मैं : नासमझ, नादान और पिछड़ा


यह शायद नौंवी या दसवीं बार हुआ जब मैं ‘नासमझ, नादान और पिछड़ा हुआ’ एजेण्ट घोषित किया गया। यह भी नौंवी या दसवीं बार हुआ कि अपनी इस नासमझी, नादानी और पिछड़ेपन पर आत्म सन्तोष हुआ। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि मुझे इस तरह प्रमाण-पत्र दिए जाने पर मुझे न तो गुस्सा आया और न ही हीनता-बोध हुआ।

उन्नीस वर्ष और सात महीने उम्र है मेरी बीमा एजेन्सी की। लगभग चौदह सौ पॉलिसियों और लगभग साढ़े नौ सौ ‘अन्नदाताओं’ की परिसम्पत्तियों का स्वामी हूँ मैं। इस अवधि में मेरे खाते में नौ या दस मृत्यु दावे ही लिखे गए हैं। मुझसे बड़े, बेहतर और समझदार बीमा एजेण्ट और बीमा अधिकारियों के मुताबिक यह आँकड़ा ‘बहुत-बहुत कम’ से भी बहुत कम है। इतना कम जिस पर एजेण्ट गर्व कर सके। किन्तु मुझे इसमें गर्व करने जैसी कोई बात नजर नहीं आती। बीमा करने से पहले एजेण्ट यदि सारी बातें खुद जान ले, वास्तविकता से आश्वस्त हो जाए और बीमा प्रस्ताव में सब कुछ सच-सच लिख दे, कोई तथ्यात्मक सूचना छिपाए नहीं, तो उसे कभी भी असुविधाजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़े। यही सब तो मैंने भी किया! कोई अनूठा काम नहीं किया। यह तो मेरी न्यूनतम जिम्मेदारी थी। अपनी जिम्मेदारी निभाने में भला गर्व करने की बात कहाँ से आती है? बहुत हुआ तो आदमी आत्म सन्तोष कर सकता है।

अन्य क्षेत्रों/अंचलों की जानकारी तो मुझे नहीं किन्तु मालवा अंचल में चलन है कि मृत्यु दावे की रकम का चेक समारोहपूर्वक दिया जाता है। एजेण्ट और/अथवा एल आई सी यह समारोह आयोजित नहीं करते। सम्बन्धित एजेण्ट और एल आई सी के लोग मृतक के बारहवें/तेरहवें पर पूरी की जानेवाली ‘पगड़ी’ की रस्म के दौरान पहुँच कर, मृतक के परिवार को दावा राशि का चेक सौंपते हैं। इससे शोकग्रस्‍त परिवार के, जाति-पंचायत तथा नाते-रिश्तेदारों के उपस्थित जन समूह के कुछ लोगों के बीमे मिलते ही मिलते हैं। इसके पीछे के कारण आसानी से समझे जा सकते हैं।

किन्तु मुझे यह आज नहीं रुचा। मेरी एजेन्सी में जितने भी मृत्यु दावों का भुगतान हुआ, उनके चेक मैंने अकले ही, शोकग्रस्त परिवार में जाकर, चुपचाप परिजनों को सौंपे। शोक के प्रसंग और वातावरण को व्यवसाय में भुनाना मुझे अब तक गले नहीं उतरा है। एक बीमा एजेण्ट के रूप में मैंने खुद को अपने ‘अन्नादाताओं’ के परिवार का सदस्य ही माना। लिहाजा, अपने परिजनों के वाजिब हक का नगदीकरण कैसे किया जा सकता है? यह तो परायों के साथ भी उचित नहीं!

बीमे का अर्थ ही है - अनुबन्धित वचनबद्धता का निष्ठापूर्वक, समयबद्ध पालन। ऐसा कर हम (बीमा एजेण्ट और बीमा कम्पनी) किसी पर अहसान नहीं करते। अपना कर्तव्यनिर्वहन हमने नम्रतापूर्वक करना चाहिए, गर्वपूर्वक नहीं - यही तो सिखाया है हमें हमारे पुरखों ने! सो, मृत्यु दावे की रकम का चेक मैं चुपचाप ही सौंपता हूँ - कुछ इस तरह कि शोकग्रस्त परिवार और मेरे सिवाय किसी और को मालूम न हो।
वैसे भी, काम करने का आनन्द भी तो तब ही आता है जब उसकी चर्चा कोई और करे! अपने किए की चर्चा करने को, वह भी समारोहपूर्वक करने को ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना’ ही कहा गया है हमारे यहाँ तो। मैं आत्म-प्रशंसा से बचने की कोशिश करता हूँ और मेरी इस कोशिश को मेरे साथी एजेण्ट और बीमा अधिकारी मेरी नासमझी, नादानी और पिछड़ापन मानते/कहते हैं।
मैं चुपचाप सुन लेता हूँ। प्रतिवाद, प्रतिकार नहीं करता।

मैं अपने ईश्वर, अपनी आत्मा के प्रति जवाबदेह हूँ। इन्हीं से मुझे डरना चाहिए। नहीं, डरना नहीं चाहिए, इन्हीं की साक्षी में अपना काम करना चाहिए। इन दोनों से भय कैसा? ये ही तो मेरे परम् मित्र हैं।

मैं अपने इन्हीं परम् मित्रों से शक्ति, आत्म-बल पाता हूँ। ये दोनों ही मुझे कहते हैं कि मैं जो कर रहा हूँ, ठीक कर रहा हूँ।

मुझे अपनी नासमझी, नादानी और पिछड़ेपन से कोई शिकायत नहीं। मैं ऐसा ही बना रहना चाहूँगा और इसीके लिए कोशिशें करता रहूँगा।

मैं नासमझ, नादान और पिछड़ा हुआ ही भला। मुझे नहीं बनना समझदार, दुनियादार और अगड़ा।

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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

पायल को बेड़ी बनानेवाले


ताऊजी की बात सुनकर मुझे हँसी आ गई और साथ ही याद आ गए रमाकान्तजी। बात बाद में। पहले रमाकान्तजी के बारे में।

मेरे कस्बे से चौंतीस किलो मीटर दूर स्थित जावरा में रहते हैं रमाकान्तजी। एक शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य हैं। विक्रम विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में एम. एससी. परीक्षा स्वर्ण पदक सहित पास की। कर्मकाण्डी ब्राह्मण अवश्य हैं किन्तु कर्मकाण्ड को वास्तविकताओं और व्यावहारिकताओ की कसौटी पर कसते हैं। वे कर्मकाण्ड को जितनी ‘पारम्परिक आवश्यकता’ मानते हैं उतनी ही आवश्यक इस परम्परा को व्यक्तिशः निभाना भी मानते हैं। याने, जो भी कर्मकाण्ड करना है, खुद को ही करना है। खुद के लिए किसी और से कर्मकाण्ड करवाना न तो उचित और न ही फलदायी मानते हैं। साफ-साफ कहते हैं - ‘आपके नाम पर मैं भोजन कर लूँ तो पेट तो मेरा ही भरेगा। आपका नहीं। इसी प्रकार यदि अपने लिए या अपने किसी कष्ट निवारण के लिए कोई मन्त्र जाप करना है तो खुद को ही करना पड़ेगा। तभी उसका लाभ मिलेगा। जावरा में बैठकर उज्जैन में बैठे किसी पण्डित से जाप करवाने से आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा। वह लाभ तो जाप करनेवाले पण्डित को ही मिलेगा।’ रमाकन्तजी यह सब उन लोगों से कहते हैं जो अपने लिए विभिन्न मन्त्रों के जाप के लिए रमाकान्तजी से आग्रह करते हैं। वस्तुतः कुण्डली ज्योतिष में रमाकान्तजी का यथेष्ठ हस्तक्षेप भी है। सो, कुण्डली अध्ययनोपरान्त जब वे किसी अनिष्टकारक योग की सूचना देते हैं तो लोग उसके निवारण का उपाय भी पूछते हैं और तब ही वे सारी बातें सामने आती हैं जो मैंने ऊपर लिखी हैं।

ताऊजी की यह बात भी ऐसी ही थी - भूख किसी और को लगी थी और भोजन किसी और को कराने की।

ताऊजी के छोटे भाई की बेटी सरला का विवाह अभी-अभी, इसी सात जुलाई को सम्पन्न हुआ है। मायका महू में है। बारात इगतपुरी से आई थी। बारात आठ जुलाई को रवाना हुई। धवला नौ की सुबह अपनी ससुराल पहुँची। आज के जमाने से सब कुछ पहले से ही तय कर लिया जाता है। सो, हनीमनू के लिए नव दम्पति का, 14 जुलाई का रेल-आरक्षण पहले से ही करवाया हुआ था। नव दम्पति की यात्रा की तैयारियों के बीच ही एक परम्परा सवाल बन कर खडी़ हो गई - ‘पग-फेरा हुए बिना सरला कैसे जा सकती है?’ ‘पग-फेरा’ याने, विवहोपरान्त लड़की का पहली बार मायके जाना। देहातों में तो यह बहुत ही सामान्य बात है किन्तु सम्पन्न शहरी समाज ने इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर, तामझामवाली परम्परा में बदल दिया है। देहातों में लड़की का पग-फेरा किसी पर आर्थिक भार नहीं होता। किन्तु शहरी समाज ने ‘पग-फेरा’ से अधिक आवश्यक इसके तामझाम को बना दिया। यह तामझाम अच्छा-भला खर्चीला हो गया है। हममें से प्रत्येक, अपनी हैसियत को बढ़-चढ़कर ही जताता है। सो, आर्थिक सन्दर्भों में यह परम्परा भी ‘नाक से भारी नथ’ बन गई है। सो, सरला का पग फेरा केवल एक रस्म मात्र नहीं थी, दोनों परिवारों की हैसियत जताने का जरिया और अवसर भी थी। किन्तु, नौ को पहली बार ससुराल पहुँची धवला, पग-फेरा के लिए महू जाए तो कब जाए और यदि जाए तो चौदह की शाम तक वापस इगतपुरी पहुँचे तो कैसे पहुँचे? सो, नव दम्पति का हनीमून-प्रस्थान संकट में पड़ गया।

ऐसे में, जैसा कि होता आया है, परम्परा निभाने की खानापूर्ति करने की सम्भावना पर विचार किया। अगले ही पल समस्या का निदान मिल भी गया। धवला की बुआ भी इगतपुरी में ही रहती है। तय किया गया कि चौदह जुलाई की सुबह सरला, बुआ के घर चली जाएगी जहाँ से शाम को ‘कुँवर साहब’ उसे लिवा लाएँगे। इस तरह ‘पग-फेरा’ भी हो जाएगा और नव दम्पति का हनीमून प्रस्थान भी समय पर हो जाएगा।

सरला के ससुरालवालों ने सारी बात सरला के माता-पिता को बताई, समझाई। ‘समझाई’ इसलिए कि ‘पग-फेरा’ भले ही इगतपुरी में हो ही रहा हो किन्तु तामझाम तो पूरा करना ही पड़ेगा। ‘समझाइश’ न केवल, परम्परा की खानापूर्ति हेतु सहमति देने की थी बल्कि इसी तामझाम की भी थी। हम कितने भी प्रगतिशील क्यों न हों, लड़कीवाले आखिरकार लड़कीवाले ही होते हैं। मजबूरी में दी गई सहमति को समझदारी की शकल में परोसनी पड़ती है। सो, सरला के माता-पिता ने यही समझदारी दिखाई और कोर बैंकिंग की सुविधा के चलते, पग-फेरा के तामझाम की कीमत हाथों हाथ ही, बुआ के खाते में जमा करा दी।

सब कुछ ठीक समय पर, ‘ढंग-ढांग’ से निपट गया। सरला का पग-फेरा हो गया। वह हनीमून-प्रवास से ससुराल के लौट आईं है। सब खुश हैं - यहाँ ताऊजी, महू में सरला के माता-पिता और ससुराल में सब के सब।

किन्तु मैं खुश नहीं हो पा रहा हूँ। रमाकान्तजी की बातें याद कर शुरु-शुरु मे आई हँसी दूर जा चुकी है। जो पग-फेरा दोनों परिवारों के लिए एक आह्लाददायक वास्तविकता होना चाहिए था, वह नीरस खानापूर्ति में बदल कर रह गया। माँ-बाप ने पग-फेरा का मूल्य चुकाया किन्तु बेटी तो माँ-बाप के आँगन में लौटी नहीं ? ब्याही बेटी को पहली बार ससुराल से लौटी देखने की जो खुशी माँ-बाप को मिलनी चाहिए थी वह तो मिली ही नहीं! ‘पग-फेरा’ कोई संस्कार नहीं है। सरला का पग-फेरा यदि हनीमनू के बाद हो जाता तो कौन सा अनिष्ट, क्या अशुभ हो जाता?

