ब्याज के भरोसे मूल गँवाना

यह आख्यान हम सबने कई बार सुना होगा और आश्चर्य नहीं कि हममें से कइयों इसे प्रयुक्त भी किया हो।

कवि रहीम का पूरा नाम अब्दुुल रहीम खानखाना है। वे अकबर के नवरत्नों में से एक थे। वे बड़े दानशील थे। दान देते समय लेनेवाले का चेहरा नहीं देखना उनकी विशेषता थी। नतनयन, नजर झुकाए दान देते थे। कवि गंग, अकबर के दरबारी कवि थे। इनके एक छप्पय पर प्रसन्न होकर रहीम ने इन्हें 36 लाख रुपये भंेट किए थे। रहीम की इस दानशीलता और विनम्रता से प्रभावित हो कवि गंग ने रहीम से पूछा -

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी देन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचो कियो, त्यों-त्यों नीचे नैन।।

बड़ी सरलता से रहीम ने उत्तर दिया -

देनहार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन।
लोग भरम हम पै करें, ता सों नीचे नैन।।

सम्राट अकबर के रत्न को अपने पद का गुमान नहीं था। उन्हें अपनी अकिंचनता का भान हर पल बना रहता था।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में यह उल्लेख अनेक बार पढ़ा। उन्हें देश-विदेश से बुलावे आते थे। लेकिन इन बुलावों में यदि आकाशवाणी का बुलावा होता तो वे सब बुलावों को परे सरका देते। कहते कि आकाशवाणी ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई और सुबह-सुबह देश के लगभग प्रत्येक घर में पहुँचाया। वे भला इस बात को कैसे भूल सकते हैं? उन्होंने कभी भी ‘आकाशवाणी’ की उपेक्षा, अनदेखी की न ही कभी खुशामद करवाई। ‘आकाशवाणी’ के साथ वे सदैव विनम्रतापूर्व कृतज्ञ भाव से पेश आते रहे।

डॉक्टर रामाचरण राय मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मन्त्री थे। वे दौरे पर जब भी रायपुर जाते, अपने परामर्श केन्द्र पर कुछ देर बैठकर कुछ मरीज जरूर देखते। सरकारी अस्पताल के निरीक्षण के दौरान एक वृद्धा उनके सामने आ खड़ी हुई। उसने शिकायत की कि अस्पताल का डॉक्टर ढंग से उसका इलाज नहीं कर रहा है। उसने छत्तीसगढ़ी में कहा कि उस डॉक्टर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। रामाचरणजी ने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि वह डॉक्टर पर भरोसा करे। बहुत अच्छा डॉक्टर है और उसका (वृद्धा का) इलाज वही करेगा। उन्होंने वृद्धा के (ईलाज के) कागज देखे, डॉक्टर से पूछताछ कर एक गोली सुझाई। डॉक्टर से ही कागजों पर लिखवाई, वृद्धा को फिर ढाढस बँधाया और चले आए। लेकिन भोपाल पहुँचकर वे उस वृद्धा को नहीं भूले। फोन पर डॉक्टर से बराबर जानकारी लेते रहे। उन्होंने मन्त्रीपद का रोब जताने के बजाय पद की शालीनता, मर्यादा और ‘डॉक्टर’ की सार्वजनिक प्रतिष्ठा की सुरक्षा की।

एक परिचित ने यह अविश्वसनीय घटना सुनाई थी। एक सुबह ‘ऊँचे घरों’ के दीखनेवाले कुछ लोग उनके मुहल्ले में आए। उन्होंने घरों के सामने आवाज लगाकर भोजन माँगा। लोगों ने जो भी दिया, दोनों हाथ फैलाकर लिया, बिना किसी बर्तन के और वहीं बैठकर खाया। पानी भी माँग कर पीया। मुहल्ले के लोग उन्हें अचरज और विश्वास से देख रहे थे किन्तु वे सबसे बेपरवाह, ‘अपना काम’ करते रहे। मेरे इन परिचित से रहा नहीं गया। कहा - “शकल, व्यवहार और कपड़ों से तो आप लोग ‘खाते-पीते घरों के’ लग रहे हैं। आप यह सब क्या कर रहे हैं?” जवाब मिला कि वे सब सचमुच में ‘खाते-पीते घरों के’ ही हैं। लेकिन शुरु से या खानदानी धनी नहीं हैं। वे सब पड़ौसी प्रदेश से आये थे। आज जरूर वे एक ही शहर में हैं लेकिन सब अलग-अलग गाँव से आकर उस शहर में बसे। सबका बचपन अभावों में, कठिनाइयों के बीच बीता। जिन्दगी ने कदम-कदम पर उनकी परीक्षा ली। कठिन परिश्रम और विकट संघर्ष करते हुए आज की दशा में पहुँचे। सबके सब करोड़पति हैं। वे वर्ष में दो बार किसी दूसरे प्रान्त में, अनजान जगहों पर जाकर इसी तरह माँग कर खाते हैं ताकि अपनी हकीकत भूल न सकें। 

बरसों पहले की बात है। स्वर्गीय दिलीप सिंह भूरिया तब मेरे इलाके के सांसद थे। वे आदिवासी थे। एक सरकारी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम से पहले उनके इलाके का एक आदिवासी दल नृत्य प्रस्तुत कर रहा था। ढोल की थाप, थालियों-झालरों की झनकार पर आदिवासी युवा-युवतियाँ खुद को भूल, मद-मस्त नाच रहे थे। लोग मन्त्र-मुग्ध भाव से नाच में खोए हुए थे। किसी को पता ही नहीं चला और अचानक ही दिलीप भाई तेजी से उठे, अपनी धोती घुटनों तक चढ़ाई, दल में शामिल हो गए और नाच खत्म होने तक नाचते रहे। अपनी कुर्सी पर लौटे तो पसीने में लथपथ थे और हाँफ जरूर रहे थे किन्तु चेहरे पर झेंप या हीन भाव की एक लकीर भी नहीं। परम प्रसन्न, सन्तुष्ट मुद्रा में। लोग तो खुश थे और तालियाँ बजा रहे थे किन्तु तमाम अधिकारी हतप्रभ, चकित थे। कलेक्टर ने जिज्ञासु नजरों से देखा तो बोले - ‘मेरा क्षेत्र, मेरे लोग, मेरे गाँव के साथी नाचें और मैं चुपचाप बैठा देखता रहूँ? अरे! मैं इनमें शामिल नहीं होऊँ तो मैं तो मैं ही नहीं रहूँ!’ कलेक्टर दिलीप भाई की नजरों की ताब नहीं झेल सका। उसकी नजरें नीची हो गईं।

हमारे परिवार के अधिकांश सदस्य आज भले ही  आय-कर चुका रहे हैं लेकिन भीख माँगना हमारे परिवार का पेशा था। जैसा कि दादा (श्री बालकवि बैरागी) कहते हैं - उन्हें पहला खिलौना जो मिला वह था, भीख माँगने का कटोरा। लोग ऐसी बातें छुपाते हैं लेकिन दादा हैं कि मौका मिलने पर यह बात बताना नहीं चूकते। गए नौ महीनों में उन्हें चार सम्मान मिले हैं और चारों के चारों लखटकिया। लेकिन दादा आज भी अपने खरीदे हुए कपड़े नहीं पहनते। वे या तो माँगे हुए कपड़े पहनते हैं या कहीं से मिले हुए। कोई उनसे पूछता है तो ठहाका लगा कर कहते हैं - ‘इससे तबीयत और दिमाग, दोनों दुरुस्त रहते हैं।’

प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायक मनोज तिवारी ने यह सब याद दिला दिया। 2014 से वे सांसद (लोक सभा) हैं। एक आयोजन में कार्यक्रम संचालिका ने उनसे एक गीत गाने का आग्रह कर दिया। इसी बात पर वे कुपित हो गए। माइक पर संचालिका को खूब फटकारा। सांसद पद की गरिमा और प्रतिष्ठा का हवाला दिया। उन्हें यह बात अपमानजनक लगी कि उन्हें भोजपुरी लोकगायक के रूप में पहचाना, पुकारा गया। आवेश में वे भूल गए कि ‘सांसदी’ विश्वासघाती प्रेमिका की तरह साथ छोड़ेगी ही छोड़ेगी और लोक गायकी ही चिता तक उनके साथ जाएगी। उनके आदेश के अधीन संचालिका को मंच छोड़ना पड़ा। सारी दुनिया ने यह सब देखा और अभी देख रही है। उनके इस व्यवहार पर सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है। उनका कहा सब कुछ वाजिब हो सकता है किन्तु इस बात से वे खुद कैसे इंकार कर सकते हैं कि उनकी पहली पहचान उनका भोजपुरी लोक गायक होना ही है। इतना ही नहीं, इससे मिली लोकप्रियता और इसीसे बनी उनकी छवि ही उनकी उम्मीदवारी की एकमात्र योग्यता थी। उनसे उनकी राजनीतिक सक्रियता और उनकी पार्टी को उनके योगदान के बारे में पूछा जाएगा तो वे तत्काल शायद ही कुछ बता पाएँ। 

मनोज तिवारी की मनोज तिवारी जानें किन्तु ‘टेम्परेरी’ के दम पर ‘परमानेण्ट’ से आँखें फेरना, उसे खारिज या अस्वीकार करना विवेकसम्मत नहीं। ब्याज का लालच  मूल को ले बैठता है और आदमी खाली हाथ, खाली जेब रह जाता है। 

हम जो नहीं हैं, खुद को वह दिखाने के चक्कर में हम वह भी नहीं रह पाते जो हम हैं। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 23 मार्च 2017 को प्रकाशित)

समूहिक नकल: देवासवालों की परीक्षा उज्जैन में

कलवाली अपनी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते मुझे अचानक ही पहले तो हैरत हुई, फिर खुद पर गुस्सा आया। मेरे जन्म नगर मनासा का एक गर्व पुरुष ऐसी ही एक ऐतिहासिक कथा का रचयिता बना था। मेरे आग्रह पर अपनी यह कथा-रचना उन्होंने ही सुनाई थी। इस कथा के बारे में उन्होंने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं कहा। अखबारों में यह घटना छपी न होती तो मुझे भी मालूम न हो पाती।

इस कथा के नायक थे प्रो. श्री हरीश गुलाटी। 

भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आए कुछ पंजाबी परिवार मनासा में बसे। ‘गुलाटी परिवार’ उन्हीं में से एक है। चार भाइयोंवाले इस परिवार के तीसरे भाई थे प्रो. हरीश गुलाटी। बड़े प्रतिभावान। मुझे उनके बारे में न तब बहुत ज्यादा जानकारी थी न अब है। उनका जन्म 1931 या 1932 में हुआ था। मेरी पीढ़ी ने उन्हें देखा कम, उनके बारे में सुना ज्यादा। वे गणित के प्राध्यापक थे। अनुशासन, निष्ठा और ईमानदारी जैसे विशेषण उनके नाम के अविभाज्य अंग थे। वे जहाँ भी रहे, अलग से पहचाने और पूजे गए। छुट्टियों में मनासा आते तो या तो अपनी पारिवारिक दुकान पर बैठते या घर पर। अत्यधिक मितभाषी। कोई बात दो बार पूछो तो एक बार जवाब मिले। कभी आते-जाते नजर आ जाते तो हम लोग ठिठक कर खड़े हो, एक-दूसरे से कहते - ‘देख रे! वो गुलाटी सर जा रहे हैं।’ उन्हें देख लेना हम लोगों के लिए अतिरिक्त उल्लेखनीय बात होती। 

इस समय मुझे सन् तो याद नहीं आ रहा था किन्तु यह बराबर याद है कि वे वार्षिक परीक्षाओं के दिन थे। एक दिन नईदुनिया में खबर छपी कि देवास के एम.एससी. पूर्वार्द्ध के छात्रों की गणित की परीक्षा फिर से होगी और वहाँ के इन छात्रों को परीक्षा देने के लिए उज्जैन जाना पड़ेगा। कारण बताया गया था - इन छात्रों ने सामूहिक नकल की है। समाचार में उल्लेखनीय बात यह थी कि ये तमाम छात्र परीक्षा देते हुए नहीं पकड़े गए थे बल्कि इनकी उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक ने यह सामूहिक नकल पकड़ी थी। इस प्रकार की यह पहली घटना थी। सो, अगले कुछ दिनों तक लगातार यह घटना अखबारों में जगह पाती रही। देवास के छात्र जगत में तीव्र असन्तोष था। प्रदर्शन, नारेबाजी, ज्ञापनबाजी हुई। राजनेता भी बीच में पड़े किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक की तथ्यात्मक विश्लेषणवाली रिपोर्ट के आगे किसी की नहीं सुनी गई और पुनर्परीक्षा उज्जैन में ही हुई।  उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक प्रो. हरीश गुलाटी थे। 

इस समाचार ने हम लोगों के लिए प्रो. गुलाटी को और अधिक महत्वपूर्ण तथा रहस्यमयी बना दिया। परीक्षा हॉल में नकल करते पकड़े जाने के किस्से तो कई सुने थे किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने से सामूहिक नकल करना कैसे मालूम हुआ होगा?

