मरी गायों को दुहने वाले

अब तक तो मुझे सन्देह ही था किन्तु अब मुझे आकण्ठ विश्वास हो गया है संघ के विहिप, बजरंग दल जैसे आनुषंगिक संगठनों का गौ-प्रेम, पाखण्ड और प्रदर्शन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। सारी दुनिया जीवित गाय का दूध दुहती है किन्तु ये लोग मरी गाय को दुहते हैं।

गए दिनों मेरे कस्बे में और मेरे कस्बे से 34 किलोमीटर दूर दूसरे कस्बे में हुई घटनाओं ने मेरे सन्देह को विश्वास में बदला। कुछ दिनों पूर्व, एक रात, मेरे कस्बे में एक लावारिस ट्रक मिला जिसमें गायें निर्ममता और क्रूरतापूर्वक ठूँस-ठूँस कर भरी हुई थीं। इसी कारण कुछ (इनकी संख्या इस समय मुझे 17 याद आ रही है) गायें मर गईं। खबर मिलते ही विहिप और बजरंग दल के लोग मौके पर पहुँचे। बात सचमुच में गम्भीर और उत्तेजित करने वाली थी। अगली सुबह लोग जब उठे तो उन्हें मालूम हुआ कि आज नगर बन्द की घोषणा की गई है। बन्द की यह घोषणा इतनी आकस्मिक थी कि पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को भी अत्यन्त विलम्ब से इसकी सूचना मिली। पुलिस अधीक्षक तो अपने निर्धारित कार्यक्रमानुसार यात्रा पर निकल चुके थे। उन्हें रास्ते में खबर मिली तो उल्टे पाँव लौटकर जिला मुख्यालय पहुँचे।ऐसे अवसर पर जैसा कि होता ही है, इन संगठनों ने ‘शत प्रतिशत बन्द’ के लिए यथा सम्भव जोर जबरदस्ती की। ‘अपनी सरकार’ होने के कारण ये अतिरिक्त उत्साहित और निश्चिन्त तो पहले से ही थे। अपराह्न में बड़ा जुलूस निकला जिसमें विभिन्न समाजों के संगठन भी शरीक हुए। इनमें वे समाज भी शामिल थे जो ‘अहिंसा और जीव दया’ को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। छुटपुट अप्रिय घटनाओं को छोड़कर बन्द निपट गया। प्रशासन ने अपनी सूझबूझ के अनुसार स्थिति को सामान्य बनाए रखने के यथा सम्भव प्रयास किए। वे सफल भी हुए।

प्रशासन ने मृत गायों को अपनी देखरेख में गड़वाया और शाम होते-होते सब सामान्य हो गया।

अगले दिन इन संगठनों के कार्यकर्ता उस स्थान पर बड़ी संख्या में एकत्र हुए जहाँ गायों को गाड़ा गया था। इन्होंने ‘महा आरती’ की, गायों को श्रध्दांजलि दी और शासन से माँग की कि ‘इस स्थान’ पर मृत गायों का स्मारक बनाया जाए। इसके बाद प्रशासन ने अपना काम शुरु किया। ट्रक से सम्बन्धित लोगों की धर पकड़ के लिए भाग दौड़ हुई। कुछ दिनों तक अखबारों में छुटपुट समाचार छपते रहे। उसके बाद, क्या हुआ, किसी को पता नहीं। गायों की अकाल मृत्यु से आक्रोशित, उत्तेजित ‘गौ प्रेमियों' ने क्या किया, किसी को कुछ पता नहीं।

दूसरी घटना इसके कुछ ही दिनों बाद हुई। लोगों ने देखा कि मेरे कस्बे से 34 किलोमीटर दूर स्थित जावरा के पास, मन्दसौर की दिशा में, कोई सात-आठ किलोमीटर दूर, सड़क के दोनों ओर कुछ मृत गायें पड़ी हुई हैं। इस बार भी विहिप और बजरंग दल के लोग ही सबसे पहले पहुँचे और आक्रोश प्रकट करते हुए महू-नीमच प्रान्तीय राज मार्ग पर चक्का जाम कर दिया। दोनों दिशाओं में वाहनों की लम्बी कतारें लग गईं। जावरा नगर पालिका पर कांग्रेस काबिज है और एक मुसलमान अध्यक्ष है। सो इस घटना में, मेरे कस्बेवाली घटना के मुकाबले ‘भाई लोग’ तनिक ‘अतिरिक्त उत्साहित’ थे। (मेरे कस्बे में नगर निगम पर भाजपा काबिज है और महापौर भी भाजपा की ही है, सो यहाँ ‘उतनी गुंजाइश’ नहीं रह गई थी।) ‘भाई लोगों’ ने नगर पालिका और अध्यक्ष को निशाने पर लिया। कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और तमाम अधिकारी भाग कर मौके पर पहुँचे। घटना की पूरी जानकारी ली तो मालूम हुआ कि मृत गायें जावरा की एक गौ शाला की थीं जिन्हें मरने के बाद ‘अन्तिम संस्कार’ के लिए लाया गया था और सड़क किनारे, खुले में ही डाल दिया गया था। नगर पालिका की लिप्तता न होने से ‘भाई लोगों’ को निराशा हुई। प्रशासन ने इस बार भी मामले को तत्परता से निपटाया। बाद में, सभी पक्षों की बैठक हुई जिसमें विहिप पदाधिकारियों ने गौ शाला के लोगों को खूब फटकारा और पूछा कि यदि मृत गायों का अन्तिम संस्कार ढंग से नहीं कर सकते हैं तो गौ शाला चलाने का क्या मतलब है? यहां यह उल्‍लेखनीय है कि गौ शाला के संचालन में इन 'भाई लोगों' का संस्‍थागत/सांगठनिक स्‍तर पर न तो कोई आर्थिक योगदान है और न ही प्रबन्‍धन में किसी प्रकार की भागीदारी। बैठक समाप्ति के बाद सब अपने-अपने घर चले गए। इस घटना के बाद भी अब तक मालूम नहीं हो सका है कि ‘गौ प्रेमियों ने क्या किया।

इन दोनों घटनाओं में ‘कुछ करने’ के नाम पर ‘गौ प्रेमी’ उत्तेजित/आक्रोशित हुए, घटना के जिम्मेदार लोगों के विरुध्द कार्रवाई की माँग की, प्रदर्शन किया, जुलूस निकाला, ज्ञापन दिया, नगर बन्द कराया, मृत गायों का स्मारक बनाने के लिए शासन से माँग की, गौ शाला के संचालकों को डाँटा/फटकारा। बस।


दोनों घटना क्रमों को मैंने ध्यान से देखा तो अनुभव किया कि विहिपियों और बजरंगियों ने गौ रक्षा के नाम पर खुद तो कुछ भी नहीं किया! इनमें से एक को भी, कस्बों में ‘आवारा’ की दशा में घूमती हुई और मैला या पोलिथीन खाती हुई गायें नजर नहीं आईं। इस तरह घूमती और पेट भरती गायों के शरीर में इन्हें न तो तैंतीस करोड़ हिन्‍दू देवी/देवताओं के निवास करने की बात याद आती है न ही इन्हें गाय ‘पवित्र और पूजनीय पशु’ अनुभव होता है। इनमें से अनेक लोग अपने-अपने व्यापार और काम-धन्धे में पोलिथीन थैलियों का उपयोग प्रचुरता से करते हैं-यह जानते हुए भी कि पोलिथीन की ये थैलियाँ खाने से अनेक गायें (मेरे कस्बे में ही) मर चुकी हैं। किन्तु एक भी माई के लाल ने, पोलिथीन थैलियों का उपयोग बन्द करने की सौगन्ध नहीं खाई। और तो और, मेरे कस्बे के जुलूस में शामिल विभिन्न समाजों ने भी इस दिशा में अपने सदस्यों को संकल्पित करने के बारे में आज तक नहीं सोचा।

हम सब जानते हैं कि गायों के ‘ऐसे’ व्यापार में मुसलमानों का प्राधान्य है। लेकिन हम सब यह भी जानते हैं कि मुसलमान तो गाय पालते नहीं। फिर ये लोग इतनी गायें कहाँ से ले आते हैं? स्पष्ट है कि हिन्दू लोग ही इन्हें बेचते हैं। मैंने, क्षीण होती अपनी स्मृति पर भरपूर जोर डाला किन्तु याद नहीं आया कि विहिपियों, बजरंगियों ने गायों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की हो या हिन्दुओं से, घर-घर जाकर कहा हो कि वे ‘अपनी बूढ़ी माँ’ को बेचें नहीं, किसी गौ शाला को सौंप दें। अपनी बूढ़ी माँ को बेचने वाले हिन्दुओं के खिलाफ इन ‘हिन्दू धर्म रक्षकों’ ने एक बार भी आवाज नहीं उठाई।

लेकिन इन सबसे पहले मुद्दे की बात यह कि इन सबने जीवित गायों की सुरक्षा, देख भाल के लिए अपनी ओर से कुछ भी नहीं किया। बात बेहद कड़वी है किन्तु इनका अब तक का आचरण बताता है कि जीवित गायों में (और गायों को जीवित बनाए रखने में) इनकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं। जीवित गाय के मुकाबले मरी गाय इन्हें अधिक उपयोगी लगती है। लेकिन उसकी चिन्ता भी ये तभी तक करते हैं जब तक कि उसके नाम पर उत्तेजना और आक्रोश फैलाया जा सके। उसके बाद तो ये अपनी उस ‘मरी हुई माँ’ का स्मारक बनाने के लिए भी शासन से माँग करते हैं या फिर गौ शाला के संचालकों को सार्वजनिक रूप से ऐसे प्रताड़ित करते हैं मानो गौ शाला के संचालन का सारा खर्च ये लोग ही दे रहे हों।

इनका व्यवहार कहने को विवश करता है कि सारी दुनिया तो जीवित गाय को दुहती है किन्तु ये ‘भाई लोग’ तो मरी गाय को दुहते हैं। ये जीवित आवारा गाय देख कर (लज्जित होना तो सपने की बात होगी) न तो असहज होते हैं न ही चिन्तित किन्तु मरी गाय की खबर मिलते ही उछल पड़ते हैं। प्रत्येक माँ अपने जीते जी अपने बच्चों का लालन-पालन करती है किन्तु गाय इनकी ऐसी माता है जो मरने के बाद भी इन्हें अपना दूध पिलाती है।


अब आपको जब भी किसी गाय (या किन्हीं गायों) के मरने पर ‘भाई लोग’ हरकत में आते नहर आएँ तो तनिक सावधानीपूर्वक देखने की कोशिश कीजिएगा कि ये लोग जीवित गायों के बारे में क्या करते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी एक-एक बात आपको सच होती नजर आएगी।


भगवान करे, मेरी ये बातें झूठ निकलें। किन्तु ‘इनकी’ हरकतों से ऐसा लगता तो नहीं।
-----


आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

अन्तिम यात्रा/उठावना/शोक निवारण से पहले चक्का जाम


मेरे कस्बे में, गए कोई दस दिनों में चार घटनाएँ ऐसी हो गईं जिनमें लोगों ने डाक्टरों के साथ हाथापाई, धक्कामुक्की और मारपीट कर दी। इनमें तीन प्रकरणों में, रोगी की मौत हो जाने से मृतक के परिजन आक्रोशित हुए थे। तीनों प्रकरणों में परिजनों का कहना था कि डाॅक्टर ने इलाज करने में असावधानी बरती, फलस्वरूप रोगी की मृत्यु हो गई। इन तीन में से दो प्रकरण निजी चिकित्सालयों के तथा एक प्रकरण शासकीय चिकित्सालय का था। चैथा प्रकरण दुर्घटना का था। इसमें प्रथमतः जिला प्रशासन और बाद में डाक्टर निशाने पर रहे। यह प्रकरण भी शासकीय चिकित्सालय का था। प्रत्येक प्रकरण में लोगों ने तोड़फोड़ भी की।


प्रत्येक प्रकरण में लोगों ने चक्काजाम किया और दोषियों को गिरतार कर, दण्डित करने की माँग की। एक प्रकरण में शव को चैराहे पर रख कर चक्का चाज किया गया, प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगे और कहा गया कि जब तक दोषी को बन्दी नहीं बनाया जाएगा तब तक दाह संस्कार नहीं किया जाएगा। इस प्रकरण में शाम के साढ़े पाँच बज चुके थे और यदि सूर्यास्तपूर्व दाह संस्कार नहीं होता तो बात अगले दिन पर जाती। स्पष्ट है कि प्रकरण न केवल सम्वेदनशील अपितु गम्भीर भी था। प्रशासकीय अधिकारी सक्रिय हुए और जैसे-तैसे बात सम्हाल कर शव की अन्तिम यात्रा प्रारम्भ कराई।


ऐसी घटनाएँ अब प्रत्येक कस्बे, नगर में होने लगी हैं। चिकित्सक और रोगी के परम्परागत सम्बन्धों का स्वरूप बदल गया है। पहले डाॅक्टर पर आँख मूँद कर विश्वारस किया जाता था। अब, डाक्टर को ‘सेवा प्रदाता’ के रूप में लिया जाता है और तदनुसार ही उससे आशा/अपेक्षा की जाती है। किन्तु एक बात में अन्तर नहीं आया। पहले भी डाक्टर को भगवान माना जाता था और आज भी माना जाता है। किन्तु भावनाओं की ऊष्मा और सम्बन्धों की मधुरता को ‘पूँजी’ ने प्रभावित कर दिया है। परिणामस्वरूप, आँख की शर्म चली गई है और सब कुछ व्यापार की तरह लिया जाने लगा है। इसके लिए किसी एक पक्ष को उत्तरदायी ठहराना न तो सम्भव है और न ही उचित। सामाजिक मूल्यों में जब स्खलन अथवा ह्रास आता है तो वह समूचे समाज पर समान रूप से आता है।


मारपीट और तोड़फोड़ की, डाक्टरों में तीखी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक ही थी। डाॅक्टरों की संस्था ‘इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन’ (आईएमए) के माध्यम से डाक्टरों ने, ऐसे प्रकरणों के जिम्मेदार लरोगों के विरुद्ध पुलिस में नामजद रिपोर्टें लिखर्वाइं और ‘डाक्टर प्रोटेक्शन एक्ट’ के अन्तर्गत कार्रवाई करने की माँग की। इस कानून के बारे में मुझे अधिक तो पता नहीं किन्तु मालूम हुआ कि इस कानून के अधीन पंजीबध्द प्रकरणों में जमानत आसानी से नहीं मिलती। सो, जब ‘आईएमए’ का दबाव बढ़ा तो चक्काजाम और डाक्टरों से मारपीट करने वालों में घबराहट फैलना स्वाभाविक ही था।


किस प्रकरण में क्या हुआ इससे अलग हटकर, डाक्टरों की एक बात ने मेरा ध्यानाकर्षण किया। डाक्टरों का कहना था कि इलाज करने में डाक्टर ने लापरवाही बरती या कि गलत दवा दी, यह बात तो कोई डाक्टर अथवा चिकित्सा विज्ञान में दक्ष व्यक्ति ही कह सकता है। जो लोग डाक्टरों पर गलत उपचार करने का अथवा लापवरवाही बरतने का आरोप लगाते हैं, वे यदि सचमुच में विषय के जानकार होते हैं तो वे खुद ही अपने रोगी परिजन का इलाज क्यों नहीं कर लेते? यदि उन्हें विषय का ज्ञान नहीं है तो ऐसे सुस्पष्ट आरोप कैसे लगाए जा सकते हैं? कोई (अथवा कुछ) डाक्टर लालची या कि लापरवाह हो सकता है किन्तु इलाज के दौरान जब रोगी की दशा प्रारम्भ में सुधरती दिखाई दे रही हो तब तो स्वस्पष्ट है कि डाक्टर ने न तो लालच किया और न ही लापरवाही बरती। किन्तु यदि अचानक ही रोगी की तबीयत बिगड़ने लगे, डाक्टर यथेष्ट प्रयास करे और फिर भी रोगी के प्राणान्त हो जाएँ तो इसमें डाक्टर का क्या दोष? डाक्टरों की इस बात में मुझे वजन लगा।


