मिजाज खोने से कैसे चलेगा?’

- काका कालेलकर

‘सुधारक हमेशा अल्पमत में होता है। रूढ़िवादी बहुमत में और अधिकार सम्पन्न होते हैं। इसलिए अपने मिजाज पर काबू रखना ही अल्पमत सुधारक की ताकत होती है।’

जब मैं पहले-पहल गाँधीजी से मिला और उन्होंने आश्रम में दाखिल होने के लिए आमन्त्रित किया तो मैंने कहा, ‘आपकी अहिंसा पर मेरा अभी तक पूरा विश्वास नहीं जमा है। अहिंसामय जीवन परमानुकूल है, उन्नतिकारक है, इतना तो मैं देख सका हूँ। उसके प्रति मेरा आकर्षण भी है। लेकिन मैं यह नहीं मानता कि अहिंसा हमें स्वराज्य दिलाएगी। स्वराज्य मुझे सबसे प्यारा है; उसके लिए मैं हिंसा करने को भी तैयार हो जाऊँगा और बाद में चाणक्य की भाँति प्रायश्चित कर लूँगा। ऐसी हालत में आप मुझे अपने आश्रम में कैसे ले सकते हैं?’

गाँधीजी मुस्कराते हुए बोले, ‘जो तुम्हारे विचार हैं, वही सारी दुनिया के हैं। तुमको आश्रम में न लूँ तो किसको लूँ? मैं जानता हूँ कि बहुमत तुम्हारा है। लेकिन में सुधारक हूँ। आज अल्पमत में हूँ। अतः मुझे धैर्य के साथ राह देखनी चाहिए। सुधारक अगर बहुमत की बात बर्दाश्त न करे, तो दुनिया में उसी को बहिष्कृत होकर रहना पड़ेगा।’

एक जवाब से गाँधीजी ने अच्छी तरह समझाया है कि सुधारक का धर्म क्या है।

कभी किसी ने गाँधीजी से पूछा, ‘आपकी राय में विनोद का जीवन में कितना स्थान है?’ वे बोले, ‘आज तो मैं महात्मा बन बैठा हूँ, लेकिन जिन्दगी में मुझे हमेशा कठिनाइयों से लड़ना पड़ा है। कदम-कदम पर निराश होना पड़ा है। उस वक्त अगर मुझमें विनोद न होता, तो मैंने कब की आत्महत्या कर ली होती। मेरी विनोद-शक्ति ने ही मुझे निराशा से बचाया है।’

इस जबाब में गाँधीजी ने जिस विनोद-शक्ति का विचार किया है, वह केवल शाब्दिक चमत्कार द्वारा लोगों को हँसाने की बात नहीं है, बल्कि लाख-लाख निराशाओं में अमर आशा को जिन्दा रखने वाली आस्तिकता की बात है। छोटे बच्चे जब गलतियाँ करते हैं, शरारतें करते हैं, तब हम उन पर गुस्सा नहीं करते। मन में सोच लेते हैं कि बच्चे ऐसे ही होते हैं। इसमें मिजाज खोने की क्या बात है? जब ये होश सम्भालेंगे, अपनी गलतियाँ अपने आप ही समझ लेंगे। सुधारक के हृदय में यह अटूट विश्वास होना चाहिए कि दुनिया धीरे-धीरे जरूर सुधर जाएगी। दुनिया भी बच्चा ही तो है!

मुझे एक प्रसंग याद आता है। ‘परिगणित जाति-आयोग’ के काम से हम मुसाफिरी कर रहे थे। रास्ते में एक साथी की पेटी गायब हो गई। वे बहुत बिगड़े, सब पर नाराज हुए। आखिरकार मेरे पास आए और ऊँची आवाज में उन्होंने सारा किस्सा कह सुनाया। मैंने उन्हें शान्ति से कहा, ‘बड़े अफसोस की बात है कि आपने अपनी पेटी खोई। लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा कि अपनी पेटी के साथ-साथ आप अपना मिजाज भी क्यों खो बैठे हैं?’ वे हँस पड़े। उन्हें खोया हुआ मिजाज तुरन्त मिल गया। और काफी कोशिश के बाद उनकी पेटी भी मिल गई।

मैंने देखा कि जिन्दगी में मनुष्य के नसीब में हार-जीत आती रहती है। कई बार मनुष्य अपनी पूँजी खो बैठता है, वसीला खो बैठता है। लेकिन उसकी आखिरी पूँजी तो उसका मिजाज ही होता है। जब तक मनुष्य ने मिजाज नहीं खोया है, उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

