तू चन्दा मैं चाँदनी - 2

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर 20 जुलाई 2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - तनिक संशोधन, सम्पादन सहित।)

यह तब की बात है जब ‘रेशमा और शेरा’ का अता-पता कल्पना में भी शायद ही रहा होगा।

फिल्मों में गीत लिखने के सिलसिले में दादा साठ के दशक में कुछ अरसा मुम्बई में रह चुके थे। तब उन्होंने श्री मुबारक मर्चेण्ट के यहाँ मुकाम जमाया था। ये मुबारकजी वे ही थे जिन्होंने फिल्म ‘अनारकली’ में अकबर की, फिल्म ‘नागिन’ में वैजयन्तीमाला के पिता की, फिल्म ‘झाँसी की रानी’ में राजा गंगाधर राव भूमिका निभाई थी और जो बाद में स्थापित चरित्र अभिनेता के रूप में पहचाने गए। दुर्गा खोटे की आत्मकथा ‘मी दुर्गा’ में मुबारकजी का सन्दर्भ अत्यन्त भावुकता से आया है। मुबारकजी मूलतः तारापुर के रहने वाले थे। यह तारापुर, महाराष्ट्र वाला नहीं बल्कि मालवा वाला तारापुर है जो इस समय नीमच जिले की जावद तहसील का हिस्सा है। इस तारापुर की रंगाई और इसकी छींटें (प्रिण्ट्स) विश्व प्रसिध्द हैं जिन्हें ‘तारापुर प्रिण्ट्स’ के नाम से जाना जाता है। इन छींटों की रंगाई के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले प्राकृतिक रंग खूब गहरे/गाढ़े होते हैं जो सैंकडों धुलाइयों के बाद भी फीके नहीं पड़ते। तारापुर के रंगरेजों की पीढ़ियाँ बीत गई हैं लेकिन कोई भी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि रंगों के कड़ाहों में पहली बार रंग किसने डाला था। इन कड़ाहों को पूरा खाली होते किसी ने नहीं देखा। अपने से पहली वाली पीढी से प्राप्त, इन रंग भरे कड़ाहों को अपने से आगे वाली पीढ़ी को सौंपने का क्रम आज भी बना हुआ है। तारापुर के रंगरेज अपनी इस परम्परा का सगर्व बखान करने का कोई अवसर नहीं चूकते। इन रंगरेजों को ‘छीपा’ जाति के नाम से पहचाना जाता है और इस जाति में दोनों सम्प्रदायों (हिन्दू और मुसलमान) के लोग हैं। सच बात तो यह है कि तारापुर की यह छपाई अपने आप में अध्ययन और लेखन का स्वतन्त्र/वृहद् विषय है।


मुबारकजी

फिल्मी दुनिया में मुबारकजी को किस सम्बोधन से पुकारा जाता था यह मुझे नहीं पता क्यों कि उनके रहते मैं कभी मुम्बई नहीं गया। हम लोगों ने उनका जिक्र सदैव ही दादा से सुना। दादा उन्हें ‘चाचाजी’ कहते थे। सो, वे हम सबके चाचाजी थे। मुम्बई में भी चाचाजी ने तारापुर को अपने मन में बराबर बसाए/बनाए रखा। वे मालवी न केवल फर्राटे से बालते थे बल्कि मालवी बोलने के मौके पैदा करते थे। दादा के आग्रह पर वे एक बार मनासा आए थे और हमारे परिवार के साथ कुछ दिन रहे थे। उन्हें मनासा के डाक बंगले में ठहराया गया था। वे शिकार के शौकीन थे। दादा के कुछ मित्रों ने उनके लिए शिकार खेलने की व्यवस्था की थी। जिज्ञासा भाव से मैं भी उस शिकार में शरीक हुआ था। कंजार्डा पठार के जंगलों में, चाचाजी के साथ, शिकारी जीप में की गई वह यात्रा मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। प्रत्येक क्षण मुझे लगता रहा कि यह जीप या तो कहीं टकरा जाएगी या फिर उलट जाएगी और हम लोगों के शव ही घर पहुँचेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। काफी भाग दौड़ के बाद उन्होंने अन्ततः बारहसिंघे की प्रजाति के जानवर एक ‘जरख’ को मार गिराया था। लेकिन इससे पहले, जब काफी देर तक कोई शिकार नहीं मिला और एक खरगोश सामने आया तो शिकार आयोजित करने वाले मेजबानों ने चाचाजी को सलाह दी कि वे खरगोश का शिकार कर लें। उन्होंने फौरन ही इंकार कर दिया। मेरे लिए यह ‘विचित्र किन्तु सत्य’ जैसी स्थिति थी। अँधेरे की अभ्यस्त हो चुकी आँखों से मैं ने चाचाजी का चेहरा देखा तो वहाँ शिकारी की क्रूरता और हिंसा कहीं नहीं थी। जीप की हेड लाइट की तेज रोशनी में खरगोश की शरबती आँखें चमक रही थीं और चाचाजी के चेहरे पर मानो मक्खन का हिमालय उग आया था। वे खरगोश को ऐसे देख रहे थे मानो खुदा की सबसे बडी नेमत उनके सामने मौजूद हो। उन्होंने कहा था - ‘कैसी बातें करते हैं आप? इतना खूबसूरत और मुलायम जानवर तो प्यार करने के लिए है, मारने के लिए नहीं।’ उस समय वे ‘सोमदत्त’ के भेस में थे और उनका व्यवहार ‘सिध्दार्थ’ जैसा था। कंजार्डा पठार के घने जंगलों में, उस गहरी, अँधेरी रात में मैं ने एक कलाकार का जो स्वरूप देखा, वह मेरे लिए जीवन निधी से कम नहीं है।

चाचाजी नियमित सुरा-सेवी थे। मनासा तब मुश्किल से नौ-दस हजार की आबादी वाला कस्बा था। आबादी में माहेश्वरियों और श्वेताम्बर/दिगम्बर जैनियों का प्रभुत्व तथा प्रभाव। माहेश्वरियों ने तो उस गाँव को बसाने में भागीदारी की। सो, सकल वातावरण ‘सात्विक’। देसी शराब का ठेका जरूर वहाँ था लेकिन ‘अंग्रेजी शराब’ की तो बस बातें ही होती थीं। ऐसे में एक शाम, जब डाक बंगले मैं अकेला उनके पास था, उन्होंने अचानक ही शराब की फरमाइश की। मैं अचकचा गया। शराब का नाम मैं ने तब तक सुना जरूर था लेकिन शराब देखी नहीं थी। शराब का ठेका भी मैं ने देखा जरूर था लेकिन वह ‘स्थायी वर्जित प्रदेश’ था। मैं घबरा गया। समझ नहीं पाया और तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करूँ और चाचाजी को क्या जवाब दूँ। तब तक चाचाजी ने फरमाईश दुहरा दी। शराब ला पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था और डाक बंगले पर रूक पाना उससे भी अधिक कठिन हो गया था। मैं वहाँ से चला तो मेरे कानों में सीटियाँ बज रही थीं और आँखें कुछ भी देख पाने में मदद नहीं कर रही थीं। एक प्रतिष्ठित कवि का छोटा भाई और ‘बैरागी-साधु’ जाति के महन्त का बेटा, छोटी सी बस्ती में, जहाँ सब उसे खूब अच्छी तरह जानते-पहचानते हों, दारू लाने के लिए ठेके पर जा रहा था। मुझे लग रहा था मानों बस्ती के लोग तो लोग, सडक पर विचर रहे ढोर-डंगर भी मुझे कौतूहल से देख रहे हैं और धिक्कार रहे हैं। लेकिन मेरा भाग्य शायद साथ दे रहा था। मैं डाक बंगले से सौ-डेड़ सौ कदम ही चला होऊँगा कि मैं ने देखा कि सामने से मोहम्मद साहब चले आ रहे हैं। मोहम्मद साहब के पिताजी और मेरे पिताजी गहरे मित्र थे और उनसे हमारा पारिवारिक व्यवहार था। मोहम्मद साहब खुद दादा के अच्छे मित्र थे और चाचाजी के शिकार की व्यवस्थाएँ करने में अग्रणी थे। लेकिन उस क्षण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे आबकारी विभाग में कांस्टेबल के पद पर मनासा में ही पदस्थ थे। मेरी शकल की इबारत उन्होंने मानो पढ़ ली  मेरी बात सुन कर वे खूब हँसे और मुझे डाक बंगले वापस भेजा। बाद में, जब वे देसी दारू की बोतल लेकर चाचाजी के पास आए तो मेरी दशा का बखान कर, खूब मजे लिए।


मुबारकजी की एक और मुद्रा

इन्हीं चाचाजी ने मुम्बई में दादा को अपने पास रखा । दादा तब तक हालांकि ‘बालकवि’ के रूप में स्थापित हो चुके थे लेकिन अन्तरंग स्तर पर वे अपने मूल नाम ‘नन्दराम दास’ से ही सम्बोधन पाते थे। चाचाजी दादा को ‘नन्दू’ कह कर पुकारते थे। मुम्बई में दादा के संघर्ष गाथा की जानकारी मुझे बिलकुल ही नहीं रही। लेकिन वे वहाँ इतने समय तक रहे कि पिताजी, दादा की सफलता की प्रतीक्षा नहीं कर सके और एक दिन मुम्बई जाकर, चाचाजी से उनके ‘नन्दू’ और अपने ‘नन्दा’ को मनासा लिवा लाए।

शेष भाग अगली कड़ी में
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मुबारकजी के चित्र मुझे  फेस बुक मित्र  सर्वश्री प्रवीण माथुुुर, राजेश कर्णधार, खुशदीप सहगल और कुमार मुकेश ने उपलब्‍ध कराए।  मैं इन सबका अत्‍यधिक आभारी हूं।

तू चन्दा मैं चाँदनी - 1

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर    20 जुलाई  2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - दादा के निधन के बाद बनी स्थितियोंनुसार संशोधन, सम्पादन सहित।)

ब्लाग की दुनिया में घूमते -घूमते आज श्री सुरेश चिपलूनकर के महाजाल की सैर की तो 2 मई 2007 की पोस्ट पर नजर ठहर गई। ‘बालकवि बैरागी: तू चन्दा मैं चाँदनी’ शीर्षक ने ही जकड़ लिया। सुरेशजी ने गीत पर, गीत के समान ही सुन्दर शास्त्रोक्त सांगोपांग वर्णन किया है। कह सकते हैं कि लताजी, जयदेवजी और दादा बालकविजी की ओर से यदि कोई कसर रह गई होगी तो चिपलूनकरजी ने वह पूरी कर दी। 

पोस्ट पढते-पढते, ऊँट के पास बैठे वहीदा रहमान, सुनीलदत्त और इन दोनों सम्पूर्ण कलाकारों को अपने में समेटता हुआ अनन्त रेगिस्तान आँखों पर अपना साम्राज्य कायम करने लगा। गीत कानों में बजने लगा और उसके मादक प्रभाव से आँखें मुँदने लगीं। पूरा गीत मानो कायनात को मालवा के अफीम के खेत में बदल रहा हो जिसमें अफीम के लाल, बैंगनी, सफेद फूलों से लिपटे डोड़े (ओपियम केप्सूल) एक ताल में नाच रहे हों और अफीम की आदिम मादक गन्ध का ऐसा समन्दर बना रहा हो जिससे बाहर आने को जी ही नहीं करे। और जब गीत समाप्त हो रहा होता है तो स्थिति नाड़ी जाग्रत होने वाली या फिर शवासन वाली आ जाती है। ‘रेशमा और शेरा’ से पहले भी रेगिस्तान अनेक फिल्मों में छायांकित किया जाता रहा है लेकिन इस फिल्म का रेगिस्तान ‘निर्जीव’ नहीं था। इसकी बालू का कण-कण स्पन्दित होता लगता था। ‘धर्मयुग’ के फिल्म समीक्षक ने इस रेगिस्तान को ‘रेशमा और शेरा’ का अनूठा जीवन्त पात्र करार दिया था।