परम्पराएँ हमने ही बनाई हैं और हमारी प्रसन्नता के लिए ही बनाई हैं। किन्तु सब कुछ उल्टा हो रहा है। जिन परम्पराएँ को हमारी संस्कृति की पायल बन कर हमारे जीवन के आँगन में में ‘रुन-झुन’ करनी चाहिए, उन परम्पराओं को हम प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक रुढ़ि की बेड़ियों में बदल रहे हैं - बिना सोचे समझे।

गलत तो नहीं कह रहा?
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आवश्यकता और जुगत


मेरे कस्बे के एक भक्त मण्डल ने दीर्घावधि के लिए रामचरित मानस पाठ शुरु किया था किन्तु पहले ही दिन व्यवधान आ गया। भक्त मण्डल ने लाउडस्पीकर लगा कर, चारों दिशाओं में भोंगे तान दिए थे। मानस-पाठ करनेवाले तो हॉल में बैठे थे। उन्हें केवल अपनी ही आवाज सुनाई दे रही थी। सो, मान कर चल रहे थे कि बाहरवालों को भी उतनी ही आवाज आ रही होगी। वास्तविकता इसके ठीक उलट थी। लाउडस्पीकर ‘फुल वॉल्यूम’ पर चल रहा था। सो, भोंगों से आ रही आवाज तेजाब की तरह कानों को जला रही थी। किसी ‘अधर्मी’ से यह सहन नहीं हुआ। उसने पुलिस में शिकायत कर दी। यह ‘अधर्मी’ अवश्य की ‘छोटी-मोटी पहुँचवाला’ रहा होगा। सो, पुलिस तत्काल ही मौके पर पहुँची और लाउडस्पीकर तथा भोंगे समेट कर ले आई। मालूम हुआ कि भोंगे लगाने की अनुमति भी नहीं ली गई थी।

जैसा कि होना था, इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया हुई। भक्त मण्डल ने पुलिस की इस ‘हरकत’ को ‘धर्म पर प्रहार’ निरुपित किया, कहा कि पुलिस के इस दुष्कृत्य से धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। कहा कि, लाउडस्पीकर के अभाव में रामचरित मानस पाठ करना असम्भव हो गया है। ऐसे मामलों में जैसी चेतावनियाँ दी जाती हैं, दी गईं।

बाद में क्या हुआ, नहीं पता। अखबारों में कुछ भी नहीं छपा सो अनुमान लगा रहा हूँ कि पुलिस ने क्षमा-याचना करते हुए सारा साज-ओ-सामान लौटा दिया होगा। ज्यादा से ज्यादा यह सलाह दी होगी कि लाउडस्पीकर की आवाज नियन्त्रित रखें। किन्तु भक्त मण्डल ने ऐसा नहीं किया होगा (मुझे विश्वास है कि वास्तव में ऐसा नहीं किया होगा। मामला ‘धर्म’ का जो ठहरा!) और ‘छोटी-मोटी पहुँच’ वाले उस ‘मूर्ख अधर्मी’ को समझ में आ गया होगा कि अत्याचार का विरोध करने का धर्म निभाना उसकी गलती थी और धर्म का अत्याचार उसे तब तक प्रसन्नतापूर्वक झेलते रहना होगा जब तक कि रामचरित मानस पाठ पूरा नहीं हो जाता।

समाचार ने मुझे प्रभावित तो नहीं किया किन्तु ध्यानाकर्षित तो किया ही। पूरे समाचार में जो बात उभर कर सामने आई वह यह कि रामचरित मानस के मुकाबले लाउडस्पीकर अधिक महत्वपूर्ण था। भक्त मण्डल के लिए यदि रामचरित मानस (और उसका पाठ) ही लक्ष्य होता तो लाउडस्पीकर के होने न होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। किन्तु इस धर्म ग्रन्थ का पाठ उनका लक्ष्य शायद ही रहा हो। उनका लक्ष्य रहा होगा - लोग देखें-जानें-समझें कि वे रामचरित मानस का पाठ कर रहे हैं। जाहिर है कि वे आत्म सन्तोष या आत्म शोधन के लिए रामचरित मानस का आश्रय नहीं ले रहे थे। वे तो खुद को धार्मिक साबित करने के लिए रामचरित मानस का ‘उपयोग’ कर रहे थे। गोया, रामचरित मानस कोई धर्म ग्रन्थ न होकर, धार्मिकता प्रदर्शन का प्रभावी औजार हो गया।

रामचरित मानस और महाभारत, भारतीय समाज में विशिष्ट स्थान रखते हैं। महाभारत को ‘नीति शास्त्र’ का और रामचरित मानस को ‘आचरण शास्त्र’ का दर्जा मिला हुआ है। प्रभु श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा ही इसलिए गया है क्योंकि जो कुछ कर पाने कि कल्पना आप-हम नहीं कर सकते, वह सब प्रभु श्रीराम ने जीया। इस दृष्टि से रामचरित मानस हमें आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है। किन्तु मेरे कस्बे के भक्त मण्डल ने रामचरित मानस के परामर्श को ताक पर रख दिया और लाउडस्पीकर को धर्म-पीठ पर स्थापित कर दिया। जो रामचरित मानस, मनुष्य को ‘उत्तम मनुष्य’ बनाता है, वही रामचरित मानस, मनुष्य द्वारा बनाए गए एक यान्त्रिक उपकरण के मुकाबले दोयम स्थान पर रख दिया गया। रामचरित मानस अपने आप में मनुष्य के परिष्कार का उपकरण है किन्तु मनुष्य निर्मित उपकरण के सामने मात खा गया - यह करिश्मा है धर्म के प्रति हमारी जड़ मानसिकता का। यह सब केवल इसलिए कि लोग हमें धार्मिक मानें, समझें।

रामचरित मानस पूर्णतः आचरण केन्द्रित ग्रन्थ है, उपदेश केन्द्रित नहीं। प्रदर्शन केन्द्रित तो बिलकुल ही नहीं। लेकिन इस मामले में इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ को ही प्रदर्शन का औजार बना दिया गया।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे ही कारणों से, हमें धार्मिक होने की आवश्यकता चैबीसों घण्टे बनी रहती है जबकि हम धार्मिक दिखने की जुगत में लगे हुए हैं।
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कॉमन वेल्थ की प्रेरणा


नेताओं को पीठ पीछे गालियाँ देना, पानी पी-पी कर भ्रष्टाचार को कोसना और इन दोनों के फलने-फूलने में अपने सिवाय बाकी सब को जिम्मेदार घोषित करना, यही हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य और हमारी राष्ट्रीय पहचान बन गया है। ये दोनों ‘नेक काम’ करने में हमें न तो देर लगती है और न ही अकल लगानी पड़ती है। सब कुछ बड़ी सहजता से करते हैं हम लोग यह सब। सचमुच में बिना विचारे। इन दोनों मुद्दों पर हम जिस दिन सोच-विचार कर बोलना, काम करना शुरु करेंगे, उसी दिन, उसी पल से हमें कष्टों से मुक्ति मिलनी शुरु हो जाएगी। लेकिन शुरुआत कौन करे? ऐसी शुरुआत के लिए हममें से प्रत्येक खुद को अशक्त, असमर्थ और विवश पाता है। वास्तविकता यह है कि हममें से कोई भी न तो अशक्त है, न असमर्थ और न ही विवश। हम सब स्वार्थी हैं। देश के नाम की दुहाइयाँ भले ही जोर-शोर से देते हैं किन्तु वास्तव में हम केवल स्वार्थी और आत्म केन्द्रित हैं। इससे कम या ज्यादा कुछ भी नहीं। हम कहें कुछ भी किन्तु वास्तविकता तो यही है कि देश हमारी प्राथमिकता सूची में तो दूर रहा, हमारी विचार सूची में ही कहीं नहीं है।


भारतीय जीवन बीमा निगम के हम एजेण्टों को कुछ आर्थिक सुविधाएँ मिलती हैं। निस्सन्देह इन सुविधाओं के लिए एजेण्टों को ढेर सारी व्यावसायिक शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। किन्तु, चैबीस से लेकर साठ तक की आसान मासिक किश्तों में, बिना ब्याज का ऋण न केवल आकर्षक अपितु ललचानेवाली भी सुविधा है। कार्यालय फर्नीचर ऋण भी ऐसी ही एक सुविधा है। किन्तु हम भारतीय बड़े उस्ताद लोग हैं। हम लोग सुविधाएँ भी अपनी शर्तों पर चाहते हैं। अपने मन माफिक हो जाए तो सब कुछ ठीक-ठाक और मन माफिक न हो पाए तो सारे नेता चोट्टे और पूरा देश भ्रष्ट।


अपने इसी राष्ट्रीय चरित्र वाले एक रोचक अनुभव से अभी-अभी गुजरा हूँ।


फर्नीचर ऋण सुविधा की पात्रता प्राप्त एक एजेण्ट मित्र ने मदद चाही। मुझे आश्चर्य हुआ। सब कुछ तो नियमानुसार और सुस्पष्ट है! भला मदद की आवश्यकता क्यों? मालूम हुआ - वे डेड़ लाख रुपयों का कार्यालय फर्नीचर ऋण लेकर पलंग, आलमारियों जैसा घरेलू फर्नीचर बनवाना चाहते हैं और इसीलिए मेरी मदद चाहते हैं। मैंने पूछा - ‘इसमें मैं मदद कैसे और क्या कर सकता हूँ?’ वे बोले - ‘आप किसी फर्नीचर व्यापारी से मुझे कार्यालय फर्नीचर का बिल बनवा दीजिए।’ मुझे और आश्चर्य हुआ। ऐसा भी होता है? हो सकता है? वे बोले - ‘कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता!’ मैंने जानना चाहा कि उन्होंने ऐसी कोई कोशिश की? जवाब मिला - ‘हाँ। कोशिश की। दुकानदार सेल्स टैक्स रजिस्टर्ड है और बिल भी देने को तैयार है किन्तु बिल की रकम (याने डेड़ लाख रुपये) पर साढ़े बारह परसेण्ट टैक्स माँगता है।’ मैंने कहा -‘मुझे नहीं लगता कि एलआईसी आपको ऐसा करने देगी। क्योंकि शाखा प्रबन्धक द्वारा व्यक्तिगत रूप से फर्नीचर का भौतिक सत्यापन करने के बाद ही ऋण मिल पाता है। किन्तु यदि आपको लगता है कि ऐसा करने से आपका काम हो जाएगा तो बिल ले लीजिए।’ मेरी बात उन्हें नहीं जँची। तनिक क्रुद्ध होकर बोले - ‘आपने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि बिल ले लीजिए। साढ़े बारह परसेण्ट से पूरे पौने उन्नीस हजार रुपये बनते हैं! मैं सामान तो नहीं ले रहा! केवल बिल ही तो ले रहा हूँ?’ मैंने कहा - ‘तो आप ऑफिस फर्नीचर ही ले लीजिए।’ मेरी ‘जड़ मति’ पर तरस खाते हुए बोले - ‘आप समझ नहीं रहे। फर्नीचर तो मुझे घर के लिए बनवाना है। ऑफिस फर्नीचर का तो केवल बिल चाहिए।’ मैंने कहा - ‘मैं समझ रहा हूँ।’ इस बार तनिक अधिक गुस्से में बोले - ‘खाक समझ रहे हैं? अरे! दुकानदार सीधे-सीधे पौने उन्नीस हजार का भ्रष्टाचार कर रहा है और आप उसकी तरफदारी कर रहे हैं? उसकी बात माननी होती तो आपके पास आता ही क्यों? आपके पास इसीलिए आया हूँ कि आप दुकानदार से मेरी सिफारिश कीजिए कि वह टैक्स की रकम न ले और बिल दे दे।’ क्षण भर को तो मुझे हैरत हुई किन्तु अगले ही पल मुझे हँसी आ गई। बोला - ‘आपको दुकानदार का पौने उन्नीस हजार का भ्रष्टाचार तो नजर आ रहा है किन्तु आप पूरे एक लाख इकतीस हजार दो सौ पचास रुपयों का जो भ्रष्टाचार कर रहे हैं, वह नजर नहीं आ रहा?’ अब वे भड़क गए। बिलकुल वैसे ही जैसे कि साँड को लाल कपड़ा दिखा दिया हो। तैश में बोले - ‘वहाँ दिल्ली में कॉमन वेल्थ खेलों में एक रुपये की चीज सौ रुपयों में खरीदी जा रही है। मन्त्री और अफसर लूटखोरी में लगे हुए हैं। आपको वह सब नजर नहीं आया। मेरा भ्रष्टाचार ही नजर आया?’


