यूलिप पॉलिसियाँ: जन्नत की हकीकत


यूलिप पॉलिसियों पर ‘सेबी’ और ‘इरडा’( भारतीय बीमा विनिमायक एवम् विकास प्राधिकरण अर्थात् आई आर डी ए) के बीच मचे द्वन्द्व में कौन सही है और कौन गलत, इससे परे हटकर, यूलिप पॉलिसियों की संरचना और इनकी सामाजिक-आर्थिक भूमिका पर विचार करने का यह ठीक प्रसंग और अवसर है।


बीमा क्षेत्र में निजी कम्पनियों के आगमन से पहले यूलिप पॉलिसियाँ इतनी प्रचारित और चर्चित नहीं थीं। तब केवल भारतीय यूनिट ट्रस्ट ही ‘यूलिप’ नाम से अपनी एक योजना बेचा करता था। किन्तु बीमा क्षेत्र में आई निजी कम्पनियों ने समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। इन कम्पनियों ने भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा बेची जा रही पारम्परिक जीवन बीमा योजनाओं को परे धकेल पर यूलिप पॉलिसियों का बोलबाला कायम कर दिया। ‘यूलिप’ में निवेशित राशि दो भागों में बँटती है। एक भाग होता है जीवन बीमा प्रीमीयम वाला जो नाम मात्र का होता है। शेष बड़ा भाग स्‍टॉक मार्केट में निवेश किया जाता है। मोटे तौर पर ‘यूलिप’ पूरी तरह से स्‍टॉक मार्केट आधारित और केन्द्रित होती हैं। इन पॉलिसियों के इसी ‘चरित्र’ के आधार पर सेबी ने इन पर प्रतिबन्ध लगाया।


इन पॉलिसियों के निवेशित राशि पर बाजार की जोखिम सदैव हावी रहती है जिसे ग्राहक वहन करता है, बीमा कम्पनियों की कोई जवाबदारी नहीं रहती। वे तो ग्राहक से पैसा लेकर उसे उसकी ओर से बाजार में लगा देती हैं। किन्तु कम्पनियाँ यह काम मुत में नहीं करतीं। इस काम के लिए वे फण्ड प्रबन्धन शुल्क, पॉलिसी प्रबन्धन शुल्क, फण्ड आबण्टन शुल्क जैसे विभिन्न शुल्क ग्राहक से वसूल करती हैं। इसके अतिरिक्त एजेण्ट को दिया जाने वाला कमीशन और निवेशित रकम को एक फण्ड से दूसरे फण्ड में स्थानान्तरित करने (स्विच ओव्हर) का शुल्क भी ग्राहक की जेब से ही जाता है। इनमें से कुछ शुल्कों की दर तो प्रति पॉलिसी के आधार पर होती है और कुछ की दर फण्ड की रकम के प्रतिशत के मान से। अधिकांश शुल्कों की रकम प्रथम वर्ष में सर्वाधिक, दूसरे और तीसरे वर्ष में उससे तनिक कम तथा चैथे वर्ष से लेकर शेष पॉलिसी अवधि तक उससे भी कम (अर्थात् सबसे कम) होती है। इसे यूँ समझा जा सकता है कि दस हजार रुपये निवेश करनेवाले ग्राहक की रकम में से पहले वर्ष लगभग तीन हजार रुपये काट लिए जाते हैं और शेष सात हजार रुपये ही निवेश के लिए उपलब्ध रहते हैं। ग्राहक दस हजार की गणित में रहता है जबकि वास्तविकता सात हजार की रह जाती है। जाहिर है कि ग्राहक की रकम में से प्रथम तीन वर्षों में सर्वाधिक कटौती होती है।


यूलिप पॉलिसियों के आक्रामक विपणन प्रचार के कारण, पॉलिसी शर्तों के मुताबिक न्यूनतम रकम निवेश करनेवाले औसत मध्यमवर्गीय लोग सर्वाधिक आकर्षित होते हैं। बीमा कम्पनियों के आँकड़े ही बता देंगे कि दस-दस हजार रुपये वाले निवेशक करोड़ों में और लाखों रुपये वाले निवेशक लाखों में होंगे। बीमा कम्पनियाँ जो आँकड़े प्रचारित करती हैं, वे लाखों के निवेशवाले होते हैं। दस-दस हजार रुपये लगानेवाला औसत मध्यमवर्गीय ग्राहक मान लेता है कि उसे बड़े ग्राहक के आनुपातिक लाभ मिलेंगे। वह रातों रात लखपति/करोड़पति बनने का सपना पाल लेता है। उस समय उसे पता ही नहीं होता कि विभिन्न शुल्कों के नाम पर उसके दस हजार रुपयों में से जितनी रकम काटी जाएगी, उतनी ही रकम एक लाख रुपये लगानेवाले ग्राहक से भी काटी जाएगी। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष बीमा प्रीमीयम भी काटी जाएगी जो निवेशक की बढ़ती उम्र के कारण प्रति वर्ष बढ़ती जाएगी। याने, स्‍टॉक मार्केट में लगाने के लिए छोटे निवेशक की रकम कम और बड़े निवेशक की रकम अधिक उपलब्ध रहेगी। इसी पेंच के कारण छोटा निवेशक सदैव मात खाता रहता है। बीमा एजेण्ट भी ग्राहकों को यह पेंच पूरी तरह नहीं समझाते। शायद वे खुद भी नहीं जानते हों। इस प्रकार यूलिप पॉलिसियाँ ‘पैसा पैसे को खींचता है’ पाली लोकोक्ति को ही साबित करती हैं।


किसी भी पॉलिसी को तीन वर्ष बाद बन्द कर ग्राहक अपना पैसा वापस ले सकता है। बीमा एजेण्ट इस स्थिति को अतिरिक्त आकर्षण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। ग्राहक को लगता है कि उसे तो कुल तीन वर्ष तक ही रकम जमा करनी है। तीन वर्ष पूरे होते ही जब वह अपनी रकम लेने पहुँचता है तो उसके पैरों से जमीन खिसक जाती है जब उसे मालूम होता है कि उसे उसकी मूल रकम भी नहीं नहीं मिल पा रही है। प्रथम तीन वर्षों की शुल्क कटौती इतनी अधिक होती है कि ग्राहक की मूल पूँजी भी उसे मिल जाए तो गनीमत। वस्तुतः यूलिप पॉलिसियों का पूर्ण लाभ लेने के लिए ग्राहक को 6 से 9 वर्ष की अवधि का धैर्य रखना चाहिए। किन्तु इन पॉलिसियों की बिक्री ही तीन वर्षों की अवधि बताकर की जाती है। जबकि यूलिप पॉलिसियों का आधारभूत ‘फण्डा’ होता है - अपेक्षित लाभ लेने के लिए अधिक रकम, अधिक समय तक रखें और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें।


बीमा कम्पनियों को और सरकार को यूलिप पॉलिसियाँ सदैव ही अनुकूल रहती हैं। चूँकि सारी जोखिम ग्राहक ही वहन करता है सो कम्पनियाँ बेफिक्र रहती हैं। वे अपना स्थापना खर्च (अधिकारियों/कर्मचारियों के भारी भरकम पेकेज की रकम, वेतन-भत्ते) निकालने के बाद वाला लाभांश ही ग्राहक को देती हैं। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि इन कम्पनियों के अधिकारियों/कर्मचारियों के लाखों के पेकेज का भुगतान दस-दस हजार रुपये लगानेवाले छोटे निवेशक करते हैं। सरकार भी इन पाॅलिसियों को भरपूर प्रोत्साहित करती है क्यों कि इन पॉलिसियों का पैसा स्टाॅक मार्केट में लगता है और हम देख रहे हैं कि 1991 से लागू की गई ‘एलपीजी’ वाली हमारी आर्थिक नीतियाँ केवल बाजार को पोषित-पल्लवित कर रही हैं और बाजार पर ही निर्भर हैं। गोया, ‘धनवान अधिक धनवान और गरीब अधिक गरीब’ की अवधारण के तहत पूरे देश को बाजार में बदलने की सरकारी नीतियों का खर्चा देश के छोटे निवेशकों से वसूल किया जा रहा है।


यूलिप पॉलिसियों के लाभ-हानि का आकलन करने पर स्थिति बहुत उत्साहित करनेवाली नहीं लगती। इनके छोटे निवेशकों को लाभ कम और नुकसान अधिक मिलते दिखाई देते हैं। ये लोगों को रोतों रात लखपति बनने का सपना दिखाकर उन्हें लालची, सट्टेबाज और अकर्मण्य बनाती दिखती हैं। इनका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ये बीमा की मूलभूत अवधारण को ही निरस्त करती हैं जो कि किसी भी बीमा कम्पनी की प्रारम्भिक, मुख्य और एकमात्र गतिविधि होनी चाहिए। तीन वर्ष बाद अपनी रकम निकालने के लालच में ग्राहक बीमा सुरक्षा से वंचित हो जाता है। जब वह नई पॉलिसी लेता है तो उसकी उम्र बढ़ जाने के कारण उसकी बीमा प्रीमीयम भी बढ़ जाती है और तीन साल बाद पॉलिसी बन्द करने के क्रम के चलते एक स्थिति यह आ जाती है कि ग्राहक को बीमा मिलना ही सम्भव नहीं रह जाता।


तीन वर्ष बाद पॉलिसी बन्द कराने की सुविधा का उपयोग बीमा कम्पनियाँ प्रायः ही अपने पक्ष में करती रहती हैं। उनके पास पूरा रेकार्ड रहता है कि किस ग्राहक की पॉलिसी को तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं। वे अपने एजेण्टों को ऐसे ग्राहकों के पास भेज कर उन्हें प्रेरित करती हैं कि ग्राहक अपनी मौजूदा पॉलिसी बन्द कर यही पैसा किसी नई यूलिप योजना में लगा दे। पॉलिसी की संरचना और चरित्र से अनजान ग्राहक अपने एजेण्ट पर भरोसा कर वैसा ही कर लेता है। ऐसे में कम्पनी को न तो नया ग्राहक मिला और न ही नया निवेश किन्तु उसकी बिक्री के आँकड़े बढ़ गए और एजेण्ट को पूरा कमीशन मिल गया। ग्राहक को तो पता ही नहीं चलता कि वह इस खेल में आर्थिक मोहरे के रूप में प्रयुक्त कर लिया गया है। बीमा क्षेत्रों में इसे ‘रिसायकलिंग’ (पुनर्निवेश) कहा जाता है। यदि इन कम्पनियों से आँकड़े लिए जाएँ तो मालूम पड़ेगा कि अस्सी प्रतिशत यूलिप पॉलिसियाँ इस प्रकार ‘रिसायकल’ (पुनर्निवेशित)कर दी गई हैं।


यूलिप पॉलिसियों की बिक्री के लिए बीमा कम्पनियाँ केवल इरडा के अधीन ही रहें या उन्हें सेबी से भी पंजीयन लेना पड़ेगा, इससे परे हटकर इन पॉलिसियों के सामाजिक प्रभाव और लोगों को बीमित किए जाने की मूल अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में अवश्य ही विशद् विवेचन किया जाना चाहिए।
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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

लोकतन्त्र के बाराती


हम सात-आठ थे। सबके सब पूरी तरह फुरसत में। करने को एक ही काम था - भोजन करना। सबको पता था कि छः बजते-बजते भोजन की पंगत लग जाएगी। याने प्रतीक्षा करने का काम भी नहीं था। सुविधा इतनी और ऐसी कि माँगो तो पानी मिल जाए, चाय मिल जाए-सब कुछ फौरन। नीमच के डॉक्टर राधाकृष्णन नगर (जिसे इस नाम से शायद ही कोई जानता हो। सब इसे ‘शिक्षक कॉलोनी’ के नाम से जानते हैं) स्थित शिक्षक सहकार भवन में हम लोग जुड़े बैठे थे।


मेरे जीजाजी की पहली बरसी पर मेरे बड़े भानजे श्यामदास ने यह आयोजन किया था। सवेरे से भजन-कीर्तन चल रहे थे। महिलाओं ने मानो यह काम अपने जिम्मे ले लिया था। सो, हम सबके सब पुरुष पूरी तरह से फुरसत में थे।


जैसा कि होता है, बात घूम फिरकर भ्रष्टाचार पर आ गई। बात शुरु हुई थी जनपद पंचायत चुनावों से। एक ने बताया कि प्रति उम्मीदवार कम से कम 20-20, 25-25 लाख रुपये खर्च हुए होंगे। मुझे हैरत हुई। मैंने पूछा - इतना खर्च क्यों किया होगा इन लोगों ने? उत्तर मिला - ‘यह तो यक्ष प्रश्न है।’ यहीं से शुरुआत हुई। कहा कि जिला पंचायत और जनपद पंचायतों में करोड़ों का फण्ड आता है। वह धरती पर तो शायद ही आता हो, कागजों में ही फँस कर रह जाता है। 20-20, 25-25 लाख रुपये खर्च करनेवाले, अपने खर्च की वसूली और अगले चुनाव की तैयारी इसी ‘करोड़ों के फण्ड’ से करते हैं।


और जैसा कि होता है, हर कोई पूरे देश को, पूरे समाज को और पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट साबित करने पर तुल गया। और जैसा कि होता है, हर कोई अपने आप को इस सबसे अलग रख कर, ‘वस्तुपरक भाव’ से बात किए जा रहा था। हर कोई कह रहा था कि देश रसातल में जा रहा है और इस तरह कह रहा था मानो इस दशा के लिए वह कहीं भी जिम्मेदार नहीं है।


जिन्होंने ‘यक्ष प्रश्न’ की उपमा दी थी वे शिक्षा विभाग से सेवा निवृत्त हुए थे। उनसे मैंने पूछा - ‘आपने अपने सेवा काल में कितनी बार रिश्वत दी।’ उत्तर मिला - ‘एक बार।’ मैंने दूसरा सवाल किया -‘आपके दो बेटे केन्द्रीय विद्यालय संगठन में सेवारत हैं। इनकी नौकरी लगवाने के लिए आपने कितनी रिश्वत दी।’ जवाब आया -‘फूटी कौड़ी भी नहीं। दोनों अपनी शैक्षणिक योग्यता के दम पर चुने गए।’


दूसरे सज्जन बहस में नाम मात्र की भागीदारी कर रहे थे। मुझे साफ लग रहा था कि वे मेरा लिहाज कर रहे थे। किन्तु राय उनकी भी यही थी कि देश भ्रष्टाचार के दलदल में डूब गया है। वे भी शिक्षा विभाग से सेवा निवृत्त हुए थे। उनसे भी मैंने वही सवाल किया - ‘अपने सेवाकाल मे आपने कितनी बार रिश्वत दी?’ उत्तर मिला - ‘एक बार भी नहीं।’ मैंने दूसरा सवाल किया - ‘आपका बेटा राष्ट्रीयकृत बैंक में सेवारत है। उसकी नियुक्ति के लिए आपने कितनी रिश्वत दी।’ उन्होंने तनिक असहज होकर कहा - ‘कोई रिश्वत नहीं दी। वह अपनी योग्यता के कारण ही नौकरी पा सका।’


दोनों से मेरे इन दोनों सवालों के बाद बहस में मानो विराम सा लग गया। मैंने सहज ही कहा कि उन दोनों को तो भ्रष्टाचार पर बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि दोनों के पास इस बाबत अपने कोई अनुभव नहीं है। मुझे बहुत ही शानदार प्रतिप्रश्न मिला - ‘तो क्या आप कहना चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार है ही नहीं?’ मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा - ‘ऐसा तो मैंने कहा ही नहीं। कह भी नहीं सकता क्योंकि मैं जानता हूँ कि देश में भ्रष्टाचार है और संस्थागत स्वरूप में है।’ ‘तो फिर आप कहना क्या चाहते हैं?’ सवाल आया। मैंने कहा - ‘मेरे सवालों के जवाब में आप दोनों ने मुझसे जो कहा, वही कहना चाहता हूँ। जब भी भ्रष्टाचार की बात हो तो आप कम से कम एक बार तो कहें कि सब कुछ रसातल में नहीं चला गया है। अच्छे, भले और ईमानदार लोग आज भी हैं जो बिना लिए-दिए काम करते हैं। आप सबको एक घाट पानी पिलाकर इन भले और ईमानदार लोगों को जिस तरह से अपमानित करते हैं, उन्हें भ्रष्टों में शरीक करते हैं, यह मुझे नहीं जँचता। मेरा मानना है कि आज भी भले और ईमानदार लोग अधिक हैं किन्तु उनके भले होने का, उनके ईमानदार होने का हम न तो नोटिस लेते हैं न ही उनकी प्रशंसा करते हैं। ऐसा करके तो हम खुद भी एक प्रकार से भ्रष्टाचार करते हैं। हम भले ही उनका नाम न जानें किन्तु उनके आचरण का जो सुखद अनुभव हमें हुआ है, उसका उल्लेख भी न करें?’