रेशमा और शेरा में वहीदा रहमान और सुनील दत्‍त एक भावपूर्ण मुद्रा में

लेकिन मुझे केवल यही सब याद नहीं आया । कई सारी वे बातें याद आ गईं जिन्हें इस समय उजागर करते हुए रोमांच हो रहा है, फुरहरी छूट रही है। यह 1969-70 की बात है। तब दादा, मध्य प्रदेश के सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री थे। पण्डित श्यामाचरण शुक्ल (जिन्हें दादा ने ‘श्यामा भैया’ का लोक सम्बोधन दिया था) मुख्यमन्त्री थे। दादा का निवास भोपाल में, शाहजहाँनाबाद स्थित पुतलीघर बंगले में था। ‘रेशमा और शेरा’ के गीत लिखवाने के लिए जयदेवजी वहीं आए थे और कच्चा-पक्का एक सप्ताह भोपाल रहे थे। जयदेवजी को तो यही काम था लेकिन दादा के पास तो राज-काज का झंझट भी था। उसी में से समय चुरा कर दादा, जयदेवजी के पास बैठते, उनकी बातें सुनते, सिचुएशन सुनते, अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करते। जयदेवजी ने पहली ही बैठक में स्पष्ट कर दिया था कि वे धुन पर गीत नहीं लिखवाएँगे, गीत के अनुसार धुन तैयार करेंगे। किसी भी रचनाकार के लिए यह स्थिति मुँह माँगी मुराद से कम नहीं होती। जयदेवजी का एक ही आग्रह था - मैं गीत लेकर जाऊँगा। यही हुआ भी।


जयदेवजी


जयदेवजी चले गए। फिल्मों में गीत लिखने का दादा का यह कोई पहला मौका नहीं था। फिल्मी दुनिया के तौर तरीके और फिल्म निर्माण की गति से वे भली भाँति वाकिफ थे। सो, जयदेवजी के जाने के बाद उत्कण्ठा तो बराबर बनी रही लेकिन वह बेचैनी में नहीं बदली। राजनीति, दादा को वैसे भी सर उठाने की फुरसत कम ही देती थी। वे भी खुद को साबित करने के लिए अतिरिक्त परिश्रम करते थे। उन्हें बडी विचित्र स्थितियों का सामना करना पडता था। वे राजनेताओं के बीच कवि होते थे और कवियों के बीच राजनेता। दादा इस स्थिति से तनिक भी नहीं घबराते बल्कि अपने मस्त मौला स्वभाव के अनुसार आसमान फाड़ ठहाके लगा कर इस विसंगति को कुशल नट की भाँति सुन्दरता से निभाते और सबकी मुक्त कण्ठ प्रशंसा पाते  राजनीति में अपने आप को साबित करने के लिए दादा जितना परिश्रम करते उससे अधिक परिश्रम वे ‘राजनीति के राज रोग’ से खुद को बचाने के लिए करते। विसंगतियों की इस विकट साधना के बीच समाचार सूत्रों से और फिल्मी अखबारों/पत्र-पत्रिकाओं से ‘रेशमा और शेरा’ की प्रगति सूचनाएँ मिलती रहती थीं।

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि एक सवेरे वह हो गया जिसे दादा न तो कभी भूल पाए और न ही कभी भूलना चाहा। मन्त्री रहते हुए भी दादा ने मन्त्री पद और मन्त्रीपन को खुद पर हावी नहीं होने दिया। वे यथासम्भव सवेरे जल्दी उठ जाते अपने विधान सभा क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ताओं/मतदाताओं की अगवानी करते, उन्हें अतिथिशाला में ठहराते, उनकी चाय-पानी की व्यवस्था करते। मन्त्रियों के टेलीफोन सूरज उगने से पहले ही घनघनाते लगते हैं। ऐसे टेलीफोनों को दादा खुद ही अटेण्ड किया करते थे। सामने वाले की ‘हैलो’ के जवाब में जब दादा कहते - ‘बोलिए! मैं बैरागी बोल रहा हूँ।’ तो सामने वाला विश्वास ही नहीं करता। सब यही मानते कि मन्त्रीजी के कर्मचारी तो अभी आए नहीं होंगे, कोई छोटा-मोटा कर्मचारी बैरागी बन कर बात कर रहा है। ऐसे लोग फौरन डाँटते और कहते - ‘अपनी औकात में रहो और मन्त्रीजी को फोन दो।’ दादा ऐसे क्षणों का भरपूर आनन्द लेते और कहते - ‘भैया! मानो न मानो, मैं बैरागी ही बोल रहा हूँ।’ सुन कर सामने वाले की क्या दशा होती होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

ऐसा ही एक फोन ‘उस’ सवेरे आया। दादा ने फोन उठाया। उधर से नारी स्वर आया - ‘हैलो! बैरागीजी के बंगले से बोल रहे हैं?’ दादा उठे-उठे ही थे। लेकिन ऐसा भी नहीं कि नींद के कब्जे में हों। खुमारी थी जरूर लेकिन यह ‘हैलो’ कानो में क्या पड़ी, मानों सम्पूर्ण जगत की चेतना कान के रास्ते शरीर में संचारित हो गई हो - बिलकुल बिजली की तरह। निमिष मात्र में। पता नहीं, दादा ने उत्तर दिया था या वे हल्के से चित्कारे थे - ‘अरे ! दीदी आप!’ उधर से लताजी बोल रही थीं। उस एक क्षण का वर्णन कर पाना मेरे बस में बिलकुल ही नहीं है। दादा होते तो कहता कि आप दादा से ही पूछिएगा और मुमकिन हो तो किसी सार्वजनिक समारोह में पूछिएगा। सब सुनने वालों का भला होगा। ‘कहन’ के मामले में दादा अद्भुत और बेमिसाल थे। जब वे कोई घटना कह रहे होते थे तो सुनने वाले उस घटना के एक-एक ‘डिटेल’ को ‘माइक्रो लेवल’ तक देख रहा होता था। 

सो, उस अविस्मरणीय पल को दादा ने जिस तरह जीया वह कुछ इस तरह था - ‘लताजी की आवाज मानो कानों में मंगल प्रभातियाँ गा रही थीं या फिर सूरज की अगवानी में भैरवी गाई जा रही थी। वे बोल रही थीं लेकिन मैं उनके एक एक शब्द को देख पा रहा था, मानो बाल रवि की अगवानी में शहद के फूलों की सुनहरी घण्टियाँ प्रार्थनारत हो गई हैं।’ दादा को वह एक पल एक जीवन जी लेने के बराबर लगा।

अभिवादन के शिष्टाचार के बाद सम्वाद शुरु हुआ तो लताजी ने जो कुछ कहा वह किसी भी रचनाकार की कलम के लिए अलौकिक पुरस्कार से कम नहीं हो सकता। लताजी ने कुछ इस तरह से कहा - ‘कल पापाजी (जयदेवजी को फिल्मोद्योग में इसी सम्बोधन से पुकारा जाता था) ने मुझसे एक गीत रेकार्ड कराया है - रेशमा और शेरा के लिए। गीत तो मैं बहुत सारे गाती हूँ लेकिन मुझे अच्छे लगने वाले गीत बहुत ही कम होते हैं। मुझे वह गीत बहुत अच्छा लगा। इतना अच्छा लगा कि गीतकार को बधाई दिए बिना चौन नहीं मिल रहा था। पापाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि गीत आपका है। उन्हीं से आपका नम्बर लिया। इतना अच्छा गीत लिखने के लिए आपको बधाई। ऐसे ही गीत लिखते रहिएगा।’ यह गीत था - तू चन्दा मैं चाँदनी।

लताजी ने ठीक-ठीक क्या कहा था, यह तो दादा ही बता सकते थे क्यों कि मैंने तो उनसे सुनी-सुनाई लिख दी, वह भी इतने बरसों बाद। सम्भव है, कई पाठकों को यह किस्सा सुनकर रोमांच हो आए। लेकिन यह तो कुछ भी नहीं है। इस रोमांच का वास्तविक आनन्द तो दादा से सुनने पर ही मिल सकता था क्यों कि मालवा में कहावत है कि आम की भूख इमली से नहीं जाती।

सो, फिलहाल आप इस इमली से काम चलाइए। लेकिन इस गीत से जुड़ा यह एक ही संस्मरण नहीं है। एक और किस्सा है। 

अगली कड़ी में वही किस्सा।
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राजनीति में सीनाजोरी तो गहना है


इन दिनों, राजस्थान के पूर्व मुख्य मन्त्री अशोक गेहलोत का एक वीडियो फेस बुक और वाट्स एप पर छाया हुआ है जिसमें गेहलोत कहते हुए नजर आ रहे हैं कि बिजली प्राप्त करने के लिए बनाए बाँधों का पानी सिंचाई के काम नहीं आएगा क्योंकि उसमें से ‘पॉवर’ तो रहेगा ही नहीं। गेहलोत की खूब हँसी उड़ाई जा रही है और गेहलोत के बहाने उनकी पार्टी और पार्टी नेताओं की खिल्ली उड़ाई जा रही है।

यह सब देखकर मुझे शुरु में ताज्जुब हुआ। क्योंकि हमारे यहाँ कहावत है कि कहनेवाला भले ही मूर्ख हो लेकिन सुननेवाला तो समझदार होता है। लेकिन जब जानबूझकर, दुराशयतापूर्वक, सोद्देश्य कोई झूठ परोसा जाता है तो फिर ऐसी कहावतें निरर्थक हो जाती हैं। तब कहनेवाला तो समझदार होता है लेकिन सुननेवाला मूर्ख हो जाता है। मजे की बात यह है कि झूठ फैलानेवाले भली प्रकार जानते हैं कि उनके झूठ का जीवन पानी के बुलबुले की तरह है। लेकिन जब दुष्प्रचार किसी झूठ को अभियान के तहत, सुनियोजित रूप से चलाया जाता है तो यह सीनाजोरी की गिनती में आता है। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सीनाजोरी अनजाने में नहीं की गई। 

मूल वीडियो में अशोक गेहलोत कहते नजर आते हैं कि भाखड़ा बाँध के सन्दर्भ में तत्कालीन जनसंघ के लोग नेहरू को गालियाँ देते हुए यह बात कहते थे। गेहलोत की इस बात का मैं गवाह हूँ। फर्क इतना ही है कि वे भाखड़ा नागल बाँध का हवाला दे रहे हैं और मैंने इसे, मन्दसौर जिले के जनसंघियों से गाँधी सागर बाँध के सन्दर्भ में सुना था। इस बाँध का शिलान्यास नेहरूजी ने सात मार्च 1954 में किया था। मैं अपना माँ के साथ उस दिन वहाँ गया था। उस समय मैं सात बरस का था। इस बाँध से देश को, मुख्यतः मध्य प्रदेश और राजस्थान को बिजली और सिंचाई के लिए पानी मिलनेवाला था।  
गाँधी सागर बाँध का विहंगम दृष्य

गाँधी सागर बाँध पर स्थापित चम्बल की मूर्ति। बच्‍चे मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं।

