यह मुकदमा जीतना ही चाहिए

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल में भारत की हार के बाद, पाकिस्तान की जीत की खुशी में पटाखे छोड़ने और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा कर, जश्न मना कर, ‘राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य’ के आरोप में बुरहानपुर पुलिस ने 15 लोगों को गिरफ्तार किया। अपने प्रदेश की पुलिस पर गर्व हो आया। वर्ना कहीं हमारी पुलिस भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की तरह ‘बन्‍दनयन’ होती तो ये देशद्रोही बच निकलते। मध्य प्रदेश की ही तरह जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा सरकार में है लेकिन वहाँ, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते और भारतीय झण्डे को जलाते, हजारों लोग वहाँ की पुलिस को या तो नजर नहीं आते या वहाँ की पुलिस देख ही नहीं पाती। बुरहानपुर में लगे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ और जम्मू-कश्मीर में आए दिनों लग रहे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारों के अर्थ और मकसद में निश्चय ही कोई गुणात्मक अन्तर होगा। वर्ना, राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य पर वहाँ के भाजपाइयों का खून भी उबलता ही। मैं नहीं मानता कि ‘राष्ट्र प्रथम’ को जीवन ध्येय घोषित करनेवाला कोई भाजपाई ‘सत्ता’ के लालच में राष्ट्र विरोधी कोई हरकत बर्दाश्त कर लेता है।

बुरहानपुर के समाचार ने मुझे जिज्ञासु और उत्सुक बना दिया। मैं सोच रहा हूँ, इन पन्द्रह लोगों के विरुद्ध कोर्ट में क्या दलीलें दी जाएँगी! कहीं ऐसा न हो कि ये लोग ‘बाइज्जत बरी’ हो जाएँ! मेरे पास अपनी कुछ आशंकाएँ, कारण हैं।

पाकिस्तानी आतंकवाद ने हमारे अनगिनत सैनिकों के प्राण ले लिए हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा। शायद ही कोई दिन जाता हो जब पाकिस्तानी सेना या पाकिस्तान-पालित-पोषित-पल्लवित आतंकवादी हमले न करें।  जम्मू-कश्मीर का जनजीवन और अर्थ व्यवस्था ध्वस्तप्रायः है। लेकिन हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही वाणी-वीर, शब्द-शूर बने हुए हैं। हमलों-हत्याओं की कड़ी निन्दा कर रहे हैं, आतंकियों को कायर कह रहे हैं और ‘हमारे जवानों का खून व्यर्थ नहीं जाएगा’ के घोष कर रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही हम अमेरीका से गुहार लगा रहे हैं, विश्व मंचों पर पाकिस्तान की असलियत उजागर कर रहे हैं। वादा तो ‘घर में घुस कर’ मारने का  था। लेकिन सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है। कुछ भी नहीं बदला। बदलता नजर भी नहीं आ रहा।

एक भाजपाई सांसद ने, पाकिस्तान को शत्रु-देश घोषित करने का निजी संकल्प प्रस्तुत किया। उम्मीद थी कि यह संकल्प न केवल विचारार्थ ले लिया जाएगा बल्कि सर्वानुमति से, पारित भी हो जाएगा। लेकिन मुझे विश्वास ही नहीं हुआ जब सरकार ने यह कह कर यह संकल्प लौटा दिया कि इस संकल्प से दोनों देशों के सहयोग-सौहार्द्र-मधुरता के सम्बन्धों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मुझे डर है कि कहीं बुरहानपुर के राष्ट्रद्रोही सरकार के इस जवाब को अपने पक्ष में पेश न कर दें। वे कह न दें कि हार से व्यथित होने के बाद भी वे पाकिस्तान से भारत के मधुर सम्बन्धों की चिन्ता करने की, भारत सरकार की भावना को ही बल दे रहे थे।

मुझे बार-बार सुनने को मिलता है कि हमने पाकिस्तान को ‘अति अनुकूल राष्ट्र’ (मोस्ट फेवर्ड नेशन) का दर्जा दे रखा है। माना कि किन्हीं अन्तरराष्ट्रीय मजबूरियों के चलते हम पाकिस्तान को शत्रु देश घोषित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन उसे दिया हुआ यह दर्जा वापस न लेने में कौन सी मजबूरी है? बुरहानपुर के, गिरफ्तार किए गए ये राष्ट्र-द्रोही, भारत के इस आधिकारिक व्यवहार के तथ्य को अपनी ढाल बना लें तो?

जिस तरह यूपीए सरकार ‘सोनिया नियन्त्रित-निर्देशित-संचालित’ थी उसी तरह एनडीए सरकार, ‘संघ’ द्वारा संचालित है। सब जानते हैं कि ‘राष्ट्र प्रथम’ ही ‘संघ’ का जीवनाधार है। इसी ‘संघ’ के प्रमुख मोहन भागवत, पाकिस्तान को ‘भारत का भाई’ घोषित कर चुके हैं।ये पन्द्रह ‘बुरहानपुरी’ कहीं भागवत को अपने गवाह के रूप में न बुलवा लें। पूछ न लें कि भाई की बेहतरी चाहना अपराध है? 