मेरी बात फिर भी उनके पल्ले नहीं पड़ी। तनिक असहज होकर बोले - ‘आपकी बात समझ नहीं आई। आप कहना क्या चाहते हैं?’ मैं उन दोनों से उम्र में काफी छोटा हूँ-कम से कम दस-बारह बरस छोटा। मुझे संकोच हो आया। मैंने कहा - ‘यह देश रसातल में यूँही नहीं चला गया। हम सबने इसे जाने दिया जबकि हमारी जिम्मेदारी थी कि इसे रसातल में न जाने दें। लेकिन हमने रोकने की कोई कोशिश नहीं की। और तो और, जो लोग ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं, उनका उल्लेख और प्रशंसा करने के बजाय हम उन्हें भी भ्रष्टों की जमात में शामिल करने का अपराध कर रहे हैं। हम कहीं भी, किसी भी प्रकार से अपनी कोई भी जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं हैं। बस, चिल्लाए जा रहे हैं, स्यापा किए जा रहे हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता।’
नहीं जानता कि मुझसे सहमत होकर चुप हुए या मेरा लिहाज कर। किन्तु अपनी मुट्ठियों पर ठोड़ी टिका कर ‘हूँ। हूँ।’ कर, विचार-मुद्रा में लीन हो, सहमति में सिर हिलाने लगे।


ठीक मौका जान मैंने आखिरी पत्थर फेंका - ‘अपन सब कभी न कभी, कम से कम एक बार तो बाराती बने ही होंगे। बाराती सामान्य प्राणी नहीं होता। वह विशेषाधिकार प्राप्त प्राणी होता है। उसके जिम्मे कोई काम नहीं होता। वह प्रति पल कुछ न कुछ माँग करता रहता है और लड़कीवाले उसकी माँग पूरी करने के लिए लगातार भागदौड़ करते रहते हैं। उसे नाराज होने का कोई मौका नहीं देना चाहते।


‘मुझे लगता है, हम सब केवल बाराती बने हुए हैं। लोकतन्त्र के बाराती। यह लोकतन्त्र की जिम्मेदारी है कि हमें नाराज न होने दे और हमारी प्रत्येक माँग पूरी करे-फौरन।’


लेकिन मैं देख नहीं पाया कि मेरी बात का क्या असर हुआ क्योंकि मेरी बात खत्म होते ही श्यामदास की आवाज आई - ‘मामा साहब! भोजन तैयार है। सबको लेकर पधारिए।’


सुनकर, मैं उठता, उससे पहले बाकी सब उठ कर तेजी से भोजन पाण्डाल की ओर लपके।


मैं तय नहीं कर पाया कि वे तेजी से क्यों लपके? वाकई में, तेज भूख के कारण?


भगवान करे यही कारण रहा हो।
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उन्होंने अनुचित का समर्थन किया


नीमच जाने के लिए मैं इन्दौर-उदयपुर रेल में यात्रा कर रहा था। मन्दसौर में ‘उन्हें’ अपने डिब्बे में चढ़ता देख तबीयत खुश हो गई। ‘वे’ मेरे आदरणीय तो हैं ही, समूचे मालवांचल के ख्यात और सुपरिचित पत्र लेखक हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब ‘उनका’ कोई न कोई पत्र, किसी न किसी अखबार में न छपता हो। ‘वे’ लोहिया के परम् भक्त, प्रखर समाजवादी और गाँधी के अनुयायी हैं। देश के मौजूदा सारे संकटों का हल ‘वे’ गाँधी में ही अनुभव करते हैं। अनुचित सहन करना ‘उनके’ स्वभाव में नहीं रहा। नौकरी करते हुए ऐसे पचासों मौके आए जब अनुचित के प्रतिकार के कारण ‘उनकी’ नौकरी पर बन आई। ऐसे प्रत्येक अवसर पर ‘उनके’ मित्रों, शुभ-चिन्तकों ने ‘उनकी’ सहायता की। ‘उनके’ प्रशंसक वे लोग भी हैं जिनकी मुखर और मुक्त-कण्ठ आलोचना ‘वे’ करते रहते हैं। हर कोई जानता है कि ‘उनकी’ शब्दावली कैसी भी हो, ‘उनकी’ नियत में खोट नहीं है।


मैं लपक कर दरवाजे तक गया और ‘उन्हें’ लिवा लाया। अपनीवाली बर्थ पर बैठाया। वहाँ पहले हम तीन थे। अब चार बैठे थे। रेल हमारी अपेक्षा से अधिक देर तक मन्दसौर स्टेशन पर खड़ी हुई थी। ‘अरे वाह! खूब मिला! कैसा है? घर में सब राजी-खुशी तो हैं?’ से ‘उन्होंने’ बात शुरु की। औपचारिकता तो हम दोनों के बीच कभी रही ही नहीं। सो, जितनी सहजता से रेल, पटरियों पर दौड़ती है, उससे भी अधिक सहजता से हम बातों में मशगूल हो गए। हमारी बर्थ पर बैठा दम्पति महू से आ रहा था और सामने बैठी माँ-बेटी, मेरे साथ ही रतलाम से बैठी थीं। सहयात्री दम्पति के जरिए ‘उन्होंने’ महू की अपनी यादें ताजा कर लीं। सामने बैठी युवती ने मुझे पहचान लिया। वे दोनों माँ-बेटी मेरे परिचित की बेटी और नातिन निकलीं। साइड बर्थ पर एक दम्पति अपने लगभग एक वर्ष के बेटे के साथ बैठा था।


हम सब सहज भाव से बातें कर ही रहे थे कि एक हिंजड़ा डिब्बे में घुस आया और पठानी वसूली की मुद्रा और शैली में भीख माँगने लगा। हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया तो वह जोर-जोर से तालियाँ बजा-बजा कर, वसूली के लिए चिल्ला-चिल्ला कर बोलने लगा। एक तो हमारी चर्चाओं में व्यवधान, दूसरे उसका दादागिरीवाला तरीका तीसरा उसका लगातार चिल्लाना और तालियाँ बजाना, सब कुछ मुझे असहज करने लगा। मैंने उसे आगे जाने को कहा तो वह मुझे हड़काने लगा। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा कि वह यदि नहीं हटा तो मैं पुलिस को आवाज लगाऊँगा। मेरी बात ने मानो उसकी ‘मर्दानगी’ को ललकार दिया। वह अपने हिंजड़ा होने की दुहाई देकर, कपड़े उठाकर नंगा होने की धमकी देने लगा। मुझे तैश आ गया। मेरी आवाज भी ऊँची हो गई। यह देख ‘वे’ मुझे समझाने लगे। मुझे हैरत हुई। लेकिन उनसे कुछ कहने के बजाय मैंने हिंजड़े से निपटने को प्राथमिकता दी। मेरी बातों के जवाब में वह और अधिक जोर से तालियाँ फटकारते हुए, चिल्ला-चिल्ला मुझे श्राप देने लगा। श्रापों की तो खैर मुझे कोई चिन्ता नहीं थी किन्तु उसकी हरकतों से मुझे और तैश आ गया। रेल यद्यपि स्टेशन पर खड़ी थी तदपि मैंने रेल रोकनेवाली जंजीर खींचने के लिए, उठकर, हाथ बढ़ाया किन्तु मैं छोटा पड़ गया। मेरा हाथ वहाँ तक पहुँचा ही नहीं। यह देख कर हिंजड़े को मजा आ गया। अब वह मुझे श्राप देने के साथ-साथ मेरी खिल्ली भी उड़ाने लगा। यह सब देख ‘वे’ घबरा गए। पकड़ कर मुझे बैठाकर मुझे समझाइश देने लगे कि मैं चुप रहूँ, हिंजड़े के मुँह नहीं लगूँ। तब तक साइड बर्थ पर बैठे दम्पति ने हिंजड़े को दस का नोट थमा दिया। हिंजड़ा उनके बेटे को असीसता हुआ और मुझे कोसता-श्राप देता हुआ वहाँ से चला गया।


उसके जाते ही ‘वे’ तनिक कुपित होकर फिर से मुझे समझाने लगे। समझा क्या रहे थे, मेरी सामान्य बुद्धि पर तरस खाते हुए मुझे प्रताड़ित ही कर रहे थे। मुझे हैरत हुई। मैंने जानना चाहा कि मेरी गलती क्या थी। ‘वे’ बोले कि मेरी गलती तो बिलकुल नहीं थी किन्तु ऐसे लोगों से बहस करने का क्या मतलब? मैंने पूछा कि हम दोनों (हिंजड़े में और मुझमें) में से अनुचित कौन था। ‘उन्होंने’ उत्तर दिया - ‘यह भी कोई पूछने, बतानेवाली बात है? अनुचित तो हिंजड़ा ही था।’ मैंने पूछा - ‘अनुचित का प्रतिकार कर मैंने कुछ गलत किया?’ ‘वे’ बोले - ‘बिलकुल नहीं।’ मैंने पूछा - ‘फिर आपने हिंजड़े का समर्थन क्यों किया?’ वे मानने को तैयार नहीं हुए कि ‘उन्होंने’ हिंजड़े का समर्थन किया। बोले - ‘मैं तो तेरी चिन्ता कर रहा था।’ तब मैंने तनिक क्रुद्ध होकर कहा - ‘आप ऐसा बिलकुल नहीं कर रहे थे। आप हिंजड़े को डाँटने, भगाने के बजाय उसके सामने ही मुझे समझा रहे थे। यह उसका समर्थन नहीं तो और क्या था?’ उन्होंने कुछ कहना चाहा किन्तु बोल नहीं पाए। पल भर बाद बोले - ‘तू मेरी बात समझ नहीं पा रहा है।’ मैंने तनिक कठोर हो कर कहा - ‘मैं तब भी आपकी बात भली प्रकार समझ रहा था और अभी भी समझ रहा हूँ। तब आप हिंजड़े की उपस्थिति में मेरे विरुद्ध उसका समर्थन कर रहे थे और अभी, उसके जाने के बाद उसके प्रतिनिधि बन कर मेरा विरोध कर रहे हैं। उसमें और आपमें क्या फर्क रहा? वह तो चला गया किन्तु आप अभी भी उसकी अनुचित हरकतों का समर्थन किए जा रहे हैं।’ इस बार वे चुप हो गए। उनके चुप होते ही सामने बैठी बच्ची अपनी माँ से बोली - ‘अंकल ने बिलकुल ठीक किया। पापा होते तो वे अंकल को सपोर्ट करते और उसे भगा देते।’ सुनकर उसकी माँ झेंप कर असहज हो गई।


रेल सरकी तो डिब्बे के हमारेवाले हिस्से में सन्नाटा छा गया। वातावरण भारी हो गया था। कोई, कुछ नहीं बोल रहा था। मैं साफ-साफ देख रहा था कि ‘वे’ मुझसे नजरें चुरा रहे थे। ‘उनके’ चेहरे पर अपराध-बोध छाया हुआ था। ‘उनकी’ आँखें नम हो आई थीं।


नीमच अभी कम से कम पचास किलोमीटर दूर था। याने, लगभग सवा-डेड़ घण्टे की यात्रा शेष थी। ‘ऐसे सन्नाटे, ऐसे भारीपन के साथ यह समय कैसे कटेगा?’ यह विचार मन में आते ही मुझे घबराहट होने लगी। मैंने तड़ाक् से पूछा - ‘आप चुप क्यों हैं?’ बड़ी मुश्किल से ‘वे’ बोले -‘तेरी बात सच है। किन्तु यह भी सच है कि मैं तेरी ही चिन्ता कर रहा था। नहीं चाहता था कि वह हिंजड़ा तेरे साथ हुज्जत करे। किन्तु तू इसे, हिंजड़े का समर्थन मान रहा है। तू भी गलत नहीं है। उसके बजाय तुझे रोक-टोककर उसका ही हौसला बढ़ाया मैंने। लेकिन अब यह हो तो गया है। अब क्या कर सकता हूँ?’


अपने आदरणीय पर मुझे दया आ गई। उनकी दशा देखकर और मनोदशा अनुभव कर मुझे रोना आ गया। बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू कर बोला - ‘हिंजड़े ने मेरी फजीहत की उसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं। सब जानते हैं कि वह गलत था और मैं सही। किन्तु आपने ही तो सिखाया है कि अनुचित का प्रतिकार करना चाहिए। ऐसा न करने पर हम खुद अनुचित करने के अपराधी बन जाते हैं। मैं आपकी सीख पर अमल कर रहा था और आप मुझे रोक रहे थे। मुझे हिंजड़े की हरकत अजीब नहीं लगी क्योंकि वह तो वही सब करने के लिए डिब्बे में आया था। किन्तु आप? आपने यह क्या किया? आपने वह किया जो आपने नहीं करना चाहिए था और वह तो किया ही नहीं जो आपने करना चाहिए था।’


मेरी बात ने मानो करण्ट का काम किया। वे चिहुँक कर बोले - ‘तेरा मतलब है, हिंजड़े ने तो अपना काम किया और मैंने अपना काम नहीं किया?’ मैं बोला - ‘मैंने शब्दशः तो ऐसा नहीं कहा किन्तु कहा तो यही है। यही मैं कहना भी चाहता था। आप मेरे आदर्श हैं और मेरे लिए यह मर्मान्तक पीड़ादायक है कि मेरा आदर्श अपने आचरण से स्खलित हुआ।’


‘वे’ फिर चुप हो गए। शेष यात्रा में उन्होंने बातचीत की तो अवश्य किन्तु उनकी आवाज की जिन्दादिली और खनक गायब थी। ऐसे बात कर रहे थे मानो बात न करने पर एक और अपराध कर लेंगे।


रेल नीमच पहुँची। ‘उन्हें’ स्टेशन के पास ही जाना था और मुझे शहर में। सो, हम लोगों ने स्टेशन पर ही एक दूसरे से विदा ली। मैंने नमस्कार किया। ‘उन्होंने’ मुझे असीसा और कहा - ‘पत्र लिखना।’ मैंने हाँ की मुद्रा में गरदन हिलाई और चल दिया। चार कदम भी नहीं चला था कि उन्होंने आवाज दी। मैं पलट कर उनके पास गया। वे बोलना चाह रहे थे किन्तु बोल नहीं पा रहे थे। अन्ततः, तनिक कठिनाई से, भर्राए गले से बोले - ‘तूने ठीक कहा। हिंजड़े ने अपना काम किया और मैंने अपना काम नहीं किया। माफ कर देना।’


और मैं कुछ कहता उससे पहले ही वे पीठ फेरकर, तेज-तेज कदमों से, मानों भागना चाह रहे हों, चले गए।


मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। प्‍लेटफार्म का कोलाहल मानो ‘म्यूट’ हो गया हो। मुझे उनकी पीठ दिखाई दे रही थी।


और हाँ, उन्होंने अपनी बाँह से अपनी आँखें पोंछी, यह भी मैंने देखा।
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पत्रकारिता की बारात का बूढ़ा


प्रकाशजी ने एक बार फिर ‘नईदुनिया’ का काम-काज सम्हाल लिया। इस बार उनकी पदोन्नति भी हुई। पहले वे ‘नईदुनिया’ के, मेरे कस्बे के कार्यालय प्रमुख थे। अब वे पूरे जिले के सलाहकार के रूप में पदस्थ किए गए हैं। उनका पदनाम भले ही ‘सलाहकार’ दिया गया हो किन्तु मैं जानता हूँ कि प्रकाशजी जहाँ भी होते हैं, पत्रकार ही होते हैं और पत्रकार से कम या ज्यादा और कुछ नहीं होते।


किन्तु इस बात से क्या अन्तर पड़ता है कि कौन आदमी किस अखबार में किस पद पर काम करे? सही है। कोई अन्तर नहीं पड़ता। किन्तु प्रकाशजी की यह पुनर्नियुक्ति सामान्य नहीं है। यह एक विशेष घटना है। ऐसा नहीं होता तो भला मैं यह सब क्यों लिखता?


