हिन्दी का आश्वस्ति पुरुष

भगवान भला करे, कर सलाहकार इन्दरमलजी जैन वकील साहब का जो उन्होंने मुझे आयोजन का निमन्त्रण-पत्र दे दिया और मुझे अनामन्त्रित श्रोता होने से बचा लिया। यह निमन्त्रण-पत्र नहीं मिलता तो भी मैं उस आयोजन में जाता ही। आयोजन था - रतलाम चार्टर्ड अकाउण्टण्ट्स सोसायटी और कर सलाहकार परिषद् रतलाम द्वारा, केन्द्रीय बजट 2010 के प्रस्तावों पर परिचर्चा। बजट के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव मुझ पर भी वे ही और उतने ही होते हैं जो एक सामान्य मध्यमवर्गीय व्यक्ति पर होते हैं। किन्तु ऐसी परिचर्चाओं का लाभ मुझे मेरे बीमा व्यवसाय में मिलता है। ऐसी परिचर्चाओं में मिलनेवाली, विशेषज्ञता वाली महत्वपूर्ण सूचनाएँ मेरे भावी और वर्तमान पालिसीधारकों के बीच मुझे समझदार और प्रभावी बनाती हैं।


सूचनाएँ तो इस बार भी मुझे बहुत सारी मिलीं किन्तु इस बार मुझे, हिन्दी के सन्दर्भ में बोनस भी मिला। यह बोनस था - इन्दौर के युवा कर सलाहकार श्री मनीष डफरिया को सुनने का रोमांचक और आश्वस्तिदायक अनुभव।



मनीष अभी चालीस पार भी नहीं हुए होंगे। उनकी जड़ें रतलाम में ही हैं। उनका जन्म रतलाम में ही हुआ। उनके बारे में न तो पहले कुछ सुना और न ही उन्हें देखा। बस, दैनिक भास्कर में उनकी कुछ टिप्पणियाँ अवश्य पढ़ी थीं। किन्तु मुझ जैसा कुटिल व्यक्ति, ऐसी टिप्पणियों से आसनी से प्रभावित नहीं होता। सो, मैने मनीष का नोटिस कभी नहीं लिया। किन्तु सात मार्च को उनका व्याख्यान सुनने के बाद उनकी अनदेखी कर पाना न तो उस समय सम्भव हो पाया और न ही आगे हो सकेगा।



स्थिति यह रही कि कार्यक्रम समाप्ति के बाद मनीष से मिलने के लिए मैं देर तक रुका रहा और उनके उद्बोधन के लिए उन्हें विशेष रूप से बधाइयाँ दीं।



अपने उद्बोधन के पहले ही वाक्य से मनीष ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। मुझे उम्मीद थी कि अपनी बात कहने के लिए वे अंग्रेजी का ही सहारा लेंगे जिसे समझने के लिए मुझे अतिरिक्त रूप से सतर्क/सावधान रहना पड़ेगा और अतिरिक्त परिश्रम भी करना पड़ेगा। किन्तु मनीष ने सुखद रूप से मुझे नाउम्मीद किया। वे हिन्दी में ही न केवल शुरु हुए अपितु आज के दौर के युवाओं की अपेक्षा बहुत ही सुन्दर और लगभग निर्दोष हिन्दी में बोले। किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने अंग्रेजी से परहेज किया। वे अंग्रेजी में भी बोले और पूरी सहजता और धड़ल्ले से बोले। कोई पचहत्तर मिनिट का उनका व्याख्यान सचमुच में धाराप्रवाह था। वे या तो साँस लेने के लिए रुके या पानी पीने के लिए या फिर बिजली चले जाने के कारण। किन्तु केवल धराप्रवहता ही उनके व्याख्यान की विशेषता नहीं थी। स्पष्ट उच्चारण, धीर-गम्भीर स्वर, शब्दाघात का उन्होंने सुन्दर उपयोग किया। उन्हें शायद भली प्रकार पता था कि उनका विषय भाषा के सन्दर्भ में नीरस और ‘निर्जीव तकनीकी’ है। सो, रोचक उदाहरणों से उन्होंने इन दोनों दोषों को सफलतापूर्वक दूर किया। यही कारण था कि सवा घण्टे के उनके भाषण में लोगों को झपकी लेने का एक भी क्षण नहीं मिल पाया। उन्होंने श्रोताओं को भरपूर गुदगुदाया और लोगों की मुक्त कण्ठ वाहवाही लूटी। उनकी सफलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे सहायक वक्ता थे किन्तु प्रमुख वक्ता के रूप में पहचाने और स्वीकार किए गए। किन्तु जिस बात ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया वह थी - उनका व्याख्यान, अधिकार भाव और आत्म विश्वास से लबालब था। ये दोनों तत्व उन्हीं व्यक्तियों के व्याख्यानों में आ पाते हैं जिन्हें अपने विषय की केवल विशेषताएँ ही नहीं, कमियाँ और दोष भी मालूम हों। विषय मनीष पर क्षण भर भी हावी नहीं हो पाया। उल्टे, पूरे पचहत्तर मिनिट तक वे विषय को, एक कुशल नट की तरह, मन माफिक अन्दाज में अंगुलियों पर नचाते रहे।
बजट जैसे, तकनीकी शब्दावली वाले विषय पर निर्दोष हिन्दी में ऐसे अधिकार भाव और आत्म विश्वास से धाराप्रवाह बोलते हुए मैंने अब तक किसी को नहीं देखा। सो, मनीष डफरिया तो मेरे लिए ‘हिन्दी के आश्वस्ति पुरुष’ बन कर सामने आए। यही मेरे लिए बोनस रहा। हिन्दी की वर्तमान दुर्दशा को लेकर मेरे मन में जो निराशा, क्षोभ और आक्रामक-आवेश उपजता रहता है, मनीष के इस व्याख्यान से इस सबमें थोड़ी देर के लिए ही सही किन्तु भरपूर कमी मैने अपने आप में अनुभव की।



मुझे बाद में मालूम हुआ कि मनीष को ऐसे व्याख्यान देने का यथेष्ठ अभ्यास है और उनके श्रोताओं की संख्या प्रायः की ढाई-तीन सौ तो होती ही है। वे इन्दौर स्थित, आई आई एम में, आयकर विषय के प्राध्यापक भी हैं।



मनीष की सफलता और शिखरों पर उनकी कीर्ति पताका का लहराना सुनिश्चित और असंदिग्ध है। उम्मीद करें कि वे हिन्दी का हाथ और साथ कभी नहीं छोड़ेंगे अपितु हिन्दी को तथा हिन्दी के माध्यम से खुद को विशिष्ट रूप से स्थापित कर वैसी ही अपनी पहचान भी बनाएँगे।



मनीष! अच्छी हिन्दी आपकी और आप हिन्दी की पहचान बनें। यह आज की आवश्यकता है।



शुभ-कामनाएँ।
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आपकी बीमा जिज्ञासाओंध्समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्‍या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।



यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

मूर्तिभंजक शिल्पकारों का देश

देश के एक सौ सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों की सूची बनाने के लिए, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के परिणामों वाला समाचार मैंने ध्यान से, एकाधिक बार पढ़ा। पढ़कर मुझे खुशी कम और हैरानी तथा चिन्ता अधिक हुई।


इस सूची के प्रथम दस व्यक्तियों में एक भी राजनीतिक व्यक्ति शामिल नहीं है। प्रथम दस में वैज्ञानिकों, उद्यमियों, कलाकारों, खिलाड़ियों को स्थान मिला है जबकि राजनीतिक व्यक्तियों को, सूची के अन्तिम दस में स्थान मिला है। मायावती ने, अन्तिम से प्रथम अर्थात् सौवें स्थान पर कब्जा किया। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को अवश्य ही सातवाँ स्थान मिला है किन्तु उन्हें ‘राजनीतिक’ मान लेना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है। मेरे कस्बे में आनेवाले किसी भी अखबार ने ग्यारहवें से लेकर नब्बेवें स्थान तक की सूची नहीं छापी है इसलिए नहीं पता कि इन अस्सी स्थानों पर कौन-कौन विराजमान हुए।


व्यावसायिक वर्गों की सूची में शिक्षकों को पहला, अग्नि शमन सेवाओं को दूसरा, किसानों को तीसरा, वैज्ञानिकों और सशस्त्र बलों को संयुक्त रूप से चैथा स्थान मिला है। चिकित्सकों, विमानचालकों और शल्य चिकित्सकों को इनके बाद स्थान मिला है।
‘रीडर्स डाइजेस्ट’ ने साफ-साफ कहा कि सर्वेक्षण के ये परिणाम पूरी तरह से वैज्ञानिक नहीं हैं किन्तु इसके बावजूद, ये जनमानस को प्रतिबिम्बित तो करते ही हैं।


इस सूची पर मैंने जितने भी मिलनेवालों से चर्चा की, राजनीतिक लोगों को खारिज किए जाने पर प्रत्येक ने, चहकते हुए प्रसन्नता ही व्यक्त की। साफ था कि यदि उन्हें भी सर्वेक्षण में शामिल होने का मौका मिलता तो वे भी नेताओं को अन्तिम स्थान ही देते।


मैं हैरान हूँ। चिन्तित भी। मैं अपने राजनेताओं को प्रथम दस में देखना चाहता हूँ। हमने संसदीय लोकतन्त्र अपनाया है जिसके संचालन और क्रियान्वयन का एक मात्र माध्यम है - राजनीति। यह त्रासद विडम्बना ही है कि आज राजनीति सबसे गन्दी चीज और राजनेता सबसे घटिया, सर्वथा अविश्वसनीय साबित किए जा चुके हैं। हमारे नेताओं को हमने ही तो ‘नेता’ बनाया हुआ है! हम ही इन्हें चुन कर भेजते हैं। जैसे हम हैं, वैसे ही हमारे नेता हैं। यदि ‘नेता’ हमारे समाज का सबसे घटिया और हेय कारक बन कर रह गया है तो यह तो हमारी ही विफलता नहीं है? हम अपने आप को ही नहीं लतिया रहे हैं? हम कैसे लोग हैं कि अपनी ही बनाई हुई मूर्तियों को अपूजनीय घोषित कर, उन्हें तोड़ कर खुश हो रहे हैं? हम ही तो वह कच्चा माल हैं जिससे नेता नामवाला ‘फिनिश्ड प्रॉडक्ट’ ‘लोक फैक्ट्री’ से बाहर आ रहा है। अपनी ही बनाई मूर्तियों को तोड़कर खुश होनेवाले हम लोग कब विचार करेंगे कि अपनी घटिया गुणवत्ता के लिए खुद मूर्ति कभी दोषी नहीं होती। कहा गया है कि मूर्ति इसलिए पूजनीय नहीं होती क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। वह तो इसलिए पूजनीय होती है क्योंकि वह हथौड़े-छेनियों के असंख्य प्रहार सहती है। हम मूर्तियाँ तो बनाते हैं किन्तु तराशने का परिश्रम करने से बचते हैं। भाटे (पत्थर) पर सिन्दूर पोत कर उसे देवता बना कर छोड़ देते हैं और जब यह देवता हमारी मनोकामनाएँ पूरी नहीं करता तो हम देवता को ही खारिज कर देते हैं।


मेरी सुनिश्चित धारणा है कि यदि ‘लोक’ अपनी भूमिका नहीं निभाएगा तो ‘तन्त्र’ हावी होकर ‘लोकतन्त्र’ को ‘तन्त्रलोक’ में बदल देगा। दिन-प्रति-दिन, आईएएस अफसरों के बिस्तरों, पेटियों से बरामद हो रहे करोड़ों रुपये यही साबित भी कर रहे हैं।


सो, नेताओं को सर्वाधिक अविश्वसनीय साबित कर, खुश होने के बजाय हमें अपनी गरेबाँ में झाँकना पड़ेगा और नेताओं को चुनने के बाद उन्हें नियन्त्रित करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ेगी। हमारी, स्वार्थपरक चुप्पी के चलते प्रत्येक नेता यह मानने लगता है कि वह जो कर रहा है, कह रहा है वही उचित है क्योंकि उसकी किसी भी कारस्तानी पर लोग तो प्रतिवाद करते ही नहीं। मेरा सुनिश्चित मानना है कि हममें से प्रत्‍येक को ‘राजनीतिक’ होना चाहिए और होना पडेगा। ध्‍यान देनेवाली बात है कि मैं ‘राजनीतिक’ होने की बात कर रहा हूँ, ‘राजनीतिज्ञ’ होने की नहीं। आज हम राजनीति को सडांध मार रही गन्‍दी नाली मान कर, अव्‍वल तो उसके पास से गुजरने में ही परहेज करते हैं और यदि गुजरना पडता है तो नाक पर रूमाल रख कर, उससे ऑंख बचाकर निकल जाते हैं। अपने इस व्‍यवहार पर हमें अविलम्‍ब ही पुनर्विचार करने की आवश्‍यकता है।

मुझे इस बात की तो खुशी है कि विश्वसनीय व्यावसायकि वर्गों की सूची में शिक्षकों को पहला स्थान मिला किन्तु इससे अधिक चिन्ता इस बात पर हुई कि न्यायपालिका और पत्रकारिता को इस वर्ग-सूची में कहीं स्थान नहीं मिला। मैं बीमा एजेण्ट हूँ और प्रतिदिन अनेक लोगों से मिलता हूँ। मैंने अनुभव किया है कि तमाम स्खलनों के बाद भी लोगों को आज तीन संस्थानों में सर्वाधिक विश्वास और सर्वाधिक अपेक्षा है। ये हैं शिक्षक, न्यायपालिका और पत्रकारिता। किन्तु इस सूची में अन्तिम दो कहीं नहीं हैं।


तो क्या हमारे लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ रसातल में धँस गए हैं? विधायिका (राजनेता) का नम्बर अन्तिम दस में आता है, कार्यपालिका (अधिकारी/कर्मचारी) के करिश्मों से अखबार पटे पड़े हैं। न्यायपालिका और पत्रकारिता को सर्वाधिक विश्वसनीयता की इस सूची में स्थान ही नहीं मिला।


क्या अब भी हम हाथ पर हाथ धरे, चुप ही बैठे रहेंगे? हम किस अवतार की, कौन से चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
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वे बताएँगे और मनवाएँगे हमारे त्यौहार

क्या धुलेण्डी और क्या रंग पंचमी! दोनों ही इस बार लगभग बेरंगी निकलीं। कोई दूसरा त्यौहार होता तो इतना नहीं खटकता किन्तु होली ही तो वह इकलौता त्यौहार है हमारा जिसमें सब एक रंग हो जाते हैं। बाकी सारे त्यौहार तो कहीं न कहीं सीमा रेखा खींचे रखते हैं। होली ही तो वह त्यौहार है जो सबको निर्बन्ध, उन्मुक्त होने का और मुक्त कण्ठ से ‘होली है’ चिल्लाने का अवसर समान रूप से उपलब्ध कराता है। त्यौहारों और उत्सवों की भीड़ में यही तो एकमात्र समाजवादी त्यौहार है! किन्तु इस बार इसके रंगों की शोखी में और लोगों के उत्साह में एकदम कमी अनुभव हुई।


धुलेण्डी को सवेरे अचानक ही तबीयत गड़बड़ हो गई। रक्त चाप अचानक ही बढ़ गया। इतना कि बिस्तर पकड़ना पड़ा। दीपावली की तरह होली भी हमारी कॉलोनी में सामूहिक रूप से मनती है। पूरी कॉलोनी के पुरुष पूरी कॉलोनी में घर-घर जाकर होली खेलते हैं और मुँह मीठा करते हैं। प्रत्येक गली में, मकानों के सामने मिठाइयों और नमकीन पकवानों की टेबलें सज जाती हैं।