समूचा भारतीय जनमानस पाकिस्तान विरोधी भावनाओं से ओतप्रोत है। पाकिस्तान को लतियाने, जुतियाने का कोई पल हम नहीं गँवाते। मैं नहीं मानता कि हमारे प्रधानमन्त्री इन जनभावनाओं से अनजान होंगे। ‘संघ’ का निष्ठावान, समर्पित स्वयम्सेवक’ होना उनकी अनेक विशेषताओं, योग्यताओं में प्रमुख है। लेकिन पाकिस्तानी प्रधामन्त्री नवाज शरीफ के जन्म दिन के जलसे में भाग लेने के लिए वे, प्रधानमन्त्री की हैसियत में, बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम, अचानक (पता नहीं, बुलावे पर या बिना बुलाए) पाकिस्तान पहुँच जाते हैं। सद्भावना और मैत्री भाव से ‘शरीफ परिवार’ को उपहार देते हैं। बदले में अपनी माँ के लिए नवाज से साड़ी स्वीकारते हैं। सारी दुनिया भौंचक रह जाती है। फिर सम्हलती है और मोदी के इस मैत्री-भाव की प्रशंसा करती है। जाहिर है, वे शत्रु-भाव से तो नहीं ही गए होंगे। बुरहानुपर के ये पन्द्रह लोग, कहीं मोदी के इस सौजन्य-व्यवहार को अपनी ढाल न बनालें।

मनमोहन सिंह सरकार के समय, मौजूदा सरकार से जुड़े तमाम लोग ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते’ और ‘पाकिस्तान को पाकिस्तान की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए’ का तर्क आसमान पर चस्पा किए हुए थे। मोदी सरकार आने के बाद सबको विश्वास था कि अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा और देश पाकिस्तानी आतंकवाद से मुक्ति पा लेगा। लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने, कम से कम दो बार संसद में कहा कि बात किए बिना आतंकवाद से मुक्ति के रास्ते तलाश नहीं किए जा सकते। बुरहानपुर के ये पन्द्रह राष्ट्रद्रोही कहीं सुषमा स्वराज की इस बात को अपने पक्ष में न ‘घुमा’ लें। 

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल के दौर में तमाम प्रखर राष्ट्रवादी बार-बार भारत को ‘पाकिस्तान का बाप’ कह रहे थे। क्या यह मुमकिन नहीं कि बुरहानपुर में गिरफ्तार ये लोग कहें कि टूर्नामेण्ट के उस दौर में उपजे पितृभाव के अधीन वे बेटे की जीत का जश्न मना रहे थे या कि ‘फादर्स डे’ पर, बेटे से मिले उपहार का उल्लास प्रकट कर रहे थे? 

पाकिस्तान को लेकर हमारे सरकारी और सार्वजनिक व्यवहार का यह विरोधाभास मुझे दहशत में डाले हुए है। मेरी जानकारी में, पाकिस्तान के सन्दर्भ में राष्ट्रद्रोह का यह पहला मामला है। इसके दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। अपनी आशंकाओं के बीच मुझे एक ही बात राहत दती है - अभियोजन तो ये सारी बातें अधिक अच्छी तरह जानता ही होगा। और इन सबकी काट भी उसके पास होगी ही। बस! यही  मेरा आशा-तन्तु है।

लेकिन इसके समानान्तर मुझे कुछ बातें और नजर आ रही हैं। पाकिस्तान नहीं रहेगा तो हम लोग फिर ‘पाकिस्तानी’ कह कर किसे चिढ़ा पाएँगे? क्या कह कर मुसलमानों को देशद्रोही आरोपित कर पाएँगे? अभी तो बात-बात में हम जिसे भी देशद्रोही घोषित कर देते हैं, उसे पाकिस्तान भेजते रहते हैं। यदि पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो फिर हम ऐसे देशद्रोहियों को कहाँ भेजेंगे? अभी तो पाकिस्तानी और देशद्रोही पर्याय बने हुए हैं। पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो देशद्रोहियों को किस देश का नागरिक बताएँगे? कभी-कभी तो लगने लगता है कि हम भले ही ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहें, लेकिन अपनी देशभक्ति, अपना राष्ट्रप्रेम दिखाने के लिए पाकिस्तान हमारी जरूरत है। यदि पाकिस्तान ही नहीं रहेगा तो हमारी देशभक्ति का क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पूनम को पूनम बने रहने के लिए जिस तरह से अमावस की जरूरत होती है उसी तरह हमारी देशभक्ति के लिए पाकिस्तान जरूरी है?

लेकिन इस परिहास को छोड़, मुद्दे की बात पर आएँ। बुरहानपुर का मुकदमा हम सबके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन गया है। अच्छा सोचें और इसके अनुकूल फैसले की प्रतीक्षा करें। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 22 जून 2017 को प्रकाशित)

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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