दस दिनों में चार घटनाओं से मेरा कस्बा उद्वेलित बना रहा। दो प्रभावित परिवारों से मैंने सम्पर्क किया तो नई बात सामने आई। दोनों परिवारों ने कहा कि मारपीट, तोड़फोड़ और चक्का जाम में उनके परिजनों की कोई भूमिका नहीं रही। सहानुभूति में साथ गए लोग, परिजनों से अधिक आक्रोशित हुए और ‘राजा के प्रति खुद राजा से अधिक वफादार’ की तरह व्यवहार करते हुए प्रकरणों को आपराधिक और जनोत्तेजक बना दिया। इन दोनों परिवारों ने, घटना के बाद, डाक्टरों के पास जाकर क्षमा याचना की जिसे डाॅक्टरों ने व्यक्तिगत रूप से स्वीकार करने का बड़प्पन बरता। किन्तु प्रकरण चूँकि ‘आईएमए’ ने प्रस्तुत कर रखा है तो एक सीमा के बाद दोनों डाक्टरों ने भी अपनी असहायता बताई। हाँ, इतना अवश्य कहा कि वे प्रकरण को लेकर अपनी ओर से कोई ‘स्मरण पत्र’ नहीं देंगे।


डाक्टर और रोगी के बीच सबसे पहला रिश्ता होता है विश्वास का। साफ लग रहा है कि इस रिश्ते पर भी भरपूर खरोंचे आ गई हैं। यदि स्थिति को सुधारने (या कि और अधिक खराब न होने देने के लिए) तत्काल ही कोई प्रभावी पहल नहीं की गई तो दस दिन में चार घटनाओं की स्थिति बदल कर एक दिन में दस वाली हो जाएगी।


तब और कुछ हो न हो, एक बात अवश्य होगी। शोक समाचारों वाले अखबारी स्तम्भों में ‘निजी’ के अन्तर्गत आने वाली सूचनाएँ कुछ इस प्रकार होंगी - ‘हमारे फलाँ-फलाँ का आकस्मिक देहावसान दिनांक फलाँ-फलाँ को हो गया है। अन्तिम यात्रा/उठावना/शोक निवारण दिनांक फलाँ-फलाँ को हमारे निवास पर इतने बजे होगा और उससे पहले एक घण्टे का चक्का जाम होगा।’

हम इसी दिशा में बढ़ रहे हैं।

-----


आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे इंपतंहपअपेीदन/हउंपससण्बवउ पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

आज से चार दिन वाराणसी में


यदि सब कुछ सामान्य रहा तो, जिस क्षण यह सूचना मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित हो रही होगी उस समय मैं मेरी जीवन संगिनी सहित वाराणसी पहुँच चुका होऊँगा।

मेरा यह प्रवास चार दिन का है।

अठारह अगस्त की शाम सवा सात बजे, शिव गंगा एक्‍सप्रेस से मेरी रतलाम वापसी यात्रा प्रारम्भ होगी।

वाराणसी में मैं मेरे मित्र परिवार श्रीमती सुनिता सिंह श्री अतुल प्रताप सिंह की मेजबानी में रहूँगा।

वाराणसी में मेरा कोई कार्यक्रम नहीं है। चूँकि वाराणसी जा रहा हूँ इसलिए भगवान काशी विश्वनाथ के दर्शन भी करूँगा।

मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी यदि वाराणसी का कोई चिट्ठाकार मित्र बन्धु सम्पर्क करे।मेरा मोबाइल नम्बर 098270 61799 है।
----

आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

‘ये’ निषेध हमारे चरित्रहीन होने के प्रमाण पत्र

जब-जब भी लड़कियों/महिलाओं पर ऐसे ‘शील रक्षक’ प्रतिबन्ध लगते हैं तब-तब, हर बार मुझे लगता रहा है मानो मुझे चरित्रहीन, दुराचारी, कामुक, परस्त्रीगामी होने का प्रमाण-पत्र दे दिया गया हो।

स्त्रियों के प्रति अपने दृष्टिकोण और व्यवहार को लेकर हम अत्यधिक सीनाजोर, निर्लज्ज और पाखण्डी समाज के रूप में सामने आ रहे हैं। अपनी उक्तियों में हम धर्मग्रन्थों के सुभाषित उद्धृत कर नारी को सर्वोच्च सम्मान दिए जाने की गर्जना करते हैं किन्तु आचरण ठीक उलटा करते हैं। दुहाई तो हम ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवा’ की देते हैं किन्तु औरत आज भी पुरुष के पैरों की जूती बनी हुई है। अपनी आधी आबादी से हमने उसका सब कुछ हड़प कर अपने कब्जे में कर लिया है। हमें जन्म देने वाली स्त्री को हम न तो बुध्दिमान मानते हैं और न ही विवेकवान। चूँकि समाज के नियन्ता हम पुरुष ही हैं सो ‘समझदारी’ पर हम पुरुषों ने एकाधिकार कर लिया है और ‘इज्जत’ की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों को सौंप दी है। इसी के चलते, ‘वो तो औरत थी पर तुम तो समझदार थे’ जैसे जुमले हमें रंच मात्र भी असहज नहीं करते। यही वह कारण भी है जिसके चलते बलात्कृत स्त्री को जमाने भर के लांछन सहन करने पड़ते हैं और बलात्कारी को शूरवीर की तरह देखा जाता है। डकैती के मामले में हमारी सहानुभूति लुटने वाले के साथ होती जबकि बलात्कार के मामले में हम स्त्री को ही अपराधी देखते हैं।


महिलाओं को लेकर हमारे सोच को जन्म से ही एक सुनिश्चित साँचे में ढाल दिया जाता है। सारे निषेध, सारी अनिवार्यताएँ स्त्री पर आरोपित की जाती हैं और पुरुष को सबसे मुक्त रखा जाता है क्योंकि समाज के नियम, कानून, कायदे हम पुरुष ही तय करते हैं। लाख कोशिशों के बाद भी मैं आज तक एक भी व्रत-उपवास ऐसा तलाश नहीं कर पाया हूँ जो पुरुषों के लिए अनिवार्य किया गया हो। हमने न केवल मान रखा है बल्कि साबित भी कर रखा है कि ‘स्त्री’ की स्वतन्त्र सत्ता होती ही नहीं है। उसका कोई ‘व्यक्ति रूप’ भी हो सकता है, यह हमारी कल्पना से परे है। स्त्री हमारे लिए केवल ‘वस्तु’ है और ‘वस्तु’ भी केवल ‘भोग्या’ रूप में। इसी के चलते ‘शुचिता’ (और विशेषतः ‘योनि शुचिता’) स्त्री के लिए पहली शर्त है। किन्तु यह निर्धारण करते समय हम यह जानबूझकर भूल जाते हैं कि कोई भी स्त्री केवल अपने दम पर कैसे अपनी शुचिता भंग कर सकती है? उसके शील भंग के लिए किसी पुरुष की भागीदारी अनवार्य होती है। किन्तु शुचिता का मैदान हमने पुरुषों के लिए निस्सीम छोड़ रखा है और स्त्री-शुचिता को तंग परिधि में घेर रखा है। मैं किसी ऐसी स्त्री की तलाश में हूँ जो किसी पुरुष के सहयोग के बिना कलंकित हुई हो।


स्त्री के बिना पुरुष का जीवन अधूरा है, यह कोई नई बात नहीं है। किन्तु हमारे अधूरेपन को समाप्त करने वाली, हमें पूर्णता प्रदान करने वाली स्त्री को हम उसका वाजिब स्थान देने के बारे में कभी नहीं सोचते। ऐसा सोच तो हमारे अचेतन से भी धकेल दिया गया है। श्रेय के सारे हिमालय हमारे और फजीहत के सारे उखेड़े (कूड़ा स्थल) स्त्री के। लोक व्यवहार में प्रयुक्त की जाने वाली गालियों पर तनिक सावधानी से ध्यान दीजिए, निन्यानबे प्रतिशत गालियाँ ‘स्त्री केन्द्रित’ हैं। गोया स्त्री, स्त्री न होकर गाली ही हो गई।

इतिहास साक्षी है कि जिस समाज ने अपनी आधी आबादी को सम्मान दिया गया, राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी ली गई उसने सफलता के झण्डे गाड़े और जहाँ-जहाँ स्त्री को वंचित, उपेक्षित, तिरस्कृत किया गया वहाँ प्रगति का पहिया धीमा ही हुआ है। लिहाजा, यदि स्त्री के लिए कोई निषेध आरोपित किया जा रहा हो तो उससे पहले पुरुषों को अपनी गरेबान में झाँकना चाहिए। यदि हम कहते हैं कि युवतियों के परिधान यौनोत्तेजित करते हैं तो शुरुआत तो हमारे संयम से होनी चाहिए! इसके समानान्तर कड़वी सचाई यह है कि हममें से प्रत्येक, अपनी सहधर्मिणी को तो ‘सीता’ और पड़ौसी की पत्नी को ‘रम्भा’ देखना चाहता है। ऐसा सोचते समय हममें से प्रत्येक यह भूल जाता है कि उसकी सहधर्मिणी भी किसी की पड़ोसन है। हमारा यह व्यवहार सचमुच में विचित्र है कि बीमार तो हम हैं और इलाज कराते हैं स्त्री का!


स्त्री का महत्व अनुभव करने के लिए अपने अतीत को खँगालें तो पाएँगे कि हमारे समस्त महापुरुषों को उनकी माता के नाम से सम्बोधित किया जाता था। जैसे कौन्तेय, कुन्ती पुत्र, गांधरी पुत्र, राधेय, कौशल्या नन्दन, यशोदा नन्दन आदि आदि। इतिहास साक्षी है कि ‘पुरुष’ का वंश चलाकर उसकी मान-मर्यादा बनाए रखने और बढ़ाने की कीमत हर बार ‘स्त्री’ न ही चुकाई, पुरुष ने नहीं।

प्रकृति ने मातृत्व सुनिश्चित किया है, पितृत्व नहीं। पितृत्व तो विश्वास भाव है। लगता है, यहीं पर ‘पुरुष’ का अहम् आहत हुआ होगा और उसने ‘पितृत्व के विश्वास’ को ‘सुनिश्चितता’ में बदलने के लिए ही अभिलेखों में सन्तान के नाम के साथ पिता का नाम लिखने की परम्परा शुरु की होगी।

इस मामले में मैं पूरी तरह से स्त्रियों के समर्थन में खड़ा हूँ। हमने ‘स्त्री’ के प्रति अकूत आभार और कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए जिसने हमें जन्म दिया, हमें पाला-पोसा बड़ा किया, हममें पूर्णता और सामाजिक सम्मान प्रदान किया, सदैव नेपथ्य में रहकर, खुद को होम करके हमें प्रमुखता/प्रधानता प्रदान की। अपने जीवन से स्त्री को निकाल दें तो जीवन न केवल नीरस और रंगहीन हो जाएगा बल्कि हम नितान्त असफल भी हो जाएँगे।

यह ‘स्त्री’ ही है जो हमें ‘हम’ बनाए हुए है।
-----

आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कुटुम्बी/रक्त सम्बन्धी याने मृत्यु की प्रतीक्षा में आतुर

24 अप्रेल की सवेरे कोई साढ़े आठ बजे कोमल का फोन आया - ‘मामा साहब! गणपति स्थापना कर रहे हैं। पधारिए.’ मैंने उसे बधाई दी और कहा कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार हम पति-पत्नी, 28 अप्रेल की सवेरे उसके यहाँ पहुँच जाएँगे.

कोमल मेरा छोटा भानजा है. मेरे कस्बे से कोई दो सौ किलामीटर दूर, राजस्थान के छोटे से गाँव निकुम्भ में रहता है. मेरी बड़ी बहन, गीता जीजी उसी के साथ रहती है. कोमल के बड़े बेटे मनीष का ब्याह 28 अप्रेल को होना था।

कोई आठ घण्टे बाद ही, अपराह्न साढ़े चार बजे फिर कोमल का फोन आया। घबराते हुए उसने कहा - ‘मामा साहब! अभी-अभी पिताजी शान्त हो गए हैं. किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा है. किन्तु अन्तिम संस्कार आज ही करेंगे. बाकी काम-काज कब और कैसे होगा, यह सब रात में ही तय करेंगे.’कोमल के पिताजी याने मेरे जीजाजी याने जिस मनीष के विवाह में हमें जाना था, उसके दादाजी. मैंने समय का हिसाब-किताब लगाया और पाया कि मैं तत्क्षण भी निकलूँ तो भी जीजाजी के अन्तिम संस्कार में सम्मिलित नहीं हो सकता. सो, तय किया कि रात को कोमल से बात करके अगली सवेरे ही निकलूँगा.

रात कोई दस बजे कोमल ने बताया कि उठावना (तीसरा) अगले ही दिन, 25 अप्रेल को ही, सवेरे ग्यारह बजे करना तय हुआ है.25 अप्रेल की बड़ी सवेरे साढ़े पाँच बजे हम पति-पत्नी निकुम्भ के लिए निकले और साढ़े दस बजते-बजते वहाँ पहुँचे. मालूम हुआ कि चूँकि विवाह हेतु गणपति स्थापना की जा चुकी थी, चाक न्यौता जा चुका था, मण्डप तान दिया गया था, पत्रिकाएँ बाँटी जा चुकी थीं। सो विवाह आयोजन स्थगित कर पाना सम्भव नहीं रह गया था। इसलिए केवल उठावना ही नहीं, पगड़ी और शोक निवारण तक की समस्त उत्तरक्रियाएँ आज ही सम्पादित कर ली जाएँगी.

ग्यारह बजते-बजते हमारा, लगभग पूरा कुटुम्ब वहाँ एकत्र हो चुका था. हम सब कोई चौदह-पन्द्रह परिवार थे. कोई आठ-दस वर्षों के बाद हम सब एक दूसरे को एक साथ देख रहे थे। अपने-अपने अहम् के टापुओं पर बैठे हुए हम सब, मोटे तौर पर तीन गुटों में बँटे हुए थे और स्थिति यह थी कि प्रत्येक गुट ने कम से कम किसी एक गुट का बहिष्कार तो किसी गुट ने दो गुटों को बहिष्कार कर रखा था। किसी के यहाँ उपस्थित मंगल प्रसंग पर बुलाने पर भी नहीं जाना इस बहिष्कार का प्रकटीकरण था तो किसी ने तो निमन्त्रण भेजना ही बन्द कर रखा था। किन्तु मैंने देखा कि इस शोक प्रसंग पर प्रत्येक परिवार का कोई न कोई प्रतिनिधि उपस्थित था और पूरे मनोयोग से उत्तरक्रियाओं में अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा था जबकि कोमल की ओर से सीधी सूचना कुछ ही लोगों को मिली थी। अधिकांश को, किसी तीसरे से ही यह शोक समाचार मिला था।अचानक ही मेरे मन में विचार आया कि शोक प्रसंग में बिना बुलाए, भाग कर आने वालों में से कितने लोग, मनीष के विवाह में भागीदारी करेंगे.