जनसंघ के लोग नितान्त राजनीतिक कारणों से इस बात का विरोध आम सभाओं में, अपने भाषण में भी करते थे और वही बात कहते थे जो अशोक गेहलोत को अपनी ओर से कहते बताए जा रहे हैं - बिजली निकल गई तो पानी में पॉवर नहीं रह जाएगा। 

लेकिन बात केवल ‘बिना पॉवरवाले पानी’ तक ही सीमित नहीं थी। वोट पाने के लिए तब विद्युतीकरण का भी विरोध किया जाताथा। 

मनासा विधान सभा क्षेत्र में एक पठारी इलाका है जिसे ‘कंजार्ड़ा पठार’ के नाम से जाना जाता है। मनासा से कंजार्ड़ा की दूरी करीब पचीस किलो मीटर होगी। इसके आसपास चौकड़ी, खेड़ली, बेसदा जैसे कुछ गाँव है। यह 1962 से 1967 के बीच की बात है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री सुन्दरलालजी पटवा तब मनासा के विधायक थे। 

कंजार्ड़ा पठार के लोग विद्युतीकरण की माँग करते थे। जवाब में लोगों को समझाया जाता था कि बिजली के करण्ट से लोग मर जाएँगे। तब जनसंघ के लोग मनासा-कंजार्ड़ा सड़क का भी विरोध करते थे। कहते थे कि सड़क बन जाने पर शहर के लोगों का गाँव में आना-जाना बढ़ जाएगा। वे शहरी लोग गाँव की बहन-बेटियों को छेड़ेंगे। सड़क की वजह से गाँव की समृद्धि शहरों में चली जाएगी। मेरी इस बात के गवाह अब भी उस इलाके में कुछ लोग मिल ही जाएँगे। 

तब कंजार्ड़ा पठार पर पटवाजी और जनसंघ की तूती बोलती थी। पूरा इलाका मानो पटवाजी और जनसंघ की जागीर था। वहाँ के गाँवों में काँग्रेसी घुस नहीं पाते थे। मनासा विधान सभा क्षेत्र के मतदान केन्द्रों का क्रमांकन इसी इलाके से शुरु होता था और मतगणना के परिणाम मतदान केन्द्रवार घोषित होते थे। इन मतदान केन्द्रों पर काँग्रेस को मिलनेवाले मत दो अंकों में भी नहीं होते थे। मतगणना परिणामों की घोषणा की शुरुआत सदैव काँग्रेस की पराजय से  होती थी। 

लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि अपने गाँव में स्कूल खुलवाने की बात को लेकर चौकड़ी के सरपंच नानालाल धाकड़ (लोग उन्हें ‘नाना पटेल’ कहते थे।) पटवाजी से नाराज हो गए। वे आधी रात को, सदलबल दादा के पास आए। (दिन के उजाले में किसी काँग्रेसी के पास जाने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाए।) दादा से सारी बात कही। दादा उन्हें लेकर भोपाल गए। द्वारका प्रसादजी मिश्र से मिलवाया। मिश्रजी ने कहा कि वे लोग यदि दादा की बात मानेंगे तो स्कूल खुल जाएगा। नाना पटेल ने वादा किया - ‘या नान्या की जिबान हे। बेरागीजी ने जीतई ने लऊँगा।’ (यह नानालाल की जबान है। बैरागीजी को जितवा कर लाऊँगा।) 

1967 के चुनाव में मिश्राजी ने पटवाजी के सामने दादा को मनासा से उम्मीदवार बनाया। मतगणना के नतीजे आए तो कंजार्ड़ा पठार के आँकड़े एकदम उल्टे हो गए। कंजार्ड़ा पठार ने पटवाजी से पीठ फेर ली। पटवाजी दस वर्ष से विधायक थे। वे हार गए। तकदीर ने उनके साथ नाइंसाफी यह की कि मन्दसौर जिले की सात सीटों में से हारनेवाले वे अकेले जनसंघी उम्मीदवार थे। इस नाइंसाफी की कसक तब कई गुना हो गई जब प्रदेश मे संविद सरकार बनी। पटवाजी यदि तब विधायक होते तो वे पहली ही किश्त में केबिनेट मन्त्री बनते।

मिश्राजी ने दादा को संसदीय सचिव बनाया। लेकिन किसी मुद्दे पर मिश्राजी और श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया में ठन गई। फलस्वरूप काँग्रेस के तीस-पैंतीस विधायकों ने दलबदल किया और प्रदेश मे गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकार बनी। लेकिन यह सरकार दो साल भी नहीं चली। नई काँग्रेसी सरकार श्यामाचरण शुक्ला के नेतृत्व में बनी। शुक्लाजी ने दादा को राज्य मन्त्री बनाया।

दादा के राज्य मन्त्री बनने के बाद नाना पटेल की भावनानुसार स्कूल खुला। उसके बाद जल्दी ही कंजार्ड़ा को विद्युतीकृत करने की बात आई। कंजार्ड़ा का प्रतिनिधि मण्डल लेकर दादा श्यामाचरणजी से मिलने गए। वे दिल्ली के जाने के लिए हवाई अड्डे के लिए निकल चुके थे। दादा सबको लेकर वहाँ पहुँचे। विमान की सीढ़ियों पर बात हुई। विद्युतीकरण के आदेश के लिए उन्होंने कागज माँगा। किसी के पास नहीं था। प्रतिनिधिमण्डल में से किसी एक ने केवेण्डर सिगरेट का पाकेट निकाला और पाकेट के जिस हिस्से पर सिगरेटें रखी हुई थीं, वह आगे बढ़ा दिया। श्यामाचरणजी ने उसी के पीछे ‘कंजार्ड़ा की विद्युतीकरण योजना स्वीकार की जाती है।’ लिख कर दादा को थमा दिया।

लेकिन आदेश जितनी आसानी से मिला, विद्युतीकरण उतना आसान नहीं था। तब मनासा में श्री किशोर कुमार सक्सेना म.प्र.वि.मं. के सहायक यन्त्री थे। दादा ने यह काम उन्हें सौंपा। तब मनासा-कंजार्ड़ा के बीच सड़क नहीं थी। सक्सेनाजी ने समस्या बताई - पचीस किलो मीटर दूर तक खम्भे कैसे पहुँचाएँ? बात कंजार्ड़ावालों तक पहुँची तो खम्भे पहुँचाने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली। कंजार्ड़ा के लोगों ने उम्मीद से बहुत कम समय में सक्सेनाजी के बताए मुताबिक खम्भे डलवा दिए।

लेकिन दुष्प्रचार की मुहीम थमी नहीं थी। खम्भे गाड़ने के लिए गड्ढे खुदना शुरु हुए ही थे कि जनसंघी खेमे से बात चली - ‘गाँव को कीला (मन्त्रबिद्ध किया) जा रहा है। गाँव की लक्ष्मी रूठ जाएगी।’ इस बात से पार पाने में सबको पसीना आ गया। लेकिन सक्सेनाजी ने काम रुकने नहीं दिया। उन्होंने और उनके लोगों ने दिन को दिन नहीं समझा और रात को रात नहीं। जो काम कम से कम छः महीनों में होता, वह तीन महीनों से कम में कर दिया।

वह सन् 1970 था या 1971, यह तो मुझे याद नहीं। लेकिन तारीख मुझे खूब अच्छी तरह याद है - 26 जनवरी। उस दिन कंजार्ड़ा में बिजली का बटन दबना था। मैं उस समारोह का प्रत्यक्षदर्शी हूँ। कंजार्ड़ा गाँव के बाहर बने, हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रांगण में समारोह हुआ था। केवल कंजार्ड़ा गाँव के ही नहीं, आसपास के दसियों गाँवों के लोग वहाँ मौजूद थे। रंग-बिरंगी पगड़ियों और लुगड़ों से पूरा परिसर इन्द्रधनुष को टक्कर दे रहा था। औरतें मंगल बधावे गा रही थीं। हर कोई उत्सुक और विगलित था। दादा मुख्यतः मौजूद थे। जैसे ही बटन दबा, मानो वहाँ मौजूद तमाम लोगों में करण्ट दौड़ गया। ‘जय हो’ और ‘जिन्दाबाद’ के नारों ने मानो आसमान फोड़ दिया। हर कोई एक दूसरे को बाँहों में भर बधाइयाँ दे रहा था। औरतें दादा की बलैयाँ ले रही थीं और दादा धार-धार रोए जा रहे थे।

उस समारोह में दादा ने सक्सेनाजी सहित, विद्युत मण्डल के तमाम लोगों को कंजार्ड़ा और आसपास के गाँवों की ओर से साफे बँधवा कर सम्मानित करवाया। समारोह के लिए जितनी मालाएँ आई थीं, दादा ने वे सब की सब सक्सेनाजी को पहनवाईं। गाँव लोगों ने सक्सेनाजी को नोटों की माला पहनाई। माला में पिरोए नोटों की रकम पचास रुपये थी। उन दिनों यह बड़ी रकम थी। मजदूर को सवा रुपया मजदूरी मिलती थी। सक्सेनाजी ने वह रकम वहीं की वहीं अपने साथी श्रमिकों मे बँटवा दी। हर कोई विगलित, रोमांचित और पुलकित था। वैसा लोकोत्सव मैंने उसके बाद से अब तक कहीं नहीं देखा। सक्सेनाजी समारोह का वर्णन आज भी इस तरह करते हैं मानो वे अभी भी कंजार्ड़ा में, समारोह में ही हों। वे भोपाल में बस गए हैं। जिसे इस बारे में और कुछ जानने की उत्सुकता हो वह उनसे मोबाइल नम्बर 99774 07468 पर उनसे बात कर ले।


किशोर कुमारजी सक्सेना

यह किस्सा मुझे अशोक गेहलोत के वीडियो ने याद दिला दिया। भाई लोग जस के तस बने हुए हैं। तनिक भी नहीं बदले। आगे भी शायद ही बदलें। 

राजनीति में सीनाजोरी गहना बन चुकी है।
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एसपी, कलेक्टरों के मिजाज और तेवर बदल दिए ‘गाँव बन्दी’ ने

किसानों को चाहिए कि वे मुख्य मन्त्री शिवराज सिंह चौहान का नागरिक अभिनन्दन करें। ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन को असफल करने की कोशिशें करते-करते शिवराज ने आन्दोलन को सफलता और किसानों की माँगों और  आन्दोलन को जायज और वाजिब होने का प्रमाण-पत्र दे दिया है।

कुशल रणनीतिकार कहते हैं कि किसी को असफल करना हो तो उसकी उपेक्षा कर दो। लेकिन शिवराज ने किसान-आन्दोलन को सर्वोच्च महत्व दे दिया। कुछ इस तरह मानो यह उनके जीवन-मरण का सवाल हो। यही किसानों की सफलता, किसानों की जीत है और इसीलिए उन्होंने शिवराज का नागरिक अभिनन्दन करना चाहिए।

आन्दोलन को असफल करने के लिए शिवराज ने क्या-क्या नहीं किया? समूची सरकारी मशीनरी झोंक दी। रतलाम जिले को आधार बनाऊँ तो मान लीजिए कि लगभग 25 मई से सरकारी दफ्तरों में कोई काम नहीं हो रहा है। दफ्तर चाहे नायब तहसीलदार का हो या एस पी, कलेक्टर का। सब जगह ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन पसरा हुआ है। इसके समानान्तर सच यह है कि जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तब किसानों का ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन लगभग असफल ही हो गया है। इसका असर अब तो कहने को भी नजर नहीं आ रहा।