उनकी ‘दुर्वासा मुद्रा’ ने मेरी हँसी और बढ़ा दी। कहा - ‘रिश्वत देना आपकी-मेरी मजबूरी हो सकती है। रिश्वत लेना मजबूरी नहीं होती। आप यदि सचमुच में भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं तो सचमुच में ऑफिस फर्नीचर ही ले लीजिए। झूठा बिल बनवाकर घरेलू फर्नीचर मत बनवाइए। ऐसा करना आपकी मजबूरी नहीं है। किन्तु आप ऐसा ही करना चाह रहे हैं तो दुकानदार को टैक्स की रकम देना आपकी मजबूरी है। दुकानदार को भ्रष्टाचार करने का अवसर तो आप दे रहे हैं! यदि आप चाहते हैं कि दुकानदार यह भ्रष्टाचार न करे तो आप खुद ईमानदारी बरतें, झूठा बिल न बनवाएँ।’


मेरी बात सुनकर वे चुप तो हो गए किन्तु चेहरा बता रहा था कि सन्तुष्ट तो बिलकुल नहीं हुए। उल्टे, मदद के लिए मेरे पास आने का पछतावा उनके चेहरे को ढँकने लगा था। मानो, कोढ़ की दवा लेने आए थे और खाज साथ ले चले।


वे एजेण्ट बन्धु अभी-अभी गए हैं। मैं चाह रहा हूँ कि उन्हें मेरी बातों का बुरा लगे और वे झूठा बिल न बनवाएँ। किन्तु जानता हूँ कि मेरे चाहने से क्या होता है? वे तो कामन वेल्थ खेलों से ही प्रेरणा लेंगे, उन्हीं का अनुकरण करेंगे और अपने एक लाख इकतीस हजार दो सौ पचास रुपयों के भ्रष्टाचार की अनदेखी कर, दुकानदार के पौने उन्नीस हजार के भ्रष्टाचार को आजीवन कोसते रहेंगे। यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र है।


चौंसठवे स्वाधीनता दिवस की प्रभात वेला में, मेरी ओर से, अपने इसी राष्ट्रीय चरित्र की महक में रचे-बसे अभिनन्दन स्वीकार कीजिए।
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खुद में लौटते हुए



धीरे-धीरे सदमे से उबर रहा हूँ। लौट रहा हूँ अपने आप में। रविजी (श्री रवि रतलामी) ने कहा था - सदमे को ही दवा बना लीजिए। वही कर रहा हूँ।

5 जून को अन्तिम पोस्ट लिखी थी। (शायद) सात जून को भोपाल कोर्ट ने भोपाल गैस काण्ड पर अपना बहु प्रतीक्षित निर्णय सुनाया था। उसके बाद से देश में जो हुआ, उससे मुझे गहरा सदमा पहुँचा। विश्वास ही नहीं कर पाया कि यह सब मैं अपनी आँखों देख रहा हूँ, अपने ही देश में देख रहा हूँ।

जो निर्णय आया वह तनिक भी अनपेक्षित नहीं था। अपराधियों को दो-दो वर्ष की सजा सुनाई गई थी। सजा की अवधि ने सारे देश में बवण्डर खड़ा कर दिया। किन्तु यह निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 में ही लिख दिया था जब मुकदमे की धाराओं में परिवर्तन किया गया था! कानून की नाम मात्र की भी जानकारी रखनेवाले को पता था कि न्यायाधीश चाहे तो भी अपराधियों को दो वर्ष से अधिक की सजा नहीं सुना सकता।

किन्तु सारे देश में भूचाल आ गया। लगा, कहीं गृह युद्ध न छिड़ जाए। तमाम राजनीतिक दल और तमाम नेता खुद को पाक-साफ जताने के लिए सामनेवाले पर अंगुली तान रहे थे, यह भूलकर कि ऐसा करने में उनकी तीन अंगुलियाँ खुद ही तरफ उठ रही हैं। भाजपाई और कांग्रेसी एक दूसरे के कपड़े उतारने में पणप्राण से जुट गए थे। यह सब वे जिस सहज निर्लज्जता से कर रहे थे, उसी ने मुझे सदमा पहुँचाया।

ये सब के सब कानून के जानकार थे। प्रत्येक को पता था कि भोपाल कोर्ट का फैसला क्या होगा। इससे भी पहले इनमें से प्रत्येक को पता था कि ये सबके सब, भोपाल गैस पीड़ितों के साथ दगाबाजी कर चुके हैं। किन्तु हर कोई ऐसे बात कर रहा था मानो वह अपराधियों को मृत्यु दण्ड मिलने की प्रतीक्षा कर रहा था और न्यायालय ने अन्याय कर दिया है। सबके सब मुखौटे लगा कर स्यापा किए जा रहे थे और इस तरह कर रहे थे कि मुखौटों के भी पपोटे सूज गए।

उसके बाद सबके सब खुद को पाक-साफ-बेदाग बताने और बनाने में जिस मनोयोग से जुटे उसने मुझे और अधिक हतप्रभ कर दिया। जो आज सत्ता में हैं, वे तब भी सत्ता में थे। भोपाल कोर्ट के फैसले के बाद वे जिस तरह से हरकत में आए, वह सब उन्हें, हादसे के फौरन बाद ही क्यों नहीं सूझा? जो आज प्रतिपक्ष में हैं और गैस पीड़ितों के लिए वर्धित मुआवजे की और विभिन्न स्वास्थ्य/चिकित्सा सुविधाओं की माँग कर रहे हैं, उनके पुनर्वास की योजनाएँ सुझा रहे हैं, ये सब काम उन्होंने तब क्यों नहीं किए जब वे दिल्ली और भोपाल में सत्ता में आए थे? गुजरे जमाने को भूल जाएँ तो भी भोपाल में तो वे गए साढ़े छः वर्षों से लगातार सरकार में हैं? जो पेशबन्दियाँ उन्होंने भोपाल कोर्ट के फैसले के बाद की हैं, वे पेशबन्दियाँ साढ़े छः वर्ष पहले क्यों नहीं कीं? यह पुण्य अर्जित करने में क्यों और कैसे चूक गए?

इनमें से प्रत्येक को वास्तविकता पता है। प्रत्येक जानता है कि एण्डरसन को किसने, क्यों और कैसे भगाया। दरअसल, पहलेवाले हों या बादवाले, सबने एण्डरसन के प्रति वफादारी बरती। एक ने भगाया तो दूसरे ने उसे भागते रहने दिया। सबके मुँह में चाँदी का जूता ठुँसा हुआ था और हाथ चम्पूगिरी में लगे हुए थे। क्या बोलते और क्या करते?

इनमें से प्रत्येक खूब अच्छी तरह जान रहा था कि वह बेशर्मी को गहना बना रहा है। फिर भी जिस सहजता ये सब के सब दुहाइयाँ देने में और एक दूसरे के कपड़े उतारने में जुटे हुए थे, उसीने मुझे स्तब्ध कर दिया। सदमे में ला दिया।

किन्तु यह पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि मैं इन्हें दोष कैसे दूँ? ये सबके सब मेरे ही तो चुने हुए, मेरे ही तो भेजे हुए, मुझसे ही स्वीकार पाकर दिल्ली, भोपाल में बैठे हुए हैं! ये सब जो भी कर रहे हैं, उसके मूल में मैं ही तो हूँ! इनकी मनमानी का, इनकी बदगुमानी का, इनकी उच्छृंखलता का मैंने कभी प्रतिकार नहीं किया। ये सब आज जो व्यवहार कर रहे हैं, वह व्यवहार करने की छूट इन सबको मैंने ही तो दी!


मैंने या तो वोट दिया ही नहीं और यदि दिया भी तो वोट देने के बाद कभी पलट कर इनकी तरफ देखा ही नहीं देखा। इन लोगों को इस मुकाम तक मैंने ही पहुँचने दिया।

इन्हीं सारी बातों के चलते मैं अब तक सदमे में बना रहा, स्तब्धता से मुक्त नहीं हो पाया। जब-जब भी अखबार देखे, जब-जब भी समाचार चैनलें देखी, मेरे सदमे में बढ़ोतरी ही हुई। बीच में तो कुछ सप्ताह ऐसे निकले जब मैंने न तो अखबार पढ़े और न ही टीवी देखा। डरता रहा कि कहीं मेरी शर्मिन्दगी में पल प्रति पल इजाफा न हो जाए।

जी कड़ा कर संसद की बहस, यथा सम्भव अधिकाधिक देखी-सुनी। एक बार फिर निराशा गहराई। कोई भी ईमानदारी नहीं बरत रहा था। सबको अपनी-अपनी राजनीति की पड़ी थी। उम्मीद थी कि सुषमा स्वराज धीर-गम्भीर और सार्थक शुरुआत करेंगी। किन्तु वे भी अपनी पार्टी को बचाने और कांग्रेसियों को दोषी ठहराने में उलझ गईं। इस शुरुआत ने पूरी बहस की दिशा तय कर दी। इसी का प्रभाव रहा कि गृह मन्त्री चिदम्बरम ने राज्य सभा में अपने उत्तर का समापन भाजपा पर इसी प्रहार से किया कि भाजपाई जो सवाल आज पूछ रहे हैं, वे सवाल यदि 2001 में पूछे होते तो उन्हें मनमाफिक उत्तर मिलता। पूरी बहस में, दोनों ही सदनों में भाजपाई और कांग्रेसी एक दूसरे को निर्वस्त्र करने में जुटे रहे और यह भूल गए कि ऐसा करने में वे सारे देश के सामने अपनी ही नंगई उजागर कर रहे हैं।

किन्तु दो सांसदों ने मुझे आश्वस्त किया - पुरी (उड़ीसा) के लोकसभा सदस्य पिनाकी मिश्र (बीजद) और कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी। पिनाकीजी की अंग्रेजी जितनी मैं समझ पाया उसके अनुसार उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि एण्डरसन के प्रत्यर्पण की और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1996 में कानूनी धाराएँ बदलनेवाले फैसले में संशोधन/परिवर्तन की बात भारत को भूल जानी चाहिए। पिनाकीजी ने ‘भारतीय नागरिक’ का समुचित मूल्यांकन कर, उसे यथेष्ठ महत्व देने और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उसके जीवन और सम्मान की रक्षा करने के उपायों पर कारगर कार्रवाई करने की बात कही।

चतुर्वेदीजी ने अपनी ही पार्टी के नेतृत्ववाली संप्रग सरकार से जानना चाहा कि भारत सरकार इस त्रासदी से क्या सबक ले रही है और ऐसे कौन से उपाय सुनिश्चित कर रही है जिनके चलते भविष्य में ऐसी त्रासदी फिर कभी न हो।

उपदेश दे पाना और अपेक्षा कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है। अपने सदमे से मुझे ही उबरना होगा। अपनी स्तब्धता मुझे ही तोड़नी होगी। यह सदमा, यह स्तब्धता मुझे अकर्मण्य बना देगी। और तब मैं अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाऊँगा। वैसा ही निकम्मापन बरतता रहूँगा जो अब तक बरतता आया हूँ और जिसके कारण मेरे देश के तमाम राजनीतिक दलों और तमाम राजनेताओं को अपनी नंगई उजागर करने न तो देर लग रही है और न ही अटपटा लग रहा है।