निश्चय ही मेरी तकदीर अच्छी थी कि उन परीक्षाओं के बादवाली छुट्टियों में प्रो. गुलाटी मनासा आए तो दादा से मिलने हमारे घर आ गए। वे दादा से बातें कर रहे थे और मैं उन्हें लगातार देखे जा रहा था। लगातार घूरती आँखें हमें अपनी पीठ पर भी अनुभव हो जाती हैं। मैं तो लगभग सामने ही बैठा उन्हें घूरे जा रहा था। वे तनिक असहज हो गए। दादा से बोले - ‘मुझे पहले इससे बात कर लेने दो।’ मुझे अपने पास बुलाया। मुझे कँपकँपी छूट गई-‘बेटा विश्न्या! आज तो गया काम से!’ 

मैं बहुत दूर नहीं बैठा था। मुश्किल से दो-तीन हाथ दूर। यह दूरी पार करने में मुझे मानो उफनता नाला पार करना पड़ा हो। उन्होंने सस्मित पूछा - ‘क्या बात है? क्या हो गया?’ मेरे गले से घरघराहट सी निकली। वे खुलकर हँस दिए। मुझे अभयदान देते हुए बोले - ‘घबरा मत। बता। क्या बात है?’ बड़ी मुश्किल से मेरे बोल फूटे - ‘वो, कॉपियाँ जाँचने से आपको कैसे मालूम हुआ कि सबने नकल की?’ वे खुश हो गए। बोले - ‘तो इतना घबरा कर क्यों पूछ रहा है? बताता हूँ।’ मेरी साँस में साँस आई।

उन्होंने बताया कि उन्होंने उलटे क्रम से उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनी शुरु की। याने सबसे अन्तिम उत्तर पुस्तिका सबसे पहले। अन्तिम से प्रथम के क्रम से। पाँच-सात कॉपियाँ जाँचते-जाँचते हुए उन्हें यह देख कर हैरत हुई कि एक समीकरण हल करते हुए प्रत्येक बच्चे ने, समीकरण के प्रत्येक चरण की शुरुआत में ‘2‘ का अंक लिखा है। उन्होंने यह क्रम बन्द कर, कापियाँ जाँचने का क्रम बदल दिया। याने प्रथम से अन्तिम की ओर। शुरु की पाँच-सात कॉपियाँ देखते ही उन्हें पूरी बात आईने की तरह साफ हो गई।

सबसे पहलेवाले बच्चे ने समीकरण का अगला चरण बराबर के निशान (=) से शुरु किया था। एक के पीछे एक, नकल करते-करते, बराबर का यह निशान ‘=’ से ‘2’ में बदल गया। 

प्रो. गुलाटी को ‘गुप्त सूत्र’ समझ में आ गया था। एक के बाद एक, उन्होंने सारे सवाल देखे और पाया कि जिस-जिस सवाल में बराबर का निशान (=) था, वह अपना स्वरूप बदलते-बदलते ‘2’ में बदल गया। इसके बाद उन्होंने कॉपियाँ तो एक तरफ रख दीं और सिलसिलेवार उदाहरण देते हुए विस्तृत रिपोर्ट के साथ सारी कॉपियाँ विश्व विद्यालय को इस निर्णायक अनुशंसा सहित लौटा दी कि देवास में यदि यह परीक्षा कराई गई तो विश्व विद्यालय की विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद किसी के बोल नहीं फूटे और देवास के बच्चों की यह परीक्षा उज्जैन में ही हुई।

पूरा किस्सा याद आते ही मैंने अपने कक्षापाठी सखा अर्जुन पंजाबी को फोन लगा कर प्रो. गुलाटी को तलाश किया तो मालूम हुआ कि मनासा का यह गर्व पुरुष अब इस दुनिया में नहीं रहा। मैंने उनका फोटू और कुछ जानकारियाँ चाहीं। अर्जुन ने प्रो. गुलाटी के बेटे राजीव का नम्बर दिया। उससे मालूम हुआ कि प्रो. गुलाटी 1994 में सेवानिवृत्त हो गए थे और 2015 में, 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने अन्तिम साँस ली। अर्जुन ने ही प्रिय प्रकाश गुलाटी से कह कर प्रो. गुलाटी का फोटू उपलब्ध कराया। फोटू देख कर मुझे धक्का लगा। मेरे दिल-दिमाग में तो उनकी वही छवि बनी हुई थी - भरा हुआ चेहरा, चमकती काली आँखें, मुस्कुराहट सजाए होठ, मजबूत कद काठी। लेकिन फोटू में इस सबमें से कुछ भी नहीं। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था। बची-खुची कसर चश्मे ने पूरी कर दी। ये मेरे प्रो. गुलाटी तो नहीं हैं।

लेकिन मेरा कष्ट यहीं खत्म नहीं हुआ। अपनी ब्लॉग पोस्टें मैं मनासा के कुछ मित्रों को भेजता हूँ। सामूहिक नकल से जुड़ी दो पोस्टें पढ़ने के बाद भी मनासावाले मेरे किसी मित्र को प्रो. गुलाटी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण घटना याद नहीं आई।

‘आँख ओट, पहाड़ ओट’ इसी को कहते होंगे। अपने लिए मैं यही सोच कर राहत तलाश कर रहा हूँ कि मेरी यह पोस्ट पढ़कर मनासा के कुछ लोग शायद प्रो. गुलाटी के बारे में आपस में ही पूछताछ कर लें। 
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सारे परीक्षार्थी जेल में

अफसर कुर्सी पर हो या सेवा निवृत्त, अफसरी की उसकी आदतें नहीं जातीं। कामकाजी दिन हो या छुट्टी का दिन, उसे कोई बहाना मिल जाना चाहिए। खुद तो अपनी आरामगाह में ऐश करता रहता है और बाकी सबको काम पर लगा देता है। वाधवाजी ने मेरे साथ यही किया। सत्रह बरस पहले सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन अफसरी नहीं गई। अच्छे-भले रविवार को मुझे काम पर लगा दिया। 

नींद तो रोज की तरह वक्त पर ही खुल गई थी किन्तु उठने को जी नहीं किया। अलसाया हुआ बिस्तर में पड़ा था। दस बजे बाद दिन की शुरुआत की। बारह भी नहीं बजे थे कि फोन घनघनाया। पर्दे पर वाधवाजी का नाम उभरा हुआ था। इन्हें क्या हो गया? ये तो कभी फोन करते नहीं! लपककर फोन उठाया। नमस्कार कर पूछा - ‘आपकी तबीयत तो ठीक है?’ बोले - ‘अच्छा-भला हूँ। ईश्वर की कृपा और आपकी दुआएँ असर किए हुए हैं।’ आयु के चौहत्तरवें बरस में हैं, बीमार हैं लेकिन आवाज वैसी की वैसी - विक्टोरिया कल्दार सिक्के की टनटनाती, कड़क, खनकदार। मैंने पूछा - ‘आज कैसे याद कर लिया?’ बोले - ‘आपने ही उकसाया।’ मैं चकराया। महीनों हो गए इनसे बात किए! जोर से हँसे- ‘सामूहिक नकलवाला  आपका लेख अभी पढ़ा। उसी ने उकसाया।’ मुझे तसल्ली हुई। 

वाधवाजी से कोई बीस-इक्कीस बरस का परिचय है। अपनी किस्म के अनूठे आदमी हैं। नौकरी तो शुरु की थी एक साधारण लिपिक के रूप में लेकिन प्रधान लिपिक, नायब तहसीलदार, तहसीलदार की, पदोन्नति की पायदानें चढ़ते-चढ़ते सेवानिवृत्त हुए अनुभाग दण्डाधिकारी (एसडीएम) के पद से। नियमों, कानून-कायदों की आत्माएँ तक इनकी हाजरी में खड़ी रहें। फाइलबाजी और प्रक्रिया के सारे पेंच इनसे पनाह माँगें। पेचीदा मामले उलझाने में विशेषज्ञ। स्वभाव से मस्तमौला। व्यवहार का आधार ‘जैसा तेरा गाना, वैसा मेरा बजाना’। आप साीधे तो वाधवाजी आपसे भी अधिक सीधे। आप तनिक तिरछे हुए तो वाधवाजी पूरे टेड़े। 
बोले - ‘आपका किस्सा पढ़कर मुझे सुसनेर की आपबीती याद आ गई। मैंने तमाम परीक्षार्थियों को जेल में बैठा दिया था।’ मेरा आलस्य छू हो गया। अब तक चाय ही पी थी। नाश्ते से आगे बढ़कर पूरी खुराक सामने आ गई। मैंने कहा - ‘ऐसा कैसे? बात समझ में नहीं आई। आपको फुरसत हो तो विस्तार से पूरी बात बताइए।’ उसी तरह खनखनाते हुए बोले - ‘यहाँ तो पूरी तरह फुरसत है। आप अपनी देख लो।’ मैंने मौका लपका - ‘लीजिए! मैं भी पूरी तरह फुरसत में हो गया। सुनाइए।’

और वाधवाजी ने कुछ इस तरह आपबीती सुनाई -

“यह 1991-92 की बात है। मैं सुसनेर में तहसीलदार था। सुसनेर तब शाजापुर जिले की एक तहसील था। आगर से लगभग तीस किलो मीटर और इन्दौर से करीब डेड़ सौ, एक सौ साठ किलो मीटर दूर। वहाँ राणाजी नाम के एक वकील साहब थे। पूरे इलाके में उनकी तूती बोलती थी। इसी के चलते सुसनेर को ‘राणाजी की सुसनेर’ के नाम से जाना-पहचाना जाता था।

“परीक्षाओं के दिन थे। और जगहों की तरह, नकल की शिकायतें यहाँ भी आ रही थीं। चौहान साहब कलेक्टर थे। उनका पूरा नाम याद नहीं। बस! इतना याद है कि वे नीमच या जावद के थे और उनके पिताजी को लोग ‘जापानी वकील साहब’ कहते थे। उन्हें नकलपट्टी पसन्द नहीं थी। उन्होंने पूरे जिले में इस पर नकेल कसने की ठान रखी थी। अपने मनमाफिक नतीजे हासिल करने के लिए वे अपने अधिकारियों को खुल कर काम करने की छूट देते थे। मैं भी पूरी ताकत से इस काम में लगा हुआ था। मुझे तो आप जानते ही हो। जानबूझकर बुरा कभी किसी का किया नहीं लेकिन किसी को यह छूट भी नहीं दी कि मुझे ‘टेकन ग्राण्टेड’ ले ले। दादाओं की तरह पेश आता था। 

“उस दिन शनिवार था। मेरी सख्ती से गिनती के लोग नाराज थे जबकि ईमानदार बच्चे और उनके माँ-बाप तो खुश थे। किन्तु आप ही खुद ही कहते हो कि भले लोग चुप रहते हैं और घरों से बाहर नहीे आते। सो, मेरी सख्ती से गिनती के जिन लोगों और बच्चों को असुविधा हो रही थी उन्होंने कुछ और बच्चों को एकट्ठा किया और जुलूस बनाकर, ‘तहसीलदार तेरी दादागीरी, नहीं चलेगी! नहीं चलेगी’ के नारे लगाते हुए आए। मैंने देखा, कोई 60-70 बच्चे चले आ रहे हैं। पुलिस सर्कल इंस्पेक्टर जुलूस के आगे-आगे चल रहा था। बाली सरनेम था उसका। बच्चे तो बच्चे थे। उस उम्र में वे अपना भला-बुरा क्या समझते? उनसे क्या कहना, सुनना? सो मैंने बाली को निशाना बनाया। सबके सामने उसे खूब डाँटा-फटकारा। कुछ गालियाँ भी दीं। वह कुछ भी नहीं समझ पाया कि उसका कसूर क्या था? हक्का-बक्का, परेशान हो मेरा मुँह ताक रहा था। मेरे ऐसे तेवर और बाली की दशा देखकर तमाम बच्चे दहशतजदा हो, बिना किसी के कहे, खुद-ब-खुद चुपचाप बिखर गए। मैं भी चुपचाप अन्दर चला आया। बाली शायद मेरी बात समझ गया था। जब तक हम दोनों सुसनेर रहे, उसने कभी इस बात की शिकायत नहीं की।