लेकिन इस आन्दोलन ने सरकारी अमले का मिजाज और तेवर बदल दिए।  जिस एस पी, कलेेक्टर से मिलने के लिए पर्ची भेज कर घण्टों उबाऊ प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, जन सुनवाई में अपना नम्बर लगाने के लिए एडीएम/एसडीएम के दफ्तर के बाहर सुबह आठ बजे से ही लाइन लग जाती थी, वह एस पी, कलेक्टर, वह एडीएम/एसडीएम गाँव-गाँव की धूल छान रहे हैं। किसानों के दरवाजे खटखटा रहे हैं। रास्ते आते-जाते किसान से आगे रहकर राम-राम, नमस्कार कर रहे हैं। थाने का पूरा अमला किसानों से इस तरह पेश आ रहा है मानो लड़कीवाले बारातियों की पूछ-परख कर रहे हों। जेठ महीने की 44/46 डिग्री गर्मी में करनी पड़ रही पदयात्रा के कारण पसीने ने  वर्दी का कलफ गला दिया है। न आवाज कड़क रही न वर्दी। 

शाम होने पर जो अफसर बंगलों का रुख करते थे वे अब सूरज ढलते गाँवों में पहुँच रहे हैं। लोगों को रोक-रोक कर पूछते हैं - ‘कोई तकलीफ तो नहीं? हो तो बेहिचक बताना।’ अमले के कुछ लोग तो साथ हैं ही, कुछ गाँववालों को इकट्ठा करते हैं। दो-दो टीमें बनाते हैं। खेल शुरु हो जाता है। कोई गाँववालों के साथ कबड्डी खेल रहा है तो कोई खो-खो। कोई रस्साकशी में जोर लगा रहा है तो कोई वॉलीबाल में हुनर दिखा रहा है। खेल खतम होने के बाद घर नहीं लौटते। कहीं मैदान में तो कहीं किसी ओटले पर तो कहीं किसी मन्दिर के चबूतरे पर चौपाल जमा लेते हैं। गाँववालों की तारीफ करते न तो रुकते हैं न ही थकते। गाँव में शान्ति बनाए रखने के लिए किसानों को मिठाई खिलाते हैं। लेकिन अपना काम नहीं भूलते। धीरे से कहते हैं - ‘देखना! कोई ऐसा काम मत कर लेना कि बाद में तकलीफ उठानी पड़ जाए।’ सुनकर गाँववालों के चेहरों बदल जाते हैं। अफसरों की आवाज में उन्हें पुलिस के डण्डों और दफ्तरी कर्मचारियों की डाँट-डपट सुनाई देने लगती है। मिठाई में जायफल का स्वाद आने लगता है। समझ जाते हैं - ‘दोस्त-खिलाड़ी के भेस में हुक्मरान आया है।’ वे सहम जाते हैं। जबानें हिलना बन्द कर देती हैं। सिर हिलने लगते हैं। चुप्पी छा जाती है। लोग, अफसरों के जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। वे चले भी जाते हैं। उन्हें तो किसानों से भी ज्यादा जल्दी है।

लेकिन हुक्मरान यदि लोक-मित्र बन जाएँ तो फिर सरकार का जलवा नहीं रह पाता। इसलिए हुक्मरान अपना मूल चरित्र दिखाने का अवसर मिलते ही लपक लेते हैं। गाँवों के सारे रास्तों पर पुलिस ने नाकाबन्दी कर रखी है। बाहर से आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति का वीडियो लिया जा रहा है। आनेवाला सहम जाता है। अपना काम भूल कर दहशत में आ जाता है। हजारों लोगों से बॉण्ड भरवा लिए गए हैं। बॉण्ड में क्या लिखा है, कोई नहीं जानता। बस, यही जानता है कि पुलिस ने किसी कागज पर उससे दस्तखत कराए हैं। नींद उड़ादेने के लिए इतना ही काफी है। वह आन्दोलन भूल कर अपनी और अपने बाल-बच्चों की सुरक्षा की फिकर करने लगता है।

लेकिन जैसे ही हुक्मरान और उनके नुमाइन्दे पीठ फेरते हैं, किसान खुशियाँ प्रकट करने लगते हैं - “अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। हमने शहर जाने से इंकार किया तो मालूम पड़ा कि किसान और किसान की ताकत क्या होती है। इनके दरवाजे जाओ तो सीधे मुँह बात नहीं करते। बात करना तो दूर, देखते भी नहीं। अब हमारे घर आकर ‘भैया-भैया’ कर रहे हैं।” केन्द्रीय कृषि मन्त्री कह रहे हैं - ‘करोड़ों किसानों में से दो-तीन हजार किसान आन्दोलन कर रहे हैं।  अखबारों में छपने के लिए ऐसा करना ही पड़ता है।’ लेकिन शिवराज सरकार का पूरा अमला केन्द्रीय कृषि मन्त्री को झूठा कह रहा है। 

6 जून 2017 को मन्दसौर जिले में पुलिस ने 6 किसानों को गोलियों से भून दिया था। उनकी पहली बरसी पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के नाम पर काँग्रेस ने, मन्दसौर जिले के पीपल्या मण्डी के पास खोखरा में बड़ी सभा की। राहुल गाँधी उसमें पहुँचे। रतलाम-पीपल्या मण्डी का, 103 किलो मीटर की फोर लेन सड़क पर जाम लग गया। इस सभा को ऐतिहासिक बनाने के लिए काँग्रेसियों अपनी जान झोंक दी। लेकिन शिवराज सरकार उससे अधिक जी-जान से इसे असफल करने में जुटी रही। कोशिश की गई कि लोग इस सभा में न पहुँचे। सूची बना ली गई कि कितनी बसों को विशेष परमिट जारी किए गए हैं। ऐसी सावधानी और कोशिश इस अंचल में इससे पहले किसी भी पार्टी के किसी भी आयोजन में नहीं देखी गई। लगा कि ‘वन-टू-वन’ की तर्ज पर एक-एक आदमी को रोकने की कोशिश की गई। बरखेड़ा पंथ का अभिषेक पाटीदार पुलिस गोलीबारी में मारा गया था। कोई पाँच महीने पहले सरकार ने उसके भाई सन्दीप को भानपुरा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर नौकरी दी है। भानपुरा तहसील, गरोठ सब डिविजन में आती है। गरोठ के एसडीओ आर पी वर्मा ने सन्दीप को फोन पर कहा कि उसके परिजन राहुल गाँधी की सभा में न जाएँ। वर्ना उसकी नौकरी खतरे में आ जाएगी। आर पी वर्मा का कहना है कि उन्होंने किसी को  सभा में जाने से नहीं रोका। केवल पूछताछ की थी। लेकिन एक बड़ा अखबार कह रहा है कि उसके पास वर्मा की बातचीत की रेकार्डिंग है। एक मृतक के परिजन समाचार चैनल पर कहते नजर आए कि राहुल की सभा में न जाने के लिए एसडीओपी ने उन पर दबाव बनाया।

सरकार की इन कोशिशें और हरकतों ने एक ही बात साबित की - किसानों की माँगें और उनका आन्दोलन सही है। यदि किसान और उनकी बातें गलत होतीं तो शिवराज तथ्यों और आँकड़ों की बाढ़ ला देते। मृतक पूनमचन्द पाटीदार के ताऊ बालाराम पाटीदार ने कहा कि मुख्यमन्त्री मन्दसौर आए तो उन्हें बुलाया तक नहीं और जब वे खुद गए तो मिलने बुलाया नहीं। इन्होंने मिलने की कोशिश की तो धक्के मारकर  बाहर कर दिया। एक मृतक किसान के परिजनों ने कहा - ‘पैसे (एक करोड़ रुपये) तो मिल गए लेकिन न्याय अब तक नहीं मिला।’ शिवराज औढरदानी तो बन गए लेकिन न्यायी शासक नहीं बन पाए। इसीलिए वे और उनकी पूरी सरकार बदहवास है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के एक नौजवान अधिकारी ने कहा - ‘बेहतर होता कि हम चुपचाप लोगों को आने-जाने देते। चेकिंग के नाम पर उन्हें रोकने की कोशिशें हमसे करवाई गईं। लेकिन हम एक चींटी को नहीं रोक पाए। बिना सरकारी मदद के इतनी भीड़ मैंने अपने सर्विस पीरीयड में पहली बार देखी।’

नीमच से फोन पर मेरे एक किसान मित्र ने कहा - ‘हर कोई जानता है कि राहुल सत्ता में नहीं है। वे तत्काल कुछ नहीं कर सकते। केवल ढाढस बँधा सकते हैं। यह भी सब जानते हैं कि नेता जितना कहता है, उतना कभी नहीं करता। फिर भी मृतकों के परिजन यदि घण्टों पहले पहुँच कर प्रतीक्षा करते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि उनकी बात किसी ने सुनी नहीं। वे केवल अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे। इसीलिए राहुल जब सामने आए तो उनसे लिपट कर रोने लगे। इन्हें शिवराज का काँधा मिल जाता तो ये राहुल के पास क्यों जाते?’ 
 6 जून 2017 को पुलिस गोली के शिकार घनश्याम धाकड़ के पिता दुर्गालाल के 
सामने राहुल पहुँचे तो वे राहुल के गले लग कर फफक-फफक कर रो पड़े। 
(चित्र - महेश नँदवाना की फेस बुक वाल से साभार।)   

किसान असंगठित होते हैं। उस पर पार्टी लाइन के चलते बड़ी संख्या में किसान इस आन्दोलन से स्वतः दूर हो गए हैं। इसके बावजूद यह आन्दोलन यदि शिवराज सरकार की नींद उड़ाए हुए है और सरकार असहाय, लाचार दशा में है और करने के नाम पर विभाजित किसानों की लकीर को छोटी करने में पसीना बहा रही है तो इसका एक ही मतलब है - यह किसानों की जीत है। 

हमारा लोक मानस ‘उदार हृदय, विशालमना’ है। क्षमा करना उसका संस्कार और भूल जाना उसका स्वभाव है। शिवराज का बैर काँग्रेस से है, किसानों से नहीं। वे काँग्रेस का गुस्सा किसानों पर नहीं निकालें। प्रतिशोधी मुद्रा छोड़ कर ‘लोक मित्र’ बनने पर सोचें। वे घाटे में नहीं रहेंगे। अजातशत्रु हो जाएँगे।   
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दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल, 07 जून  2018

डीआरएम के पाँच रुपये

रतलाम रेल्वे स्टेशन पर दुपहिया वाहनों की पार्किंग व्यवस्था दो जगहों पर है। एक तो पुराने जमाने से चली आ रही पुराने शेड की और दूसरी, गए कुछ वर्षों पहले शुरु हुई है। यह व्यवस्था, स्टेशन के बाहर, खुले में है। इसे प्रीमीयम पार्किंग का नाम दिया हुआ है। दोनों पार्किंगों पर भुगतान पहले करना पड़ता है - वाहन रखते समय। इस प्रीमीयम पार्किंग के काउण्टरवाले से कुछ दिनों पहले मेरा सम्वाद हुआ। सम्वाद रोचक और सूचनादायी लगा। इसीलिए यहाँ दे रहा हूँ।

- पार्किंग का कितना पैसा लगता है?

- दस रुपये।

- दस रुपये? यह तो बहुत ज्यादा है! पासवाले पार्किंग पर तो पाँच रुपये ही लगता है?

- वहाँ का पता नहीं। यहाँ दस रुपये लगता है। प्रीमीयम पार्किंग है।

- इस प्रीमीयम पार्किंग में क्या खास है? वहाँ तो गाड़ियाँ शेड में रखी जाती हैं। यहाँ तो खुले में रखी जाती हैं। इसमें क्या प्रीमीयम बात हुई?

