिक पुलिस के दो जवान और तीन-चार समाजसेवी मिलकर ट्रेफिक क्लीयर करने में लगे हुए हैं। लोग उनकी परवाह नहीं कर रहे हैं। जिसे, जहाँ गुंजाइश मिल रही है, अपना वाहन घुसेड़ रहा है। ऐसा करने में खुद की और सबकी मुश्किलें बढ़ रही है। अखबारवाला नहीं आया है।एक ऑटो वाला कहता है - ‘अब नहीं आएगा। आना होता तो आ गया होता।’ मैं अपने मुकाम की ओर चल पड़ता हूँ। दारू की दुकान से दो दुकान आगेवाली होटल के सामने, दो लोग सड़क पर खड़े-खड़े चाय पीते हुए, दीन-दुनिया से बेपरवाह बातें कर रहे हैं। इस तरह कि रास्ते चलते आदमी को बिना कोशिश के ही सुनाई दे जाए। लगता है, दोनों एक ही संस्थान में काम करते हैं और कम्पनी के वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों समवय हैं। चालीस-पैंतालीस के आसपास। मुखमुद्रा और बेलौसपन से एक झटके में समझ पड़ जाती है कि गम्भीर बिलकुल नहीं हैं। वक्तकटी की चुहलबाजी कर रहे हैं -

‘तुम स्साले काँग्रेसियों को उस एक खानदान के सिवाय और कुछ नजर नहीं आता। अपने घर के हीरों की न तो परख करते हो न ही पूछताछ। ये तो हम हैं जो बड़ा दिल करके तुम्हारेवालों को सम्मानित कर देते हैं। हिम्मत चाहिए इसके लिए। तुम सब तो मम्मी से डरते हो।’

तू कभी नहीं सुधरेगा! तेरे आका इतने भले नहीं है कि बिना किसी लालच के किसी के गले में माला डाल दे। इतने भले होते तो आडवाणी और जोशी की ये दुर्गत न करते। लोकसभा चुनाव में सीटों का घाटा पूरा करना है। इसलिए बंगालियों को खुश करने के लिए प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न दे दिया। लेकिन ये चाल उल्टी न पड़ जाए। जानता है प्रणव मुखर्जी कौन है? इन्दिरा गाँधी ने जो इमरजेन्सी लगाई थी, उसका ब्लाइण्ड सपोर्टर था! उस समय, उसकी केबिनेट में मिनिस्टर था। इन्दिरा की इमरजेन्सी का विरोध और इमरजेन्सी का समर्थन करनेवाले को भारत-रत्न! तेरे आकाओं ने ये भी नहीं सोचा कि उन्होंने इमरजेन्सी का समर्थन कर दिया है। अब किस मुँह से इमरजेन्सी को क्रिटिसाइज करेंगे? और अभी जो कमलनाथ ने मीसा बन्दियों की पेंशन खत्म करने का जो आर्डर जारी किया है, उसका विरोध किस मुँह से करोगे? मुँह उठाकर कुछ तो भी बोल देते हो! कुछ अक्कल-वक्कल है के नहीं?’

‘अरे! तू तो सीरीयस हो गया यार! कहाँ तो तू राहुल को पप्पू कहता है और कहाँ ऐसी बातें कर रहा है?’

‘तेने हरकत ही ऐसी की! मैं तो जानता हूँ कि मुझे राहुल और सोनिया रोटी नहीं देते। लेकिन तू तो ऐसे बातें करता है जैसे मोदी केवल तेरे भरोसे, तेरे दम पे पीएम बना हुआ है और वहीं से तेरा टिप्पन आता है! अरे भई! जब पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी बातें करेंगे तो सबका भट्टा बैठेगा नहीं तो और क्या होगा? ईमानदारी से अपना काम करो। सही को सही और गलत को गलत कहो।’

‘सॉरी-सॉरी यार! तू सही कह रहा है। मैंने तो यूँ ही बात-बात में बात कर दी थी। दिल पे मत ले।’

‘बात-बात में बात तो जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। पढ़ा-लिखा, समझदार, एक बच्चे का बाप है। जिम्मेदारी से बात किया कर।’ उसे कोई जवाब मिलता उससे पहले ही उनकी बस आ गई। 

वे दोनों चले गए। अब मुझे अखबार की जरूरत नहीं रह गई थी। जाते-जाते वह अनजान आदमी सूत्र दे गया - ‘बात जरूर कर लेकिन यूँ ही मत कर। जिम्मेदारी से किया कर।’ क्या यह सूत्र मुझ अकेले के लिए है?
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 31 जनवरी 2019

जरा तलाश करना! इन्हें आप्टे साहब मिले?


फेस बुक पर अचानक ही यह तस्वीर नजर आई। कुछ दिन पुरानी है। फिल्मी दुनिया के कुछ लोग प्रधान मन्त्री मोदी से मिलने गए थे। उसी समय की तस्वीर है यह। चित्र में प्रधान मन्त्री मोदी, अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाए नजर आ रहे हैं। जवाब में परिणीति हाथ मिलाने के बजाय हाथ जोड़ कर नमस्कार करती दिखाई दे रही हैं। इस चित्र ने फेस बुक की ‘चाय की प्याली में तूफान’ ला दिया। अधिकांश लोगों ने परिणीति के इस व्यवहार को प्रधान मन्त्री मोदी का अपमान माना और खिन्नता जताते हुए परिणीति को अनेक परामर्श दिए। कुछ लोगों ने इस व्यवहार को भारतीय संस्कृति का निर्वाह मानते हुए परिणीति की सराहना की। ‘लाइक’ और ‘ट्रोलिंग’ से ‘आच्छादित’ इस समय में कुल मिलाकर लोगों ने अपनी भावनानुरूप ही मूरत देखी। चित्र पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ देखकर मुझे, पचास बरस से अधिक पहले, अंग्रेजी के अपने प्रोफेसर आप्टे साहब से खाई जोरदार डाँट-फटकार याद आ गई। 

मैं उस समय के अविभाजित मन्दसौर  जिले के रामपुरा कॉलेज में बी. ए. के दूसरे साल में था। अंग्रेजी के प्रोफेसर एस. डी. आप्टे साहब उसी बरस स्थानान्तरित होकर रामपुरा आए थे। मैं मन्दसौर कॉलेज से बी. एससी. के पहले साल में फेल होकर रामपुरा कॉलेज में, बी. ए. में भर्ती कराया गया था। रामपुरा बड़े गाँव जैसा कस्बा था। उसके मुकाबले मन्दसौर बहुत बड़ा शहर होता था। कॉलेज में छात्रों की संख्या का आलम यह कि मन्दसौर कॉलेज में, बी. एससी. के प्रथम वर्ष की तीन कक्षाओं की छात्र संख्या, रामपुरा कॉलेज की सभी वर्षों की सभी कक्षाओं की छात्र संख्या के बराबर। रामपुरा कॉलेज का प्रत्येक प्रोफेसर, कॉलेज के प्रत्येक छात्र/छात्रा को नाम और शकल से पहचानता था। बी. ए. दूसरे वर्ष की कक्षा में हम कुल चौदह छात्र/छात्रा थे। ‘मन्दसौर रिटर्न’ होना मुझे रामपुरा में सबसे अलग करता था। मेरा रहन-सहन, चाल-चलन ‘फैशनेबल’ माना जाता था। अपनी यह दशा अनुभव कर मैं भी खुद को ‘स्मार्ट’ मानने लगा था और वैसा ही व्यवहार भी करने लगा था।

आप्टे साहब स्थूल शरीर, ऊँचे डील-डौल और गुरु-गम्भीर व्यक्तित्व वाले थे। बड़ी-बड़ी आँखें और गूँजती आवाज। कम बोलते थे। उनका कम बोलना हमें आतंकित करता था। शुरु के कुछ महीनों तक उनके सामने हमारे बोल ही नहीं फूटते थे। स्थिति ‘तनावपूर्ण किन्तु नियन्त्रण में’ जैसी बनी रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे बर्फ पिघली तो मालूम हुआ - ‘अरे! आप्टे साहब तो नारियल हैं! ऊपर से हड्डी तोड़ कठोर लेकिन अन्दर से सजल मुलायम और मीठे।’ जिस पर लाड़ आता, उसे ‘अरे! गधे’ कह कर पुकारते। कुछ ही महीनों में, गिनती के हम विद्यार्थियों में ‘गधा’ बनने की होड़ शुरु हो गई। 

सब कुछ ऐसा ही चल रहा था। लेकिन एक दिन मेरी ‘ओव्हर स्मार्टनेस’ ने मुझे आप्टे साहब के हत्थे चढ़ा दिया। उस दिन मैं कक्षा में सबसे बाद में लेकिन आप्टे साहब से पहले पहुँचा। मैं कक्षा में घुस ही रहा था कि आप्टे साहब आते दिखे। मैं रुक गया। सोचा, सर के पीछे ही कक्षा में जाना चाहिए। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन वह मूर्खता हो गई जिसने जिन्दगी का बड़ा पाठ पढ़ा दिया। 

मैं कक्षा की दहलीज के बाहर खड़ा था। आप्टे साहब पहुँचे तो उन्हें प्रभावित करने के लिए, हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए, विनम्रताभरी एँठ से बोला - ‘गुड मार्निंग सर!’ अपनी रौ में झूमते चले आ रहे आप्टे साहब झटके से ठिठक गए। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें हैरत से और बड़ी हो गईं। मुझे घूरकर देखने लगे। मुझे पल भर भी नहीं लगा यह समझने में कि मैंने कोई बड़ी गड़बड़ कर दी है और मैंने अब अपनी खैर मनानी शुरु कर देनी चाहिए। आप्टे साहब की शकल देखकर मैं हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। 

यह स्थिति कुछ ही क्षण रही। आप्टे साहब धीरे-धीरे मेरे पास आए। अपना भारी-भरकम हाथ उठाया। मुझे लगा - ‘आज तो बेटा विश्न्या! तू गया काम से!’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बहुत ही धीमे से उन्होंने मेरी टप्पल में धौल टिकाई और बोले - ‘अरे गधे! तू गधा ही रहेगा।’ कहकर, कसकर मेरी गर्दन पकड़ी। दो-तीन बार झटके से इधर-उधर हिलाई और बोले - ‘इंगलिश लिटरेचर ले लेने का मतलब अंग्रेज हो जाना नहीं होता। यू आर स्टडिंग इंगलिश लिटरेचर ओनली। डोण्ट ट्राय टू बी एन इंगलिश मेन। इट इज ग्रेट टू बी एन इण्डियन। बी ए गुड इण्डियन एण्ड रीमेन लाइक देट।’ मेरी गरदन लोहे के पंजे में जकड़ी हुई थी। साँसें घुट रही थीं। बोल पाने का तो सवाल ही नहीं था।

मेरी गरदन को इसी तरह जकड़े हुए आप्टे साहब कक्षा के बाहर खड़े थे। अन्दर बैठे सारे तेरह साथी/साथिनें यह अद्भुत और अनूठा ‘सीन’ देख रहे थे। आप्टे साहब गुस्से में बिलकुल नहीं थे लेकिन मेरी गर्दन पर उनकी पकड़ रंच मात्र भी ढीली नहीं हो रही थी। इसी दशा और मुद्रा में आप्टे साहब ने उस दिन अपना पूरा ‘पीरीयड’ एक अकेले विद्यार्थी को पढ़ाया।