इस पुनर्नियुक्ति की खास बात यह है कि प्रकाशजी (याने श्री प्रकाश उपाध्याय) ने अपनी आयु के 77वें वर्ष में यह जिम्मेदारी सम्हाली है। कोई सत्रह वर्ष पूर्व, 1993 में, साठ वर्ष की आयु पूरी कर लेने के कारण वे सेवा निवृत्त कर दिए गए थे। आयु के सतहत्तरवें वर्ष में यह पुनर्नियुक्ति? मैं प्रसन्न अवश्य हूँ किन्तु विस्मित भी।


प्रकाशजी केवल मेरे कस्बे के ही नहीं, समूचे मालवांचल के अग्रणी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। साक्षात्कार और मैदानी रपट (फील्ड रिपोर्टिंग) के मामले में वे अप्रतिम, अनुपम हैं। पत्रकारिता-कर्म करते हुए वे सामनेवाले के पद, प्रतिष्ठा से कभी भी आतंकित/प्रभावित नहीं होते, इस तथ्य का गवाह मैं पचासों बार रहा हूँ। शालीनता और विनम्रता बरतते हुए पत्रकारिता की दृढ़ता और पत्रकारिता की अस्मिता की रक्षा कैसे की जाती है, यह मैंने उन्हीं से सीखा। वे मेरे आदर्श रहे हैं। सक्रिय पत्रकारिता के अपने समय में मैं ‘प्रकाश उपाध्याय’ बनना चाहता रहा। इस दौरान मैं उनसे ईष्र्या भी करता रहा और प्रतियोगिता भी। एक-दो प्रतियोगिता में मैं उनसे आगे निकला भी तो वह मेरी कुशलता, दक्षता और क्षमता के कारण नहीं, मात्र संयोग और स्थितियों के कारण। प्रकाशजी का ‘जलवा’ ऐसा और इतना हुआ करता था कि अपनी पत्रकार वार्ता शुरु करने के लिए मुख्यमन्त्रियों को प्रकाशजी की प्रतीक्षा करते हुए कम से कम सात बार तो मैंने देखा है। ऐसे प्रकाशजी एक बार फिर अधिक जिम्मेदारी के साथ ‘नईदुनिया’ कार्यालय में नजर आएँगे, यह जानकर मुझे सचमुच में ‘सुखद आश्चर्य’ हुआ।


पत्रकारिता की जिस पीढ़ी और संस्कार परम्परा से प्रकाशजी आते हैं, वह सब आज लगभग खारिज कर दी गई है। पहले पत्रकार अपने मुँह से कुछ नहीं कहता था। उसका काम बोलता था और लोग जानते थे कि फलाँ आदमी फलाँ अखबार का पत्रकार है। आज स्थिति एकदम उलट है। आज तो पत्रकार विभिन्न उपक्रमों और प्रतीकों के जरिए अपने होने को जनवाते हैं। पहले के पत्रकार, कलेक्टर के तीन-चार बार बुलाने पर एक बार कलेक्टर के चेम्बर में जाते थे। आज तो कलेक्टर के चेम्बर के बाहर पंक्तिबद्ध पत्रकार नजर आना सामान्य बात हो गई है। लगता है, सारी परम्पराएँ, सारे मूल्य पूरी तरह से उलट गए हैं। ऐसे में, वह कौन सी बात, वे क्या कारण हो सकते हैं कि प्रकाशजी को वापस बुलाना पड़ा? आज वे 77 वर्ष के हैं, भाग-दौड़ करने की उनकी शारीरिक क्षमता पहले के मुकाबले तो शून्य प्रायः ही होगी। विज्ञापनों के लिए खुशामद करना उनके मिजाज में पहले भी नहीं था। अब तो बिलकुल भी नहीं रहा होगा। आजकी पत्रकारिता की भाषा, शैली, प्रस्तुति सब कुछ बदल गया है। प्रकाशजी के जमाने में सम्पादकीय विभाग को प्रमुखता, प्रधानता, प्राथमिकता और भरपूर सम्मान मिलता था। आज यह सब प्रबन्धन और खास कर विज्ञापन विभाग को मिलने लगा है। पहले, अखबार का प्रबन्ध सम्पादक कोने में खड़ा टुकुर-टुकुर देखता रहता था। आज उसके लिए लाल कालीन बिछा मिलता है। पहले सम्पादक के अड़ जाने के कारण समाचार के लिए विज्ञापन कम कर दिए जाते थे। आज तो विज्ञापन ही अखबार का भगवान बन गया है। ये सारी बातें जब मैं जानता हूँ तो क्या प्रकाशजी नहीं जानते होंगे? उनसे भी पहले, क्या ‘नईदुनिया’ का प्रबन्धन यह सब नहीं जानता होगा? वहाँ तो प्रकाशजी की पीढ़ी का एक भी आदमी नहीं है। सब नई उमर के, इक्कीसवीं सदी के महत्वाकांक्षी, आक्रामक विपणन नीति वाले, ऊर्जस्वी नौजवान आ गए हैं। अखबार और पत्रकारिता को लेकर इस पीढ़ी के मूल्य, मायने एकदम अलग हैं। इतने अलग कि प्रकाशजी और ये लोग या तो मुठभेड़ की स्थिति मे आमने-सामने होंगे या एक दूसरे की ओर पीठ करके बैठे मिलेंगे। फिर भी प्रकाशजी की वापसी हुई? ‘नईदुनिया’ के प्रतियोगी अखबारों में प्रकाशजी के पुत्रों-पौत्रों की उम्र के पत्रकार काम कर रहे होंगे, यह हर कोई जानता है। फिर भी सतहत्तर वर्ष के प्रकाशजी को पूरे जिले की जिम्मेदारी दे दी गई?


मुझे लगता है, यह केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं है। यह कुछ और है। हमारे अखबार और पत्रकारिता आज जिस मुकाम पर आ गए हैं वहाँ प्रसार और पैसा तो मूसलाधार बरस रहा है किन्तु अखबारों और पत्रकारों के प्रति आदरणीयता, सम्मान का भाव तिरोहित होता जा रहा है। पहले ‘पत्रकार’ हुआ करते थे, आज ‘अखबारों के कर्मचारी’ नजर आते हैं। पहले ‘क्या छापा जाए’ इस पर विचार होता था और यही चिन्ता होती थी। आज ‘क्या नहीं छापा जाए’ की दृष्टि से सम्पादन होने लगा है। पत्रकारिता की धार में कमी अनुभव होने लगी है। कुछ कर गुजरने की अदम्य लालसा लिए पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले उत्साही और महत्वाकांक्षी नौजवान को सबसे पहली समझाइश यही दी जाने लगी है कि वह पत्रकारिता करने नहीं, नौकरी करने आया है। उसे समाचार तो लाने हैं किन्तु ऐसे कि जिनसे अखबार पर कोई जोखिम नहीं आए। पहले, जनहित के लिए अखबार मानो मुठभेड़ के लिए, व्यवस्था से टकराने के लिए सन्नद्ध रहते थे। आज समन्वय के लिए सन्नद्ध रहते नजर आते हैं। आपातकाल में सबसे पहले गिरतार होकर, जार्ज फर्नाण्डिस के साथ जेल जानेवाले, अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष श्री के। विक्रमराव का सुनिश्चित और जग जाहिर मत है कि ‘पत्रकार सदैव प्रतिपक्ष में रहता है।’ राव साहब का यह मत अब उन्हीं तक सिमट कर गया लगता है। पहले अखबार को जन संघर्ष का धारदार, प्रभावी और परिणामदायी औजार माना जाता था। आज के अखबार ‘उत्पाद’ (प्रॉडक्ट) की तरह नजर आते हैं।


इन्हीं और ऐसी ही बातों के कारण आज अखबारों के प्रति लोगों के मन से आदरभाव तिरोहित होता जा रहा है, अखबारों से अपेक्षा करना लोगों ने कम कर दिया है। अखबारों और पत्रकारों की ‘प्रबुद्ध छवि’ लुप्तप्रायः हो गई है। लोग अखबारों से यदि नाउम्मीद नहीं हुए हैं तो उन्होंने उम्मीद करना भी छोड़ दिया है। अखबारों में आज समाचार कम और शीर्षक अधिक नजर आते हैं। ‘विचार’ तो मानो विस्थापित ही कर दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर का एक भी अखबार हमें देखने-पढ़ने को नहीं मिलता। उच्च तकनीक ने सारे अखबारों को स्थानीय बना दिया है। इतना स्थानीय कि अपने कस्बे से पचास किलोमीटर दूरवाले कस्बे के समाचार भी देखने-पढ़ने को नहीं मिलते। अखबार छप रहे हैं, प्रसार संख्या बढ़ गई है, विज्ञापनों की बरसात हो रही है किन्तु ‘मजा’ किसी को नहीं आ रहा है, सन्तोष किसी को नहीं हो रहा है - न तो छापनेवाले को और न ही पढ़नेवाले को।


ऐसे में, प्रकाशजी की वापसी को मैं केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं मानता। मुझे लगता है, यह अखबारों में ‘विचार की वापसी’ की शुरुआत है, अखबारों और पत्रकारों की प्रबुद्ध छवि बनाने की शुरुआत है, समूची पत्रकारिता और अखबार नामकी संस्था के सम्मान और आदरणीयता की पुनस्र्थापना की शुरुआत है।


प्रकाशजी की इस पुनर्नियुक्ति की खबर मिलने के पहले ही क्षण मुझे मालवा की एक लोक कथा याद आ गई और मैं अकेले में ही हँस पड़ा। लोक कथा कुछ इस प्रकार है - एक विवाह सम्बन्ध तय हुआ तो वधू पक्ष ने शर्त रखी कि वर पक्ष बारात में किसी बूढ़े को नहीं लाएगा। वर पक्ष ने बात तो मान ली किन्तु जिज्ञासा बराबर बनी रही। इसी जिज्ञासा के अधीन, एक बूढ़े को, बक्से में बन्द कर बारात के सामान में शामिल कर लिया गया। बारात तोरण पर पहुँची तो बारात में एक भी बूढ़े को न देखकर वधू पक्ष परम प्रसन्न हुआ। किन्तु तोरण मारने के लिए वर ने जैसे ही तलवार उठाई, वधू पक्ष के एक बूढ़े ने कहा - ‘पहले नदी को घी से लबालब भरें, फिर तोरण मारें और वधू को ब्याह ले जाएँ।’ पूरी बारात में सन्नाटा छा गया। यह तो किसी ने सोचा भी नहीं था। कहाँ तो वधू लेकर लौटने की उमंग उछालें मार रही थीं और कहाँ तोरण मारने में ही बाधा आ गई।


वधू पक्ष अड़ गया। किसी को कुछ भी सूझ नहीं पड़ रही थी। तभी एक बाराती को बक्से में बन्द बूढ़ा याद आया। वह भागा-भाग जनवासे गया और बक्सा खोल कर बूढ़े को समस्या बताई। सुनकर बूढ़ा हँसा और बोला - ‘लड़कीवालों से कहो कि वे नदी खुदवा दें ताकि उसे हम घी से लबालब भर सकें।’ बाराती उल्टे पाँवों वधू के दरवाजे पहुँचा और नदी खुदवाने की बात कही। सुनकर, शर्त रखनेवाला वधू पक्ष का बूढ़ा तत्काल बोला - ‘आपने शर्त तोड़ी है। आप बारात में बूढ़ा लेकर आए हैं।’ वर पक्ष ने सहमति में सर हिलाया। वधू पक्ष का बूढ़ा ठठा कर हँसा और बोला - ‘जिन्हें लाए हैं, उन्हें ससम्मान यहाँ लाएँ। वे तो हमारे सिरमौर हैं। वे न होते तो हमारी बेटी आज कुँवारी रह जाती।’


इस लोक कथा के आलोक में प्रकाशजी की वापसी पर सोचें। यहाँ प्रकाशजी तो केवल एक नाम हैं, एक निमित्त हैं। उम्मीद करें कि पत्रकारिता और अखबार-संस्थान् की विश्वसनीयता, बौद्धिकता, आदरणीयता, सम्मान की पुनर्स्‍थापना की कोशिशों के तहत, ऐसे अनेक प्रकाशजी एक बार फिर हमें अपने आसपास नजर आएँ।

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यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

देश? क्या होता है देश?


दन्तेवाड़ा में हुए नक्सली हमले के बाद एक बार फिर राष्ट्र भक्ति का ज्वार आ गया है। हर कोई सरकार को कोस रहा है, सरकार की असफलताएँ उजागर कर रहा है। शहीदों के परिजनों को आर्थिक सहायता दिए जाने का मखौल उड़ाते हुए कोई कह रहा है कि प्रधानमन्त्री और गृह मन्त्री ऐसे हमलों में मरकर दिखाएँ तो वह इतने-इतने करोड़, इन दोनों के परिजनों को दे देगा। हर कोई अपने आप को सबसे बड़ा देश प्रेमी और सबसे बड़ा देश भक्त साबित करने के लिए छटपटा रहा है।


ढोंग है यह सब। कोई सचाई नहीं है इन सारी बातों में और ऐसी सारी बातों में। बात कड़वी लगेगी किन्तु सच यह है कि हमारे खून में देश कहीं नहीं रह गया है। देश हमारी प्राथमिकताओं में कहीं नहीं है। देश तो हमारे लिए ऐसा झुनझुना बन कर रह गया है जिसे हम अपनी सुविधानुसार बजा-बजा कर अपने देशप्रेमी होने का प्रमाण पत्र खुद के लिए ही जारी करते रहते हैं। हममें से हर कोई उपदेशक बना हुआ है। चाह रहा है कि बाकी लोग देश के लिए कुछ करें या फिर पूछ रहा है कि बाकी लोग देश के लिए क्या कर रहे हैं?


बात कुछ इस तरह पेश की जा रही है मानो देश के लिए मरना ही देश प्रेम या देश भक्ति का एक मात्र पैमाना बन कर रह गया है। क्या वाकई में ऐसा ही है? जी नहीं। ऐसा बिलकुल ही नहीं है। देश तो हमारे आचरण में झलकना चाहिए। इस बात पर हँसा जा सकता है किन्तु एक बार फिर कड़वी किन्तु सच बात यह है कि देश सदैव बलिदान नहीं माँगता वह तो छोटी-छोटी बातें ही हमसे माँगता है।


क्या है ये छोटी-छोटी बातें? कुछ नमूने पेश हैं - हम यातायात के नियमों का पालन करें, अपना वाहन व्यवस्थित रूप से पार्क करें, विचित्र ध्वनियोंवाले हार्न अपने वाहन में न लगाएँ, अपने अवयस्क बच्चों को वाहन न सौंपें, वयस्क बच्चों को बिना लायसेन्स वाहन न चलाने दें, अपने देय कर समय पर जमा कराएँ, सरकारी या नगर पालिका/निगम की जमीन पर अतिक्रमण न करें, जो उपदेश दूसरों को दें उस पर खुद पहले अमल करें आदि आदि।


हम लोकतन्त्र-रक्षा के भी उपदेशक बने हुए हैं। लोकतन्त्र के क्षय और हनन के प्रत्येक क्षण पर स्यापा करने में सबसे आगे रहने के लिए मरे जाते हैं। चाहते हैं कि सबसे पहला रुदन हमारा ही हो और वही सबसे पहले सुना जाए। किन्तु लोकतन्त्र की रक्षा के लिए हम करेंगे कुछ भी नहीं। अपने लोकतन्त्र को हम केवल अपना अधिकार मानते हैं। जानबूझकर (बेशर्मी से) भूल जाना चाहते हैं कि लोकतन्त्र हमारी जिम्मेदारी, हमारा कर्तव्य भी है। हमने अपने नेताओं को उच्छृंखल छोड़ दिया है। उन्होंने लोकतन्त्र को ‘गरीब की जोरु’ बना दिया है - जब चाहते हैं, उससे अश्लील हरकतें कर लेते हैं। विधायी सदनों को व्यर्थ साबित करने की उनकी प्रत्येक कुचेष्टा हमें उत्तेजित तो करती है किन्तु हम उनमें से किसी से कुछ भी नहीं कहते। कहेंगे भी नहीं। कहना चाहते ही नहीं। क्या पता, कब, किस नेता से काम पड़ जाए? इसलिए हम तमाम नेताओं को दोषी ठहराने की समझदारी बरत कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। एक की कुचेष्टा को पूरी बिरादरी की कुचेष्टा प्रमाणित कर हम खुश होकर बैठ जाते हैं। हम वो माहिर लोग हैं जो खीर बनाने के लिए मँगवाए दूध में नींबू निचोड देते हें और फिर दूध के फट जाने की शिकायत करते हैं - इसके लिए दूसरे को जिम्‍मेदार ठहराते हुए।


हम ही सरकार बनाते हैं और अपनी ही बनाई सरकार को निकम्मी, भ्रष्ट करार देने में देर नहीं करते। जिस देश के नागरिक सचेत, सतर्क, ईमानदार नहीं होंगे उस देश की सरकार भला सक्रिय और ईमानदार कैसे हो सकती है? हम सरकार को दोषी करार देते हैं किन्तु उस सरकार को बनाने की जिम्मेदारी कभी नहीं लेते। देश (के प्रान्तों) में कहीं न कहीं लगभग प्रत्येक प्रमुख राजनीतिक दल की सरकार चल रही है। किन्तु एक और कड़वा सच यह है कि किसी भी सरकार को नागरिक योगदान नहीं मिल रहा। हम सब सरकार को ऐसा कोई तीसरा पक्ष मानकर चलते हैं जिससे हमारा कोई लेना-देना नहीं, जिसके प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।