- यही तो प्रीमीयम पार्किंग है।

- लेकिन पार्किंग चार्ज कहीं भी लिखा हुआ नहीं है। न तो कोई बोर्ड लगा है न ही तुम जो स्लिप दे रहे हो उस पर लिखा हुआ है।

- हाँ। कहीं लिखा हुआ नहीं है। मैं कह रहा हूँ वही फायनल है। दस रुपये।

- यह तो गलत बात है!

- गलत है, तो है। चार्ज तो दस रुपये ही है।

- तो एक काम करो। मुझे जो स्लिप दी है उस पर लिख दो - पार्किंग चार्ज दस रुपये।

- नहीं लिखूँगा।

- ऐसे कैसे? जो पैसा ले रहे हो वह कहीं तो लिखा हुआ नजर आना चाहिए! आना चाहिए कि नहीं?

- हाँ। आना चाहिए। लेकिन यहाँ नहीं चलता।

- ये क्या बात हुई? तुम भले ही बीस रुपये लो। लेकिन देनेवाले को मालूम तो होना चाहिए कि उससे कितना पैसा लिया गया है। 

- आप चाहे जो कहो। यहाँ तो ऐसा ही चल रहा है और ऐसा ही चलेगा।

- मैं डीआरएम से शिकायत करूँगा।

- आप एक काम करो। अपना काम निपटा कर आओ। फिर बात करेंगे।

मैं अपना काम निपटा कर लौटा। उसने मेरी स्लिप ली। काउण्टर के पटिए पर रखे सिक्कों में से पाँच का सिक्का उठा मेरी ओर बढ़ाया। मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। इसके बाद हमारा सम्वाद कुछ इस तरह हुआ -

- ये आपके पाँच रुपये वापस।

- क्यों? वापस क्यों? तुमने तो चार्ज दस रुपये बताया था?

- हाँ। बताया था। वो गलत है। चार्ज पाँच रुपये ही है।

- तो फिर तुम दस रुपये क्यों माँगते हो और लेते हो?

- कहना पड़ता है और लेना पड़ता है।

- क्यों? क्यों कहना और लेना पड़ता है?

- ये पाँच रुपये डीआरएम के हैं।

- क्या? क्या कहा तुमने? पाँच रुपये डीआरएम के हैं?

- हाँ। ये पाँच रुपये डीआरएम के हैं।

- डीआरएम को पता है कि तुम उनके नाम पर ये पाँच रुपये ले रहे हो?

- हाँ। उनको पता है। उनको ही क्यों? नीचे से ऊपर तक, सबको पता है।

- याने कि तुम्हें पाँच रुपये ही मिलते हैं?

- हाँ। मुझे तो पाँच रुपये ही मिलते हैं। बाकी पाँच डीआरएम को जाते हैं।

- तो अभी जो तुम मुझे पाँच रुपये लौटा रहे हो वो डीआरएम के पाँच रुपये हैं?

- हाँ। वो डीआरएम के पाँच रुपये हैं।

- तो ये पाँच रुपये तुम अपनी जेब से डीआरएम को दोगे?

- नहीं! दो-चार दिन में आपके जैसा शिकायत करने की बात करनेवाला ग्राहक आ जाता है तो उसे दे देता हूँ। इतना एडजस्टमेण्ट तो चलता है। यह भी सब जानते हैं।

- तो यार! जब तुम्हें तुम्हारे पाँच रुपये ही मिलते हैं तो ये दस रुपये लेने की बदनामी और रिस्क क्यों लेते हो?

- करना पड़ता है। मना कर दूँगा तो मेरे पाँच रुपये भी नहीं मिलेंगे। मेरा ठेका केंसल हो जाएगा।

इसके बाद पूछने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। मैंने अपने पाँच रुपये लिए और निकल आया।

सोच रहा हूँ कि मैंने अपना हक बचाया या डीआरएम के हक पर डाका डाला?

चित्र की इबारत ध्यान से पढ़िए। सज्जन व्यक्ति का परिचय देने से मना किया गया है। दुर्जन का परिचय चलेगा। चित्र पुराना है लेकिन है रतलाम रेल्वे स्टेशन के इसी प्रीमीयम पार्किंग स्टैण्ड का।

उनका नामकरण मेरे सामने हुआ

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधनोपरान्त शोक प्रकट करनेवालों का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्हें चाहने-जाननेवाले पूरे तेरह दिनों तक लगातार आते रहे। अब भी आ रहे हैं - मनासा में भी और मेरे यहाँ, रतलाम में भी। अनेक ऐसे थे जो हम परिजनों में से किसी को नहीं जानते थे और न ही हम परिजन उन्हें। इस आवगमन में दादा से जुड़ी कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो जानकारियाँ बढ़ानेवाली तथ्य भी थीं और दादा के व्यक्तित्व के अनजान-अनछुए पहलुओं को उजागर करनेवाली भी। ऐसी ही कुछ बातों का दस्तावेजीकरण करने के लिहाज से मैं उन्हें लिख रहा हूँ ताकि कभी, किसी जिज्ञासु के लिए उपयोगी हो सकें।)


बरसों बाद उन्हें देखा तो पहचान नहीं पाया। समय ने कुछ ज्यादा ही असर दिखाया निवास दादा पर। उनका पूरा नाम श्री श्रीनिवास बसेर है लेकिन हम उन्हें निवासजी या निवास दादा के नाम से ही जानते-पुकारते हैं। मेरे मित्र गोपाल बसेर और महेश बसेर के बड़े भाई हैं। इनके एक छोटे भाई और थे - विश्वनाथजी बसेर। हम उन्हें विशु दादा कहते थे। उनकी लम्बी-घनी मूँछें उन्हें विशिष्ट पहचान देती थीं। मैं गाहे-बगाहे उनकी मूँछों पर हाथ फेरने का सुख ले लिया करता था। उन्हें भी इसमें मजा आता था।

निवास दादा आए तो दादा की बातें करते-करते अतीत में खो गए। यह तो होना ही था। बोले - “मैं उनसे पाँच-छः साल छोटा हूँ। लेकिन हमारी दोस्ती थी। हम गुलाम भारत में जी रहे थे लेकिन आजादी-वाजादी जैसी बातों का मतलब नहीं समझते थे। मनासा में एक ‘अन्याय दमणी सेवादल’ (‘अन्याय दमणी’ याने ‘अन्याय दमनी’ याने अन्याय का दमन करनेवाला। मालवी बोली के प्रभाव से ‘दमनी’, ‘दमणी’ हो गया।) चलता था। गाँव के अनेक बच्चे उसमें जाते थे। हम दोनों भी जाते थे।”

निवास दादा के सामने बोलने या उनसे पूछने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था। वे कहे जा रहे थे और हम सुने जा रहे थे। वे एक के बाद एक बातें बताते जा रहे थे। इसी क्रम में बोले - ‘काटजू सा’ब ने उनका नाम मेरे सामने रखा था। मैं मौजूद था उस वकत।’ यह बात मेरे काम की थी। मैंने कहा - ‘दादा! जरा खुल कर पूरी बात बताओ।’ 

निवास दादा उत्साहित हो गए।  उन्हें कुछ याद करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जैसे सब कुछ उन्हें सामने नजर आ रहा हो और वे ‘आँखों देखा हाल’ सुना रहे हों। बोले - “यह सम्वत 2008 की बात है। मेरी उमर चौदह बरस की थी। काटजू सा’ब दिल्ली सरकार में मन्त्री थे। वे दौरे पर मनासा आए थे। काँग्रेस ने उनकी सभा कराई थी। यहाँ बाजार में अभी जहाँ रामदयाल मन्त्री की दुकान है, झँवरों की दुकान के सामने, वहाँ बड़ा तखत लगाया गया था जिस पर कुर्सी लगाई गई थी। काटजू सा’ब उसी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने बैठे-बैठे ही भाषण दिया था। 

“सभा शुरु होने से पहले दादा ने स्वागत गीत गाया था। उसके बोल थे - ‘हुए बरबाद, कराया भारत को आजाद। राखो न राखो, तुम्हारी मरजी।’ गीत सुनकर काटजू सा’ब बहुत खुश हुए थे। जब उनसे भाषण देने के लिए कहा तो भाषण में सबसे पहले उन्होंने दादा के गीत की ही बात की। दादा की खूब तारीफ की और कहा कि यह लड़का आपके गाँव का ही है। अच्छे गीत लिखता और गाता है। इसका नाम तो मुझे नहीं मालूम लेकिन आप इसे बालकवि कहना। बस! उसी मिनिट से दादा बालकवि हो गए।”

मैंने पूछा - ‘दादा का नामकरण होने के बाद आपने उनसे
इस बारे में कभी बात की थी? कुछ बता सकते हैं कि दादा को कैसा लगा था?’ जवाब में निवास दादा ने कहा कि इस बारे में दादा से उनकी कोई बात नहीं हुई। लेकिन दादा को कोई फर्क पड़ा हो ऐसा नहीं लगा। सब कुछ रोज की तरह राजी-बाजी चलता रहा और लोगों ने दादा को बालकवि कहना शुरु कर दिया। 

दादा के नामकरण-संस्कार के किसी प्रत्यक्षदर्शी की ऐसी आधिकारिक बात मैंने पहली बार सुनी। यही बात मुझे तनिक महत्वपूर्ण लगी।
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अपने नामकरण को लेकर दादा यह बात बार-बार लिख और कह चुके हैं। लेकिन उनके चाहनेवाले फिर भी कभी-कभी अपनी इच्छा और सुविधा से उनके नामकरण की अपनी-अपनी कहानी बताते रहते हैं। गए दिनों ‘नईदुनिया’ ने छापा था कि यह नामकरण रामपुरा में आयोजित काँग्रेस सम्मेलन में हुआ था। काटजू सा’ब दादा का नाम भूल गए थे और गलती से उन्हें बालकवि सम्बोधित कर बैठे। किसी जमाने में विश्वसनीयता और आधिकारिता का पर्याय रहे ‘नईदुनिया’ में यह छपना मुझे विस्मित कर गया था। मैंने सम्पादकजी को पत्र भी लिखा था। लेकिन जैसा कि मैंने अनुमान लगाया था, पत्र नहीं छपा।
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मेवालाल और उसका प्याज

मेवालाल खुद को सचमुच में अन्नदाता मानने लगा था। शहर ने एक झटके में उसका मुगालता दूर कर दिया। उसे उसकी औकात बता दी।

यह कल, 31 मई 2018 गुरुवार को ही हुआ। रतलाम की मण्डी में।

मेवालाल रतलाम जिले के गाँव बरबोदना का रहनेवाला है। उसे मालूम हुआ कि रतलाम मण्डी में प्याज का भाव साढ़े तीन/चार रुपये किलो मिल रहा है। वह बड़ी आशा से अपना प्याज लेकर रतलाम मण्डी में आया। लेकिन उसकी आशाओं पर ओले गिर गए। उसे कहा गया कि उसे ढाई रुपये किलो के भाव पर अपना प्याज बेचना पड़ेगा। उसने एतराज जताया तो उन सबने पीठ फेर ली जो उसकी बेहतरी और उसकी हिफाजत की ग्यारण्टी देने के दावे करते हैं। उसे दो टूक जवाब मिला - ‘यही भाव मिलेगा। बेचना हो तो बेचो। नहीं तो अपना प्याज वापस ले जाओ।’ मन मसोस कर मेवालाल को अपना प्याज ढाई रुपये किलो ही बेचना पड़ा।