चूँकि काम कम और फुर्सत अधिक थी, सो मैंने धीरे-धीरे कुटुम्बियों को टटोलना शुरु किया। कुछ को विवाह का निमन्त्रण मिला था था और कुछ को भेजा ही नहीं गया था। जीजी का बहिष्कार करने वाले गुट में से जिनको निमन्त्रण भेजा गया था उनसे मैंने सहज भाव से पूछा कि मनीष के विवाह के अवसर पर उनसे मिलना होगा या नहीं? मुझे उत्तर मिला-‘आने का कोई सवाल ही नहीं उठाता. आज मिल लिए सो मिल लिए. अगला मिलना इसी तरह किसी मौत-मरण में ही होगा.

किन्तु इस उत्तर ने नए प्रश्न खड़े कर दिए. वह कौन सा कारण है कि मंगल प्रसंगों पर तो हम बार-बार बुलाने पर भी नहीं जाते और शोक प्रसंग पर, तीसरे आदमी से सूचना मिलने पर भी भाग कर पहुँच जाते हैं और प्रयास करते हैं कि अन्तिम संस्कार में अवश्य ही सम्मिलित हो जाएँ?

समाधानकारक उत्तर कहीं से नहीं मिला। सबने लगभग एक ही उत्तर दिया - ‘ऐसा ही होता है.’ बार-बार कुरेदने पर कुछ वरिष्ठों और सयानों ने बताया कि ‘कुटुम्बियों‘ और ‘रक्त सम्बन्धियों’ की पहचान ऐसे ही क्षणों/प्रसंगों में होती है. बात मुझे बिलकुल ही समझ में नहीं आई. यदि हम सचमुच में ‘कुटुम्बी’ या ‘रक्त सम्बन्धी’ हैं तो यह भाव, उत्सवों, मंगल प्रसंगों पर, उजागर क्यों नहीं होता? उस समय क्यों हम सारी मनुहारों की उपेक्षा करते हैं? क्यों एँठे, इतराए बने रहते हैं? मैं ने खुद ने मेरे जीजाजी का बहिष्कार कर रखा था किन्तु मेरा और जीजी का परस्पर आना-जाना बना हुआ है। मैं जीजी की भावनाओं की चिन्ता करते हुए निकुम्भ पहुँचा था।

मेरी जिज्ञासा का समुचित उत्तर मुझे अब तक नहीं मिला है. तलाश करने पर अधिक निराशा ही मिली जब मालूम हुआ कि पूरे समाज में और प्रत्येक कुटुम्ब में यह स्थिति (कहीं कम तो कहीं अधिक) समान रूप से बनी हुई है. एक परिचित ने तो अधिक कष्टदायी अनुभव सुनाया. मेरी पूरी बात सुनकर उन्होंने बताया कि ठीक ऐसा ही प्रसंग उनके कुटुम्ब में भी आया था तो उन्होंने सबसे कहा कि कुटुम्ब में परस्पर बहिष्कार बन्द किया जाना चाहिए. किन्तु शुरुआत कौन करे? तब इन्होंने कहा कि शुरुआत वे करने को तैयार हैं किन्तु सब लोग वचनबध्द हों कि सारे कुटुम्बी बहिष्कार करना छोड़ देंगे. उन्हें दुख और आश्चर्य हुआ जब उन्होंने पाया कि कोई भी वचनबध्द होने को तैयार नहीं है. सबने कहा - ‘तुम शुरुआत तो करो. बाद की बाद में देखेंगे.’ मेरे ये परिचित बोले - ‘बैरागीजी! मेरे कुटुम्बियों और रक्त सम्बन्धियों ने शुरुआत से पहले ही मेरी बात का अन्त कर दिया और अब हम भी एक दूसरे के यहाँ मौत-मरण में जाने के लिए चैबीसों घण्टों तैयार बने रहते हैं.’

आपमें से कोई यदि मुझे इस व्यवहार का तार्किक औचित्य प्रदान कर सकें तो मुझे उपकृत कीजिएगा। अन्यथा ‘कुटुम्बी’ अथवा ‘रक्त सम्बन्धी’ की एक ही व्याख्या सत्य लगती रहेगी कि सच्चे कुटुम्बी अथवा/और रक्त सम्बन्धी वे ही होते हैं जो आपके यहाँ किसी के मरने की प्रतीक्षा अत्यधिक आतुरता से कर रहे होते हैं कि ‘तुम्हारे यहाँ कोई मरे तो हम दौड़ कर आएँ।’

-----


आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे इंपतंहपअपेीदन/हउंपससण्बवउ पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

नागरिकता से दूर

तेरह अगस्त। आधा दिन बीतने को है। तरेंसठवाँ स्वाधीनता दिवस अब छत्तीस घण्टों से भी कम दूरी पर है। मैं खुद को टटोल रहा हूँ और पा रहा हूँ कि निराश तो नहीं किन्तु उदास, अनमना अवश्य हूँ। इस प्रसंग पर होने वाली प्रसन्नता में वर्ष-प्रति-वर्ष कमी होती जा रही है।

स्कूली दिनों में अपनों से बड़ों के विमर्श-विवाद के बीच जब-तब ‘हमें तो आजादी बहुत सस्ते में मिल गई’ जैसा वाक्य सुनता था तो उलझन में पड़ जाता था। सच क्या है-जो सुन रहा हूँ वह या जो पुस्तकों में पढ़ रहा हूँ वह? पुस्तकें कहती थीं कि असंख्य लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, असंख्य सुहागिनों का सिन्दूर पुँछ गया, उनसे अधिक बच्चे अनाथ हो गए, कई वंश निर्मूल हो गए, अनेक माँओं की गोदें सूनी हो गईं तब कहीं जाकर हमें स्वाधीनता मिल पाई। किन्तु बड़ों की बातें यह सब झुठलाती थीं।

विद्यार्थी जीवन की इस उलझन से उबरने में बरसों लग गए। किताबों की बातें राई-रत्ती भर असत्य नहीं किन्तु प्रति वर्ष कम होती जा रही प्रसन्नता अनुभव करा रही है कि स्वाधीनता का मोल हम वास्तव में नहीं पहचान पाए। अपने शहीदों के प्राणोत्सर्ग का मूल्यांकन करने में हम आपराधिक कृपणता और असावधानी बरत कर उस सब कुछ को व्यर्थ साबित कर रहे हैं।

स्वाधीनता मिलने वाले पहले ही क्षण से हमें जिस उत्तरदायित्व का बोध हो जाना चाहिए था, लगता ही नहीं 62 वर्षों की इस दीर्घावधि में हम उसके आस-पास भी पहुँच पाए हों। पहुँच पाना तो कोसों दूर रहा, ऐसा करने के बारे में सोचा भी नहीं।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हम भले ही तेजी से उभर रही शक्तिशाली अर्थ व्यवस्था और तीसरी दुनिया के सिरमौर बन रहे हों किन्तु आन्तरिक स्थितियों और अपने आचरण के सन्दर्भों में शोचनीय से कम के पड़ाव पर नहीं हैं। देश का प्रत्येक प्रमुख राजनीतिक दल कहीं न कहीं सत्तारूढ़ है। सबकी विचारधारा और कार्यक्रम भले ही अलग-अलग हों किन्तु जन समस्याएँ सबके सामने एक जैसी हैं। इसी के चलते ये तमाम दल दोगला व्यवहार करने को अभिशप्त हो गए हैं। अपने शासन वाले राज्य में ये जिस समस्या को औचित्यपूर्ण बताते हैं उसी समस्या पर दूसरे राज्य में धरना, प्रदर्शन और बन्द कराते हैं। किन्तु एक समस्या की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। यह है - किसी भी सरकार को नागरिक योगदान न मिलना।

हम सब खुद को सरकार से अलग मानते हैं। गोया सरकार, सरकार न हुई, कोई विदेशी तत्व हो। जिस सरकार को हम चुनते हैं, कुर्सी पर बैठाते हैं, उसी सरकार को, कुर्सी पर बैठाने के अगले ही क्षण निकम्मी, अक्षम और लापरवाह घोषित कर उसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आते हैं। राजनीतिक स्तर पर तो स्थिति ‘विचित्र’ से आगे बढ़कर ‘लज्जाजनक’ हो गई है। विरोध के लिए विरोध करने के नाम पर हम अपने ही प्रधान मन्त्री को ‘देश को बेच देनेवाला’ तक कह देते हैं और चुनावी विजय के लिए प्रधान मन्त्री को अक्षम, असफल और अयोग्य तक कहने में हमें असुविधा, असहजता अनुभव नहीं होती।

स्वाधीनता को हमने अपना अधिकार तो माना किन्तु यह भूल गए कि अधिकारों का सुख भोगने से पहले उत्तरदायित्व पूरे करने पड़ते हैं। उत्तरदायित्व और अधिकार, स्वाधीनता के सिक्के के दो पहलू हैं और कोई भी सिक्का तभी बाजार में चल पाता है जब उसके दोनों पहलू उजले, स्पष्ट और चमकदार हों। इस दृष्टि से हम अपनी स्वाधीनता को खोटे सिक्के में बदलते नजर आ रहे हैं।

देश में व्याप्त विसंगतियाँ, असमानता, आर्थिक खाइयाँ, ऊँच-नीच, दुराचरण, अनुचित निर्णय हमें उत्तेजित, आक्रोशित करना तो दूर, रंच मात्र भी असहज, विचलित, व्याकुल नहीं करते। जिस देश के लगभग 80 प्रतिशत लोग, 20 रुपये प्रतिदिन भी मुश्किल से जुटा पाते हैं, उनके जनप्रतिनिधियों का करोड़पति/अरबपति होना हमें न तो चौंकाता है न ही असहज करता है। अन्याय सहन करना भी अन्याय करना ही है वाली उक्ति हम भूल गए हैं। जिन नेताओं को नियन्त्रित किया जाना चाहिए, उनकी चापूलसी करने में हमने अलस्येशियनों को भी मात दे रखी है।

गाँधी ने उस शासन पद्धति को श्रेष्ठ बताया था जो नागरिक जीवन में कम से कम हस्तक्षेप करे। हमने इसकी अनुचित व्याख्या कर, स्वच्छन्दता और उच्छृंखलता बरतने की सुविधा स्वयम् ही प्राप्त कर ली जबकि गाँधी का आशय था कि हममें से प्रत्येक, अपना नागरिक उत्तरदायित्व ऐसा और इतना निभाए कि ‘शासन’ को सक्रिय होने की आवश्यकता ही नहीं पड़े।

‘लोकतन्त्र अर्थात् लोगों का शासन, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा’ वाली परिभाषा किताबों में ही कैद होकर रह गई है। अपनी स्वाधीनता के तरेसठवें वर्ष में प्रवेश वाले इस क्षण तक भी हम ‘जनता’ या ‘प्रजा’ ही बने हुए हैं। ‘नागरिक’ बनने की न तो हमें याद आई है और नही आवश्यकता अनुभव की। लगता है कि हम ‘नागरिक’ बनना चाहते भी नहीं। यदि हम नागरिक बन गए तो उत्तरदायित्व निभाना पड़ेगा।हमें, ‘गैरजिम्मेदार’ बन कर रहने ही न केवल आदत हो गई है अपितु लगता है, अपनी इस दशा पर हम गर्व भी अनुभव करने लगे हैं।

किन्तु एक बात तो है। हम ‘गैरजिम्मेदार’ भले ही हों, ‘नासमझ’ बिलकुल ही नहीं हैं। जीवन का अधिकतम आनन्द, ‘नासमझ’ बनकर ही उठाया जा सकता है। क्यों कि हम सबमें यह समझ अवश्य है कि ‘समझदार की मौत है।’

मैं अकेला बैठा हूँ


राखी पर मैं घर में अकेला ही बैठा हूँ। पत्नी तो हिम्मत करके मायके चली गई है किन्तु मैं उसके जैसा हिम्मतवाला नहीं हो सका।

हर साल की तरह इस साल भी जीजी को फोन किया था तय करने के लिए कि कि वह राखी पर आ रही है या फिर मैं ही उसके पास चला जाऊँ। उसने न तो आने की हामी भरी और न ही मुझे आने को कहा। यह सब इशारों-इशारों में नहीं, खुल्लम खुल्ला हुआ। सो, इस राखी पर मैं घर में अकेला ही बैठा हुआ हूँ।मेरी राखी इस बार भारत सरकार और मनमोहनसिंह की खुली अर्थनीति से बनी समाजिकता की भेंट चढ़ गई। जीजी ने इनका नाम तो नहीं लिया लेकिन जो कुछ कहा, वह इन्हीं का कहा हुआ था।

उसने कहा कि यदि मैं आऊँ तो त्रिभुवनदास जवेरी और वोडाफोन के और ऐसे ही सारे विज्ञापन देख कर इनमें से किसी एक की सलाह पर अमल करके ही आऊँ। ‘वर्ना आने का क्या फायदा?’ जीजी ने कहा। मैंने कहा कि उसकी रक्षा करने के वचन का ‘रीन्यूअल’ करने का मौका मुझे साल में इसी दिन मिलता है। मेरा जवाब सुनकर वह बहुत हँसी। बोली - ‘मेरी रक्षा की फिकर छोड़। तू अपनी ही कर ले तो बहुत है।’ उसने कहा - ‘बड़े नेता की बात तो छोड़, तेरे वार्ड का पार्षद भी तेरी नहीं सुनता। शहर का कोई गुण्डा-बदमाश तेरी नमस्ते का जवाब नहीं देता। पुलिस का अदना सा जवान भी तुझे नहीं जानता। तू तो भला आदमी है। रक्षा की जरुरत तो तुझे ही है।’ जीजी की बातों से मुझे शर्मिन्दगी होने लगी। फोन के दूसरे सिरे पर बैठे-बैठे ही उसने ताड़ लिया। मुझे दुलराती बोली -‘देख भैया! मैं जानती हूँ कि तू ईमानदार, नेक, चरित्रवान और साफ बोलने वाला है। लेकिन अब तेरा जमाना नहीं रहा। तू खुद जानता है कि तेरी इन्हीं बातों के चलते तू अब तक बाबू की कुर्सी पर ही बैठा हुआ है और तेरे जूनीयर तेरे सेक्शन हेड हो गए हैं। तू तो अपने अफसर की चापलूसी भी नहीं कर पाता। तेरे जैसे लोगों की जगह अब किस्सों-कहानियों, किताबों में या फिर समारोहों के भाषणों में ही रह गई है। मुझे तो तुझ पर गर्व है लेकिन तेरे कारण मुझे अपने सर्कल में झेंपना पड़ सकता है।’