मुझे कोई भी क्षमा न करे। मेरी धारणा है कि देश हमारे खून में कहीं नहीं है। रह ही नहीं गया है। हम तो बेशर्म, स्वार्थी समाज बन कर रह गए हैं और स्वार्थी के लिए ‘स्व-अर्थ’ ही महत्व रखता है, देश-वेश जैसी बातें तो फालतू हैं। यदि हमें मालूम हो जाए कि कल से हमारे देश पर चीन का कब्जा हो जाएगा तो कल का सूरज उगने से पहले ही हम लोग दीपक-कुंकुम सजी पूजा की थालियाँ लेकर हिमालय के पार खड़े नजर आएँगे।


देश बलिदान माँगता है, उपदेश और आशा/अपेक्षा नहीं। यह बलिदान केवल प्राणों का नहीं होता। हमारे क्षुद्र स्वार्थों का बलिदान, हमारी अनुचित हरकतों का बलिदान, उपदेशक की भूमिका में बने रहने का बलिदान, खुद की गरेबान में झाँकने की बजाय दूसरों की हरकतों की चैकीदारी करने की आदत का बलिदान।


देश बातों से नहीं, आचरण से बनता और चलता है। है हममें हिम्मत कि हम अपनी गरेबान में झाँकें और खुद को दुरुस्त करने में जुट जाएँ - यह चिन्ता किए बिना कि दूसरा क्या कर रहा है?
नहीं। हममें यह हिम्मत नहीं है। यह देश मेरा है जरूर किन्तु इसकी चिन्ता, इसकी रखवाली, इसकी देख-भाल, सब-कुछ आप करेंगे। मैं नहीं। देने के लिए मेरे पास कुछ है ही कहाँ? मैं तो दीन-हीन, बेचारा, अक्षम, असहाय, निरुपाय हूँ।


आप किस देश की बात कर रहे हैं? कौन सा देश? किसका देश? इस देश ने मुझे दिया ही क्या है? जो कुछ आज मेरे पास है, वह तो मैंने अपनी मेहनत से, अपने पुरुषार्थ से प्राप्त किया है। देश की वर्तमान दुर्दशा के लिए मैं कहीं दोषी नहीं। वह तो आप सबने देश को इस मुकाम पर पहुँचा दिया है।
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मुख्‍यमन्‍त्री : नौकरों का नौकर

‘यह दुर्भाग्य ही है कि आप लोगों को हड़ताल करनी पड़ रही है, धरना-प्रदर्शन करना पड़ रहे हैं। आज सरकार भले ही हठधर्मी कर, आपकी बात नहीं मान रही है किन्तु मुझे साफ नजर आ रहा है कि आपको यूजीसी वेतनमान मिलेगा। शिवराज सरकार सौ जूते भी खाएगी और सौ प्याज भी।’ गत वर्ष, 15 से 20 सितम्बर के बीच वाले किसी दिन, ऐसा ही कुछ कहा था मैंने, मेरे कस्बे के महाविद्यालयीन प्राध्यापक समुदाय से। वे, शासकीय कला-विज्ञान महाविद्यालय के दरवाजे के बाहर, मंच बना कर धरने पर बैठे थे। वे विश्व विद्यालय अनुदान आयोग का वेतनमान प्राप्त करने के लिए संघर्षरत थे। उनकी माँग जायज थी किन्तु सरकार उनकी बात नहीं सुन रही थी।
यह वेतनमान प्राप्त करने के लिए मध्य प्रदेश के महाविद्यालयीन प्राध्यापकगण बार-बार सरकार का दरवाजा खटखटा रहे थे और सरकार थी कि कानों में अंगुलियाँ डाले, न सुनने का नाटक करती हुई, इंकार में मुण्डी हिला रही थी।

प्राध्यापकों ने तीन अगस्त 2009 से ही अपना आन्दोलन शुरु कर दिया था। तीन अगस्त से पचीस अगस्त तक वे पढ़ाई खत्म करने के बाद इकट्ठे होते, नारेबाजी करते, वे सब, एक के बाद एक, समूह को सम्बोधित करते और फिर बिखर जाते। किन्तु विरोध प्रदर्शन के ऐसे तरीकों पर कार्रवाई करना तो दूर, उनका तो नोटिस भी नहीं लिया जाता! ‘कक्षाएँ बराबर लग रही हों, विद्यार्थियों को कोई शिकायत नहीं हो, महाविद्यालय में कोई बखेड़ा नहीं हो तो करते रहो ऐसे विरोध प्रदर्शन जिन्दगी भर! हमारे ठेंगे से।’ कुछ ऐसा ही रवैया रहा मध्य प्रदेश सरकार का।


अपनी माँग मनवाने के लिए प्राध्यापकों ने अन्ततः स्थापित और चिरपरिचित तरीका अपनाया। कानूनों की खानापूर्ति करते हुए वे शिक्षक दिवस याने 5 सितम्बर 2009 से हड़ताल पर चले गए। पढ़ाना बन्द कर दिया। भोपाल के प्राध्यापकों ने अतिरिक्त सक्रियता बरती। आठ सितम्बर को उन्होंने सड़कों पर प्रदर्शन किया तो भारतीयता, संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देनेवालोंकी सरकार ने ‘गुरु समुदाय’ की ‘सेवा-वन्दना’ लाठियों से की। ‘नारी शक्ति’ का मन्त्रोच्चार करनेवालों की सरकार ने महिला प्राध्यापकों को भी समान निर्मम भाव से पीटा।


इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया होनी ही थी। प्राध्यापक समुदाय ने पूरे प्रदेश में जुलूस निकाले, सरकार के प्रतिनिधि कलेक्टरों को ज्ञापन दिए। कई स्थानों पर विभिन्न देवी-देवताओं के मन्दिरों की घण्टियाँ बजाईं, उनकी प्रतिमाओं को भी ज्ञापन अर्पित किए। प्राध्यापकों के धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन मानो दिनचर्या बन गए। धरने पर बैठे प्राध्यापकों के प्रति समर्थन और सहानुभूति जताने के लिए समाज के तमाम वर्गों के लोगों का आना और माइक पर अपनी बात कहना प्रमुख घटना बनने लगा। मैं भी इसी क्रम में पहुँचा था और अपनी बात कही थी।


कहीं कोई असर होता नजर नहीं आ रहा था। आन्दोलन अखबारों का स्थायी स्तम्भ बन गया था। प्रदेश का कोई भी मन्त्री कहीं मिल जाता तो अखबार और मीडियावाले सवाल करते। उच्छृंखल और गैरजिम्मेदार मिजाज के मन्त्रियों ने प्राध्यापकों को ‘व्यापारियों की तरह व्यवहार न करें’ जैसे मूल्यवान परामर्श भी दिए। शिक्षा मन्त्री के वक्तव्य उन दिनों कभी चुटकुलों की तरह तो कभी झुंझलाए हुए विवश व्यक्ति के अस्त व्यस्त (मानों अखबारवालों से पीछा छुड़ाना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य रह गया हो) जुमलों की तरह पढ़ने को मिले।


जब प्राध्यापकों का धैर्य जवाब दे गया तो अपनी ‘प्रबुद्ध छवि’ को खूँटी पर टाँग कर वे 22 सितम्बर को क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठ गए। किन्तु तीसरे ही दिन, 24 सितम्बर को उन्हें न केवल भूख हड़ताल बन्द करनी पड़ी वरन् अपना आन्दोलन फौरन बन्द कर अगले ही दिन काम पर लौटना पड़ा। प्रदेश के उच्च न्यायालय, जबलपुर में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने प्राध्यापकों को फौरन ही काम पर लौटने का निर्देश दिया। इस जनहित याचिका पर जिस तरह से कार्रवाई हुई उससे यह भ्रम फैला मानो सरकार ने न्यायालय को ‘मेनेज’ कर लिया हो। किन्तु शुक्र है कि वास्तविकता ऐसी नहीं थी। हड़ताल टूट गई। सरकार ने प्राध्यापकों का, हड़ताल अवधि का वेतन काट लिया।


मामल कोर्ट में चला तो पेशियाँ शुरु हुईं। सरकार की पेशानी पर छलकनेवाली, पसीने की बूँदों की संख्या और उनका आयतन प्रत्येक पेशी पर बढ़ने लगा। ‘सरकार विचार कर रही है’ वाली सूचना हर पेशी पर पेश की जाने लगी। किन्तु एक तर्क से एक बार ही तो राहत मिल सकती है! सो, कानून की जितनी भी गलियों का उपयोग कर पाना सम्भव था, उन सबका उपयोग सरकार ने किया। प्राध्यापकों का कटा वेतन भी इस बीच लौटा दिया गया। किन्तु आखिरकार वह बन्द गली में घिर ही गई। न्यायालय के सामने अन्तिम जवाब देने का दिन आ ही गया। अब बचने का कोई रास्ता नहीं था। सरकार को केवल यही सूचित करना शेष रह गया था कि उसने प्राध्यापकों को यूजीसी वेतनमान दे दिया है। सो, आखिरकार सरकार ने घुटने टेक दिए और मंगलवार, 6 अप्रेल 2010 को, प्रदेश मन्त्रि मण्डल ने महाविद्यालयीन प्राध्यापकों को यूजीसी वेतनमान देने का निर्णय लेकर तदनुसार घोषणा कर दी। इतना ही नहीं, इस हड़बड़ी में सरकार ने प्राध्यापकों को वह भी दे दिया जो उन्होंने माँगा ही नहीं था। प्राध्यापकों की सेवा निवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी गई।


पूर मामले को देखें तो सरकार की हठधर्मी, मूर्खता और बेशर्मी ही सामने आती है। जब यह सब करना ही था तो पहली ही बार में क्यों नहीं कर लिया? क्यों प्राध्यापकों को हड़ताल पर जाने को विवश किया गया? क्यों उन पर लाठियाँ भाँजी गई? क्यों छात्रों की पढ़ाई का नुकसान किया गया? क्यों प्राध्‍यापकों का वेतन काटा गया? काटा गया तो लौटा क्यों दिया? यदि पहली ही बार में यह सब कर लिया होता तो न केवल सरकार अपनी भद पिटाई से बचती अपितु वह समूचे प्राध्यापक समुदाय की, उनके परिवारों की और प्राध्यापकों से सहानुभूति रखनेवाले तमाम वर्गों की सद्भावनाएँ अर्जित करती। तब, भाजपा को राजनीतिक लाभ भी होता। शिवराज सिंह चैहान की टोपी में ऐतिहासिक पंख लगता। महाविद्यालयीन प्राध्यापकों को समूचे समाज में अतिरिक्त आदर से देखा जाता है, उन्हें प्रबुद्ध माना जाता है। किन्तु सरकार यह सब चूक गई। अब उसने यह सब किया भी तो उसका श्रेय उसके खाते में जमा नहीं होगा। अब प्राध्यापक कहेंगे कि अपना यह हक उन्होंने लड़कर, लाठियाँ खाकर लिया है।


यह ऐसा पहला और अनूठा प्रकरण नहीं है जिसमें किसी सरकार ने दोहरा दण्ड भुगता हो। ऐसे बीसियों उदाहरण मिल जाएँगे। सरकारें (वे किसी भी पार्टी की हों) आखिरकार ऐसी मूर्खताएँ क्यों करती हैं? मुझे लगता है, कुर्सी पर बैठने के बाद तमाम मन्त्री अपनी प्राथमिकताएँ बदल लेते हैं। विभागीय कामों को निपटाने में उनकी दिलचस्पी शायद सबसे कम रह जाती है और वे अपने विवेक से कोई निर्णय लेने के बजाय अधिकारियों का कहा, आँख मूँदकर मानने लगते हैं। यहीं हमारा लोकतन्त्र परास्त हो जाता है। मन्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह अधिकारियों को हाँकेगा, उनसे जनहित के काम कराएगा। किन्तु होता इसका ठीक उल्टा है। महाविद्यालयीन प्राध्यापकों को यूजीसी वेतनमान देने का यह मामला इसका ताजा उदाहरण है। इसमें किसी भी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा जबकि शिवराज सरकार की अच्छी-खासी फजीहत हो गई। कल तक प्राध्यापकों को व्यापारी कहनेवाले मन्त्री अब क्या कहेंगे? इस मामले में तो सरकार ने प्राध्यापकों को वेतनमान देकर सौ जूते भी खाए और काटा हुआ वेतन लौटा कर सौ प्याज भी खाए। अपनी बात को इस तरह से सच होते देखकर भी मैं खुश नहीं हो पा रहा हूँ।


यह डॉक्टर राममनोहर लोहिया जन्म शती वर्ष है। लोकतन्त्र के प्रति वे इतने सतर्क और चिन्तित थे कि उन्होंने अपनी ही सरकार गिरा देने से पहले पल भर भी नहीं सोचा। गैर कांग्रेसवाद उन्हीं की परिकल्पना थी। कांग्रेसी मन्त्रियों की कार्यशैली पर वे कहते थे कि हमारे मन्त्री तो नौकरों के भी नौकर हो गए हैं। आईएएस अधिकारी सरकार के नौकर के होते हैं और मन्त्री आँख मूँदकर उनकी बातें मानते हैं।


मुझे अच्छा नहीं लग रहा किन्तु मैं कर भी क्या सकता हूँ? मध्य प्रदेश के मुख्य मन्त्री शिवराजसिंह चैहान, ऐसे ही, नौकरों के नौकर साबित हो गए हैं।
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बिना पतेवाला पोस्टकार्ड

जब भी कोई पत्र लेकर महेन्द्र भाई की दुकान पर जाता हूँ तो पहले तो वे और उनका बेटा नितिन खुश होते हैं और अगले ही क्षण ताज्जुब में डूब जाते हैं। महेन्द्र भाई का पूरा नाम महेन्द्र जैन (पाणोत) है और नगर के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र में उनकी, स्टेशनरी की अच्छी-खासी दुकान है। ईश्वर की कृपा है कि वे और नितिन, दुकान पर रहते हुए कभी फुर्सत नहीं पाते। स्टेशनरी व्यवसाय के साथ ही साथ वे कूरीयर से भेजे जाने वाले पत्रों की बुकिंग भी करते हैं। मुझे देखकर वे खुश इसलिए होते हैं क्यों कि वे मुझे पसन्द करते हैं (भगवान करे मेरा यह भ्रम बना रहे) और ताज्जुब इसलिए करते हैं क्योंकि वे भली प्रकार जानते हैं कि पत्र भेजने के मामले में मैं भारत सरकार की डाक सेवाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देता हूँ और निजी कूरीयर कम्पनियों को बिलकुल भी पसन्द नहीं करता।

डाक विभाग को मैं अपना ‘अन्नदाता विभाग’ मानता हूँ। अपने ग्राहकों को बीमा सेवाएँ उपलब्ध कराने में यह विभाग मुझे मेरी आशा/अपेक्षा से अधिक सेवाएँ उपलब्ध कराता है। किन्तु बीमा एजेन्सी का काम तो मैंने अभी उन्नीस बरस पहले ही शुरु किया है जबकि इस विभाग से मेरा जुड़ाव मेरे स्कूली दिनों से ही बना हुआ है। दादा ने सूत्र दिया था - ‘पत्राचार वह एक मात्र माध्यम है जिसके जरिए, अपने घर से निकले बिना ही सारी दुनिया से जुड़ा जा सकता है।’ किन्तु दादा ने यह सूत्र वाक्य ही नहीं दिया। उनसे मुझे पत्राचार भी संस्कार में मिला। ‘पत्र-मैत्री’ (पेन फ्रेण्डशिप) को अपना शौक बताकर मैं अपने से बेहतर लोगों के बीच आसानी से जगह बनाता रहा हूँ। सो, जब भी पत्राचार की बात होती है तो मुझे डाक विभाग के सिवाय और कुछ न तो सूझता है और न ही अच्छा लगता है। इस विभाग के प्रति, इसकी सेवाओं के प्रति और इसके कर्मचारियों के प्रति मेरे मन में अतिरिक्त प्रेम, सम्मान, आदर और सदाशयता का भाव शुरु से ही बना हुआ है।

यह कड़वा और अप्रिय सच है कि डाक सेवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में घातक कमी आ गई है। इतनी कि खीझ और झुंझलाहट होने लगती है। आज की पीढ़ी के लिए यह सूचना ‘सफेद झूठ’ हो सकती है कि किसी जमाने में पत्र, देश के किसी भाग में, केवल तीन दिनों में ही अपने मुकाम पर पहुँच जाया करता था। आज स्थिति यह हो गई है कि स्थानीय पत्र भी पाँच-पाँच दिनों में पहुँच रहे हैं। खीझ का चरम यही है कि मुझ जैसा आदमी भी कभी-कभी कह उठता है कि अंग्रेजों की डाक व्यवस्था ही अच्छी थी।