टेबलें तो इस बार भी उतनी ही सजीं लेकिन आने वालों की संख्या लगभग एक तिहाई रह गई। उन्हीं में से कुछ कृपालुओं ने अन्दर आकर मुझे रंग लगाया। मुझे लगता रहा, बाहर सब कुछ परम्परानुसार ही चल रहा होगा। किन्तु कोई पाँच-सात मिनिट में ही बड़ा बेटा वल्कल और मेरी उत्तमार्द्ध अन्दर आ गए। मैंने टोका - ‘दोनों अन्दर आ गए हो, बाहर, घर के सामने अपनी ओर से कौन खड़ा है?’ वल्कल ने कहा - ‘सब निपट गया पापा।’ मैंने अविश्वास से पूछा - ‘इतनी जल्दी? ऐसे कैसे?’ वल्कल ने जवाब दिया - ‘इस बार तो लोग आए ही नहीं।’ इस कॉलोनी में यह मेरी छठवीं होली थी। इससे पहलेवाले पाँच सालों में, हर बार हम लोगों को, आनेवालों का स्वागत करने में बीस-पचीस मिनिट लगते थे । उसके बाद भी लगता था कि कई लोग छूट गए हैं। किन्तु इस बार यह क्या हुआ? मुझे लगा कि मेरी तबीयत तो यह समाचार सुनने के बाद खराब होनी चाहिए थी।


लगभग पूरा दिन सोता रहा। किन्तु जब-जब भी आँख खुली, गली में आने-जानेवालों की हलचल ध्यान से सुनने की कोशिश करता रहा। मुझे निराशा मिली। मेरी गली के बच्चों के अलावा, हुड़दंगियों की एक भी टोली नहीं निकली। उधर टेलीविजन पर होली के सिवाय कुछ भी नहीं था। प्रत्येक चैनल पर होली के रंग, होली की बहार और होली की मस्ती छाई हुई थी। चैनलें तो सारे देश में होली की मौजूदगी की खबर दे रही थीं जबकि मेरी गली में सन्नाटा था।


रंग पंचमी तो इससे भी अधिक फीकी निकली। दिन भर घर में ही था। प्रतीक्षा करता रहा कि कोई न कोई तो रंग लगाने आएगा ही। लेकिन कोई नहीं आया। घबरा कर दो-एक बार गली में, इस छोर से उस छोर तक देखा - एक भी ऐसा संकेत या हलचल नहीं जो रंग पंचमी होने का अहसास कराए।


होली पर दोनों बेटे घर आए जरूर किन्तु मानो खानापूर्ति करने। वल्कल एक बहुराष्ट्रीय कम्प्यूटर कम्पनी में काम करता है। वह शनिवार की रात आठ बजे पहुँचा। आया बाद में, जाने की तैयारी पहले करने लगा। उसे धुलेण्डी के दिन ही लौटना था। सो, कौन सी ट्रेन, कितने बजे जाएगी, बार-बार यही चिन्ता करता रहा। इतना ही नहीं, नौकरी का काम भी लेकर आया जिसे शनिवार और रविवार की रातों में देर तक लेप टॉप पर निपटाता रहा।


छोटा बेटा रविवार रात कोई दस बजे पहुँचा। वह इंजीनीयरिंग के तीसरे साल (छठवें सेमेस्टर) में है। कोचिंग क्लास और डांस क्लास की एक प्रतियोगिता के कारण वह जल्दी नहीं आ पाया। वह आया तब तक मोहल्ले की होली जल चुकी थी। वह लस्त-पस्त हालत में आया था। आते ही जो सोया तो धुलेण्डी की दोपहर में उठा। तब तक सामूहिक होली मिलन की खानापूर्ति हो चुकी थी और गली में सन्नाटा छा चुका था। वल्कल तो चूँकि सामूहिक होली मिलन में घर का प्रतिनिधित्व कर रहा था सो उसे तो रंग लगा। किन्तु तथागत पर तो रंग का एक छींटा भी नहीं पड़ा।


घर में आनन्द तो छाया हुआ था किन्तु होली का नहीं, दोनों बेटों के आने का। मुझे लगा (और अभी भी लग रहा है) कि सब कुछ बदल रहा है। आनेवाले दिनों में, त्यौहारों पर बच्चे आएँ या न आएँ किन्तु बच्चों का घर आना ही त्यौहार होगा।


धुलेण्डी को मोबाइल दिन भर ‘बीप-बीप’ करता रहा। धड़ाधड़ एसएमएस आए जा रहे थे। एसएमएस के शुभ कामना सन्देश मुझे नहीं रुचते। फिर भी, भेजनेवाले का नाम जानने की उत्सुकता के अधीन एसएमएस पढ़ता रहा। सन्देशों की भीड़ में एक सन्देश ऐसा मिला जिसमें होली की बधाई के स्थान पर नसीहत दी गई और आग्रह किया गया था कि इस नसीहत को अधिकतम लोगों तक पहुँचाऊँ। नसीहत इस प्रकार थी - ‘कृपया होली, रंग पंचमी पर रंग खेलने से बचें और दूसरों को भी निरुत्साहित करें। अपना एक और अमूल्य दिन व्यर्थ न जाने दें। कामकाजी (प्रोडक्टिव) बनें। समय, ऊर्जा और पानी नष्ट न करें। कृपया इस सन्देश को अधिकाधिक लोगों को फारवर्ड भी करें।’


बदलाव की बयार चल पड़ी है। त्यौहार खानापूर्ति बन कर रह जानेवाले हैं। टेलीविजन की चैनलें और रेडियो के कार्यक्रम ही हमें त्यौहारों की सूचना देंगे और वे ही हमारे त्यौहार मनवाएँगे भी।
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उठावने का निमन्त्रण


चीजें अचानक नहीं बदलतीं। धीरे-धीरे ही बदलती हैं। इतनी धीरे-धीरे कि उनके बदलने का आभास भी नहीं होता। यह धीमापन, बदलाव को स्वाभाविकता प्रदान करता लगता है। किन्तु वह परिवर्तन ही क्या जो अपने होने की प्रतीति न कराए! सो, यह प्रतीति होती तो है किन्तु अचानक ही। ऐसे ‘अचानक-क्षण’ में ही अनुभव होता है कि चीजें बदल गई हैं। यह ‘अचानक क्षण’ ही इस प्रतीति को आश्चर्य में बदल देता है। तब ही चीजों के बदलाव पर भी अचरज होता है।


देख रहा हूँ कि बोलचाल में आदरसूचक शब्दावली गुम होती जा रही है। गुम यदि नहीं भी हो रही है तो कम तो हो ही रही है। बहुत पुरानी बात नहीं है, आठ-दस बरस पहले तक ‘सुनिएगा’, ‘आइएगा’, ‘लीजिएगा’, ‘दीजिएगा’ जैसे आदरसूचक शब्द प्रयुक्त होते थे। अचानक ही मेरा ध्यान गया कि इनके स्थान पर ‘सुनना’, ‘लेना’, ‘आना’, ‘देना’ जैसे रूखे और अक्खड़ शब्दों ने ले लिया है। ये सब शब्द यूँ तो पहले से ही मौजूद थे किन्तु अन्तरंग और अनौपचारिक सम्वादों में ही जगह पाते थे। किन्तु अब तो इन्हीं का बोलबाला है-वहाँ भी, जहाँ इनका होना रुचिकर नहीं होता।


मेरी बीमा एजेन्सी को अभी-अभी उन्नीस वर्ष पूरे हुए हैं। मेरा धन्धा ही ऐसा है कि ग्राहक की तलाश में मुझे घर-घर जाना पड़ता है-कभी समय लेकर तो कभी समय लिए बिना। कोई एक दशक पहले तक ‘आइए बैरागीजी’ या फिर ‘आइए अंकल’ से अगवानी होती थी। गृह स्वामी के आने में देर होती तो बच्चे कहते - ‘आप बैठिए अंकल। पापा अभी आते हैं।’ अब बदलाव आ गया है। अब ‘आओ बैरागीजी’ या फिर ‘आओ अंकल’ और ‘अंकल आप बैठो। पापा अभी आते हैं।’ सुनने को मिलता है। सुनने में तनिक अटपटा लगता है किन्तु यह देख कर तसल्ली होती है कि आदरभाव में कहीं भी कमी नहीं-न मन में, न आँखों में।


अठारह जनवरी की शाम भोपाल पहुँचा था। भाई विजय वाते ने गाड़ी स्टेशन पर भिजवा दी थी। सीधा उनके दफ्तर पहुँचा था। घर लौटते हुए उन्हें रास्ते में, उद्घाटन के एक छोटे से आयोजन में शरीक होना था। हम दोनों आयोजन स्थल पर पहुँचे तो सन्नाटा था। समय पर जो पहुँच गए थे! वहाँ बैठ कर वक्त काटना भी सम्भव नहीं लग रहा था। विजय को हल्की सी भूख लग आई थी। सो, हमीदिया रोड़ स्थित मनहर डेयरी पहुँच गए। टेबल पर बैठने के कुछ ही पलों में वेटर आ गया। बोला - ‘बोलो साहब! क्या लाऊँ?’ मुझे हैरत हुई। एक तो भोपाल जैसा तहजीबदार शहर उस पर मनहर डेयरी जैसा प्रतिष्ठित संस्थान्! वेटर की भाषा मुझे हजम नहीं हुई। स्वल्पाहार करने के बाद निकलते समय मैंने मैनेजर को अपनी भावनाएँ जताईं। उसने माफी माँगी और बोला -‘आप अगली बार आओगे तो शिकायत का मौका नहीं पाओगे।’ मैनेजर ने मेरा भ्रम दूर कर दिया। वेटर पर आए गुस्से का स्थान हँसी ने ले लिया। ‘आओगे, पाओगे’ के लिए मैंने हँसते-हँसते, मैनेजर का शुक्रिया अदा किया।
भाषा का यह बदलाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान रूप से आया अनुभव हो रहा है। शोक सन्दर्भों में केवल सूचनाएँ देने का लोक प्रचलन है। जैसे कि फलाँ की माताजी का देहावसान हो गया है। अन्तिम यात्रा इतने बजे निकलेगी और दाह संस्कार फलाँ श्मशान में होगा। यही स्थिति उठावने (या कि तीसरे) की सूचना देने में भी होती है। लेकिन यहाँ भी बदलाव आ गया है। एक पखवाड़े पहले, फोन पर एक किशोर ने टेलीफोन किया -‘अंकल! आपके फ्रेण्ड वीरेन्द्रजी की सासूजी और मेरी दादीजी का उठावना कल सवेरे साढ़े दस बजे सूरज हॉल पर रखा है। आपको आना है। आईएगा जरूर। हम सब आपकी राह देखेंगे।’


इसी तरह, शोक पत्रिकाओं में मृत्यु की और उत्तर क्रियाओं की केवल सूचना देने की परम्परा रही है। जैसे ‘हमारी माताजी का स्वर्गवास फलाँ दिनांक को हो गया है जिनका उत्तरकार्य निम्नानुसार रखा गया है।’ इसके बाद विस्तृत कार्यक्रम दिया रहता है। बदलाव ने इसे भी प्रभावित किया है। गए दिनों मुझे दो शोक पत्रिकाएँ ऐसी मिलीं जिनमें ‘अवश्य पधारिएगा’ का आग्रह भी किया गया था।


ये शोक पत्रिकाएँ देख/पढ़कर किस्सा याद आ गया। किस्सा कितना सच है, नहीं जानता किन्तु एक बार कहीं पढ़ा भी है और दो-तीन बार, समझदारों के मुँह सुना भी है। किस्से के अनुसार महावीर और बुद्ध समकालीन थे। महावीर कनिष्ठ और बुद्ध वरिष्ठ थे। एक बार दोनों की भेंट हो गई। महावीर ने जिज्ञासा प्रकट की - ‘जन्म यदि उत्सव है तो मृत्यु क्या है?’ बुद्ध ने उत्तर दिया - ‘मृत्यु महोत्सव है।’ शोक सन्दर्भों में आ रहा यह बदलाव मृत्यु को शोक के बजाय महोत्सव का स्थान दिलाता अनुभव हुआ।


जानता हूँ कि मुझे अच्छा लगे या नहीं, बदलाव तो शाश्वत और अनवरत प्रक्रिया है। बदलाव का सुख लेने के लिए खुद को ही बदलना पड़ेगा। नहीं बदलूँगा तो मेरे सिवाय और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
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उत्सव: सरकार के या हमारे?


अपने उत्सव मनाने के लिए हम सरकार पर निर्भर हो गए हैं? अब सरकार तय करेगी कि हम अपने उत्सव मनाएँ या नहीं? हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ और लोकोत्सव किसी जिम्‍मेदारी हैं-हमारी या सरकार की? अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को बनाए रखने के लिए हम सरकार की कृपा के मुहताज हो गए हैं? गए तीन दिन से ये और ऐसे ही अन्य प्रश्न बार-बार मेरे मन में उठ रहे हैं। इनमें से प्रत्येक का उत्तर मैं ‘नहीं’ में देना चाहता हूँ पर दे नहीं पा रहा हूँ।


बात शायद बहुत ही छोटी लगे किन्तु इसने मुझे असहज कर रखा है। रतलाम जिले में एक छोटा सा कस्बा है - ताल। यह आलोट तहसील का हिस्सा है। यहाँ रंग पंचमी समारोहपूर्वक मनाई जाती है। रंग पंचमी की पूर्व सन्ध्या पर मूर्ख सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है। कोई पन्द्रह-सत्रह वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है। लोग इसकी प्रतीक्षा भी करते हैं और उत्साहपूर्वक इसकी तैयारी भी। एक दिन के लिए यह कस्बा मानो अपने आप को भूल जाता है। ‘रंग पंचमीमय’ हो जाता है।


जिला प्रशासन प्रति वर्ष आलोट तहसील के लिए इस दिन का स्थानीय अवकाश घोषित करता आया है। इस बार ऐसा नहीं हुआ। स्थानीय अवकाश घोषित करना जिला प्रशासन (कलेक्टर) का अधिकार है किन्तु कलेक्टर को दो या तीन स्थानीय अवकाश का ही अधिकार रहता है। जिले की स्थानीय आवश्यकताओं और महत्वानुसार वह ये अवकाश घोषित करता है। इस बार यह स्थानीय अवकाश शायद किसी दूसरे त्यौहार के लिए प्रयुक्त कर लिया गया। ताल निवासियों को यह कबूल नहीं हो पा रहा है।


तीन दिन पहले अखबारों में ताल का समाचार छपा जिसमें स्थानीय अवकाश घोषित करने के लिए कलेक्टर से तो माँग की ही गई, चेतावनी देते हुए चिन्ता जताई गई कि स्थानीय अवकाश घोषित नहीं करने से वहाँ के लोग इस वर्ष, पूर्वानुसार रंग पंचमी नहीं मना पाएँगे। मेरे लिए तय कर पाना कठिन था कि इसे चेतावनी भरी चिन्ता मानूँ या चिन्ता जनित चेतावनी?