मैं, जन्म से लेकर अब तक के सिलसिले को तोड़ना नहीं चाहता था। फिर, भाई-बहन के नाम पर हम दोनों ही एक दूसरे के लिए ‘इकलौते’ हैं। सो मैंने इसरार किया - ‘मैं तेरे किसी भी मिलने वाले के सामने नहीं आऊँगा। चुपचाप आऊँगा और राखी बँधवा कर वैसा ही चुपचाप चला जाऊँगा।’ जीजी बोली-‘यही तो! तेरा चुपचाप आना ही सबसे ज्यादा बोलेगा। तू जानता है कि तेरे जीजाजी की सोशल लाइफ ऐसी है कि मेरी कोठी पर रात तो होती ही नहीं। तू अपने हिसाब से भले ही अँधेरे में आएगा लेकिन मेरे यहाँ तो उजाला ही रहेगा। फिर, तू स्टेशन से मेरी कोठी तक या तो पैदल आएगा या बहुत हुआ तो ताँगे से। कन्धे पर झोला लटकाए, हाथ में पोलीथिन में लिपटा कोई पौधा लिए, ताँगे से उतरता हुआ तू! नहीं भैया, मैं तो इस सीन की कल्पना से ही पसीना-पसीना हो रही हूँ। तू खुद ही तय करले कि राखी के पवित्र त्यौहार पर तू मेरा स्टेटस बढ़ाएगा या कम करेगा?’ मैंने कहा - ‘भाई-बहन के रिश्तें में ये सारी बातें नहीं आतीं। यह तो तेरे और मेरे बीच की बात है।’ जीजी बोली-‘तू सही कह रहा है। लेकिन भैया! अब तो सब कुछ ग्लोबल और ओपन है।’

मैं भली भाँति समझ रहा था कि जीजी न केवल सच कह रही है बल्कि वह मेरा भला भी चाह रही है। वह बात और चिन्ता भले ही अपने स्टेटस की कर रही थी किन्तु वास्तव में मुझे उपहास से बचाना चाह रही थी। मैंने निरुपाय हो पूछा-‘तो मैं क्या करूँ?’ जीजी शायद इसी सवाल की प्रतीक्षा कर रही थी। तत्काल बोली -‘एक काम कर। तू मुझे एक मँहगा और खूबसूरत कार्ड भेज दे। मेरे यहाँ आने के लिए तुझे जितना भी खर्च करना पड़ता, उसके मुकाबले, मँहगे से मँहगा कार्ड भी तुझे सस्ता ही पड़ेगा। वह कार्ड मेरे सर्कल में मेरा स्टेटस बढ़ाएगा और तेरा स्टेटस छुपा लेगा। तू चुपचाप आने-जाने की बात कर रहा है लेकिन मैं तेरे कार्ड को अपने ड्राइंग रूम में बड़ी शान से एक्जिबिट करूँगी और अपनी सहेलियों के सामने इतराऊँगी। जमाना भी तो अब कार्ड का ही हो गया है। रिश्ता भले ही न निभा पाएँ, कार्ड तो होना ही चाहिए।’

मैंने जीजी का कहना मान लिया। उसे कार्ड भेज दिया है।

आसपास के घरों से बच्चों, किशोरियों के खिलखिलाने की आवाजें आ रही हैं। बन रहे व्यंजनों की गन्ध नथुनों में समा रही है। पूरे मुहल्ले में राखी के त्यौहार ने डेरा डाल दिया है।

बस, एक मैं ही हूँ जो घर में अकेला बैठा, अपनी सूनी कलाई को घूर रहा हूँ।

-----

लोकतन्त्र के मदारी

चुनाव के दिनों में ‘असामान्य ही सामान्य’ हो जाता है शायद। कहने वाले और सुनने वाले, दोनों ही इसके शिकार हो जाते हैं। शाश्वत सत्य की तरह स्थापित और जग जाहिर बातें भी इस तरह कही जाती हैं मानो कोई अजूबा प्रस्तुत किया जा रहा हो।


शुरुआत आडवाणी ने की और ‘क्रिया की समान तथा विपरीत प्रतिक्रिया‘ वाले, न्यूटन के नियम को चरितार्थ करते हुए अनुगमन किया सोनिया गाँधी ने।

आडवाणी ने कहा कि मनमोहन सिंह अपनी अकल से कोई निर्णय नहीं लेते। वे दस जनपथ के कहे अनुसार ही काम करते हैं। जवाब में सोनिया गाँधी ने आडवाणी को आरएसएस का गुलाम कहा।

इन दोनों ने कौन सी नई और अनूठी बात कही? केन्द्र में सरकार ‘संप्रग’ की है जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही है। सोनिया गाँधी, कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष तो हैं ही, वे ‘संप्रग’ की अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में मनमोहन सिंह यदि सोनिया गाँधी की बात नहीं मानेंगे तो क्या मोहन भागवत की बात मानेंगे?

यही बात आडवाणी पर भी लागू होती है। हर कोई जानता है कि भाजपा की अपनी कोई औकात नहीं है। वह घोषित रूप से संघ का वह आनुषांगिक संगठन है जिसके माध्यम से संघ अपनी राजनीतिक इच्छाएँ पूरी कर रहा है। भाजपा में कोई भी तब तक ही प्रभावी हैसियत में रह सकता है जब तक कि संघ उसे टेड़ी नजरों से न देखे। भाजपा में सुखपूर्वक, निश्चिन्त राजनीतिक जीवन जीने के लिए संघ का अभय दान अनिवार्य और अपरिहार्य है। मुसलमानों को प्रभावित करने के लिए आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना को ‘सेक्यूलर’ कहने पर जो प्रताड़ना और बहिष्कार झेली था वह सबने देखा है। भाजपा में तो मूत्र त्याग जैसी प्राकृतिक गतिविधियाँ सम्पन्न करने के लिए भी संघ की अनुमति आवश्यक होती है। ऐसे में यदि आडवाणी, संघ के गुलाम की तरह व्यवहार करें तो इसमें न तो किसी को अचरज होना चाहिए और न ही आपत्ति। वे संघ की गुलामी नहीं करेंगे तो क्या सोनिया गाँधी की गुलामी करेंगे?

मनमोहन सिंह और आडवाणी अपना-अपना काम न केवल पूरी निष्ठा से कर रहे हैं अपितु ऐसा करना दोनों की नियती भी है।

फिर भी, आडवाणी और सोनिया गाँधी इन बातों को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे सड़क किनारे मजमा लगाए कोई मदारी ‘चुर घुसडूँ’ कहते हुए, बन्द मुट्ठी पर जादू का डण्डा घुमाते हुए कबूतर निकाल रहा हो।

लोगों को भी मजा आ रहा है। वे तो तमाशबीन हैं। सो, उन्हें भी तमाशा ही चाहिए।

लोकतन्त्र का तमाशा जारी है।

----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे @जीमेल.कॉम पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001।


कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

5 लाख का बीमा लेना है। योजना और किश्त रकम बताएं

पौड़ी गढ़वाल से प्रदीपजी ने पूछा है - ‘मुझे 5 लाख का बीमा कराना हो तो छःमाही किश्त कितनी होगी और कौन सी स्कीम सबसे अच्छी होगी?’


इस प्रश्न का उत्तर अब मेरी आदत बन गया है क्योंकि बीमा एजेन्सी के मेरे अब तक के अठारह वर्षों में यह प्रश्न मुझसे सैंकड़ों बार पूछा जा चुका है।


इस प्रश्न का सीधा-सपाट उत्तर दे पाना किसी के लिए सम्भव नहीं होता।


किसे कितना बीमा लेना चाहिए अथवा किसे कितना बीमा दिया जा सकता है, इसके लिए कुछ आधारभूत सूचनाएँ आवश्यक होती हैं जिनके समुचित उत्तरों के बाद ही कोई परामर्श दिया जा सकता है।


ये सूचनाएँ इस प्रकार हैं -


-इस समय आपकी आयु क्या है?

-आपका वर्तमान व्यवसाय क्या है?

-इस समय आपकी सकल वार्षिक आय क्या है?

-आपकी आय की प्रकृति क्या है? स्थायी है अथवा अस्थायी?

-इस समय आपका और आपके परिजनों का कितना बीमा है?

-(यदि आपका और आपके परिजनों का बीमा है तो) इस समय आप प्रीमीयम के रूप में प्रति वर्ष कितनी रकम जमा करा रहे हैं?

-इस समय आपके पारिवारिक उत्तरदायित्व क्या हैं?

-नया बीमा लेने का उद्देश्य क्या है? (यथा, परिवार की आर्थिक सुरक्षा, आय कर नियोजन, भविष्य के लिए बचत, बच्चों की उच्च शिक्षा/विवाह हेतु व्यवस्था, किसी ऋण की जमानत के लिए आदि, आदि।)

-नये बीमे के लिए आप प्रति वर्ष कितनी रकम चुकाने की मानसिकता में हैं?

मुझे आपके बारे में उपरोक्त में से कोई भी जानकारी नहीं है। ऐसे में आपको सामान्य जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ। यह जानकारी 30 वर्ष की अवस्था वाले व्यक्ति के लिए है।


यदि आपका अब तक कोई बीमा नहीं है और आप केवल पारिवारिक सुरक्षा के लिए बीमा लेना चाहते हैं तो मेरा सुझाव है कि आप भारतीय जीवन बीमा निगम की ‘बन्दोबस्ती योजना’ (तालिका 14) में अपना बीमा कराएँ। चूँकि आपको आयु के 75 वर्ष तक के लिए बीमा मिल सकता है इसलिए आप पालिसी की अवधि 45 वर्ष रखें। अवधि की दीर्घता से घबराएँ नहीं। इसके बारे में आगे अलग से बता रहा हूँ।


5 लाख रुपये बीमाधन की वार्षिक किश्त रुपये 12,255 तथा छःमाही किश्त रुप्ये 6,226 होगी। ये किश्तें आपको 45 वर्षों तक चुकानी होंगी।


45 वर्ष बाद, जब आप आयु के 75 वर्ष पूरे कर चुके होंगे तब आपको लगभग रुपये 28,80,000 का भुगतान पालिसी की परिपक्वता राशि के रूप में मिलेगा। इस रकम में 5 लाख रुपये मूल बीमा धन, 45 वर्ष की अवधि के बानस की रकम 10 लाख 80 हजार रुपये तथा अन्तिम अतिरिक्त बोनस की रकम 13 लाख रुपये शामिल हैं। उपरोक्त में से बीमा धन 5 लाख रुपयों का भुगतान सुनिश्चित है जबकि बोनस की गणना मैंने 48 रुपये प्रति वर्ष प्रति हजार (अर्थात् 24 हजार रुपये प्रति वर्ष) के मान से की है तथा अन्तिम अतिरिक्त बोनस की गणना वर्तमान प्रचलित दर से की है। बोनस की रकम में कमी/वृध्दि हो सकती है।


इस पूरी समयावधि (45 वर्ष) में आपके जीवन पर 5 लाख रुपयों की बीमा सुरक्षा उपलब्ध रहेगी तथा इतनी ही रकम (अर्थात् 5 लाख रुपये) की ‘दुर्घटना हित लाभ सुरक्षा’ उपलब्ध रहेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि 45 वर्षों की इस समयावधि के दौरान सामान्य मृत्यु की दशा में पालिसीधारक के नामित व्यक्ति को 5 लाख रुपयों का (+ पालिसी प्रारम्भ होने से लेकर मृत्यु दिनांक तक की अवधि के बोनस की रकम का) भुगतान किया जाएगा। दुर्घटना मृत्यु की स्थिति में मूल बीमा धन के बराबर रकम (अर्थात् 5 लाख रुपये) का भुगतान नामित व्यक्ति को अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

आप जो प्रीमीयम चुकाएँगे उस पर आपको आय कर अधिनियम की धारा 80 सी के अन्तर्गत छूट मिलेगी तथा पालिसी से मिलने वाली रकम, आय कर अधिनियम की धारा 10 (10) (डी) के तहत आय कर से मुक्त होगी।


अब बात, पालिसी की अवधि 45 वर्ष की। सामान्यतः लोग अल्पावधि की बीमा पालिसियाँ लेने पर जोर देते हैं। यह ग्राहक के लिए गम्भीर घाटे का सौदा होता है।

मेरा सुनिश्चित मत है कि जीवन बीमा का निवेश ‘लाभ का सौदा’ नहीं होता। लाभ की तलाश वाले लोगों को जीवन बीमा की तरफ देखना ही नहीं चाहिए। किन्तु नाम मात्र की प्रीमीयम चुका कर लाखों की सुरक्षा प्राप्त करने की बात हो तो फिर जीवन बीमा का कोई विकल्प नहीं है। जीवन बीमा वस्तुतः ‘सुरक्षा का सौदा’ होता है। अर्थात् ‘रिस्क कवरेज’ का सौदा।

प्रथमतः तो हममें से हर कोई ‘लाभ’ को ही प्राथमिकता देगा। किन्तु यदि लाभ नहीं मिल रहा है तो फिर देखा जाना चाहिए कि हमें घाटा न हो। और यदि घाटा हो रहा हो तो लाभ में हो तो चलेगा, मूल में तो घाटा नहीं ही हो। ऐसे में बात जब ‘रिस्क कवरेज’ खरीदी की हो तो, ‘दीर्घावधि की खरीदी’ अन्ततः लाभ का सौदा बन कर सामने आती है।

अल्पावधि योजना में किश्त की रकम अधिक हो जाती है जबकि बोनस की रकम कम हो जाती है। इसलिए अल्पावधि योजनाएँ ग्राहक के लिए घाटे का सौदा होती हैं।

पालिसी अवधि के इन 45 वर्षों में यदि आपको बीच में धन की आवश्यकता अनुभव हो तो आप अपनी पालिसी पर लोन ले सकते हैं। ऐसे लोन पर वर्तमान में 9 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज लिया जा रहा है। इस लोन की विशेषता यह है कि लोन लेने के बाद भी आपका रिस्क कवरेज कम नहीं होता। ब्याज की गणना छःमाही आधार पर की जाती है। लोन लेने की दशा में एक बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि ब्याज समय पर जमा करा दिया जाए। अन्यथा, ब्याज पर ब्याज लगना शुरु हो जाता है जिसके नकारात्मक प्रभाव पालिसी पर पड़ने की आशंका बन जाती है।

एक आशंका यह भी होती है कि आयु के उत्तरकाल में आय शून्य हो सकती है। तब पालिसी की किश्त जमा कराना असम्भव जैसा हो सकता है। ऐसी दशा में भी आप अपनी पालिसी पर प्रति वर्ष, किश्तों की रकम के बराबर लोन लेकर अपनी किश्तें आसानी से जमा करा सकते हैं और अपनी पालिसी को पूर्णावधि तक प्रभावी बनाए रखकर योजना के समस्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

आशा है, इस सामान्य प्रारम्भिक जानकारी से आपको कुछ सहायता मिली होगी।

मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप मुझे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध करा दें। यदि आप ठीक समझें तो अपने एसटीडी कोड सहित अपना फोन नम्बर मुझे उपलब्ध करा दें। मैं अपनी ओर से आपसे सम्पर्क कर आपकी जिज्ञासा का समाधान करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करूँगा।

मुझे आत्मीय प्रसन्नता और सुख-सन्तोष मिलेगा, यदि मैं आपके लिए तनिक भी सहायक हो सका।
----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan/blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

किसकी कथा है यह?