इन सबको मैंने ही बिगाड़ा है। इन्हें दुरुस्त भी मुझे ही करना होगा।

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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

तुम-हम नहीं पाल सकते कबूतर


सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट ने दुनिया को गाँव में बदल दिया। अंगुलियों के पोरों पर दुनिया सिमट आई। ‘सात समन्दर पार’ वाले जुमले आज के बच्चों के लिए चुटकुले से अधिक नहीं रह गए। किन्तु उलटबासियाँ शायद सर्वकालिक होती हैं। यह अलग बात है कि कबीर ने इन्हें इस तरह प्रयुक्त किया कि हम उन्हें उलटबासियों का आविष्कारक माने बैठे हैं।

अभी-अभी मुझे चरम तकनीकी विकास की एक उलटबाँसी से रु-ब-रु होने का अवसर मिला।

रविवार, 30 मई को शामगढ़ से सक्तावतजी ने फोन पर पूछा - ‘तुझे दादा कोई खबर मिली या नहीं?’ मुझे लगा, दादा को राज्यपाल बनाने की अफवाह ने एक बार फिर जोर मार लिया है। मैंने कहा -‘आप इन बातों के चक्कर में मत पड़िए। इनमें कोई दम नहीं है। जिस दिन बन जाएँ, उस दिन मानिएगा।’ सक्तावतजी ने डाँट दिया -‘तू कभी तो संजीदा होकर बात किया कर! दादा के बाँए हाथ में फ्रेक्चर हुआ है। उनकी कार, खड़े ट्रैक्‍टर से टकरा गई थी। मैंने उनसे बात की थी। गम्भीर या चिन्तावाली बात तो नहीं है किन्तु इस उम्र में (दादा इस समय अस्सीवें वर्ष में चल रहे हैं) छोटी परेशानी भी बड़ा दुख देती है।’ मैं न केवल सकपका गया, घबरा भी गया। मैंने कहा -‘मैं फोन बन्द कर रहा हूँ। पहले दादा से बात करता हूँ। उसके बाद आपसे बात करूँगा।’

मैंने अविलम्ब दादा को फोन लगाया। वे भोपाल में थे। उन्होंने बताया कि 24 मई की रात, कवि सम्मेलनी-प्रवास में उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। ड्रायवर को खड़ा टैक्टर दिखाई नहीं दिया और टक्कर हो गई। दादा की बाँयी बाँह में, कोहनी और कन्धे के बीच फ्रेक्चर हुआ। हड्डी चार जगह से टूटी है और उसी दिन ऑपरेशन होनेवाला है। दादा सहज और संयत स्वरों मे बात कर रहे थे। पीड़ा की कोई आहट नहीं थी वहाँ। हाँ, उन्हें कष्ट इस बात का था कि उनका लिखना बन्द हो गया है क्योंकि वे बाँये हाथ से ही लिखते हैं। फ्रेक्चर की सूचना से अधिक पीड़ा इस सूचना में टपक रही थी।

प्रथमदृष्टया मैंने अनुमान लगाया कि फ्रेक्चर साधारण है और कन्धे-कोहनी का संचालन यथावत् बना रहेगा। निश्चय ही जो भी हुआ, अच्छा नहीं हुआ किन्तु अच्छी बात यह है कि इससे भी बुरा हो सकता था जिससे ईश्वर ने बचा लिया। ईश्वर की महती कृपा है कि दादा स्वस्थ-प्रसन्न हैं। ‘स्वस्थ’ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वे ‘दुर्घटनाग्रस्त’ हैं, ‘अस्वस्थ’ नहीं। बाद में गोर्की ने बताया कि दादा का ऑपरेशन सफल रहा। उनकी बाँयी भुजा में स्टील प्लेट लगा दी गई है। एक जून की शाम उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई है और समुचित चिकित्सकीय देखभाल के दृष्टिगत उन्हें, गोर्की के निवास के पास स्थित डॉक्टर पंकज अग्रवाल के अस्पताल में रखा गया है।

इतनी सारी सूचनाएँ मिल जाने के बाद, मुझे अलग-अलग स्थानों से दादा के दुर्घटनाग्रस्त होने की सूचना मिलनी शुरु हुई। कुछ लोगों ने सूचना की पुष्टि करने के लिए फोन लगाए। जिन्होंने मुझे सूचित करने के लिए फोन लगाया था, उन सबको मैंने
‘ताजा समाचार’ का ‘प्रति उपहार’ (रिटर्न गिट) दिया। तीन जून की शाम को डॉक्टर तय करेंगे कि दादा को अभी भोपाल ही रखा जाए या छुट्टी देकर, घर (नीमच) भेज दिया जाए।

किन्तु इस सबमें तकनीकी विकास की उलटबाँसी कहाँ? यही कहने के लिए तो मैं यह सब लिख रहा हूँ। उल्लेखनीय बात यह है कि मुझे सूचना देनेवालों को यह सूचना किसी अखबार या स्थानीय चेनल या अन्य किसी सार्वजनिक संचार माध्यम से नहीं मिली। प्रत्येक को किसी न किसी व्यक्ति से मिली।

तकनीकी विकास की सहायता पाकर सारे अखबार स्थानीय हो गए। सब जिला स्तर के संस्करण छाप रहे हैं। दादा चूँकि नीमच रहते हैं सो यह समाचार (यदि छपा भी होगा तो) अखबारों के नीमच जिला संस्करण में ही छपा होगा। सक्तावतजी शामगढ़ रहते हैं जो मन्दसौर जिले में आता है। मुझे सूचना देनेवालों में से अधिकांश को भी यह समाचार किसी अखबार से नहीं, किसी न किसी व्यक्ति से ही मिला। 24 मई वाली इस दुर्घटना का समचार मुझे भी सातवें दिन, 30 मई को मिला, वह भी व्यक्तिशः, किसी अखबार से नहीं। गोया, अखबारों की प्रसार संख्या भले ही बढ़ रही हो किन्तु वास्तव में वे सिमट रहे हैं। ‘कोस-कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बानी’ वाली मालवी कहावत अखबारों पर लागू हो गई है। ये भी पाँच कोस पर वाणी (याने कि खबरें) बदल रहे हैं।

इस सबको क्या माना जाए? सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोटवाले इस समय में, एक दूसरे का कुशल क्षेम जानने के लिए हमें एक बार फिर अपने पारम्परिक साधन/माध्यम अपनाने पड़ेंगे? तकनीकी विकास के चरम को छूने को प्रति पल लालायित बने हुए इस समय में, अपने सन्देश पहुँचाने के लिए हमें कबूतर पालने पर विचार शुरु कर देना चाहिए?

सम्भव है, यह उलटबाँसी न हो। किन्तु उलटबाँसी के कच्चे प्ररुप की हैसियत पाने की अधिकारिणी तो यह घटना है ही।

नहीं?
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मेरा उपरोक्त आलेख, साप्ताहिक उपग्रह के दिनांक 03 जून 2010 वाले अंक में, ‘कबूतर पालने का समय’ शीर्षक से मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में छपा था। अगले दिन, 04 जून 2010 को मुझे एक पत्र मिला जिसने मुझे धरती पर ला पटका। पत्र प्रेषक ने अपना नाम-पता नहीं लिखा किन्तु कुछ मजमून ऐसे होते हैं जो अपने लिखनेवाले का अता-पता दे देते हैं। यह भी वैसा ही था। पत्र भेजनेवाले को मैं तो पहचान गया किन्तु उसकी पहचान मैं भी उजागर नहीं कर रहा हूँ। मेरी असलियत उजागर करनेवाला जब खुद ही ‘गोपन’ रहना चाहता है तो शराफत का तकाजा यही बनता है कि मैं भी खुद को नियन्त्रित कर, सामनेवाले की भावनाओं का सम्मान करूँ।

बहरहाल, पत्र इस प्रकार है -

‘प्रिय विष्णु,

‘कबूतर पालने का समय’ पढ़कर दो खुशियाँ एक साथ हुईं। पहली - तेरे लिखे में भले ही तन्त (‘तन्त’ मालवी बोली का शब्द है जो ‘प्राण’ अथवा ‘तत्व’ के समानार्थी के रूप मे प्रयुक्त होता है) न हो किन्तु पढ़ने में मजा आता है। दूसरी - यह अच्छी बात है कि तू बिलकुल नहीं बदला। अभी भी वैसा ही है जैसा कि हायर सेकेण्डरी में पढ़ते समय था। तू न तब कुछ समझता था न अब समझता है। समझता होता तो कबूतर पालने की सलाह नहीं देता। कोई जमाना रहा होगा जब घर-घर की छत पर कबूतर पाले जा सकते रहे होंगे। आज तो कबूतर पालना विलासिता हो गया है। अम्बानी, टाटा या मनमोहनसिंह की आर्थिक नीतियों के सौजन्य से जन्मा कोई नव कुबेर ही कबूतर पाल सकता है। औसत आदमी नहीं पाल सकता।

‘आज कबूतर की जगह मोबाइल ने ले ली है। तेरे-मेरे जैसों के घर में तीन-तीन, चार-चार मोबाइल तो होंगे ही। दादा के एक्सीडेण्ट की खबर तुझे मोबाइल से ही मिली होगी। अब तो ये ही आज के जमाने के कबूतर हैं। लेकिन तेरी समझ में यह बात नहीं आई। आई होती तो कबूतर पालने की बात तुझे नहीं सूझती। तू अभी भी वहीं का वहीं है, ग्यारहवीं में पढ़ते समय जैसा मनासा में था। मुझे कोई ताज्जुब नहीं होगा यदि मेरी इस बात पर भी खुश हो जाए।’

पत्र पढ़कर मेरी बोलती बन्द है।

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दुर्जनों का सम्मान


मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि अन्ततः हम लोग चाहते क्या हैं? हम सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। हमारे संकटों का कारण कहीं हमारी अस्थिरचित्तता तो नहीं?

मेरे कस्बे से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में मैं मेरा स्तम्भ ‘बिना विचारे’ नियमितप्रायः है। कभी ‘उपग्रह’ के लिए जो लिखता हूँ उसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट बना लेता हूँ तो कभी अपनी किसी पोस्ट को अपने स्तम्भ का लेख। इसी क्रम में, वरुण के बच जाने से उपजी खुशी शीर्षकवाली मेरी पोस्ट ‘उपग्रह’ में छपी। लगभग बीस लोगों ने फोन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। ऐसी प्रत्येक प्रतिक्रिया की शुरुआत प्रसन्नता से और समाप्ति खिन्नता से हुई। एक, दो नहीं, पूरे अठारह लोगों ने रीमा के प्रति न केवल सहानुभूति व्यक्त की अपितु उसकी वास्तविकता उजागर करने के लिए मुझे उलाहने दिए। अल्पाधिक सबका कहना यही रहा कि मैंने उसकी फजीहत कर दी। वह बेचारी तो अब मुँह दिखाने काबिल भी नहीं रही। बेचारी एक औरत जैसे-तैसे अपनी नौकरी कर रही है और मैं हूँ कि चौराहे पर उसकी बेइज्जती कर दी। एक बात और प्रायः प्रत्येक ने कही कि कामचोरी, आलस्य और बेशर्मी कौन नहीं कर रहा? दिल्ली से लेकर देहात तक चारों ओर यही दशा है। ऐसे में रीमा की वास्तविकता उजागर कर मैंने ‘बेचारी एक औरत’ पर अत्याचार ही किया।

कुल दो लोगों (मनासा से अर्जुन पंजाबी और बृजमोहन समदानी) ने रीमा का पक्ष नहीं लिया। दोनों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि कोई कर्मचारी ऐसा भी हो सकता है? मैंने दोनों को रतलाम आने का न्यौता दिया और कहा - ‘जब जी चाहे, बिना पूर्व सूचना दिए रतलाम आ जाओ। रीमा के साथ चाय पीलेना और मेरे लिखे की हकीकत उसी से पूछ लेना।’ दोनों को अविश्वासभरा दुख हुआ।