इस समाचार ने ही मुझे असहज कर रखा है। लोकोत्सवधर्मिता हमारा संस्कार है या राज्याश्रय?यह हमारी उत्सवप्रियता है या अवकाशप्रियता? क्या हम वे त्यौहार ही मनाते हैं जिनके लिए सरकारी अवकाश घोषित होता है? इसके समानान्तर यह सवाल भी उठता है कि जिन त्यौहारों के लिए सरकारी अवकाश घोषित होते हैं, क्या वे सब त्यौहार हम सचमुच में मनाते हैं?ईद, क्रिसमस, गुड फ्रायडे, नानक जयन्ती आदि ऐसे त्यौहार हैं जिनके लिए सरकारी अवकाश घोषित होते हैं किन्तु अधिसंख्य लोग इन्हें नहीं मनाते। ये त्यौहार मनाना तो दूर की बात है, इन त्यौहारों से जुड़े अपने कितने मित्रों को हम बधाइयाँ देते हैं, अभिनन्दन करते हैं? इसके विपरीत, अभी-अभी आई संक्रान्ति पर सरकार ने छुट्टी घोषित नहीं की थी किन्तु स्कूल वीरान थे। मुझे कलेक्टोरेट में कुछ काम था। गया तो देखा कि अधिकांश कर्मचारी, कार्यालय के बाहर ही गिल्ली डण्डा खेल रहे हैं। जो स्थिति थी, उसे देखकर मेरी ही हिम्मत नहीं हुई कि अपने काम की बात करता। चुपचाप चला आया।


छब्बीस जनवरी, पन्द्रह अगस्त हमारे लिए ‘अवकाश’ से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। इस दिन लगभग सारे के सारे आयोजन शासकीय स्तर पर ही होते हैं। अशासकीय स्तर पर आयोजित होनेवाले समारोह किसी भी शहर/कस्बे में या तो होते ही नहीं हैं और यदि होते भी हैं तो अंगुलियों के पोरों पर गिने जा सकने की संख्या में। दो अक्टूबर को कितने लोग गाँधी को याद करते हैं? गाँधी जयन्ती भी हमारे लिए ‘अवकाश’ से कम या ज्यादा और कुछ नहीं है।


हरतालिका तीज पर मध्य प्रदेश सरकार महिलाओं को विशेष अवकाश देती है। मेरी उत्तमार्द्ध जिस शासकीय स्कूल में अध्यापक है वहाँ कुल तीन अध्यापक हैं और तीनों ही महिलाएँ। स्थिति यह है कि महिलाओं को विशेष अवकाश तो दिया गया किन्तु विद्यालय का अवकाश नहीं था। सो, विद्यालय तो खुलना ही था। ऐसे में क्या किया जाए? तीनों महिलाओं ने एक दूसरे की चिन्ता की और तीनों ही विद्यालय आईं और अपना-अपना व्रत भी निभाया। यह विशेष अवकाश ऐसा नहीं था जिसके बदले में कोई दूसरा अवकाश मिल जाए।


ताल का समाचार पढ़ते-पढ़ते यही सब बातें मुझे याद आ रही थीं। केवल मालवा और मध्य प्रदेश ही नहीं, समूचा भारत उत्सवधर्मी और उत्सवप्रेमी समाज है। इसीलिए तो हमारे उत्सव, लोकोत्सव हैं! हम इन्हें सरकारी उत्सव बनाने पर तो आमादा नहीं हो गए? यदि रामनवमी पर सरकारी अवकाश नहीं हो तो हम अपने आराध्य का जन्मोत्सव मनाने के लिए एक आकस्मिक अवकाश (सी एल) की कीमत भी शायद ही चुकाएँ।


यदि स्थितियाँ सचमुच में ऐसी ही बन रही हैं तो हमें अपनी मानसिकता, अपनी वैचारिकता, अपने आचारण पर फौरन ही विहंगम दृष्टिपात करने की आवश्यकता है। सांस्कृतिक परम्पराएँ और लोकोत्सव यदि राज्य की कृपा पर छोड़ दिए जाएँगे तो हम मनुष्य भी नहीं रह पाएँगे। फिर तो हम ‘प्राणवान यन्त्र’ बन कर रह जाएँगे।


मैं कुछ गलत सोच रहा हूँ?

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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

मेरी ‘सच्ची-सच्ची’ भाभी

ईश्वर सब सुख एक साथ कभी नहीं देता। इसे चाहें तो ‘कोई न कोई कसर रख ही देता है’ कह दें या फिर यह कि वह किश्त-किश्त में सुख देता है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ-तीन रात और लगभग सवा दो दिनों तक सुख सागर में गोते लगाने के बाद भी एक सुख की कसर रह गई।


बरसों बाद विजय और कल्पना भाभी के सान्निध्य में इस बार इतना समय रहने का मौका मिला। विजय और कल्पना भाभी याने श्री विजय वाते और अ। सौ. कल्पना वाते। जब-जब इनके साथ रात-दिन रहने का मौका मिला तब-तब हर बार ऐसी ही कसर रह गई।


कल्पना भाभी को मैं ‘सच्ची-सच्ची’ भाभी कह सकता हूँ। जब-जब भी वाते दम्पति की मेजबानी एक समय या थोड़ी ही देर के लिए मिलती है तब-तब ‘सच्ची-सच्ची भाभी’ मुझे तब तक झूठा घोषित करती रहती हैं जब तक कि मैं उनसे सहमत न हो जाऊँ। अब तो मुझे असहमति के पहले ही क्षण से मुझे मालूम रहता है कि मुझे अन्ततः सहमत होने के लिए समर्पण करना ही पड़ेगा-यही मेरी नियति है, फिर भी मैं इससे बचने की यथसम्भव, यथाशक्ति कोशिश करता रहता हूँ क्योंकि तब मैं सच बोल रहा होता हूँ जिसे कि ‘सच्ची-सच्ची भाभी’ झूठ ही मानती हैं। मेरा सच उन्हें कभी सच नहीं लगा। सदैव झूठ ही लगा और ऐसी दशा में, जब हारकर, खुद के साथ होने वाली (जो कि वस्तुतः ‘सच्ची-सच्ची भाभी द्वारा की जाने वाली’ होती है) ज्यादती के लिए खुद को तैयार कर मैं उनसे सहमत हुआ, उन्होंने हर बार अपनी जीत से खुश होकर, तपाक् से पूछा - ‘पहले ही सच बोलने में क्या जा रहा था?’
यह सब होता रहा है (और मुझे आकण्ठ विश्वास है कि कल्पना भाभी कभी नहीं बदलेंगी इसलिए आगे भी ऐसा ही होता रहेगा) मेरे भोजन करने को लेकर।



भोपाल यात्रा में मैं जब-जब भी, समय-असमय विजय के यहाँ पहुँचा, तब-तब कल्पना भाभी ने हर बार पूछा -‘विष्णु भैया! खाना खाआगे ना?’ मैंने शायद ही कभी, पहली ही बार में हाँ भरी हो। मैं या तो भोजन करके पहुँचता या कहीं न कहीं मेरा भोजन करना तयशुदा रहता। सो मैं हर बार कहता - ‘नहीं भाभी! मैं खाना नहीं खाऊँगा।’ कल्पना भाभी इस जवाब के लिए तैयार तो रहतीं किन्तु सहमत एक बार भी नहीं रहीं। हर बार बोली - ‘देखो! झूठ मत बोलो। सच्ची-सच्ची बोलो, खाना खाओगे?’ मेरा इंकार और कल्पना भाभी का ‘सच्ची-सच्ची बोलो’ का इसरार देर तक चलता। इस दौरान वे हाथ के काम निपटाती रहतीं लेकिन मुझे ‘टारगेट’ पर बनाए रखतीं। कभी अखबार पढ़ते हुए, कभी तैयार होते हुए विजय इस स्थिति में मेरी दशा के मजे लेता रहता और दो-एक शेर दाग देता। पति-पत्नी एक दूसरे को देख कर हँसते, मुझे अजीब सा लगता। कोई दस-बीस बार कल्पना भाभी ‘देखो! झूठ मत बोलो। सच्ची-सच्ची बोलो’ की चेतावनी देकर मुझे ‘झूठा’ साबित कर चुकी होतीं। मुझे अजीब लगता-मेरे मुँह पर ही मुझे झूठा कहा जा रहा है। बीच में विजय एक-दो बार हँसते-हँसते कहता-‘नतीजा तुम्हें पता है। फिर क्यों वर्जिश कर रहे हो और करा रहे हो?’ मुझे और अजीब लगता। जी करता, जूलीयस सीजर की तरह विजय से पूछूँ -‘विजय! तुम भी?’ किन्तु आज तक नहीं पूछ पाया। जानता हूँ, विजय को मेरे साथ नहीं, कल्पना भाभी के साथ रहना है।



सच पर मेरा अड़ा रहना एक बार भी सफल नहीं हो पाया। भरपूर जोर आजमाइश के बाद अन्ततः मैं कहता-‘हाँ। खाना खाऊँगा।’ कल्पना भाभी बस ताली नहीं बजाती, अपनी मनुहार का मनोनुकूल परिणाम मिलते ही खूब खुश होकर कहती-‘मैं तो शुरु से ही जानती थी कि झूठ बोल रहे हो। पहले ही सच बोलने में क्या जा रहा था?’ ऐसे प्रत्येक अवसर पर मैं रुँआसा होकर, असहाय, बेबस होकर चुपचाप सब कुछ देखने-सुनने के सिवाय और कुछ भी नहीं कर पाता। किन्तु कल्पना भाभी के चेहरे पर खुशी का बरगद उग आता। जानती तो वे भी रहती होंगी कि मैं झूठ नहीं बोल रहा किन्तु मैं उनके यहाँ से भोजन किए बगैर नहीं लौटूँ, यह उनकी अदम्य इच्छा रहती रही होगी जिसकी पूर्ति के लिए ही वे मुझे सहजता से असत्यवादी साबित और घोषित करती रहतीं, देर तक, लगातार, बार-बार।



किन्तु कल्पना भाभी ने इस बार एक बार भी मुझे झूठा साबित नहीं किया। मुझे अच्छा तो लग रहा था किन्तु समझ नहीं आ रहा था कि भाभी ऐसा क्यों कर रही हैं। दो समय का भोजन मैंने कर लिया और भाभी ने एक बार भी ‘सच्ची-सच्ची बोलो’ नहीं कहा! अचेतन में इच्छा होने लगी कल्पना भाभी एक बार तो मुझे झूठा साबित कर दे। उनका व्यवहार मुझे असहज लग भी रहा था और असहज कर भी रहा था। आशंका हुई - भाभी बीमार तो नहीं? लेकिन देख रहा था कि वे पूर्ण स्वस्थ और सामान्य, सहज बनी हुई हैं।



अठारह जनवरी की रात वहाँ पहुँचा था और इक्कीस की सवेरे उनसे बिदा ली। दिन में ‘लियाफी’ (भारतीय जीवन बीमा निगम के एकमात्र राष्ट्रीय संगठन) के झोनल प्रतिनिधियों और भाजीबीनि के क्षेत्रीय प्रबन्धक की संयुक्त बैठक थी। वह निपटा कर शाम पाँच बजे, रतलाम के लिए रेल में बैठा तब भी कल्पना भाभी का यह बदला हुआ व्यवहार मन पर छाया हुआ था।



रेल चली और बैरागढ़ पहुँचती उससे पहले ही मेरी ट्यूब लाइट चमकी और अपनी कमअक्ली पर मैं खुद ही ठठा कर हँस पड़ा-इतने जोर से कि आसपास बैठे यात्री मेरी ओर देखने लगे। मैंने खुद से कहा -‘हे! मूर्ख श्रेष्ठ, तुम जब वहीं रुके हुए हो तो यह तो तय है कि तुम्हें भोजन वहीं करना है। ऐसे में पूछताछ की गुंजाइश ही कहाँ बनती? इसके उल्टे, कल्पना भाभी भोजन के लिए पूछती तो वह अटपटा ही नहीं, अशालीन भी होता। बच्चू! भोपाल यात्रा में जब भी कभी केवल मिलने जाओगे तो कल्पना भाभी को उनके उसी ‘सच्ची-सच्ची’ वाले मूलस्वरूप में पाओगे।’



अपने आप से हुए इस एकालाप के चलते, कब मेरी आँखें धुँधला गईं, मुझे पता ही नहीं चला। अपनी इस दशा पर, टेलीविजन पर सुना एक शेर अचानक ही याद आ गया - ‘जिन्हें हम कह नहीं सकते, जिन्हें तुम सुन नहीं सकते। वही कहने की बाते हैं, वही सुनने की बाते हैं।’ इस समय जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तब ऐसी ही न कही जा सकनेवाली बातें मन पर छा गई हैं।



कल्पना भाभी के सामने शायद नहीं कह पाऊँ। यहीं लिख देता हूँ - ‘शुक्रिया मेरी सच्ची-सच्ची भाभी! खुद को आपसे झूठा साबित करवाने मैं जल्दी ही भोपाल आऊँगा।’


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अकेला करता धर्म

अकेला करता धर्म
कुछ बातें सुनने में तो तत्काल अच्छी लगती हैं किन्तु समझ में बाद में आती हैं। होना तो यह चाहिए कि दोनों ही स्थितियों में आनन्दानुभूति हो किन्तु आवश्यक नहीं कि ऐसा हो ही। कुछ ऐसा ही में गए कुछ दिनों से अनुभव कर रहा हूँ। जब भी यह बात मन में आती है, मन कसकने लगता है।


देख रहा हूँ कि ‘नमस्कार’ और ‘नमस्ते’ जैसे पारम्परिक और लोक स्वीकृत अभिवादन लुप्त होते जा रहे हैं। अब अभिवादन के स्थान पर लोगों की धार्मिक, पांथिक अथवा किसी सन्त/गुरु के प्रति आस्था और प्रतिबद्धता जताने वाली शब्दावली या शब्द-युग्म सुनने को मिलते हैं। सम्भव है कि गाँवों में अब भी सब कुछ वैसा का वैसा ही हो किन्तु कस्बों, नगरों में स्थिति तेजी से बदलती जा रही है।


जिस गाँव के मन्दिर की पूजा मेरे परिवार का जिम्मा रही है वह गाँव पीपलोन (जिसे बोलचाल में पीपण अथवा फीफण उच्चारा जाता है) बहुत ही छोटा है। आज का तो पता नहीं किन्तु मैंने जब मनासा छोड़ा तो वह मुश्किल से सौ-सवा सौ घरों की बस्ती हुआ करता था। मीणा पटेल और गायरी समाज का प्रभुत्व था उस गाँव में। कुछ घर माली समाज के थे। वहाँ का चौकीदार था मेहताब खाँ मेवाती। वह अकेला गैर हिन्दू परिवार था उस गाँव में। ‘राम! राम!’ या ‘जै रामजी की’ कह कर परस्पर अभिवादन किया जाता था। मेहताब भी यही कह कर अभिवादन करता था और हम लोग भी ‘राम-राम मेताब भई’ कह कर ही अभिवादन करते थे। एक बार मैंने सहज जिज्ञासावश पूछ लिया था -‘मेताब भई! तुम तो मुसलमान हो! फिर राम-राम क्यों कहते हो?’ जवाब में उसने चा चौंक कर, अपनी ठोड़ी खुजलाते हुए कहा था - ‘अरे! बब्बू माराज! तुमने याद दिलाया तो याद आया कि मैं मुसलमान हूँ।’ बात इससे आगे नहीं बढ़ी।