मेवालाल ऐसा अकेला किसान नहीं है। यहाँ हर किसान मेवालाल है। इन मेवालालों के साथ ऐसा ही हो रहा है। 

ये मेवालाल अपनी उपज मण्डी में लाते हैं। खरीदने के लिए व्यापारी इकट्ठे होते हैं। एक व्यापारी कहता है - ‘यह प्याज मैं खरीदूँगा।’ सुनकर बाकी व्यापारी लौटते तो नहीं लेकिन बोली भी नहीं लगाते। लगाते भी हैं तो इस तरह कि उसी व्यापारी की बोली अन्तिम हो जो खरीदने का इरादा जता चुका है। 

यह सब कुछ चौड़े-धाले हो रहा है। नेताओं, अफसरों की आँखों के सामने और नाक के नीचे। लेकिन मेवालालों की मदद कोई नहीं कर रहा। न तो मण्डी अध्यक्ष (जो खुद एक किसान है और किसानों के वोट लेकर अध्यक्ष बना है) न ही मण्डी सचिव और न ही कलेक्टर। कैसे करें बेचारे? सब कुछ कानून कायदे से तो हो रहा है! व्यापारी इकट्ठे हो रहे हैं। बोली लगा रहे हैं। सब कुछ किसान के सामने हो रहा है। सब कुछ पारदर्शी है। कहीं कोई बदमाशी, चोरी-चकारी नहीं। लेकिन फिर भी तमाम मेवालाल कहते हैं कि उनके साथ बेईमानी, अन्याय हो रहा है। उन पर जुल्म हो रहा है।

इन मेवालालों से पूछते हैं - ‘जब मनमाफिक भाव नहीं मिल रहा तो क्यों बेचते हो? वापस क्यों नहीं ले जाते?’ लगभग रोते-रोते ये मेवालाल कहते हैं - ‘बात तो सही कर रहे हो सा’ब। लेकिन वापस ले जाने पर और घाटा हो जाएगा। इस बार लाने-ले जाने का खर्चा माथे पड़ेगा और अगली बार लाने का खर्चा फिर झेलना पड़ेगा। और सा’ब! इस बात की क्या ग्यारण्टी कि अगली बार भी मनमाफिक भाव मिल जाएगा? इसलिए मजबूरी है सा’ब!’ हालत यह है कि जब किसी मेवालाल को मनमाफिक भाव नहीं मिलता तो वह घरवालों को फोन लगाता है - ‘भाव नहीं मिल रहा। क्या करूँ?’ लाचारी की चक्की में पिसा हुआ, घुटी-घुटी आवाज में जवाब आता है - ‘बेच दे भैया! मजबूरी है। जो भी भाव मिल, उस भाव बेच दे।’

व्यापारियों, नेताओं, अफसरों की मिली भगत का शानदार उदाहरण मण्डी में खुली आँखों देखा जा सकता है। यहाँ प्रत्येक व्यापारी ने खरीदी का अपना-अपना आँकड़ा तय कर रखा है। उसका आँकड़ा पूरा करने में बाकी सारे व्यापारी मदद करते हैं। जैसे ही उसका आँकड़ा पूरा होता है, वह पीछे हट जाता है और उन व्यापारियों का आँकड़ा पूरा करने में मदद करने लगता है जिन्होंने उसका आँकड़ा पूरा करवाया था। किस भाव खरीदना है और कितना खरीदना है, सारी मनमानी मिली भगत से हो रही है।

कोई मेवालाल दीन स्वरों में प्रतिवाद, प्रतिरोध करता है तो व्यापारी उससे ठिठोली करते हैं - ‘तुझे क्या नुकसान हो रहा है? भावान्तर में बाकी रकम सरकार से ले लेना।’ तमाम मेवालाल चुपचाप यह जवाब सुन लेते हैं। कुछ नहीं बोलते। बोलते हैं तो कहते हैं - ‘भावान्तर से भी फायदा तो सेठों को ही मिल रहा है।’

ऐसी दुर्दशा झेल रहे मेवालाल यदि शहर आने से इंकार करें और कहें कि उनकी अपनी उपज उनके दरवाजे पर ही खरीदी जाए तो सबके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं।
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पुछल्ला - कल मैंने कहा था कि किसान को अपना माल मण्डी में खुला रखना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं। बरसात हो जाए तो सारा नुकसान किसान को ही झेलना पड़ता है। कोई नेता, कोई अफसर उसकी मदद पर नहीं आता।

कल मेरी यह बात सच हो गई। कल रात हुई बरसात से किसानों का, मण्डी में, खुले में रखा प्याज गीला हो गया। यह नुकसान किसानों को ही सहन करना पड़ेगा। मण्डी सचिव ने किसानों की चिन्ता की और अमूल्य सलाह दी - ‘किसान अपनी उपज तिरपाल या अन्य साधनों से ढँक कर लाएँ ताकि बरसात होने पर उनकी उपज सुरक्षित रहे।’
चित्र - गुरुवार की रात हुई बरसात से भीगे प्याज। चित्र सौजन्य - ‘पत्रिका’।

चाकुओं से घिरा खरबूजा है हमारा किसान

यह तीस मई की दोपहर है। प्रदेश सरकार के आँख-कान मन्दसौर पर टिके हुए हैं। मन्दसौर, नीमच और रतलाम जिले के सारे गाँवों-कस्बों के रास्ते मन्दसौर जा रहे हैं। आज मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह वहाँ पहुँच रहे हैं। वे उड़न खटोले से पहुँचेंगे। वहाँ वे कुछ योजनाओं के उद्घाटन करेंगे। कॉलेज मैदान में उनकी आम सभा होगी। अनुमान है कि किसानों के लिए कुछ महत्वपूर्ण आकर्षक घोषणाएँ करेंगे। आम सभा में एक लाख लोगों की उपस्थिति का लक्ष्य है। लेकिन तम्बू ठेकेदार को 25 हजार की क्षमता का तम्बू लगाने का पैसा दिया गया है। भीड़ लाने के लिए एक हजार यात्री बसों की व्यवस्था की गई है। मन्दसौर जिले की 500 में से 462 बसें अधिगृहित कर ली गई हैं। राजस्थान से 150 बसें मँगवाई गई हैं। 

यह सब इसलिए कि देश के सौ से अधिक किसान संगठनों ने एक जून से दस जून तक ‘गाँव की उपज गाँव में रहे’ का आह्वान किया है। लेकिन यही एक मात्र कारण नहीं है। एक कारण और है जो पहले कारण से ज्यादा महत्वपूर्ण है। गए बरस, 6 जून 2017 को मन्दसौर जिले में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस गोलीबारी से 6 किसानों की मृत्यु हो गई थी। इस घटना की पहली बरसी पर काँग्रेस श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर रही है। गाँव खोखरा में यह आम सभा होगी। इस आम सभा को असफल और बौनी साबित करने में तीनों जिले का भाजपा संगठन और प्रशासकीय अमला जी-जान से जुटा हुआ है। मन्दसौर, नीमच और रतलाम जिले के तमाम अफसर और प्रशासकीय अमला कोई एक पखवाड़े से चौबीसों घण्टे मुस्तैद बना हुआ है। किसानों को ‘भाजपाई किसान’ और ‘गैर भाजपाई किसान’ में बाँट दिया गया है। कलेक्टर और एसपी, गाँव-गाँव जाकर दिन-रात लोगों से मिल रहे हैं। किसानों से चर्चा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि दूध, सब्जी, फल जैसी अपनी उपज बेचने के लिए बेहिचक शहरों कस्बों में लाएँ। तीनों जिलों में अतिरिक्त पुलिस बल बुला लिया गया है। पुलिस जवानों के लिए हजारों नए लट्ठ खरीद लिए गए हैं। जगह-जगह केमरे लगा दिए गए हैं। तीनों जिलों के हजारों किसानों को पुलिस द्वारा नोटिस जारी कर बॉण्ड भरवाए जा रहे हैं। ऐसे लोगों में कुछ मृतक और अस्सी साल के बीमा बूढ़े भी शरीक हैं। लगता है, अंगरेजी राज लौट आया है। पूरे अंचल में तनाव व्याप्त है - कस्बों-शहरों में भी और गाँवों में भी। यह देखकर ताज्जुब हो रहा है कि सरकार ने किसानों को निशाने पर ले लिया है। बेहतर होता वह अपनी गरेबान झाँकती। एक बरस पहले किए गए मुख्यमन्त्री के वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं। जिन मृतक किसानों के परिजनों को नौकरियाँ दी गई हैं उन्हें चार-चार महीनों से वेतन नहीं मिला है। भारी-भरकम लाव-लश्कर जुटाने में सरकार जो मेहनत कर रही है, जो खर्चा कर रही है उसका दसवाँ हिस्सा भी अपने वादे पूरे करने में लगाया होता तो आज यूँ बदहवास, हाँफती नजर नहीं आती।

मैं किसानों के साथ हूँ। उनके मूल विचार ‘गाँव की उपज गाँव में रहे’ के समर्थन में। बचपन से इस क्षण तक मेरी सुनिश्चित धारणा बनी हुई है कि किसानों के साथ न्याय नहीं हुआ। आजादी के बाद के शुरुआती बरसों में जरूर हमारी नीतियों का केन्द्र किसान रहा किन्तु धीरे-धीरे उसे हाशिये पर धकेल दिया गया। आज उसके साथ हम आवंछितों, अस्पृश्यों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। जो देश कृषि प्रधान रहा हो, जिस देश की अस्सी प्रतिशत से अधिक आबादी खेती-किसानी पर आधारित रही, जो कभी ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान’ के लिए पहचाना जाता रहा हो वही देश आज किसानों की आत्म हत्याओं के लिए पहचाना जाने लगा है। 

भारत का किसान अपनी उपज की कीमत खुद तय नहीं कर सकता। उसे व्यापारियों, बिचौलियों की दया पर जीना पड़ता है। हम अन्न से पेट भरते हैं लेकिन अन्न खरीदने के लिए कभी किसान के पास नहीं जाते। किसान अपनी उपज लेकर हमारे दरवाजे पर आता है। प्रकृति ने व्यवस्था की कि प्यासा कुए के पास जाता है। किसानों के सन्दर्भ में हमने प्रकृति को झुठला दिया - कुआ प्यासे के पास आ रहा है। 

किसानों के साथ शहरी बर्ताव पर सोचने की हमें न तो जरूरत अनुभव होती है न ही फुरसत मिलती है। पहले उसे गुण्डा, दंगाई, असामाजिक तत्व, उपद्रवी कहा गया। अब चोर कहा जा रहा है। किसान शहर में मण्डी के बन्द दरवाजे के बाहर मीलों लम्बी लाइन लगाकर प्रतीक्षा करता है। अपनी उपज की नीलामी के लिए उसे चार-चार दिन तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उसे ट्राली पर ही रातें बीतानी पड़ती हैं। अधिकांश किसान किराए की ट्रालियों में उपज लाते हैं। उन्हें तीन दिनों का ट्राली किराया अतिरिक्त भुगतना पड़ता है। मण्डियों में हम्माल, तुलावटी, व्यापारी, अधिकारी सब उससे चूहे-बिल्ली का खेल खेलते नजर आते हैं। वह मोल में भी मारा जाता है और तौल में भी। मेरे जिलेे का आधिकारिक रेकार्ड है कि तौल में पाँच किलो से लेकर पचीस किलो तक की बेईमानी किसान के साथ हुई। 