“जुलूस तो बिखर गया लेकिन बात खत्म नहीं हुई थी। कलेक्टर तक पहुँची। चौहान साहब ने मुझे फोन किया। पूरी बात जानी। फिर पूछा - ‘चाहे जो हो, नकल तो नहीं होगी। बताओ! क्या करना चाहिए और तुम क्या कर सकते हो?’ मैंने कहा कि जहाँ अभी परीक्षा हो रही है वहीं होती रही तो नकल नहीं रुकेगी। परीक्षा की जगह बदली जानी चाहिए। उन्होंने पूछा - ‘तुम करवा सकते हो कहीं और परीक्षा?’ मैं इस सवाल के लिए तैयार था। केवल जवाब ही नहीं सोच रखा था, पूरा एक्शन प्लान भी बना रखा था। जवाब दिया - ‘आज शनिवार है। अगला पेपर सोमवार को है। आप यदि मुझे विशेष सशस्त्र बल (एस ए एफ) का एक-चार (एक हेड कांस्टेबल और चार जवान) का फोर्स दे दें तो मैं दूसरी जगह परीक्षा करा सकता हूँ।’ उन्होंने कहा - ‘फोर्स की कोई दिक्कत नहीं। जितना चाहोगे मिल जाएगा। लेकिन जगह कहाँ से लाओगे?’ मैं पूरी तरह तैयार था। एक सेकण्ड की देर किए बिना बोला - ‘नए जेल की बिल्ंिडग तैयार खड़ी है। उसका उद्घाटन भी नहीं हुआ है। पूरी की पूरी खाली है। वहीं परीक्षा हो जाएगी। जेल का उद्घाटन होगा जब होगा, इस बहाने एक नेक गतिविधि से इसका दरवाजा खुल जाएगा।’ बात सुनकर चौहान साहब बहुत खुश हुए। इतने कि मैं सामने होता तो मेरी पीठ ठोकते। बोले - ‘बहुत बढ़िया विचार है। प्रोसीड।’

“इसके बाद मुझे और क्या चाहिए था? शनिवार की रात और रविवार का पूरा दिन मेरे पास था। मैं किसी से कुछ कहता उससे पहले ही सारा किस्सा पूरे सुसनेर में पसर चुका था। मेरा काम बहुत आसान हो गया था। हालत यह हो गई थी कि मैं एक कहूँ तो लोग दो मानने को तैयार। तैयारियाँ कुछ इस तरह हुईं कि रविवार को ही परीक्षा हो जाए।

“सोमवार को बच्चे तो बच्चे, झुण्ड के झुण्ड लोग नई बनी जेल की तरफ उमड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो हर कोई जेल में हुई परीक्षा का चश्मदीद गवाह बनना चाह रहा हो। उम्मीद से कहीं ज्यादा शान्ति से परीक्षा पूरी हुई। उसके बाद जब तक मैं सुसनेर रहा तब तक मुझे ‘जेल में परीक्षा करानेवाला तहसीलदार’ के रूप में ही जाना-पहचाना जाता रहा।”

वाधवाजी रुक गए। उनके हिसाब से उनकी आपबीती पूरी कही जा चुकी थी। लेकिन मेरे मन का पत्रकार अब भी कुलबुला रहा था। पूछा - ‘किसी पत्रकार ने आपको निपटाया नहीं?’ अचानक कुछ याद आया हो, कुछ इस तरह वाधवाजी बोले - “खूब याद दिलाया आपने। यह बात तो मैं तो भूल ही गया था। पत्रकारों ने मुझे खूब घेरा। किसी ने तारीफ की तो किसी ने खुन्नस निकाली। लेकिन अगले दिन अखबारों में समाचार लगभग एक ही हेडिंग से छपा - सारे के सारे परीक्षार्थी जेल में।”

अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। इस पुछल्ले से मुझे वह भी मिल गया था जिसकी ओर वाधवाजी का ध्यान नही नहीं था। मैंने कहा - ‘आपकी आवाज से लग रहा है, आप थक गए हैं। आप हाँफ रहे हैं।’ बरसों का प्रशासकीय अनुभव परिहासपूर्वक बोला - ‘जान रहा हूँ कि आपका काम निकल गया है। चलिए, मैं थका ही सही। मैं भी अपना काम करता हूँ। आप भी अपना काम निपटाइए।’

और हम दोनों ने ठठाते हुए अपना-अपना फोन बन्द कर दिया।
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सामूहिक नकल: दरोगा ने दोस्ती नहीं की

‘बैरागीजी हैं?’

मैं अगले कमरे में बैठकर अपनी लिखत-पढ़त कर रहा था। अपने नाम की हाँक सुन, तनिक ऊँची आवाज में जवाब दिया -‘जी। अन्दर आ जाईए। दरवाजा खुला है।’

वे अदब से अन्दर आए। मुझे नमस्कार किया। मुझे लगा, प्रीमीयम जमा करने आए हैं। मैंने उनकी ओर देखे बिना, लापरवाही से कहा - ‘प्रीमीयम जमा करनी है? बैठिए। पॉलिसी नम्बर दीजिए।’ धीमी आवाज में जवाब आया - ‘नहीं। प्रीमीयम जमा नहीं करनी है। आपसे थोड़ी बात करनी है।’ अब मैंने उनकी ओर देखा। उम्र सत्तर के आसपास। लेकिन चेहरा और कद-काठी पचपन जैसी। सफेद कुर्ता-पायजामा, काला जॉकेट। माथे पर भूरे रंग की टोपी। जेब में दो पेन। दोनों ही स्याहीवाले। हाथों में ‘हंस’ और ‘वीणा’ के मार्च महीने के अंक। 

अपना नाम बता कर बोले - ‘मैं सेवानिवृत्त हायर सेकेण्डरी लेक्चरार हूँ। पास ही के गाँव में रहता हूँ। पढ़ाना मेरा व्यवसाय था। पढ़ने का शौक है। सुबह भोजन कर रोज रतलाम आ जाता हूँ। साहित्यिक रुचिवाले मित्रों, परिचितों से मिल कर, बतिया कर शाम को लौट जाता हूँ। आज एक मित्र के बेटे ने आपका लेख पढ़वाया। बिलकुल वैसे ही एक किस्से का अनुभव मुझे भी है। वही सुनाने आया हूँ। सुन लीजिए और हो सके तो इस पर भी एक लेख लिख दीजिए।’ उन्हें लेकर मेरी सोचने की दिशा और धारणा एक झटके में बदल गई। वे अपने लिए नहीं, मेरे लिए आए थे। मैंने चाय की मनुहार की। सहजता से बोले - ‘बात में थोड़ा समय तो लगेगा ही। बनवा लीजिए। पी लूँगा।’

बिना किसी विस्तृत परिचय और भूमिका के उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बताया।

यह कोई दस बरस पहले की बात है। हायर सेकेण्डरी की वार्षिक परीक्षा में उनकी डयूटी लगी थी। परीक्षा केन्द्र शहर के एक छोर पर स्थित स्कूल में था। इस दो मंजिले स्कूल भवन का मुख्य दरवाजा आम स्कूलों की तरह खूब चौड़ा, चेनल वाला ही था। परीक्षार्थियों की बैठने की व्यवस्था दोनों मंजिलों पर थी। यह स्कूल इनका नहीं था। इसमें ये पहली बार आए थे। योग-संयोग कुछ ऐसा रहा कि यहाँ ये किसी को नहीं जानते थे। 

केन्द्राध्यक्ष द्वारा बताए कमरे में गए तो पाया कि उनका कमरा ठीक चेनल गेट के पासवाला है। समयानुसार परीक्षा की कार्रवाई शुरु हुई। कमरों में प्रश्न-पत्र पहुँचे, बँटे। बच्चों ने अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में माथा गड़ाया। सब कुछ शान्त, संयत, नियन्त्रित। 

पाँच-सात मिनिट ही बीते होंगे कि चेनल गेट बन्द होने की आवाज आई। इन्हें अटपटा लगा। जिज्ञासावश गेट तक आए। देखा, चपरासी गेट पर ताला लगा रहा था। इन्हें कुछ समझ में नहीं आया। परीक्षा ड्यूटी का बरसों का अनुभव। किन्तु इस तरह मुख्य दरवाजे पर ताला कभी, कहीं नहीं लगा। चपरासी से पूछा। जवाब मिला - ‘यहाँ ऐसे ही परीक्षा होती है।’ अब कुछ जानने, समझने की जरूरत नहीं रह गई थी। जी कसैला हो गया। डर भी लगने लगा। ऐसा सुना तो जरूर था किन्तु देखा कभी नहीं था। आज न केवल देख रहे थे बल्कि इसका हिस्सा भी हो रहे थे। मन ही मन भगवान का नाम लिया-‘बचाना भगवन्। रिटायरमेण्ट के दो बरस बचे हैं। बुढ़ापा मत बिगाड़ देना।‘ अब इनका ध्यान परीक्षा पर कम, खुद के बचाव पर ज्यादा हो गया।

तकदीर बहुत अच्छी थी कि इनके कमरे में नकल नहीं हो रही थी। लेकिन मनोदशा ऐसी हुई कि हर बच्चा नकल करता नजर आ रहा था। एक-एक पल भारी पड़ रहा था। आज सब राजी-खुशी निपट जाए तो गंगा नहाए। कल, कुछ भी करके अपना केन्द्र बदलवा लेंगे।

कोई डेड़ घण्टा बीता होगा कि मुख्य दरवाजे पर कार रुकने की आवाज आई। फिर, कार की फाटकें खुलने और बन्द होने की। सीढ़ियों पर कुछ लोगों के चढ़ने की आहट हुई। फिर, चेनल खड़खड़ाने के साथ ही किसी ने रोबदार आवाज में आदेश दिया - ‘दरवाजा खोलो।’ चपरासी बहुत दूर नहीं था। लेकिन वह भागकर नहीं आया। आना तो दूर, पहली बार तो उसने मानो आवाज सुनी ही नहीं। पल भर की प्रतीक्षा के बाद चेनल जोर-जोर से खड़खड़ाने के साथ बावाज गूँजी ‘अरे! सुना नहीं? दरवाजा फौरन खोलो।’ इस बार चपरासी भाग कर आया। पूछा - ‘आप लोग कौन हैं?’ बौखलाई हुई आवाज ने बुरी तरह से फटकारते हुए कहा - ‘कौन हैं? समझ में नहीं आता? इंस्पेक्शन टीम आई है। चलो! फटाफट दरवाजा खोलो।’ चपरासी ने हाथ जोड़कर, नम्रतापूर्वक माफी माँगी और पूरी ताकत से केन्द्राध्यक्ष को पुकारा - ‘सर! चाबी दीजिए। गेट खोलना है। इंस्पेक्शन टीम आई है।’ 

होना तो यह चाहिए था कि केन्द्राध्यक्ष पहली मंजिल से कूद कर आते। लेकिन इसके बदले जवाब आया - ‘रुकना जरा! सर बाथरूम गए हैं। आते हैं।’ 

इसके बाद, जो होना था, वही हुआ। केन्द्राध्यक्ष आए। क्षमा याचना करते हुए खुद ताला खोला। कहा-सुनसान इलाके के कारण सुरक्षा की दृष्टि से दरवाजे पर ताला लगाना पड़ा। 

लेकिन इसके बाद वह नहीं हुआ जो इंस्पेक्शन टीम को करना था। निरीक्षण दल के प्रमुख ने निरीक्षण से इंकार कर दिया। कहा-‘अब केन्द्र का नहीं, आपका निरीक्षण करेंगे। वह भी यहाँ नहीं, कलेक्टर के दफ्तर में।’ 

दल प्रमुख ने वहीं, वस्तुस्थिति के विस्तृत ब्यौरे सहित रिपोर्ट बनाई। केन्द्राध्यक्ष के हस्ताक्षर लिए और लिखित में आदेश दिए - ‘उत्तर पुस्तिकाएँ सील कर आप कलेक्टर कार्यालय पहुँचें। अगली कार्रवाई वहीं होगी।’

घटना सुनकर मैंने पूछा - ‘उसके बाद क्या हुआ? केन्द्राध्यक्ष पर कोई कार्रवाई हुई? उन्हें कोई सजा मिली?’ ये बोले - ‘उस वक्त तो मुझे कुछ भी भान नहीं रहा। ड्यूटी के बाद घर जाने के बजाय सीधा जिला शिक्षाधिकारी के पास पहुँचा। पूरी बात सुनाई और साफ-साफ कह दिया कि मैं तो अब वहाँ ड्यूटी नहीं करूँगा। फिर चाहे मुझे बर्खास्त ही क्यों नहीं कर दें। उन्होंने मेरी सुनवाई कर ली। फौरन मेरी ड्यूटी बदल दी।’ मैंने अपनी जिज्ञासा दुहराई तो बहुत खुश होकर बोले - ‘सर! इंस्पेक्शन टीम के प्रमुख ने उस दरोगा की तरह केन्द्राध्यक्ष से दोस्ती नहीं की। उन्होंने पहली ही रिपोर्ट ऐसी बनाई कि केन्द्राध्यक्ष को निलम्बित कर जाँच बैठाई गई जिसमें वो दोषी साबित हुए। सजा के तौर पर उन्हें अपने घर से सैंकड़ों किलोमीटर दूर फेंक दिया गया। उनकी भविष्य की सारी वेतनवृद्धियाँ रोक दी गईं और ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि वे फिर कभी परीक्षा केन्द्राध्यक्ष नहीं बन सके।’ 

मैंने देखा, उनके चेहरे पर परम प्रसन्नता व्याप्त है। उनके अनुसार वे दो बातों से बहुत खुश थे। पहली, उन पर कोई आँच नहीं आई और दूसरी, निरीक्षण दल के दरोगा ने दोस्ती नहीं की।

जिस तन्मयता और आत्मपरकता से उन्होंने आपबीती कही यह उसका ही प्रभाव था कि इस बीच कब चाय आई और कब हमने पी ली, हमें पता ही नहीं चला।