सुधारक तो हमेशा अल्पमत में होता है। रूढ़िवादी ही बहुमत में होते हैं, अधिकार-सम्पन्न होते हैं। ऐसी हालत में दुनिया के साथ दोस्ती रखना, नाराज न होना और मिजाज न  खोते हुए अपना हाथ ऊपर रखना उसी के लिए साध्य है, जो हमेशा मुस्कराता रहता है और प्रसन्न रहकर लोगों के साथ पेश आता है। 

सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रधान अमात्य चाणक्य से किसी ने आकर घबराते हुए कहा, ‘स्वामिन्! आपके साथियों ने आपको दगा दिया है। वे शत्रुओं से जाकर मिले हैं। आपकी फौज भी बिगड़ गई है और आपको छोड़कर शत्रु के पास जाने की तैयारी कर रही है।’ चाणक्य ने शान्ति से जवाब दिया, ‘और भी जिनको जाना हो, शौक से चले जाएँ। मेरी बुद्धि मुझे न छोड़ जाए, तो बस है - बुद्धिस्तु मा गान्मम।’ संकट-काल में परिस्थिति को सम्भालने वाली ऐसी अघटित-घटना-पटीयसी बुद्धि को ही मिजाज कहते हैं।

पूना के एक भाई बड़े मसखरे थे। लम्बे प्रवास के बाद घर आए तो देखते हैं कि घर का ताला नहीं खुलता। क्या किया जाए? नाराज होने से ताला थोड़े ही समझने वाला था! वे नाटकीय स्वर में बोले, ‘अरे कमबख्त ताले! मैंने तुझे पूरे दाम देकर खरीदा था। मैं तेरा मालिक हूँ। तू मेरा क्रीत दास है। मैं दो महीने बाहर क्या गया, तू मुझे भुला ही बैठा! ठहर, अब मैं तुझ पर स्नेह-प्रयोग करता हूँ। खोल तो जरा अपना मुँह!’ और उन्होंने तेल की दो तीन बूँदें ताले में डालकर फिर चाबी घुमाई। ताला तुरन्त खुल गया। घर के सब लोग, जो बाहर प्रतीक्षा में खड़े-खड़े तंग आ गए थे, प्रसन्न हो गए, और उसी शुभ प्रसन्नता के साथ उन्होंने गृह-प्रवेश किया। हमारे सामाजिक जीवन में रूढ़ि के ताले ऐसे ही खुल सकते हैं।

सुकरात यूनान के प्रथम पंक्ति के तत्वज्ञानी सन्त थे, और थे अपने जमाने के कड़े टीकाकार। लेकिन मिजाज के पक्के थे। कभी होश-हवास नहीं खोते थे। एक दिन उनकी पत्नी गुस्से में आकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी; लेकिन सुकरात बर्फ की तरह ठण्डे ही रहे। यह देखकर पत्नी का मिजाज और भी बिगड़ गया। उसने गन्दे पानी की एक बाल्टी सुकरात के सिर पर उँडेल दी। सुकारात हँस कर बोले, ‘इतनी गर्जना के बाद तो बारिश होनी ही थी!’ ऐसे ठण्डे मिजाज के कारण ही सुकरात अपने जमाने को सुधार सके।

महाराष्ट्र के सन्त-कवि और समाज-सुधारक तुकाराम भी अपनी पत्नी के साथ शान्ति से काम लेते थे। वे अपने अनुभव से कहते हैं, ‘मना करा रे प्रसन्न, सर्व सिद्धीचें कारण’, अर्थात् अपने मन को प्रसन्न रखो, वही सब सिद्धियों का मूल है।

मैंने यह लेख गाँधीजी की विनोद-शक्ति के नमूने से प्रारम्भ किया है। इसका अन्त भी मैं इस वाक्य से करूँगा, जो गाँधीजी ने सेवाग्राम की अपनी कुटी में लिख रखा था, ‘जब आप ठीक हैं, तब तो मिजाज सम्भालना आपके लिए आसान भी है। और जब आपकी बात ठीक नहीं है तब मिजाज खोने से कैसे चलेगा?’

इसलिए, सबसे बड़ी हानि मिजाज खोने में ही है। जो मिजाज खोता है, कमजोर पड़ता है, अन्धा बनता है और खुद अपना ही शत्रु बनता है। जो मिजाज नहीं खोता, उसका भविष्य उज्ज्वल है।

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(‘गांधी-मार्ग’, जनवरी-फरवरी 2022 अंक से साभार।)

 


 


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