मनासा मेरा पैतृक गाँव है। हमारा मकान, गाँव के उत्तर में, सबसे अन्तिम से पहले वाले, धोबी मुहल्ले की पुरबिया गली में है। मोहल्ले में कुछ मुसलमान परिवार थे। आज भी होंगे। कुछ सब्जी बेचते थे तो कुछ ऊँटों पर जंगल से लाद कर लकड़ी लाकर बेचा करते थे। एक सब्जी विक्रेता मोहम्मद भाई हमारा किरायेदार था। ये सब लोग या तो पहनावे से (खास कर महिलाओं के पहनावे से) या फिर ईद-मुहर्रम जैसे त्यौहारों पर ही मुसलमान मालूम होते थे अन्यथा बोलचाल और रहन-सहन में इनमें भेद कर पाना कठिन होता था। मेरे अपंग पिताजी सवेरे-सवेरे, बाहर चबूतरे पर बैठ जाते थे। आने-जानेवाले स्त्री-पुरुष (जिनमें हिन्दू, मुसलमान सब हुआ करते थे) उनसे ‘जै रामजी की माराज’ या फिर ‘राम-राम माराज’ कह कर ही अभिवादन करते थे। मोहम्मद भाई भी इसी शब्दावली में अभिवादन करता था। पिताजी भी ‘राम-राम रे भई मम्मद’ कह कर ही उत्तर देते थे।


मनासा की सामाजिकता पर माहेश्वरी और जैन समाज (श्वेताम्बर और दिगम्बर, दोनों) का प्रभाव-प्रभुत्व है। वस्तुतः मनासा तो बसाया ही माहेश्वरियों और मीणाओं ने। बाजार पर माहेश्वरियों के प्रभुत्व के चलते माहेश्वरियों को ‘साहजी’ कह कर सम्बोधित किया जाता रहा है। सो, आज के मनासा की व्युत्पत्ति ‘मीणा-साह’ से हुई है। मुस्लिम समाज के लोग भी वहाँ भरपूर हैं। नगर पालिका के दो-एक वार्डों में तो मुस्लिम मतदाताओं का ही बाहुल्य है। किन्तु वहाँ भी अभिवादन के नाम पर सब कुछ पारम्परिक ही बना हुआ था। सबको पता था कि कौन किस समाज से है। अपना समाज या पंथ बताने के लिए किसी को अलग से कुछ कहना नहीं पड़ता था।


किन्तु आज काफी कुछ बदल गया है। जैसा कि मैने शुरु में कहा, ‘नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ अब लुप्त होता लग रहा है। अब लोग परस्पर अभिवादन नहीं करते। अभिवादन करने के नाम पर वे अपनी अलग पहचान बताते हैं। कोई ‘जय श्री कृष्ण’ कह कर तो कोई ‘राधे-राधे’ कह कर अपना सम्प्रदाय उजागर कर रहा है। कोई ‘जय जिनेन्द्र’ कह कर अपनी धार्मिक पहचान उजागर कर रहा है तो कोई इससे भी आगे बढ़कर ‘जय केसरियानाथ’ उच्चारकर ‘विशेष में विशेष’ बनता नजर आ रहा है। स्निग्ध और आत्मीयता भरे ‘जै रामजी की’ का स्थान भयभीत कर देने वाले स्वरों वाले ‘जय श्री राम’ ने ले लिया है। कोई ‘ओऽम्’ उच्चार कर अपने गुरु की पहचान बताता है तो कोई ‘हरि ओऽम्’ कह कर अपने गुरु की। ‘साँई राम’ या ‘जय साँई राम’ का घोष कर कोई अपने आस्था पुरुष के प्रति सम्मान जताता है तो कोई ‘साहेब बन्दगी’ कह कर। हर कोई अपनी-अपनी पहचान बताने की कोशिश में खुद को सबसे अलग कर रहा है। सुना और पढ़ा था कि अध्यात्म लोगों को जोड़ता है और धर्म लोगों को बाँटता है। जुमलेबाजी और वाणी विलास के लिहाज से यह वाक्य अच्छा लगा था। किन्तु उसे सच होते देखकर अच्छा नहीं लगता। ये सारे व्यवहार हिन्दू या सनातनी या गैर मुस्लिम, गैर ईसाई समुदाय की न केवल स्थायी पहचान बन गए हैं बल्कि अपने ऐसे व्यवहार पर प्रत्येक को गर्वानुभूति भी होती है। गोया, खुद को सबसे अलग कर हम खुश हुए जा रहे हैं और फूले नहीं समा रहे हैं।


क्या आपको नहीं लगता कि सुनी-पढ़ी हुई कुछ बातें वास्तविकता न बनें तो ज्यादा अच्छा लगता है?-----

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परसाई के वानर और स्वदेशी लँगोटधारी

(यह पोस्ट मेरे बेटे वल्कल के एक कक्षापाठी मित्र ने लिखी है। बाबुल सुप्रियो इसका वास्तविक नाम नहीं है। यह देखकर कि बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्यरत, 30 वर्षीय नौजवान को भी ऐसी बातों से पीड़ा होती है, उसके मन में क्षोभ उपजता है तो सच मानिए, मन को ठण्डक मिलती है और भारत के भविष्य के प्रति निश्चिन्तता उपजती है। बाबुल सुप्रियो इस समय कोरिया में है। यह पोस्ट उसने मुझे 27 जनवरी को भेजी थी। तब वह बेंगलुरु में ही था।)


प्रणाम सज्जनों,


बंगलुरू की सड़क किनारे आज मैंने एक होर्डिंग देखा जिसने मेरी कुछ यादें ताजा कर दीं। यादें, तब की जब भुट्टा, खीरा या ऐसा ही कुछ चना चबेना बटोर कर मनमानी से गप्प गोष्ठियों का मजा लिया जाता था ।


कुछ साल पहले मैंने परसाई का एक व्यंग्य पढ़ा था, जिसमें उन वानरों का उल्लेख था जो लंका युद्ध के दौरान मजे से समन्दर किनारे बैठे रहे । जब प्रभु (याने कि लंका विजय के बाद वाले राम) वापिस लौट रहे थे तो ये भी भीड़ में शामिल हो गए, और अपने हाथ पैर थोड़े खरोंच-खरूँच कर सेनानी होने का रोना रोने लगे (इच्छा थी की इसे स्वाँग कहूँ, लेकिन मेरे हिसाब से स्वाँग भरने में भी सृजनात्मक बुद्धि की जरुरत होती है) आज भी अपने यहाँ माँग मनवाने के लिए भाँति भाँति के रोने रोना ही सबसे कारगर तरीका है ।


एक बार सम्मान मिल गया तो ये दादाजी की तरह (या राशन वाली शक्कर की तरह) अपने मिलावटी किस्से सुनाने लगे । जैसे मैं कचोरी की क्वालिटी का अन्दाजा इस बात से लगाता हूँ कि इस सेठ की दुकान का कितना नाम है। शायद उसी तरह इन वानरों की नीतियों में (फैशन के दौर में गारण्टी की उम्मीद करने वाली) जनता को ज्यादा रस दीख पड़ा होगा, और अपना पाँच रुपये का नोट (कचोरी का नोट = वोट) उनको ही टिका दिया हो ।


शुरु में ये वानर, राम के रिप्रसेंटेटिव थे, बाद में ये जनता के रिप्रसेंटेटिव हुए। राम और जनता दोनों का मनमाना दूध निकाला गया। इसके बाद तो जो कुछ भी किस्सा पता है, उसमें अपना पचास पचपन साल का गौरवमय इतिहास सभी का रटा रटाया है।


यह रही लिंक
http://www.montblanc.com/products/11867.php मॉडल बनाम गाँधी जी के उस इश्तेहार की जिसमें स्वदेशी लँगोट धारी कह रहा है - ‘‘जाओ जी जाऽऽऽऽओ! बस इतना सुन लो! ये जर्मन पेन खरीद लो, कुछ चूडियाँ पहन लो, और चाहो तो एक घाघरा सिलवा लो।’


इति गणतन्त्र दिवस सिद्धम,


-बाबुल सुप्रियो

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छोटी-छोटी बातें

नहीं। वे तीनों परिहास नहीं कर रहे थे। उपहास तो बिलकुल ही नहीं कर रहे थे। मुझे आकण्ठ विश्वास और अनुभूति है कि वे तीनों मुझे भरपूर आदर और सम्मान देते हैं। हाँ, साप्ताहिक उपग्रह में मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में मेरे लिखे पर तनिक विस्मित होकर प्रसन्नतापूर्वक बात कर रहे थे। तीनों अर्थात् सर्वश्री डॉक्टर जयन्त सुभेदार, वरिष्ठ अभिभाषक मधुकान्त पुरोहित और डॉक्टर समीर व्यास।


अपनी और अपनी उत्तमार्द्ध की नियमित जाँच कराने के लिए जब डॉक्टर सुभेदार साहब के कक्ष में पहुँचा तो मधु भैया के कागज देखे जा रहे थे। मैं पंक्तिबद्ध हो गया। मेरा क्रम आने पर मैंने अपने कागजात दिखाए और डॉक्टर साहब से निर्देश लेने के बाद अपनी ओर से कुछ जानना चाहा तो मधु भैया तपाक् से बोले - ‘इनसे सम्हल कर बात करना। पता नहीं ये किस बात पर कब, क्या लिख दें!’ सुभेदार साहब ने हाँ में हाँ मिलाई और उतने ही तपाक् से बोले - ‘इन्हें तो लिखने के लिए कोई सब्जेक्ट चाहिए। आपकी-हमारी बातों में से अपना सब्जेक्ट निकाल लेंगे।’ डॉक्टर समीर निःशब्द मुक्त-मन हँस दिए। हँस तो तीनों ही रहे थे। मुझे कोई उत्तर सूझ नहीं पड़ा। उनकी हँसी में शरीक होने में ही मेरी भलाई थी। मैं शरीक हो लिया। मेरी उत्तमार्द्ध के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। ऐसे क्षणों में सबका साथ देना ही बुद्धिमत्ता होती है। सो, वे भी सस्मित हम चारों को देखने लगी।


ऐसा मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ था। काफी पहले, वासु भाई (श्री वासुदेव गुरबानी) कम से कम दो बार कह चुके थे - ‘दादा! जिन छोटी-छोटी बातों की हम लोग अनदेखी कर देते हैं आप उन्हीं को अपनी कलम से बड़ी और महत्वपूर्ण बना देते हो।’ ऐसा ही कुछ, ‘विस्फोट’ वाले संजय तिवारी (नई दिल्ली) आठ-दस बार कह चुके हैं।


अपने लिखने पर जब-जब ऐसे जुमले सुने, तब-तब हर बार, अपनी धारणा पर विश्वास और गहरा ही हुआ। मेरा मानना रहा है कि हमारे जीवन में कोई भी बात छोटी नहीं होती। इसके विपरीत, छोटी-छोटी बातें प्रायः ही बड़े प्रभाव छोड़ जाती हैं। बच्चों की बातों की अनदेखी और उपेक्षा करना हमारा स्वभाव है। किन्तु बच्चों की बातें भी हमें सबक सिखा देती हैं। मेरा छोटा भतीजा गोर्की पाँच-सात साल का रहा होगा। दादा ने उसे कोई काम बताया। वह अनसुनी कर जाने लगा। दादा ने कहा - ‘गुण्डे! कहाँ चल दिया?’ तब तक गोर्की दौड़ लगा चुका था। लेकिन दादा की बात सुनकर वह पलटा और घर के बाहर, सड़क से ही चिल्लाया -‘मैं गुण्डा तो आप गुण्डे के बाप।’ और कह कर गोर्की यह जा, वह जा। दादा के पास मौजूद सब लोग ठठा कर हँस दिए। किन्तु दादा गम्भीर हो गए। उसके बाद उन्होंने अपने तो क्या, किसी और के बच्चे को भी ऐसे सम्बोधन से नहीं पुकारा। आप-हम अपने बच्चों को ‘बेवकूफ, गधा, पाजी’ जैसे ‘अलंकरण’ देते रहते हैं। इसका एक ही मतलब हुआ कि हम बवेकूफ, गधे, पाजी के भी बाप हैं। बात छोटी है किन्तु मर्म पर प्रभाव करती है।


मुझे लगता है कि हमारे संकटों में सर्वाधिक व्यवहृत संकट यही है - किसी बात को छोटी मान कर उसकी अनदेखी करना। एक बार की गई अनदेखी कालान्तर में हमारा स्वभाव बन जाती है और इसके परिणाम प्रायः ही कष्टदायक होते हैं।


अपने बड़े बेटे वल्कल को मैंने तब ही मोटर सायकिल सौंपी जब वह 18 वर्ष पूरे कर चुका था और लर्निंग लायसेन्स ले चुका था। मैं जानता था कि वह घर से बाहर, स्कूल के मित्रों के दुपहिया वाहन चलाता है। मैंने उसे ऐसा करने से हमेशा ही हतोत्साहित किया और कहता रहा कि वह अपराध कर रहा है। परिणाम यह हुआ कि वह यातायात नियमों और कानूनों के प्रति आज भी अतिरिक्त सतर्क है। इसके विपरीत, छोटे बेटे तथागत को सोलह वर्ष की अवस्था से पहले ही मोटरसायकिल चलाने को मिल गई। इस मामले में वह अपने बड़े भाई के मुकाबले अधिक असावधान और कम गम्भीर बना हुआ है।
यदि हम तनिक सावधानी से, तनिक ध्यानपूर्वक देखें तो हमें हमारे आस-पास ऐसे पचासों प्रकरण उपलब्ध हो जाएँगे जहाँ छोटी सी बात ने बाड़ा बिगाड़ दिया या फिर जिन्दगी सँवार दी। रत्नावली के एक उपालम्भ ने दुनिया को गोस्वामी तुलसीदास उपलब्ध करा दिया। मूक मादा क्रौंच के क्षणिक विलाप ने एक लुटेरे को वाल्मिकी बना दिया। वृद्ध, रोगी और मृत देह ने एक राजकुमार को गौतम बु़द्ध बना दिया। भार्या की बेवफाई ने राजा को सन्यासी भर्तहरी बना दिया। ये तो नाम मात्र के उल्लेख हैं।


वस्तुतः, पहली बार के स्खलन को जब हम छोटी बात या ‘ऐसा तो होता रहता है’ जैसे जुमले उच्चार कर छोड़ देते हैं तो नहीं जानते कि हम स्खलन को स्वीकार कर उसकी आवृत्ति को प्रोत्साहित कर रहे होते हैं। वह कहानी याद हो आती है जिसमें मृत्यु दण्ड पाने वाला अपराधी अपनी अन्तिम इच्छा के रूप में में अपनी माँ के कान में कुछ कहने की अनुमति लेता है और कुछ कहने के स्थान पर अपनी माँ का कान काट लेता है। कहता है कि यदि पहली बार चोरी करने पर माँ ने टोका होता तो मृत्यु दण्ड की नौबत नहीं आती।


निष्कर्ष यह कि कोई भी बात छोटी नहीं होती। हर बात अपना व्यापक अर्थ रखती है और उससे भी अधिक व्यापक प्रभाव छोड़ती हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मेरा लिखा ‘बिना विचारे’ नहीं पढ़ा जाता और न ही यह टिप्पणी लिखने की स्थिति बनती।


यह छोटी बात नहीं है।

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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001.