आप्टे साहब ने कहा कि हाथ मिलाना पाश्चात्य शिष्टाचार की परम्परा है। भारतीय परम्परा नमस्कार करने की है। अर्थ तो दोनों का एक ही है - अभिवादन कर आदर जताना। किन्तु दोनों की प्रक्रिया एकदम अलग-अलग है। लगभग विपरीत। पाश्चात्य परम्परा में वरिष्ठ को शाब्दिक अभिवादन (यथा, गुड मार्निंग/गुड नून/गुड इवीनिंग सर!) किया जाता है। जवाब में वरिष्ठ शाब्दिक अभिवादन तो करता ही है, कनिष्ठ के प्रति प्रेम और सम्मान भाव प्रकट करते हुए अपना हाथ बढ़ाता है। तब ही कनिष्ठ उससे हाथ मिलाता है। पाश्चात्य संस्कृति में कनिष्ठ कभी भी पहले हाथ नहीं बढ़ाता। भारतीय संस्कृति में हाथ नहीं मिलाया जाता। हमारे यहाँ कनिष्ठ व्यक्ति, विनयपूर्वक, दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार कर अभिवादन करता है। जवाब में वरिष्ठ व्यक्ति प्रेमपूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वचन से उसे समृद्व करता है। विस्तार से समझा कर आप्टे साहब ने मेरी गर्दन छोड़ी और पूछा - ‘डिड यू अण्डरस्टेण्ड?’ घिघियाते हुए मेरे बोल फूटे - ‘यस सर!’ आप्टे साहब बोले - ‘नो। इट इज नाट सफिशियण्ट। लेट अस हेव ए प्रेक्टिकल।’ कह कर खुद दो कदम पीछे हटे और बोले - ‘आई एम कमिंग टू क्लास। विश मी ए गुड मार्निंग।’ मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। मेरी दशा देख कर बोले - ‘अरे! गधे! विश मी ए गुड मार्निंग।’ मन्त्रबिद्ध दशा में मैंने खुद को यन्त्रवत बोलते सुना - ‘गुड मार्निंग सर!’ खुश होकर आप्टे साहब ने जवाब दिया - ‘व्हेरी गुड मार्निंग माय ब्वाय। हाऊ डू यू डू?’ और अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने उसी दशा में अपना लुंज-पुंज हाथ उनके हाथ में दे दिया। वे खुश हो गए। मेरा हाथ छोड़ कर बोले - ‘अब भारतीय संस्कृति का प्रेक्टिकल हो जाए।’ कह कर फिर दो कदम पीछे हटे। इस बार मैंने न तो प्रतीक्षा की न ही देर। बोला - ‘नमस्कार सर!’ पूरी ऊँचाई तक अपना दाहिना हाथ आकाश में उठाते हुए आप्टे साहब गद्गद् भाव से बोले - ‘आयुष्मान् भव। यशस्वी भव।’ कहते-कहते मेरा माथा सहलाया और कक्षा में देखते हुए बोले - ‘तुम सबने सुना?’ सबने मुण्डियाँ हिला कर हामी भरी। देखकर आप्टे साहब बोले - ‘आज की क्लास हो गई। सी यू टुमारो।’

उसके बाद क्या हुआ, क्या नहीं, यह बताने का कोई मतलब नहीं। वह सब आज याद आ गया - प्रधान मन्त्रीजी और परिणीति की यह तस्वीर देखकर। पता नहीं, इन दोनों को कभी कोई आप्टे साहब मिले या नहीं।
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‘राज’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें

‘दोनों में डिफरेंस ही क्या है? दोनों एक ही तो हैं अंकल!’ सुनकर मैं चौंका भी और हतप्रभ भी हुआ। 

यह 25 जनवरी की अपराह्न है। सत्तरवें गणतन्त्र दिवस से ठीक एक दिन पहले की अपराह्न। मेरे परम मित्र रवि शर्मा के भानजे लकी के विवाह प्रसंग के कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए बिबड़ोद मार्ग स्थित एक मांगलिक परिसर में बैठा हूँ। सब लोग फुरसत में गपिया रहे हैं। लोकसभा चुनावों पर बातें हो रही हैं। ‘सरकार किसकी बनेगी?’ इस पर हर कोई बढ़-चढ़कर, विशेषज्ञ की मुद्रा में अन्तिम राय दे रहा है। सबकी अपनी-अपनी पसन्द है। वे अपनी पसन्द की सरकार बनवा रहे हैं। मैंने अचानक ही कह दिया - “सरकारें तो बनती-बिगड़ती रहती हैं। आती जाती हैं। बेहतर होगा कि ‘राज’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें।’ मेरी इसी बात के जवाब में एक अपरिचित नौजवान ने वह कहा जो मैंने शुरु में लिखा है। वह नौजवान स्नातक कक्षा के अन्तिम वर्ष का विद्यार्थी है। वह ‘राज्य’ और ‘राज’ को पर्यायवाची माने बैठा है। यह हमारी, भाषागत विफलता है या अपनी अगली पीढ़ी से बनी हमारी संवादहीनता का परिणाम? मेरा भाग्य अच्छा था कि उस नौजवान ने समझने की खिड़कियाँ बन्द नहीं कर रखी थीं। उसने इस अन्तर को समझाने का आग्रह किया। मेरी बात तनिक लम्बी हो गई लेकिन उस नौजवान ने पल भर भी धैर्य नहीं छोड़ा। वह मेरी बात चुपचाप सुनता रहा। 

हम स्वभावतः लोकतान्त्रिक समाज रहे हैं। शासक भले ही एक व्यक्ति (राजा) रहा हो लेकिन वह भी ‘लोक’ केन्द्रित ही रहा। भारत का इतिहास जनपदों और गणराज्यों के उल्लेखों से भरा पड़ा है। शासक कोई भी रहा हो, ‘गण’ और ‘जन’ ही उसके लक्ष्य रहे हैं। राजाओं ने राज तो किया लेकिन ‘राज्य’ ही उनकी पहली चिन्ता और पहली प्राथमिकता रहा। राम के वनवास काल में भरत ने राज तो किया लेकिन राजा बनकर नहीं। उन्होंने ‘अवध’ की चिन्ता की, खुद के पद की नहीं। मेवाड़ के शासकों ने भगवान एकलिंगजी के प्रतिनिधियों के रूप में राज किया। जिन्होंने ‘राज’ की परवाह की, वे लोकोपवाद के रूप में उल्लेखित किए गए और जिन्होंने ‘राज्य’ की परवाह की वे इतिहास बन गए।

कानूनी और तकनीकी विवेचन से तनिक नीचे उतरकर बोलचाल की भाषा में बात करें तो ‘राज्य’ एक स्वतन्त्र, सार्वभौम भूमि प्रदेश होता है और ‘राज’ उसकी संचालन व्यवस्था। भारत एक स्वतन्त्र, सार्वभौम गणराज्य है और निर्वाचित संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली इसकी संचालन व्यवस्था। इस प्रणाली से ही हम अपनी सरकार चुनते हैं। ऐसी प्रत्येक सरकार (याने कि ‘राज’) अस्थायी होती है लेकिन ‘राज्य’ तो स्थायी, अविचल बना रहता है।

लेकिन ‘सेवक भाव’ से राज करने की बात अब ‘कल्पनातीत’ से कोसोें आगे बढ़कर ‘मूर्खतापूर्ण सोच’ हो गई है। अब तो जो भी सरकार में आता है, वह आजीवन वहीं बना रह जाना चाहता है। इसीलिए प्रत्येक ‘राजा’ खुद को ‘राज्य’ साबित करने लगता है। तब, ‘व्यक्ति विरोधी’ को ‘राष्ट्र विरोधी’ घोषित किया जाने लगता है। इसका पहला उदाहरण इन्दिरा राज में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने ‘इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा’ कह कर पेश किया था। तब, विरोधियों की बात तो दूर रही, अनेक काँग्रेसियों ने भी इस ‘अमृत वचन’ से असहमति व्यक्त कर इसकी खिल्ली उड़ाई थी। 1977 के आम चुनावों में देश ने बरुआ का मुगालता दूर कर दिया। खुद इन्दिरा गाँधी ही चुनाव हार गई।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ‘राज’ और ‘राज्य’ का अन्तर जिस तरह से हमें समझाया वह अद्भुत है। उन्होंने ‘राज्य’ (भारत) को मुक्ति दिलाने के लिए ‘राज’ (अंग्रेजी राज) को उखाड़ फेंका। गाँधी के प्रत्येक आग्रह, अभियान को अंग्रेज सरकार ने राष्ट्रद्रोह कहा लेकिन गाँधी ने हर बार साबित किया कि वे देश का नहीं, अंग्रेजी राज का विरोध कर रहे थे। आश्चर्य यह कि यह अनूठा विरोध भी वे अंग्रेज सरकार के (याने ‘राज’ के) कानूनों का पालन करते हुए कर रहे थे। क्रान्तिकारियों का साथ न देने के कुछ आरोप् गाँधी पर इसलिए भी लगे कि गाँधी ने, अपने सिद्धान्तों के अधीन, ‘राज’ के कानूनों का उल्लंघन करने से इंकार कर दिया था। 
‘राज’ और ‘राज्य’ कभी भी समानार्थी या कि पर्यायवाची नहीं रहे। केवल तानाशाही शासन पद्धति में ही ये दोनों समानार्थी माने जाते हैं। तब, राजा को ही राष्ट्र बना दिया जाता है। राजा के विरोधी को राष्ट्र का विरोधी करार दिया जाता है और मृत्युदण्ड या देश निकाला दे दिया जाता है। इन्दिरा राज में इन्दिरा विरोधियों को देश विरोधी करार दिया जाता था। वही दौर आज फिर लौट आया है। प्रधान मन्त्री मोदी को ‘राष्ट्र’ निरूपित किया जा रहा है। उनके विरोधियों को राष्ट्र विरोधी करार दिया जा रहा है और ऐसे ‘राष्ट्र विरोधियों’ को पाकिस्तान भेजने का तो मानो मन्त्रालय ही स्थापित हो गया है। इतिहास गवाह है कि तानाशाहों का अन्त या तो आत्म-हत्या से हुआ है या फाँसी से।

हमारे संविधान में राजनीतिक प्रतिबद्धता की बाध्यता नहीं थी। संविधान विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रधान मन्त्री चुनने के बाद संसद सदस्य राजनीति प्रतिबद्धता से मुक्त हो जाते थे। किन्तु बाद के वर्षों में (सम्भवतः राजीव गाँधी के कार्यकाल में, जब दलबदल निरोधी प्रावधान प्रभाव में आए) पार्टी व्हीप की बाध्यता शुरु हुई।

आज ‘राज्य’ पर ‘पार्टी लाइन’ हावी हो गई है। प्रत्येक पार्टी के लोग जानते हैं कि उनकी पार्टी की अनेक बातें असंवैधानिक, अनुचित और आपत्तिजनक हैं। लेकिन वे सब केवल ‘पार्टी लाइन’ के अधीन ‘क्रीत दास भाव’ से उनका समर्थन करते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कही गई अपनी अनगिनत बातों पर हमारे मौजूदा प्रधान मन्त्री मोदी ने जिस तरह से पलटियाँ खाई हैं और उनके तमाम समर्थक जिस तरह से मौन हैं, वह हमारे सामने है।

प्रत्येक गणतन्त्र दिवस हमारे आत्म निरीक्षण का अवसर बन कर सामने आता है। हम स्वतन्त्र, सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य हैं। यही हमारी पहली चिन्ता और पहली जिम्मेदारी है। सरकारें क्षण भंगुर हैं। देश चिरंजीवी, चिरन्तन है। हमारी सरकारें कर्तव्यच्युत न हों, यह हमारी जिम्मेदारी है। अपनी पार्टी के ‘राज’ का अन्ध समर्थन करते रहे तो ‘राज्य’ खो बैठेंगे। ‘राज्य’ हमारा माथा है और ‘राज’ उसे ढँकनेवाली टोपियाँ। सर है सलामत तो टोपी हजार। ‘गण’ (याने कि ‘हम, भारत के लोग’) अपने ‘राजा’ पर, वस्तुपरक भाव से (आब्जेक्टिवली) नजर रखें और पथभ्रष्ट होने पर उसे रोकें-टोकें। यह गुंजाइश रखंे कि ‘हमारा राजा’ मनुष्य है, गलती कर सकता है। यदि ‘राजा’ हमारी पार्टी का है तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। विरोधी कुछ कहे, उससे पहले हम ही उसे टोकें। 

कुर्सी पर बैठते ही प्रत्येक ‘राजा’ मुगालते में आ जाता है कि अब उसे कोई हटा नहीं सकता। उसे याद दिलाते रहें कि इस कुर्सी पर कल कोई और था, कल कोई और होगा। पदान्ध-मदान्ध हो रहे अपने राजा को राहत इन्दौरी का यह शेर जोर-जोर से, बार-बार सुनाएँ, सुनाते रहें -

आज जो सहिब-ए-मसनद हैं, कल नहीं होंगे
किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़े  है?