इसके बावजूद, मैं भारतीय डाक सेवाओं का मुरीद हूँ। कोई एक पखवाड़ा पहले इस विभाग ने मुझे ‘सुखद आश्चर्य’ का ‘जोर का झटका, धीरे से’ दिया। विक्रम सम्वत् 2067 की चैत्र प्रतिपदा, 16 मार्च 2010 की डाक में मुझे आदरणीय श्रीयुत भगवानलालजी पुरोहित का, नव वर्ष अभिनन्दन एवम् शुभ-कामना पत्र मिला। त्यौहार के दिन किसी पवित्रात्मा की शुभ-कामनाएँ और आशीर्वाद मिल जाएँ तो मन पुलकित हो ही जाता है। इसी पुलक भाव मग्न हो मैंने पोस्ट कार्ड पलटा तो देखकर चकित रह गया। पोस्ट कार्ड पर मेरा पता ही नहीं था! डाक विभाग का यह कृपापूर्ण चमत्कार मुझ पर पहला नहीं था। इससे पहले, स्थानीय डाककर्मी, अनगिनत बार मुझ पर कृपा वर्षा कर चुके हैं। पते के स्थान पर केवल ‘विष्णु बैरागी, रतलाम’ लिखा होने पर तो पत्र मुझे मिलते ही रहे किन्तु पते के स्थान पर ‘बैरागी को मिले’, ‘मनासावाले बैरागी को मिले’, ‘बीमा एजेण्ट बैरागी को मिले’ जैसे जुमले लिखे पत्र भी मुझे मिलते रहे। विस्मय की बात यह कि ऐसे सारे पत्र सचमुच में मेरे लिए ही थे जबकि मेरी निजी जानकारी के अनुसार, विष्णु बैरागी नामवाले कम से सोलह व्यक्ति तथा तीन बीमा एजेण्ट रतलाम में हैं। ऐसे तमाम पत्रों को ‘अपूर्ण पता’ की टिप्पणी के साथ प्रेषक को लौटने के कानूनी अधिकार और सुविधा डाक विभाग के पास सुरक्षित है। किन्तु इस ‘अधिकार और सुविधा’ को परे धकेलकर, विभाग ने पत्र अपने मुकाम पर पहुँचाने को प्राथमिकता दी। आदरणीय श्रीयुत भगवानलालजी पुरोहित का भेजा, ताजा पत्र तो पत्र-छँटाई के समय ही अलग निकाला जा सकता था। किन्तु ऐसा न कर, वह पत्र भी मुझे तक पहुँचाया गया।

मैं यह सम्भावना लेकर चलता हूँ कि डाक विभाग के कर्मचारी निजी स्तर पर मुझे जानते-पहचानते होंगे इसलिए मुझ पर यह अतिरिक्त कृपा की गई होगी। किन्तु तनिक कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा कोई पत्र, किसी निजी कूरीयर सेवा को मिलता तो उसकी क्या दशा होती? ऐसा पत्र अपने मुकाम तक पहुँचाना तो दूर की बात रही, उसे लौटा देने के सिवाय और कुछ सोचा ही नहीं जाता। यह इसलिए कह पा रहा हूँ कि दो-एक बार ऐसा हुआ है कि जो पत्र मैंने महेन्द्र भाई के माध्यम से कूरीयर सेवा के जरिए भेजे थे, वे न तो अपने मुकाम पर पहुँचे और न ही मुझे लौटाए गए। इसके उल्टे, उनके ऐसे पीओडी (प्रूफ ऑफ डिलीवरी) मुझे दिए गए जिन पर, जिन सज्जन को मैंने पत्र भेजे थे उनके स्थान पर पता नहीं किसके हस्ताक्षर थे। ऐसी दशा में मैं और मेरे साथ महेन्द्र भाई असहाय हो, टुकुर-टुकुर देखने और मन ही मन कुढ़ने के सिवाय और कुछ नहीं कर सके।

नहीं जानता कि निजी कूरीयर सेवा की अवधारणा देशी है या विदेशी किन्तु अच्छी तरह अनुभव करता हूँ कि उनकी कार्यशैली और ग्राहकों के प्रति व्यवहार, उनकी विदेशी प्रकृति और मानसिकता ही प्रकट करती है। लगता ही नहीं कि उन्हें ग्राहक की और उसके सरोकारों की तनिक भी चिन्ता है। इसके विपरीत, भारतीय डाक सेवाओं में अभी भी आत्मीयता की ऊष्मा और ग्राहकों की चिन्ता का भाव बना हुआ है। आप-हममें से कइयों को आज भी ऐसे पत्र मिलते होंगे जिन पर हमारा पुराना पता होता है। उस पते की बीटवाले डाकिए को जब मालूम पड़ता है कि पानेवाले का पता बदल गया है तो वह (पुराने पते पर रह रहे लोगों से और/या आसपास के लोगों से) हमारा परिवर्तित पता पूछ कर, उस नए पते की बीटवाले पोस्टमेन को वह पत्र सौंप देता है। ऐसा पत्र हमें जब-जब भी मिलता है, तब-तब हम उसे अत्यन्त सहजता से लेते हैं और डाक कर्मियों के इस अनदेखे परिश्रम और हमारे प्रति बरती गई उनकी चिन्ता के प्रति धन्यवाद देना तो दूर, उनके परिश्रम और चिन्ता की कल्पना भी नहीं करते। इसके विपरीत, डाक कर्मियों की प्रत्येक गलती और चूक को उजागर करने, उसकी आलोचना करने का और उनकी खिल्ली उड़ाने का कोई भी अवसर नहीं चूकते।

हमारा (सामान्य मनुष्य का) सामान्य स्वभाव ही है। हमारे बिना कहे यदि किसी ने (विशेषकर किसी शासकीय विभाग/कर्मचारी ने) ‘फेवर’ किया (वह भी तब, जबकि वैसा न करने की कानूनी सुविधा और अधिकार उसे प्राप्त था) तो हम उसकी अनदेखी करते हैं। ऐसी बातों की चर्चा भी नहीं करते।

बुराइयों की चर्चा आज समूचे परिदृश्य पर छाई हुई है। अखबारों में ‘दुर्जनता और दुष्कर्म’ प्रमुखता पाए हुए हैं। यह सब देख कर, पढ़कर हम निराश, हताश और अवसादग्रस्त होते हैं। सोचते हैं, कुछ अच्छा देखने को, पढ़ने को मिले। किन्तु तब हमारे आसपास कुछ अच्छा होता है तो हम ही चर्चा नहीं करते। अच्छाई किस कदर उपेक्षित है, यह इसीसे अनुमान लगाया जा सकता है कि पुरोहितजी के इस पत्र की फोटो प्रति मैंने एक अग्रणी अखबार को, सत्रह मार्च को दी तो वहाँ इसे तत्काल सराहना तो मिली किन्तु अखबार में जगह आज तक नहीं मिली। यदि हम अच्छाइयों की चर्चा करना शुरु कर दें तो

माहौल बदला जा सकता है। तब बुराइयों के लिए जगह शायद बचे ही नहीं। मैं ऐसी ही छोटी-छोटी कोशिशों में विश्वास करता हूँ।

यह ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश है।



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आपकी बीमा जिज्ञासाओंध्समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासाध्समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।




यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

अधर्मी और धर्म-विरोधी मैं


मेरे कस्बे में आए दिनों किसी न किसी साधु-सन्त के प्रवचन आयोजित होते रहते हैं। जब-जब भी ऐसा होता है, मेरी शामत आ जाती है।

साधु-सन्त के अथवा/और उनके मत के अनुयायी आग्रह करते हैं कि मैं ऐसे प्रवचनों में नियमित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराऊँ। कोई पन्द्रह बरस पहले तक मैं ऐसा कर लिया करता था। अब नहीं करता। कर ही नहीं पाता।

बरसों तक ऐसे प्रवचन सुनने के बाद मुझे लगने लगा कि कोई भी साधु-सन्त नया कुछ भी नहीं कह रहा है। सनातन से चली आ रही, चिरपरिचित बातें दुहराई जा रही हैं। केवल भाषा का, वक्तृत्व शैली का और प्रस्तुति का अन्तर होता है। बातें सबकी सब, वही की वही। कुछ चीजों में जरूर अन्तर आया। ऐसे आयोजनों की संख्या बढ़ने लगी है, आयोजन अधिक व्यवस्थित होने लगे हैं, आयोजनों का प्रचार-प्रसार अधिक व्यवस्थित तथा अधिक आकर्षक तरीकों से होने लगा है। प्रचार-प्रसार में पहले आयोजन को प्राथमिकता दी जाती थी, अब सम्बन्धित साधु-सन्त को दी जाती है। याने, प्रचार अभियान व्यक्ति (साधु-सन्त) केन्द्रित हो गया है। साधु-सन्तों के नाम पर उनके अनुयायियों के संगठन बनने लगे हैं। आयोजनों की भव्यता और इस भव्यता के प्रदर्शन को प्रमुखता दी जाने लगी है। पाण्डालों में भीड़ बढ़ने लगी है। किसी-किसी साधु-सन्त के प्रवचानों में पाण्डाल छोटा पड़ जाता है।

एक घटना ने मेरा मोह-भंग न किया होता तो मैं भी इस सबका हिस्सा अब तक बना रहता। कोई पन्द्रह वर्ष पहले एक सन्त के, सात दिवसीय प्रवचन सुनने गया था। दो दिन तक तो सब ठीक-ठाक चला। तीसरे दिन गाड़ी पटरी से उतर गई। बिना किसी सन्दर्भ-प्रसंग के सन्तश्री ने अकस्मात कहना (इसे ‘सूचित करना’ कहना अधिक उचित होगा) शुरु कर दिया कि उनके अनुयायियों को आयकर विभाग के छापों का डर नहीं सताता। सन्तश्री के अनुसार, अनुयायियों का कहना था कि उन्होंने, सन्तश्री के चित्र अपने विभिन्न कमरों में और स्नानागारों के बाहर लगा रखे हैं। आयकर विभाग वाले जब-जब भी आते हैं, तब-तब वे, उन कमरों, स्नानागारों की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। मुझे लगा, ये सन्त नहीं, साधु वेश में आयकर विभाग से सेटिंग कराने वाला कोई कुशल और प्रभावी मध्यस्थ है।

एक और सन्त की कथनी और करनी में दुस्साहसपूर्ण अन्तर देखकर मैं हतप्रभ रह गया। विचित्र शैली में व्याख्यान देनेवाले ये सन्त अपने प्रत्येक प्रवचन में राजनीति को शौचालय निरुपित करते। किन्तु, उनके प्रवास के दौरान एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उनके हाथों किसी राजनेता का सम्मान न हुआ हो। इन सन्तश्री ने मेरे कस्बे से प्रस्थान का अपना निर्धारित कार्यक्रम एक-एक कर पूरे तीन दिन स्थगित किया। वे चाहते थे कि राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर का कोई न कोई राजनेता उनके प्रस्थान के समय उपस्थित हो, उन्हें विदा दे। इसके लिए उन्हें मोबाइल पर एक के बाद एक अनेक राजनेताओं से बात करते देख कर मुझे गहरी निराशा हुई।

ये और ऐसे ही कुछ प्रसंग ऐसे रहे कि मैंने साधु-सन्तों के ऐसे प्रवचनों में जाना बन्द करना ही श्रेयस्कर समझा। सो, अब मैं ऐसे प्रवचन सुनने नहीं जाता और लोगों से चर्चा करने के बाद अनुभव करता हूँ कि मेरा निर्णय बिलकुल सही है।

लोग मुझसे पूछते हैं - ‘आप प्रवचन सुनने नहीं गए?’ मैं प्रति प्रश्न करता हूँ - ‘आप गए थे?’ वे हाँ में उत्तर देते हैं तो मैं पूछता हूँ - ‘महाराजजी की कौन सी बात आपको अच्छी लगी?’ जवाब मिलता है - ‘बात तो याद नहीं लेकिन महाराजजी व्याख्यान बहुत अच्छा देते हैं।’ मैं पूछता हूँ - ‘महाराजजी का कौन सा उपदेश आप अपने आचरण में उतार रहे हैं?’ जवाब मिलता है -‘उनका काम है कहना, अपना काम है सुनना। उन्होंने कह दिया, अपन ने सुन लिया। यह आचरण बीच में कहाँ से आ गया?’ मैं पूछता हूँ - ‘जब आप उनकी बात मानते नहीं तो सुनने क्यों जाते हैं?’ जवाब मिलता है - ‘जाना चाहिए। सब जाते हैं सो अपन को भी जाना चाहिए। नहीं जाएँगे तो लोग क्या कहेंगे? वहाँ जाकर आप भले ही कुछ मत सुनो। पर सबको नजर आना चाहिए कि आप धार्मिक हो, वहाँ गए हो।’ ऐसे जवाब सुनकर मुझे निराशा होती है।

मेरा विश्वास है कि इस देश के केवल सौ साधु-सन्त तय करलें तो देश की दशा और दिशा बदल सकती है। किन्तु एक भी सन्त ऐसा करने को तैयार नजर नहीं आता। मैं अनुभव करता हूँ कि सब अपने आप को, बड़ी सावधानी से केवल उपदेश तक सीमित रखते हैं, उपदेश से आगे बिलकुल नहीं बढ़ते। वे चाहें तो अतिक्रमण न करने, कर-चोरी न करने, यातायात के नियमों का पालन करने, वृक्षारोपण करने, पोलीथीन का उपयोग न करने जैसी ज्वलन्त बातों के लिए अपने अनुयायियों को संकल्पबद्ध कर सकते हैं। किन्तु एक भी साधु-सन्त यह जोखिम लेने को तैयार नजर नहीं आता। इन बिन्दुओं पर कुछ सन्तों से मेरी विस्तृत बात हुई। सबने निराश किया। मेरी धारणा है कि ये सब डरते हैं कि यदि इन्होंने लोगों को संकल्पबद्ध करना शुरु कर दिया तो इनके पाण्डाल खाली रह जाएँगे। कभी-कभी लगता है, सब अपनी-अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं।

मेरे एक आत्मीय, अपने समाज के धार्मिक आयोजनों की व्यवस्थाएँ अत्यन्त सतर्कता, चिन्ता, समर्पण और निष्ठा से करते हैं। कभी-कभी ये आयोजन एक-एक माह की अवधि के होते हैं। वे अपना काम-धन्धा छोड़ कर आयोजन की व्यवस्थाएँ देखते हैं। मैं ने जब-जब उनसे कहा - ‘आप तो प्रतिदिन महाराजजी के प्रवचन सुनते हैं। आप भाग्यशाली हैं जो आपको इतना धर्म-लाभ होता है।’ तब-तब (हाँ, प्रत्येक बार) उन्होंने कहा - ‘मैं कोई व्याख्यान-आख्यान नहीं सुनता। व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी लेता हूँ, सो व्यवस्थाओं तक ही सीमित रहता हूँ। बाकी सब फालतू बाते हैं। सब धतिंगेबाजी है।’ मैं हतप्रभ रह जाता हूँ और हर बार कहता हूँ - ‘आप सचमुच में धार्मिक हैं। इतनी स्पष्टता तथा ईमानदारी से सच बोल रहे हैं और अपना धर्म निभा रहे हैं।’


लोगों के आग्रह के बाद भी मैं प्रवचन सुनने नहीं जाता हूँ तो वे कहते हैं - ‘आप अधर्मी और धर्म विरोधी हैं।’ मैं प्रति प्रश्न करता हूँ -‘मैं प्रतिदिन अपने घर में देव पूजा करता हूँ, हनुमान चालीसा, आदित्यहृदय स्तोत्र और श्रीगणेश अथर्वशीर्ष का तथा प्रति मंगलवार और शनिवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ करता हूँ। वैष्णव सम्प्रदाय का हूँ सो तुलसीमाला पहनता हूँ। फिर भी मैं अधर्मी और धर्म विरोधी हूँ?’ वे कहते हैं - ‘क्या गारण्टी कि आप सच बोल रहे हैं? आपको यह सब करते हमने तो एक बार भी नहीं देखा!’ मैं कहता हूँ - ‘आप किसी भी दिन, अकस्मात चेकिंग कर लीजिए।’ वे कहते हैं -‘हमें अब यही काम रह गया है?’ मैं कहता हूँ -‘आप न तो मेरी बात पर विश्वास करने को तैयार हैं और न ही चेकिंग करने को। बताइए! आपकी तसल्ली के लिए मैं क्या करूँ?’ मुझे उत्तर मिलता है - ‘आप कहते हो तो मान लेते हैं। पर आप धार्मिक दिखते तो नहीं।’