सुख और प्रसन्नता के क्षण सचमुच में बहुत तेजी से बीतते हैं।
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पटेल बा की अफीम की तस्करी



वे रतलाम आए तो मुझे तलाश कर, मिलने के लिए बुलाया। मैं हाथ के सारे काम छोड़, भाग कर गया। कम से कम पैंतीस बरस बाद उनसे मिलना जो हो रहा था! हम दोनों की उम्र में अठारह बरस का फासला है-वे 88 बरस के, मैं 70 बरस का। लेकिन इस अन्तर को उन्होंने न तो खुद माना न ही मुझे मानने दिया। परिचय के पहले ही क्षण से मित्रवत् ही मिले और आज जब मिले तब भी उसी भाव से। स्वभाव पर उम्र की छोटी सी खरोंच भी नहीं आ पाई। खूब गर्मजोशी से मिले। खूब बतियाये। बातें करते-करते मुझे, हमेशा की तरह ही पाँच-सात धौल जमाए। वैसे ही झन्नाटेदार, जैसे पैंतीस बरस पहले थे। बातों ही बातों में वह किस्सा भी सुनाया जिसने उनकी ‘पटलई’ को सीमेण्ट-काँक्रीट की मजबूती दे दी थी। 

वे बरसों तक, मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के एक समृद्ध गाँव के ‘पटेल’ बने रहे। वे उस जमाने के ‘इण्टर पास’ हैं जिस जमाने में मेट्रिक पास होना ही किसी को दर्शनीय बना देता था। अच्छी-खासी सरकारी नौकरी मिल रही थी लेकिन न तो ताबेदारी (अधीनस्थता)  कबूल न ही बँध कर रहना। सो इंकार कर दिया। परिवार के पास सिंचित जमीन का भरपूर रकबा। खुद को खेती में झोंक दिया। ‘इण्टर पास पेण्टधारी जण्टरमेन’ को खेतों में बुवाई, सिंचाई, निंदाई-गुड़ाई करते देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते।

आज तो नीमच अलग जिला है लेकिन तब वह मन्दसौर जिले का उप सम्भाग (सब डिविजन) हुआ करता था। प्रदेश को, सुन्दरलालजी पटवा और वीरेन्द्रकुमारजी सकलेचा जैसे दो-दो मुख्यमन्त्री देने की पहचान से पहले मन्दसौर जिले की पहचान अफीम के लिए रही है। मध्य प्रदेश में सर्वाधिक अफीम मन्दसौर जिले में ही पैदा होती है। अफीम की खेती वहाँ आज भी एक महत्वपूर्ण ‘सामाजिक प्रतिष्ठा-प्रतीक’ है। आज तो स्थिति लगभग आमूलचूल बदल गई है किन्तु तब माना जाता था कि प्रत्येक अफीम उत्पादक किसान किसी न किसी स्तर पर अफीम तस्करी से जुड़ा हुआ है। 

जैसा कि ‘पटेल बा’ ने बताया, उनका गाँव अफीम उत्पादक गाँवों मे अग्रणी था। नामचीन अफीम तस्कर और उनके कारिन्दे इस गाँव मे अक्सर नजर आते थे। एक बार अफीम का बड़ा सौदा हुआ। गाँव के कई किसान इस सौदे में शरीक थे। पढ़े-लिखे और प्रतिभाशाली होने के कारण पटेल बा को गाँव की ओर से प्रभारी बनाया गया। तय हुआ कि फलाँ तारीख की रात को तस्कर के लोग आकर अफीम की डिलीवरी लेंगे। भागीदार किसानों की अफीम पटेल बा के घर में इकट्ठी की गई। 

एक तो बड़ा सौदा और दूसरे, माथे पर जिम्मेदारी। सो, पटेल बा ने अपने पक्के मकान की छत पर खाट बिछाई। अमावस की रात। माहौल में अफीम की मादक गन्ध। लेकिन पटेल बा की आँखों ने नींद को अनुमति नहीं दी। कभी खाट पर बैठें तो कभी छत पर चहल कदमी करें।

आधी रात होने को आई। तस्कर के कारिन्दों के आने का समय हो चला था। पटेल बा की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। ऐसा काम अब तक छुटपुट स्तर पर ही किया था। इतने बड़े स्तर का पहला मौका था। उनकी आँखें मानो मशालें बन जाना चाह रही थीं। अँधेरे को घूर कर और चीर कर दूर-दूर तक देखने, टोह लेने की कोशिशें जारी थीं।

लेकिन पटेल बा चौंके। दूर से दो जीपों की बत्तियाँ चमकती नजर आईं। यह क्या? यह तो तय नहीं हुआ था! तस्कर के लोग तो मोटर सायकिलों से आनेवाले थे! ये जीपें कैसी? बात समझने में पटेल बा को क्षण भी नहीं लगा। निश्चय ही किसी भेदिये ने पुलिस को खबर कर दी होगी। अब क्या किया जाए? जीपों की घरघराहट और उनकी रोशनी पल-पल बढ़ती जा रही थी। गाँव से उनकी दूरी हर साँस पर कम होती जा रही थी। छापा कामयाब हो गया तो आधे से ज्यादा गाँव पकड़ा जाएगा! क्या किया जाए? 

जैसे किसी आत्मा ने पटेल बा पर अपनी सवारी उतार दी हो इस तरह पटेल बा ने जोर-जोर से चिल्लाना, आवाजें लगाना शुरु कर दिया - ‘डरना मत रे! घबराना मत रे! ये डाकू नहीं हैं। ये तो अपने पुलिसवाले हैं।’ छोटा सा गाँव और कवेलू की छतें। पटेल बा की आवाज गाँव के हर घर में गूँज उठी। जिनकी अफीम थी वे तो पहले से ही अधजगे थे। वे तो पूरे जागे ही जागे, बाकी गाँव भी जाग गया और पटेल बा का मकान मानो पंचायत घर में बदल गया। जिनका ‘माल’ था, वे चीतों की तरह झपटे। अपना-अपना ‘माल’ कब्जे किया। ठिकाने लगा कर वापस पटेल बा के घर पहुँच, भीड़ में शामिल हो गए।

कुछ ही मिनिटों में पुलिस दल पहुँच गया। पूरे गाँव को जमा देख दरोगाजी भन्ना गए। सारा खेल खराब हो चुका था। समझ तो गए थे किन्तु कहते और करते भी क्या? पटेल बा को खरी-खोटी सुनाने लगे। उधर दरोगाजी बिफरे जा रहे इधर पटेल बा मासूम, दयनीय मुद्रा में सफाई दिए जा रहे - ‘क्या गलत किया सा‘ब? डाकू समझ कर गाँव के लोग बन्दूकें चला देते। पता नहीं क्या से क्या हो जाता। मैंने तो आपको और गाँववालों को बचाया सा‘ब! और आप हैं कि मुझे डपटे जा रहे हैं! सच्ची में भलमनसाहत का तो जमाना ही नहीं रहा।’ पूरा गाँव पटेल बा की हाँ में हाँ मिलाता, मुण्डियाँ हिला रहा। दरोगाजी की झल्लाहट देखते ही बनती थी। 

दरोगाजी आखिर कब तक चिल्लाते? जल्दी ही चुप हो गए। पटेल बा ने गाँववालों को डाँटा - ‘अपना आराम छोड़ कर आधी रात को हाकम आए हैं। तुम आँखें फाड़े देख रहे हो! कुछ तो  शरम करो! गाँव का नाम डुबाओगे क्या? हाकम को कम से कम पानी की तो पूछो!’ सुनते ही पूरा गाँव ताबेदारी में जुट गया। फटाफट देसी घी का हलवा बनाया और लोटे भर-भर ‘कड़क-मीठी’ चाय पेश की। 

भुनभुनाते हुए दरोगाजी चलने को हुए तो पटेल बा ने कुछ इस तरह मानो मक्खन में छुरी गिर रही हो, ‘मालवी मनुहार’ की - ‘सा’ब! अब आधी रात में कहाँ जाओगे? गाँववालों के भाग से आपका आना हुआ। रात मुकाम यहीं करो। सवेरे कलेवा करके जाना।’ दरोगाजी तिलमिला उठे। मानो कनखजूरे पर चीनी छिड़क दी हो। चिहुँक कर बोले - ‘रहने दो पटेल! रहने दो। मुँह में आया निवाला तो आधी रात को छीन लिया और सुबह के कलेवे की मनुहार कर रहे हो। तुम्हारी मनुहार का मान फिर कभी रखूँगा। याद रखूँगा और राह देखूँगा। लेकिन तुम भी याद रखना। जब कभी मेरे ठिकाने पर आओगे तो कलेवा तो क्या पूरा भोजन कराऊँगा। वो भी बिना मनुहार के।’

बमुश्किल अपनी हँसी रोकते हुए पटेल बा, नतनयन, दीन-भाव से विनीत मुद्रा में बोले - ‘आप हाकम, हम रियाया। जैसे रखेंगे वैसे रहेंगे हजूर। आप नाराज हों, आपकी मर्जी। अपने जानते तो हमने कोई गुनाह नहीं किया। फिर भी आप सजा देंगे तो भुगत लेंगे हजूर! ग्रीब तो जगत की जोरू होता है। भला हाकम से हुज्जत कर सकता है?’

ठठाकर हँसते हुए पटेल बा ने कहा - ‘आग उगलती आँखों से देखते हुए दरोगाजी ने बिदा ली। उनकी जीपों ने गाँव छोड़ा भी नहीं कि मेरे घर के सामने जश्न मनने लगा। लोगों ने मुझे कन्धों पर उठा लिया। उसके बाद किसी ने गाँव का पटेल बनने की बात सोचना ही बन्द कर दी। नया पटेल तभी बना जब मैंने अपनी मर्जी से पटलई छोड़ी।’

मैंने पूछा - ‘वो सब तो ठीक है लेकिन आपको भोजन कराने की, दरोगाजी की हसरत पूरी होने का मौका तो नहीं आया?’ पटेल बा बोले - ‘दरोगा गुस्सैल जरूर था लेकिन मूरख नहीं। अपनी आँखों देख लिया था कि पूरा गाँव मेरी पीठ पर है। कुछ ही दिनों बाद उसने खुद ही दोस्ती कर ली।’ मैंने शरारतन पूछा - ‘आपके हर काम से दोस्ती कर ली?’ जोरदार धौल टिकाते हुए बोले - ‘पोते का दादा हो गया लेकिन अब तक अक्कल नहीं आई। उस दिन क्या उस बेचारे की फजीहत कोई कम हुई जो आज तू फिर मुझसे उसकी फजीहत कराना चाहता है।?’  

ठठाकर हँसते हुए, पटेल बा ने मुझे बाँहों में भर लिया।
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बुलबुल भी हम, सैयाद भी हम