गणतन्त्र दिवस की इस मंगल वेला में हम अपनी गरेबाँ में झाँकें। ‘राज’ या ‘राजा’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें। ‘राज्य’ बना रहेगा तो ‘अपना राजा’ और ‘अपना राज’ बनता रहेगा। ‘राज्य’ ही नहीं रहेगा तो कौन सा राजा और किसका राज?

गणतन्त्र दिवस की शुभ-कामनाएँ। अमर रहे गणतन्त्र हमारा।
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खाता-बही यहाँ जिन्दा है


सुरेश भाई को इस तरह देख कर झटका लगा। विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं इक्कीसवीं सदी में यह देख रहा हूँ। याद नहीं आता कि ऐसा दृष्य इससे पहले कब देखा था। मेरी दशा देख कर सुरेश भाई मुस्कुरा कर बोले - ‘विश्वास नहीं हो रहा न? मुझसे तो कम्प्यूटर पर काम हो नहीं पाता। मैं अब भी इसी तरह काम करता हूँ।’

सुरेश भाई याने रतलाम के चाँदनी चौक स्थित ‘चौधरी ब्रदर्स’ वाले सुरेश चौधरी। बिजली के सामान की, पीढ़ियों पुरानी दुकान है। इतनी पुरानी कि बस! नाम ही काफी है। काम लम्बा-चौड़ा है। चार भाई, सुरेश, जयन्ती, राजेन्द्र और जवाहर मिल कर सम्हालते हैं। सबने अपना-अपना काम बाँट रखा है। बड़े ग्राहक दुकान पर नजर नहीं आते। नजर आएँ भी कैसे? भाई लोग उनके दफ्तरों में पहुँच कर उनके काम जो कर देते हैं! देहात के ग्राहकों का जमावड़ा दिन भर लगा रहता है। मैं महीने-दो महीने में मिलने चला जाता हूँ। लेकिन सुरेश भाई को इस तरह, पारम्परिक ढंग से काम करते कभी नहीं देखा।

मैं जब एक औद्योगिक इकाई में भागीदार था तो हमारे यहाँ रजिस्टरों के आकारवाली केश-बुक और लेजर काम में आते थे। पारम्परिक खाता बहियाँ देखे मुझे बरसों हो गए। मनासा से निकलने के बाद रतलाम में भी दुकानों पर लाल रंग की खाता-बहियों में काम करते किसी को नहीं देखा। सुरेश भाई को देखा तो मुझे मानो ‘नास्टेल्जिया’ ने घेर लिया।

सुरेश भाई न केवल पारम्परिक खाता-बही में हिसाब-किताब रखते हैं, लिखने के लिए भी वे बॉल-पेन के बजाय स्याहीवाला पेन ही वापरते हैं। कहते हैं कि हर बरस स्याहीवाला नया पेन खरीदते हैं। स्याही की दावात जरूर दो-ढाई बरस में खरीदनी पड़ती है। स्याही सोखनेवाला कागज (स्याही सोख्ता याने कि ब्लाटिंग पेपर) तनिक कठिनाई से मिलता है। इसलिए उसे अतिरिक्त सावधानी से वापरते हैं।

मैं पहुँचा तब सुरेश भाई का काम पूरा होने को था। मैंने फटाफट ये फोटू लिए। आप भी देखिए और अपना गुजरा जमाना तो याद कीजिए ही, अपने बच्चों को भी इसके बारे में बताइए।  




खाता बही में प्रविष्टियाँ करते हुए सुरेश भाई

पेन में स्याही भरते हुए सुरेश भाई

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बस्तर से घिरे जीजाजी

जीजाजी ने मुझे जोर का धक्का दिया, बहुत धीरे से। प्रेमपूर्वक। आनन्ददायक। 

जीजाजी याने विनायकजी पोतनीस। सुभेदार परिवार के दामाद। हमारी नीलम ताई के जीवन संगी। कोई तीस-पैंतीस बरस से उनसे मिलना और बतियाना बना हुआ है। लेकिन वे ‘ऐसे’ भी हैं, यह कभी महसूस ही नहीं होने दिया। बहुत कम बोलते हैं और धीमी आवाज में। उन्हें सुनने के लिए अतिरिक्त चौकन्ना होना पड़ता है। 


यह बीस दिसम्बर की रात थी। सुभेदार परिवार का उपक्रम ‘आशर्वाद नर्सिंग होम’, अगली सुबह, 21 दिसम्बर 2018 को रतलाम के चिकित्सा व्यवसाय जगत में इतिहास का महत्वपूर्ण पन्ना जोड़ने जा रहा था। (इस पर मैं अलग से लिखूँगा।) इसी प्रसंग पर समूचा सुभेदार कुटुम्ब जुटा हुआ था। कार्यक्रम संचालन का सुख-सौभाग्य मुझे मिला था। इसी सिलसिले मैं वहाँ पहुँचा था। 

काम की बातें हो चुकी थीं। हम लोग बेबात बतिया रहे थे। जीजाजी चुपचाप उठे। अन्दर गए। एक छोटी सी पुस्तिका लिए लौटे। मैं बेध्यान हो, गप्पों में व्यस्त था। जीजाजी सीधे मेरे सामने आए और पुस्तिका मुझे थमाते हुए बोले - ‘इसे देखिएगा विष्णुजी! शायद आपको अच्छी लगे।’ मैंने देखा, कविता संकलन था। कवि का नाम था - विनायक पोतनीस। मेरे लिए यह उल्कापात से कम नहीं था। मैंने जड़ अवस्था में ही पन्ने पलटे। तीस पृष्ठों की, बहुरंगी मुखपृष्ठवाली  इस पुस्तिका में छब्बीस कविताएँ थीं। मैं अवाक् हो गया।

जीजाजी अच्छे-भले सिविल इंजीनीयर हैं। अविभाजित मध्य प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य यान्त्रिकी (पी एच ई) विभाग की नौकरी में जिन्दगी खपा दी। बेदाग और निर्विवाद रहते हुए विभाग के सर्वोच्च पद, प्रमुख यन्त्री (इंजीनीयर-इन-चीफ) से सेवानिवृत्त हुए। जब भी मिले, प्रायः चुप ही मिले। लोग अपनी अफसरी के किस्से शेखियाँ बघार-बघार कर सुनाते हैं। लेकिन जीजाजी तो कभी खुद के बारे में भी बताते नहीं मिले! ऐसे ‘चुप्पा’ जीजाजी कवि भी हैं! मुझे अचानक ही निदा फाजली याद आ गए -

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

मैंने तो जीजाजी को कई बार देखा लेकिन वे ‘ऐसे’ तो कभी नजर नहीं आए! मेरी नजर का ही दोष है यह। मेरे बोल नहीं फूट रहे थे। घरघराई आवाज में पूछा - ‘आप कविताएँ भी लिखते हैं?’ जवाब लगभग निस्पृह स्वरों में मिला - ‘हाँ। यह चौथी किताब है।’ मैं रोमांचित हो, असहज हो गया था। मुझे सम्पट नहीं बँध रही थी। थरथराते हाथों से मेंने किताब के पन्ने पलटे। दो-एक कविताएँ पढ़ीं। मुझे कविता की समझ नहीं है। लेकिन कविताएँ मुझे अच्छी लगीं। उनके सामने पढ़ी कविताओं पर दो-चार बातें कीं और लौट आया।

घर आकर कविताएँ पढ़ीं। कई बातें मन में आने लगीं।

जीजाजी ने छत्तीस बरस की नौकरी में दस बरस छत्तीसगढ़ में गुजारे। 1996 में सेवा निवृत्ति के बाद भी छत्तीसगढ़ से रिश्ता बना रहा। अभी जीवन के बयासीवें बरस में चल रहे हैं। भोपाल में बस गए हैं। लेकिन बस्तर आज भी उनके मन में बसा हुआ, साथ बना हुआ है। अब भी ‘हाण्ट’ करता है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मुझे दी पुस्तिका के शीर्षक में बस्तर प्रमुख है। यह पुस्तिका दो बरस पहले ही छपी है। सारी कविताएँ तो बस्तर पर नहीं हैं लेकिन बस्तर प्रमुखता लिए हुए है। 

मैं कहूँ, उससे बेहतर है कि दो-एक कविताएँ खुद ही कहें-





हरा सलाम

कोई चालीस साल गुजरे
बस्तर से मेरा तबादला हुए
मेरे रहगुजर थे वो
हरी आस्तीनें हिलाकर सलाम जताते
हरी छत्री धरे साल की
मधुमक्खी के छत्ते जैसे जंगल में बसे
जगरमुण्डा से देर रात में बेखौफ लौटता
बस्तर अभय वरदान था।
हरा सलाम अचानक लाल हो गया
सुरंगों, दुनालियों से निकले लाल फव्वारे
हरा केवल पेड़ पत्तों में बहता रहे
लाल केवल शरीर की शिराओं में
बाहर नहीं।
+ +

स्वप्नदेश

सारी सृष्टि नवजात बालक सी
निर्बोध, निर्विकार, उल्लासमय
युवा तितलियों का स्वानन्द विचरण
मन्द, मादक महुए का वातावरण
तब बस्तर स्वप्नदेश था।
+ +

जगरगुंडा में एक शाम

कंधे तक ऊँची घास के रास्ते
कटेकल्यान पठार से सीधे उतरे
एक शाम जगरगुंडा में
बितायी एक रात
अठपहरिया की थानागुड़ी में
बस गई यह रात मेरे अवचेतन में।
+ +

मरमेड (मत्स्यपरी)

सोचा भी नहीं कभी मरमेड दिखेगी
अचानक बिजली सी कौंध गई
मछलीनुमा नुकीले पाँव, हीरे टपकाते केश
सुनामी जैसी आयी और
बरबाद कर गई।

पुस्तिका मिले साठ घण्टे से अधिक हो गए हैं लेकिन कविताएँ मेरे साथ ही बनी हुई हैं। जब मेरी यह दशा है तो जीजाजी ने इन कविताओं को तो जीया है! खुद को व्यक्त करने तक जीजाजी की क्या दशा रही होगी? सम्भवतः इसीलिए ‘कवि’ आजीवन आकुल, व्याकुल, व्यग्र बना रहता है। उसकी यह दशा ही समय और समाज को संजीवनी दे पाती है।

इस कविता पुस्तक ने एक और जीजाजी से ही मुलाकात नहीं करवाई, यह भी बताया कि हमारी नीलम ताई का पूरा और वास्तविक नाम नीलप्रभा है और वे सुन्दर रेखांकन भी करती हैं। पुस्तिका के मुखपृष्ठ का रेखांकन उन्हीं का है।

शासक और रचनाकार में यही अन्तर है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया बसाते हैं। लेकिन शासक की दुनिया में किसी और के लिए जगह नहीं होती जबकि रचनाकार की दुनिया में सदैव भरपूर स्पेस उपलब्ध रहती है। इतनी कि पूरा ब्रह्माण्ड समा जाए तो भी जगह बची रहती है। जीजाजी की दुनिया में भी भरपूर जगह है।

इस सम्भावना के साथ कि आपको कविताएँ अच्छी लगी हों और उनसे बात करना चाहें, उनका अता-पता, सम्पर्क सूत्र दे रहा हूँ -

श्री विनायक पोतनीस
ए-124, मानसरोवर कॉलोनी,
शाहपुरा,
भोपाल-462039
मोबाइल नम्बर - 94244 07829
ई-मेल:vinayakpotnis124@gmail.com 

बोहरा सा’ब नहीं मिलते तो.....