रीमा का बचाव करनेवाले सब लोगों से मैंने कहा कि आचरण का बखान शब्दशः सच है किन्तु रीमा और वरुण की वास्तविक पहचान छुपा ली गई है। दोनों के नाम और विभाग बदल दिए गए हैं। मुझे यदि रीमा की फजीहत करनी होती तो मैं ऐसा नहीं करता। मेरी भावना और कोशिश यही रहती है कि मैं यदि किसी का सम्मान बढ़ा नहीं सकूँ तो मेरे कारण उसके सम्मान में कमी भी न हो। मैं तो वैसे भी ‘सद्भावनाकांक्षी’ हूँ। रीमा के समस्त समर्थकों ने मेरी इस सूचना पर राहत भरी साँस ली और मुझे साधुवाद दिया।

ऐसे प्रत्येक व्यक्ति से मैंने पूछा कि वरुण के बारे में उसकी क्या राय है? उत्तर में प्रत्येक ने मुक्त कण्ठ से वरुण की प्रशंसा की और कहा कि वे समस्त शासकीय कार्यालयों की प्रत्येक कुर्सी पर वरुण को बैठे देखना चाहेंगे। मैंने पूछा - ‘किन्तु आपने तो वरुण की बात ही नहीं की। उसके बारे में तब ही कुछ कह रहे हैं जब मैंने आपसे पूछा।’ अधिकांश लोग मौन रहे किन्तु दो-एक ने विचित्र उत्तर दिया। कहा - ‘तो इसमें कौन सी अनोखी बात है? ईमानदारी से काम करना तो उसकी आधारभूत जिम्मेदारी है। फिर, वह अपनी मर्जी से ईमानदारी बरत रहा है, किसी के कहने से नहीं।’ मैंने पूछा - ‘और ईमानदारी निभाना रीमा की आधारभूत जिम्मेदारी नहीं? वरुण को तो कोई नहीं कह रहा किन्तु रीमा को तो उसके अधिकारी, सहकर्मी बराबर टोकते रहते हैं फिर भी वह कामचोरी, मक्कारी, बेशर्मी अपनाए हुए है?’ उत्तर में बचते हुए ऐसे लोगों ने कहा -‘आप तो पीछे पड़ जाते हो। किन्तु बेचारी औरत जात के साथ आपने अच्छा नहीं किया।’

ये सारी बातें मैं भूल जाना चाहता हूँ किन्तु भूल नहीं पा रहा। कामचोरों, बेईमानों से हम सब दुखी और सन्तप्त हैं। उनसे मुक्ति चाहते हैं। चाहते हैं कि उन्हें कामचोरी का दण्ड मिले। किन्तु अवसर आने पर कामचोरों की हिमायत करने में बिना देर किए जुट जाते हैं। प्रथमतः तो किसी कामचोर, बेईमान की पहचान हो नहीं पाती। और यदि होती है तो इस तरह उसका बचाव करने लगते हैं। वह भी सज्जनों की उपेक्षा करते हुए!

सयानों से सुनता आया हूँ कि जो समाज सज्जनों का सम्मान और दुर्जनों का धिक्कार नहीं करता, वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।

हम क्या कर रहे हैं?

दुर्जनों का सम्मान?
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एक बार फिर बिना शर्त क्षमा याचना


पावती सहित पंजीकृत डाक से

24 मई 2010, सोमवार
द्वितीय वैशाख शुक्ल एकादशी, 2067

प्रति,
श्रीयुत हरीशजी बी. त्रिपाठी,
उच्च न्यायालय वकील,
63/1 सुमित अपार्टमेण्ट,
स्नेहलतागंत,
इन्दौर

महोदय,

आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा पिता श्रीयुत लक्ष्मीनारायणजी शर्मा निवासी 195, सुखदेव नगर एक्स.-1, एरोड्रम रोड़, इन्दौर के प्रतिबोधन एवम् निर्देशानुसार आपके द्वारा भेजा गया सूचना पत्र दिनांक 17-05-2010 प्राप्त हुआ।

इसके उत्तर में मैं, श्रीमती साधना पति श्रीयुत लक्ष्मीनारायणजी शर्मा, निवासी 8, राजस्व कॉलोनी, रतलाम के प्रतिबोधन एवम् निर्देशानुसार, वकील श्रीयुत जय प्रकाशजी भट्ट, 19 जाटों का वास, रतलाम द्वारा मुझे भेजे गए सूचना पत्र दिनांक 11.5.2010 के उत्तर में, मेरे द्वारा उन्हें भेजे गए मेरे पत्र दिनांक 18.05.2010 की प्रतिलिपि संलग्न कर रहा हूँ।

आपके और श्रीयुत भट्ट के सूचना पत्रों की अधिकांश बातें समान हैं, इसलिए आप श्रीयुत भट्ट को भेजे मेरे संलग्न पत्र को ही, अपने सूचना पत्र का उत्तर मान लें।

उस पत्र में वर्णित बातों के अतिरिक्त मुझे निम्नानुसार कुछ बातें और कहनी हैं -

पहली बात तो यही कि समूचे विवाद का आधारभूत और प्राथमिक कारण, आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा की वह प्रस्तुति है जो दिनांक 03 मई 2010 को नईदुनिया में प्रकाशित हुई है। सुश्री गायत्री शर्मा को लिखा, दिनांक 03 मई 2010 वाला मेरा पत्र इस विवाद का कारण बिलकुल ही नहीं है।

दूसरी बात यह कि मैंने जो कुछ भी किया, वह किसी प्रतिद्वन्द्विता अथवा बैर भाव से नहीं किया क्योंकि मैं तो आपकी पक्षकार से सर्वथा अपरिचित हूँ।

तीसरी बात यह कि (जैसा कि मैंने श्रीयुत जय प्रकाशजी भट्ट को लिखे मेरे, दिनांक 18 मई 2010 वाले पत्र में कहा है) मेरा ‘आशय’ (मंशा) क्षणांश को भी खराब नहीं रहा। इसका प्रमाण यही है कि आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा और उनकी माताजी श्रीमती साधना के कहने/चाहने से पहले ही मैं, अपने ब्लॉग पर इस प्रकरण में अपनी शर्मिन्दगी और आत्म सन्ताप प्रकट कर चुका था जिसे आपके अनुसार देश-विदेश के लाखों, करोड़ों इण्टरनेट उपयोगकर्ता, मेरी बिना शर्त क्षमा याचना से पहले ही पढ़ चुके थे। मुझसे पहले और मुझसे बेहतर आप खुद जानते हैं कि किसी भी मामले में ‘आशय’ (मंशा) ही प्राथमिक, आधारभूत और सर्वोपरि निर्णायक कारक होता है।

निम्नांकित कुछ बातों पर भी मैं आपका ध्यानाकर्षण कर रहा हूँ जो मेरे ‘आशय’ को और अधिक स्पष्ट करती हैं।

किसी व्यक्ति पर किए गए अत्याचार/अनाचार का और उससे उपजी पीड़ा का प्रकटीकरण, सम्बन्धित व्यक्ति स्वयम् कर लेता है। किन्तु राष्ट्रीय अस्मिता और भावनाओं से जुड़े अमूर्त विषयों के साथ हुए अनाचार/अत्याचार का, उससे उपजी पीड़ा का प्रकटीकरण वे विषय खुद नहीं कर सकते क्योंकि वे ‘व्यक्ति’ नहीं, अमूर्त, अशरीरी होते हैं। उस दशा में उन विषयों से जुड़े वे लोग बोलते हैं जो ऐसे अनाचारों/अत्याचारों से भावना के स्तर पर आहत और पीड़ित होते हैं। धार्मिक प्रकरणों से जुड़े ऐसे विषय आए दिनों सामने आते रहते हैं। जिस धर्म के साथ अनाचार/अत्याचार होता है, उस धर्म के अनुयायी, उसमें विश्वास करनेवाले लोग ही बोलते हैं। राष्ट्रीय ध्वज की अवमानना से जुड़े अनेक प्रकरण मिल जाएँगे जिनमें, राष्ट्र ध्वज की अवमानना से भावनाओं के स्तर पर आहत लोगों ने न्यायालयों के दरवाजे खटखटाए।

हिन्दी के साथ किए जानेवाले/ किए जा रहे अत्याचार/अनाचार का मामला बिलकुल ऐसा ही है। ‘हिन्दी’ कोई ‘व्यक्ति’ नहीं जो अपने पर हुए अनाचार/अत्याचार का और उससे उपजी पीड़ा का वर्णन कर सके। वह सब तो हिन्दी प्रेमी ही करेंगे।

‘हिन्दी’ ‘एक भाषा मात्र’ नहीं है। भारतीय सन्दर्भों में वह ‘राष्ट्र भाषा’ है जो सीधे-सीधे ‘राष्ट्रीय अस्मिता’ और ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ से जुड़ी हुई है। इसीलिए, राष्ट्र ध्वज में ‘थेगला’ लगाना और हिन्दी में अकारण, बलात् अंग्रेजी शब्दों का घालमेल करना, हिन्दी का अंग्रेजीकरण करना, हिन्दी को हिंग्लिश बनाना, एक समान है। यह राष्ट्रीय दुर्भाग्य ही है कि ‘बोलचाल की हिन्दी’ की कोई सुस्पष्ट (और विशेषतः विधि सम्मत) परिभाषा उपलब्ध नहीं होने की सुविधा का लाभ वे समस्त लोग उठा रहे हैं जो हिन्दी को हिंग्लिश बना रहे हैं और वे समस्त लोग निशाने पर लिए जा रहे हैं जो इस प्रवृत्ति का प्रतिकार करने का ‘मूर्खतापूर्ण दुस्साहस’ कर रहे हैं।

यह एक और ‘राष्ट्रीय दुर्भाग्य’ है कि ‘हिन्दी’ आज तक ‘वोट’ से नहीं जुड़ पाई। यदि ऐसा हो जाता तो हिन्दी के साथ छेड़छाड़ करनेवालों की भी वही दशा होती जो धार्मिक विषयों पर छेड़छाड़ करनेवालों की होती है क्योंकि हमारे देश में धार्मिक मुद्दे ‘वोट’ से जुड़ गए हैं। अन्तर केवल एक ही है कि धार्मिक मुद्दों के साथ छेड़छाड़ होते ही वे तमाम लोग मैदान में उतर आते हैं जिनकी दुकानदारी धर्म से चलती है। इसके विपरीत, हिन्दी के साथ छेड़छाड़ होने पर भी वे तमाम लोग अपने मुँह और आँखें बन्द कर लेते हैं जो हिन्दी से अर्थ-यश-लाभ प्राप्त करते हैं और कर रहे हैं।

यहाँ तमिलनाडु की चर्चा समीचीन होगी। तमिलनाडु में ‘हिन्दी-विरोध’ आज भी ‘वोट’ दिलाता है। इसीलिए वहाँ जैसे ही कोई हिन्दी के पक्ष की बात करता है तो हिन्दी-विरोधी सड़कों पर उतर आते हैं। हिन्दी की अस्मिता-रक्षा का जैसा, जितना आग्रह मैं यहाँ कर रहा हूँ, उसका सहस्‍त्रांश भी मैं, तमिलाडु में, सार्वजनिक रूप से कर दूँ तो मुझे आकण्ठ विश्वास है कि मैं वहाँ से जीवित नहीं लौट पाऊँ। हिन्दी थोपे जाने के विचार मात्र से तमिलनाडु में जान पर बन आती है। यह रोचक और त्रासद विडम्बना ही है कि यहाँ, हिन्दी क्षेत्र में, हिन्दी को हिंग्लिश बनाने को गौरवपूर्ण कारनामा माना जाता है और इस प्रवृत्ति का विरोध करनेवाले प्रताड़ित होते हैं और वे तमाम लोग टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं जो हिन्दी के कारण ही पहचान, प्रतिष्ठा, आर्थिक सम्पन्नता और विलासिता के स्तर की सुख सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं।

अपने सूचना पत्र के चरण-7 में आपने समूचे विषय को ‘रूढ़ स्वरूप’ देने की चेष्टा की है। मैं आपकी इन बातों से असहमत हूँ और अस्वीकार करता हूँ।