जब से उसके पास से लौटा हूँ, वह रोज सुबह वाट्स एप पर ‘सुविचार-सन्देश’ देने लगा है। पहले नहीं देता था। आज का चलन यही है। किन्तु आज आया उसका सन्देश पढ़कर मन जाने कैसा-कैसा तो हो गया है! सन्देश है - ‘रोटी कमाना बड़ी बात नहीं है। परिवार के साथ खाना बड़ी बात है।’ इन तेरह शब्दों ने मुझे झिंझोड़ दिया है। उसने यह सन्देश खुद भी पढ़ा या नहीं? केवल मुझे ही भेजा है या सबको? मुझे कह रहा है या अपनी व्यथा-कथा सुना रहा है? 
वह घर से कोई तीन सौ किलो मीटर दूर है। मित्र का बेटा है। अट्ठाईस बरस का, अविवाहित। मुझे पितृवत् मान देता है। किसी काम से उसके नगर जाना हुआ तो तीन दिन उसी के कमरे पर ठहरा। हम लोग बहत्तर घण्टे एक छत के नीचे रहे किन्तु दिन के उजाले में एक बार भी एक-दूसरे को नहीं देखा। वह सुबह सवा पाँच, साढ़े पाँच बजे निकल जाता। मैं अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार निकलता। मैं दिन ढलते कमरे पर पहुँच जाता किन्तु वह कभी भी रात साढ़े नौ बजे से पहले नहीं पहुँचा। वह भोजन करके आता और मैं उसके आने से पहले भोजन कर चुका होता। उसने चाहा भी कि कम से कम एक समय तो हम दोनों साथ भोजन करते। किन्तु ऐसा हो नहीं पाया। मैं लौटा तो उससे मिले बिना ही। उसकी गैर हाजरी में। उसने फोन पर कहा - ‘तीन साल से नौकरी कर रहा हूँ। लेकिन जैसा आज लग रहा है, वैसा पहले कभी नहीं लगा। मम्मी-पापा आते रहे। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन आपका इस तरह जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा। मम्मी-पापा तो आते रहेंगे लेकिन आप कब आएँगे? आज पहली बार अपनी नौकरी पर गुस्सा भी आ रहा है और शर्म भी। आप मुझे माफ कर दीजिएगा।’ उसकी भर्राई आवाज ने मुझे हिला दिया। मानो, कोई वट वृक्ष अपनी जड़ें छोड़ रहा हो। मैंने कठिनाई से कहा - ‘वल्कल (मेरा बड़ा बेटा)  की दशा भी कुछ ऐसी ही है। मैं समझ सकता हूँ। तुम मन पर बोझ मत रखो।’ 
माँ-बाप जल्दी से जल्दी उसका विवाह कर देना चाहते हैं। वह भी राजी है। किन्तु  वह पहले ‘सेटल’ हो जाना चाहता है। ‘सेटल’ याने इतना समृद्ध कि अपनी और अपनी पत्नी की इच्छाएँ पूरी कर सके। उसकी दशा देख कर फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ की, बरसात में भीगते हुए, ‘तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए’ गाती हुई, नायिका नजर आने लगी। मुझे दहशत हो आई। मन ही मन प्रार्थना की - ‘हे! भगवान। इसे वैसी दशा से बचाना।’ 
गए रविवार को कुछ घण्टों के लिए भोपाल में था। तीन परिवारों में जाना हुआ। तीनों ही परिवारों में बूढ़े/अधेड़ पति-पत्नी। बिलकुल मुझ जैसी दशा तीनों की। बच्चे गिनती के और वे भी अपनी-अपनी नौकरी पर बेंगलुरु या पूना में। वहाँ, बच्चों को अपनी देखभाल करनी है और यहाँ हम बूढ़ों को अपनी। वे हमें लेकर चिन्तित और हम उन्हें लेकर। न वे हमारे साथ रह सकते और न ही हम वहाँ जाने की स्थिति में। तीनों जगह एक ही विषय। सम्वाद भी लगभग एक जैसे। उलझन भी एक जैसी - “बच्चों की ‘अच्छी-भली’ नौकरी पर खुश हों या सकल परिस्थितियों पर झुुंझलाएँ?” क्या स्थिति है! प्रत्येक वार त्यौहार पर वे हमें याद करें और हम उन्हें। त्यौहारों पर व्यंजन बनाने का जी न करे और बना लें तो स्वाद नहीं आए। मुझे रह-रह कर पुराना फिल्मी गीत याद आता है - ‘कैद में है बुलबुल, सैयाद मुस्कुराए। कहा भी न जाए, चुप रहा भी न जाए।’ किससे शिकायत करें? किसे दोष दें? हम ही बुलबुल, हम ही सैयाद! 
प्रख्यात कवि सुरेन्द्र शर्मा का एक वीडियो अंश मुझे एक के बाद एक, कई मित्रों ने भेजा। इस वीडियो अंश में सुरेन्द्र भाई दिल्ली के किसी कॉलेज में व्याख्यान देते हुए, अपने स्वभावानुरूप परिहासपूर्वक पालकों और बच्चों की मौजूदा ‘कैदी दशा’ और विसंगतियों पर तंज कस रहे हैं। सुनते हुए, कभी लगता है वे हमें रुला देंगे तो कभी लगता है खुद ही न रो दें। साफ अनुभव होता है कि तमाम बातों में कहीं न कहीं वे खुद भी शामिल हैं। उलझनों के बीहड़ में वे अपना रास्ता कुछ इस तरह घोषित करते हैं - ‘मेरा बेटा केवल पन्‍द्रह हजार रुपये महीने की नौकरी करता है लेकिन रात का भोजन मेरे साथ करता है। मेरे लिए इससे बड़ा और कोई पेकेज नहीं।’
यह तीन दिन पहले की बात है। रात के आठ बजनेवाले थे। प्रीमीयम जमा करने के लिए विजय भाई माण्डोत मेरे घर आए। मैंने चाय की मनुहार की। हाथ जोड़कर, नम्रतापूर्वक इंकार करते हुए बोले - ‘अंकुर दुकान मंगल करके घर पहुँच रहा होगा। सब भोजन पर मेरी राह देखेंगे। हम तीनों बाप-बेटे, एक ही थाली में, एक साथ भोजन करते हैं। पहले मेरी पत्नी भी साथ देती थी। किन्तु अंकुर की शादी के बाद वे दोनों सास-बहू एक साथ भोजन करती हैं और हम तीनों एक साथ। (विजय भाई के दो बेटे हैं।) इसके लिए हमने एक बड़ी थाली अलग से खरीद रखी है।’ मुझे रोमांच हो आया। उन्हें दरवाजे से ही विदा किया और मन ही मन याचना की - ‘हे! प्रभु! कृपा करना। इस थाली को सदैव उपयोगी बनाए रखना।’
नहीं जानता कि आज स्थिति क्या है। किन्तु, जब तक गाँव में रहा तब तक मालवा के लोक मानस में ‘पढ़ाई’ सदैव ही दोयम पायदान पर पाई। बच्चे को पढ़ाने का मतलब घर से दूर करना। पढ़-लिख कर घर से दूर जाने के बजाय, जीवन यापन का कोई ठीक-ठीक जतन कर, गाँव-घर में ही रहने को बेहतर माना जाता था। यहाँ तक कि अपनी मिट्टी न छोड़ने के लिए भीख माँगने तक की अनुमति दी जाती थी। 
एक गीत हमने खूब गाया भी और खूब सुना भी। किन्तु गाते-सुनते समय इसकी व्यंजना का अनुमान कभी नहीं हो पाया। आज की हकीकत अब इस गीत की व्यंजना अनुभव करा रही है। आज, बारहवीं के बाद, ‘उच्च शिक्षा’ के लिए घर से निकल रहा बच्चा, वस्तुतः हमेशा के लिए घर से दूर हो रहा है। मालवा के ‘लोक’ ने इस यथार्थ का अनुमान पता नहीं कब से लगा रखा है। इन सारे क्षणों से गुजरते हुए वही सब याद आ रहा है।
पंछियों से फसलों की रक्षा के लिए खेत के बीचोंबीच मचान बनाया जाता है। रखवाला किसान, गोफन (और पत्थर लिए) लिए उसी पर अपने दिन-रात काटता है। कभी गोफन चला कर, कभी थाली बजा कर तो कभी मुँह से विभिन्न आवाजें निकाल कर पंछियों को फसल पर बैठने से रोकता है। मालवी में मचान को ‘डागरा’, पढ़ाई/शिक्षा को ‘भणाई’, पंछियों को भगाने को ‘ताड़ना’ और तोते को ‘हूड़ा’ कहते हैं। उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने को मचल रहे बेटे को रोकने के लिए किसान कहता है -
‘बेटा! भणे मती रे!
आँपी माँगी खावाँगा।
डागरा पे बेठा-बेठा,
हूड़ा ताड़ाँगा।’
अर्थात्-बेटे! अपन यहाँ माँग कर खा लेंगे, तोतों को भगा-भगा कर, मचान पर बैठ, खेतों की रखवाली करके अपना पेट पाल लेंगे। किन्तु तू पढ़ाई के लिए बाहर मत जा। घर मत छोड़।   
गाँवों से पलायन में तेजी आई है। गाँव का पिता यह गीत गाता तो अब भी होगा लेकिन उसकी आवाज धीमी हो गई होगी। जिन्दा रहना पहली शर्त है। क्या पता, रोकनेवाला पिता खुद भी बेटे के पीछे-पीछे चल पड़ा हो। 
किससे कहें? क्या कहें? बुलबुल भी हम और सैयाद भी हम। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में 09 मार्च 2017 को प्रकाशित।) 

जन्म दिन का जश्न न मनने की खुशी

मुकेश इस समय मेरे सामने होता तो शाल-श्रीफल से उसे सम्मानित कर देता।

मेरी ससुराल, इन्दौर-उज्जैन के बीच, सावेर में है। मुकेश मेरा सबसे छोटा साला है। शासकीय विद्यालय में अध्यापक है। रहता तो सावेर में है किन्तु इन्दौर में भी मकान बना लिया है। उसका बड़ा बेटा नन्दन इन्दौर में ही  नौकरी करता है। मुकेश और मेरी सलहज मंजू प्रायः प्रति शनिवार शाम को इन्दौर आ जाते हैं।

आज, रविवार 26 फरवरी, मुकेश-मंजू के छोटे बेटे तन्मय की जन्म तारीख है। इस शनिवार मुकेश-मंजू इन्दौर आए तो तन्मय को भी साथ लेते आए - इस शुभ-विचार से कि पूरा परिवार एक साथ तन्मय का जन्म दिन मना लेगा। मेरे सास-ससुरजी भी इन्दौर ही रहते हैं। हमारा छोटा बेटा तथागत भी इन्दौर में ही नौकरी कर रहा है। 

मुकेश स्वभावतः पारम्परिक और सुविधानुसार प्रगतिशील है। घर का सबसे छोटा बेटा होने से कुछ विशेषाधिकार उसे स्वतः प्राप्त हैं जिनके चलते कभी-कभी मुझे भी, बिना असम्मान बरते, ‘सद्भावना और सदाशयतापूर्वक’ हड़का देता है। 

तो, इन दिनों जैसा कि चलन बन गया है, बच्चों ने, 25 और 26 फरवरी की सेतु रात्रि की बारह बजे, तन्मय के जन्म दिन का केक काटना और जश्न मनाना तय कर तदनुसार साज-ओ-सामान जुटा लिए। 

आधी रात में जन्म दिन मनाना मुझे आज तक न तो सुहाया न ही समझ में आया। आधी रात में तारीख बदलना मुझे एक ‘व्यवस्था’ लगती है, (प्रमुखतः यात्रा टिकिटों के आरक्षण को लेकर) संस्कृति और परम्परा नहीं। किन्तु सम्भवतः, 31 दिसम्बर की आधी रात को नए साल के आगमन का जश्न मनाने से यह व्यवस्था, परम्परा का रूप लेती हुई संस्कृति बन गई। आधुनिक और प्रगतिशील होने का दिखावा करने की होड़ में हम भारतीय ‘अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेज’ हो गए और भूल गए कि हम ‘उदय तिथि’ वाले लोग हैं। हमारा दिन सूर्योदय से प्रारम्भ होता है। इसीलिए, आधी रात में जन्म दिन वर्ष गाँठ का उत्सव मनाना आज तक मेरे गले नहीं उतर पाया है। बहुत पहले मैं ऐसा करने से रोकने की कोशिश करता था किन्तु एक बार भी सफल नहीं हो पाया। बच्चों के माँ-बाप मुझसे सहमत होते और बच्चों के सामने हथियार डाल, मेरे सामने झेंपते। जल्दी ही मुझे अकल आ गई और भारतीय संस्कृति को बचाने का यह महान् काम मैंने बन्द कर दिया। लेकिन दुःखी तो होता ही हूँ। ऐसे में, ऐसे उपक्रमों की खिल्ली उड़ाकर अपनी भड़ास निकाल लेता हूँ और खुश होकर अपनी पीठ थपथपा लेता हूँ।

आज सुबह, अपने प्रिय भतीजे को शुभाशीष और शुभ-कामनाएँ देने से पहले मेरी उत्तमार्द्ध ने, जश्न के हालचाल जाने के लिए तथागत को फोन लगाया। तथागत ने जवाब दिया - “कौन सा जश्न मम्मी? कोई जश्न-वश्न नहीं हुआ। मामाजी को मालूम हुआ तो उन्होंने डाँट दिया। बोले - ‘ये क्या उल्लूपना है? कोई कहाँ से आएगा और कोई कहाँ से। आधी रात में आते-जाते कहीं कुछ हो गया तो मुँह काला हो जाएगा। लेने के देने पड़ जाएँगे। चुपचाप सो जाओ। जो भी करना हो, सुबह करना।’ इसलिए हमारा तो सारा जश्न धरा का धरा रह गया मम्मी।” 

‘उदय तिथि’ वाले मुद्दे पर उत्तमार्द्धजी भी मेरी पार्टी में हैं। सो, तथागत का जवाब सुनकर हँस-हँस कर दोहरी हो गई। इसी दशा में, बड़ी मुश्किल से मुझे सारी बात बताई।  हँसी तो मुझे भी आई किन्तु खुशी ज्यादा हुई। नहीं जान पाया (न ही जानना चाहा) कि मुकेश ने यह सब मानसिकता के अधीन किया या व्यावहारिकता के अधीन। किन्तु बात मेरे मन की थी। मेरी तबीयत खुश हो गई।  मैंने फौरन ही मुकेश को फोन लगाया और इस ‘नेक काम’ के लिए खूब प्रशंसा की और बधाइयाँ दी। मेरी मनःस्थिति और बधाई देने का कारण जान कर मुकेश भी खूब खुश हुआ और हँसा। मैंने कहा - ‘फटाफट तुम चारों का फोटू भेजो।’ उसने पूछा - ‘क्या करोगे जीजाजी?’ मैंने कहा - ‘क्या करूँगा? अरे भई! तेने वो काम किया जो मैं चाहता हूँ कि सब करें। तू मेरे सामने होता तिलक लगा कर शाल-श्रीफल से तेरा सम्मान कर देता। मुझसे खुश समेटी नहीं जा रही। अपनी खुशी बाँटूँगा। उसी के लिए फोटू चाहिए। फटाफट भेज।’

मुकेश ने अभी ही फोटू भेजा और उतनी ही फुर्ती से मैं अपनी खुशी का विस्तार कर रहा हूँ।