मण्डियों में किसान के लिए व्यवस्था के नाम पर केवल खानापूर्ति है। उपज के लिए पर्याप्त सुरक्षित जगह नहीं। किसानों के माल के प्लेटफार्मों पर व्यापारियों का माल रखा मिलता है। किसान को उपज खुले में, धरती पर रखनी पड़ती है। बरसात हो गई तो नुकसान किसान का। सरकार या मण्डी प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं। मण्डी कमेटी का दफ्तर चकाचक मिलेगा। वहाँ पंखे, कूलर (मुमकिन है, ए सी भी) मिलेंगे। लेकिन किसानों के लिए यह सब आपवादिक रूप से भी शायद ही मिले। मण्डी अध्यक्ष और सचिव की टेबल पर नाश्ता, स्टील की साफ चमकीली प्लेटों में आएगा लेकिन किसान केण्टीन में पुराने अखबार की रद्दी में नाश्ता मिलेगा। मण्डी पदाधिकारियों, कर्मचारियों के शौचालय चकाचक मिलेंगे जबकि किसानों के शौचालयों में झाँकना भी दुरुह होता है। शहर में आए किसान की दशा चाकुओं के बीच खरबूजे जैसी होती है। वह शहर में आकर अपना माल कौड़ियों के मोल बेचता है और उसी माल को अपने ही गाँव में सोने के भाव खरीदने को अभिशप्त रहता है।

समाचार माध्यमों पर निगमित घरानों और शहरी मध्यमवर्गीयों का कब्जा है। इन्हें चींटी भी काट ले तो आसमान फट जाता है। लेकिन देहातों में किसानों पर आसमान भी फट जाए तो शहरों में पत्ता भी नहीं खड़कता। उसे समाचार बनने के लिए आत्महत्या करनी पड़ती है। पूरे देश के किसानों की कर्ज मुक्ति के लिए केवल तेरह हजार करोड़ रुपये चाहिए थे। वह रकम सरकार के पास नहीं होती। लेकिन गिनती के कार्पोरेट घरानों को लाखों करोड़ रुपयों की कर-माफी दे दी जाती है।

ऐसे में किसान शहर में आने से इंकार क्यों न करे? साठ-सत्तर रुपयों में बिकनेवाला टमाटर का एक क्रेट कल मेरे कस्बे की सब्जी मण्डी में, चार सौ रुपयों में बिका। केवल इसलिए कि किसान ने शहर में लाना बन्द कर दिया। माँग और पूर्ति के नियम का लाभ किसान को तब ही मिल सकता है जब उसकी उपज उसके दरवाजे पर बिके। किसान ऐसा चाह रहा है तो क्या गलत है? 

किसान और किसानी से जुड़े लोग आज भी देश की जनसंख्या का सत्तर प्रतिशत हैं। देश की आर्थिक नीतियाँ इन्हें ही केन्द्र में रखकर बनाई जानी चाहिए। जो देश ऐसा नहीं करता वह आँकड़ों में बेशक धनी हो सकता है, जीडीपी और सेंसेक्स के हिमालय खड़े कर सकता है लेकिन वह अन्ततः गरीब जनसंख्यावाला धनी देश ही होगा। वह सुखी देश कभी नहीं होगा।

इसीलिए मैं किसानों के साथ हूँ।
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बड़ेपन का विसर्जन, बड़प्पन का अर्जन

दादा श्री बालकवि बैरागी को लेकर यह सब जो मैं लिख रहा हूँ, है तो व्यक्तिगत किन्तु ऐसा ‘व्यक्तिगत’ है जो व्यापक सार्वजनिकता से जुड़ता है। यह सब कोरा उपदेश नहीं, दादा का, बरसों से आचरण में उतारा हुआ, जीया हुआ, आजमाया हुआ है। इसे ‘स्मृति शेष’ की श्रेणी में भी रखा जा सकता है और ‘वस्तुपरक अध्ययन’ की श्रेणी में भी। ‘सफल कैसे बनें’ या ‘रातों-रात लोकप्रिय बनें’ जैसे प्रेरक व्याख्यानों के व्यवसायियों के लिए ये बातें उपयोगी और सहायक हो सकती हैं। 

बरसों पहले दादा ने ‘व्यवहार का पंचशील’ बनाया था जिस पर वे मृत्युपर्यन्त आचरण करते रहे। इस पंचशील के पहले दो शील तो सर्वज्ञात हैं - किसी पुरुष से उसकी आय और किसी स्त्री से उसकी आयु मत पूछो। तीसरा शील था - किसी परिवार में कोई सयानी बिटिया नजर आए तो उसके विवाह के बारे में कोई पूछताछ मत करो। किसी भी परिवार के लिए यह बहुत ही सम्वेदनशील मामला होता है। चौथा शील - किसी परिवार में कोई सयाना, पढ़ा-लिखा नौजवान नजर आए तो कभी मत पूछो कि वह क्या काम कर रहा है और कितना कमा रहा है। दादा कहते थे - ‘भला कौन नौजवान बेकार रहना चाहता है? उसकी बेकारी, उसकी मजबूरी होती है। किसी की मजबूरी का उपहास नहीं करना चाहिए।’ दादा ने जब यह कहा था तब तो सरकारी नौकरियाँ फिर भी जैसे-तैसे मिल जाती थीं। आज तो प्रायवेट नौकरियाँ भी आसानी से नहीं मिलतीं। उनका पाँचवाँ शील था - कोई स्त्री-पुरुष आपको एक साथ मिलें तो उनका अन्तर्सम्बन्ध जानने की कोशिश कभी मत करो। ये बातें देखने-सुनने में बहुत छोटी, बहुत हलकी लगती हैं लेकिन इन पर चिन्तन-मनन करने पर जब इनकी गहराई और व्यापकता अनुभव होती है तो आदमी अकेले में भी डर जाए। इस पंचशील के निर्वहन से आदमी अतिरिक्त रूप से पहचाना जाने लगता है और अतिरिक्त रूप से लोकप्रिय भी होता है। 

पत्राचार और लोगों से मिलना - ये दो उपक्रम उन्हें जीवनी शक्ति देते थे। पत्राचार तो अकेले में किया जा सकता है लेकिन लोगों से मिलने के लिए तो लोगों का होना अपरिहार्य होता है। दादा खुद को भाग्यशाली मानते थे कि लोग चल कर उनके पास आते थे और उन्हें जीवनी शक्ति दे जाते थे। लोगों से बतियाते हुए वे अत्यन्त सतर्क रहते थे। कोई भी अप्रिय, अवांछित सवाल नहीं पूछते थे। वे लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में बात करते थे और ऐसे सवाल करते थे जिनके जवाब में आदमी को अपनी सफलताएँ, अपनी उपलब्धियाँ बताने, गिनाने का मौका मिलता था। जाहिर है, ऐसे आदमी के पास कौन नहीं आना चाहेगा? सम्भवतः इसलिए भी लोग दादा से मिलने के लिए बार-बार आते थे और बिना किसी काम के आते थे।

लेकिन खेत पर निवास कर लेने के कारण लोगों का आना-जाना कम होने लगा था। तब, ‘रास्ते चलते’ आनेवालों का आना बन्द सा हो गया था। भौगोलिक दूरी बढ़ गई थी। तब वे ही लोग पहुँचते थे जिन्हें कोई काम होता या जो दादा से मिले बिना रह नहीं पाते थे। घर में तो गिनती के ही लोग थे - खुद दादा, मुन्ना, बहू सोना, चौबीस घण्टों का परिचारक भूरा। मुन्ना ने कोई तीस किलो मीटर दूर खेती ले रखी है। वह अस्थायी सदस्य की तरह सप्ताह में दो-एक दिन घर में रह पाता है। भरे-पुरे घरों के बूढ़े भी अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। यहाँ तो वैसे भी गिनती के लोग थे। बूढ़ों के पास बैठने में लोग वैसे भी कतराते हैं। बूढ़े लोग इस तरह पूछताछ करते हैं मानो किसी अपराधी से पुलिसिया पूछताछ हो रही हो। बूढ़ों में एक और प्रवृत्ति सामान्य पाई जाती है। वे खुद को और अपने समय को श्रेष्ठ बताने की कोशिश में बच्चों को अक्षम, असमर्थ, निकम्मा साबित करते रहते हैं। 

दादा ने अपने अकेलेपन से खुद ही मुक्ति तलाशी। उन्होंने सूत्र खोजा - ‘लोग तुम तक नहीं आ पाते तो तुम ही लोगों तक पहुँचो।’ कोई चार महीने पहले उन्होंने गाँव के तमाम लिखने-पढ़नेवालों से कहा कि महीने में एक दिन सब लोग किसी एक जगह इकट्ठे हों और बिना किसी विषय के बात करें। सबको यह बात अच्छी लगी और मासिक समागम जुड़ने लगा। इस समागम के समाचार मुझे फेस बुक से मिलते थे। हर बार नया विषय और नई टिप्पणियाँ। दादा अपनी ओर से कुछ नहीं कहते-पूछते। उनसे जो पूछा जाता उसका जवाब देते। फेस बुकिया मित्रों की मानूँ तो उन्हें दादा से अनूठी जानकारियाँ मिलती थीं और जिन्दगी के अनछुए, अनदेखे पन्ने खुलते थे। दादा ने बताया था कि इन समागमों में, बच्चों का बोला सुनने में उन्हें बहुत मजा आता था। वे कहते थे - ‘हमारे बच्चे अद्भुत, विलक्षण, अनूठे और अत्यधिक प्रतिभाशाली हैं। हम सब इन्हें दुत्कारते, खारिज करते रहते हैं। कोई इनके पास बैठ कर इन्हें सुने, समझे तो सही!’ अपनी भावी पीढ़ियों की पैरवी करते हुए वे बार-बार कहा करते थे - ‘जो वृक्ष अपनी नई कोंपलों का स्वागत नहीं करता, वह ठूँठ बन कर रह जाता है।’ दादा ने बताया था कि उनकी चौथी पीढ़ी तक के बच्चे इस समागम में आते थे। चूँकि दादा ने सवाल पूछना बन्द कर रखा था इसलिए (चौथी पीढ़ी के) ये बच्चे भी उनसे मित्रवत बात-व्यवहार करते थे। बच्चे तो उत्साहित रहते ही थे, दादा भी खुद को अतिरिक्त रूप से ऊर्जावान अनुभव करते थे। 

मेरे छोटे बेटे के विवाह प्रसंग पर वे आए तो लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें अकेले नहीं रहने दिया। विवाह की भागदौड़ के बीच मैंने जब भी उन्हें देखा तो पाया कि वे श्रोता बने हुए हैं। अपनी ओर से किसी से कुछ नहीं पूछ रहे हैं। कोई कुछ पूछ रहा है, सवाल कर रहा है तो जवाब दे रहे हैं। पूछने के नाम पर सामनेवाले के परिवार की कुशल क्षेम और सफलताओं के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। उनके आसपास बैठे लोग उनके तो परिचित थे लेकिन वे सब परस्पर परिचित नहीं थे। दादा उन सबका परिचय कराते हुए उनकी सफलताओं, उपलब्धियों, विशेषताओं की विस्तृत जानकारी दे रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वे सबके प्रशस्ति-पत्र बाँच रहे हों। यह सामान्य मनोविज्ञान है कि हर कोई खुद को प्रमुख या विशेष अनुभव करना चाहता है। मुझे अब लग रहा है कि दादा अपने मिलनेवालों की यह अनकही मनोकामना सहजता से पूरी करते थे और बिना कंजूसी बरते करते थे। 