कह नहीं सकता कि यह कथा सागर बाबू की है अथवा नहीं। किन्तु वे इस कथा के जनक-सूत्र अवश्य हैं। यह उनका वास्तविक नहीं, काल्पनिक नाम ही है।

श्रेष्‍ठी समाज के प्रतिष्ठित सागर बाबू अपने कस्बे के अग्रणी व्यापारी हैं। व्यवहार के साफ और बात के धनी। उन्होंने दन्त कथाओं को भी परास्त कर रखा है। वह कथा आपने सुनी/पढ़ी ही होगी जिसमें एक साहूकार, एक व्यक्ति की मूँछ का बाल, राजी-राजी गिरवी रख लेता है। मूँछों के स्वामी की स्थापित प्रतिष्ठा के चलते ही यह सम्भव हो सका था। किन्तु सागर बाबू इस लोक कथा से कोसों आगे हैं। उनकी अनुपस्थिति में भी कोई उनका नाम लेकर कुछ कह दे तो उस पर सन्देह करने का साहस पूरे कस्बे में कोई नहीं कर पाता। लोक प्रतिष्ठा ने सारे प्रतिमान/कीर्तिमान सागर बाबू के पर्याय बने हुए हैं। इन्हीं सागर बाबू की भागीदारी में जीतू ने व्यापार किया था।
जीतू ने अपनी आयु के बीस वर्ष पूरे किए ही थे कि वज्राघात हो गया। उसके पिता का आकस्मिक देहावसान हो गया। घर में कुल तीन सदस्य - जवान विधवा माँ, कोई सवा साल बड़ा भाई और खुद जीतू। घर का कोई खानदानी पेशा नहीं। जीतू की यारी-दोस्ती श्रेष्ठी परिवारों के लड़कों से थी। यह शायद सोहबत का ही असर रहा कि व्यापार-व्यवहार की कुशलताएँ, ब्राह्मण कुल में जन्मे जीतू की सहचरियाँ बन गईं। जीतू के पिता और सागर बाबू घनिष्ठ मित्र थे। (वैसे भी उस छोटे से कस्बे में ऐसा कोई नहीं जो सागर बाबू का घनिष्ठ मित्र न हो।) सो, माँ और बड़े भाई से सलाह कर, स्वीकृती प्राप्त कर जीतू ने परिवार की जमा पूंजी समेट कर सागर बाबू की भागीदारी में व्यापार शुरु कर दिया। भागीदारी को लिखित रुप देने का विचार क्षणांश को भी, किसी के भी मन में नहीं आया। सागर बाबू के प्रति लोक आस्था के चलते इसकी आवश्यकता भी किसी ने अनुभव नहीं की। जीतू ने सागर बाबू में अपने पिता को देखा और कस्बे में जिसने भी सुना, खुश ही हुआ कि चलो, जीतू को कोई लाइन मिल गई।
जीतू का अनवरत-अथक परिश्रम, सागर बाबू का नाम, सितारों का साथ और ईश्वर की अनुकम्पा का सकल परिणाम यह हुआ कि आशा और अपेक्षा से बहुत ही कम समय में मुनाफे का आँकड़ा, सात अंकों की भारी-भरकम संख्या में बदल गया। जीतू को तो मानो पर ही लग गए। कल्पनातीत और अपेक्षातीत सफलता ने उसके आत्म विश्वास को सहसगुना कर दिया। वह दीन-दुनिया को भूल कर व्यापार में ही डूब गया।
सब कुछ ठीक ही चल रहा था। कुछ समय बाद परिवार ने तय किया कि अब भागीदारी से मुक्त होकर खुद का व्यापार शुरु किया जाए। सो, जब सालाना हिसाब किताब हुआ तो जीतू ने अपनी इच्छा और परिवार का निर्णय बता कर सागर बाबू से अपने हिस्से की रकम माँगी।
यही वह क्षण था जिसमें वह अघटित घटित हो गया जिस पर बाकी दुनिया तो ठीक, खुद सागर बाबू भी शायद ही विश्वास कर पाते। सागर बाबू ने रुपये देने से दो टूक इंकार ही नहीं किया, जीतू के साथ किसी भी भागीदारी से ही इंकार भी कर दिया।
जीतू के पाँवों के नीचे की धरती सरक गई। उसने तो सागर बाबू में अपने पिता को ही देखा था! वह मानो मूक-बधिर हो गया। समूचा ब्रह्माण्ड उसे रसातल में जाता दिखाई दे रहा था। अपना वर्तमान ही नहीं, समूचा भविष्य चौपट नजर आ रहा था। वह क्या करे? किससे कहे और क्या कहे? भले ही पूरा कस्बा जानता हो कि जीतू ने सागर बाबू की भागीदारी में व्यापार किया है किन्तु यदि सागर बाबू इससे इंकार करें तो सब उनकी ही बात मानेंगे।
सागर बाबू के यहाँ से जीतू अपने घर कैसे लौटा, जीतू को आज तक पता नहीं। किस्सा सुनकर माँ और भाई को विश्वास ही नहीं हुआ कि सागर बाबू ऐसा कर सकते हैं। तीनों ही अवसाग्रस्त थे। एक दूसरे की शकल देखे जा रहे थे, बोल कोई नहीं रहा था। जीतू बताता है - ‘वे क्षण हमारे जीवन के सबसे भारी क्षण थे। पिता के अकस्मान निधन से उपजी अनिश्चितता इस बार उससे सौ गुना अधिक विकराल बन कर सामने खड़ी हो गई थी।’
ऐसे विकट समय में तीनों ने अपने ब्राह्मण संस्कारों का सहारा लिया और तय किया कि यह बात किसी से नहीं कहेंगे और किसी से कोई शिकायत भी नहीं करेंगे। लेकिन तय करना जितना आसान रहा, उस पर अमल करना उससे करोड़ों गुना अधिक दुरुह था। किन्तु अन्ततः परिवार ने खुद को इस सदमे से उबार ही लिया।
जीतू बताता है कि उसके परिवार की चुप्पी समूचे कस्बे में बोलने लगी और ऐसी बोलने लगी कि सागर बाबू का बाहर निकलना कुछ दिनों के लिए तो बन्द ही हो गया। उनके सामने तो कोई कुछ नहीं कहता था किन्तु पीठ पीछे कोई भी चुप नहीं रहता था। बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती ही है। फिर, सागर बाबू तो दूर भी नहीं थे। कस्बे में ही तो थे! सो उन तक क्यों नहीं पहुँचती? लेकिन अपने जीवन के सम्भवतः इस एकमात्र आपवादिक स्खलन को स्वीकार कर पाने का साहस वे खो चुके थे। सो, यदि कभी किसी ने कुछ पूछा भी तो या तो चुप ही रहे या फिर ऐसा कुछ कहा जिसका कोई अर्थ नहीं होता।
जीतू और उसके परिवार ने भले ही सन्तोष कर लिया था किन्तु बात मन से निकल नहीं रही थी। सो, एक दिन जीतू अपनी जन्म कुण्डली लेकर अपने कस्बे से कोई पैंतीस किलोमीटर दूर, जिला मुख्यालय वाले कस्बे में जाकर अपने पिता के परम मित्र ज्ञान सिंहजी से मिला।

ज्ञान सिंहजी जन्मना क्षत्रिय हैं और क्षत्रिय गर्व से अभिभूत भी। किन्तु सादगी, विनम्रता, दृढ़ता के मानवाकार और विप्र आचरण के अनुपम उदाहरण। वे जिला शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और ज्योतिष में यथेष्ठ हस्तक्षेप रखते हैं। जीतू का समूचा परिवार उन्हें अपने कुटुम्ब का वरिष्ठ और परम् हितैषी मानता है। वे भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं।


जीतू ने अपनी जन्म कुण्डली ज्ञान सिंहजी को दी, पूरा किस्सा सुनाया और आगत की आहट सुननी चाही। ज्ञान सिंहजी ने ध्यान से पत्रिका देखी, देर तक देखी और एक तरफ रख दी। जीतू की प्रश्नाकुल दृष्टि ज्ञान सिंहजी की आँखें में गड़ी हुई थी। अपनी रकम डूबने से अधिक वेदना उसे इस बात की थी कि सागर बाबू जैसा आदमी उसके साथ धोखा कैसे कर सकता है? ज्ञान सिंहजी ने भेदती नजरों से जीतू को देखा। अपनी आँखें बन्द कीं, मानो ध्यान में जा रहे हों। लम्बी साँस ली और अध्र्द निर्लिप्त नेत्र मुद्रा में रहते हुए उस दिन, उस समय उन्होंने जीतू से जो कुछ कहा, वह इस क्षण तक जीतू के जीवन की सर्वाधिक मूल्यवान जीवनी-शक्ति बना हुआ है।

जैसा कि मुझे जीतू ने बताया, ज्ञान सिंहजी ने कहा कि सागर बाबू ने तो कुछ भी गलत नहीं किया। उन्होंने तो वही किया जो उनकी प्रकृति था। यह तो जीतू की ही गलती रही जो उसने सागर बाबू को भला, ईमानदार, विश्वसनीय और पितृतुल्य माना। उन्होंने तो जीतू से नहीं कहा था कि वह यह सब माने? यह जीतू की अपनी प्रकृति रही कि उसने सागर बाबू को वैसा माना और तदनुसार ही उनके साथ व्यवहार किया। ज्ञान सिंहजी ने कहा - ‘लोग तुम्हारी अपेक्षा और धारणा के अनुरुप खुद को कभी नहीं बदलेंगे। तुम्हार नियन्त्रण केवल तुम तक ही सीमित है। यह तो तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम उन्हें भली प्रकार देखो और फिर उनके बारे में धारणा बना कर तदनुसार उनसे व्यवहार करो। जो भी करना है, तुम्हें ही करना है। सामने वाले को बदलने की तुम्हारी कोई भी कोशिश अन्ततः तुम्हारे लिए ही त्रासदायी होगी।’

जीतू ने कहा - ‘विष्णु भैया! वह दिन और आज का दिन। अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं होती। मेरे साथ यदि कुछ अवांछित होता है तो उसके लिए मैं खुद को ही जिम्मेदार मानता हूँ, किसी दूसरे को नहीं। अब जब भी कभी मैं किसी से धोखा खाता हूँ तो अपनी ही गलती मानता हूँ कि मैंने ही सामने वाले का आकलन करने में चूक की थी और उसी का दण्ड मुझे मिला।’

सागर बाबू बाबू आज भी अपने कस्बे में अपना काम कर रहे हैं। कहना न होगा कि इस अपवाद ने उनकी लोक आस्था को स्थायी रूप से खण्डित किया। ज्ञानसिंहजी इस समय 83 वर्ष की अवस्था में पूर्णतः स्वस्थ, सक्रिय हैं। अपना सारा काम खुद करते हैं। फिटनेस के मामले में वे अपनी उम्र के तमाम लोगों से मीलों आगे हैं। जीतू इस समय शारजाह में एक भारतीय अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी में वाइस प्रेसीडेण्ट के पद पर कार्यरत है। बड़ा भाई भारत सरकार के एक सर्वाधिक विश्वसनीय उपक्रम में, मुम्बई में पदस्थ उच्चाधिकारी है। दोनों के पास कोई कमी नहीं है। किन्तु माँ को अब भी चैन नहीं मिल पा रहा है। दोनों भाई चाहते हैं कि ‘माँ मेरे ही पास रहे।’ सो, माँ मुम्बई और शारजाह के बीच ‘शटल’ बनी हुई है।

इतना सब लिख देने के बाद भी इस आलेख का शीर्षक मेरे लिए प्रश्न ही बना हुआ है। यह किसकी कथा है? सागर बाबू की? जीतू की? या गीता का तत्व ज्ञान देने वाले ज्ञान सिंहजी की?


सदैव की तरह इस बार भी मैं आप पर ही निर्भर हूँ।


-----
(बाँया चित्र ज्ञान सिंहजी का और दाहिना चित्र जीतू का)
सम्‍‍पर्क : ज्ञान सिंहजी - ०७४१२ २४१७२७
जीतू : 00971-5-2180198 ई-मेल : jvaidya@eim.ae
-----
इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे @जीमेल.कॉम पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001।

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

वह रोहित की सगी माँ ही थी

शाम हुई नहीं थी। होने ही वाली। दिन भर का थका मैं, घर लौटा था। कपड़े बदल कर पाँव फैलाए ही थे कि दरवाजे पर रोहित प्रकट हुआ। बिना किसी भूमिका के, हाँफता-हाँफता बोला - ‘मेरी मम्मी की पालिसी चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो।’ मुझे सम्पट नहीं पड़ी। समझ ही नहीं पाया कि वह चाहता क्या है। मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा। उत्तर में उसने प्रश्न किया - ‘आपने मेरी मम्मी का बीमा कर रखा है ना?’ मैंने कहा - ‘कर रखा है नहीं, कर रखा था।’ रोहित बोला -‘हाँ। वही तो!’ मैंने पूछा - ‘तो?’ तनिक झुंझला कर रोहित बोला -‘तो क्या? उसी की तो बात कर रहा हूँ! उसे ही चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो।’

मैंने कहा - ‘बन्द पॉलिसी चालू करना मेरे हाथ में नहीं है। वैसे भी आज दफ्तर बन्द हो चुका है और पॉलिसी चालू करने के लिए तुम्हारी मम्मी का मेडिकल कराना पड़ेगा। बकाया सारी किश्तें जमा करानी पडेंगी। उसके बाद ही पॉलिसी चालू हो सकेगी। यह सब एक दिन में तो हो नहीं पाएगा। और हो भी गया तो अब यह कल ही होगा।‘ रोहित झुंझला गया। बोला - ‘मेडिकल तो उसका कई दिनों से हो रहा है और रही बकाया किश्तों की बात? सो बताओ, कितने रुपये जमा कराने पड़ेंगे? मैं अभी आपको दे देता हूँ। साथ लेकर आया हूँ।’

मैं चकरा गया। मैंने पूछा -‘मेडिकल रोज हो रहा है से क्या मतलब?’ रोहित का उत्तर था - ‘आपको पता नहीं? मम्मी को केंसर हो गया है। साल भर से जयपुर में इलाज चल रहा था। वहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, घर ले जाओ। परसों ही हम सब जयपुर से लौटे हैं और मम्मी को जिला अस्पताल में भरती कर रखा है। वहाँ भी डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। घर ले जाने को कह दिया है। पापा और भैया मम्मी को घर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। मैं उन्हें बताए बिना आपके पास आया हूँ। आप फटाफट मम्मी की पॉलिसी चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो। मम्मी मरने ही वाली है। आप देर मत करो।’

मनुष्य प्रकृति के अनुरूप जितने भी भाव और विचार हो सकते हैं, वे सब के सब अन्धड़ बन कर मेरे मन-मस्तिष्क में घुस बैठे। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि रोहित से कैसा व्यवहार करुँ? उसे प्रताड़ित करुँ? पुचकारुँ? सहानुभूति या दया भाव जताऊँ? उसका गला दबा कर उसकी हत्या कर दूँ? जूते मारता-मारता, मेरे घर से उसके घर तक ले जाऊँ और उसकी मरणासन्न माँ को सारी बात बताऊँ? अपना सर पीट लूँ? अपने बाल नोच लूँ? जोर-जोर से रोऊँ? याने कि एक बात मन में आकर मुझे सलाह दे, मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँचूँ, उससे पहले ही दूसरी बात सामने आ खड़ी हो रही थी। मुझे सामने खड़े रोहित की नहीं, उसकी माँ की शकल नजर आ रही थी। उस माँ की शकल, जिसे मरता छोड़ कर रोहित दौड़ा-दौड़ा मेरे पास चला आया था-माँ के लिए जीवन माँगने नहीं, मर रही माँ को खनकदार रुपयों में बदलने में मेरी मदद माँगने के लिए।