मुझे लगता है, लोगों की इसी बात में हमारे साधु-सन्तों के प्रवचन आयोजनों का लक्ष्य उजागर हो जाता है। लोग धार्मिक बनें, इसमें किसी की रुचि हो न हो, लोग धार्मिक दिखें, इसमें सबकी रुचि अवश्य है। यह भी एक बड़ा कारण है जो मुझे ऐसे आयोजनों में जाने से रोकता है। मैं आचरण में, धार्मिक होने में विश्वास करता हूँ, प्रदर्शन में, धार्मिक दिखने में नहीं।


ऐसे क्षणों में मुझे विवेकानन्द याद आते हैं जिन्होंने साधु-सन्तों की अकर्मण्य सामाजिक भूमिका के प्रति असन्तोष प्रकट करते हुए कहा था कि देश के साधु-सन्तों को कृषि कार्य में लगा देना चाहिए और जिस किसान के पास बैल न हों, वहाँ बैल की जगह साधु-सन्तों को जोत देना चाहिए। विवेकानन्द का कहना था कि (उस समय) देश के प्रत्येक गाँव में औसतन तीन साधु पाए जाते हैं। ये साधु यदि इन गाँवों को अक्षर-ज्ञान देना शुरु कर दें तो पूरा देश मात्र एक महीने में साक्षर हो जाए।
हिन्दी साहित्य का भक्ति-काल, सामाजिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन के सन्दर्भों में साधु-सन्तों की नेतृत्ववाली भूमिका का सुन्दर उदाहरण है। साधु-सन्तों की बातों को लोग चूँकि श्रद्धा-भाव से सुनते हैं, इसलिए सामाजिक बदलाव में वे (साधु-सन्त) चमत्कारी भूमिका निभा सकते हैं।


माकपा के पूर्णकालिक कार्यकर्ता और प्रगतिशील लेखक जसविन्दरसिंहजी गए दिनों रतलाम आए थे। मैं उनके लेखों का मुरीद हूँ। उनसे मुलाकात हुई और ऐसी ही तमाम बातें हुईं तो उन्होंने प्रख्यात शायर मुनव्वर राना का यह शेर मुझे थमा दिया -
ये शेख-ओ-बरहमन हमें अच्छे नहीं लगते।

जितने हम हैं, ये उतने भी सच्चे नहीं लगते।

यह भली भाँति जानते हुए कि सभी साधु-सन्त एक जैसे नहीं होते। अपवाद सब जगह होते हैं और मैंने चीजों का साधारीकरण करने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए-मेरी धारणाएँ, मेरे विश्वास, मेरे निष्कर्ष मेरे साथ।

मैं जैसा भी हूँ, हूँ। मैं ऐसा ही अधर्मी और धर्म विरोधी ही ठीक हूँ।

आज मेरा चौंसठवॉं जन्‍म दिनांक है। मैं स्‍वयम् को यही उपहार दे रहा हूँ।

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धर्म और चक्करदार जलेबी

यह निठल्ला चिन्तन है। एकदम रूटीन वाला। फुरसतिया चिन्तन। जब करने को कोई काम न हो तो फिर यही काम हो जाता है।
हमारे जीवन में धर्म की भूमिका क्या है? वह हमें रास्ता दिखाता है या रास्ता रोकता है? बिना किसी बात के, गए कुछ दिनों से ये सवाल मेरी आँखों के आगे नाच रहे हैं।
नहीं। मैंने गलत कह दिया। बिना किसी बात के नहीं। बात तो हुई। तभी तो ये बातें मेरे मन में उगीं! कोई बात नहीं होती तो इन बातों की नौबत ही भला क्यों आती?
बढ़ती उम्र के साथ कुछ और बातों/चीजों में बढ़ोतरी होती जाती है। कुछ बीमारियाँ चुपचाप साथ हो लेती हैं और उन्हीं के साथ कुछ दवाइयाँ साथी बन जाती हैं। लेकिन इन सबसे पहले बढ़ोतरी होती है - चिन्ता में। परिवार छोटे हो गए, बच्चे पहले तो पढ़ने के लिए और अब पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरियों के लिए बाहर चले गए। घर में बूढ़े पति-पत्नी ही रह गए। ये पति-पत्नी अपनी जवानी के दिनों में अपने माता पिता का कहा/बताया काम करते थे, अब बच्चों का कहा/बताया काम करते हैं। तन साथ नहीं देता। मन तो उससे पहले ही साथ छोड़ चुका होता है। किन्तु काम तो करने ही पड़ते हैं। कभी बिजली का बिल भरना है , कभी टेलीफोन का तो कभी पानी का। कभी पेण्ट रफू करानी है तो कभी वाशिंग मशीन की दुरुस्ती के लिए मिस्त्री की तलाश करनी है। मन ही मन भुनभुनाते रहते हैं, खीझते, चिड़चिड़ाते रहते हैं और इसी तरह ‘भन्न-भन्न’ करते हुए सारे काम करते रहते हैं। ये और ऐसे सारे काम करते हुए एक चिन्ता सबसे ऊपर सवार रहती है - कहीं बीमार न पड़ जाएँ। पराश्रित न हो जाएँ। ऐसा कुछ हो गया तो सेवा-सुश्रुषा तो दूर की बात रही, पूछ-परख करने कौन आएगा? सो, बिना किसी के कहे, अपनी ही ओर से, जबरन ही बीसियों परहेज खुद पर लाद लेते हैं। हाथ-पैर चलते रहने चाहिएँ-यह बात चेतन और अचेतन में चैबीसों घण्टे बराबर बनी रहती है।
इसी चिन्ता से ग्रस्त हो, मैं और मेरी उत्तमार्द्ध प्रति शाम एक छोटे से जिम में जाते हैं। बीस-बीस मिनिट ट्रेड मिल पर चलते हैं और पाँच-पाँच मिनिट की कसरतें कुछ अन्य मशीनों पर करते हैं। सबसे अन्त में ‘योगा’ के नाम पर थोड़ी-बहुत कसरत कर लौट आते हैं। कोई पचास-पचपन मिनिट का यह उपक्रम हमें ‘फिट’ बने रहने के भ्रम का सुख प्रदान करता है।
गौशाला के सामने स्थित इस जिम पर जाने के लिए हमें काटजू नगर, सुभाष नगर, हाट रोड़ पार करना होता है।
कुछ दिन पहले, यही कोई पाँच-छः दिन पहले हमने जैसे ही काटजू नगर में प्रवेश किया तो सड़क बन्द मिली। ‘जगराते’ के लिए सड़क को तीनों ओर से घेर कर पाण्डाल बना दिया गया था। मंच बना था जिसके दोनों ओर, भारी-भरकम आकार वाले चार-चार स्पीकर चिंघाड़ रहे थे। सब तरफ मिला कर कोई अठारह-बीस हेलोजन जल रही थीं। बिजली का अस्थायी कनेक्शन लेने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। बिजली के तार से सीधे ही करण्ट ले लिया गया था। न तो मंच पर कोई था न पाण्डाल में। और तो और साउण्ड सिस्टम के पास भी कोई नहीं था। हमें चिढ़ तो हुई किन्तु मुख्य सड़क के पास ही छोटा रास्ता उपलब्ध था। हम उसी से निकल लिए।
किन्तु यह क्या? जैसे ही सुभाष नगर में जैसे ही घुसे तो पाया कि वैसा ही एक धर्म-पाण्डाल और मंच रास्ता रोके, तना खड़ा है। वैसी ही कानफोड़ू-प्राणलेवा ध्वनि व्यवस्था और वैसी ही चोरी की बिजली। फर्क एक ही था-काटजू नगर में मंच हमारे सामने था, यहाँ हम मंच के पिछवाड़े बाधित हो खड़े थे। यहाँ पास में कोई छोटा रास्ता नहीं था। श्रीकृष्ण सिनेमा के परिसर में होकर, लम्बा रास्ता पार कर हमने हाट रोड़ पकड़ी और जिम पहुँचे - लगभग दस/बारह मिनिट विलम्ब से।
लौटते में जानबूझकर बाजारवाला लम्बा रास्ता पकड़ा ताकि बिना किसी व्यवधान के घर पहुँच सकें। किन्तु ‘मेरे मन कछु और है, कर्ता के मन कछु और’ वाली बात हो गई। चाँदनी चौक वाले चक्कर पर पहुँचते ही देखा, हरदेवलाला की पीपली वाला चैराहा, चारों दिशाओं से बन्द था। यहाँ का पाण्डाल और मंच तो पहलेवाले दोनों पाण्डालों और मंचों का परदादा था और इसी कारण यहाँ लगी हेलोजन भी ‘शतकवीर’ बनी हुई थीं। हाँ, एक अन्तर था। पहलेवाले दोनों पाण्डालों के लिए एक-एक स्थान से ही बिजली चोरी की गई थी। यहाँ आठ-दस खम्भों से बिजली के तार जोड़े गए थे। पहलेवाले दोनों पाण्डालों के दोनों ओर ही स्पीकर लगे हुए थे जबकि यहाँ सड़क के दोनों ओर, छः-छः स्थानों पर दो-दो स्पीकर (याने कुल जमा चैबीस स्पीकर) टँगे हुए थे।
हमें कुछ देर रुकना पड़ा-यह तय करने के लिए कि अब कौन से रास्ते से घर जाया जाए। मैं कोई फैसला लेता उससे पहले ही, परम धर्मिक मानसिकतावाली मेरी उत्तमार्द्ध (वे, देव पूजा किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करतीं और एकादशी, पूर्णिमा पर सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करती हैं) भन्ना गई। मानो दसों दिशाओं से पूछ रही हो, कुछ इसी तरह से, जोर से बोलीं - ‘यह सब क्या है?’ उन्होंने न तो मुझसे यह सवाल किया था और न ही मैं इस सबके लिए जवाबदार ही था। किन्तु उनक सवाल का जवाब देनेवाला वहाँ और कोई था भी तो नहीं? सो मैंने तसल्ली से कहा - ‘धर्म का मामला है।’ वे बोलीं - ‘ये ऐसा कैसा धर्म है? धर्म रास्ता रोकता है या रास्ता देता/बताता है?’ झुंझलाहट तो मुझे भी भरपूर हो रही थी (मोटरसायकिल जो मुझे चलानी पड़ रही थी!) किन्तु हम दोनों मिलकर भी वहाँ कर ही क्या सकते थे? सो मैंने और अधिक तसल्ली से कहा - ‘धर्म के मामले में मेरी जानकारी आपसे कम है। आप बेहतर जानती हैं। मैं क्या कहूँ?’ चूँकि जवाब देने की मूर्खता मैं कर चुका था सो पलटवार भी मुझ पर ही होना था। वे अधिक तैश में बोलीं -‘मुझे चिढ़ा रहे हैं? तो सुनिए! यह धर्म नहीं है। यह तो अधर्म है। धर्म तो जीवन को आसान और सहज-सुगम बनाता है। अवरोधों को हटाता है। मनुष्य को चक्करों में डालता नहीं, चक्करों से बचाता है। वह चोरी-चकारी के लिए प्रेरित और प्रवृत्त नहीं करता। वह तो खुद प्रकाश है। उसे प्रकाशवान बनाने की कोई भी कोशिश पाखण्ड है।’
मुझे अच्छा तो लगा किन्तु अचरज भी हुआ। सुनता आया हूँ कि आवेश के आते ही व्यक्ति का विवेक साथ छोड़ देता है। किन्तु यहाँ तो ‘भरपूर आवेशित’ मेरी उत्तमार्द्ध, विवेकवान बनी हुई थीं। मैंने उकसाया - ‘तो यह जो आज अपन दोनों ने देखा है, वह धर्म नहीं, पाखण्ड है?’ तुर्शी-ब-तुर्शी वे अविलम्ब बोलीं - ‘और नहीं तो क्या? यह पाखण्ड के सिवाय और क्या है?’
इसके बाद मेरे पास कहने-सुनने को कुछ भी नहीं बचा था। श्रीमतीजी ने धर्म को व्याख्यायित कर दिया था। देख रहा था कि उनका गुस्सा कम नहीं हो रहा था। उन्हें सहज करने के लिए पूछा -‘बताओ! कौन से रास्ते से चलें?’ मानो उन्हें इस सवाल का अनुमान हो गया था। छूटते ही बोली -‘जिस रास्ते में धर्म आड़े नहीं आए।’ चौमुखी पुल की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए मेरी हँसी छूट गई। उन्होंने पूछा -‘क्यों? हँसे क्यों? मैंने कुछ गलत कहा?’ मैंने कहा -‘आपने बिलकुल गलत नहीं कहा। धर्म तो कभी किसी के आड़े नहीं आता। धर्म का निर्माण तो मनुष्य ने ही किया है। सो, वह तो अपने जन्मदाता के साथ ही चलता है। उसके आचरण से प्रकट होता है। धर्म के नाम पर किए जानेवाले कर्मकाण्ड, प्रदर्शन की शकल लेते हुए पाखण्ड में बदल जाते हैं। और तब, धार्मिक होने के बजाय धार्मिक दिखना अधिक जरूरी तथा अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।’
मेरी बात सुनकर वे आवेश-मुक्त हो बोलीं - ‘आप तो उपदेश देने लगे। जल्दी चलिए वर्ना मुझे डर है कि आप इन तीनों में से किसी एक मंच पर विराजमान न हो जाएँ। इस क्षण आपका धर्म यही है कि जल्दी घर पहुँचाएँ। भूख लग रही है। आप तो कुछ करेंगे-धरेंगे नहीं। रोटी मुझे ही बनानी है। आप घर पहँचाने का धर्म निभाइए ताकि मैं पेट भरने का उपक्रम सम्पन्न करने का धर्म निभा सकूँ।’
तब से लेकर अब तक, इतना सारा विवेचन हो जाने के बाद भी मैं, मनुष्य के जीवन में धर्म की भूमिका को लेकर निठल्ला चिन्तन किए जा रहा हूँ। यह ऐसी चक्करदार जलेबी है जिसका न कोई आदि है न कोई अन्त।
इन दिनों इसी में व्यस्त हूँ।
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यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

दादाजी का व्यवहार और मेरा भय

‘हाँ भई! हाँ, मुझे तो इस घर में होना ही नहीं चाहिए।’ अड़सठ वर्षीय दादाजी क्षुब्ध, कुपित और आक्रोशित होकर अपने, दस वर्षीय पोते पर कटाक्ष कर रहे थे-घर के बाहर, ऐन सड़क पर आकर। इतनी जोर से कि आसपासवाले और आने-जानेवाले, न चाहकर भी सुन लें। ऐसा ही हुआ भी। सुनकर कुछ ने चैंककर देखा और अगले ही क्षण अनदेखा-अनसुना कर अपने-अपने काम में लग गए। मैं वहाँ पहुँचा ही था। सो, सुना तो मैंने भी। मैने भी कुछ नहीं कहा। पोते की तरफ देखा। वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। समझता भी कैसे? उसकी उम्र तो अभी ‘अभिधा’ समझने की भी नहीं थी और दादाजी ‘व्यञ्जना’ में कहे जा रहे थे! सकपकाया हुआ पोता कुछ क्षण दरवाजे पर खड़ा रहा, फिर अन्दर चला गया।


दादाजी से मेरा परिचय कोई बीस वर्षों से है। घनिष्ठता और अनौपचारिक सहजता की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ यह परिचय आज घरोपा बन गया है। मैं उनके रसोईघर तक आता-जाता हूँ, खाने की कोई मनपसन्द चीज हो तो उठा लेता हूँ और बाज वक्त उनकी बहू से फरमाइशकर अपनी मनपसन्द चीज बनवा भी लेता हूँ। वास्तविकता तो भगवान ही जाने किन्तु मुझे लगता है कि मेरी ऐसी हरकतों से दादाजी ही नहीं, पूरा परिवार प्रसन्न होता है।