जैन साहब का पत्थर


जैन साहब जिस तटस्थ-भाव और अविचलित स्वर में बोल रहे थे, वह मुझे चकित ही कर रहा था। उनकी जगह मैं होता तो अपनी ‘वैसी’ सफलता पर पता नहीं क्या कर बैठता! पर जैन साहब अपनी व्यक्तिगत सफलता की सूचना सहज भाव से, संयत स्वरों में ऐसे दे रहे थे मानो किसी और के किए की जानकारी दे रहे हों।


जैन साहब याने श्रीयुत (प्रो) रतनलालजी जैन । प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त भले ही हो गए किन्तु उनकी कलम चलती रहती है। मालवा अंचल में, सम्पादक के नाम नियमित रूप से पत्र लिखनेवालों (और छपनेवालों) की सूची के पहले पाँच में से एक। रहते तो नीमच में हैं किन्तु छाए रहते हैं पूरे मालवा में। वे ही जैन साहब फोन पर बता रहे थे कि कैसे उन्होंने नितान्त व्यक्तिगत प्रयासों से दो फूहड़, भोंडे और अश्लील होर्डिंग हटवाने में सफलता पाई।


ये दोनों होर्डिंग कण्डोम के विज्ञापनों के थे और सार्वजनिक स्थानों पर प्रमुखता से ऐसे लगे हुए थे कि आते-जाते लोग न चाहें तो भी उन्हें देखें। एक होर्डिंग में स्त्री-पुरुष लगभग सम्भोगरत मुद्रा में ही दिखाई दे रहे थे और दूसरे में ‘सम्पूर्ण आनन्दपूर्वक, सुरक्षित सम्भोग’ का आमन्त्रण दिया जा रहा था। दोनों होर्डिंगो को हजारों ने देखा होगा, सैंकड़ों को बुरा लगा होगा, बीसियों ने खिन्नता जताई होगी किन्तु इन्हें हटवाने की कोशिश करने का अवकाश किसी के पास नहीं रहा होगा। सबके पास अपने-अपने काम और उनसे उपजी भरपूर व्यस्तता रही होगी।


किन्तु जैन साहब इन सबमें कहीं भी शरीक नहीं हो पाए। उनकी फितरत ही ऐसी है। सो, पहली बार नजर पड़ते ही उन्होंने ‘नईदुनिया’ को सम्पादक के नाम पत्र लिखा। यथेष्ठ समय तक प्रतीक्षा के बाद भी नहीं छपा तो फिर दूसरा पत्र पोस्ट किया। वह भी नहीं छपा। जैन साहब को आश्चर्य नहीं हुआ। वे भली प्रकार जानते हैं कि बाजार ने अच्छे-अच्छों को बदल दिया है। इसी के चलते, सामाजिक सरोकारों पर विज्ञापनों का लालच भारी पड़ गया हो तो ताज्जुब नहीं।


किन्तु जैन साहब चुप बैठनेवालों में से नहीं थे। सो चुप नहीं बैठे। उन्होंने जिला प्रशासन के उच्चाधिकारियों से सम्पर्क किया। उनसे होर्डिंग हटाने का आग्रह करने के बजाय कहा कि अधिकारीगण कम से कम एक बार अपने बच्चों के साथ जाकर दोनों होर्डिंग देखें अवश्य और फिर जैसा लगे, वैसा करें। जैसाकि होता है (और होना था), जैन साहब की बात पहली बार किसी को सुनाई नहीं दी। किन्तु जैन साब कब चुप बैठने वाले थे? सो, फिर बोले। इस बार एक अधिकारी ने यह आवाज सुनी। जैन साहब के आग्रह का ‘पेंच’ इस अधिकारी ने समझा और बच्चों के साथ नहीं, अकेले ही जाकर दोनों होर्डिंग देखे। इसका प्रभाव और परिणाम यह हुआ कि पहले तो उसने वहीं से फोन कर, दोनों होर्डिंग हटवाने के निर्देश दिए और अपने घर-दफ्तर बाद में लौटा। लौट कर उसने जैन साहब को धन्यवाद दिया और की गई कार्रवाई की जानकारी दी।


यही किस्सा जैन साहब मुझे फोन पर सुना रहे थे-सम्पूर्ण सहजता से, बिलकुल शान्त और संयत स्वरों में। मैं चकित था। इस जमाने में किसी अधिकारी से, व्यक्तिगत स्तर पर, बिना किसी धमकी और तोड़-फोड़ के ऐसा काम करवा लेना मुझे किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था। इसके समानान्तर, उस अधिकारी के प्रति प्रशंसा भाव भी उपज रहा था जिसने यह चमत्कारी काम चुपचाप कर दिया। मैंने जैन साहब से उस अधिकारी का नाम पूछा तो जैन साहब बोले -‘नहीं बताऊँगा। तेरा कोई भरोसा नहीं। तू उसका नाम छाप देगा और वह भला आदमी कण्डोम कम्पनियों की धन-क्षमता के कारण परेशान कर दिया जाएगा। पैसों से सरकारें खरीदनेवाली इन कम्पनियों के लिए एक अफसर का तबादला करवाना तो चुटकी बजाने से भी कम मेहनत का काम है।’ जैन साहब की बात मुझे फौरन ही समझ आ गई। मैं चुप हो गया।


इस बात को तीन दिन हो गए हैं। मैं चाह कर भी यह किस्सा नहीं भुला पा रहा हूँ। जैन साहब इस समय पचहत्तरवें साल में चल रहे हैं। उन्हें क्या पड़ी थी यह सब करने की? आराम से घर में बैठ कर भजन-पूजन करते रहते या पोते-पोतियों के साथ खेलते रहते! लेकिन कुछ लोग ऐसा नहीं कर पाते। ऐसे लोग अपने लिए पेरशानियाँ पैदा करते रहते हैं। यह अलग बात है कि ये परेशानियाँ उनकी अपनी नहीं, सारे जमाने की होती हैं। दुष्यन्त कुमार आज होते तो जैन साहब और जैन साहब जैसे लोग पाकर बच्चों की तरह खुश हो जाते। ऐसे ही लोगों के लिए तो उन्होंने लिखा होगा - एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।


जैन साहब ने तबीयत से पत्थर उछाला। नतीजा हमारे सामने है।

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प्रतिभा पाटिल बनाम झमकू


मेरे जिले की, जनजातीय (भील) समाज की सागुड़ी, रुपली, भागूड़ी, झमकू, दरली, तीजड़ी, फुन्दी और ऐसी ही अन्य कई स्त्रियों ने अनायास और अचानक ही, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की बराबरी कर ली। इससे पहले वे एक मामले मे ही उनके बराबर थीं। अब दो मामलों में वे प्रतिभाजी के बराबर हो गई हैं।

वस्तुतः, मेरे जिले में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। मेरे जिले का बड़ा भू भाग जनजातीय (भील) समाज की आबादीवाला है। इसमें कई ग्राम पंचायतों और जनपदों के पंच, सरपंच, जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष आदि पद महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। ऐसे पदों की उम्मीदवार अनजाने में ही, अचानक ही श्रीमती पाटिल की बराबरी में जा बैठीं हैं।

‘साप्ताहिक उपग्रह’ के प्रकाशक परिवार ‘छाजेड़ परिवार’ से मेरा रिश्ता अब केवल अखबार और स्तम्भ लेखक का नहीं रह गया है। आज वह मेरा ‘संरक्षक परिवार’ है और मैं उन पर आश्रित, उनसे संरक्षित। मेरे मोटापे के कारणों में से एक कारण यह भी है कि अपनी अनेक चिन्ताएँ और उत्तरदायित्व ‘छाजेड़ परिवार’ को सौंप कर मैं निश्चिन्त हो गया हूँ।

सो, छाजेड़ प्रिण्टरी पर मेरा उठना-बैठना अब मेरे द दैनन्दिन जीवन का हिस्सा बन गया है। वहाँ बैठने के दौरान ही मेरा ध्यान इस बात पर गया। विभिन्न पदों की उम्मीदवारों के प्रचार के पर्चे, पोस्टर और नकली मतपत्र वहीं छप रहे थे। वर्तनी की अशुद्धियाँ देखने के लिहाज से मैं, छाजेड़ प्रिण्टरी पर छपनेवाली सामग्री को देखता रहता हूँ। इसी क्रम में मैंने इन उम्मीदवार महिलाओं की प्रचार सामग्री देखी। वर्तनी की अशुद्धियाँ देखते-देखते अचानक ही मेरा ध्यान इस बात पर गया कि प्रत्येक उम्मीदवार के नाम के साथ उसके पति का नाम भी दिया गया है। मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो मैंने प्रायः ऐसे प्रत्येक पर्चे, पोस्टर और नकली मत पत्र को ध्यान से देखा। नहीं। एक भी कागज ऐसा नहीं दिखाई दिया जिस पर किसी महिला उम्मीदवार के पति का नाम साथ में नहीं दिया गया हो।

दूसरी जिस बात पर मेरा ध्यान गया वह थी, प्रेस पर महिला उम्मीदवारों की अनुपस्थिति। छपाई के लिए आनेवाले सबके सब पुरुष थे। महिला एक भी नहीं। मेरे कौतूहल ने परिहास की शक्ल ले ली। आनेवालों से मैंने अलग-अलग, व्यक्तिगत स्तर पूछताछ की तो सबने एक ही उत्तर दिया कि उनकी पत्नी को कोई नहीं जानता। उनका तो केवल नाम तथा चित्र है और चुनाव तो वास्तव में पति ही लड़ रहे हैं। वोट भी पति के नाम पर और पति के कारण ही मिलेंगे। कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि पंचायतों की बैठक में भी पति ही जाएँगे और पत्नी के अंगूठे की जगह वही (पति ही) अंगूठा लगाऍंगे।

मेरा परिहासी मन उदास हो गया। महिला जाग्रति का यह स्वरुप मेरे लिए तनिक अटपटा और अनपेक्षित ही था। नगरीय क्षेत्रों मे भी ‘पार्षद पति’, ‘अध्यक्ष पति’, ‘महापौर पति’ का पद सृजित अवश्य हो गया किन्तु स्थानीय निकायों के सम्मेलनों में महिलाएँ भागीदारी करती हैं। भले ही वे ‘गूँगी गुड़िया’ बनी रहें किन्तु उपस्थिति के हस्ताक्षर तो खुद ही करती हैं। पहचान तक तो पति का नाम स्वाभाविक माना जा सकता है किन्तु लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में तो उन्ही महिलाओं को भागीदारी करनी चाहिए जो चुनवा जीत कर निकायों में पहुँची हैं।

अचानक ही मुझे अपनी राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल याद हो आईं। प्रतिभाजी ने योग्यता, क्षमता और प्रतिभा के दम पर खुद को साबित किया और राजनीति के कुटिल और जटिल संसार में खुद को स्थापित किया। इन्हीं सब बातों के चलते वे विधायी सदनों में और बाद में एकाधिक संवैधानिक पदों तक पहुँचीं।

राष्ट्रपति बनने से ठीक पहले वे राजस्थान की राज्यपाल थीं। राजस्थान उनका ससुराल भी है। किन्तु तब तक उनके नाम के साथ उनके पति श्री देवीसिंह शेखावत का नाम उल्लेखित नहीं किया जाता था। राष्ट्रपति बनने के बाद से ही वे ‘श्रीमती प्रतिभा पाटिल’ से बदल कर ‘श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल’ हो गईं। नहीं पता कि यह परिवर्तन क्योंकर हुआ या क्योंकर करना पड़ा। वास्तविक कारण तो प्रतिभाजी ही जानें किन्तु इस परिवर्तन का सीधा सन्देश गया कि भारतीय स्त्री को अपनी स्‍वतन्‍त्र पहचान बनाने के लिए अभी भी लम्बा संघर्ष करना शेष है।

मुझे अनायास ही याद आया कि एक महिला कलेक्टर से जब मैंने बीमे की बात की तो योजना समझकर वे बीमा कराने को तैयार तो हो गईं किन्तु अन्तिम निर्णय के लिए उन्हें अपने पति से पूछना जरूरी लगा। कलेक्टर साहिबा की उपस्थिति में मैं उनके पति से मिला तो पति महोदय ने बिना कोई कारण बताए इंकार कर दिया। कलेक्टर साहिबा ने कारण जानना चाहा तो जवाब मिला - ‘मैंने कह दिया कि नहीं तो नहीं। क्या यह कारण पर्याप्त नहीं है?’ बेचारी कलेक्टर साहिबा! वे संकोच के मारे मेरी ओर देख भी नहीं पा रही थीं।

इस किस्से ने मुझे तनिक सहज तो किया किन्तु उदासी दूर नहीं हो सकी। फिर मैंने अपने आप को समझाया कि मेरे जिले की, जनजातीय समाज की ये महिलाएँ अब तक केवल एक मामले में ही प्रतिभाजी के बराबर थीं - वे भी भारतीय और ये भी भारतीय। किन्तु अब इन महिलाओं ने एक और मामले में प्रतिभाजी की बराबरी कर ली - उनका काम भी पति के नाम के बिना नहीं चलता और इनका काम भी पति के नाम के बिना नहीं चलता।

फिलहाल तो यह समानता ही मुझे तसल्ली दिला रही है।
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मालवा का महाकाल


याद नहीं आता कि निगम साहब से इस बार का मिलना कितने बरसों बाद हुआ। लेकिन मिलने पर पाया कि वे वैसे के वैसे ही हैं जैसे कि कुछ बरस पहले मिले थे। लगा, उन्होंने काल को अपनी मुट्ठी में बन्द कर नियन्त्रित कर लिया हो।


मैं बात कर रहा हूँ उज्जैन निवासी डॉ। श्याम सुन्दरजी निगम की। 1977 के अगस्त में मैं रतलाम में आया तो किराये का पहला मुकाम बना, पेलेस रोड़ पर श्रीकमला शंकरजी ओझा का मकान ‘प्रशान्ति निलयम्’। तब निगम साहब रतलाम कॉलेज में पढ़ा रहे थे और ‘प्रशान्ति निलयम्’ में ही किरायेदार थे। वे 1969 1980 तक रतलाम कॉलेज में रहे। सो, उनके कार्यकाल के अन्तिम दो-ढाई साल उनका सत्संग मिला। तब मैं नव विवाहित था। ज्ञान और दुनियादारी के मामलों में उन्होंने मुझे भरपूर समृद्ध किया। उन्हें लेकर मेरे पास संस्मरणों का खजाना है लेकिन एक अब तक उन सबमें ‘टॉप’ पर बना हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे लेकर निगम साहब अब भी खुद पर हँसने का अजूबा और साहस कर लेते हैं।

पीएच. डी. करने से पहले निगम साहब कोई सात-आठ विषयों में एम.ए. होने के अतिरिक्त एम. कॉम., एल. एल. बी., भिषगाचार्य, साहित्याचार्य, साहित्य रत्न, शिक्षा रत्न, आयुर्वेद रत्न जैसी उपाधियों के स्वामी भी हैं। कुछ उपाधियों में उन्होंने प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त किया तो कुछ में स्वर्ण पदक भी हासिल किए। शेष सबमें प्रथम श्रेणी ही प्राप्त की। पता नहीं यह सब उन्होंने कब और कैसे किया होगा। मेरा यह संस्मरण उनकी इन्हीं उपाधियों को लेकर उपजा।