शायद ईश्वर ही मेरी सहायता कर रहा था। मैंने अपने आप को, संयत स्वरों में कहते सुना - ‘रोहित! फौरन घर जा। तेरी माँ अन्तिम साँस ले, उससे पहले उससे दो बोल बोल ले, दो बोल सुन ले। उसकी आँखें तुझे तलाश रही होंगी। उसके प्राण तुझमें अटके होंगे। जा। सब काम छोड़ कर, उल्टे पाँवों अपनी माँ के पास जा।’

मेरी आशा और अपेक्षा के विपरीत रोहित मानो आपे से बाहर हो गया। चिल्लाते हुए, मुझे लगभग डाँटते हुए बोला - ‘मुझे मालूम है कि मेरी माँ मर रही है। मैं नहीं जाऊँगा तो भी वह बचेगी नहीं। आप मुझे उपदेश मत दो। मुझे मालूम है, मेरी मम्मी का, एक लाख का बीमा है। आप तो पॉलिसी फौरन चालू करो और वारिसों में मेरा नाम जोड़ो। कितने रुपये देने हैं और कहाँ दस्तखत करने हैं, यह बताओ।’

मैंने अपनी असमर्थता बताई तो इस बार रोहित हत्थे से उखड़ गया। अपनी पूरी शक्ति लगा कर बोला -‘दो साल की किश्तें भरी हैं। तीन साल से किश्तें नहीं भरी तो इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम मेरी माँ के एक लाख रुपये डकार जाओ। वह पैसा तो मेरा है। मैं लेकर रहूँगा। आप अपना काम करो। पॉलिसी चालू करो और वारिसों में मेरा नाम जोड़ो।’

यह सब मेरे लिए न केवल अप्रत्याशित था अपितु असहनीय भी था। मैं फूट पड़ा। अपने अब तक के जीवन में मैंने किसी को इतना प्रताड़ित नहीं किया, इतना भला-बुरा नहीं कहा, जितना उस शाम मैंने रोहित को किया/कहा।

रोहित को मुझसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा और अनुमान नहीं रहा होगा। वह घबरा गया और सचमुच में उल्टे पाँवों पीछे हटने लगा-मुझे कोसते हुए।

किन्तु मेरा दुर्भाग्य अभी शेष था। मुझे कोसने के साथ-साथ अब रोहित अपनी माँ को भी कोस रहा था। मालवा में विधवा स्त्री के लिए अपमानजनक सम्बोधन ‘राँड’ प्रयुक्त किया जाता है। अपनी माँ को कोसते-कोसते रोहित भूल गया कि उसके पिता जीवित है और उसकर माँ सुहागिन है। वह कह रहा था - ‘राँड से हजार बार कहा था कि किश्तें टेम पर भरती रह। पॉलिसी बन्द मत कर। राँड ने नहीं सुनी। वह तो मर गई और मरते-मरते एक लाख का सदमा और दे गई।’

रोहित चला गया। मुझे और अपनी माँ को कोसते हुए। मैं उसे अपनी मर रही माँ के लिए क्रन्दन करते, विलाप करते देखना चाह रहा था। चाह रहा था कि अपनी माँ की मृत्यु की कल्पना मात्र से वह मूर्छित हो जाए और उसे, उसके घर तक पहुँचाने का श्रम मुझे करना पड़े। किन्तु उसके चेहरे पर ऐसा कुछ भी नहीं था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अपनी मरणासन्न माँ के प्रति कोई बेटा ऐसा भाव, ऐसा व्यवहार कर सकता है। उसके चेहरे और जबान पर अपनी माँ के लिए धिक्कार-भाव और श्राप थे।

अगले दिन, रोहित की माँ के अन्तिम संस्कार के दौरान मालूम हुआ कि रोहित जब मेरे घर आया था तब उसकी माँ मर चुकी थी। उसके पिता और बड़ा भाई, मृत देह को अस्पताल से घर ले जाने का उपक्रम कर रहे थे। उसी समय सबकी नजरें बचा कर रोहित मेरे घर आया था। पॉलिसी में, नामित व्यक्ति के स्थान पर उसके बड़े भाई का नाम था। अस्पताल से उसकी अकस्मात अनुपस्थिति को सबने ‘माँ की मृत्यु से आहत, व्याकुल-व्यथित पुत्र की अनुपस्थिति’ मान लिया था।

इस घटना को आठ वर्ष पूरे हो रहे हैं। रोहित अब भी यदा कदा मुझे मिल जाता है। हम दोनों में देखा-देखी से अधिक कुछ नहीं होता। बस! अन्तर इतना ही होता है कि उसकी नजरों में नफरत होती है और मेरी नजरों में भय और विस्मय।

आठ बरस बाद भी मुझे यह लिखने में अपना सम्पूर्ण आत्म बल जुटाना पड़ रहा है कि मरने वाली स्त्री सचमुच में रोहित की सगी माँ ही थी-उसे जन्म देने वाली।

-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.


कृपया मेरे ब्‍लाग 'मित्र-धन' http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर अवश्‍य डालें।

रिश्तों को बदरंग कर देता है अन्ध विश्वास

{साप्ताहिक उपग्रह (रतलाम) के 9 से 15 अप्रेल वाले अंक में प्रकाशित यह लेख मेरे धारदार बालसखा अर्जुन पंजाबी का है। नीमच और मन्दसौर जिले के पाँच-छः अखबार, अर्जुन के लिखे को सप्ताह में दो-तीन दिन छापते ही छापते हैं। उसके व्यंग्य, पढ़ने वाले को ‘अश्-अश्’ करने को विवश कर देते हैं।
यह लेख पढ़ कर मुझे आश्यर्च हुआ क्यों कि ज्योतिष और कुण्डली जैसी बातें उसके लेखन की विषय वस्तु कभी नहीं रही। लेख पढ़कर मेरी ‘छठवीं इन्द्री’ जाग्रत हो गई। मैंने अर्जुन को फोन लगाया तो आशा भाभी ने बताया कि वह जयपुर गया हुआ है। मुझे चैन नहीं पड़ा। मैंने मनासा में उसके आसपास के कुछ मित्रों के फोन घनघनाए। आठवें प्रयत्न में मुझे सफलता मिल गई।
यह लेख एक सत्य घटना से उपजा है। अर्जुन के (और मेरे भी) एक घनिष्ठ मित्र की बिटिया का रिश्ता (जातिगत स्तर पर आयोजित एक परिचय सम्मेलन में) तय हो ही गया था। लड़की-लड़के की आपसी पसन्द सहित सारी की सारी बातें सौ टका अनुकूल थीं। किन्तु बात ‘कुण्डली मिलान’ पर आकर अटक गई। लड़के की माँ इस मामले में ‘कोई भी जोखिम’ नहीं लेना चाहती थी और परिचय सम्मेलन में, लड़कीवालों के पास कुण्डली थी नहीं। उन्हें बाद में कुण्डली भेजी गई। दोनों कुण्डलियों का मिलान नहीं हुआ। सो लड़के की माँ ने क्षणांश का भी विलम्ब किए बिना इंकार कर दिया। लड़की वालों की छोड़िए, खुद लड़का और लड़के का पिता भी इस सम्बन्ध के लिए उतावले थे। दोनों ने रिश्ते के लिए जोर दिया किन्तु लड़के की माँ टस से मस नहीं हुई और लगभग बना-बनाया रिश्ता (ऐसा बना-बनाया कि केवल लग्न लिखे जाना ही बाकी रह गए थे) टूट गया।
यह लेख न केवल अर्जुन के गुस्से को प्रकट करता है अपितु परम्परा को रूढ़ी बनते देखने की विवशता से उपजी खीझ भी उजागर करता है। अर्जुन के इस लेख को यहाँ देने से मैं खुद को रोक नहीं पाया।}

मौजूदा विसंगत और विकट समय में लोगों ने दूसरों के लिए सोचना बन्द कर दिया है। बात कोई भी हो, मूल्यांकन का आधार 'आर्थिक' ही हो गया है और रिश्तों की ऊष्मा तथा मिठास मानो गुम हो गई है। अन्ध विश्वास ने इसमें आश्चर्यजनक योगदान दिया है।ऐसे अन्ध विश्वासों वाली बातें तो यद्यपि बहुत हैं पर ‘कुण्डली-मिलान’ इनमें यदि प्रमुख नहीं तो महत्वपूर्ण तो है ही।

आम आदमी के जीवन में सतत् बढ़ते जा रहे आर्थिक तनावों/दबावों और दिन-प्रति-दिन सिकुडती जा रही दुनिया में ‘कुण्डली मिलान’ एक मुद्दा तो हो सकता है पर इसे बुनियादी और एकमात्र निर्णायक मुद्दा मान लेना किसी भी तरह उचित नहीं है। सही अर्थों में यह भटकाव है, भूल है।कुण्डली का कोई गणितीय या वैज्ञानिक आधार होता तो अलग-अलग पण्डित इसका भाष्य अलग-अलग नहीं करते। यदि दो और दो यहाँ चार होते हैं तो लन्दन और अमेरिका में भी चार ही होंगे। पाँच या तीन नहीं होंगे। पर कुण्डली के मामले में ऐसा नहीं है। इसमें कहीं पाँच हो जाते हैं, कहीं तीन हो जाते हैं, और कहीं दो-एक ही रह जाते हैं।

'गुण मिलान' के मामले में कुछ दिन पहले तक कहा जा रहा था कि कम से कम सत्‍तर प्रतिशत गुण तो मिलने ही चाहिए। अब यह अनिवार्यता तीस प्रतिशत पर आकर टिक गई है। ‘मांगलिक-अमांगलिक’ देखने को लेकर कहीं कहा जाता है कि 20 वर्ष की आयु के बाद इस देखने का कोई अर्थ नहीं है तो कहीं यह आयु 25 वर्ष तक की छूट दे रही है। कहीं मांगलिक के ‘परिहार’ हैं कहीं उन्हें नहीं माना जाता।

एम.एससी. कर, सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम की कक्षाएँ पढ़ा रही एक युवती की कुण्डली देख कर पण्डित ने कह दिया कि ‘काल सर्प योग’ है। किन्तु वही कुण्डली जब जाने माने ज्योतिषाचार्य श्री राधाकिशन श्रीमाली को दिखाई (और काल सर्प योग वाली बात बताई) तो उन्होंने छूटते ही कहा - ‘किस पण्डित ने कहा है कि काल सर्प योग है? इन पण्डितों से कहो, भैय्या! सौ पाँच सौ लेना है तो यूँ ही ले लो पर ऐसे गुमराह मत करो।’

यह मामला बताता है कि कुण्डली मिलान अवैज्ञानिक है। और यदि इससे अलग हटकर और कुछ है भी तो इसका सही भाष्य नहीं है। सटीक कुछ भी नहीं है।इसमें विचारने की बात यह भी है कि संसार के मुश्किल से दो प्रतिशत लोग ही ‘कुण्डली-मिलान’ को आधार बनाते हैं। क्या शेष, अधिसंख्य लोग, अकाल और अप्रत्याशित मौत मर रहे हैं? वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। ये तमाम 98 प्रतिशत लोग वे हैं, जो अपनी नींद सोते हैं, अपनी नींद जागते हैं। विचारों के खुले आकाश में, अपनी जिन्दगी जीते हैं, उधार की नहीं। वे नाड़ी दोष, गण दोष, नवम् पंचम, बैर योनी, गृह मैत्री दोष, नक्षत्र दोष, कालसर्प दोष, मंगल दोष से घिरे किसी चक्रव्यूह में अपने ‘रिश्तों के अभिमन्यु' को नहीं भेजते हैं। वे इस बात से वाकिफ हैं कि दुर्योधन- शकुनी-कर्ण-जयद्रथ-दुःशासन से सज्जित यह चक्रव्यूह षड़यन्त्रपूर्वक अभिमन्यु को घेर लेता है। अभिमन्यु उसमें जा तो सकता है, उसे तोड़कर बाहर नहीं आ सकता। कुण्डली मिलान भी ऐसा ही मामला है। इसमें जाने या न जाने तक आप स्वतन्त्र हैं। बाद में नहीं। चिन्तन करें और निर्णय लें।

‘कुण्डली-भीरु’ बनना ठीक नहीं। एक हद तक उस पर भरोसा किया जा सकता है किन्तु ‘वहम्’ की सीमा तक चले जाना घातक है। ‘वहम्’ तो ऐसा मानसिक रोग है जिसमें व्यक्ति अपनी ही रसोई में गिरने वाले बर्तन से पैदा हुई आवाज से भी बुरी तरह चैंक जाता है। बर्तन गिरना ‘अप्रत्याशित’ है, पर है स्वाभाविक। जीवन में घटित ‘अनहोनी-अप्रत्याशित’ भी स्वाभाविक है। उसे ग्रहों के खेल मान लेना अन्धविश्वास है। हमें इससे उबरना होगा। ईश्वरवादी बनना होगा।

इसमें तथ्यपरक एक और बात यह है कि जब ऐसा कुण्डली मिलान नहीं किया जाता था तो रिश्तों में आज की बनिस्बत अधिक मेल था। न यूँ बेटियाँ तिल-तिल जल रही थीं, न बहुएँ आग में जलती थीं, न रिश्ते टूटते थे इस कदर, न इतने ‘तलाक’ होते थे। ‘कुण्डली मिलान’ ने ‘बेमेल-अनचाहे रिश्तों को जन्म दिया है। कटुता को बढ़ाया है।

रिश्तों के लिए पुनः विचारें। ईश्वर पर, संयोग पर भरोसा करें। और बनने दें उस रिश्ते को, जो मन को, आत्मा को ठीक लग रहा है। बनने दें उस बात को जो प्रथम दृष्टि में ही सुकून दे रही है। जँच रही है। भा गई है। बनने दें उस बात को जो ईश्वर की मर्जी से बन रही है। रिश्ते जब ऊपर से बनकर आते हैं, तो बनाने दें उस ऊपर वाले को। ये रिश्ते ऐसे होंगे जिन्हें हम अपनी बुद्धि की अपेक्षा संयोग के हाथों, विश्वास के हाथों सौंपेंगे। वे न केवल बेहतर होंगे, सुख, समृद्धि, सुकून, सन्तोष, सौभाग्य दायक भी सिद्ध होंगे।

तय करें कि हम कुण्डली मिलान को सतही तौर पर रखेंगे। ईश्वर के मिलान पर भरोसा ज्यादा करें। तब हम लौट सकेंगे उस खुशनुमा समय की ओर जिसमें रिश्तों में भरपूर प्रेम-प्यार था, तालमेल था, सौहार्द्र भाव था, दोस्ती थी, एक-दूसरे की मर्यादा को कायम रखने का भाव था। रिश्तेदारी में भाईचारा और सगापन था। ऐसे ही शीतल भावों में पल्लवित रिश्तों की फसल उगाएँ। हर जंजीर, हर बन्धन, हर जकड़न, हर कैद की सलाखों से बाहर आकर मुक्त विचारों के आकाश में रिश्तों की फसल को यदि लहलहाना है तो खुले विचार-खुले दिल को रिश्ते की बुनियाद बनाएँ। सतही मुद्दों को प्रमुख न बनाएँ । तब ही बनेगी बात। तब बनेंगे रिश्ते। अस्तु।

सम्‍‍पर्क : अर्जुन पंजाबी, 'आशा भवन', गोविन्‍‍द कॉलोनी, रानी लक्ष्मीबाई मार्ग, मनासा-458110 (जिला-नीमच)(मध्य प्रदेश)। फोन - 07412 242007 मोबाइल - 094240 66651