मैं सचमुच में बड़भागी हूँ जो मुझे बोहरा सा’ब मिल गए। वे
क्या मिले, मुझे जीवन-पाथेय मिल गया। वे नहीं मिलते तो पता नहीं कि मैं ‘हाथ का साफ’ रह पाता या नहीं। बोहरा सा’ब जैसे लोग आत्मा को निर्मल कर देते हैं। 

मैं 1991 में बीमा एजेण्ट बना। उन दिनों विपन्नता के चरम को जी रहा था। एक बार फिर भिक्षावृत्ति के कगार पर आ खड़ा हुआ था। मेरी जीवन संगिनी वीणाजी तो अवलम्ब थीं ही, सहायता करने को उतावले, उदार हृदय मित्र ही मुझे सम्हाल रहे थे मुझे। एजेण्ट बने तीन-चार बरस हो रहे थे। सरकते-सरकते गति पकड़ रहे धन्धे से आत्म विश्वास और हौसला बढ़ता जा रहा था। हम एजेण्ट लोग ग्राहकों से पुराने बीमों की किश्तों की रकम लेने के लिए अधिकृत नहीं हैं। लेकिन पुराने बीमों की किश्तें जमा कराना ही आज भी ‘मुख्य ग्राहक सेवा’ बना हुआ है। इसी कारण, मेरी जेब में हजार-पाँच सौ रुपये बराबर बने रहने लगे थे। दो छोटे-छोटे बच्चों की जरूरतों की भीड़वाली गृहस्थी। जेब में नोट। लेकिन नोट अपने नहीं। परायी अमानत। खुद को संयत और बच्चों को समझदार बनाने का निरन्तर संघर्ष। जेब में पैसे हैं लेकिन बच्चों की इच्छाएँ पूरी न कर पाने से उपजती झुंझलाहट रुला-रुला देती। मन कमजोर हो, बहक जाने को उतावला होता था लेकिन शायद माँ-पिताजी और दादा के दिए संस्कार थाम लेते थे। कुछ ऐसी ही डूबती-उतराती मनोदशावाले दिनों मे बोहरा सा’ब मिले।

पूरा नाम सज्जाद हुसैन बोहरा। सहायक शाखा प्रबन्धक के पद पर जावरा से स्थानान्तरित हो गृह नगर रतलाम स्थानान्तरित हुए थे। हम एजेण्टों को नए बीमे लाने के लिए प्रेरित करना और हमारी मदद करना उनका काम था। इसलिए बोहरा सा’ब के पास रोज दो-चार बार जाना, बैठना होता ही था। इसी तरह मिलते-मिलाते मालूम ही नहीं हुआ कि कब उनसे मानसिक नैकट्य स्थापित हो गया। हम दोनों अपना काम निपटाते हुए बेकाम की बातें करने लगते। आज, बरसों बाद मालूम हो रहा है कि वे बेकाम की बातें कितने काम आ रही हैं!

इसी तरह बेकाम की बातें करते-करते बोहरा सा’ब ने न जाने कितनी किश्तों में ‘अच्छा बीमा एजेण्ट’ बनने के कुछ गुर दिए। एलआईसी के सारे अफसर हमें ‘सफल एजेण्ट’ बनाने में लगे रहते हैं। लेकिन ‘धर्मनिष्ठ’ बोहरा सा’ब हमें ‘अच्छा एजेण्ट’ देखना चाहते थे। उनका मानना रहा कि एजेण्ट कितना ही बड़ा और कितना ही कामयाब क्यों न हो, वह यदि ‘अच्छा एजेण्ट’ नहीं है तो उसकी कामयाबी और उसका बड़ा होना ‘नीरस, निरर्थक आँकड़ा’ से अधिक कुछ नहीं है। यदि आप ‘अच्छा मनुष्य’ नहीं हैं तो फिर आपकी कामयाबी और बड़ापन, आपकी अचकन में लगा वह कागजी फूल है जो आपको दर्शनीय तो जरूर बनाता है लेकिन उसमें खुशबू नहीं होती। इसलिए वह आपको सार्थकता प्रदान नहीं करता, आपको उपयोगी नहीं बना पाता।

बोहरा सा’ब से बरसों हुई बातों में, खण्ड-खण्ड रूप में मिले ये सूत्र पहली नजर में जरूर बीमा एजेण्ट के धन्धे से जुड़े लगते हैं लेकिन तनिक ध्यान से विचार करें तो वे समूचे जीवन को उदात्तता और प्रांजलता प्रदान करते हैं। अपने पेशे की नैतिकता (प्रोफेशनल ईथिक्स) का ईमानदारी से पालन करना ही इन सारे सूत्रों का आधार और केन्द्र रहा।

पहला सूत्र - ‘आप जिस भी आदमी/औरत का बीमा करें, उसके शारीरिक नाप (ऊँचाई, पेट, सीना/छाती) खुद लें। यदि महिला का बीमा कर रहे हैं तो या तो किसी अन्य महिला की मदद लें और अपने सामने यह प्रक्रिया पूरी करें।’

मेरी एजेंसी का यह अट्ठाईसवाँ बरस चल रहा है। दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि यह काम करने में हमारे एजेण्ट मित्रों को पता नहीं क्यों शरम आती है। बोहरा सा’ब की इस सलाह पर मैंने यथासम्भव पूरा अमल किया। आज भी मेरी जेब में इंची टेप बना रहता है। नाप लेने के लिए मैं जब जेब से इंची टेप निकालता हूँ तो मौके पर मौजूद तमाम लोग ताज्जुब भी करते हैं और हँसते भी हैं। ऐसा करते समय मुझे हर बार (जी हाँ, हर बार) सुनना पड़ा - ‘पहलेवाले (एजेण्ट) ने तो ऐसा नहीं किया था।’ एक अुगल का इंची टेप हर बार मुझे सारे एजेण्टों से अलग बना देता है। ये नाप खुद लेने से ही हमें ग्राहक की शारीरिक दशा की वास्तविक जानकारी हो पाती है। 

दूसरा सूत्र - ‘बैरागीजी! आप बीमा करो तो यह याद रखते हुए करना कि आज बीमा किया और कल उसकी (ग्राहक की) मृत्यु हो जाए तो उसके नामित को दावे की रकम का भुगतान, पहली बार कागज पेश करने पर मिल जाए।’

यह बहुत ही बारीक और महत्वपूर्ण बात है। बीमा होने के तीन वर्ष की अवधि में बीमाधारक की मृत्यु होने की दशा में विस्तृत जाँच होती है। बीमा प्रस्ताव में ग्राहक के स्वास्थ्य-ब्यौरे (जिन्हें, बीमा शब्दावली में ‘मटेरियल फेक्ट’ कहा जाता है) विस्तार से पूछे जाते हैं। यह जगजाहिर तथ्य है बीमा फार्म ग्राहक नहीं भरता है। एजेण्ट ही भरता है। जाँच में ये ब्यौरे यदि झूठे पाए जाएँ तो बीमा कम्पनी मृत्यु दावे की रकम चुकाने से इंकार कर देती है। बोहरा सा’ब इस बात पर हर बार जोर दिया करते थे - ‘एक-एक कर, मटेरियल फेक्ट की पूरी जानकारी लो। कुछ भी गलत मत लिखो।’

तीसरा सूत्र - ‘किश्त की रकम के लिए ग्राहक जो नोट आपको दे, वे ही नोट केश काउण्टर पर जाने चाहिए।’

पहली नजर में यह यह बात हास्यास्पद होने की सीमा तक महत्वहीन लगती है। लेकिन ऐसा है नहीं। कोई नोट कटा-फटा, रंग में सना हुआ, नकली निकल आए तो बदलने के लिए आप ग्राहक से आत्मविश्वास और अधिकारपूर्वक कह सकेंगे। यदि आपने उसके दिए नोट किसी को छुट्टा देने के लिए या अपने काम के लिए बदल लिए तो फिर सारी जिम्मेदारी आपकी होगी और आपको ही आर्थिक भार उठाना होगा।

चौथा सूत्र - ‘ग्राहक ने आपको रकम दी। अगले दिन छुट्टी नहीं है और रकम आपने जमा नहीं कराई तो यकीन मानिए, या तो आपने बहुत बड़ी आफत मोल ले ली है या फिर आपकी नियत में खोट आ गया है। आप इस रकम का उपयोग अन्यत्र करने जा रहे हैं।’

एजेण्ट को रकम देते ही ग्राहक मान लेता है कि उसे बीमा सुरक्षा मिल गई है। यदि उसका बीमा प्रस्ताव अविलम्ब प्रस्तुत/स्वीकृत नहीं हुआ और आपके अभाग्य से कोई अनहोनी हो गई तो उस स्थिति की कल्पना खुद ही कर लीजिए। रकम तो कुछ हजार की होती है जबकि बीमा लाखों का होता है।

सूत्र तो मुझे और भी मिले लेकिन ये चार सूत्र मेरे बीमा व्यवसाय के मजबूत पाये साबित हुए। मैंने इन पर अमल करने की पूरी-पूरी कोशिश की। यह बड़ा कारण रहा कि मैं अपने ग्राहकों का, उनके परिजनों और परिचितों/मित्रों का विश्वास हासिल करने में कामयाब हो पाया। आज जब मैं जीवन के चौथे काल में चल रहा हूँ तो मुझे इस बात का परम आत्म सन्तोष है कि मुझ पर गलत बिक्री (मिस सेलिंग) का, अमानत में खयानत का एक भी छींटा नहीं पड़ा और मटेरियल फेक्ट में विसंगति के आधार पर एक भी मृत्यु दावा अस्वीकार नहीं हुआ। इन सूत्रों ने मुझे भरपूर सार्वजनिक प्रतिष्ठा और पहचान दिलाई।

ये सारी बातें अचानक ही याद नहीं आईं। मेरी आदत है कि जिस भी मुहल्ले में जाता हूँ तो उस मुहल्ले में रहनेवाले अपने अन्नदाताओं (ग्राहकों), परिचितों से मिलने की कोशिश भी करता हूँ। बोहरा सा’ब लक्कड़पीठा मे रहते हैं। बुधवार, 06 दिसम्बर को सुरन्द्र भाई सुरेका से मिलने गया तो बोहरा सा’ब से भी मिलने चला गया। मुझे देखकर वे चकित हुए भी हुए और बहुत खुश भी हुए। मुझे अकस्मात अपने सामने खड़ा देख वे ‘अरे!’ कहकर मानो हक्के-बक्के हो गए। आधा मिनिट तक बोल ही नहीं पाए। उम्र नब्बे बरस के आसपास हो आई है। तबीयत ठीक-ठीक ही है। घर से बाहर निकलना बन्द सा हो गया है। मैं बहुत ज्यादा देर तो उनके पास नहीं बैठा। लेकिन जितनी देर बैठा रहा, लगा किसी विशाल, घने नीम के नीचे बैठा हूँ जो मुझे ठण्डक भी दे रहा है और निरोग भी कर रहा है। 