किसी व्यक्ति द्वारा कही गई बातों को ‘जस का तस’ प्रस्तुत करने के तर्क के सहारे हिन्दी में, बलात् तथा अकारण अंग्रेजी शब्दों के उपयोग का कोई औचित्य नहीं है। वह तब ही सम्भव है जबकि सम्बन्धित व्यक्ति की कही बातों को ‘उत्तम पुरुष, एक वचन’ में (अर्थात् इनवरटेड कॉमा में) प्रस्तुत किया जाए। ऐसा न होने का एक ही अर्थ होता है कि प्रस्तोता ने कहनेवाले की बातों को अपनी भाषा में प्रस्तुत किया है।

आए दिनों ऐसा होता है कि विदेशी (यथा रुसी, जर्मनी, आस्ट्रेलियाई) राष्ट्राध्यक्ष अथवा समान स्तर के अतिथि हमारे देश में आते हैं। पत्रकारों की बातों का उत्तर वे अपनी मातृ भाषा में देते हैं। किन्तु देश के सारे अखबार उन बातों को, अपनी-अपनी भाषा में ही प्रकाशित करते हैं, अतिथि की मातृभाषा में नहीं।

जैसा कि संलग्न पत्र में मैंने विस्तार से कहा है, आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा ने, श्रीयुत हिंगे की बातों को इनवरटेड कॉमा में प्रस्तुत किया होता तो मैं उन्हें (सुश्री गायत्री शर्मा को) ‘वह पत्र’ लिखता ही नहीं।

जैसा कि मैंने अपने संलग्न पत्र में कहा है, सुश्री गायत्री शर्मा की प्रस्तुति ‘मूल क्रिया’ थी और मेरा पत्र ‘प्रतिक्रिया।’ ‘मूल क्रिया’ (अर्थात् हिन्दी के साथ किए गए अनाचार/अत्याचार) से मुझे हुई पीड़ा की ‘समानानुभति’ कराने की मंशा से ‘प्रतिक्रिया’ व्यक्त की गई, किसी दुराशय अथवा दुर्भावना से बिलकुल ही नहीं। यदि ‘मूल क्रिया’ ही नहीं होती तो भला ‘प्रतिक्रिया’ क्योंकर होती?

इन सारी बातों के परिप्रेक्ष्य में, यह जानते हुए कि मैंने दुराशयतापूर्वक कोई अपराध नहीं किया है, अपने पत्र दिनांक 03.05.2010 की भाषा और शब्दावली के लिए मैं एक बार फिर न केवल आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा से अपितु विश्व के समूचे स्त्री समुदाय से, मेरे समस्त परिजनों, परिचितों, मित्रों, हित चिन्तकों, समस्त ब्लॉगर बन्धुओं से, अपने अन्तर्मन से बिना शर्त खेद प्रकट करता हूँ और क्षमा याचना करता हूँ।

किसी को आहत करना मेरा लक्ष्य कभी नहीं रहा है। यदि मैं किसी को दुखी करुँगा तो भला मैं कैसे सुखी रह सकूँगा? मैं जैसा बोऊँगा, वैसा ही काटूँगा। इन समस्त भारतीय अवधारणाओं में मेरा आकण्ठ विश्वास है।

आपके चाहे अनुसार, यह पत्र भी मैं अपने ब्लॉग ‘एकोऽहम्’ पर प्रकाशित कर रहा हूँ। प्रसंगवश सूचित कर रहा हूँ कि, श्रीयुत जय प्रकाशजी भट्ट को प्रेषित, दिनांक 18.05.2010 वाला मेरा संलग्न पत्र, मेरे ब्लॉग पर ‘मैं बिना शर्त क्षमा याचना करता हूँ’ शीर्षक से, दिनांक 20.05.2010 को प्रकाशित किया जा चुका है जिसे http:/akoham.blogspot.com/2010/05/blogpost_20.html लॉग-ऑन कर पढ़ा जा सकता है। यह पत्र आप तक पहुँचेगा तब तक यह पत्र भी वहाँ प्रकाशित हो चुका होगा और जैसा कि आपने लिखा है, देश, विदेश के लाखों, करोड़ों इण्टरनेट उपयोगर्ता इसे पढ़ चुके होंगे।

इसके अतिरिक्त मैं दिनांक 18.05.2010 वाले अपने पत्र में किया गया अपना प्रस्ताव दोहरा रहा हूँ कि आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा चाहें तो अपना पक्ष मुझे ई-मेल कर दें। मैं उसे अपने ब्लॉग पर, अविकल स्वरूप में प्रकाशित कर दूँगा।

इस पत्र की प्रतिलिपि उन समस्त महानुभावों भी भेज रहा हूँ जिन्हें पूर्व पत्रों की प्रतिलिपियाँ भेजी थीं।

आपके सूचना पत्र के चरण-9 में तथा सूचना पत्र के अन्त में चाहे अनुसार कोई भी रकम देने का न तो कोई कारण बनता है और न ही मेरे लिए वह सम्भव है।

इस प्रकरण को मैं अपनी ओर से समाप्त कर रहा हूँ और आपसे भी ऐसा ही करने का अनुरोध, आग्रह तथा अपेक्षा करता हूँ। इसके बाद भी यदि आप कोई कार्रवाई करना चाहें तो उसके लिए तो आप स्वतन्त्र हैं ही। उस दशा में वह सब, आप अपने उत्तरदायित्व पर ही करेंगे।

एक बार पुनः समस्त सम्बन्धितों से क्षमा याचना सहित।

भवदीय,

(विष्णु बैरागी)

संलग्न-उपरोक्तानुसार।

प्रतिलिपि -

- श्रीयुत डॉक्टर जयकुमारजी जलज, 30 इन्दिरा नगर, रतलाम-457001 को व्यक्तिगत सन्देशवाहक द्वारा,

- श्रीयुत प्राफेसर सरोजकुमार, ‘मनोरम्’, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर,

- श्रीयुत जयदीप कर्णिक, द्वारा-नईदुनिया, 60/61, बाबू लाभचन्द छजलानी मार्ग, इन्दौर-452009

को, डाक प्रमाणीकरण द्वारा प्रेषित।

मेरे दिनांक 18.05.2010 वाले पत्र की प्रतिलिपि मैं आप सबको पहले ही भेज चुका हूँ, इसलिए वह प्रतिलिपि संलग्न नहीं कर रहा हूँ।

(विष्णु बैरागी)

हाट में सरस्वती


‘सात लाख?’ सुनकर मैं मानो धड़ाम् से गिरा। लगा, फोन के चोंगे में ज्वालामुखी फूट गया है और लावा बह कर मेरे कानों में समाए जा रहा है। मैं बहरा हो गया हूँ। कानों से बहता हुआ लावा मेरे मुँह में आ पहुँचा है। मेरी जबान जल गई है। मैं बहरा ही नहीं, गूँगा भी हो गया हूँ।

फोन के दूसरे छोर पर बैठे संजय ने निश्चय ही मेरी दशा भाँप ली थी। ‘हलो, हलो, भाई साहब! आप तो परेशान हो गए। यह तो सामान्य बात है। आजकल दस-बारह लाख तो सामान्य बात हो गई है। अपन तो सस्ते में निपट रहे हैं।’

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। संजय की बात सुनकर लगा या तो मैं अपने समय में ही ठहरा हुआ था, जड़वत्। या फिर कदम ताल कर रहा था और जमाने के साथ-साथ चलने का भ्रम पाले हुए था। संजय को मेरे घर आना था। अपनी उत्तमार्द्ध के साथ मैं उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। पूरा दिन बाट जोहते निकल गया तो शाम को उसे फोन किया। जवाब में जो कुछ उसने कहा, उसी ने मेरी यह गत बना दी।

बात संजय के बेटे की थी। उसे पूना के एक निजी शिक्षण संस्थान में, एम.बी.ए. में प्रवेश मिल गया था। संजय को यह यह सूचना ई-मेल से मिली थी। उसे और उसके पूरे परिवार को प्रसन्न होना चाहिए था किन्तु सूचना के उत्तरार्द्ध ने संजय को गड़बड़ा दिया था। कहा गया था कि शिक्षण शुल्क के ढाई लाख रुपये और छात्रावास का शुल्क छप्पन हजार रुपये के ड्राट, बाईस तारीख तक पहुँचाने अनिवार्य हैं। संजय को यह सूचना इक्कीस तारीख को मिली, जिस दिन उसे मेरे यहाँ आना था और जिस दिन हम दोनों उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रथमतः तो इतनी बड़ी रकम एक मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा आदमी की जेब में होती नहीं और हो भी और ताबड़तोड़ ड्राट भी बन जाए तो भी चैबीस घण्टों में रतलाम से पूना कैसे पहुँचाए जाएँ? संजय इसी सब में उलझ गया। इसीलिए नहीं आ पाया। यही सब बताते हुए संजय ने कहा - ‘दो वर्ष के एम. बी. ए. पाठ्यक्रम का कुल शुल्क सात लाख रुपये है। छात्रावास शुल्क अलग।’ यह रकम सुनकर ही मैं बहरा-गूँगा हो गया था और संजय मुझे इससे उबारने में लगा हुआ था।

मुझे क्या कुछ याद नहीं आया? यह चार साल पहले की ही तो बात है। सन् 2006 में मेरे बड़े बेटे वल्कल ने एम. बी. ए. किया था। तब, दो वर्ष का सकल शिक्षण शुल्क एक लाख रुपये था। तब हम लोगों को यह रकम कितनी बड़ी, कितनी भारी लगी थी? कैसे हम लोग यह रकम जुटा पाएँगे - हमारे इस सवाल का जवाब किसी भी दिशा में नहीं मिल रहा था। दसों दिशाएँ मानो नीरव हो गई थीं। वल्कल हमारी यह दशा जानता ही था। उसने ही ‘उच्च शिक्षा ऋण’ के लिए भाग दौड़ की। कागज-पत्तर जुटाए। कहा - ‘पापा! आप केवल बैंक में मेरे साथ खड़े रहिएगा और जहाँ कहें, वहाँ दस्तखत कर दीजिएगा। सब हो जाएगा।’ और सचमुच में सब हो गया। ऋण मिल गया, वल्कल ने एम. बी. ए. कर लिया, उसे नौकरी मिल गई और उसीने ब्याज सहित ऋण भी चुका दिया-निर्धारित समय से पहले ही।

किन्तु चार वर्षों में शिक्षण शुल्क में इतनी बढ़ोतरी? सवा-डेड़ रुपये वार्षिक चक्रवृद्धि ब्याज दर भी हो तो भी रकम पाँच साल में दुगुनी होती है। यहाँ तो चार साल ही हुए हैं और रकम सात गुनी हो गई है? इस आँकड़े तक पहुँचनेवाली ब्याज दर निकालने की हिम्मत ही नहीं हुई।

याद आ गई वे लोकोक्तियाँ जिनमें लक्ष्मी और सरस्वती का बैर बताया जाता था। कहा जाता था कि दोनों एक स्थान पर अपवादस्वरुप ही मिलती हैं-बड़े भाग्यवान को। अन्याथ, लक्ष्मी है तो सरस्वती नहीं और सरस्वती है तो लक्ष्मी नहीं। याद आई वे लोक कथाएँ जिनके नायक सरस्वती के दम पर लक्ष्मी लूट लाते थे। एक पोथी लेकर निकलते और किसी राजा के दरबार में अपनी विद्वत्ता प्रमाणित कर अशर्फियों और मोहरों की पोटलियाँ कन्धों पर लादे लौटते थे। अपने अध्यापकों से सुने वे प्रेरक प्रसंग याद आए जिनमें धनपतियों को निर्धन विद्वानों के चरणों में नत मस्तक होते बताया जाता था। कहा जाता था - सरस्वती से लक्ष्मी जुटाई जा सकती है किन्तु लक्ष्मी से सरस्वती नहीं क्यों कि सरस्वती तो भाग्यवानों को ही मिलती है।

संजय की बातें सुनकर ये सारी लोकोक्तियाँ, सारे किस्से, सारी बातें प्रश्न चिह्न का रुप धर, मेरे सामने आ खड़े हुए। आज तो सरस्वती का हाट लगा हुआ है। खरीदनेवाला चाहिए। जिसकी अण्टी में रोकड़ा हो, आए और मनमाफिक डिग्री हासिल करने का मौका पाए। रोकड़ा नहीं तो मौका नहीं। लक्ष्मी नहीं तो सरस्वती नहीं।

बातें यहीं नहीं रुकीं। इतनी मँहगी कीमत चुकाकर डिग्रियाँ लेनेवाले बच्चे ‘मानवीय’ बने रह सकेंगे? वे कैसे भूल पाएँगे कि उनके माँ-बाप ने कितनी कठिनाई से उनके लिए यह रकम जुटाई है? डिग्रियाँ लेकर जब वे नौकरियों पर जाएँगे तो उनके मन में कौन सी बात सबसे पहले उठेगी? यही कि उन्हें जल्दी से जल्दी यह रकम जुटानी है। या तो पिता का कर्जा चुकाना है या फिर बैंक का। देश, मानवीयता, सम्वेदनाएँ - ये सब उनके लिए कोई अर्थ और महत्व रख पाएँगे? वे ‘उच्च शिक्षित, हाड़-माँसवाले, आत्मकेन्द्रित रोबोट’ बन कर न रह जाएँगे?