गुस्से के मामले में दादाजी अपने ‘पिता के आज्ञाकारी सुपुत्र’ हैं। उन्हें कब, किस बात पर गुस्सा आ जाएगा, वे खुद नहीं जानते। किन्तु जब तक उनकी पत्नी जीवित थीं तब तक वे फिर भी स्वयम् को नियन्त्रित कर लेते थे। कोई साढ़े चार-पाँच वर्ष पूर्व उनकी पत्‍नी की मृत्यु के बाद से उनके व्यवहार में अनपेक्षित परिवर्तन आ गया है जिसके चलते गुस्सा करना उनका मूल, प्राथमिक, अन्तिम तथा एक मात्र काम हो गया है। घर से बाहर वे पहले भी लोकप्रिय थे और आज भी हैं। किन्तु बाहरवालों के साथ किए जाने वाला उनका व्यवहार घर में तो पल भर भी नजर नहीं आता। यूँ तो हम सब दोहरी जिन्दगी ही जीते हैं - घर में कुछ और तथा बाहर कुछ और। किन्तु इतना अन्तर तो मैंने अब तक किसी के व्यवहार में नहीं देखा जैसा कि दादाजी के व्यवहार में है। घर में तो अब उनका ‘तामस स्वरूप’ ही स्थायी भाव बन गया है। इकलौता बेटा, उसकी पत्नी, एक पोती और एक पोता - सब चौबीसों घण्टों दहशत में ही रहते हैं। ये चारों कुछ भी करें, दादाजी सदैव कुपित, आक्रोशित ही रहते हैं। बेटा-बहू पूछते हैं - ‘आज खाने में क्या बनाएँ?’ दादाजी कहते हैं -‘जो तुम्हें जँचे, बनालो। मैं सब खाता हूँ।’ लेकिन जब थाली सामने आती है तो आँखें तरेरते हुए, सब्जी में से आलू निकाल कर एक तरफ कर देते हैं। इससे सबक लेकर अगले दिन बहू, भरवाँ शिमला मिर्च परोसने से पहले उसमें से आलू निकालने लगती है तो दादाजी कहते हैं -‘क्यों निकाल रही हो? मुझे आलू से परहेज थोड़े ही है।’ सवेरे बहू पूछती है -‘नाश्ते में क्या लेंगे? उपमा या पोहा?’ दादाजी कहते हैं -‘जो जँचे, बना लो। मैं सब खाता हूँ।’ बहू जब प्लेट में उमपा रखती है तो खिन्न हो, दादाजी कहते हैं -‘उपमा बना लिया? चलो, खा लेता हूँ। वैसे, पोहा बनाती तो अच्छा होता।’


‘थ्री इडियट्स’ लगी। पहले ही सप्ताह में बच्चों ने देखने का कार्यक्रम बनाया। चारों ने दादाजी से आग्रह किया। दादाजी ने तत्क्षण, दो-टूक मना कर दिया - ‘तुम लोग जाओ। सेकण्ड (नाइट) शो मुझे सूट नहीं करता। यह मेरे सोने का समय होता है।’ बहू ने कहा - ‘तो वहीं सो जाइएगा।’ दादाजी तैयार नहीं हुए। चारों ने सिनेमा हॉल में अपनी कुर्सियाँ सम्हाली ही थीं कि दादाजी ने बेटे को मोबाइल घनघनाया - ‘मेरे लिए टिकिट की व्यवस्था करो। मैं भी फिल्म देखने आ रहा हूँ।’ एडवांस बुकिंग वाले पहले सप्ताह में, करण्ट बुकिंग में एक टिकिट मिलना सम्भव ही नहीं था। बेटे ने कहा -‘टिकिट तो नहीं मिलेगा लेकिन आप तैयार रहिए। मैं आता हूँ। मेरे टिकिट पर आप फिल्म देख लीजिएगा। मैं घर पर रह लूँगा।’ दादाजी बिदक गए। फौरन बोले -‘मत आ। वहीं रह। तू मेरे साथ फिल्म नहीं देखना चाहता इसलिए बहाने बना रहा है।’ कल्पना की जा सकती है कि बेटे ने फिल्म कैसे देखी होगी और उसे कितना आनन्द आया होगा।


शाम को पोता पूछता है - ‘दादाजी! मैं खेलने जाऊँ?’ रूखेपन से दादाजी का जवाब होता है -‘मुझसे क्या पूछता है? जो तेरे जी में आए, कर।’ पोता किलकारी मारकर बच्चों के झुण्ड में शरीक हो जाता है। पाँच मिनिट भी नहीं बीतते कि दादाजी की टेर पूरे मुहल्ले में गूँजने लगती है - ‘क्यों रे! कहाँ चला गया तू? यह खेलने का वक्त है या पढ़ने का?’


छुट्टी के दिन, सवेरे-सवेरे पोती ने टेलिफोन की तरह हाथ बढ़ाया ही था कि दादाजी ने टोका -‘किसे फोन कर रही हो?’ सहमी हुई पोती ने घुटी-घुटी आवाज में कहा - ‘मेरी फ्रेण्ड का बर्थ डे है। उसे विश कर रही हूँ।’ ‘तो इसमें इतना डरने की क्या बात है? करो! करो! बर्थ डे पर ग्रीट करना तो बहुत अच्छी बात है।’ दादाजी ने कहा। उत्साहित हो, पोती ने फ्रेण्ड को फोन लगाया, विश किया और ‘कल मिलते हैं। तभी बात करेंगे।’ कह कर फोन रख दिया। दादाजी फौरन बोले -‘जब कल मिलना ही है और कल बात करनी ही है तो आज फोन करने की क्या जरूरत थी? फालतू में पैसा और वक्त बरबाद किया। ये फोन-वोन करने की आदत बदलो और पढ़ाई पर ध्यान दो।’


दादाजी यूँ तो रेल्वे में हेड क्लर्क थे किन्तु पढ़ाने का काम बहुत अच्छा कर सकते हैं। जिस भी घर में मिलने जाते हैं, वहाँ बच्चों को पढ़ाई में मदद करते हैं। किन्तु घर में ऐसा नहीं करते। बेटे ने जब-जब भी पोते को पढ़ाने का कहा तो हर बार जवाब मिला -‘मुझसे नहीं होता यह सब। अपने बच्चों की पढ़ाई की चिन्ता और व्यवस्था खुद करो।’ किन्तु अभी-अभी, जब परीक्षा शुरु हुई तो पोते को घेर कर बैठने लगे। उसकी कॉपियाँ देख-देख कर उसकी अध्यापिकाओं को कोसते हैं, उनकी आलोचना करते हैं और उनसे पूछे जाने वाले सवाल अपने पोते से करते हैं। अब दादाजी चाहते हैं कि उनका पोता लगातार छः-छः घण्टे उनके पास बैठकर पढ़े। इतनी देर, लगातार बैठ पाना और पढ़ते रहना पोते के लिए सम्भव नहीं होता। सो, वह ऊँचा-नीचा होने लगता है। उसकी ऐसी किसी भी हरकत पर दादाजी उसे प्रताड़ित करते हैं। उस दिन भी यही हुआ था। परेशान होकर पोते न कह दिया -‘क्या दादाजी! आप तो बहुत परेशान करते हैं।’ उसी के जवाब में, घर से बाहर, सड़क पर आकर दादाजी ने जोर से कहा था-‘हाँ भई! हाँ, मुझे तो इस घर में होना ही नहीं चाहिए।’


दादाजी का यह व्यवहार मुझे भयभीत कर रहा है। जो कुछ मैंने लिखा है, वह सब मेरे सामने ही हुआ है। उनके बेटे-बहू और पोती-पोते की दशा देखी नहीं जाती। किन्तु मैं उनकी कोई मदद भी नहीं कर पाता। दो-तीन बार दादाजी को टोका तो हर बार मासूमियत से प्रति प्रश्न किया -‘क्या कर रहा हूँ मैं? मैं तो कुछ भी नहीं करता। जो ये देते हैं, खा लेता हूँ। जैसा कहते हैं, वैसा कर लेता हूँ। मैं तो कभी कोई फरमाइश भी नहीं करता। ये जैसा रख रहे हैं, वैसा रह रहा हूँ। मैं तो किसी से कुछ नहीं कहता।’


मैं जब-जब उनसे मिल कर लौटता हूँ, अपने आप से डरने लगता हूँ। वे अड़सठ के हैं, मैं तरेसठ का। मैं उनके पीछे-पीछे ही चल रहा हूँ। कल को मैं भी दादाजी बनूँगा। क्या मैं भी ऐसा ही हो जाऊँगा? क्या मेरे कारण भी मेरे बेटे-बहू, पोते-पोती इसी तरह त्रस्त, चौबीसों घण्टे भयभीत, सहमे-सहमे रहेंगे? यह एक व्यक्ति विशेष का प्रकरण है या सामान्य मानव मनोविज्ञान का? क्या सब ऐसे ही हो जाते हैं?


दादाजी के इस व्यवहार का सीधा प्रभाव इस समय तो मुझ पर यह हुआ है कि घर में मेरा बोलना एकदम कम हो गया है। दो-दो, तीन-तीन घण्टे मैं बिना बोले रहने लगा हूँ। कहीं यह भी घरवालों पर अत्याचार तो नहीं?


जीवन के इस मोड़ पर स्वयम् के प्रति इतना अविश्वस्त, इतना भयभीत रहना मुझे असहज कर रहा है।
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महिला दिवस का क्षेपक

यह घटना मेरे कस्बे में आठ मार्च को घटी। आठ मार्च याने अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस।

इन दिनों यहाँ नौंवीं और ग्यारहवीं कक्षाओं की परीक्षाएँ चल रही हैं। ये परीक्षाएँ स्थानीय स्तर पर हो रही हैं, बोर्ड स्तर पर नहीं। जैसा कि चलन हो गया है, नकल करने (और अध्यापकों द्वारा नकल कराने) का काम धड़ल्ले से चलता है। इसकी रोकथाम के लिए जाँच मण्डलियाँ घूम-घूम कर छापामारी करती रहती हैं। इसी क्रम में एक जाँच मण्डली ने, एक शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पर छापा मारा। वहाँ परीक्षा प्रारम्भ हुए दस-पाँच मिनिट ही हुए थे। एक-एक कमरे का चक्कर लगाने के बाद मण्डली के सदस्यों को सुखद आश्चर्य हुआ कि लगभग सवा दो सौ (नवमीं कक्षा की लगभग 150 और ग्यारहवीं कक्षा की लगभग 70) लड़कियों में से एक भी लड़की नकल नहीं कर रही थी।

किन्तु जाँच मण्डली की यह खुशी कुछ पल भी नहीं ठहर पाई। अचानक एक लड़की कसमसाई तो मण्डली के एक अनुभवी सदस्य को सन्देह हुआ। उसने लड़की को टोका और उसकी तलाशी ली। लड़की की जेबों में से अधिक नहीं, कोई पाँच-सात पर्चियाँ बरामद हुईं। बस! फिर क्या था? एक के बाद एक, सब लड़कियों की तलाशी ली गई तो सब हक्के-बक्के रह गए और सबके छक्के छूट गए। लगभग प्रत्येक लड़की के पास से, नकल करने के लिए तैयार की गई एक से अधिक पर्चियाँ बरामद हुईं। सब पर्चियों को एकत्र किया गया गया तो विद्यालय के कार्यालय की, कचरे की दो टोकरियाँ (डस्ट बिन) लबालब भर गईं।

प्रकरण तो खैर एक भी लड़की का नहीं बना क्योंकि नकल करते हुए कोई नहीं पकड़ी गई थी किन्तु जाँच दल के सदस्य हतप्रभ थे। घटना का विवरण सुनाते हुए उनमें से एक ने मुझसे कहा - ‘नकल करने के मामले में लड़कों को दुस्साहस की सीमा छू जाते देखना तो अब हमारी आदत में आ गया है। किन्तु लड़कियाँ ऐसा साहस प्रायः नहीं करतीं। लेकिन यहाँ? बाप रे! इन्होंने तो लड़कों को एक मुश्त, थोक के भाव, पीछे छोड़ दिया। यहाँ तो सबकी सब साहसी निकलीं।’

यह समाचार अलगे दिन अखबारों में तीन कॉलम शीर्षक सहित प्रकाशित हुआ। मुझे अपना जमाना याद आ गया। तब यदि कोई लड़का नकल करते पकड़ा जाता तो उसके माँ-बाप लज्जा के मारे, दो-तीन दिनों तक सहज नहीं हो पाते थे और लड़के की दुर्गत हो जाती थी। किसी लड़की के नकल करने की बात तो तब कल्पनातीत ही होती थी। आज मैं सोच रहा हूँ कि अखबारों में यह खबर पढ़कर कितने पालकों को शर्म आई होगी और कितनों ने अपनी लड़कियों को टोका होगा।

मेरी चिन्ता सुन कर मेरी उत्तमार्द्ध ने अपने सम्पूर्ण आत्म विश्वास से कहा - ‘माँ-बाप पूछते और उन्हें शर्म तब आती जब उन्होंने अखबार पढ़ा होगा। मँहगाई के इस जमाने में अखबार खरीद पाना उनके बस की बात नहीं। और रही पढ़ने की बात! तो उन बेचारों को दो जून की रोटी और अपनी बेटी की फीस की जुगाड़ से फुर्सत मिले तो अखबार पढ़ें। और योग-संयोग से यदि किसी ने पढ़ भी लिया होगा तो यही कहा होगा कि उनकी बेटी ने कौन सा अनोखा काम कर दिया? सारा जमाना यही तो कर रहा है?’

मैं निरुत्तर हो गया।

यह सब मेरे कस्बे में हुआ और ऐन अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हुआ।
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हिन्दी का आश्वस्ति पुरुष

भगवान भला करे, कर सलाहकार इन्दरमलजी जैन वकील साहब का जो उन्होंने मुझे आयोजन का निमन्त्रण-पत्र दे दिया और मुझे अनामन्त्रित श्रोता होने से बचा लिया। यह निमन्त्रण-पत्र नहीं मिलता तो भी मैं उस आयोजन में जाता ही। आयोजन था - रतलाम चार्टर्ड अकाउण्टण्ट्स सोसायटी और कर सलाहकार परिषद् रतलाम द्वारा, केन्द्रीय बजट 2010 के प्रस्तावों पर परिचर्चा। बजट के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव मुझ पर भी वे ही और उतने ही होते हैं जो एक सामान्य मध्यमवर्गीय व्यक्ति पर होते हैं। किन्तु ऐसी परिचर्चाओं का लाभ मुझे मेरे बीमा व्यवसाय में मिलता है। ऐसी परिचर्चाओं में मिलनेवाली, विशेषज्ञता वाली महत्वपूर्ण सूचनाएँ मेरे भावी और वर्तमान पालिसीधारकों के बीच मुझे समझदार और प्रभावी बनाती हैं।


सूचनाएँ तो इस बार भी मुझे बहुत सारी मिलीं किन्तु इस बार मुझे, हिन्दी के सन्दर्भ में बोनस भी मिला। यह बोनस था - इन्दौर के युवा कर सलाहकार श्री मनीष डफरिया को सुनने का रोमांचक और आश्वस्तिदायक अनुभव।



मनीष अभी चालीस पार भी नहीं हुए होंगे। उनकी जड़ें रतलाम में ही हैं। उनका जन्म रतलाम में ही हुआ। उनके बारे में न तो पहले कुछ सुना और न ही उन्हें देखा। बस, दैनिक भास्कर में उनकी कुछ टिप्पणियाँ अवश्य पढ़ी थीं। किन्तु मुझ जैसा कुटिल व्यक्ति, ऐसी टिप्पणियों से आसनी से प्रभावित नहीं होता। सो, मैने मनीष का नोटिस कभी नहीं लिया। किन्तु सात मार्च को उनका व्याख्यान सुनने के बाद उनकी अनदेखी कर पाना न तो उस समय सम्भव हो पाया और न ही आगे हो सकेगा।



स्थिति यह रही कि कार्यक्रम समाप्ति के बाद मनीष से मिलने के लिए मैं देर तक रुका रहा और उनके उद्बोधन के लिए उन्हें विशेष रूप से बधाइयाँ दीं।



अपने उद्बोधन के पहले ही वाक्य से मनीष ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। मुझे उम्मीद थी कि अपनी बात कहने के लिए वे अंग्रेजी का ही सहारा लेंगे जिसे समझने के लिए मुझे अतिरिक्त रूप से सतर्क/सावधान रहना पड़ेगा और अतिरिक्त परिश्रम भी करना पड़ेगा। किन्तु मनीष ने सुखद रूप से मुझे नाउम्मीद किया। वे हिन्दी में ही न केवल शुरु हुए अपितु आज के दौर के युवाओं की अपेक्षा बहुत ही सुन्दर और लगभग निर्दोष हिन्दी में बोले। किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने अंग्रेजी से परहेज किया। वे अंग्रेजी में भी बोले और पूरी सहजता और धड़ल्ले से बोले। कोई पचहत्तर मिनिट का उनका व्याख्यान सचमुच में धाराप्रवाह था। वे या तो साँस लेने के लिए रुके या पानी पीने के लिए या फिर बिजली चले जाने के कारण। किन्तु केवल धराप्रवहता ही उनके व्याख्यान की विशेषता नहीं थी। स्पष्ट उच्चारण, धीर-गम्भीर स्वर, शब्दाघात का उन्होंने सुन्दर उपयोग किया। उन्हें शायद भली प्रकार पता था कि उनका विषय भाषा के सन्दर्भ में नीरस और ‘निर्जीव तकनीकी’ है। सो, रोचक उदाहरणों से उन्होंने इन दोनों दोषों को सफलतापूर्वक दूर किया। यही कारण था कि सवा घण्टे के उनके भाषण में लोगों को झपकी लेने का एक भी क्षण नहीं मिल पाया। उन्होंने श्रोताओं को भरपूर गुदगुदाया और लोगों की मुक्त कण्ठ वाहवाही लूटी। उनकी सफलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे सहायक वक्ता थे किन्तु प्रमुख वक्ता के रूप में पहचाने और स्वीकार किए गए। किन्तु जिस बात ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया वह थी - उनका व्याख्यान, अधिकार भाव और आत्म विश्वास से लबालब था। ये दोनों तत्व उन्हीं व्यक्तियों के व्याख्यानों में आ पाते हैं जिन्हें अपने विषय की केवल विशेषताएँ ही नहीं, कमियाँ और दोष भी मालूम हों। विषय मनीष पर क्षण भर भी हावी नहीं हो पाया। उल्टे, पूरे पचहत्तर मिनिट तक वे विषय को, एक कुशल नट की तरह, मन माफिक अन्दाज में अंगुलियों पर नचाते रहे।
बजट जैसे, तकनीकी शब्दावली वाले विषय पर निर्दोष हिन्दी में ऐसे अधिकार भाव और आत्म विश्वास से धाराप्रवाह बोलते हुए मैंने अब तक किसी को नहीं देखा। सो, मनीष डफरिया तो मेरे लिए ‘हिन्दी के आश्वस्ति पुरुष’ बन कर सामने आए। यही मेरे लिए बोनस रहा। हिन्दी की वर्तमान दुर्दशा को लेकर मेरे मन में जो निराशा, क्षोभ और आक्रामक-आवेश उपजता रहता है, मनीष के इस व्याख्यान से इस सबमें थोड़ी देर के लिए ही सही किन्तु भरपूर कमी मैने अपने आप में अनुभव की।