निगम साहब ने अपने निवास के बाहर अपनी नेम प्लेट लगा रखी थी जिस पर इन सारी उपाधियों का उल्लेख था। मैंने एक-दो बार ही इनका नोटिस लिया था। किन्तु एक दिन वह हो गया जिसकी कल्पना और किसी को हो न हो, निगम साहब को तो कभी नहीं रही होगी।
यह सम्भवतः अप्रेल 1980 के किसी एक दोपहर की बात होगी। गर्मी ने पाँव पसारने शुरु कर दिए थे। घरों में पंखे चलने लगे थे। सड़कें नीरव होने लगी थीं। निगम साहब और मैं, उनके अगले कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। अचानक ही दो बच्चों की बातों ने हमारा ध्यानाकर्षण किया। दोनों बच्चे दसवीं-ग्यारहवीं के छात्र रहे होंगे। रास्ते चलते उन्होंने निगम साहब की नेम प्लेट पढ़ी। ढेर सारी डिग्रियों को पढ़ने में समय तो लगना ही था। सो, दोनों खड़े रह कर पढ़ने लगे। पढ़ने के बाद दोनों में कुछ इस तरह सम्वाद हुआ -
‘देख तो रे! इसने कित्ते सारे एम. ए. कर रखे हैं!’
‘हाँ! यार, भोत सारे हैं।’
‘यार! इत्ते सारे एम. ए. करने में तो भोत पढ़ना पड़ा होगा!’
‘चल-चल, इत्ता कोई पढ़ सकता है? नहीं पढ़ सकता। जरूर इसने टीप-टीप कर (नकल कर) पास की होंगी।’
‘हाँ यार! तू सई के रिया है। टीप कर ही पास हुआ होगा।’

अन्तिम वाक्य कहने के साथ ही दोनों बच्चे तो चले गए लेकिन मैं और निगम साहब अवाक् हो, एक दूसरे की शकल देखने लगे। कुछ भी सूझ नहीं पड़ा कि बच्चे क्या कह गए और क्या हो गया! बाहर पसरा सन्नाटा कमरे के भीतर तक चला आया था। निगम साहब के चेहरे पर एक के बाद एक रंग आ-जा रहे थे। मैं संकोचग्रस्त हो अपने में ही सिमट गया था। हम दोनों एक दूसरे की साँसों की आवाज और हृदय की धड़कनों को साफ-साफ सुन रहे थे। कितना समय इस दशा में बीता, हम दोनों को अब तक याद नहीं। लेकिन जल्दी ही निगम साहब अपने में लौटे और बुक्का फाड़ ठहाका लगा कर मालवी में बोले - ‘हत्तेरे की। या बात तो मारा ध्यान में आज तक नी आई के ऐसो भी वेई सके। अब तो मने भी लागवा लाग्यो के मूँ टीपी नेऽज पास व्यो वूँगा।’ (धत्तेरे की। यह बात तो आज तक मेरे ध्यान में भी नहीं आई कि ऐसा भी हो सकता है। अब तो मुझे भी लगने लगा है कि मैं नकल करके ही पास हुआ होऊँगा।) पहले तो ठहाका और फिर यह वाक्य सुनकर मेरी साँस में साँस आई और मैं भी ठहाका मार कर निगम साहब के साथ हो लिया। उसके बाद निगम साहब ने सबसे पहले जो काम किया वह था - जोर-जोर से हँसते हुए, अपनी नेम प्लेट उतारने का। शायद वे इस घटना की आवृत्ति की जोखिम लेने को अब क्षणांश को भी तैयार नहीं थे।

कई सारी बातें आई-गई हो गईं किन्तु यह बात आज भी जस की तस बनी हुई है। सो, इस बार दो जनवरी को जब मैंने उनके चरण स्पर्श किए तो उन्होंने यही किस्सा याद करते हुए मुझे बाँहों में भर लिया।

इस समय वे 79वें वर्ष में चल रहे हैं किन्तु उन्हें देख कर लगता है कि वे अभी कॉलेज जाने के लिए निकल पड़ेंगे। 1991 में सेवा निवृत्त होने के बाद वे जिस योजनाबद्ध तरीके से सक्रिय हुए, लगा कि वे सेवा निवृत्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे। अपनी आदरणीया माताजी के नाम पर उन्होंने ‘कावेरी शोध संस्थान्’ की स्थापना कर अपने निवास को मानो तीर्थ बना लिया। क्षेत्रीय लोक परम्पराएँ,भारतीय सामाजिक एवम् आर्थिक जीवन का इतिहास, पुराभिलेख एवम् पुरालिपि विज्ञान, क्षेत्रीय/आंचलिक इतिहास, विभिन्न युगीन भारतीय संस्कृति जैसे जटिल विषय उनके प्रिय विषय हैं। अब तो उन्हें भी याद नहीं कि उनके निर्देशन में कितने बच्चों ने पीएच. डी. कर ली है। सम्मेलनों/संगोष्ठियों मे भागीदारी, विभिन्न ग्रन्थों का सम्पादन, शोध आलेख लेखन, टीवी/रेडियो पर साक्षात्कार और वार्ताएँ, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएँ, पर्यावरण रक्षण की गतिविधियाँ आदि काम उन्हें फुरसत में नहीं रहने देते। उनके निवास पर दो-चार शोधार्थी बने ही रहते हैं। निगम साहब की जीवन संगिनी आदरणीया भाभीजी श्रीमती स्नेहलता निगम, ‘गुरु माता’ की तरह उनकी देखभाल करती हैं। चार शोध ग्रन्थों सहित 15 पुस्तकें, हिन्दी एवम् अंग्रेजी में साठ से अधिक शोध पत्र, दो सौ से अधिक आलेखों का प्रकाशन उनके खाते में जमा हैं। गए आठ वर्षों से हिन्दी-अंग्रेजी त्रैमासिक ‘शोध समवेत’ का प्रकाशन निरन्तर किए हुए हैं। उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों का काम इस पत्रिका के बिना नहीं चलता। उल्लेखनीय बात यह है वे सरकार से फूटी कौड़ी भी नहीं लेते। सब कुछ अपने और मित्रों के दम पर कर रहे हैं। ‘सीकरी’ ने उन्हें रिझाने की अनेक कोशिशें की किन्तु इस ‘सन्त’ ने एक बार भी उसकी नहीं सुनी। इस महर्षि के सामने सत्ता सदैव की ‘चेरी भाव’ से ही नतमस्तक खड़ी रहने को विवश हुई है।

निगम साहब उज्जैन में गौ घाट के पास स्थित केशव नगर कॉलोनी में निवासरत हैं। उनके निवास का नाम समर्पण और मकान नम्बर 34 है।उज्जैन महाकाल की नगरी के रूप में जाना जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि वहाँ दो महाकाल हैं। एक सारी दुनिया के और दूसरे मालवा के महाकाल।

अगली बार उज्जैन जाएँ तो मालवा के महाकाल के दर्शन भी कीजिएगा। उनसे मिल कर लौटते समय तीर्थ दर्शन का आनन्द साथ-साथ चला आता है। हाँ, जाने से पहले फोन नम्बर (0734) 2551317 पर तलाश अवश्य कर लें। कहीं ऐसा न हो कि आप ‘समर्पण’ पहुँचें तो मालूम पड़े कि मालवा का महाकाल किसी बौद्धिक समुदाय को समृद्ध करने के लिए विचरण कर रहा है।
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गाँधी विचार पर पुनर्विचार: एक दृष्टिकोण

रोटरी अन्तरराष्ट्रीय के पूर्व मण्डलाध्यक्ष श्री आलोक बिल्लोरे का यह लेख मुझे श्री रमेश चोपड़ा (बदनावर, जिला धार, मध्यप्रदेश) ने ई-मेल से भेजा है। पढ़ें और विचार करें।

गाँधीजी के विचार, ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’ पर हम पुनर्विचार कर सकते है ?

भगवान ने ये तीन गुण ( सुनना, देखना और बोलना) दे कर मनुष्य को श्रृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी बना दिया। पशु भी सुनते हैं और देखते व चिल्ला सकते हैं पर बोल नहीं सकते । चिल्लाने और बोलने में अन्तर होता है, इसीलिए तो कहते हैं कि चिल्लाओ मत, बोलो...और वह भी तोल- मोल कर। किन्तु हम चर्चा कर रहे हैं, देखने और सुनने की क्रिया पर।


देखना और सुनना एक प्राकृतिक क्रिया है, जिस पर देखने और सुनने वाले का कोई वश नहीं होता। व्यक्ति वही सुनता या देखता है जो बोला या किया जा रहा हो।


गाँधी जी का यह विचार कि ‘बुरा मत बोलो’, निश्चित रूप से न केवल पालन करने योग्य है बल्कि, सम्भव भी है। परन्तु बुरा मत देखो या बुरा मत सुनो! कैसे सम्भव है ? जो हो रहा है, जब तक उसे देख या सुन नहीं लिया जाता, उसके अच्छे या बुरे होने का निर्णय कैसे किया जा सकेगा ? इसलिए बुरा जब भी कहा या किया जाए, उसे सुनना या देखना न केवल मजबूरी है बल्कि आवश्यक भी।


कुछ बुरा हो रहा है, एक ऐसी घटना जो चल रही है, बार बार हो रही है, ऐसे में क्या गाँधीजी के बन्दर की तरह अपनी आँखें बन्द कर सकते हैं? कोई बुरा बोल रहा है, क्या गाँधीजी के बन्दर की तरह अपने कान बन्द कर सकते हैं? इस तरह का बर्ताव तो बहुत ही अनुचित और कर्तव्य से मुँह मोड़ना कहा जायेगा।


समाज में सुधार लाने के लिए बुरी बातों को सुनना और बुरे होते को देखना नितान्त आवश्यक है। जब तक हम उसको आमने-सामने की लड़ाई नहीं बनायेंगे, सुधार कैसे सम्भव है? आँख या कान बन्द कर लेने से काम नहीं चलेगा। यह तो वही बात हुई कि तूफान आया और हम समझें कि सर नीचे कर लेने से वो निकल जाएगा और सब ठीक हो जाएगा? उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी को अपशब्द कह रहा हो, या आपके लिए ही गलत भाषा का उपयोग कर रहा हो, तो क्या आप अपने कान बन्द कर लेंगे? या सोचिये कि कोई व्यक्ति किसी के साथ अभद्र व्यवहार कर रहा हो, या किसी महिला या कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय कर रहा हो, तो क्या आप गाँधीजी के बन्दर की तरह आँखें बन्द कर लेंगे? क्या यह बुद्धिमत्ता या वीरता होगी?


मुझे खुद से शिकायत है कि यह बात मेरी समझ में इतने वर्षो बाद क्यों आई? गाँधी जी ने यह बात कही, इस पर देश में अभी तक प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई? हमने क्यों अपने बच्चों को विद्यालयों में यह पाठ पढाया? हमने कैसे इतनी अर्थहीन बात को, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, सहर्ष मान लिया और अपनी आगे वाली पीढ़ी को भी यही सिखाया? हमने क्यों इसका पुरजोर विरोध नहीं किया ?


आइये! हम हिम्मत करें , आगे बढें और स्वीकार करें कि ये विचार उपयुक्त नहीं हैं। आइये! हम अपने बच्चों को बताएँ कि यदि कहीं बुरा हो रहा है तो उसे अवश्य देखें, उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें, उसका विरोध करें, उसकी पुनरावृत्ति न हो ऐसा प्रयास करें। यदि कहीं पर बुरी बात कही जा रही है तो उसे बहुत गौर से सुनें, उस पर मंथन करे, उसमें क्या बुराई है और उसे कैसे सुधारा जा सकता है इस पर विचार करें।


गाँधीजी के प्रति पूरी निष्ठा और सम्मान के साथ ही यह सब कहा गया है। उनके द्वारा किये गए अत्यन्त असाधारण और सामयिक कार्यों के प्रति असहमति प्रकट करने का कोई आशय नहीं है। किन्तु अब समय आ गया है जब यह विचार होना चाहिए कि अहिंसा की क्या परिभाषा हो, क्षमा करने के क्या मापदण्ड हों, अधिकारों की लड़ाई एक निर्बल व्यक्ति को कैसे लड़नी चाहिए?


आज आतंकवाद की विकराल समस्या देशों के बीच लड़ाइयों का सबब बन चुकी है। जिस कायरता और धर्म की आड़ लेकर, धर्मावलम्बियों को अँधेरे में रख कर, मर्यादाओं की सभी सीमाओं को तोड़ कर जो कुछ किया जा रहा है, वह पाशविक ही तो कहलायेगा? कैसे आँख और कान बन्द कर लें?


हो सकता है कि जब आजादी की लड़ाई लड़ी गई उस समय हम इतने कमजोर, असहाय, दबे, कुचले थे कि अहिंसा और क्षमा का रास्ता ही सबसे आसान और सफल होने का श्रेष्ठतम मार्ग कहलाया या सिर्फ मजबूरी ही रही होगी। अनुमान लगाइए कि हम ताकतवर होते, सक्षम होते, सुसंगठित होते, पराक्रमी होते, तो क्या सिर्फ शान्ति, धैर्य, क्षमा, अहिंसा की बात उन निर्दयी, क्रूर, स्वार्थी, चरित्रहीन अंग्रेजो के समक्ष करते जिन्होंने बर्बरता और अन्याय बरतने में कोई कसर नहीं रखी?


किसी भी समस्या का वही समाधान सही मान लिया जाता है, जो हमें सफलता दिलाता है, क्योंकि सफलता ही मापदण्ड और मार्ग को निश्चित कर देती है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समस्या और समाधान दोनों ही परिस्थितियों के दास हैं। एक समस्या किसी दूसरी परिस्थिति में समस्या ही नहीं रह जाती। समाधान भी परिस्थितियों के अनुसार बदल जाते हैं। उसी तरह अच्छाइयाँ , बुराइयाँ, सिद्धान्त और यदि गलत ना हो तो ये कहा जा सकता है कि धर्म, मान्यताएँ, विश्वास, आधार, श्रध्दा ,भावनाएँ भी समय के साथ बदलती जाती हैं।


अब समय आ गया है कि गाँधीजी के इन विचारों पर पुनर्विचार किया जाए। क्यों नहीं नारा दिया जाये कि बुरा अवश्य देखो, बुरा अवश्य सुनो, उससे आँख नहीं चुराना है बल्कि ध्यान से सुन कर और गौर से देख कर उस बुरे के विरुद्ध सक्रिय होना है, क्योंकि क्रिया में ही जीवन है और जड़ता मृत्यु का पर्यायवाची। आँख और कान बन्द करना जड़ता ही प्रदर्शित करता है। अगर धृतराष्ट्र अपने ज्ञान चक्षु और कान खुले रखते तो महाभारत की नौबत ही नहीं आती।
पद पर आसीन कोई व्यक्ति यदि अधर्मी, लोभी, कामी , अहंकारी, निकृष्ट, अमर्यादित, अक्रियाशील, अन्यायी व अभद्र हो तो उसके द्वारा किये गए गलत कृत्यों को सुन-देख कर उस पर प्रतिकिया करना नितान्त आवश्यक हो जाता है। आँख और कान कैसे बन्द रखे जा सकते है? परम आवश्यक हो जाता है कि उसे उसका स्थान दिखाया जाए। सबका कर्तव्‍य हो जाता है कि ऐसे चरित्र के व्यक्ति को अधिकार की आसन्दी से दूर ही रखा जावे।


परिवर्तन निरन्तर प्रक्रिया है। कान खोल कर सुनना और बहुत गौर से देखना नितान्त आवश्यक है। अब हमारा नारा हो - बुराई को मिटाने के लिए बुरा अवश्य देखो, बुरा अवश्य सुनो और उस पर तुरन्त प्रतिक्रिया करो। प्रयास करो कि दोहरे चरित्र के व्यक्तियों को उनके पद के कारण जो सम्मान मिल रहा है उसे उस लायक बनाने में हम उसको मार्गदर्शन दें, सज्जनतावश गलत कार्यो के विरोध में प्रतिक्रिया ना करना भी एक अपराध है।
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आपकी बीमा जिज्ञासाओं/समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराने हेतु मैं प्रस्तुत हूँ। यदि अपनी जिज्ञासा/समस्या को सार्वजनिक न करना चाहें तो मुझे bairagivishnu@gmail.com पर मेल कर दें। आप चाहेंगे तो आपकी पहचान पूर्णतः गुप्त रखी जाएगी। यदि पालिसी नम्बर देंगे तो अधिकाधिक सुनिश्चित समाधान प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।


यदि कोई कृपालु इस सामग्री का उपयोग करें तो कृपया इस ब्लाग का सन्दर्भ अवश्य दें । यदि कोई इसे मुद्रित स्वरूप प्रदान करें तो कृपया सम्बन्धित प्रकाशन की एक प्रति मुझे अवश्य भेजें । मेरा पता है - विष्णु बैरागी, पोस्ट बाक्स नम्बर - 19, रतलाम (मध्य प्रदेश) 457001।

मैं अकेला तो नहीं?