-----
इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे पर">bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.
कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

समनुदेशन अर्थात् बीमा पालिसी को मूल्यवान सम्पत्ति का दर्जा

हममें से अधिकांश इस बात पर आश्चर्य ही करेंगे कि जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ की तरह भी प्रयुक्त किया जा सकता है। किन्तु, जीवन बीमा क्षेत्र में यह अत्यन्त सहज और प्रचलित वास्तविकता है। इसका ज्ञान उस प्रत्येक पालिसीधारक को हो चुका होगा जिसने किसी वित्तीय संस्था से साधारण ऋण अथवा गृह ऋण लिया होगा।


जब कोई व्यक्ति किसी उद्यम, उपक्रम के लिए अथवा मकान खरीदने/बनाने के लिए किसी वित्तीय संस्था से ऋण लेता है तो वह संस्था प्रतिभूति (जमानत अथवा सिक्यूरिटी) के बतौर तत्सम्बन्धित उपक्रम/उद्यम की परिसम्पत्तियों/मकान को अपने पक्ष में गिरवी रखती हैं। अनेक वित्तीय संस्थाएँ, जीवन बीमा पालिसी को ‘सम पार्श्‍व प्रतिभूति’ (कोलेटरल सिक्यूरिटी) के रूप में गिरवी रखवाती हैं।

ऋण चुकाने से पहले ही यदि दुर्भाग्यवश ऋणधारक की मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार पर दोहरा संकट आ जाता है। पहला संकट-घर के लिए रोजी-रोटी कमाने वाला नहीं रहता। और दूसरा संकट-लिया गया ऋण चुकाने का कानूनी उत्तरदायित्व, मृतक के विधिक उत्तराधिकारियों पर आ जाता है।
ऐसे समय में, गिरवी रखी गई जीवन बीमा पालिसी ही ऋण वसूली के लिए सबसे पहले काम में आती है। पालिसी से मिलने वाली रकम का समायोजन, बकाया ऋण राशि में किया जाता है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण राशि से अधिक है तो ऋण राशि वसूलने के बाद बाकी रकम, ऋणधारक के परिजनों को लौटा दी जाती है। यदि पालिसी से मिली रकम, शेष ऋण रकम से कम है तो,तत्सम्बन्धित उद्यम/उपक्रम की गिरवी रखी गई परिसम्पत्तियों/मकान को बेच कर शेष ऋण की वसूली की जाती है। इसके बाद भी यदि ऋण शेष रहता है तो उसकी वसूली उसके विधिक उत्तराधिकरियों से की जाती है।

कई प्रकरणों में, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, उद्यम/उपक्रम की परिसम्पत्तियों/मकान के अतिरिक्त किसी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति की जमानत भी माँगती हैं। यदि ऐसी जमानत ली गई है तो ऋण वसूली के लिए उस जमानतदार पर भी विधिक उत्तरदायित्व आता है।

स्पष्ट है कि जिस जीवन बीमा पालिसी को बहुत ही हलके से लिया जाता है वही जीवन बीमा पालिसी ऐसी आकस्मिक विकट आपदा के समय सबसे बड़ी और सबसे पहली सहायक पसिम्पत्ति बन कर सामने आती है। किन्तु ऐसा तभी हो पाता है जब जीवन बीमा पालिसी का ‘समनुदेशन’ कराया गया हो। यह ‘समनुदेशन’ ही जीवन बीमा पालिसी को ‘मूल्यवान सम्पत्ति’ का स्वरूप प्रदान करता है।

अंग्रेजी के ‘असाइनमेण्ट’ का कानूनी अनुवाद है-समनुदेशन। आसानी से समझने के लिए इसे ‘गिरवीनामा’ भी कहा जा सकता है जो इसका भावानुवाद होगा, विधिक अनुवाद नहीं। इसलिए याद रखिएगा कि यदि आप जीवन बीमा कार्यालय में जाकर ‘मुझे अपनी पालिसी गिरवी रखनी है’ अथवा ‘मुझे पालिसी पर गिरवीनामा अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपके काम में देर हो सकती है। किन्तु यदि आप ‘मुझे अपनी पालिसी असाइन करनी है’ अथवा ‘मुझे अपनी पालिसी पर असाइनमेण्ट अंकित करवाना है’ कहेंगे तो आपका काम जल्दी हो सकेगा।

जैसा कि शुरु में कहा गया है, आपकी जीवन बीमा पालिसी वह मूल्यवान सम्पत्ति है जिसे ऋण लेने के लिए प्रतिभूति (जमानत) के रूप में गिरवी रखा जा सकता है। जीवन बीमा पालिसी को गिरवी रखने की इस प्रक्रिया को ही समनुदेशन अथवा असाइनमेण्ट कहा जाता है।


समनुदेशन कौन कर सकता है?
वह प्रत्येक पालिसीधारक जो पूर्ण वयस्क हो, जो भारतीय कानूनों के अनुसार अनुबन्ध करने की पात्रता रखता हो और जिसमें पालिसी निहित (वेस्ट) हो चुकी हो, अपनी पालिसी पर समनुदेशन कर सकता है।


किसके पक्ष में किया जा सकता है समनुदेशन?
सामान्यतः यह (समनुदेशन) किसी ऐसी वित्तीय संस्था के पक्ष में ही किया जा सकता है जिससे, पालिसीधारक ऋण ले रहा है। किसी व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन सामान्यतः नहीं ही होता है। जीवन बीमा पालिसी चूँकि ‘परिवार के बीमा हित (इंश्योरेबल इण्टरेस्ट)’ को ध्यान में रख कर ली जाती है इसलिए, जीवन बीमा पालिसियों की खरीदी-बिक्री को निरुत्साहित करने के लिए, व्यक्ति के पक्ष में समनुदेशन न करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है तथा अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती है।


समनुदेशन कैसे होता है?
इसकी एक सुनिश्चित प्रक्रिया है।
समनुदेशन के लिए पालिसीधारक अपनी बीमा कम्पनी को लिखित सूचना (नोटिस) देता है जिसमें समनुदेशन का कारण तथा जिसके पक्ष में समनुदेशन किया जाना है उस संस्था का नाम/पता सूचित करता है।
इस सूचना के साथ ही, समनुदेशन की इबारत मूल पालिसी पर लिख/टाइप कर, मूल पालिसी अभिलेख, बीमा कम्पनी को प्रस्तुत करनी पड़ेगी। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा जारी किए गए पुराने पालिसी अभिलेखों में तो पर्याप्त खाली स्थान उपलब्ध होता है किन्तु इन दिनों जारी किए जा रहे पालिसी अभिलेखों में ऐसा खाली स्थान नहीं है। जिन पालिसी अभिलेखों में खाली स्थान नहीं है ऐसे प्रकरणों में, समनुदेशन की इबारत, 20 (बीस) रुपयों के अन्यायिक (नान ज्युडिशियल) स्टाम्प पेपर पर अंकित कर प्रस्तुत करनी पड़ेगी।
इस सूचना के आधार पर बीमा कम्पनी अपने अभिलेखों में इस समनुदेशन की प्रविष्टि कर, इसे पंजीबध्द करेगी और मूल पालिसी उस वित्तीय संस्था को पंजीकृत डाक से भेज देगी जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। यदि समनुदेशन, स्टाम्प पेपर पर अंकित किया गया है तो वह स्टाम्प पेपर भी पालिसी अभिलेख का भाग बन जाएगा और मूल पालिसी अभिलेख के साथ वह स्टाम्प पेपर भी भेजा जाएगा।
समनुदेशन पंजीयन के लिए पालिसीधारक को 250 रुपये (दो सौ पचास रुपये) का शुल्क चुकाना पड़ेगा।

पालिसी और पालिसीधारक पर समनुदेशन के क्या प्रभाव पड़ेंगे?

इसके दो प्रत्यक्ष और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभाव होते हैं
पहला - समनुदेशन पंजीकृत होते ही, पालिसी पर से पालिसीधारक के समस्त अधिकार समाप्त हो जाते हैं और समनुदेशित पालिसी उस वित्तीय संस्था की सम्पत्ति हो जाती है जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है। अर्थात् पालिसी से मिलने वाले समस्त लाभ और समस्त प्रतिफल उस वित्तीय संस्था को मिलेंगे जिसके पक्ष में समनुदेशन किया गया है।

वह संस्था चाहे तो ऐसी पालिसी को अभ्यर्पित (सरेण्डर) कर सकती है अथवा किसी अन्य संस्था के पक्ष मे समनुदेशन कर सकती है।
दूसरा - समनुदेशन के प्रभाव में आते ही, पालिसीधारक द्वारा पालिसी पर कराया गया नामन (नामीनेशन) स्वतः निरस्त हो जामा है।

समनुदेशन के बाद रिस्क कवर की स्थिति क्या होगी?
समनुदेशन से रिस्क कवर की स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता है। समनुदेशन के बाद भी रिस्क कवर उसी व्यक्ति (बीमित व्यक्ति) का होगा जिसके जीवन पर पालिसी ली गई है।

समनुदेशन के बाद यदि बीमित व्यक्ति किश्तें जमा कराना बन्द कर दे तो?
अपनी जीवन बीमा पालिसी की किश्तें जमा करना या न करना, पालिसी को प्रभावी बनाए रखना या समय पूर्व ही बन्द कर देना, पालिसीधारक का अधिकार है। किन्तु ऐसा बिलकुल ही नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल आत्मघाती अपितु आश्रित परिवार के लिए भी अत्यधिक घातक होता है।
जीवन बीमा पालिसी के पूरे लाभ तभी मिलते हैं जब कि उसे उसकी पूरी अवधि के लिए प्रभावी बनाए रखा जाए। जो पालिसी समनुदेशित की जा चुकी है, उसे प्रभावी बनाए रखना तो और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
इस आशंका को ध्यान में रखकर, ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ विभिन्न व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करती हैं। कुछ संस्थाएँ, बीमित व्यक्ति की बीमा किश्तें खुद ही जमा कर, किश्तों की रकम, ऋणधारक के नाम लिख देती हैं। कुछ वित्तीय संस्थाएँ ऋणधारक से लिखित अनुबन्ध कराती हैं कि वह निर्धारित समयावधि में अपनी प्रीमीयम किश्तें जमा कर उनकी रसीदें ऋणदाता वित्तीय संस्था को नियमित रूप से प्रस्तुत करेगा। इस शर्त का उल्लंघन करने पर वित्तीय संस्थाएँ, ऋणधारक पर आर्थिक दण्ड भी आरोपित करती हैं।

ऋणधारक बीमित व्यक्ति द्वारा समय पर किश्तें जमा न कराने के कारण, पालिसी कालातीत (लेप्स) हो जाने की दशा में ऋणदाता वित्तीय संस्थाएँ, समूची ऋण राशि की एकमुश्त वसूली जैसी कानूनी कार्रवाई करने के अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रख सकती हैं।

यदि कोई बीमित/पालिसीधारक, बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना ही पालिसी किसी को समनुदेशित कर दे तो?

ऐसा हो सकता है और ऐसा होने पर बीमा कम्पनी को कोई आपत्ति नहीं होगी। किन्तु जब भी पालिसी के लाभों अथवा प्रतिफल के भुगतान की स्थिति बनेगी तब बीमा कम्पनी उसी व्यक्ति को भुगतान करेगी जिसका उल्लेख इस हेतु, बीमा कम्पनी के अभिलेखों में किया गया है।ऐसे प्रकरण में चूँकि समनुदेशन का पंजीयन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में अंकित नहीं है इसलिए पालिसी से मिलने वाला भुगतान या तो पालिसीधारक को किया जाएगा अथवा मृत्यु दावे की स्थिति में पालिसी में नामित व्यक्ति को किया जाएगा।

बीमा कम्पनी को सूचित किए बिना और बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीयन कराए बगैर किया गया समनुदेशन, पालिसीधारक और समनुदेशित के बीच का मामला है जिससे बीमा कम्पनी का कोई लेना-देना नही है। समनुदेशित को भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कम्पनी पर तब ही आती है जब समनुदेशन बीमा कम्पनी के अभिलेखों में पंजीकृत किया गया हो।

क्या अवयस्क के जीवन पर जारी जीवन बीमा पालिसी भी समनुदेशित की जा सकती है?
हाँ, की जा सकती हैं। ऐसा सामान्यतः, बच्चों की उच्च शिक्षा हेतु लिए जाने वाले ‘शिक्षा ऋण’ के लिए किया जाता है। ऐसे प्रकरणों समनुदेशन की सारी औपचारिकताएँ, बीमा प्रस्तावक (जो कि अवयस्क बच्चे का पिता अथवा माता में से कोई एक होता है) पूरी करेगा और अवयस्क बच्चा इस पूरी प्रक्रिया से दूर ही रहेगा। ऐसे प्रकरण में समनुदेशन करने वाले (अर्थात् बच्चे के पिता अथवा माता) को यह यह लिखित वचन देना होगा कि इस ऋण राशि का उपयोग पूर्णतः बच्चे के लिए, बच्चे के हित में ही किया जाएगा।

सम्पूर्ण ऋण चुका देने के बाद पालिसी की स्थिति क्या होगी और पालिसीधारक को तत्काल ही क्या करना चाहिए - यह सब अगली किसी किश्त में।

(‘समनुदेशन’ अत्यन्त विस्तृत विषय है। यहाँ उन्हीं बातों को प्रस्तुत किया गया है जो सर्वाधिक व्यवहार में हैं।)
कृपया सदैव की तरह याद रखिएगा कि ये जानकारियाँ मेरे अधिकतम और श्रेष्ठ ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत हैं। इन्हें कृपया भारतीय जीवन बीमा निगम की अधिकृत जानकारियाँ न समझें।
----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

मेरी आपबीती और बिट्टू की हाँ

बिट्टू कहने भर को बिट्टू है। उसे सचमुच में बिट्टू मत मान लीजिएगा। यदि माता-पिता का कहा मान उसने विवाह कर लिया होता तो अब तक तो वह खुद कम से कम एक बिट्टू (या बिट्टी) का पिता बन चुका होता।

बिट्टू इस समय पचीसवें में चल रहा है। आज के जमाने के हिसाब से कोई बहुत ज्यादा उम्र नहीं है उसकी। आज कल के बच्चे 28/30 के आसपास ही विवाह के बारे में सोचते/करते हैं। इस लिहाज से तो बिट्टू सचमुच में ‘बच्चा’ ही कहा जा सकता है। किन्तु उसके माता-पिता के हिसाब से तो साल दो साल पहले ही उसका विवाह हो जाना चाहिए था। दो साल पहले ही, पढ़ाई समाप्त होते ही, बिट्टू की नौकरी लग चुकी है। ढंग की तनख्वाह (महीने के तीस-पैंतीस हजार रुपये) पा रहा है। वैसे भी घर में कोई कमी नहीं है। फिर, वह परिवार का बड़ा बेटा है! सो, उसने अब तनिक भी देर किए बिना विवाह के लिए हाँ कर देना चाहिए।