वे बार-बार मुझे धन्यवाद दे रहे थे कि मैं उनसे मिलने पहुँचा। मैं चलने लगा तो बोले - ‘अब तो लोगों ने मिलना-जुलना बन्द ही कर दिया है। आप आए तो जी खुश हो गया। आते रहो।’ मैं उनसे कैसे कहता कि मैं तो खुद ही अपनी खुशी के लिए उनसे मिलने पहुँचा था। मेरी तो तीर्थ यात्रा हो गई। ईश्वर उन्हें स्वस्थ बनाए रखे। 

ऐसे बोहरा सा’ब सबको मिलें।
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कॅरिअर और परिवार के सन्तुलन का विकट संघर्ष

जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कुछ क्षण ठहरे हुए रह जाते हैं। एक नवम्बर की उस शाम के कुछ मिनिट अब तक ठहरे हुए हैं। आध्या का कुम्हलाया चेहरा आँखों के सामने बना हुआ है और रुचि की भीगी आवाज सुनाई दे रही है। रुचि और अर्पित के बारे में मैं यहाँ लिख चुका हूँ।

वह, मेरे दाँतों के ईलाज का अन्तिम सोपान था। एक तो अपने मित्र के बेटा-बहू और दूसरा, चार महीनों के निरन्तर सम्पर्क में चार-चार, पाँच-पाँच घण्टों की बैठकें। इसके चलतेे मैं अर्पित और रुचि से ‘तू-तड़ाक’ से बातें करने लगा। दोनों की सस्ंकारशील शालीनता यह कि दोनों ने मेरे इस व्यवहार पर असहजता नहीं जताई। व्यक्ति और डॉक्टर के रूप में दोनों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। इतनी कम उम्र में दोनों ने डॉक्टरी पेशे में और मरीज के साथ व्यवहार में जो परिपक्वता हासिल कर ली है वह मेरे लिए ‘आश्वस्तिदायक, सुखद, सन्तोषदायक आश्चर्य’ ही है। ये बच्चे निश्चय ही डॉक्टरी के व्यवसाय को प्रतिष्ठा दिलाएँगे। मैं बहुत अधीर और अत्यधिक पूछताछ करनेवाला मरीज हूँ। लेकिन दोनों ने जिस धीरज और विनम्रता से मुझ जैसे अटपटे मरीज की चिकित्सा की उससे मुझे एकाधिक बार खुद पर ही झेंप आई। दोनों के हाथ इतने सध गए हैं कि आँखें बन्द कर, बातें करते हुए ईलाज करते लगते हैं। 

जब मेरा ईलाज शुरु हुआ था तो मित्रों-परिजनों ने बहुत चिन्ता की थी। ईलाज के दौरान एक-एक करके सबने मुझसे कम से कम एक बार तो पूछा ही पूछा - ‘दर्द कितना हुआ? बेहोश तो नहीं हुए? हर बार साथ में कोई न कोई था या नहीं? (चार महीनों के ईलाज के दौरान हर बार मैं अकेला ही गया था।) रात को सो पाए या नहीं? भोजन बराबर कर पा रहे हैं?’ मेरा जवाब हर बार सवाल पूछनेवाले को निराश करता था। मुझे एक पल भी दर्द नहीं हुआ। दर्द के मारे एक रात भी कष्ट से नहीं गुजरी। भोजन नियमित रूप से, सामान्य रूप से करता रहा। दाँतों का ईलाज कराने का मेरा कोई पूर्वानुभव नहीं रहा। इसलिए, लोगों के सवाल सुन-सुन कर अनुमान लगाया कि मरीज को बहुत तकलीफ होती होगी। बार-बार ऐसे सवाल सुन-सुन कर मुझे हर बार इस बात की तसल्ली हुई कि मैं अच्छे, विशेषज्ञता प्राप्त कुशल डॉक्टरों के हाथों में हूँ।

रुचि की बेटी आध्या अभी लगभग डेड़ बरस की है। माँ की सबसे बड़ी, सबसे पहली चिन्ता अपनी सन्तान और बच्चे की सबसे बड़ी, सबसे पहली जरूरत होती है माँ। इसीके चलते डॉक्टरी पर ममता प्रभावी हो जाती है और रुचि की दिनचर्या तनिक गड़बड़ा जाती है। मुझे यह बात दूसरी बैठक में अच्छी तरह समझ में आ गई थी। रुचि के साथ आध्या भी क्लिनिक पर आती है। इसलिए उससे भी मेरी देखा-देखी की पहचान हो गई। 

एक नवम्बर से पहलेवाली सारी बैठकों में आध्या मुझे हर बार तरोताजा, हँसती-खेलती, खिलखिलाती मिलती थी। लेकिन उस शाम वह सुस्त, चुपचाप, मुरझाई-कुम्हलाई हुई थी। मेरे मन में शंकाएँ-कुशंकाएँ उग आईं। रहा नहीं गया। पूछा बैठा - ‘आध्या सुस्त क्यों है? तबीयत तो ठीक है?’ रुचि ने जवाब दिया - ‘एकदम फर्स्ट क्लास है अंकल। तबीयत बढ़िया है।’ सुनकर तसल्ली तो हुई किन्तु आध्या का चेहरा, उसका गुमसुमपन रुचि की बात की पुष्टि नहीं कर रहा था। लेकिन रुचि की बात पर अविश्वास करने का भी कोई कारण नहीं था। (वह तो खुद ही डॉक्टर है!) तनिक हिचकिचाते हुए मैंने पूछा - ‘सब कुछ फर्स्ट क्लास है और तबीयत भी ठीक है तो यह बीमार जैसी सुस्त क्यों है?’ रुचि ने जवाब तो दिया लेकिन मुझसे आँखें चुराते हुए - “वो क्या है अंकल, इसकी ‘स्लीप सायकिल’ बदलनी है। चाइल्ड स्पेशलिस्ट ने कहा है।” मैं चौंका। याने आध्या की दिनचर्या बदली जा रही है। ऐसे कामों को मैं प्रकृति के काम में अनुचित हस्तक्षेप मानता हूँ। फिर, बच्चों के मामले में तो मैं तनिक अधिक दुराग्रही हूँ। मेरा बस चले तो पाँच बरस की उम्र तक बच्चे के कान में ‘स्कूल’ शब्द पड़ने ही नहीं दूँ। ढाई बरस की उम्र होते-होते बच्चों को स्कूल भेजने को मैं बच्चों पर ‘क्रूर, अमानवीय अत्याचार’ मानता हूँ। यह बच्चों से उनका बचपन छीनने के सिवाय कुछ भी नहीं है। बच्चों को जब नींद आए तब उन्हें सोने दिया जाए। जब वे जागें तब उन्हें खेलने दिया जाए। मैं दो बच्चों का बाप हूँ। अपनी शिशु अवस्था में मेरे दोनों बच्चे दिन में सोते थे और रात में जागते थे। आधी रात के बाद तक (कभी-कभी भोर तक) उनके साथ जागना पड़ता था। उन्हें कन्धे पर लेकर, थपकते हुए कमरे में घूमना पड़ता था। इसका असर हम पति-पत्नी की, अगले दिन की दिनचर्या पर होता था। दिन में भरपूर काम रहता था। सोने की तनिक भी गुंजाइश नहीं। बिना कुछ सोचे मुझे बात समझ आ गई। आध्या भी दिन में सोती होगी और रात में जागती, खेलती होगी। डॉक्टर माँ-बाप थक कर चूर रहते होंगे। चाहकर भी उसे वक्त नहीं दे पाते होंगे। ऐसे में यही एक निदान हो सकता था। 

रुचि की आवाज में खनक नहीं थी। स्वर भी मद्धिम था। चार महीनों की बैठकों के दौरान आध्या के बहाने बच्चों के प्रति माँ-बाप के व्यवहार को लेकर मेरी मानसिकता से वह भली भाँति परिचित हो चुकी थी। उसे लगा होगा, मैं कोई खिन्नताभरी असहमत टिप्पणी करूँगा। लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। 

यह केवल अर्पित-रुचि की बात नहीं थी। आज की पीढ़ी के, प्रत्येक व्यवसायी दम्पति (प्रोफेशनल कपल) की कष्टदायी हकीकत है। कॅरिअर तथा परिवार की चिन्ता और देखभाल में सफलत सन्तुलन करना ‘डूब कर आग का दरिया पार करना’ जैसा दुसाध्य है। फिर, यह सब वे बच्चों की बेहतरी के लिए ही तो कर रहे हैं!


यह चित्र रुचि की क्लिनिक में ही लिया हुआ है। मेरी इच्छा थी कि रुचि, डॉक्टर का एप्रेन पहन कर ही चित्र में रहे। लेकिन रुचि ने दृढ़तापूर्वक मना कर दिया - ‘नहीं अंकल! आध्या को इनफेक्शन का खतरा मैं नहीं उठाऊँगी।’

ये सारी बातें, कुछ ऐसे युगलों के चित्र एक पल में मेरे मन में उभर आए। मैं कुछ नहीं बोला। बोलता कैसे? बोल ही नहीं पाया। मैं तो चुप हो ही गया था, रुचि भी चुपचाप अपना काम करती रही। काम खत्म करने के बाद बोली - ‘एक महीने बाद आपको फिर आना है अंकल। चेक-अप के लिए।’ उसकी आवाज अब तक सामान्य नहीं हो पाई थी।

मैं कल, चार दिसम्बर को अर्पित-रुचि के पास जा रहा हूँ।  अभी से असहज हो गया हूँ। आध्या मुझे कैसी मिलेगी? हँसती-खिलखिलाती, चहचहाती या सुस्त, मुरझाई-कुम्हलाई? उसकी दशा से ही मैं अर्पित और रुचि की दशा का अनुमान कर पाऊँगा।

ईश्वर अर्पित-रुचि को और तमाम अर्पितों-रुचियों को सदैव सुखी, समृद्ध रखे और यशस्वी बनाए। ये बच्चे ही हमारा कल हैं। ये सेहमतन्द रहें ताकि हमारा आनेवाला समूचा समय सेहतमन्द रहे। कॅरिअर और परिवार में समुचित सन्तुलन बनाए रखते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचना इनका विकट संघर्ष है। लेकिन इनकी उत्कट जिजीविषा इन्हें सफल बनाएगी ही। 

कल शुभेच्छा सहित जाऊँगा - आध्या चहकती मिले। आध्या तो मिले ही, उससे पहले रुचि मिले - चहकती हुई, निष्णात् चिकित्सक और श्रेष्ठ माँ: रुचि।
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ये समझ रहे हैं, रामजी इनके भरोसे हैं

26 नवम्बर सोमवार की दोपहर। चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। भाजपा और काँग्रेस के उम्मीदवार रैलियों के जरिये, कस्बे के प्रमुख बाजारों में मतदाताओं को अपनी शकलें दिखा रहे हैं, उनके हाथ जोड़ रहे हैं। 