मुझे बाद में मालूम हुआ कि मनीष को ऐसे व्याख्यान देने का यथेष्ठ अभ्यास है और उनके श्रोताओं की संख्या प्रायः की ढाई-तीन सौ तो होती ही है। वे इन्दौर स्थित, आई आई एम में, आयकर विषय के प्राध्यापक भी हैं।



मनीष की सफलता और शिखरों पर उनकी कीर्ति पताका का लहराना सुनिश्चित और असंदिग्ध है। उम्मीद करें कि वे हिन्दी का हाथ और साथ कभी नहीं छोड़ेंगे अपितु हिन्दी को तथा हिन्दी के माध्यम से खुद को विशिष्ट रूप से स्थापित कर वैसी ही अपनी पहचान भी बनाएँगे।



मनीष! अच्छी हिन्दी आपकी और आप हिन्दी की पहचान बनें। यह आज की आवश्यकता है।



शुभ-कामनाएँ।
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मूर्तिभंजक शिल्पकारों का देश

देश के एक सौ सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों की सूची बनाने के लिए, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के परिणामों वाला समाचार मैंने ध्यान से, एकाधिक बार पढ़ा। पढ़कर मुझे खुशी कम और हैरानी तथा चिन्ता अधिक हुई।


इस सूची के प्रथम दस व्यक्तियों में एक भी राजनीतिक व्यक्ति शामिल नहीं है। प्रथम दस में वैज्ञानिकों, उद्यमियों, कलाकारों, खिलाड़ियों को स्थान मिला है जबकि राजनीतिक व्यक्तियों को, सूची के अन्तिम दस में स्थान मिला है। मायावती ने, अन्तिम से प्रथम अर्थात् सौवें स्थान पर कब्जा किया। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को अवश्य ही सातवाँ स्थान मिला है किन्तु उन्हें ‘राजनीतिक’ मान लेना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है। मेरे कस्बे में आनेवाले किसी भी अखबार ने ग्यारहवें से लेकर नब्बेवें स्थान तक की सूची नहीं छापी है इसलिए नहीं पता कि इन अस्सी स्थानों पर कौन-कौन विराजमान हुए।


व्यावसायिक वर्गों की सूची में शिक्षकों को पहला, अग्नि शमन सेवाओं को दूसरा, किसानों को तीसरा, वैज्ञानिकों और सशस्त्र बलों को संयुक्त रूप से चैथा स्थान मिला है। चिकित्सकों, विमानचालकों और शल्य चिकित्सकों को इनके बाद स्थान मिला है।
‘रीडर्स डाइजेस्ट’ ने साफ-साफ कहा कि सर्वेक्षण के ये परिणाम पूरी तरह से वैज्ञानिक नहीं हैं किन्तु इसके बावजूद, ये जनमानस को प्रतिबिम्बित तो करते ही हैं।


इस सूची पर मैंने जितने भी मिलनेवालों से चर्चा की, राजनीतिक लोगों को खारिज किए जाने पर प्रत्येक ने, चहकते हुए प्रसन्नता ही व्यक्त की। साफ था कि यदि उन्हें भी सर्वेक्षण में शामिल होने का मौका मिलता तो वे भी नेताओं को अन्तिम स्थान ही देते।


मैं हैरान हूँ। चिन्तित भी। मैं अपने राजनेताओं को प्रथम दस में देखना चाहता हूँ। हमने संसदीय लोकतन्त्र अपनाया है जिसके संचालन और क्रियान्वयन का एक मात्र माध्यम है - राजनीति। यह त्रासद विडम्बना ही है कि आज राजनीति सबसे गन्दी चीज और राजनेता सबसे घटिया, सर्वथा अविश्वसनीय साबित किए जा चुके हैं। हमारे नेताओं को हमने ही तो ‘नेता’ बनाया हुआ है! हम ही इन्हें चुन कर भेजते हैं। जैसे हम हैं, वैसे ही हमारे नेता हैं। यदि ‘नेता’ हमारे समाज का सबसे घटिया और हेय कारक बन कर रह गया है तो यह तो हमारी ही विफलता नहीं है? हम अपने आप को ही नहीं लतिया रहे हैं? हम कैसे लोग हैं कि अपनी ही बनाई हुई मूर्तियों को अपूजनीय घोषित कर, उन्हें तोड़ कर खुश हो रहे हैं? हम ही तो वह कच्चा माल हैं जिससे नेता नामवाला ‘फिनिश्ड प्रॉडक्ट’ ‘लोक फैक्ट्री’ से बाहर आ रहा है। अपनी ही बनाई मूर्तियों को तोड़कर खुश होनेवाले हम लोग कब विचार करेंगे कि अपनी घटिया गुणवत्ता के लिए खुद मूर्ति कभी दोषी नहीं होती। कहा गया है कि मूर्ति इसलिए पूजनीय नहीं होती क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। वह तो इसलिए पूजनीय होती है क्योंकि वह हथौड़े-छेनियों के असंख्य प्रहार सहती है। हम मूर्तियाँ तो बनाते हैं किन्तु तराशने का परिश्रम करने से बचते हैं। भाटे (पत्थर) पर सिन्दूर पोत कर उसे देवता बना कर छोड़ देते हैं और जब यह देवता हमारी मनोकामनाएँ पूरी नहीं करता तो हम देवता को ही खारिज कर देते हैं।


मेरी सुनिश्चित धारणा है कि यदि ‘लोक’ अपनी भूमिका नहीं निभाएगा तो ‘तन्त्र’ हावी होकर ‘लोकतन्त्र’ को ‘तन्त्रलोक’ में बदल देगा। दिन-प्रति-दिन, आईएएस अफसरों के बिस्तरों, पेटियों से बरामद हो रहे करोड़ों रुपये यही साबित भी कर रहे हैं।


सो, नेताओं को सर्वाधिक अविश्वसनीय साबित कर, खुश होने के बजाय हमें अपनी गरेबाँ में झाँकना पड़ेगा और नेताओं को चुनने के बाद उन्हें नियन्त्रित करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ेगी। हमारी, स्वार्थपरक चुप्पी के चलते प्रत्येक नेता यह मानने लगता है कि वह जो कर रहा है, कह रहा है वही उचित है क्योंकि उसकी किसी भी कारस्तानी पर लोग तो प्रतिवाद करते ही नहीं। मेरा सुनिश्चित मानना है कि हममें से प्रत्‍येक को ‘राजनीतिक’ होना चाहिए और होना पडेगा। ध्‍यान देनेवाली बात है कि मैं ‘राजनीतिक’ होने की बात कर रहा हूँ, ‘राजनीतिज्ञ’ होने की नहीं। आज हम राजनीति को सडांध मार रही गन्‍दी नाली मान कर, अव्‍वल तो उसके पास से गुजरने में ही परहेज करते हैं और यदि गुजरना पडता है तो नाक पर रूमाल रख कर, उससे ऑंख बचाकर निकल जाते हैं। अपने इस व्‍यवहार पर हमें अविलम्‍ब ही पुनर्विचार करने की आवश्‍यकता है।

मुझे इस बात की तो खुशी है कि विश्वसनीय व्यावसायकि वर्गों की सूची में शिक्षकों को पहला स्थान मिला किन्तु इससे अधिक चिन्ता इस बात पर हुई कि न्यायपालिका और पत्रकारिता को इस वर्ग-सूची में कहीं स्थान नहीं मिला। मैं बीमा एजेण्ट हूँ और प्रतिदिन अनेक लोगों से मिलता हूँ। मैंने अनुभव किया है कि तमाम स्खलनों के बाद भी लोगों को आज तीन संस्थानों में सर्वाधिक विश्वास और सर्वाधिक अपेक्षा है। ये हैं शिक्षक, न्यायपालिका और पत्रकारिता। किन्तु इस सूची में अन्तिम दो कहीं नहीं हैं।


तो क्या हमारे लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ रसातल में धँस गए हैं? विधायिका (राजनेता) का नम्बर अन्तिम दस में आता है, कार्यपालिका (अधिकारी/कर्मचारी) के करिश्मों से अखबार पटे पड़े हैं। न्यायपालिका और पत्रकारिता को सर्वाधिक विश्वसनीयता की इस सूची में स्थान ही नहीं मिला।


क्या अब भी हम हाथ पर हाथ धरे, चुप ही बैठे रहेंगे? हम किस अवतार की, कौन से चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
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यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

वे बताएँगे और मनवाएँगे हमारे त्यौहार

क्या धुलेण्डी और क्या रंग पंचमी! दोनों ही इस बार लगभग बेरंगी निकलीं। कोई दूसरा त्यौहार होता तो इतना नहीं खटकता किन्तु होली ही तो वह इकलौता त्यौहार है हमारा जिसमें सब एक रंग हो जाते हैं। बाकी सारे त्यौहार तो कहीं न कहीं सीमा रेखा खींचे रखते हैं। होली ही तो वह त्यौहार है जो सबको निर्बन्ध, उन्मुक्त होने का और मुक्त कण्ठ से ‘होली है’ चिल्लाने का अवसर समान रूप से उपलब्ध कराता है। त्यौहारों और उत्सवों की भीड़ में यही तो एकमात्र समाजवादी त्यौहार है! किन्तु इस बार इसके रंगों की शोखी में और लोगों के उत्साह में एकदम कमी अनुभव हुई।


धुलेण्डी को सवेरे अचानक ही तबीयत गड़बड़ हो गई। रक्त चाप अचानक ही बढ़ गया। इतना कि बिस्तर पकड़ना पड़ा। दीपावली की तरह होली भी हमारी कॉलोनी में सामूहिक रूप से मनती है। पूरी कॉलोनी के पुरुष पूरी कॉलोनी में घर-घर जाकर होली खेलते हैं और मुँह मीठा करते हैं। प्रत्येक गली में, मकानों के सामने मिठाइयों और नमकीन पकवानों की टेबलें सज जाती हैं।


टेबलें तो इस बार भी उतनी ही सजीं लेकिन आने वालों की संख्या लगभग एक तिहाई रह गई। उन्हीं में से कुछ कृपालुओं ने अन्दर आकर मुझे रंग लगाया। मुझे लगता रहा, बाहर सब कुछ परम्परानुसार ही चल रहा होगा। किन्तु कोई पाँच-सात मिनिट में ही बड़ा बेटा वल्कल और मेरी उत्तमार्द्ध अन्दर आ गए। मैंने टोका - ‘दोनों अन्दर आ गए हो, बाहर, घर के सामने अपनी ओर से कौन खड़ा है?’ वल्कल ने कहा - ‘सब निपट गया पापा।’ मैंने अविश्वास से पूछा - ‘इतनी जल्दी? ऐसे कैसे?’ वल्कल ने जवाब दिया - ‘इस बार तो लोग आए ही नहीं।’ इस कॉलोनी में यह मेरी छठवीं होली थी। इससे पहलेवाले पाँच सालों में, हर बार हम लोगों को, आनेवालों का स्वागत करने में बीस-पचीस मिनिट लगते थे । उसके बाद भी लगता था कि कई लोग छूट गए हैं। किन्तु इस बार यह क्या हुआ? मुझे लगा कि मेरी तबीयत तो यह समाचार सुनने के बाद खराब होनी चाहिए थी।


लगभग पूरा दिन सोता रहा। किन्तु जब-जब भी आँख खुली, गली में आने-जानेवालों की हलचल ध्यान से सुनने की कोशिश करता रहा। मुझे निराशा मिली। मेरी गली के बच्चों के अलावा, हुड़दंगियों की एक भी टोली नहीं निकली। उधर टेलीविजन पर होली के सिवाय कुछ भी नहीं था। प्रत्येक चैनल पर होली के रंग, होली की बहार और होली की मस्ती छाई हुई थी। चैनलें तो सारे देश में होली की मौजूदगी की खबर दे रही थीं जबकि मेरी गली में सन्नाटा था।


रंग पंचमी तो इससे भी अधिक फीकी निकली। दिन भर घर में ही था। प्रतीक्षा करता रहा कि कोई न कोई तो रंग लगाने आएगा ही। लेकिन कोई नहीं आया। घबरा कर दो-एक बार गली में, इस छोर से उस छोर तक देखा - एक भी ऐसा संकेत या हलचल नहीं जो रंग पंचमी होने का अहसास कराए।


होली पर दोनों बेटे घर आए जरूर किन्तु मानो खानापूर्ति करने। वल्कल एक बहुराष्ट्रीय कम्प्यूटर कम्पनी में काम करता है। वह शनिवार की रात आठ बजे पहुँचा। आया बाद में, जाने की तैयारी पहले करने लगा। उसे धुलेण्डी के दिन ही लौटना था। सो, कौन सी ट्रेन, कितने बजे जाएगी, बार-बार यही चिन्ता करता रहा। इतना ही नहीं, नौकरी का काम भी लेकर आया जिसे शनिवार और रविवार की रातों में देर तक लेप टॉप पर निपटाता रहा।


छोटा बेटा रविवार रात कोई दस बजे पहुँचा। वह इंजीनीयरिंग के तीसरे साल (छठवें सेमेस्टर) में है। कोचिंग क्लास और डांस क्लास की एक प्रतियोगिता के कारण वह जल्दी नहीं आ पाया। वह आया तब तक मोहल्ले की होली जल चुकी थी। वह लस्त-पस्त हालत में आया था। आते ही जो सोया तो धुलेण्डी की दोपहर में उठा। तब तक सामूहिक होली मिलन की खानापूर्ति हो चुकी थी और गली में सन्नाटा छा चुका था। वल्कल तो चूँकि सामूहिक होली मिलन में घर का प्रतिनिधित्व कर रहा था सो उसे तो रंग लगा। किन्तु तथागत पर तो रंग का एक छींटा भी नहीं पड़ा।


घर में आनन्द तो छाया हुआ था किन्तु होली का नहीं, दोनों बेटों के आने का। मुझे लगा (और अभी भी लग रहा है) कि सब कुछ बदल रहा है। आनेवाले दिनों में, त्यौहारों पर बच्चे आएँ या न आएँ किन्तु बच्चों का घर आना ही त्यौहार होगा।


धुलेण्डी को मोबाइल दिन भर ‘बीप-बीप’ करता रहा। धड़ाधड़ एसएमएस आए जा रहे थे। एसएमएस के शुभ कामना सन्देश मुझे नहीं रुचते। फिर भी, भेजनेवाले का नाम जानने की उत्सुकता के अधीन एसएमएस पढ़ता रहा। सन्देशों की भीड़ में एक सन्देश ऐसा मिला जिसमें होली की बधाई के स्थान पर नसीहत दी गई और आग्रह किया गया था कि इस नसीहत को अधिकतम लोगों तक पहुँचाऊँ। नसीहत इस प्रकार थी - ‘कृपया होली, रंग पंचमी पर रंग खेलने से बचें और दूसरों को भी निरुत्साहित करें। अपना एक और अमूल्य दिन व्यर्थ न जाने दें। कामकाजी (प्रोडक्टिव) बनें। समय, ऊर्जा और पानी नष्ट न करें। कृपया इस सन्देश को अधिकाधिक लोगों को फारवर्ड भी करें।’


बदलाव की बयार चल पड़ी है। त्यौहार खानापूर्ति बन कर रह जानेवाले हैं। टेलीविजन की चैनलें और रेडियो के कार्यक्रम ही हमें त्यौहारों की सूचना देंगे और वे ही हमारे त्यौहार मनवाएँगे भी।
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