जानता हूँ कि इन सवालों के जवाब मेरे पास भी हैं और इन बच्चों के पास भी। किन्तु हमारे जवाब अलग-अलग हैं। एक दूसरे से सर्वथा विपरीत।

कितना अच्छा होता कि यही बात मैं नहीं जानता होता?
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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

परम नहीं, ईश्वर आया मेरे घर



‘काकू! देखो, फोन बन्द मत करना। मेरी पूरी बात सुनना। तीस सालों से आप मुझसे कन्नी काट रहे हो। मुझे टाल रहे हो। मेरे खिलाफ भले ही कुछ नहीं कहते हो किन्तु मेरा नाम सुनना, मेरी बात करना पसन्द नहीं करते हो। लेकिन आज मैं बिलकुल वैसा हो गया हूँ जैसा आपने तीस साल पहले सोचा और चाहा था। मुझे देखेंगे और सुनेंगे तो ही मेरी बात समझ सकेंगे। मुझे आपसे मिलना ही है। मैं आपसे, जल्दी से जल्दी मिलना चाहता हूँ।’ उसने अपना नाम नहीं बताया किन्तु मुझे ‘काकू’ कहनेवाला वह एक ही है - परम। अत्यन्त विनम्रता, आदर और अधिकारभाव से कही गई दो-टूक बात सुनने के बाद इंकार करने का साहस मुझमें रह ही नहीं सकता था। उत्तर दिया - ‘ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुम्हारा ही घर है। जब जी चाहे, आ जाना।’

फोन रखने से पहले ही मन तीस बरस पहले की यादों में गुम हो चुका था। यह शायद 1980 की बात होगी। रतलाम आए मुझे तीन साल हुए होंगे। उसके पिताजी से हुआ परिचय आशा से तनिक अधिक जल्दी प्रगाढ़ता और पारिवारिकता में बदल गया। तब वह पन्द्रहवें-सोलहवें साल में चल रहा था। शायद नवमीं या दसवीं का छात्र रहा होगा।

उसके पिताजी भारत सरकार के एक उपक्रम में सेवारत थे। पुरुषार्थ और कर्मठता में विश्वास रखनेवाले निर्धन परिवार की पृष्ठभूमि से आए वे, अत्यन्त सज्जन, ईश्वरभीरु, धार्मिक प्रवृत्तिवाले, कर्मनिष्ठ, ईमानदार और आचरण को सर्वाधिक महत्व देनेवाले व्यक्ति थे। उनकी इन्हीं ‘खराबियों’ के कारण उनके परिवार को ‘सूखी तनख्वाह’ पर गुजारा करना पड़ता था। पत्नी और दोनों बच्चे उनसे असन्तुष्ट ही रहते थे। उनका छोटा भाई राज्य शासन के उपक्रम में अधिकारी था। वह केवल रक्त सम्बन्धों में ही छोटा भाई था, आचरण और जीवन मूल्यों में उनके सर्वथा विपरीत। बड़े भाई से बाद में नौकरी पर लगा था किन्तु धन सम्पत्ति के मामलों में ‘बड़ा आदमी’ बन गया था। जब-जब भी बड़े भाई के घर आता, उसकी सम्पन्नता का आतंक साथ-साथ चला आता। दो-चार दिन रह कर वह तो चला जाता किन्तु उसकी सम्पन्नता का आतंक कुछ दिनों तक इनके घर में ही बना रहता। पत्नी और दोनों बच्चे, चाचा को समझदार, दुनियादार और इन्हें मूर्ख मानते और अपने इस मानने का आभास भी कराते। ये बुरा नहीं मानते और ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये’ कह कर, मुस्कुराते रहते।

उनके यहाँ मेरा आना-जाना बना रहता था। उनकी पत्नी और दोनों बच्चे मुझे बिलकुल ही पसन्द नहीं करते थे। तीनों ही मानते थे कि मैं भी उन्हें बिगड़ने में प्रोत्साहन दे रहा हूँ। कुछ ऐसे ही वातावारण में एक बार उनके ‘इस’ बेटे से, रिश्वतखोरी पर बात चल निकली। उसने अविलम्ब कहा - ‘काकू! मुझे मौका मिला तो मैं तो दोनों हाथो से रिश्वत बटोरुँगा। पापा को तो कुछ दिखता नहीं कि अपने दोस्तों के बीच हमें कितनी बातें सुननी पड़ती हैं।’ सुनकर मैं भौंचक रह गया था। पन्द्रह-सोलह की उम्र और ऐसी बातें! मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। मैं इतना ही कह पाया - ‘परम बेटे! तू नहीं जानता कि तू क्या कह रहा है। किन्तु तू जो भी कह रहा है, वह हमारी पीढ़ी की असफलता का प्रमाण-पत्र है।’ इस सम्वाद के बाद से ही मैं उससे कन्नी काटने लगा था। परम जब भी सामने आता, मुझे उलझन होने लगती, अपने आप पर झुंझलाहट और गुस्सा आने लगता।

कोई दो साल बाद ही उसके पिता का स्थानान्तर हो गया। उसके पिता से तो जीवन्त सम्पर्क आज तक यथावत् बना हुआ है किन्तु परम के बारे में कभी, कुछ पूछने की न तो इच्छा हुई और न ही साहस। किन्तु उसके पिता से उसके समाचार मिलते रहते थे। मालूम हुआ कि स्नातक उपाधि पाते ही, अपने चाचा की सहायता से उसे राज्य सरकार के एक अन्य ‘कमाऊ उपक्रम’ में नौकरी मिल गई है और जैसा कि उसने घोषित किया था, दोनों हाथों से माल बटोर रहा है। उसकी माँ प्रसन्न थी। किन्तु पिता को ऐसी बातें बताने में पीड़ा होती थी। सो, हम दोनों सावधानी बरतते थे कि परम का सन्दर्भ न आए। यही कारण रहा कि परम के बारे में मेरी जानकारी शून्यवत हो गयी। इतना भर पता था कि वह महाकौशल अंचल में कहीं पदस्थ है।

फोन इसी परम का था। मैं वर्तमान में लौटा और अपने काम में लग गया। इतनी दूर से आने में उसे कम से कम चैबीस घण्टे तो लगेंगे ही। आएगा, तब जान लूँगा कि क्या बात है।

लेकिन चैबीस मिनिट भी नहीं बीते होंगे कि परम दरवाजे पर खड़ा था। उसे पहचानने में तनिक कठिनाई ही हुई। गोल-मटोल परम को देखा था मैंने तो! यह तो इकहरे शरीरवाला, पैंतालीस बरस का अधेड़ सामने था! मेरे पाँव छूते हुए बोला - ‘क्या काकू! माना कि घर मेरा है पर अन्दर आने की भी नहीं कहोगे?’ मुझे सम्पट नहीं पड़ी। हड़बड़ाकर, जैसे-तैसे उसे अन्दर आने को कहा। वह आया अवश्य किन्तु उसकी चाल में उत्साह, चपलता बिलकुल नहीं थी। ऐसे चल कर आया मानो कोसों पैदल चल कर आया हो, थक कर टूट रहा हो।

वह सोफे पर पसर गया, आँखें मूँद कर, गहरी साँसें लेकर सामान्य होने की कोशिश करता हुआ। मैं कुछ पूछताछ करता उससे पहले ही वह खुद ही शुरु हो गया। वह बोलता रहा, मैं जड़वत् सुनता रहा। उसकी बातें सुनकर मेरी उलझन बढ़ती ही गई - खुश होऊँ या दुखी? रिश्वतखोरी में आकण्ठ डूबा परम, ईश्वर को भी भूल गया। घर में समृद्धि के संकेत अनचाहे ही नजर आने लगे। कुटुम्ब में उसकी पूछ परख बढ़ गई। नाते-रिश्तेदारी में भी उसने अपने पिता का जाना बन्द करवा दिया। खुद ही जाता और अपनी इस बेहतरी को ‘माता-पिता का पुण्य प्रताप’ बताता।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि परम की चाची बीमार हो गई। मालूम हुआ, केन्सर है। परिवार मे अफरा तफरी मच गई। मुम्बई में चिकित्सा करानी पड़ी। दो-चार नहीं, पूरे उन्नीस लाख रुपये खर्च हुए। चाचा के पास इतनी रकम एक मुश्त नहीं थी। सो, परिजनों से सहायता लेनी पड़ी। सहायता करनेवालों में परम भी शामिल था। परम ने मदद तो पूरी उदारता से की किन्तु उसे लगा, ईश्वर उसे कोई संकेत दे रहा है। अपने जीवन के आदर्श, चाचा पर आए इस अप्रत्याशित संकट ने परम को झकझोर दिया। परम को अचानक ही कर्म-फल की याद आने लगी। उसे घबराहट होने लगी। किन्तु बुद्धि ने ढाढस बँधाया, तर्क जुटा दिए और परम का भ्रम बना रहा।

कोई दो वर्ष भी नहीं बीते होंगे कि परम खुद बीमार हो गया। लगभग एक वर्ष तक बीमारी ही पकड़ में नहीं आई। जब पकड़ में आई तब तक काफी कुछ कर गुजरी। परम ने कहा - ‘काकू! बीमारी क्या थी, इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता। बस, इतना समझ लो कि मेरा पुनर्जन्म हो गया। मुझे भी बम्बई, चैन्नई के चक्कर काटने पड़े। कोई नौ-दस लाख रुपये खर्च हो गए। पूरे कुटुम्ब के प्राण कण्ठ में आ गए। भ्रष्टाचार तो इससे कहीं अधिक किया था किन्तु सारा का सारा पैसा तो अपने पास नहीं रहता! वह तो नीचे से ऊपर तक बँटता है। सो, जो इकट्ठा किया था, सब खर्च हो गया। कोई नौ-दस लाख रुपये लग गए। आज जब मैं आपके सामने बैठा हूँ तो चाय भी नहीं पी सकता। बिना घी की चपाती और बिना बघारी हुई मूँग की दाल या लौकी की सब्जी ही मेरा भोजन हो गया है। मैं मिर्ची, घी, अधिक नमक नहीं खा सकता। खा लूँ तो मर जाऊँ। पीने के नाम पर केवल मट्ठा, वह भी बिना नमक का। घरवाले ध्यान रखते हैं, मेरी गैरहजारी में ही अपना भोजन करते हैं ताकि उनका चटपटा भोजन देख कर मैं आत्मघाती लालच के चक्कर में न पड़ जाऊँ।

‘इस बीच पापा ने खुद को भी सम्हाला और मुझे भरोसा बँधाते रहे। उन्होंने केवल ईश्वर का सहारा लिया। वे मेरे साथ मुम्बई, चैन्नई कहीं नहीं आए। घर ही रहे और मेरे लिए पूजा-प्रार्थना ही करते रहे। वे मेरा हौसला बँधाते और कहते - परम। हमें अपने कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं। भरोसा रख, तू अच्छा हो जाएगा। ईश्वर बड़ा कृपालु है। तुझे जो भी कहना-सुनना हो, उसी से कह-सुन। अपनी बीमारी के कारण और ईलाज बाहर नहीं, अपने अन्दर ही तलाश।’