चुनाव की रंगीनी और गहमा-गहमी तलाशते हुए, हम सात फुरसतिये बिना किसी पूर्व योजना के, अचानक ही माणक चौक में एक ठीये पर  मिल गए हैं। सातों के सातों सत्तर पार। देश की प्रमुख सभी राजनीतिक विचारधाराएँ इनसे प्रतिनिधित्व पा रही हैं। सबके सब घुटे-घुटाए। सूरदास की ‘कारी कामरियाँ’, जिन पर दूजा रंग चढ़ने की आशंका भी नहीं। प्रत्येक अपने आप में एक मदरसा। कोई डाइबिटिक है तो कोई बीपी का मरीज। सबके अपने-अपने परहेज हैं। लेकिन जैसे गणित में ऋण-ऋण मिलकर धन हो जाता है, उसी तरह यहाँ परहेजियों के सारे परहेज, कुण्ठित चटोरापन बन कर जबान पर आ बैठे हैं। कॉमरेड की दुकान की कचौरियाँ और शंकर स्वीट्स की कड़क-मीठी चाय आ गई है। सबकी जबानें नश्तर तो हैं लेकिन नुकीली नहीं। छिलके उतार रही हैं। चुभ नहीं रहीं। कचौरियाँ कुतरने और चाय चुसकने के बीच बातें होने लगीं - 

- कश्यप जीत जाएगा।

- अभी से क्या कहें! प्रेमलता  जोरदार टक्कर दे रही है।

- क्या टक्कर दे रही है? कश्यप के सामने कहाँ लगती है? खानापूर्ति कर रही है। 

- इस मुगालते में मत रहना। अण्डर करण्ट दौड़ रहा है। बरसों बाद कोई सनातनी उम्मीदवार सामने है। 

- तुम लोग धरम-जाति से कभी ऊपर भी उठो यार! ये क्या जैन-सनातनी लगा रखा है? एक पूरी नई पीढ़ी सामने आ गई है। वो तुम्हारे धरम-जात के चक्कर में नहीं पड़ती। अपने दिमाग से काम लेती है। 

- हाँ! वो तो है। लेकिन उनके सामने आप्शन क्या है? 

- ये ‘नोटा’ को वोट नहीं दे सकते?

- दे सकते हैं लेकिन देंगे नहीं। वे कमिटेड नहीं हैं। तुमसे-हमसे ज्यादा पढ़े-लिखे, समझदार हैं। वोट को बेकार नहीं जाने देंगे। वोट तो किसी न किसी पार्टी को ही देंगे।

- हाँ। किसी न किसी पार्टी को ही देंगे। 

- देखो यार! इतने भावुक और आदर्शवादी मत बनो। अपना शहर, व्यापारी शहर है और व्यापारी कभी घाटे का सौदा नहीं करता। इसलिए जीतेगा तो कश्यप ही। उसके जीतने में ही सबका फायदा है।

- लेकिन कश्यप से नाराज लोग भी कम नहीं। जीत भले ही जाए लेकिन इस बार पसीना आ रहा है। 

- अरे! यार! तुम लोग ये क्या कश्यप-प्रेमलता में उलझ गए! कल अयोध्या में जो हुआ वो मालूम है तुम्हें?

- लो! इससे मिलो! चौबीस घण्टे हो गए हैं। अखबारों और टीवी में सब आ गया। सबने कह दिया कि उद्धव ठाकरे का शो फ्लॉप हो गया। पाँच हजार भी नहीं थे उसके मजमे में।

- य्ये! येई तो सुनने के लिए मैंने इसे उचकाया था। उचक गया स्साला। उद्धव की तो बता दी लेकिन वीएचपी की नहीं बताई। जरा वीएचपी की भी तो बता दे!

- क्यों? वीएचपी की क्या बताना? भव्य प्रोग्राम रहा। 

- अच्छा! कितना भव्य रहा?

- मुझसे क्या पूछते हो? अखबार में पढ़ लो! टीवी में देख लो!

- अरे! शाणे! हमको क्या उल्लू समझता है? तीन बज रहे हैं। हम क्या सीधे बिस्तर से उठ कर चले आ रहे हैं? बिना मुँह धोये? अरेे! दुनिया की खबर ले कर आ रहे हैं! तेरे मुँह से सुनना है। बता! कितना भव्य रहा वीएचपी का मजमा?

- अरे! यार! बुड्डा हो गया है। याददाश्त चली गई है बिचारे की। मगज (बादाम) खाता तो है लेकिन असर नहीं करती। तू ही बता दे।

- वो तो मैं बता ही दूँगा। लेकिन पहले ये, उद्धव के मजमे की गिनती बतानेवाला तो कुछ बोले!

- चल! तू ही बता दे। तेरी आँखों पर तो पट्टी बँधी है। मैं कुछ भी बताऊँगा तो तू मानेगा तो नहीं। तू ही बता।

- बड़ी जल्दी मैदान छोड़ दिया तेने तो रे! अपनी जाँघ उघाड़ने में शरम आती है? चल! मैं ही बताता हूँ। दो लाख लोग इकट्ठा करने का दावा किया था। चालीस हजार भी नहीं पहुँचे! पण्डाल खाली था। 

- नहीं। चालीस नहीं। पचास हजार। लेकिन चालीस हजार भी कोई कम नहीं होते। 

- सवाल कम-ज्यादा का नहीं है रे! सवाल तो तुम्हारे होश उड़ने का है। उद्धव ने तुम्हारे होश उड़ा दिए। उसने तो तुम्हारी दुकान पर कब्जा कर ही लिया था। बाबरी डिमालेशन का क्रेडिट ले ही लिया था उसने तो। वो अयोध्या आने की बात नहीं करता तो तुम लोग ये मजमा लगाते?

- क्यों? क्रेडिट लेने की बात ही कहाँ है। वो तो हमने ही किया था।

- अच्छा! तुमने किया था? लेकिन उद्धव के दावे के जवाब में वीएचपी ने तो कबूल कर लिया कि उस डिमालेशन में केवल वीएचपी का नहीं, देश के दूसरे संगठनों का भी योगदान है!

- ये तो वीएचपी की शालीनता है। देश के सम्पूर्ण हिन्दू समाज को क्रेडिट दे रही है। लेकिन हिन्दू भावनाओं की चिन्ता तो हम ही कर रहे हैं? इसमें क्रेडिट की बात ही कहाँ है। छाती ठोक कर कहते हैं - हाँ हमने किया है। 

- अच्छा! ये छाती ठोकनेवाले तो सबके सब मादा बने हुए हैं। कोर्ट में  तो एक भी सूरमा जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सबके सब एक भाव से कह रहे हैं कि बाबरी गिराने में उनका हाथ नहीं है। तुममें केवल एक ही मरद है। उमा भारती। उसी ने कहा कि वो बाबरी गिराने में शामिल है। बाकी तो तुम सबके सब मादा हो।

- अरे यार! क्यों इसके पीछे पड़ गया! हकीकत अपन सब जानते हैं।

- यही तो! जानता तो ये भी है लेकिन कबूल नहीं करता। अच्छा चल बता! अभी ये जमावड़ा क्यों किया? क्या प्रसंग था?

- क्या प्रसंग था? अरे! राम मन्दिर तो देश के हिन्दू समाज की आस्था का मामला है। बहुत राह देख ली।  अब नहीं देखेंगे। अभी नहीं तो कभी नहीं। बस! यही तो कह रहे हैं!

- अच्छा! साढ़े चार साल पहले जब एक साथ 282 आए थे लोक सभा में तब आते ही रामजी क्यों याद नहीं आए? चलो कोई बात नहीं। लेकिन उसके बाद अब तक क्या करते रहे? अडानी-अम्बानी के जरिए जेबें भरते रहे। पेट्रोल, नोटबन्दी और जीएसटी से लोगों की जान लेते रहे। अब जब लोग सामने आकर बोलने लगे हैं। हिसाब माँगने लगे हैं तो रामजी याद आ गए? लोग बेवकूफ नहीं हैं। सब जानते हैं। तुम तो लोगों की नब्ज टटोल रहे थे। लेकिन फ्लॉप हो गए। यही तुम्हारी परेशानी है। इसी से तुम घबरा रहे हो। तुम्हें रामजी नहीं, 2019 का चुनाव नजर आ रहा है। 

- ऐसी कोई बात नहीं है। चुनाव, चुनाव की जगह और राम मन्दिर अपनी जगह। मन्दिर बनाना तो हमारे जीवन का ध्येय है। तुम चाहे जितनी बाधाएँ खड़ी कर दो, मन्दिर तो बन कर रहेगा। हम ही बनाएँगे।

- अरे! यार! तुम दोनों ने चाय-कचोरी का नास कर दिया। बन्द करो यह सब। चलो! एक-एक कचोरी और चाय और बुलाओ।

- हाँ! हाँ! बुलाओ। मेरी ओर से। लेकिन एक बात तुम सब सुन लो। ये ऐसे बात कर रहा है जैसे रामजी इसके भरोसे हैं। जरा समझाओ इसे। रामजी इसके भरोसे नहीं, ये रामजी के भरोसे है। और ये ही नहीं, सारी दुनिया रामजी के भरोसे है। इसे समझाओ कि रामजी अपनी चिन्ता खुद कर लेंगे। चुनाव जीतने के लिए कोई और टोटका करे।

तीसरा कोई और बोलता, इससे पहले कॉमरेड की दुकान से कचोरियाँ आ र्गइं। सब उन्हीं में अपने-अपने रामजी देखने लगे।
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 29 नवम्बर 2018



न सुधरनेवालों का संघर्ष

इस कलि काल में वह व्यक्ति अभागा भी होगा और दुर्लभ भी जो किसी वाट्स एप ग्रुप में शामिल न हो। प्रेम जताने का दावा करते हुए दुश्मनी कैसे निभाई जाती है, वाट्स एप ग्रुप इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं।  आप हैं कि बार-बार पल्ला छुड़ाना चाहते हैं लेकिन भाई लोग हैं कि हर बार आपको पल्लू में बाँध लेते हैं। आपकी ‘त्राही! त्राही!’ की मर्मान्तक पुकार  ‘वाह! वाह!’ मानी जाती है। आप मित्रता के अत्याचार सहने को अभिशप्त हो घुटने टेक देते हैं और ग्रुप की कोड़ामार पिटाई के लिए अपनी पीठ नंगी कर मुँह मोड़ लेते हैं।

लेकिन यदि आप ग्रुप के एडमिन हैं और सबका भला चाहते हैं तो आपकी पिटाई तो सबसे ज्यादा होती है। दया की भीख माँगने की तरह आप ग्रुप का अनुशासन बनाए रखने के लिए बार-बार गिड़गिड़ाते हैं। आप पर कोई दया नहीं करता। यह सामूहिक पिटाई अचानक ही आपको याद दिलाती है कि आप भी स्वाभिमान जैसी चीज के मालिक हैं। यह याद आते ही आप चेतावनियाँ देते हैं। अंगूठा चिपका-चिपका कर सब आपका सही तो ठहराते हैं लेकिन आपकी सुनता कोई नहीं। तब आप लोगों को ‘रिमूव’ करते हैं। लेकिन ऐसा करते-करते आपको अचानक खयाल आता है कि ऐसे तो सबको रिमूव करना पड़ जाएगा! और यदि सबको रिमूव कर दिया तो फिर आप इन अपनेवालों का भला कैसे कर पाएँगे? तब आप खीझकर, एक दिन या दो दिन का ‘रिमूवल पीरीयड‘ तय कर, रिमूव किए लोगों को झुंझलाते हुए फिर ग्रुप में शामिल कर लेते हैं। रिमूव किए हुए लोग खुद को फिर से ग्रुप में शामिल देख दुगुने उत्साह से ‘अपनीवाली’ पर लौट आते हैं और आप ‘हवन करने में हाथ तो जलते ही हैं’ कह कर, सबकी पिटाई झेलने के लिए खुद को सौंप देते हैं।