बिट्टू और उसके माता-पिता के बीच यही सब बातें चल रहीं थीं जब मैं बिट्टू के घर पहुँचा। नहीं, बिट्टू से मिलने नहीं गया था। उसके माता-पिता से मिलना था। पहुँचते ही लगा कि गलत समय पर आ गया हूँ। जी तो किया कि उल्टे पाँव लौट जाऊँ किन्तु वैसा कर पाना सम्भव नहीं रह गया था। सो, मुझे बैठना ही पड़ा। बैठ गया। तय किया था कि चुपचाप तीनों की बातें सुनूँगा। बोलूँगा कुछ भी नहीं। किन्तु जब आप, उपस्थित लोगों में उम्र में सबसे बड़े हों, एक बेटे को पढ़ा-लिखा कर उसका विवाह कर चुके हों और सामने वाले के परिवार में घर के बड़ों की तरह व्यवहार/सम्मान पाते हों तो आपको चुप कौन बैठने देगा? ऐसे वक्त तो आप सबसे बड़े सहायक बन कर सामने आते हैं! सो, वहाँ ‘अयाचित, अनपेक्षित’ पहुँचा मैं, अब ‘परिवार के बड़े-बूढ़े’ की भूमिका में भी था। बिट्टू के माता-पिता ने कहा - ‘हम तो समझा-समझा कर थक गए। आप ही इसे समझाइए।’


सहायता के लिए उनका आग्रह तो मुझे उचित लगा किन्तु बिट्टू को नासमझ मानने की उनकी समझ मुझे उचित नहीं लगी। हम अपने बच्चों को शायद कभी भी बड़ा नहीं होने देते। वे बड़े हो जाते हैं किन्तु हम उन्हें सदैव ‘शिशुवत्’ ही मानना चाहते हैं। जो बिट्टू किसी बहु राष्ट्रीय कम्पनी में अपने अनुभाग का प्रभारी है, तीस-पैंतीस हजार रुपयों वाली नौकरी कर रहा है, पाँच-सात अधीनस्थों से काम ले रहा है उसे नासमझ मान लेना अपने आप में समझदारी कैसे हो सकती है? हमारे बच्चे हमारा लिहाज पाल कर हमारे सामने चुप रहते हैं तो यह उनकी संस्कारशीलता है, नासमझी नहीं। हाँ, बिट्टू तनिक अपरिपक्व भले ही हो सकता है। मैं उसे नासमझ मानने के लिए पल भर को भी तैयार नहीं हुआ।

सो मैंने कहा कि मैं उसे समझाने या उपदेश देने की मूर्खता तो नहीं कर पाऊँगा किन्तु आपबीती अवश्य सुनाना चाहूँगा। बिट्टू को बड़ी राहत मिली, यह उसके चेहरे पर पढ़ा जा सकता था। वैसे भी उपदेश की अपेक्षा किसी की आपबीती सुनना अधिक रोचक होता है।

मैं शुरु हो गया।

बिट्टू की तरह ही मैं भी विवाह न करने पर अड़ा हुआ था। बड़ा अन्तर यह था कि मैं बेरोजगार था जब मुझ पर विवाह करने का दबाव बनाया जा रहा था। मेरा आत्मा इसके लिए तैयार नहीं था। अन्ततः, मैं विवाह के लिए जब तैयार हुआ तब मेरी उम्र 29 वर्ष थी। विवाह के चार वर्ष बाद (अर्थात् जब मैं 33 वर्ष का था तब) मेरे बड़े बेटे का जन्म हुआ और उसके नौ वर्ष बाद (मेरी आयु के 42वें वर्ष में) मेरे छोटे बेटे का। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, वैसे-वैसे माँ-बाप बूढ़े होते ही हैं। किन्तु मेरे साथ यह तनिक अधिक गति से हो रहा था क्यों कि विवाह देर से किया और छोटा बेटा तो उसके भी 13 वर्ष बाद हुआ।

बड़े बेटे के विवाह के उत्तरदायित्व से मैं गत वर्ष (अर्थात् अपनी आयु के 61वें वर्ष में) निवृत्त हुआ हूँ। छोटा बेटा इस समय इंजीनीयरिंग के तीसरे सेमेस्टर में पढ़ रहा है। अर्थात् उसकी इंजीनीयरिंग पूरी होने में अभी कम से कम ढाई वर्ष तथा उसके बाद कोई भी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए और दो वर्ष लगेंगे। उसके बाद उसका विवाह करना होगा। लेकिन यदि उस समय वह काम-काज से नहीं लगा तो वह भी मेरी ही तरह विवाह से इंकार करेगा और मैं उसे मना नहीं कर पाऊँगा। यह सब मेरा न्यूनतम उत्तरदायित्व है। यदि पढ़ाई पूरी होते-होते उसे नौकरी मिल भी गई और वह तत्काल ही विवाह के लिए राजी हो गया तो भी उस समय मेरी उम्र कम से कम 67 वर्ष के आसपास होगी।


मेरे सहपाठियों में से दो स्वर्गवासी हो चुके हैं और शेष समस्त ‘रिटायर्ड लाइफ’ बिता रहे हैं। अपने नातियों-पोतों के साथ खेल रहे हैं। उन्हें या तो कहानियाँ सुना रहे हैं या उन्हें स्कूल ला-ले जा रहे हैं। बहुत हुआ तो घर के लिए सब्जी ला दी या टेलिफोन, बिजली, पानी के बिल भरने का काम कर दिया। जबकि मुझे तो तब तक लगातार कमाते रहने के लिए हाथ पैर मारने पड़ेगें। फिर, मँहगाई जिस तरह दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है उसके चलते मेरी आय का प्रत्येक आँकड़ा हर बार छोटा ही बना रहेगा! याने, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे मुझे और ज्यादा तथा और अधिक गति से काम करते रहना पड़ेगा जबकि शरीर बराबर प्रतिवाद करता रहेगा।मैंने कहा कि तब मुझे मेरे माता-पिता की बातें नासमझी लगती थीं किन्तु अब (इन सारी वास्तविकताओं का अनुमान करते हुए) मैं अनुभव करता हूँ कि वह मेरी नासमझी थी। निस्सन्देह, बारोजगार होने के बाद ही विवाह करने का मेरा आग्रह अनुचित बिलकुल ही नहीं था लेकिन अब लग रहा है कि मैंने तब, माता-पिता के पहली बार कहने पर ही विवाह कर लेना चाहिए था। मैंने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि बिट्टू को फौरन विवाह कर लेना चाहिए किन्तु मेरी कहानी पर उसने विचार अवश्य करना चाहिए। मैंने कहा-सही समय पर सही निर्णय लेना तो समझदारी होती ही है किन्तु दूसरे की मूर्खता से सबक लेना उससे भी बड़ी समझदारी होती है।


मैं आपबीती सुना रहा था, उपदेश बिलकुल नहीं दे रहा था। किन्तु मैं देख रहा था मेरी आपबीती को उपदेश की तरह सुना जा रहा था। बिट्टू अविश्वास से मेरी ओर देखे जा रहा था। मैं तो अपनी आपबीती सुना रहा था किन्तु उसे लग रहा था कि मैं अपनी गलती का सार्वजनिक स्वीकार कर रहा हूँ। उसके चेहरे पर प्रसन्नता चमक रही थी। शायद यह जानकर कि जिसे वह समझदार और प्रबुध्द मानता है वह आदमी भी गलती कर चुका है। उसकी प्रसन्नता में घुला हुआ विजय भाव भी मैं पढ़ पा रहा था जो अपने माता-पिता से कहता प्रतीत हो रहा था कि कहाँ तो आप मुझे गलत साबित कर रहे थे और यहाँ तो जिसे आपने मुझे समझाने का काम सौंपा है, वह अपनी गलती स्वीकार कर रहा है। भला, एक गलत आदमी मुझे क्या समझाएगा?

बिट्टू की यह मनोदशा अनुभव कर मुझे प्रसन्नता तो हुई, हँसी भी आई। हमारे बच्चे! निस्सन्देह वे समझदार होते हैं किन्तु इतने भी नहीं कि अपने बूढ़ों के आत्म स्वीकार में लिपटी लम्पटता को समझ सकें। मेरी आपबीती सुनने के बाद, अपने माता-पिता से कुछ कहने के बजाय उसने मुझसे कहा - ‘ताऊजी! आपने यह सब कहा है तो मैं एक बार फिर विचार करूँगा।’ सुनकर उसके माता-पिता बहुत खुश नहीं हुए। वे तत्काल ही स्पष्ट स्वीकृती चाह रहे थे। किन्तु वे कर भी क्या सकते थे?

यह सब 30 मार्च की शाम की बात है। कल शाम बिट्टू के माता-पिता का फोन आया। कह रहे थे कि बिट्टू ने विवाह के लिए हाँ कर दी है। कोशिश है कि इसी मई में विवाह हो जाए। कोशिशें कामयाब हो गईं तो मुझे बारात में चलने के लिए अभी से तैयार रहना चाहिए।

धन्यवाद देते हुए वे कह रहे थे - आपकी आपबीती ने हमारी बड़ी सहायता की।
-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://akoham.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।

मित्रों ने पढ़ाया पाठ

एक अठवाड़े से अधिक हो गया। न तो कुछ लिखा और न ही कुछ पढ़ा। और तो और, ई-मेल से मिलने वाले चिट्ठों पर भी टिप्पणी नहीं कर पाया। बेटे की, मँहगी पढ़ाई वाले कम से कम चार और वर्ष तथा उसके बाद उसके विवाह के उत्तरदायित्व से चिन्तित एक बूढ़ा पिता और एक लालची बीमा एजेण्ट जितना व्यस्त होना चाहिए था, लगभग उतना ही व्यस्त मैं भी रहा - 31 मार्च की भागदौड़ में।

इस बीच एक दुर्घटना का शिकार भी हो गया। आहत और क्षत-विक्षत तो हूँ किन्तु तन से नहीं। मन से।

राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवार चयन में ‘जीतने की सम्भावना’ को एकमात्र आधार बनाने के कारण अनेक अवांच्छित लोग विधायी सदनों में पहुँच जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए मतपत्र अथवा इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प उपलब्ध कराने के लिए चलाए जा रहे अभियान से मैं भी जुड़ा हूँ। निर्वाचन आयोग ने यह सुझाव, भारत सरकार को भेज भी दिया है। किन्तु इसे स्वीकार कर लिया जाएगा, इसमें हर किसी को सन्देह ही है। ऐसे में, मताधिकार कानून की धारा 49 (ओ) का प्रचार-प्रसार अपने कस्बे में व्यापक स्तर पर कर सकूँ, इस हेतु अत्यधिक उत्साहित और प्रयत्नरत था। मन-मस्तिष्क में पूरी योजना स्पष्ट थी। रोटरी, लायंस, जैन सोश्यल ग्रुप, इण्डियन मेडिकल एसोसिए‍शन जैसे समस्त प्रतिष्ठित और सूचीबध्द संगठनों की मासिक बैठकों में जाकर, इस प्रावधान की जानकारी देना और लोगों से आग्रह करना कि वे मतदान केन्द्र पर जाकर, मतदान न करने का अपना निर्णय अंकित कराने की प्रक्रिया पूरी करें। यह भी सोचा था कि इस हेतु शाम को छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएँ की जाएँ।

मैं इस सबमें आगे बिलकुल ही नहीं रहना चाहता था। चाहता था कि अधिकाधिक लोग इससे जुड़ें। संगठनों की बैठक में भी दो-तीन लोग पहुँचें। एक बोले, बाकी दोनों उसे मानसिक मजबूती देते रहें। नुक्कड़ सभाओं को लेकर भी यही विचार था। अभियान की प्रारम्भिक जानकारी लोगों को देने के लिए अखबारों में रख कर पर्चे पहुँचाना भी तय हो गया था। पर्चों के खर्च की भी व्यवस्था कर ली गई थी। पर्चा लिखवाने का काम एक मित्र के जिम्मे किया गया था-काम बाँटने और अधिकाधिक लोगों की भागीदारी प्राप्त करने की सद्इच्छा से। पर्चा किससे लिखवाना है, यह भी सुस्पष्ट था।

किन्तु इनमें से कुछ भी नहीं हो सका। जिन मित्रों को काम दिया था, उन सबने आश्चर्यजनक रूप से उदासीनता जताई। मजे की बात यह है कि ये तमाम मित्र वर्तमान त्रासदियों, विसंगतियों और प्रदूषित राजनीतिक परिस्थितियों पर जोरदार बहसें करते हैं और ‘हालात फौरन बदले जाने चाहिए’ जैसे जुमले कहते नहीं थकते। मुझे इन सब पर बड़ा भरोसा था। इन सबकी बातों को मैं इनकी पीड़ा और मन में छायी बेचैनी मानता था। किन्तु इनमें से एक को भी इस काम के लिए फुरसत नहीं मिली। सबके सब एक साथ, समान रूप से उदासीन और निस्पृह रहे। मैं ने जब भी बात की तो इन सबने ऐसे बात की मानो यह सब मेरा निजी काम (जैसे कि मेरे बेटे या बेटी की शादी) है जिसमें ये सब सहयोग कर मुझे और मेरे कुटुम्ब को उपकृत कर रहे हों। जिन मित्र के जिम्मे पर्चा लिखवाने का काम था, उन्हें जब तीसरी बार याद दिलाया तो निर्विकार भाव से बोले - ‘अरे! दादा, मैं तो भूल ही गया।’ उनका यह उत्तर मेरे लिए किसी जवान मौत से उपजे सदमे से कम नहीं था।

मेरा विचार क्रियान्वित नहीं हो पाया इससे अधिक वेदना मुझे इस बात से हुई कि जो लोग परिवर्तन की चाह रख कर निजी बहसों में झण्डाबरदारी करते रहे, काम करने के नाम पर उनमें से एक ने भी गम्भीरता और ईमानदारी नहीं बरती। किसी के पास इस काम के लिए समय नहीं था। कोई भी अपनी दुकान से उतरने को या कि घर के काम से समय निकालने को क्षण भर भी तैयार नहीं था। सबके सब ईमानदारी से बेईमानी बरत गए।

हमारे लोकतन्त्र का यही सबसे बड़ा संकट है। लोग इसे बेहतर स्थितियों में देखना तो चाहते हैं किन्तु सहयोग करते रहते हैं इसे बदतर बनाने में। कोई भी, कुछ भी खोने को तैयार नहीं। आर्थिक हित छोड़ दीजिए, मेरे मित्र तो समय और श्रम देने को भी तैयार नहीं हुए।

सदमे के पहले क्षण तो मुझे सब पर गुस्सा ही आया किन्तु अगले ही क्षण अपनी मूर्खता पर हँसी आ गई। उन बेचारों ने तो वही किया जो उनका स्वभाव था। मैं ने उन्हें जिम्मेदार और प्रयत्नवादी, परिवर्तनवादी मान लिया, उनसे अपेक्षा कर ली, यह मेरा ही तो अपराध था! उन ‘बेचारों’ का क्या दोष?

सो, इस समय मैं इस सदमे से तो उबर अवश्य गया हूँ किन्तु आगे कैसे क्या करना है, यह स्पष्ट नहीं है। कृपालु मित्रों ने यह तो जता ही दिया कि जो भी करना है, मुझे अपने अकेले के दम पर ही करना है।

देखता हूँ, कितना कुछ कर पाता हूँ। कर भी पाता हूँ या नहीं?
-----

इस ब्लाग पर, प्रत्येक गुरुवार को, जीवन बीमा से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। (इस स्थिति के अपवाद सम्भव हैं।) आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने का यथा सम्भव प्रयास करूँगा। अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी। यह सुविधा पूर्णतः निःशुल्क है।

यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

कृपया मेरे ब्लाग ‘मित्र-धन’ http://mitradhan.blogspot.com पर भी एक नजर डालें ।