नेक काम में भला देर क्यों?
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(चित्र में बॉंये  से तन्‍मय, मुकेश, मंजू और नन्‍दन)

मेरा कस्बा: मेरा देश

मेरे कस्बे में हुई  कुछ कार्रवाइयों का संक्षिप्त ब्यौरा दे रहा हूँ। मेरी इन बातों से जिज्ञासु मत हो जाइएगा वर्ना यह जानकर पछताएँगे कि यह सब तो आपके यहाँ भी हो रहा है। होता चला आ रहा है।
कुछ व्यापारिक/वाणिज्यिक अट्टालिकाओं पर कलेक्टर की नजर पड़ गई।  सबके निर्माण में स्वीकृत मानचित्र का उल्लंघन किया गया था। पार्किंग की व्यवस्था तो एक में भी नहीं पाई गई। कलेक्टर ने सबको लाइन में लगा दिया। कुछ को कठोर कार्रवाई का नोटिस दिया गया तो कुछ पर कुछ दिनों की तालाबन्दी भी हो गई। कस्बे में हंगामा मच गया। लेकिन दुःखी होनेवाले कम, खुश होनेवाले अधिक। ऐसे लोग सबसे ज्यादा खुश जो आज तक इनमें नहीं गए और शायद ही कभी जाएँगे। आर्थिक विषमता सेे उपजे सामाजिक, सरकारी व्यवहार के चलते हर कोई इसी बात से खुश था कि ‘करोड़ोपतियों’ पर हाथ डाला गया। हम सुखी नहीं तो वो भी सुखी क्यों? खुशी इस बात की भी रही कि लिख कर देने के लिए किसी को बुरा नहीं बनना पड़ा और मनचाही हो गई। लोग कलेक्टर के गुणगान में मगन हो गए।
मेरे कस्बे की एक सड़क है - लक्कड़पीठा सड़क। यहाँ एक छोटा सा देवालय है। आबाल-वृद्ध नर-नारी आते-जाते यहाँ माथा टेकते हैं। वार-त्यौहार पर धूमधाम से आस्था जताते हैं। देवालय से लगभग सटी हुई, देशी शराब की दुकान है। दुकान ने देवालय को लगभग ढक लिया है। परिणामस्वरूप देवालय जानेवालों को दारू की दुकान कुछ इस तरह से पार करनी पड़ती है मानो ठेकेदार से अनुमति ले रहे हों। साँझ घिरने के बाद देवालय आने-जानेवाले इसके देवता को माथा टेकने से पहले अपने-अपने देवता को याद करते हैं। महिलाएँ, बच्चियाँ तो तब जाने की सोच भी नहीं सकतीं।
दारू की इस दुकान को हटाने के लिए लोग महीनों से आन्दोलनरत हैं। बीसियों बार लिख कर कलेक्टर को दे चुके हैं। सड़क पर उतर चुके हैं। बीच में तो क्रमिक धरना-अनशन शुरु हो गया था। अखबार भी इस सबमें हिस्सेदारी कर चुके हैं। लेकिन दुकान जस की तस बनी हुई है।
इसी तरह गाँधी नगर में देशी शराब की एक दुकान है। दुकान के ठीक सामने, सड़क की दूसरी ओर सरकारी स्कूल है। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि स्कूल के सामने दारू की दुकान है। ‘गाँधी नगर’ नाम से ही मालूम हो जाता है कि इस स्कूल में उन्हीं लोगों के बच्चे पढ़ते हैं जो अपने बच्चों को ढंग-ढांग के, अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में नहीं भेज सकते। स्कूल की खिड़की से दारू की दुकान, ग्राहक, आसानी से, बिना किसी कोशिश के नजर आते हैं। तेजी से बजनेवाले रेडियो के गाने स्कूल में सुनाई पड़ते हैं। कानून है कि स्कूल से एक निर्धारित सीमा में दारू की दुकान नहीं हो सकती। यह दुकान इस आदेश को ‘टिली, ली, ली, ली’ करती हुई अंगूठा दिखा रही है। प्रधानाध्यापिका और अध्यापिकाएँ दसियों बार जिला शिक्षा अधिकारी को लिख कर दे चुकी हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं। पालकों को गुस्सा आ गया। हंगामा किया। अखबारों ने हाथों-हाथ लिया। जिला शिक्षा अधिकारी बोले - ‘मुझे तो पता ही नहीं।’ सरकार बोली- ‘हमारे पास तो कोई कागज-पत्तर नहीं आया। आया तो देखेंगे।’ अखबारों ने कलेक्टर पर तंज कसा - ‘मॉलों, बड़ी दुकानों (याने ‘अट्टालिकाओं’) पर तो बिना किसी आवेदन के कार्रवाई! लेकिन स्कूल के मामले में आवेदनों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं।’ सरकार हरकत में आई। छोटे-बड़े अफसर भेजे गए। उन्होंने फिर से आवेदन लिया, दूरी नपवाई, पंचनामा बनाया, रिपोर्ट जिला शिक्षाधिकारी को दी, कलेक्टर को पहुँची। कलेक्टर ने ‘प्रकरण का परीक्षण’ कराया और कहा - ‘फौरन दुकान हटाना सम्भव नहीं। अप्रेल के बाद देखेंगे।’ हंगामा हो गया। लोग विधायकजी के पास पहुँचे। उन्होंने भरोसा दिलाया किन्तु अब तक कुछ नहीं हुआ। लगता है, कलेक्टर की बात सही निकलेगी। 

‘केक्टस गार्डन’ के लिए प्रख्यात सैलाना की ओर जानेवाली सड़क पर एक कॉलोनी बननी शुरु हुई। जोरदार अखबारबाजी हो गई। कलेक्टर ने जाँच करवाई। उजागर हुआ कि सरकारी जमीन पर सड़क बना ली गई है और एक सरकारी नाले को अनुकूलता के लिए मोड़ दिया गया है। अखबारी खबरों के मुताबिक इस सब में एक एसडीएम, एक गिरदावर और नगर एवम् ग्रामीण नियोजन दफ्तर के अधिकारी पहली ही नजर में संलिप्त अनुभव हो रहे हैं। सड़क तोड़ दी गई। नाला मुक्त करा दिया गया। कलेक्टर ने विस्तृत जाँच के बाद किसी भी दोषी को न बख्शने की घोषणा की है। लोगों को भरोसा हो गया है कि किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा।
एक दिन अखबारो में अचानक खबर छपी-कृषि उपज मण्डी की उस जमीन पर कॉलोनी बननी शुरु हो गई है जो मण्डी के विस्तार के लिए सुरक्षित थी। कॉलोनाइजर ने कहा कि उसके पास समस्त सम्बन्धित विभागों की आवश्यक अनुमतियाँ हैं। नगर एवम् ग्रामीण नियोजन विभाग ने कहा कि मण्डी सचिव के अनापत्ति पत्र के आधार पर अनुमति दी गई। मण्डी सचिव ने कहा कि उसके उसने तो अनुपत्ति पत्र जारी ही नहीं किया। कलेक्टर ने फाइल अपने पास बुलवाई। पूछताछ की। जाँच बैठा दी है। मण्डी के कुछ डायरेक्टर जिस तरह से हरकत में आए हैं उससे लग रहा है कि जमीन वापस मण्डी को मिल जाएगी। लेकिन मेरे कस्बे को भरोसा है गैरकानूनी काम करने के लिए कि किसी पर आँच नहीं आएगी। ऐसा आज ही होना शुरु नहीं हुआ। आजादी के बाद से ही हो रहा है। पूरा देश मेरा कस्बा बना हुआ है।
एक लोक कल्याणकारी शासक स्वयम् को केन्द्र में नहीं रखता। वह आज्ञाकारी, शीलवान प्रशासकों को अपनी बुद्धि और विवेक से नियन्त्रित कर मनोनुकूल परिणाम प्राप्त करता है। एक चतुर प्रशासक, आज्ञाकारी और शीलवान बने रहकर अपने शासक को संचालित और नियन्त्रित करता है। प्रत्येक नियन्त्रक, अपने से कम समझ अधीनस्थों के जरिए शासन करता है और प्रत्येक कम समझ अधीनस्थ अपने नियन्त्रक को  दुनिया का सर्वाधिक बुद्धिमान घोषित करते रहने की समझदारी बरत कर अपने नियन्त्रक को मूर्ख बनाये रखता है। कालान्तर में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने ऐसी शालीन, आलंकारिक सुभाषित सूक्तियों का सहज भाष्य इस तरह किया - ‘हमारे मन्त्री नौकरों के नौकर होते हैं।’ याने सरकार जिन कलेक्टरों को नौकरी में रखती है, हमारे मन्त्री उन्हीं के कहे पर चलने लगते हैं। इससे पहले पर्किंसन्स नामक एक अंग्रेज यही बात कह चुका था - ‘भारत सरकार के मन्त्री, चिह्नित स्थानों पर हस्ताक्षर करते हैं।’ (इण्डियन मिनिस्टर्स पुट देयर सिगनेचर्स ऑन डॉटेड लाइन्स।) किन्तु जब अक्षम शासक धूर्तता बरतने लगे, उतने ही धूर्त प्रशासकों की सहायता से खुद को स्थापित करने के एममेव लक्ष्य में जुट जाए तब हतप्रभ, विवश लोग अवाक् मूक दर्शक की स्थिति में आ जाते हैं।
हमने अंग्रेजों से तो मुक्ति पा ली लेकिन अंग्रेजीयत से नहीं। भारत में बीबीसी के सम्वाददाता रहे, प्रख्यात पत्रकार मार्क टली, ने सेवानिवृत्ति के बाद भारतीय नागरिकता ले कर भारत को ही अपना घर बना लिया है। भारतीय प्रशासनिक प्रणाली पर कुछ बरस पहले उनकी टिप्पणी थी कि कलेक्टर के रूप में अंग्रेज आज भी भारत पर राज कर रहे हैं।
मार्क टली की बात आज और अधिक प्रभावशीलता से अनुभव हो रही है। हिन्दू-मुसलमानों को ‘बाँटो और राज करो’ की नीति अंग्रेजों की पहचान रही है। अंग्रेज अघोषित रूप से यह काम करते थे। आज तो सरकारी तौर पर खुले आम हो रहा है। वे भी सरकार में बने रहने के लिए करते थे। आज भी इसीलिए यह हो रहा है।
आगे-आगे देखिए! होता है क्या।
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(दैिनक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में 23 फरवरी 2.17 को प्रकाशित)

दशकों बाद मुझ तक पहुँचा ‘नेता’

कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी की कही बात फौरन समझ में नहीं आती। जब समझानेवाला ही समझाने में मुश्किल अनुभव करे तो भला समझनेवाला कैसे समझे? स्थिति तब और तनिक कठिन हो जाती है जब, समझनेवाला लिहाज के मारे दूसरी बार पूछ भी न सके। तब, वह पल टल तो जाता है किन्तु दोनों ही उलझन में बने रह जाते हैं।

ऐसा ही एक बार हम दोनों भाइयों के बीच हो गया। न मैं समझ सका, न वे समझा पाए। लेकिन उस पल को टालने के लिए उन्होंने जो कहा था वह अब, लगभग सैंतालीस बरस बाद मुझ पर हकीकत बन कर गुजर गया।

यह सत्तर के दशक की बात होगी। मन्दसौर से एक साप्ताहिक अखबार शुरु हुआ। उद्घाटन किया इन्दौर के जुझारू प्रतीक श्री सुरेश सेठ ने। कार्यक्रम की अध्यक्षता दादा (श्री बालकवि बैरागी) ने की। मैं उसका संस्थापक सम्पादक बना। अखबार को लोकप्रिय बनाने के लिहाज से दादा से आग्रह किया कि वे अखबार के पाठकों के प्रश्नों के उत्तर दें। उन्होंने हाँ भर दी। अखबार को जो पत्र मिलते, वे दादा को पहुँचा दिए जाते। उनकी सुविधा से उत्तर आ जाते। स्तम्भ लोकप्रिय हो चला। पाठकों के प्रश्नों की संख्या सप्ताह-प्रति-सप्ताह बढ़ने लगी। इन्हीं में एक प्रश्न आया - ‘विश्वसनीय नेता की क्या पहचान?’ यह प्रश्न मेरी नजर में चढ़ गया। दादा को भेजकर उनके उत्तर की राह देखने लगा। 

दादा के जवाबों का लिफाफा आया तो मैंने अपने सारे काम छोड़कर उसे टटोला। दादा ने जवाब लिखा था - ‘जो अपने कार्यकर्ताओं, अनुयायियों के पीछे खड़ा रहने, उनके पीछे-पीछे चलने की हिम्मत कर सके।’ बात मेरी समझ में बिलकुल ही नहीं आई। उन दिनों आज जैसी फोन-सुविधा तो थी नहीं। दादा का कोई ठौर-ठिकाना नहीं। ‘कविता-काँग्रेस-कवि सम्मेलन’ के चलते आज यहाँ तो कल वहाँ। उनसे बात तब ही हो सकती थी जब या तो वे खुद फोन करें या मन्दसौर आएँ। जवाब को तो छपना था। छाप दिया गया। लेकिन मैं अधीरता से दादा के फोन की या उनके आने की राह देखने लगा।