जीवन में सब कुछ प्रिय और मनोनुकूल नहीं होता। आपका नियन्त्रण केवल आप पर ही होता है, अन्य पर नहीं। ऐसे में, आप कितने ही ‘समय-पालनकर्ता’ हों, दूसरे भी वैसे ही हों, यह अपेक्षा और आग्रह ही कर सकते हैं। इससे अधिक कुछ भी नहीं। किन्तु अपेक्षा तो दुःखों का मूल है! इसी कारण मैं कुछ दुःखी हूँ। जिन पर मेरा नियन्त्रण नहीं, वे मेरे मनोनुकूल व्यवहार करें, यह अपेक्षा की और दुःखी हुआ।
कुछ दिनों से मैं तीन मिस्त्रियों (मेकेनिकों) से दुःखी हूँ। मेरी व्यथा-कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ और उम्मीद कर रहा हूँ ऐसा केवल मेरे साथ नहीं हो रहा होगा।


सबसे पहले साबका पड़ा ईश्वर से। चौधरी ब्रदर्सवाले चौधरी बन्धुओं के सौजन्य से ईश्वर से सम्पर्क हुआ। बहुत ही मीठे और विनम्र व्यवहारवाला ईश्वर, सिंचाई की और घरेलू मोटरों का उत्कृष्ट मेकेनिक है। शुरु-शुरु में तो बब्बू सेठ (श्रीराजेन्द्र चौधरी) के माध्यम से ईश्वर की सेवाएँ लेता रहा। किन्तु गए कुछ समय से मैं सीधे ही उससे सम्पर्क कर रहा हूँ। ईश्वर की खूबी यह है कि वह दी गई तारीख और समय पर कभी नहीं आता। बड़ी खूबी यह कि काम से इंकार भी नहीं करता। जब मैं चिढ़ कर उसे बुरा-भला कहता हूँ और कहता हूँ कि अब मत आना तो वह उसी शाम को प्रकट हो जाता है। आकर मेरी पत्नी से पूछताछ कर काम शुरु कर देता है और मुझे देखकर हँसने लगता है। उसकी हँसी मेरे गुस्से को अधिक टिकने नहीं देती। उसकी विनम्रता मुझ जैसे कुटिल आदमी को भी साध लेती है और मैं उसके सामने परास्त हो जाता हूँ। कहता हूँ - ‘अब तुझे नहीं बुलाऊँगा।’ वह मुँह फेरकर, हँसते हुए कहता है - ‘तो बताओ जरा, किसे बुलाओगे।’ और मैं कुनमुनाते हुए उसके पास से हट जाता हूँ। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सम्विदा शिक्षक की जिस नौकरी के लिए लोग हाथ-पाँव मारते हैं, सिफारिशें करवाते हैं, वह लगी-लगाई नौकरी छोड़कर ईश्वर ने खुद का रोजगार विकसित कर लिया है। अपने व्यवसाय पर गर्व करते हुए वह कहता है कि वह चाहे तो एक सम्विदा शिक्षक को नौकरी पर रख सकता है।

जिस दूसरे मेकेनिक के हत्थे मैं इन दिनों चढ़ा हुआ हूँ उसका नाम शैलू है। इसकी शकल मुझे याद नहीं क्योंकि इससे मैं अब तक एक बार ही मिला हूँ। मेरे ‘अध्यक्षजी’ के माध्यम से मैं शैलू के सम्पर्क में आया हूँ। ‘अध्यक्षजी’ याने नीम चौक वाले, रतलाम में डिश टीवी के मालिक श्रीमहेन्द्र बोथरा। इनसे मैंने लकड़ी का कूलर खरीदा था। उसी में कुछ काम कराना है। शैलू पहले काम कर चुका है। कोई चार महीनों से मैं उसकी मिन्नतें, चिरौरियाँ कर रहा हूँ लेकिन वह है कि सुन ही नहीं रहा। आठ-दस बार तो वह ‘श्योअर शॉट’ आने की तारीखें दे चुका है किन्तु अब तक नहीं आया है। अध्यक्षजी का बेटा सौरभ और खुद अध्यक्षजी एक-एक बार उसे कह चुके हैं। 16 दिसम्बर पक्की हुई थी। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ कि वह 16 दिसम्बर 2010 से पहले जरूर आ जाए।


तीसरे मेकेनिक के बारे में तो सोच कर ही मेरी आत्मा काँप जाती है। उसकी शकल मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकूँगा। मेरी कुटिलता उसका असली नाम जाहिर करने को उकसाती है किन्तु विवेक रोकता है। सो उसका काल्पनिक नाम इमदाद मान लीजिए। मेरे आत्मीय और बहुत ही तहजीबदार एजेण्ट प्रिय खालिद (पूरा नाम मोहम्मद खालिद कुरैशी) के जरिए इस मेकेनिक से मेरा साबका पड़ा। इसने जो व्यवहार दिया वह कल्पनातीत है। इतना ही कह सकता हूँ कि इससे तो भगवान आप सबको और मेरे दुश्मनों (यदि कोई है तो) को भी बचाए। मेरा फ्रीज ठीक करने के लिए यह आया था। मुझे लग रहा है कि मैंने गए जनम में ईश्वर के प्रति बहुत बड़ा अपराध किया था जो इस जनम में इमदाद से मिलना पड़ा। फ्रीज का कम्प्रेशर बदलने के लिए इसने मुझसे पूरी रकम ली। कम्प्रेशर बदला। एक महीना भी नहीं हुआ कि कम्प्रेशर खराब हो गया। मैं किसे कहता? इमदाद को ही! मैं फोन करूँ और वह या तो फोन उठाए ही नहीं या बन्द कर दे। एक-दो बार उठाया भी तो सीधे मुँह बात नहीं करे। मैंने कहा कि वह कम्प्रेशर का बिल मुझे दे दे ताकि मैं दुकान से उसे बदलवा सकूँ क्योंकि कम्प्रेशर ग्यारण्टी की अवधि में है। इमदाद ने सीनाजोरी से कहा - ‘आपको बिल नहीं मिलेगा।’ मैंने पूछा - ‘क्यों?’ अपनी सम्पूर्ण अशिष्टता से उसने कहा -‘मेरी मर्जी। आपको जो करना हो, कर लो।’ मैं कर ही क्या सकता था? सो, कुछ नहीं किया। सिवाय इसके कि भगवान से प्रार्थना करूँ कि इस मेकेनिक की सेवाएँ लेने का दुर्भाग्य किसी को न मिले। मुझे इस बात का विशेष मलाल है कि इसके कारण बेचारा खालिद जैसा नेक लड़का मुझसे मिलते समय हर बार संकोच में पड़ता है।


यह सब पढ़ने के बाद अपनी यादों की गठरी खोलिएगा और बताइएगा कि मैं अकेला ही हूँ या आप भी मेरे साथ हैं?
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मोदी की प्रशंसनीय पहल


अब नरेन्द्र मोदी केवल, राज्य द्वारा प्रेरित, प्रोत्साहित ओर संरक्षित सामूहिक नस्लवादी नर संहार के लिए ही नहीं, भारतीय लोकतन्त्र की श्रेष्ठ सेवा के लिए भी याद किए जाएँगे।
मैं उन लोगों में से एक हूँ जो नियमित और निरन्तर यह माँग करते रहे हैं कि मतदाताओं को, सारे उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के लिए मतपत्र/ईवीएम पर ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए और यह प्रावधान करने के बाद मतदान अनिवार्य किया जाना चाहिए।


मेरी सुनिश्चित धारणा रही है कि हमें ‘मताधिकार’ तो है किन्तु ‘चयनाधिकार’ नहीं है। मतदाताओं की इसी विवशता का दुरुपयोग करते हुए राजनीतिक दल, ‘प्रयाशी चयन’ में ईमानदारी, चरित्र, सादगी, शिक्षा, योग्यता, पात्रता जैसे गुणों को दरकिनार कर ‘जीतने की सम्भावनावाले’ व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाते हैं। प्रत्याशियों के चयन के इस पैमाने पर प्रायः ही धन-बली और बाहु-बली ही खरे उतरते हैं। ऐसे लोगों को अधिसंख्य मतदाता स्वीकार करने की मनःस्थिति मे नहीं होते और इसी कारण वे मतदान नहीं करते।


यह ‘दीर्घ प्रतीक्षित प्रावधान’ देश को भ्रष्टाचार सहित अनेक समस्याओं से मुक्ति दिलाएगा और विधायी सदनों में हम ऐसे लोगों को देख सकेंगे जिन्हें वहाँ होना चाहिए।


भारत सरकार को भेजी अपनी 22 सिफारिशों में, भारत निर्वाचन आयोग ने यह प्रावधान भी शामिल किया हुआ था जिसमें से भारत सरकार ने कुल 5 सिफारिशें मानी जिनमें यह प्रावधान स्वीकार करनेवाली सिफारिश शामिल नहीं है। भारत सरकार ने जो चूक की उसे नरेन्‍द्र मोदी ने अपने स्तर पर, अपने प्रदेश में दुरुस्त कर भारत सरकार को रास्ता दिखाया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य प्रदेश भी इस ‘मोदी-मार्ग’ पर चलने का साहस जुटाएँगे।
चूँकि इस विधेयक के विस्तृत ब्यौर सामने नहीं आए हैं इसलिए कहना पड़ रहा है कि इस प्रावधान के तहत अस्वीकार किए गए उम्मीदवारों को पुनः उम्मीदवार बनने से रोकने का प्रावधान भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा किए बिना मोदी की यह सामयिक, ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पहल अप्रभावी हो जाएगी।


मुझ जैसे तमाम लोगों की ओर से नरेन्द्र मोदी को बधाइयाँ और अभिनन्दन।
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सड़कछाप आदमी आदमी की बातें


‘जब खुद ही ऐसे प्रपंच करते हैं तो वे झूठ और भ्रष्टाचार का विरोध किस मुँह से करते हैं?’ यह सवाल दाग कर वह चला गया।


यह सत्रह दिसम्बर की बात है। उससे तीन दिन पहले, चौदह दिसम्बर को मेरे कस्बे के नगर निगम के चुनावों के लिए मतदान हुआ था। सत्रह को मतगणना हो रही थी । मैं घर से निकलने को ही था कि वह आ गया-बीमा पाॅलिसियों की जानकारी लेने। बीमा से शुरु होकर बात चुनाव से गुजरते हुए अखबारों पर आ गई।


‘ये ऐसा क्यों करते हैं?’ उसने पूछा।


‘क्या करते हैं?’ मैंने प्रति प्रश्न किया।


उत्तर में उसने जो कुछ कहा वह मेरे लिए नया नहीं था किन्तु रतलाम जैसे मझौले कस्बे का एक औसत आदमी इस दिशा में सोचता है, चिन्ता करता है! यह मेरे लिए नई बात थी।


उसे, चुनावी विज्ञापनों को छापने को लेकर अखबारों के चाल-चलन पर आपत्ति थी। विज्ञापनों को समाचारों की तरह प्रस्तुत करने से वह अप्रसन्न था। ‘यह तो हम पाठकों की जगह पर अतिक्रमण है!’ उसने सरोष कहा। ‘विज्ञापन छापने से उन्हें कौन रोकता है? रोक सकता है भला? यह तो उनका धन्धा है? अपना धन्धा करने से उन्हें कौन रोकता है? अरे! विज्ञापन छापना है तो खूब छापो, धड़ल्ले से छापो लेकिन समाचार बनाकर तो मत छापो।’ उसकी इस समझ पर मुझे हैरत ही हुई। सड़कछाप आदमी को नासमझ मानने की भूल करनेवालों के लिए वह सशक्त उत्तर था। उसका कहना था कि अखबारवाले जब विज्ञापनों को समाचार की तरह छापते हैं तो इसका सबसे पहला मतलब तो यही है कि वे खुद जानते हैं कि वे गलत कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो वे उसे विज्ञापन के रूप में ही छापते। यह अनुचित आचरण है। मुनाफा जब सोच-विचार के केन्द्र में आ जाता है तो आदमी उचित-अनुचित नहीं देख पाता। विज्ञापनों को समाचार की तरह छाप कर वे सारे उम्मीदवारों को एक साथ लोकप्रिय और भारी बहुमत से जीतता हुआ बताते हैं। अब भला, सारे उम्मीदवार कैसे जीत सकते हैं? जीतेगा तो कोई एक ही! सबको जीतता हुआ बताना ही पाठकों के साथ बेईमानी है। पाठकों तक जानबूझकर सही बात नहीं पहुँचाई जा रही है।


उसका कहना था कि अखबार जब तक नहीं छपता तभी तक वह अखबार मालिक की मिल्कियत होता है। छपने की प्रक्रिया शुरु होते ही पाठकों की मिल्कियत बन जाता है। पाठकों की मिल्कियत के साथ बलात्कार करना अपने आप में अपराध है।


उसे इस बात पर भी आपत्ति थी कि विज्ञापनों को ‘इम्पेक्ट फीचर’ या ‘प्रायोजित प्रस्तुति’ या फिर ऐसा ही कोई नाम देकर छापते हैं। गोया, बन्दूक को आइस्क्रीम का नाम देकर वे चाहते हैं कि पाठक उसे आइस्क्रीम ही समझ लें। ऐसा करके अखबारवाले शुतुरमुर्ग की तरह रेत में चोंच गड़ा लेते हैं। वे समझते हैं कि पाठक कुछ नहीं समझता। यह उनकी नासमझी है। पाठक तो वह भी समझ लेता है जो अखबार मालिक खुद भी नहीं जानता या छुपाना चाहता है। जिस अखबार मालिक को अपने पाठकों की बुद्धि पर भरोसा नहीं वह सबसे बड़ा निर्बुद्धि है। जब समाचार की तरह छपे विज्ञापन को भी पाठक विज्ञापन समझ लेता है तो फिर वह कोई भी नाम दे दे, पाठक उसकी (अखबार मालिक की) और खबर की असलियत तो पहली ही नजर में जान लेता है। इन्हें समझना चाहिए कि ऐसे प्रपंच रचने से उनकी साख खराब होती है और विश्वसनीयता पर शंका होने लगती है।


‘अब आप ही बताइए! पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा खम्भा कहते हैं। खम्भे ऐसे होते हैं? अगर खम्भे ऐसे ही हैं तो चल लिया अपना लोकतन्त्र। भट्टा ही बैठना है ऐसे तो।’ उसका गुस्सा थम नहीं रहा था।


मैंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। लेकिन उसे मेरा चुप रहना भी खल रहा था। बोला - ‘आप भी तो पत्रकार हो। आप क्यों नहीं कुछ बोलते, करते?’ मैंने कहा कि मैं वैसा पत्रकार नहीं हूँ जैसा वह समझ रहा है। अखबारवालों से भी मेरी दोस्ती ऐसी नहीं कि मैं उनके निर्णय को प्रभावित कर सकूँ। मेरी बात उसे बहाना लगी। बोला - ‘आपकी बातों में कोई दम नहीं है। आप तो हम सबको चुप न रहने के लिए, अनुचित के विरुद्ध बोलने के लिए कहते हैं। फिर आप चुप क्यों हैं?’ मैंने कबूल किया कि उसकी बात सच है। मैंने चुप नहीं रहना चाहिए। बोलना चाहिए। मैंने कहा - ‘मैं कोशिश करूँगा।’ ‘यहीं तो इण्डिया मात खा गया। जिन पर भरोसा होता है वे ही भरोसा तोड़ते हैं। हम जैसे सड़कछाप लोग क्या कर सकते हैं? आप जैसों से कहने के सिवाय हमारी पहुँच आगे नहीं है। लेकिन आप भी कोशिश करने की बात करके अपनी चमड़ी बचा रहे हैं।’ मेरे पास कोई जवाब नहीं था उसकी बातों का। बड़ी मुश्किल से मैंने कहा - ‘ये लोग भले ही कितने ही खराब क्यों न हों। अपने को काम तो इन्हीं से चलाना पड़ेगा।’


उत्तर में वह झल्ला कर वही बात कह कर उठ गया जो मैंने शुरु में लिखी है - ‘जब खुद ही ऐसे प्रपंच करते हैं तो वे झूठ और भ्रष्टाचार का विरोध किस मुँह से करते हैं?’