मेरे एक अनदेखे मित्र, ग्रुप एडमिन की इसी दशा को भोग रहे हैं। लेकिन उनका धैर्य और हम एजेण्टों के प्रति उनकी चिन्ता देख-देख मैं उन्हें मन ही मन प्रणाम करता हूँ। उनसे मेरा फोन सम्पर्क बना रहता है। कभी मैं फोन कर लेता हूँ। कभी वे।

ये हैं बुर्ला (उड़ीसा) निवासी श्री रवि नारायण मिश्रा। एलआईसी के प्रशासनिक ढाँचे के अनुसार इनकी शाखा सम्बलपुर मण्डल में आती है। उड़ियाई उच्चारण में इन्हें ‘रबि नारायण’ और बंगाली उच्चारण में ‘रोबी नारायण’ पुकारा जाता है। हम एजेण्टों की रक्षा के लिए तो हमारा संगठन ‘लियाफी’ है ही लेकिन बचाव के औजारों का खजाना इन मिश्राजी के पास है। एजेण्टों से जुड़े, एलआईसी के तमाम आदेश, तमाम परिपत्र इन मिश्राजी के पास उपलब्ध हैं। लेकिन चमत्कार तो यह कि सबकी डिजिटल प्रतियाँ इस तरह उपलब्ध करा देते हैं जैसे कोई जादूगर हवा में हाथ लहरा कर कबूतर पेश कर देता है।

लेकिन इन अनदेखे मिश्राजी की यही एकमात्र विशेषता नहीं हैं। इससे बड़ी विशेषता इनकी यह है कि ये प्रत्येक एजेण्ट को जानकारियों, सूचनाओं से लैस, समृद्ध करना चाहते हैं। ये ऐसे अनूठे और उदार ज्ञानी हैं जो प्रत्येक एजेण्ट को अपने जैसा ही ज्ञानी बनाना चाहते हैं। लेकिन मैं देख रहा हूँ कि हम एजेण्ट लोग ज्ञानी बनने के बजाय मिश्राजी पर निर्भर होने में अधिक सुख अनुभव कर रहे हैं। ऐसे मे मिश्राजी हम एजेण्टों के लिए ‘निर्बल के बल राम’ बन गए हैं।

एजेण्टों को सूचना समृद्ध बनाने के लिए मिश्राजी ने ‘ओनली इंश्योरेंस ज्ञान’ तथा ‘ग्रुप मेडिक्लेम नॉलेज’ नाम से दो ग्रुप बना रखे हैं। इनकी इच्छा और कोशिश रहती है कि इन ग्रुपों के सदस्य केवल विषय से जुड़ी बातें और सामग्री ही दें। अधिकांश लोग तो मिश्राजी की बात मानते हैं लेकिन कुछ भाई लोग हैं कि इनकी सुनने को तैयार ही नहीं होते। वे ‘गुड मार्निंग’, ‘हेप्पी टुडे’, ‘हेव ए नाइस डे’ जैसे सन्देश, चित्र चिपकाते रहते हैं। मिश्राजी तो हमारा व्यावसायिक ज्ञान बढ़ाने की कोशिश करते हैं लेकिन ये भाई लोग मिश्राजी सहित हम सबका जीवन सुधारने का बीड़ा उठाए हैं। ऐसे लोग उपदेशों, निर्देशों, सुभाषितों, नीति वाक्यों, नाना प्रकार के उद्धरणों से सबका जनम सफल करने का ‘अत्याचारी-उपकार’ करते रहते हैं।

मिश्राजी ने ऐसे लोगों को चेतावनी देना शुरु किया। चेतावनी का असर  न होते देख चेतावनी दी कि यदि कहा नहीं माना तो ग्रुप से निकाल देंगे। चेतावनी तो दे दी लेकिन निकाला किसी को नहीं। मिश्राजी की इस भलमनसाहत को भाई लोगों ने शायद मिश्राजी की मजबूरी समझ लिया। रुकना तो दूर रहा, वे दुगुने उत्साह से अनावश्यक, अप्रासंगिक सामग्री देने लगे। मजबूर होकर मिश्राजी ने ऐसे लोगों को एक दिन, दो दिनों के लिए ग्रुप से बाहर करना शुरु कर दिया। इसका असर तो हुआ जरूर लेकिन ‘आदत से मजबूर’ भाई लोग अभी भी काम पर लगे हुए हैं।

ऐसे लोगों से मुक्ति पाने के लिए मिश्राजी ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने ‘बेस्ट विशेस’ नाम से एक अलग ग्रुप बनाया और कहा कि इस ग्रुप में कोई भी काम की बात नहीं की जाएगी। यहाँ केवल शुभ-कामनाएँ, अभिनन्दन, विभिन्न प्रसंगों के सन्देश और सुभाषित, नीति उद्धरण दिए जाएँगे। मिश्राजी ने चेतावनी दी - ‘यहाँ जो भी काम की बात करेगा उसे निकाल दिया जाएगा।’ होना तो यह चाहिए था कि सब खुश होते और जी भर कर शुभ-कामनाएँ, अभिनन्दन, बधाइयाँ देते। लेकिन हुआ उल्टा। कामवाले ग्रुपों पर फालतू सामग्री देनेवाले मित्रों ने कहा - ‘ऐसे कैसे? केवल बेस्ट विशेस का भी कोई ग्रुप होता है? ऐसे तो सब बोर हो जाएँगे! ग्रुप में तो काम की बातें होनी चाहिए!’ और भाई लोगों ने इस ग्रुप पर काम की बातें डालनी शुरु कर दीं। अब हालत यह है कि काम की बातोंवाले ग्रुप में भाई लोग बेस्ट विशेस डाल रहे हैं और बेस्ट विशेस वाले ग्रुप में काम की बातें।

फोन पर मिश्राजी से बातें करते हुए मुझे उनके मिजाज का कुछ-कुछ अनुमान हो चला है। बेस्ट विशेस ग्रुप पर भाई लोगों की प्रतिक्रियाएँ देख कर मैंने फौरन मिश्राजी को फोन लगाया। वे हतप्रभ और असहज थे। ‘कैसे लोग हैं बैरागीजी? काम की बात करने को कहो तो फालतू बातें करते हैं और फालतू बातों के लिए ग्रुप बनाया तो काम की बातें करने को कहते हैं!’ मैं ठठा कर हँसा। कहा - “यह ‘न सुधरनेवाली दो मानसिकताओं’ का संघर्ष है। आप भला करने पर तुले हुए हैं और वे अपना भला न होने देने को। न आप सुधरने को तैयार हैं न वे। दुःखी मत होईए। ऐसा ही चलते रहने दीजिए। कभी-कभी न सुधरते हुए भी आदमी सुधर जाता है।” 

अब मिश्राजी ठठाकर हँस रहे थे। 
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दुष्यन्त कुमार के ‘मुनासिब लोग’

हम पति-पत्नी के दो बैंकों में खाते हैं। पहला बैंक ऑफ बड़ौदा की स्टेशन रोड़ शाखा में और दूसरा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की कलेक्टोरेट एरिया शाखा में। बड़ौदा बैंक में हमारा खाता बरसों से चल रहा है। किन्तु, श्रीमतीजी सरकारी नौकरी में थी। उनकी पेंशन एसबीआई की इसी शाखा से मिलनी थी। इसलिए यहीं खाता खुलवाने  बाध्यता थी। एसबीआई में हमेशा इतनी भीड़ रहती है कि घुसने की ही हिम्मत नहीं होती। तीन दिन चक्कर काटे लेकिन खाता नहीं खुला। अचानक ही मालूम हुआ कि शाखा प्रबन्धक, एलआईसी की हमारी शाखा मे पदस्थ विकास अधिकारी श्री संजय गुणावत के बड़े भाई हैं। उन्होंने मदद की। खाता फौरन ही खुल गया। 

जब-जब भी एसबीआई जाने की जरूरत हुई, जाने से पहले ही हिम्मत पस्त हो जाती। ईश्वर महरबान हुआ और एक कृपालु वहाँ पदस्थ मिले। उनका काम ऐसा कि सप्ताह में तीन दिन उन्हें शाखा से बाहर रहना पड़ता है। जाने से पहले तलाश कर लेता। वे वहाँ होते तो ही जाता। नहीं होते तो जाना टाल देता।

हम पति-पत्नी नेट बैंकिंग या ई-बैंकिंग अब तक नहीं सीख पाए। एटीएम कार्ड घर बैठे आया। बच्चों ने हिम्मत बढ़ाई और सिखाया तो एटीएम से रकम निकालनी शुरु की। पाँच-सात बरस से एटीएम का उपयोग कर रहा हूँ लेकिन रकम निकालते समय आज भी हाथ काँपते हैं। श्रीमतीजी तो एटीएम का उपयोग अब तक नहीं सीख पाईं। बड़ौदा बैंक के कुछ मित्रों ने ई-बैंकिंग के लिए खूब प्रोत्साहित किया। बार-बार आग्रह किया। हिम्मत कर ई-बैंकिंग सुविधा के लिए खानापूर्ति की। किन्तु पता नहीं, प्रक्रिया के किस चरण में मुझसे कहाँ चूक हुई कि पास वर्ड उलझ गया और ऐसा उलझा कि बैंक के तमाम जानकार मित्र जूझ-जूझ कर हार गए लेकिन पास वर्ड उलझा ही रहा। अब तक उलझा हुआ ही है। मैंने तो उलझन की शुरुआत में ही घुटने टेक दिए। उसके बाद से ई-बैंकिंग के नाम से धूजनी (कँपकँपी) छूटने लगती है।

इसी के चलते, अपने खाते के ब्यौरे जानने के लिए हम लोग पास बुक पर ही निर्भर बने हुए हैं। लेकिन एसबीआई से पास बुक छपवाना किसी युद्ध लड़ने से कम नहीं। खिड़की पर लम्बी लाइन। अपना नम्बर आए तो बाबू पास बुक लेते हुए, मुँह बिगाड़ कर, हड़काते हुए सलाह दे - ‘मशीन से क्यों नहीं छपवा लेते?’ मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। परिचित सज्जन ने एक बार कह ही दिया - ‘यार! सरजी! आप पास बुक मशीन से छपवा लिया करो।’ उसके बाद उनकी मदद लेने की हिम्मत भी जाती रही। 

अब, पास बुक छपवाना मेरे लिए दुनिया का सर्वाधिक दुरुह काम बन गया। इधर श्रीमतीजी हैं कि महीना-दो महीना पूरे होते ही टोकने लगती हैं।

गए दिनों अचानक ही मालूम हुआ कि मित्र निवास रोड़ पर पास बुक छापने की एक नहीं दो-दो मशीनें लगी हैं। पुष्टि करने गया। देखा, बहुत ही आसानी से पास बुकें छपवा रहे हैं। मशीन भी बहुत बढ़िया - बराबर निर्देश भी देती है और प्रक्रिया की जानकारी भी। लेकिन वहाँ भी ल ऽ ऽ ऽ म्बी ऽ ऽ लाईन। देख कर छक्के छूट गए। मेरी दशा देख एक अनुभवी ने कहा - ‘रात नौ बजे के आसपास आईए। मशीनें खाली मिलेंगी।’ मेरा दिल बल्लियों उछल गया।