मेरी तकदीर अच्छी थी कि कुछ ही दिनों बाद अचानक ही वे मन्दसौर आ गए। हम दोनों मिले तो मैंने उनका जवाब समझना चाहा। उन्होंने कोशिश तो की किन्तु न वे खुद ही सन्तुष्ट हो पाए न ही मैं। मैंने कहा - ‘नेता तो सदैव आगे ही रहता है। यह शब्द तो बना ही नेतृत्व से है। ऐसे में पीछे खड़ा रहनेवाला या चलनेवाला भला नेता कैसे हो सकता है?’ मैंने उनसे कोई उदाहरण देकर समझाने को कहा। वे विचार में पड़ गए। मैंने हिम्मत करके कहा - ‘आपने शायद जवाब देने के लिए जवाब दे दिया। ऐसा होता नहीं होगा।’ विचारमग्न स्थिति में ही वे बोले - ‘नहीं। यह कोई टालनेवाली बात नहीं है। यह मेरा विश्वास तो है ही, एक विचार है जिसके उदाहरण शायद ही मिले। आज मैं कोई उदाहरण नहीं दे पा रहा हूँ लेकिन अपने जवाब पर कायम हूँ। आज न सही, कभी ऐसा कोई मौका आएगा जरूर जब तुझे मेरी बात समझ में आएगी।’ मैं क्षणांश को भी सन्तुष्ट नहीं हुआ किन्तु दूसरी बार पूछने की न तो स्थिति थी न ही  हिम्मत।

किन्तु अभी-अभी, दो दिन पहले दादा की बात सच साबित हो गई। मेरा दिमाग झनझना गया। रोंगटे खड़े हो गए।

मध्य प्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग के सेवा निवृत्त एक बड़े अधिकारी श्री रमेश भाई गोधवानी ने वाट्स एप पर मुझे एक वीडियो कतरन भेजी। अन्तरिक्ष वैज्ञानिक, भारत रत्न डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम की, एक मिनिट की इस वीडियो कतरन ने दशकों पुरानी मेरी जिज्ञासा एक झटके में हल कर दी। मुझे मिलने के अगले ही दिन से यह कतरन फेस बुक पर भी आ गई है। हममें से अधिकांश अब तक इसे देख चुके होंगे।

इस कतरन में डॉक्टर कलाम अपना एक अनुभव सुनाते हुए बताते हैं कि 1979 में वे, उपग्रह एसएलवी-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, मिशन डायरेक्टर थे। प्रक्षेपण करते समय कम्प्यूटर के पर्दे पर दो शब्द चमके - ‘डोण्ट लांच।’ लेकिन डॉक्टर कलाम कहते हैं - ‘मैंने इसकी अनदेखी कर दी और उपग्रह प्रक्षेपित कर दिया। लेकिन वह अपनी कक्षा में स्थापित होने के बजाय बंगाल की खाड़ी में गिर गया।’ डॉक्टर कलाम ने कहा - “प्रक्षेपण सफल होता तो मैं बात करता। लेकिन असफल हो गया। अब क्या बात करूँ? लेकिन तभी, भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमेन डॉक्टर सतीश धवन आए और बोले - ‘चलो, पत्रकारों से बात करते हैं।’ मैं घबरा गया। पता नहीं क्या होगा? मुझे अपराधी घोषित कर दिया जाएगा।” 

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर कलाम कहते हैं - “उन्होंने (डॉक्टर धवन ने) पत्रकारों से कहा - ‘हम असफल हुए हैं। लेकिन मैं अपनी टीम के साथ हूँ और उनका समर्थन करता हूँ। हमारी टीम बहुत बढ़िया टीम है। हम अगले वर्ष सफल होंगे।”

और इसके बाद डॉक्टर कलाम ने जो कहा, उसने मेरे बरसों की अनुत्तरित कुँवारी जिज्ञासा को सुहागन कर दिया। डॉक्टर कलाम कहते हैं - “अगले वर्ष प्रक्षेपण कामयाब रहा। डॉक्टर धवन आए और मुझसे कहा - ‘जाओ! पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करो।” वीडियो कतरन, डॉक्टर कलाम के इस वाक्य से समाप्त होती है - ‘नेता वो जो असफलता की जिम्मेदारी खुद ले और सफलता का श्रेय अपने सहयोगियों को दे।’ 

इसके बाद मेरे लिए कुछ भी कहने-सुनने को बाकी नहीं रह जाता। अपने आसपास देखता हूँ तो ‘नेता’ को लेकर अपने समय के अभाग्य पर क्षुब्ध होता हूँ। जिस ‘भारतीय महानता’ की हम दुहाइयाँ देते हैं उसके चलते तो ऐसे उदाहरण हमारे लिए ‘आम’ होने चाहिए किन्तु ऐसा है नहीं। आज तो ऐसे उदाहरण ‘दुर्लभों में दुर्लभ’ हो गए हैं। 

बाकी की तो मैं नहीं जानता। अपनी कह पा रहा हूँ - ‘मैं भाग्यवान हूँ कि एक भुक्तभोगी-नायक द्वारा ऐसे उदाहरण का बखान अपनी आँखों देख पाया, कानों सुन सुन पाया।

समय हर बात का जवाब देता तो है किन्तु अपनी शर्तों पर। धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना शायद उसकी शर्तों में से एक है।

धन्यवाद रमेश भाई गोधवानी। 
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(मेरा अंग्रेजी ज्ञान शून्यवत है। मैंने अपनी सूझ-समझ के अनुसार, डॉक्टर कलाम के वक्तव्य का भावानुवाद करने की कोशिश अपनी सम्पूर्ण सदाशयता से की है। यदि कोई चूक हुई हो तो मैं करबद्ध क्षमा याचना करता हूँ और अनुरोध करता हूँ कि मेरी चूक दुरुस्त करने में  मदद करने का उपकार करें। प्रस्तुत चित्र गूगल से लिया है जिसका कोई वाणिज्यिक उपयोग नहीं किया गया है।)

औरत की दोस्त होती है औरत

मेरी धारणा है कि बुराई के मुकाबले अच्छाई ही ज्यादा है किन्तु जिक्र सदैव बुराईवाले अपवादों का ही होता है। तब हमें लगता है, हमारे चारों ओर बुराई ही बुराई है। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं।

औरतों की बदहाली की बात जब भी होती है तब ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है।’ वाला जुमला कम से कम एक बार तो सुनने को मिल ही जाता है। लेकिन मुझे सदैव लगता रहा है कि ऐसा केवल अपवादस्वरूप हर होता है। मेरी धारणा है कि ‘औरत ही औरत की मित्र होती है।’ मेरी धारणा को बलवती करता एक उदाहरण मुझे कल ही मिला। 

बड़े बेटे वल्कल का, पूना से, वाट्स एप पर भेजा (यहाँ प्रस्तुत) यह सन्देश मुझे बिलकुल ही समझ नहीं पड़ा। पूछने पर उसने जो कुछ बताया वह मुमकिन है, वह सबके लिए नया न हो, मेरे लिए तो नया और कुछ सीमा तक अनूठा  ही रहा। इसने ‘औरत की दोस्त होती है औरत’ की मेरी धारणा भी मजबूत की। 

वल्कल ने बताया कि परस्पर परिचित कुछ महिलाओं ने ’पुला’ (पुणे लेडीज) नाम से, वाट्स एप पर ग्रुप बना रखा है। इस ग्रुप में महिलाओं के ऐसे ही अन्य ग्रुपों से तनिक हटकर भी कुछ होता है। ये महिलाएँ अपनी गृहस्थी से अलग हटकर चलाए जा रहे अपने उपक्रम की जानकारी देती हैं। यह उपक्रम यदि किसी के लिए उपयोगी/सहयोगी होता है तो वे इसे काम में लेकर प्रति शुक्रवार अपनी-अपनी समीक्षा प्रस्तुत करती हैं। उदाहरणार्थ, हमारी बहू प्रशा बच्चों के काम आनेवाला कुछ सामान बेचती है। उसने अपने इस काम की जानकारी ‘पुला’ पर दी। ग्रुप की एक महिला को, अपने परिचित परिवार के दो वर्षीय एक बच्चे के लिए भेंट देने के लिए प्रशा का बनाया ‘भीम कम्बल’ उपयुक्त लगा। उस महिला ने फोन पर अपना आर्डर दिया। सम्भवतः भेंट दिया जानेवाला प्रसंग तनिक जल्दी रहा होगा। उस महिला ने अपनी ‘तत्काल आवश्यकता’ जताई। प्रशा ने उस महिला की आवश्यकतानुसार समय पर कम्बल पहुँचा दिया। अगली ‘शुक्रवार समीक्षा’ में प्रशा को यह प्रशंसा टिप्पणी प्राप्त हुई।

वल्कल के मुताबिक ऐसे ग्रुप कॉलोनी, मुहल्ला स्तर पर बने हुए हैं। मुमकिन है, अपने-अपने वर्गीय-स्तर के मुताबिक महिलाओं ने नगर स्तर पर भी ऐसे  ग्रुप बना रखे हों। महिलाएँ परस्पर खरीददारी कर एक-दूसरे के उपक्रम को सहयोग कर, आर्थिक सम्पन्नता में भी भागीदारी करती हैं। सामान की यह खरीदी-बिक्री, ग्रुप के प्रभाव क्षेत्र के अनुसार कॉलोनी, मुहल्ला और नगर स्तर पर होती है। किन्तु मेरे हिसाब से यह बात आर्थिक सम्पन्नता से कहीं आगे बढ़कर महिलाओं में आत्म विश्वास, खुद की क्षमता पर भरोसे की भावना जगाती-बढ़ाती होगी और फुरसत के समय को ‘उत्पादक समय’ में बदलने को प्रेरित करती होगी। 

वल्कल ने बताया कि ऐसे ग्रुपों पर महिलाएँ अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशने की कोशिशें भी करती हैं। उदाहरणार्थ, कोई महिला अपने बच्चे के स्कूल से सन्तुष्ट नहीं है तो वह अपनी बात यहाँ कहती है। मालूम होता है कि वह अकेली उस समस्या से नहीं जूझ रही। तब ऐसी ‘समान पीड़ित’ महिलाएँ एकजुट होकर स्कूल प्रबन्धन से, अपने ग्रुप की जानकारी देकर बात करती हैं। स्कूल प्रबन्धन को महिलाओं की यह सामूहिकता भयभीत करती है। उन्हें लगता है कि ग्रुप की महिलाओं के जरिए, पूरे शहर में उनकी बदनामी न हो जाए। लिहाजा वे बात अनसुनी नहीं कर पाते। कोई महिला अपने बच्चों का स्कूल बदलना चाहती है तो उसे अन्य स्कूलों के बारे में फौरन ही जानकारी मिल जाती है। 

मैंने अब तक सोशल मीडिया की बुराइयों और उससे उपजे कष्टों के बारे में खूब सुना था। कुछ मामलों में भुक्त-भोगी भी हूँ। किन्तु ऐसे सार्थक सदुपयोग के बारे में पहली ही बार जाना। इसीलिए, यह सब यहाँ बताने से खुद को रोक नहीं पाया। 

यह सब पढ़कर आपको प्रशा के बेचे जानेवाले सामान के बारे में कोई उत्सुकता हो तो उससे मोबाइल नम्बर पर 90096 47745 सम्पर्क कर विस्तार से जाना जा सकता है। मैं भी उससे पूछूँगा। नहीं जानता कि वह क्या-क्या सामान बेचती है। 
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निरपेक्षता का ‘सुमन भाष्य’

शुरु में ही साफ-साफ जान लीजिए, यह आलेख अम्बरीश कुमार पर बिलकुल ही नहीं है।मैं उन्हें नहीं जानता। पहचानता भी नहीं। आज तक शकल नहीं देखी। हाँ नाम जरूर सुना, पढ़ा है। तब से, जब वे जनसत्ता में हुआ करते थे। गए कुछ समय से फेस बुक पर उनसे जरूर सम्पर्क बना है। कभी-कभार मेसेंजर पर उन्हें सन्देश दे देता हूँ। वे मेरे कहे पर ध्यान देते हैं और जवाब भी। उनकी पोस्टें रुचिपूर्वक पढ़ता हूँ। लगता है, मैं उनके जैसा सोचता हूँ या वे मुझ जैसा। जनसत्ता से ओमजी (थानवी) की सेवानिवृत्ति के पहले और बाद में (ओमजी को लेकर) चली बहस में ओमजी पर उनकी तीखी, प्रतिकूल, कड़वी टिप्पणियाँ कभी अच्छी नहीं लगीं। यह मजे की बात है कि मैं ओमजी से भी आज तक नहीं मिला न ही कभी सम्पर्क हुआ। उनका लिखा मुझे झनझना देता है। उनकी सेवा निवृत्ति के बाद दो-एक बार उनसे, मेसेंजर सन्देशों का आदान-प्रदान हुआ। अम्बरीश कुमार के मुकाबले ओमजी मुझे मेरे अधिक नजदीक, अधिक अनुकूल लगे। लेकिन यह आलेख ओमजी पर भी नहीं है न ही इन दोनों के जगजाहिर अन्तर्सम्बन्धों को लेकर। 