इस सबमें आप अपने आप को किस जगह पाते हैं-मेरी जगह या उसकी जगह?
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एकान्त के बुनकर


उस दोपहर तेज बरसात हो रही थी। बरसात के तेवर देखने बाहर आया तो देखा-आचार्यजी सामनेवाले मकान के बरामदे में खड़े हैं। आचार्यजी याने सेवा निवृत्त प्राध्यापक डॉक्टर मणीशंकरजी आचार्य। हिन्दी के ज्ञाता, एकाधिक पुस्तकों के रचयिता, ऑरो आश्रम को समर्पित। आचार्यजी की बिटिया विनीता और दामाद संजय ओझा के मकान के ठीक सामने मेरा निवास है। सो, उस मकान के बरामदे में खड़े आचार्यजी मुझे नजर आने ही थे। वे बेटी-दामाद और नातियों से मिलने आए थे। विनीता-संजय बाहर थे। घर पर ताला लगा था। आचार्यजी के लिए यह शायद अनपेक्षित था। सो, असमंजस में थे और चूँकि बरसात से बचने का कोई उपकरण उनके पास नहीं था, सो प्रतीक्षा कर रहे थे कि बरसात रुके तो जाएँ।


मैंने उन्हें आवाज दी और मेरे निवास पर आने को कहा। उन्होंने ससंकोच इंकार कर दिया। मुझे न तो बुरा लगा और न ही अटपटा। ऐसे समय हम सब वैसा ही करते हैं। मैं सड़क पार कर उनके पास गया और तनिक अधिक जोर से अपना आग्रह दुहराया। वे फिर भी तैयार नहीं हुए। मैंने कहा - ‘आप इस दशा में खड़े रहेंगे तो विनीता और संजय मुझे बुरा-भला कहेंगे। पधारिए, आधा कप चाय आपके साथ पीने का सौभाग्य मुझे प्रदान कीजिए।’ वे अत्यधिक संकोच से, शायद बेमन से, मात्र संस्कार-शिष्टाचार के अधीन मेरे साथ आए।


मैं घर पर अकेला ही था। चाय मुझे ही बनानी थी। यह जानकर आचार्यजी और अधिक असहज हो गए। लेकिन वे कर ही क्या सकते थे। फँस गए थे। मैं खुश था। मेरे प्रिय और आदरणीय नायकों में से एक, मेरे घर में विराजमान था। मैं उन्हें ‘सारस्वत पुरुष’ कहता हूँ। गोया, ‘बैरन बरसात’ मेरे लिए ‘मन की मुराद पूरी करने वाली सौगात’ बन कर आई थी।


तेज और लगातार हो रही बरसात से उपजी ठण्डक के बीच कुनकुनी चाय का प्याला थामना हाथों को भला लग रहा था। आचार्यजी ने चाय का पहला सिप लिया और कहा - ‘आप चाय अच्छी बना लेते हैं।’ मैं झेंपा। किन्तु अगले ही क्षण मन ही मन हँस पड़ा। अच्छे लोग सदैव अच्छाई ही देखते हैं।


श्रीअरविन्द, श्रीमाँ और ऑरो आश्रम आचार्यजी के प्रिय विषय हैं। वे इन सबके अध्येता भी हैं, भाष्यकार भी और विद्यार्थी भी। अरविन्द दर्शन मुझे शुरु से ही क्लिष्ट और दुरुह लगा है। इसकी शब्दावली मुझे आक्रान्त करती है। मैंने, अपनी इसी उलझन पर उनसे कुछ देर बात की। हम चाय पीने लगे।


वे चुप बैठे थे। मौन मैंने ही तोड़ा। पूछा कि नई उमर के कवि-लेखक कभी उनसे मिलने आते हैं? आचार्यजी ने तत्क्षण कहा - ‘कोई नहीं आता।’ मैंने बात आगे बढ़ाई और पूछा कि उनकी पीढ़ी के, लिखने-पढ़नेवाले लोग कभी उनसे सम्पर्क करते हैं? इस बार आचार्यजी ठिठके। चाय का कप टेबल पर रखा। दोनों हाथों की अँगुलियाँ आपस में फँसाई, इसी दशा में दोनों हाथ माथे तक ले गए, मानो कुछ सोच रहे हों। क्षणोपरान्त बोले - ‘नहीं। उनमें से भी कोई सम्पर्क नहीं करता।’ आठ शब्दों का यह वाक्य कहने में उन्होंने मानो मीलों लम्बा सफर तय कर लिया। खिन्नता उनके चेहरे पर आकर मानो बाहर हो रही बरसात में बदल गई।


कमरे में भारीपन छा गया था। मैने कठिनाई से पूछा, लगभग हकलाते हुए - ‘आचार्यजी! क्या हम लोग एकान्त बुन रहे हैं?’ ‘बिलकुल सही कहा आपने।’ आचार्यजी बोले - ‘बुन ही नहीं रहे हैं, अपने आप को उस एकान्त का कैदी भी बना बैठे हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई आए और इस कैद से हमें निकाले।’ कहकर उन्होंने लम्बा निःश्वास लिया और टेबल पर कप ऐसे रखा, मानो बुरी तरह थक गए हों।


अब हम दोनों चुपचाप बैठे थे। बरसात का शोर कम हो गया था। बरसात हो तो रही थी किन्तु ऐसी नहीं कि रुकना पड़े। वे उठे। मैं भी। हम दोनों बाहर आए। विनीता-संजय अभी भी नहीं आए थे। मकान पर ताला जस का तस लटक रहा था। उन्होंने अपनी स्कूटी स्टार्ट की। मुझे धन्यवाद दिया। मैंने प्रणाम किया। सस्मित मौन उत्तर देकर वे चले गए।


मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा। वे जा रहे थे, शायद अपने एकान्त में कैद होने के लिए। मुझे मेरे घर लौटना था-अपने एकान्त में कैद होने के लिए।

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धन्यवाद ब्लॉग! धन्यवाद मित्रों!


बाँटने से खुशी बढ़ती है और दुःख कम होता है। सो, अपनी खुशी में बढ़ोतरी के लालच के वशीभूत मैं, आज अपनी खुशी आप सबके साथ बाँट रहा हूँ।

बरसों से मेरी इच्छा थी कि मैं ‘जनसत्ता’ में छपूँ। दसियों बार वहाँ अपना लिखा भेजा। एक बार भी नहीं छपा। कोई एक पखवाड़ा पहले चमत्कार हो गया। मेरी साध पूरी हो गई। मेरी पोस्ट ताजमहल और मेरा मन को जनसत्ता ने छापा, शायद ‘समान्तर’ स्तम्भ के तहत। उस दिन, पूरे दिन भर मैं पगलाया सा रहा। चाहता रहा कि सब लोग उसे देखें, चर्चा करें और मुझे फोन करें। कुछ सीमा तक मेरी यह चाहत पूरी हुई भी।

आज फिर लगभग वही स्थिति है। आज ‘दैनिक भास्कर’ ने अपने मध्यवर्ती पृष्ठ पर अपने समस्त संस्करणों में मेरा एक व्यंग्य छापा है। आज सवेरे से मित्रों के फोन आ रहे हैं। बड़ौदा, रायपुर, कोटा, भोपाल, उज्जैन, इन्दौर से अनेक मित्रों ने बधाई दी है। आज मेरा फोन सवेरे से घनघना रहा है। एक मित्र ने दैनिक भास्कर के इण्टरनेट संस्करण पर पढ़कर चैन्नई से फोन किया। आज फिर मैं पगलाया हुआ हूँ। उस बच्चे की तरह खुश हूँ जिसे वह मनचाहा खिलौना मिल गया है जिसकी माँग वह लम्‍बे समय से कर रहा था।

मैंने अपने आप को कभी भी साहित्यकार और लेखक नहीं माना। इस क्षण भी नहीं मानता। हाँ, साहित्य और साहित्यकार/लेखक प्रेमी अवश्य मानता हूँ। लिखनेवालों के आसपास बने रहने, उनके पास बैठने में मुझे बड़ा सुख मिलता है। अपने से बेहतर लोगों के साथ उठने-बैठने का कोई मौका नहीं छोड़ता। किन्तु आज मुझे कुछ मित्रों ने लेखक की तरह मान कर बधाई दी। और तो और मेरी सहधर्मिणी ने भी मुझमें लेखक देख कर मुझे बधाई दी।

यह खुशी मुझसे सचमुच समेटी नहीं जा रही। मैं बहत खुश हूँ। किन्तु प्रसन्नता के आवेग में ‘बेभान’ नहीं हूँ। मैं भली भाँति अनुभव कर रहा हूँ कि ब्लॉग और अपनी टिप्पणियों की कृपावर्षा कर मेरा हौसला बढ़ानेवाले कृपालु ब्लॉगर मित्रों के कारण ही मैं यह खुशी हासिल कर पा रहा हूँ।

सो, मैं आप सबको नमन करता हूँ। आप सबके कारण मुझे खुशी का वह प्रसंग मिल पाया जिसके लिए मैं बरसों से प्रयत्नरत रहा। मेरी यह खुशी आप सबको अर्पित है।
ब्लॉग जगत में मुझे लाने वाले मेरे गुरु श्री रवि रतलामी को अपनी यह खुशी मैं सबसे पहले अर्पित करता हूँ।

धन्यवाद ब्लॉग-जगत्। धन्यवाद मित्रों।

यही कृपा-भाव बनाए रखिएगा।

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चुनाव आगमन के संकेत

(मेरे कस्बे में नगर निगम के चुनाव चल रहे हैं। यह पोस्ट, उसी सन्दर्भ में दैनिक भास्कर के लिए लिखी गई है।)

सखि! मुझे क्यों लग रहा है कि नगर चुनावग्रस्त है?


खगवृन्द के कर्णप्रिय कलरव के स्थान पर वातावरण में उद्घोष-तुमुल छाया हुआ है। किसी के जिन्दाबाद का तो किसी को विजयी बनाने का आग्रह सामूहिक कण्ठों से कर्कश ध्वनि में उच्चारित होता सुनाई देता है।


सखि! गृह कार्य ने मेरी दुर्दशा कर दी है। मेरे ये मैले हाथ देख रही हो? बीस रुपये प्रति दिवस पारिश्रमिक पानेवाली मेरी गृह परिचारिका तीन दिनों से काम पर नहीं आ रही है। उसके निवास पर दूत भेजने पर ज्ञात हुआ कि वह ढाई सौ रुपये प्रति दिवस पारिश्रमिक पर किसी ‘जिन्दाबाद’ और ‘हमारा ध्यान रखिएगा’ जैसे अनुरोध करने वाले दल में सम्मिलित हो गई है। ऐसे दल चुनाव में ही तो आवश्यक होते हैं!
मेरे निवास के सामनेवाले सार्वजनिक उद्यान में इन दिनों युवा युगलों की संख्या अकस्मात ही बढ़ गई है। यौवनावस्थाजनित सहज भावोत्तेजना के अधीन आलिंगनबध्द ये युवा युगल निश्चय ही चुनाव अभियान में भाग लेने का बहाना कर, अपने घरों से निकलने का अवसर प्राप्त कर पा रहे होंगे। ये प्रार्थना कर रहे होंगे कि चुनाव बारहों महीने बने रहें।


मेरी प्रिय सखि! मैं देख रही हूँ कि अपनी समस्याओं के निदान के लिए जिन राजपुरुषों से मिलने के लिए जन सामान्य चक्कर काटता रहता है, प्रातःकाल से ही उनकी ड्यौढ़ियों पर जाकर, उनकी एक छवि पाने के लिए प्रतीक्षारत हो, दिन भर भूखा प्यासा बैठा रहता है और उनसे भेंट न होने पर सायंकाल कुम्हला कर घर लौटता है वे समस्त राजपुरुष इन दिनों अनामन्त्रित अतिथि बन समय-कुसमय, गली-गली, द्वार-द्वार उपस्थित होकर करबद्ध हो, विगलित स्वरों में ‘हमारा ध्यान रखियेगा’ जैसे निवेदन करते हुए याचक दिखाई दे रहे हैं। ऐसा तो चुनाव के प्रभाव से ही सम्भव है। अन्यथा, कमर से गर्दन तक स्टील रॉड लगे यान्त्रिक पुतले की तरह अकड़े रहनेवाले ये राजपुरुष भला इतने विनम्र कैसे होते?


हे! सखि, आज तो हद ही हो गई। बिना द्वार खटखटाए, बिल्ली की तरह नीरव पदचाप से चल कर, औचक आलिंगनबध्द कर, मेरा अधरपान कर मुझे स्पर्शजनित ‘सुखद विस्मय’ का आनन्द प्रदान करने वाले मेरे प्रियतम ने आज द्वार खटखटा कर, गृह-प्रवेश के लिए मुझसे अनुमति चाही और नत-मस्तक-करबध्द-मुद्रा में मुझसे ‘मेरा ध्यान रखिएगा’ की याचना की। मैं तो भौंचक रह गई। मेरा संशय दूर हो गया। पराये अपनों जैसा और अपनेवाले परायों जैसा व्यवहार तभी करते हैं जब वे चुनावग्रस्त हो गए हों।


सखि! मेरा हृदय अकुला रहा है। मेरा जी घर में नहीं रुक रहा। पगतलों में उत्साह समा गया है। मेरा मतदाता परिचय पत्र निकाल। मेरी पर्ची ला। मेरा मतदान केन्द्र बता। मुझे मेरे प्रियतम को मत देने जाना है।


चुनाव
जो आ गए हैं!

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