मैं बुधवार 14 नवम्बर की रात गया। एक सज्जन पास बुक छपवा रहे थे। मैं दूसरी मशीन की तरफ बढ़ा। उसके पर्दे पर मशीन के काम न करने की सूचना तैर रही थी। मैं, पास बुक छपवा रहे सज्जन के पीछे आ खड़ा हुआ। उनकी पास बुक छपते ही मशीन ने पास बुक लेने का सन्देश दिया। उन्होंने पास बुक निकाली। वे हटे। मैं मशीन के सामने खड़ा हुआ। लेकिन यह क्या? क्षमा याचना करते हुए मशीन के पर्दे पर, मशीन के काम न करने का सन्देश चमक रहा था। मैंने मुझसे पहलेवाले सज्जन से मदद माँगी। वे भी हैरत में पड़ गए। उन्होंने भी अपनी सूझ-समझ के मताबिक मशीन को टटोला, मेरी पास बुक ‘स्लॉट’ में डाली। किन्तु कोई हलचल नहीं हुई। सज्जन ने कहा कि कभी-कभी अचानक लिंक टूट जाने से या सर्वर में समस्या आ जाने से ऐसा हो जाता है। थोड़ी देर मे अपने आप ठीक हो जाएगा। मैं करीब बीस मिनिट वहाँ रुका रहा। फिर थक कर लौट आया। 

मैं गुरुवार 15 नवम्बर की रात फिर गया। लेकिन दोनों मशीनें पूर्ववत निश्चल, निष्क्रिय खड़ी थीं। शुक्रवार 16 नवम्बर की रात को फिर देहलीज पर मत्था टेका। लेकिन देवियाँ नहीं पिघलीं। शनिवार 17 नवम्बर को मैंने फेस बुक पर दो पोस्टों में अपनी व्यथा-कथा सार्वजनिक की। कुछ टिप्पणियाँ आईं। एक-दो ने बैंक की व्यवस्था को कोसा। बाकी  सबने एक भाव से नेट बैंकिंग अपनाने की सलाह दी। शनिवार की मेरी दूसरी पोस्ट पर मेरे प्रिय मित्र श्री राधेश्यामजी सारस्वत ने ढाढस बँधाया कि शनिवार को यदि पास बुक नहीं छपे तो सोमवार को वे हर हालत में मेरी पास बुक छपवा देंगे। सारस्वतजी बड़े प्रेमल व्यक्ति हैं। वे कलेक्टोरेट में सेवारत हैं और मेरी सहायता करने के अवसर तलाश करते रहते हैं।

इन चार दिनों (14 से 17 नवम्बर) में श्रीमतीजी ने अपने पास बुक प्रेम के अधीन मुझे उलाहने देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर उलाहने का अन्त एक ही वाक्य से हुआ - ‘आपसे इतना सा काम भी नहीं होता? हुँह!’

शनिवार को भी मशीनें बन्द की बन्द ही मिलीं। रविवार को मैंने सारस्वतजी को फोन किया - ‘पास बुक कहाँ पहँचाऊँ?’ उन्होंने कहा कि वे सोमवार सुबह मेरे घर आकर पास बुक ले लेंगे। सोमवार सुबह दस बजे वे आए। पास बुक ली। चले गए। ग्यारह बजते-बजते उनका फोन आया - ‘सर जी! पास बुक छप गई। फोटू वाट्स एप कर रहा हूँ।’ शाम को वे घर आकर पास बुक दे गए। (यह पूरा किस्सा फेस बुक पर मेरी वाल पर 17 और 19 नवम्बर को विस्तार से दिया हुआ है।)

बात यहीं खतम हो जानी चाहिए। लेकिन यह ब्यौरा तो मेरी मूल बात की भूमिका है। मेरी बात तो यहीं से शुरु होती है। 
जैसा कि मैंने कहा है, सत्रह नवम्बर की मेरी दोनों फेस बुक पोस्टों पर और काम हो जाने के बाद 19 नवम्बर वाली फेस बुक पोस्ट पर आई टिप्पणियों में दो-एक मित्रों ने ही बैंक के प्रति खिन्नता जताई। बाकी सबने मुझे ई-बैंकिंग और/या नेट बैंकिंग अपनानेे की न केवल सलाह दी अपितु इसके फायदे भी समझाए। मेरे ऐसा न करने पर दो-एक कृपालुओं ने तो यथेष्ठ खिन्नता भी जताई।

मैं भली प्रकार जानता हूँ कि इन सारे मित्रों ने मेरी चिन्ता करते हुए, मुझे कष्ट न हो, बैंक पर मेरी निर्भरता समाप्त करने के लिए मुझे यह नेक सलाह दी। लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ कि समुचित सेवाएँ न देने के लिए इनमें से किसी ने बैंक की आलोचना करना तो दूर, बैंक का नाम भी नहीं लिया।

यह, व्यवस्था के प्रति हमारी हताशाभरी उदासीन मानसिकता का नमूना है। हमने व्यवस्था के सामने घुटने टेक दिए हैं। हमने मान लिया है कि अपने ग्राहकों के साथ बैंक का व्यवहार तो ऐसा ही रहेगा। न तो वह सुधरेगी न ही हम उसे सुधार सकेंगे। यह हमारी हताशा का चरम है कि उसे सुधार की, उसके दुरुस्त होने की बात ही हमारे मन में आनी बन्द हो गई है। मुझे नेट/ई-बैंकिंग अपनाने की सलाह देते हुए मेरे तमाम कृपालु मित्र यह याद ही नहीं रख पाए कि बैंक अपने ग्राहकों को पास बुकें जारी कर रहा है और उन्हें छापने के लिए मँहगी स्वचलित मशीनें लगवाए चला जा रहा है। जाहिर है कि बैंक स्वीकार कर रहा है कि ग्राहक को यह सेवा देना अभी भी उसकी जिम्मेदारियों में शामिल है। लेकिन हमने हार मान ली है। क्रूर व्यवस्था से परास्त होना हमने अपनी नियती मान ली है। एक दुःखी उपभोक्ता के समर्थन में खड़े होने के बजाय सब उसे समझा रहे हैं - 
‘खुुुद ही सुधर जाओ भाई!’ 

यह सब याद करते हुए मुझे दुष्यन्त कुमार याद आ गए। बरसों-बरस पहले वे कह गए हैं -

न हो कमीज तो घुटनों  से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

जहाँ हमें रीढ़ की हड्डी तानकर खड़े होना चाहिए वहाँ हम विनयावनत हो खुद को बदल लेते हैं। व्यवस्था को और चाहिए ही क्या?

हम (इस ‘हम’ में मैं भी शरीक हूँ) दुष्यन्त कुमार के ये ही ‘मुनासिब लोग’ हैं।
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मेरी छपी हुई पास बुक देने के लिए मेरे घर आए श्री राधेश्यामजी सारस्वत। 
भगवान इनका भला करे। 

वाट्स एप यूनिवर्सिटी के शिकार

निर्भीक पत्रकारिता के पर्याय बन चुके पत्रकार रवीश कुमार
अपने दर्शकों/श्रोताओं को, ‘वाट्स एप यूनिवर्सिटी’ की शिक्षाओं से बचने की सलाह देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। किन्तु उनकी यह सलाह राजनीति में धर्मान्धता से बचने को लेकर होती है। लेकिन कहा नहीं जा सकता कि अंगुलियों की पोरों से संचालित हो रही यह यूनिवर्सिटी हमारे जीवन के किस पहलू को कब स्पर्श कर ले। इस यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर बनने के लिए न तो किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता है न ही किसी परीक्षा/साक्षात्कार से गुजरना होता है। इसमें न तो भर्ती का आयु बन्धन है न ही सेवा निवृत्ति का। देश की तमाम सरकारी शिक्षा यूनिवर्सिटियों में प्रोफेसरों के हजारों पद खाली पड़े हैं लेकिन इस यूनिवर्सिटी में न तो पदों की संख्या निर्धारित है न ही स्वनियुक्त प्रोफेसरों की गिनती। घर-घर में इस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मौजूद हैं। घर में जितने मोबाइलधारक, उतने ही प्रोफेसर। इन प्रोफेसरों के न तो ‘ड्यूटी अवर्स’ तय हैं न ही पीरीयड की समय सीमा। निस्वार्थ-निष्काम, ‘अहर्निशम् सेवामहे’ भाव से ये स्वैच्छिक मानसेवी प्रोफेसर लोग आपकी-हमारी जिन्दगी सँवारने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मुझे नहीं पता कि इन नेक सलाहों का फायदा किसी को हुआ या नहीं। किन्तु इसके एक ‘शिकार’ की व्यथा-कथा सुनने का मौका मिल गया।

श्री अरविन्द सोनी मेरे ‘मुक्त कण्ठ प्रशंसक’ हैं। वे म. प्र. विद्युत मण्डल के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। रतलाम जिला इण्टक के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। सेवा निवृत्त जरूर हो गए हैं लेकिन काम करना फितरत में है। परिचितों-मित्रों की समस्याएँ हल कराने के लिए एलआईसी कार्यालय आते रहते हैं। प्रायः ही मिलना होता है। जब भी मिलते हैं, कुछ पल बात करते ही हैं। इसी तरह, बातों ही बातों में अचानक ही ‘वाट्स एप यूनिवर्सिटी की सलाह का शिकार’ हो जाने की बात सामने आ गई।

हुआ यूँ कि किन्हीं कारणों से अरविन्दजी को टीएमटी करवानी पड़ी। रिपोर्ट से हृदय की धमनियों में अवरोध की आशंका के संकेत मिले। चिकित्सा शुरु की ही थी कि एक भरोसेमन्द हितचिन्तक ने वाट्स एप पर एक देसी नुस्खा भेजा। ये हितचिन्तक, मुम्बई के ख्यात-प्रतिष्ठित केईएम अस्पताल में चिकित्सक रहे हैं। परम सद्भाव और सदाशयता से भेजे गए इस सन्देश पर अरविन्दजी ने आकण्ठ विश्वास से अमल किया और नुस्खे में बताई दवा लेनी शुरु कर दी।

शुरु में तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा लेकिन कुछ दिनों बाद पेट में जलन की शिकायत शुरु हो गई। जैसा कि हम सब करते हैं, अरविन्दजी ने एसिडिटी का अनुमान लगाया और स्वचिकित्सक बन, एसिडिटी निरोधी सामान्य गोलियाँ ले लीं। लेकिन गोलियाँ निष्प्रभावी रहीं और समस्या बढ़ती गई। अरविन्दजी ने डॉक्टर से सलाह ली तो उसने बड़ी आँत में अल्सर का अन्देशा बताया। अरविन्दजी फौरन इन्दौर गए। पेट रोग विशेषज्ञ से मिले। कुछ जाँचें करवाईं जिनके आधार पर विशेषज्ञ ने बड़ी आँत में अल्सर की पुष्टि की। 

विशेषज्ञ की सलाह पर अरविन्दजी इन्दौर में ही अस्पताल में भर्ती हुए। दो दिन वहाँ ईलाज कराया। डॉक्टर के निर्देश लेकर रतलाम लौटे। पूरे दो महीने ईलाज चला तब कहीं जाकर कष्ट से मुक्ति मिली।

अरविन्दजी अब पूर्ण स्वस्थ तो हैं लेकिन आँत के अल्सर के कारण कुछ ऐसे निषेध आरोपित कर दिए गए हैं जिनका पालन करने के लिए अरविन्दजी की, चाय के ठीयों की बैठकें बन्द सी हो गईं है। बैठक में शामिल हों तो भाई लोग जबरदस्ती करने में कंजूसी नहीं करते। उनका कहा मानना याने अपनी जान से दुश्मनी। 

अब अरविन्दजी जब भी ऐसी बैठकों में शामिल होते हैं तो वाट्स एप यूनिवर्सिटी से मिला यह सबक सबसे पहले सुनाते हैं।
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