वस्तुतः, 15 फरवरी को फेस बुक पर अम्बरीश कुमार का (यहाँ प्रस्तुत) स्टेटस पढ़कर, कोई (कम से कम) पचास बरस पहले सुनी, सुमनजी की कुछ बातें याद आ गईं। सुमनजी याने अपने आदरणीय डॉक्टर शिवमंगलसिंहजी सुमन। 

जगह तो अब याद नहीं आ रही किन्तु बात इन्दौर की है। दादा (श्री बालकवि बैरागी) और सरोज भाई (डॉक्टर सरोज कुमार) भी मौजूद थे। लेकिन ये दोनों किसी और से बातों में व्यस्त थे और सुमनजी किन्हीं दो सज्जनों से बात कर रहे थे। 
ये दोनों सज्जन सुमनजी से मिलने इन्दौर आए थे। किसी ग्रन्थ या स्मारिका के लिए उन्हें सुमनजी से एक लेख चाहिए था। सुमनजी उस ग्रन्थ/स्मारिका के प्रसंग और प्रयोजन की विस्तृत जानकारी चाह रहे थे। आगन्तुकों ने सुमनजी की जिज्ञासाएँ शान्त की और सुमनजी ने लेख लिखने की हामी भर दी। 

मनोरथ पूरा होने से आगन्तुक प्रसन्न थे। सुमनजी के चरण स्पर्श कर उन्होंने जाने की अनुमति ली। चलते-चलते उनमें से एक ने कहा - ‘गुरुदेव! लेख में निरपेक्षता बरतने की कृपा कीजिएगा।’ सुन कर सुमनजी ने अविलम्ब कहा - ‘सुनो! सुनो! रुको! इधर आओ।’ दोनों को लगा, कुछ गड़बड़ हो गई है। घबराहट और अनिष्ट की आशंका उनके चेहरों पर उभर आई। सहमे-सहमे कदमों से दोनों सुमनजी के सामने, हाथ बाँधे खड़े हो गए। अपने मस्तमौला अन्दाज में सुमनजी दोनों को लड़ियाते हुए बोले - ‘अरे! घबराओ मत। लेकिन भाई! यह हमसे नहीं हो सकेगा।’ दोनों को लगा, सुमनजी लेख लिखने से इंकार कर रहे हैं। निरपेक्षता की माँग करनेवाला गिड़गिड़ाते स्वरों में बोला - ‘सर! गलती हो गई। माफ कर दीजिए। लेख से इंकार मत कीजिए। आपका यह कृपा प्रसाद तो हमें चाहिए ही चाहिए।’ सुमनजी जोर से हँसे और बोले - ‘अरे भाई! हमने लिखने से इंकार कब किया? वो तो हम लिख देंगे। लेकिन भाई! यह निरपेक्षता हम नहीं बरत पाएँगे।’ दोनों की साँस में साँस आई। साथ-साथ आँखें भी गीली हो आईं। मानो जीवन-धन नष्ट हो जाने से बच गया हो, कुछ इस तरह बोले - ‘जैसा आप ठीक समझें गुरुदेव। हमें तो बस! लेख प्रदान कर दीजिएगा।’ सुमनजी फिर हँसे। बोले - ‘पूछोगे नहीं कि हम निरपेक्षता क्यों नहीं बरतेंगे?’ सामनेवाला हकला गया। शब्द गले में घुट गए। बाहर नहीं निकल पाए। अपनी रौ में बहते हुए सुमनजी बोले - ‘कई बात नहीं। हम ही बता देते हैं। तुम्हारे काम आएगी। सुन लो।’ दोनों मानो मन्त्र-बिद्ध-जड़ हो गए हों। 

अपने अन्दाज में सुमनजी ने जो कुछ कहा उसका मतलब था कि हम सब सापेक्षिक हैं। कोई निरपेक्ष नहीं होता। चाह कर भी नहीं हो पाता। हम सब अपनी-अपनी धारणाओं, अपने-अपने आग्रहों के साथ जीवन जीते हैं। हम जब खुद के निरपेक्ष होने की बात करते हैं तो निरपेक्ष नहीं होते। हम एक पक्ष बनकर ही विवेचन कर, निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। किसी और की वही बात हमें निरपेक्ष लगती है जो हमारी धारणा, हमारे आग्रह से मेल खाती है। वास्तव में निरपेक्ष होने के लिए हमें श्रीमद्भागवत गीता में योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा बताए ‘साक्षी भाव’ को आत्मसात करना पड़ेगा जो आप-हम जैसे सामान्य मनुष्यों के लिए लगभग असम्भव ही है। अपनी बात का भाष्य कर सुमनजी बोले - ‘इसलिए भाई! हमसे निरपेक्षता की उम्मीद मत करना।’ दोनों आगन्तुकों की तन्द्रा टूटी। शीश नवाया, एक बार फिर सुमनजी के चरण स्पर्श किए और बगटुट निकल लिए।

पचास बरस पहले सुमनजी ने जो भाष्य किया था, अम्बरीश कुमार के स्टेटस ने कुछ इस तरह याद दिला दिया मानो सुमनजी की बात सुने बिना ही सुमनजी को दोहरा रहे हों।

अच्छा लगा। सुमनजी को याद करके भी और उनकी कही बात को फिर से सुनकर भी।
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पेढ़ी के जेवर होते हैं दलाल

दलाल कथा - 04

इससे पहले कि मैं (दलाल से जुड़ा) मेरेवाला किस्सा सुनाता, एक किस्सा अपने पाँवों चलकर मुझे तक आ पहुँचा। वही किस्सा, दो कारणों से पहले सुना रहा हूँ। एक कारण तो यह कि मेरावाला मेरा आँखों देखा है जबकि मुझ तक आया यह किस्सा ‘आपबीती’ है। दूसरा कारण, अपनी पूँजी सुरक्षित रख, पहले परायी पूँजी पर अपनी दुकानदारी कर लेने का लालच। 

किस्सा सुनने के लिए दो काल्पनिक नाम तय कर लेते हैं। एक नाम दलाल का और दूसरा सेठ का। दलाल का नाम जीतमलजी और सेठजी का नाम बालचन्दजी। इन्हें हम जीतूजी दलाल और बालू सेठ के नाम से जानेंगे। मेरी, अब तक की तीनों ‘दलाल कथाएँ’ पता नहीं कैसे जीतूजी के पोते तक पहुँची। उसने अपने दादाजी को पढ़कर सुनाईं। इन्हें सुनकर ही जीतूजी ने मुझे तलाशा और मुझ तक पहुँचे। उनकी अवस्था इस समय बयासी वर्ष है। अपने जमाने में वे कड़क और दमदार दलाल रह चुके हैं। 

जीतूजी के मुताबिक यह किस्सा, दलाल के रूप में उनके शुरुआती काल का है। साफ-सुथरा काम और ईमानदारी आदमी को पहचान, प्रसिद्धि  दिलाती है और आत्म सन्तोष प्रदान करती है। किन्तु सयाने लोग कह गए हैं कि पैसा और प्रसिद्धि हजम करना आसान नहीं होता। इसलिए आदमी के अहंकारी होने की आशंकाएँ बराबर बनी रहती हैं। जीतूजी को पता ही नहीं चला कि वे कब इस आशंका के शिकार हो गए।

लेकिन ऐसा केवल जीतूजी के साथ ही नहीं हुआ। बालू सेठ भी इसके शिकार बन बैठे। बीच बाजार में दुकान थी। खूब साखवाली पेढ़ी। रामजी राजी थे। व्यापार अटाटूट। लक्ष्मीजी मानो बालू सेठ पर लट्टू हो कर ‘चंचला’ से ‘स्थिर’ बन गई हों। लेकिन वह व्यापार ही क्या जिसमें पूँजी की जरूरत न बनी रहे! सो जीतूजी और जीतूजी जैसे कुछ और दलालों का आना-जाना बालू सेठ की पेढ़ी पर बना रहता। 

लेकिन एक दिन उनके मन में ऐसा विचार आया जिसके लिए जीतूजी का कहना रहा - ‘लक्ष्मीजी ने तो बालू सेठ की तिजोरी में वास कर लिया लेकिन उनके वाहन ने बालू सेठ के दिमाग पर सवारी कर ली।’ एक दिन, अचानक ही जीतूजी से कहा - ‘जीतूजी! दलाल, दलाल तो होता है लेकिन वह कर्ज वसूली करनेवाला भी होता है। आप भले ही मेरे लिए पूँजी लेकर आओ लेकिन देखनेवाला तो उल्टा भी समझ सकता है। लोग यह समझें कि कोई वसूली करनेवाला मेरी पेढ़ी पर आया है, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। आगे से आप मत आना। मुझे खबर कर देना। मैं रकम लेने के लिए मुनीमजी को भेज दूँगा।’ 

जीतूजी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। बालू सेठ ने यह क्या कह दिया? उन्हें पता भी है कि उनकी इस बात का क्या मतलब निकलेगा? अविश्वासी नजरों से बालू सेठ को घूरते हुए बोले - ‘बोलने से पहले थोड़ा सोच लिया करो सेठ। आपको पता भी है कि आपने क्या कह दिया?’ बालू सेठ ठसके से बोले - ‘सोच कर ही कहा। आप मत आना। मैं मुनीमजी को भेज दूँगा।’ जीतूजी ने दुगुने ठसके से कहा - ‘एक बार फिर सोच लो सेठजी। इसी तरह व्यापार करना है तो दलालों के लिए दुकान के दरवाजे खुले रखना पड़ेंगे। दलालों का आना-जाना बन्द कर दिया तो लोग आपका बाजार से उठा देंगेे।’ बालू सेठ को जैसे करण्ट लग गया। हाथ का काम छोड़ तनिक गुस्से में बोले - ‘क्या मतलब आपका? मैं किसी की मेहरबानी से बाजार में बैठा हूँ?’ उसी ठसके से जीतूजी बोले - ‘किसी की मेहरबानी से तो नहीं बैठे लेकिन आप-दुश्मनी करके लोगों को मौका दे रहे हो।’ जीतूजी के तेवर और ठसका देख बालू सेठ एकदम नरम पड़ गए। बाले- ‘मैं तो सबकी बोलती बन्द करने का काम कर रहा हूँ और आप एकदम उल्टी बात कर रहे हो!’ अब जीतूजी दुगुने नरम हो गए। कुछ इस तरह बोले मानो मक्खन में छुरी गिर रही हो - ‘सेठजी! बाजार में बैठना हो तो बाजार का चाल-चलन मानना पड़ता है। बाजार के रीति-रिवाज निभाने पड़ते हैं। आपने तो एक झटके में दलालों का रास्त बन्द करने की बात कह दी। लेकिन लोग देखेंगें-सुनेंगे कि पूँजी के लिए बालू सेठ के मुनीम दलालों के चक्कर काट रहे हैं तो लोग दुकान के सामने आकर ‘हुर्राट्ये’ लगाना (याने कि हूटिंग करना) शुरु कर देंगे। बैठना मुश्किल हो जाएगा। अगले ही दिन दरी-गादी झटकने की नौबत आ जाएगी। लक्ष्मीजी टूटमान (महरबान) है तो कदर करो।  आज कह दिया सो कह दिया। आगे से ऐसा कहना तो दूर, कहने की सोचना भी मत।’

बालू सेठ की मानो घिघ्घी बँध गई हो। कहाँ तो लोगों की बोलती बन्द करने चले थे और कहाँ खुद के ही बोल नहीं फूट रहे! पूरा शरीर पसीने में भीग गया और आँखे डबडबा आईं। बड़ी मुश्किल से बोले - ‘ठीक कह रहे हो जीतूजी। मेरी ही मति मारी गई थी जो ऐसी आपघाती बात कर बैठा। मेरी तकदीर अच्छी थी कि आपसे कही, किसी और से नहीं। आज आपके मुँह से साक्षात् भगवान बोले। आपके पाँव धोकर पीयूँ तो भी कम। मुझे माफ कर देना और इसी तरह आगे भी मेरा ध्यान रखना।’ कह कर बालू सेठ ने मानो जबरन खुद को गादी पर धकेला।

जीतूजी और पिघल गए। बोले - ‘ऐसा कुछ भी नहीं बालू सेठ! समझ लो ग्रह-नक्षत्र अच्छे थे। बुरी घड़ी टल गई। मैं आपसे न तो अलग हूँ न ही दूर। आप हो तो मैं भी हूँ।’ फिर मानो बाजार का चरित्र-सूत्र बखान किया - ‘भगवान की दया से सेठाणीजी के पास पेटी भर जेवर होंगे। जेवर  सेठाणीजी को राणी पदमणी (रानी पद्मिनी) ही नहीं बनाते, वो आपकी हैसियत की डोंडी  भी पीटते हैं। इसी तरह सेठजी! दलाल भी पेढ़ी के जेवर हैं। ये पेढ़ी की हैसियत भी बताते हैं और मान भी बढ़ाते हैं।’
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