दादा में बड़ापन तो था ही, बड़प्पन उससे कहीं-कहीं अधिक था। ‘बड़ापन’ तो बैठे-बिठाए मिल जाता है लेकिन ‘बड़प्पन’ तो अर्जित करना पड़ता है। दादा की ये सारी बातें जब एक साथ जुड़कर सामने आती हैं तब अनुभव हो पाता है कि बड़प्पन अर्जित करना जितना दुसाध्य है उतना ही सरल भी। बड़प्पन अर्जित करने के लिए अपने बड़ेपन को विसर्जित करने का साहस करना पड़ता है। हम अपने बड़ेपन के बन्दी होकर खुद को बड़प्पन से वंचित कर लेते हैं। बात ले-दे कर आदमी की मानसिकता पर ही आकर टिकती है। 

हम दो ही भाई थे। वे मेरे इकलौते बड़े भाई और मैं उनका इकलौता छोटा भाई। लेकिन वे मेरे मानस पिता थे। मेरे पिताजी की मृत्यु जरूर 1992 में हुई लेकिन पितृविहीन तो मैं अब हुआ। वे चले गए, परिवार का अपना बड़ापन मुझे दे कर। बड़ापन मैं लेना नहीं चाहता था और बड़प्पन मुझ तक नहीं आ पाया। उनके रहते जो बेफिक्री, जो मदमस्ती बनी रहती थी, वह हवा हो गई है। लेकिन देख रहा हूँ कि अनगिनत लोग दादा के इन जीवन सूत्रों को थाम सफलताएँ, उपलब्धियाँ अर्जित किए जा रहे हैं। 

मैं क्यों घबरा रहा हूँ? मैं तो इन सबसे बहुत अधिक समृद्ध हूँ! 
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उन्हें सवाई-ड्योड़ी मौत मिली

13 मई 2018 रविवार। हर दिन की तरह एक सामान्य दिन। रोज की तरह दादा उठे। नौ बजे तक तैयार हो गए। आज उन्हें एक पेट्रोल पम्प के उद्घाटन में जाना है।

घर में कुल तीन लोग हैं - दादा, बड़ा बेटा मुन्ना और परिचारक भूरा। बहू सोना, राजसमन्द गई है, बेटी (याने दादा की पोती) रौनक के पास। वह वहाँ जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी है। बहू सोना आज आ रही है। वह उदयपुर आ जाएगी। मुन्ना उसे लेने उदयपुर जाएगा। 

दादा सलीम कुरेशी को फोन करते हैं - ‘वक्त पर आ जाना। साढ़े ग्यारह बजे उद्घाटन है। मैं तैयार बैठा हूँ।’ मल्हारगढ़-नीमच फोर लेन पर, ग्राम चंगेरा में एक पेट्रोल पम्प का उद्घाटन है। कार्यक्रम में जाना तो बहुत पहले से तय था लेकिन उन्हें कल ही मालूम हुआ कि उद्घाटन उन्हें ही करना है। वे मना कर ही नहीं सकते थे। पेट्रोल पम्प बाबू सलीम चौपदार का है और बाबू किसी परिजन से कम नहीं। दादा को देर से पहुँचना पसन्द नहीं। कोई आए न आए, कार्यक्रम भले ही देर से शुरु हो, वे समय से पहले ही पहुँचते हैं। आदत है उनकी।

दस बज कर पाँच मिनिट हो गए हैं। दादा अधीर हो गए हैं। अब तक तो उन्हें निकल जाना चाहिए था। लेकिन उन्हें ले जानेवाले  अब तक नहीं आए। वे फोन लगाने की सोचते हैं। लेकिन फोन लगाएँ, उससे पहले ही कार दरवाजे पर आ जाती है।  चन्द्रशेखर पालीवाल, मंगेश संघई, सलीम कुरेशी और ओम रावत उतरते हैं। चन्द्रशेखर मनासा ब्लॉक काँग्रस अध्यक्ष है और मंगेश जिला काँग्रेस उपाध्यक्ष। दादा उठ खड़े होते हैं - ‘चलो भई! चलो। अपन लेट हो गए हैं।’ चारों में से कोई एक कहता है - ‘प्रोग्राम साढ़े ग्यारह बजे है। अपन घण्टे भर में ही पहुँच जाएँगे। लेट नहीं होंगे।’ दादा कुछ नहीं बोलते। वे ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठ चुके हैं। हाथ से इशारा करते हैं - चलो। कार चल पड़ती है।

दादा के जाने के कोई दो घण्टे बाद मुन्ना भी उदयपुर के लिए निकल जाता है। दोनों बाप-बेटे पहले ही तय कर चुके हैं - सम्भव हुआ तो मुन्ना और सोना, दादा की वापसी के समय तक नीमच पहुँच जाएँगे और सब साथ-साथ मनासा आएँगे। 

सवा ग्यारह बजे दादा पेट्रोल पम्प पर पहुँचते हैं। लोग दादा की आदत जानते हैं। सो, काफी लोग पहुँच चुके हैं। बाबू भाई उनकी अगवानी करते हैं। 

साढ़े ग्यारह बजे कार्यक्रम शुरु होता है। दादा से आग्रह किया जाता है - मंच पर आने का। वे मना कर देते हैं। उन्हें मंच पर चढ़ने में तकलीफ होती है। फौरन तय होता है - मंच पर कोई नहीं बैठेगा। सब दादा के साथ, मंच के नीचे ही बैठेंगे। दादा तो मंच पर नहीं गए। मंच ही नीचे आ गया।

तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक दादा से उद्बोधन का अनुरोध होता है। दादा माइक सम्हालते हैं। अपनी चिर-परिचित शैली में, लगभग तीस मिनिट में अपनी बात कहते हैं। बाबू सलीम के परिवार से अपने नाते का विस्तृत ब्यौरा देते हुए उन्हें और उनके परिवार को असीसते हैं। धन्धे में मधुर व्यवहार, नैतिकता, पारदर्शिता, ईमानदारी बरतने की, आैर ग्राहकों को दिए जाने वाले बिलों पर हिन्‍दी में हस्‍ताक्षर करने की आग्रहभरी सलाह देते हैं। यह सब करते हुए मीठी चुटकियाँ लेते हैं। लोगों को गुदगुदी होती है। ठहाके लगते हैं। बार-बार तालियाँ बजती हैं।
पेट्रोल पम्प उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दादा (चित्र - बाबू भाई चोपदार की फेस बुक वाल से)

दादा फीता काटते हैं। कार्यक्रम समाप्त होता है। भोजन शुरु हो जाता है। दादा की मनुहार होती है। वे भोजन से इंकार कर देते हैं। एक मनुहार होती है - ‘थोड़े से दाल-चाँवल तो चलेंगे।’ दादा हाँ भर देते हैं। प्लेट आ जाती है। दादा प्रेमपूर्वक भोजन करते हैं।

ढाई बज गए हैं। गर्मी चरम पर है। मुन्ना और सोना अब तक नहीं आए हैं। दादा रवाना हो रहे हैं। लोग उन्हें बिदा करने कार तक आते हैं। दादा, ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठते हैं। नमस्कार करते हुए सबसे कहते हैं - ‘आप लोग भी जल्दी से जल्दी अपने-अपने मुकाम पर पहुँचो और आराम करो। गरमी बहुत तेज है।’ 

लगभग साढ़े तीन बजे दादा अपने निवास पर पहुँचते हैं। चन्द्रशेखर, मंगेश, सलीम और ओम जाने की इजाजत माँगते हैं। दादा उन्हें रोकते हैं - ‘ऐसे कैसे? पानी पीकर जाओ।’ वे भूरा को आवाज लगाते हैं - ‘भूरा! इन्हें दो-दो गिलास पानी पिलाना। इन्होंने आज बहुत श्रीखण्ड खाया है।’ चारों हँसते हैं। पानी पीते हैं। दादा चारों को बिदा करते हैं - ‘अब जाओ। तुम भी आराम करो। मैं भी आराम करूँगा।’

दादा अपने कमरे में आते हैं। कुर्ता बदल कर लेट जाते हैं। साढ़े चार बजे उठते हैं। मुन्ना को फोन लगाते हैं - ‘कहाँ हो तुम लोग?’ मुन्ना बताता है कि वे मंगलवाड़ चौराहा पार कर चुके हैं। दादा कहते हैं - ‘मैं घर आ गया हूँ। आराम कर लिया है। अब चाय पीयूँगा। तुम लोग तसल्ली से आना। जल्दी मत करना।’ फोन बन्द कर वे भूरा से चाय के लिए कहते हैं और दाहिनी हथेली पर सर टिका कर, दाहिनी करवट पर लेट जाते हैं।

दादा ग्रीन टी पीते हैं। बनाने में कोई देर नहीं लगती।
मुश्किल से पाँच मिनिट होते हैं कि भूरा चाय लेकर पहुँचता है। देखता है, दादा सो रहे हैं। वह ‘पापाजी! पापाजी!!’ की आवाज लगाता है। कोई जवाब नहीं मिलता। उसे लगता है, दादा थक गए हैं। गहरी नींद में हैं। वह वापस चला जाता है। कोई दस मिनिट बाद फिर चाय बनाकर लाता है और दादा को आवाज लगाता है-एक बार, दो बार, तीन बार। दादा जवाब नहीं देते हैं। वह उन्हें हिलाता है। दादा फिर भी न तो कुछ बोलते हैं न ही आँखें खोलते हैं। भूरा घबरा जाता है। रोने लगता है। इसी दशा में मुन्ना को फोन कर सब कुछ बताता है। मुन्ना कहता है -‘पापा को हिला।’ भूरा कहता है, वह सब कुछ कर चुका। मुन्ना इस समय निम्बाहेड़ा के आसपास है। वह फौरन डॉक्टर मनोज संघई को फोन लगाता है - ‘जल्दी पापा को देखो। वे बोल नहीं रहे। लगता है, उनकी शुगर कम हो गई है।’ मनोज भाग कर दादा के पास पहुँचता है। दादा को टटोलता है। वह पाता है - अब दादा की केवल देह वहाँ है। दादा नहीं। 

मनोज, मुन्ना को फोन करता है - ‘दादा चले गए मुन्ना भैया। आप जल्दी चले आओ।’ मुन्ना गाड़ी चला रहा है। एक पल उसके हाथ काँपते हैं। लेकिन वह खुद को संयत करने की कोशिश करते हुए, भर्राई आवाज में सोना से कहता है - ‘पापा चले गए सोनू! सबको फोन करो।’ सोना पर मानो पहाड़ टूट पड़ता है। वह रोने लगती है। मुन्ना कहता है - ‘मैं गाड़ी चला रहा हूँ। फोन नहीं कर सकता। तुम फोन करो।’ रोते-रोते ही सोना एक के बाद एक परिजनों को फोन लगाती है और रोते-रोते हम सबको खबर करती है। 

सात-सवा सात बजे मुन्ना घर पहुँचता है। देखता है, अपनी दाहिनी हथेली पर माथ टिकाए दादा, दाहिनी करवट लेटे हुए हैं। रोज की तरह। मानो अभी उठ जाएँगे और कहेंगे - ‘मेरी चाय लाओ।’

दादा ‘अकस्मात मृत्यु’ की बातें किया करते थे। लगता है, उन्होंने कभी एकान्त में ईश्वर से अकस्मात मृत्यु माँगी होगी। ईश्वर ने उनकी कामना सवाई-ड्योड़ी पूरी की। केवल अकस्मात मृत्यु नहीं दी। निःशब्द, एकान्त, अकस्मात मृत्यु दी। अन्तिम समय में वे थे और उनका ईश्वर उनके पास था। उनसे बतिया रहा था।

13 मई 2018, रविवार का दिन अब एक सामान्य दिन नहीं रह गया।
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