‘और काकू! जब मैं आखिरी बार अस्पताल से बाहर आया तो कसम लेकर कि अब रिश्वत नहीं लूँगा। कोई मेरे बिना माँगे देगा तो भी नहीं लूँगा। मैंने अपने आप को पूरी तरह, ऊपरवाले के हवाले कर दिया है। इस बात को दस महीने हो गए हैं। सब कुछ बढ़िया चल रहा है-नौकरी भी और घर-बार भी।

‘घर आने के बाद से आप रोज याद आते रहे। रोज सोचता, आपसे बात करुँ। पापा से कहा तो उन्होंने कहा कि वे मेरी ओर से आपसे बात नहीं करेंगे। उन्होंने कहा - खुद बात करो। किन्तु हिम्मत नहीं होती थी। जी कड़ा कर, कल रात रतलाम पहुँचा। अब मैं आपके सामने हूँ और विश्वास कीजिए कि जैसा तीस बरस पहले आपने चाहा था बिलकुल वैसा ही हूँ।’

हम दोनों रो रहे थे, सचमुच में धार-धार। बोल नहीं फूट रहे थे। उसे जो कहना था, कह चुका था। मैंने कहा - ‘परम। ईश्वर की कृपा है कि तुम हमारे सामने हो। किन्तु मेरी चाहत के अनुरूप बनने के लिए तुमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई।’

खुद को संयत कर परम बोला - ‘काकू! इस भाव में भी यह जिन्दगी बहुत सस्ती मिली। आप कहते हो ना कि हम अतीत की मरम्मत नहीं कर सकते? सो, जो हो गया सो हो गया। मैं अपने वर्तमान को जीऊँगा और ईश्वर को धन्यवाद देते हुए, प्रसन्नतापूर्वक जीऊँगा। आप मुझे आशीर्वाद दीजिएगा और मेरी ओर से निश्चिन्त रहिएगा।’

मुझे लग रहा था, परम नहीं, स्वयम् ईश्वर मुझे अपना सन्देश दे रहा है।
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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

हम सब, निहालसिंह


इन दिनों निहालसिंह चर्चा में हैं। शायद ही कोई अखबार और समाचार चेनल बचा हो जिसने निहालसिंह की चर्चा न की हो। किसी ने कम, किसी ने अधिक, किन्तु चर्चा की सबने। एक समाचार चैनल ने निहालसिंह पर आधे घण्टे का विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया और थोड़े-थोड़े अन्तराल से, लगभग पूरे दिन प्रसारित किया।

लोग निहालसिंह के घर जा रहे हैं किन्तु उनसे मिलने नहीं। निहालसिंह में किसी की रुचि नहीं है। जो भी जा रहा है, उनकी कार देखने जा रहा है। एक प्रसिद्ध कम्पनी की इस कार का मूल्य बीस लाख रुपये अवश्य है किन्तु ऐसी कार देश में कई लोगों के पास है। इसलिए, मूल्य की दृष्टि से निहालसिंह की कार अनूठी और इकलौती नहीं है। अनूठा है इसका पंजीयन नम्बर - 0001। यह नम्बर प्राप्त करने के लिए निहालसिंह ने पूरे दस लाख रुपये खर्च किए। याने कार के मूल्य की आधी रकम। अपनी कार के लिए यह नम्बर प्राप्त करने क लिए निहालसिंह को नीलामी में उतरकर बोली लगानी पड़ी। खबर है कि इस नम्बर के लिए सात लाख रुपये तक की बोली तक तो कई लोग आए किन्तु उसके बाद दो ही रह गए और अन्ततः निहालसिंह के दस लाख के आँकड़े के सामने कोई नहीं टिका और निहालसिंह की कार एक नम्बरी हो गई। अब निहालसिंह जब भी अपने परिवार के साथ घर से बाहर कार में निकलते हैं तो कार चलाते समय सड़क पर कम और आसपास, उनकी कार को देखनेवालों को ज्यादा देखते हैं, फिल्मी गीत की पंक्ति को साकार करते हुए - हम उधर देखनेवालों की नजर देख रहे हैं।

मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पहले हुआ करता था। अब बातें कुछ-कुछ समझ आने लगी हैं। अपने से बेहतर लोगों से मिलने-जुलने का यही लाभ हुआ मुझे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि जीने का आनन्द कम हो जाता है। ऐसी बातों का जितना आनन्द दूसरे लेते हैं, उतना आप नहीं ले पाते। जीवन का आनन्द लेने के लिए न्यूनतम अज्ञानी और मूर्ख होना आवश्यक शर्त होती है। आप जैसे ही समझदार हुए कि गए काम से। सब लोग जिस बात पर ठहाके लगा रहे होते हैं तब आप मूर्खों की तरह चुपचाप बैठे रहते हैं। अज्ञान के अपने सुख होते हैं। अबोध बच्चों को हमारे साथ तब तक ही मजा आता है जब तक कि हम जानबूझकर अज्ञानी और नासमझ बने रहते हैं। गोया, अपने आनन्द के लिए ही नहीं, दूसरो के आनन्द के लिए भी अज्ञानी होना बड़ा सहायक तत्व होता है।

मानव मनोविज्ञान के अनुसार हम सब ‘पहचान की भूख’ के रोगी हैं। हममें से कोई भी भीड़ का हिस्सा बन कर नहीं जीना चाहता। चाहता है कि भीड़ में रहकर भी वह भीड़ से अलग दिखाई दे। यह 'सहज प्रवृत्ति' चैबीसों घण्टे हमें नियन्त्रित किए रहती है। तब भी, जब हम सोए रहते हैं। इसी के अधीन हम सब कोई न कोई सनक या पागलपन पाले रहते हैं जिसका भान हमें तो नहीं होता किन्तु हमारे आसपासवाले इसे खूब अच्छी तरह जानते हैं और इसके बहाने कभी हमारे मजे लेते रहते हैं तो कभी-कभी कोई जिज्ञासा और कौतूहल की विषय वस्तु बना रहता है।

हमारा एक कंजूस मित्र था। उससे चाय पी लेना चुनौतीभरा काम होता था। हम उसे घेर कर ले जाते, वह चाय का आर्डर देता। चाय पीकर हम उसे, भुगतान के लिए, पीछे छोड़कर निकलने लगते तब वह काउण्टर से आवाज लगा कर हमें बुलाता। उसके पास सदैव सौ रुपयों का नोट होता जिसकी शेष रकम का छुट्टा दुकानदार के पास नहीं होता। उसे गालियाँ देते हुए हममें से कोई भुगतान करता। किन्तु चौबीस घण्टे से पहले ही वह हमें भुगतान कर देता। हम पूछते - ‘होटल में क्यों नहीं किया?’ वह कहता - ‘मुझसे चाय पीने के लिए तुम सब जो कुछ करते हो, मेरे भुगतान न करने पर कुढ़ते हो, गालियाँ देते हो, इस सबमें मुझे मजा आता है।’ हम कुछ नहीं कहते। अब समझ आ रहा है कि हम सबके सब उल्लू के पट्ठे थे। हम समझते थे कि हम सब उसके मजे ले रहे हैं जबकि वास्तव में वह हमारे मजे लेता था। तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि हममें से कौन सनकी था - वह अकेला या हम सब?

सबसे अलग दिखने के लिए हम सब अपनी-अपनी क्षमता, समझ और सुविधानुसार उपक्रम करते हैं। अपने लिए पेण्ट-शर्ट का कपड़ा खरीदते समय और उनकी सिलवाई कराते समय भी यह सहज प्रवृत्ति हमें नियन्त्रित करती रहती है। हममे से प्रत्येक चाहता है कि जो कपड़ा वह पसन्द कर रहा है, उस कपड़ेवाली पेण्ट-शर्ट किसी और के पास न हो और यदि हो तो सिलाई के मामले में तो वह सबसे अलग हो ही।

परिजन की हैसियत पा चुका हमारा एक परिचित था - राम प्रकाश सिंह। बहुत ही सरल, सहज, निश्छल, निष्कलुष। हम सबके आनन्द के लिए खुद को परिहास की विषय वस्तु तक बना लेता। खूब चुलबुला और मीठा बोलनेवाला। किन्तु किसी समारोह, आयोजन में जाने के लिए वह जैसे ही कपड़े बदलता, बोलना बन्द कर देता। उसका तर्क होता था - ‘मेरे कपड़े तब तक ही बोलेंगे, तब तक ही मेरा साथ देंगे, जब तक मैं चुप रहूँगा और मैं कपड़ों की कीमत कम नहीं करना चाहता।’

दादा के एक बम्बइया मित्र थे - बद्रीलालजी जोशी। अब स्वर्गीय हैं। वे फिल्मों से जुड़े हुए थे। उनकी पुत्री रतलाम में ही है - स्नेहलता तिवारी या स्वर्णलता तिवारी। वे पार्षद भी रह चुकी हैं। जोशीजी की अपनी पहचान थी। वे पायजामा और बुशर्ट पहनते थे। न तो कभी पेण्ट-बुशर्ट पहना और न ही कभी पायजामा-कुर्ता। सदैव ही पायजामा-बुशर्ट में मिलते। पूरी फिल्मी दुनिया में उन्हें ‘पायजामेवाला जोशी’ के नाम से ही पुकारा, पहचाना जाता।

रतलाम में ही एक डॉक्टर साहब हैं जो ऊपर से नीचे तक सफेद में ही रहते हैं- बालों को छोड़कर। जूते, मौजे, कमरपट्टा, पेण्ट, शर्ट - सब कुछ सफेद। उनकी कार का रंग भी सफेद। उनसे मेरा परिचय नहीं, उनका नाम तक नहीं जानता किन्तु फिर भी मैं उन्हें जानता हूँ। एक हैं मनु भाई चह्वाण। एलआईसी के भूतपूर्व कर्मचारी। नाखून से कागज पर कलाकृतियाँ और शब्द उकेरने में निष्णात्। व्यावहारिकता निभाने के मामले में अद्भुत। किन्तु कभी सीधे मुँह बात नहीं करते। आड़ी-तिरछी बात करने का मेरा एकाधिकार उन्हीं ने नष्ट किया। उनके सामने मैं सदैव ही परास्त-मुद्रा में रहता हूँ। मैं उन्हें ‘मनु भाई एबला’ कहता हूँ। अभिवादन के उत्तर में वे पूछते हैं - ‘कहो भई एबला नम्बर दो?’ हम दोनों जब मिलते हैं तो थोड़ी देर के लिए ही सही, आसपास के लोग हमें देखते रहते हैं। मुझे लगता है, यह सब देखकर हम दोनों का अहम् तुष्ट होता होगा - हम दोनों को सब लोग देख रहे हैं।

ऐसे पचासों लोग, पचासों बातें हमारे आसपास प्रतिदिन ही उपथित रहती हैं किन्तु हम अपने आप में ही इतने खोए रहते हैं कि उनका संज्ञान (याने कि उन सबका आनन्द) लेने की सूझ ही नहीं पड़ती। हम सब अपने आप को सबसे अलग दिखाने की जुगत में ही भिड़े रहते हैं।

‘तीन आस्था घोष’ शीर्षकवाली दादा की एक कविता की पंक्ति है - ‘मैं असाधारण रूप से साधारण हूँ।’ मुझे लगता है कि ऐसा ‘असाधारण’ बनने की कोशिश में हम प्रायः ही ‘असामान्य’ बन जाते हैं। मित्र मण्डली में मैं परिहासपूर्व कहता रहता हूँ - ‘हम जो नहीं हैं, खुद को वही साबित करने के चक्‍कर में हम वह भी नहीं रह पाते जो हम हैं।’ किन्तु इस सन्दर्भ में मुझे जलजजी की बात बराबर याद आती रहती है। हम सब ‘अहम्’ के मारे हुए हैं। जलजजी कहते हैं - ‘कई लोगों को इस बात का अहम् होता है कि उन्हें कोई अहम् नहीं है।’

गोया, हम सब निहालसिंह ही हैं। जब भी मौका मिलता है, निहालसिंह बन जाते हैं - पैसा हुआ तो पैसे से, अकल हुई तो अकल से, प्रतिभा हुई तो प्रतिभा से, शारीरिक शक्ति हुई तो उससे। यदि नहीं बन पाते हैं तो ‘निहालसिंहपन’ तो बता ही देते हैं।
बस, मौका मिलना चाहिए।
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