लोकतन्त्र का बीज और सार है लोगों के सवाल

पहले एक कथा।

ऋषि उद्दालक का बेटा श्वेतकेतु ज्ञान-क्षुधा ग्रस्त था। एक दिन ऋषि ने उससे वट वृक्ष का फल मँगाया। श्वेतकेतु फल ले आया। ऋषि ने कहा - ‘तोड़कर देखो और बताओ, इसमें क्या है?’ आज्ञापालन कर श्वेतकेतु ने कहा है - ‘बीज है।’ ऋषि ने कहा - ‘एक बीज तोड़कर देखो और परिणाम बताओ।’ श्वेतकेतु ने कहा - ‘कुछ भी नहीं।’ सुनकर ऋषि कहा - “जिस बीज में तुम्हें ‘कुछ नहीं’ दिखाई दे रहा है, उसी बीज से वह विशाल वट वृक्ष उगा है। यह, जिसे तुम ‘कुछ नहीं’ कह रहे हो, यह ‘कुछ नहीं’ ही सब चीजों का सार है। यही सर्वोच्च वास्तविकता है।”

इस कथा को यहीं छोड़िए। आगे काम आएगी। 

लोग अब खुलकर बोलने लगे हैं। अपने नेताओं से आमने-सामने हिसाब माँगने लगे हैं। सफाई में, बहाने बनाने में नेताओं को पसीना आने लगा है। वे रास्ते बदलने लगे हैं। पीछा छुड़ा कर भागने लगे हैं। जावद विधायक ओम प्रकाश सकलेचा को उनके मतदाताओं ने बोलने नहीं दिया। सवालों से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें भागना पड़ा। उनके ड्रायवर ने खेतों-मेड़ों के रास्ते गाड़ी निकाल कर उन्हें घर पहुँचाया। सकलेचा को अपने मतदाताओं से जान का खतरा नहीं था। उनके पास अपने मतदाताओं के सवालों के जवाब नहीं थे। वे लोगों को हाँकना चाह रहे थे और लोग हँकने को तैयार नहीं थे। मन्त्री बालकृष्ण पाटीदार को, रतलाम में, महिलाओं के सवालों का सामना करना पड़ा। वे बोलते रहे, महिलाओं ने एक न सुनी। वे लगातार अपनी बात कहती रहीं और सवाल पूछती रहीं। मन्त्री ने क्या कहा, यह अखबारों में नहीं छपा। केवल महिलाओं के सवाल छपे। ऐसे समाचार पढ़-पढ़कर लोग मजे लेते हैं। मुझे सन्तोष होता है। यह ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ है। जो काम पहले आम चुनाव के ठीक बाद से ही हो जाना चाहिए था, अब हो रहा है। बहुत देर से।

ऐसे तमाम मामलों को नेता, अपने विरोधियों की साजिश कह कर खारिज कर अपनी जग हँसाई कराते हैं।  सवाल पूछनेवाले लोग या तो सत्तारूढ़ पार्टी के ही कार्यकर्ता थे या पीड़ित जनसामान्य। इन्हें मन्त्री या अपने नेता से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। गुस्साए हुए ये तमाम लोग, अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने की प्रतीक्षा से उकताए, नाउम्मीद हो चुके, निराश, हताश लोग थे। आश्वासनों के ‘चिर कौमार्य’ ने इनका धैर्य छीन लिया।

नेता और जनता का रिश्ता आज ‘भेड़ और गड़रिया’ बन कर रह गया है। गड़रिया हर पाँचवे बरस भेड़ों के पास जाता है। उन्हें ठण्ड में कम्बल देने का भरोसा दिलाता है। भेड़ें खुश हो कर, अगली भेड़ के पिछवाड़े में अपना सर गड़ाए, एक के पीछे एक, रेवड़ बन कर चल देती हैं। कम्बल बनाने के लिए गड़रिया उनकी ऊन कतरता है। कम्बल भी बनाता है लेकिन ये कम्बल भेड़ों को नहीं, चुनावी चन्दा देनेवाले अपने पूँजीपति रहनुमाओं को दे देता है। उसे पता है, भेड़ों को तो ऊन देनी ही है। उसे नहीं तो उसके जैसे किसी दूसरे गड़रिए को देंगी। इसीलिए वह भेड़ों के पास तब ही जाता है जब उसे ऊन की जरूरत होती है। नेता खुद को ‘जन सेवक’ कहता है और ‘जन सेवित’ की, विलासी जिन्दगी जीता है। 

अपने क्षेत्र की बलात्कृत अबोध बच्ची के हालचाल पूछने सांसद सुधीर गुप्ता इन्दौर अस्पताल जाते हैं। बच्ची का बाप निःशब्द, अवाक् स्थिति में उनके सामने खड़ा है। सुधीर के पास खड़े, इन्दौर के विधायक सुदर्शन गुप्ता उससे कहते हैं - ‘सांसदजी सुबह चार बजे चलकर तुम्हारे पास आए हैं। उन्हें धन्यवाद तो दे दो।’ लाचार बाप के बोल नहीं फूटते। वह हाथ जोड़ देता है। लेकिन सांसद सुधीर गुप्ता, विधायक सुदर्शन गुप्ता को औपचारिकता के नाते भी नहीं टोकते - ‘नहीं! ऐसा मत कहिए। ये मेरे मतदाता हैं। मैं इनका सेवक हूँ।’ चुप रहकर वे सुदर्शन गुप्ता से सहमति जताते हैं। अपेक्षा करते हैं कि मौत से जूझ रही अपनी बेटी को देख रहा वह असहाय बाप खुद को, सांसद के प्रति कृतज्ञ अनुभव करे। यह रिश्ता हो गया है आज नेता और मतदाता का!

सच तो यह है कि अपने मतदाताओं से नेता का सम्पर्क शून्यप्रायः हो गया है। आम आदमी अब ‘प्राणवान वोट’ से एक सीढ़ी नीचे उतर कर ‘वोट देनेवाली निष्प्राण मशीन’ में बदल गया है। नेता को अब उसकी परवाह नहीं। इसका छोटा सा प्रमाण यह है कि विभिन्न निकायों, संस्थाओं के लिए तो वह अपने प्रतिनिधि की नियुक्ति करता है (जहाँ नेता की और प्रतिनिधि की ‘झाँकी’ जमती है, दोनों का रौब जमता है) लेकिन अपने मतदाताओं से सम्पर्क के लिए किसी भी स्तर पर, किसी भी प्रतिनिधि की नियुक्ति नहीं करता। लोगों की क्या परवाह करना! वे तो हमेशा ही रोते-गाते रहते हैं।

लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ  रही है। वह वही शकल ले रही है जो आजादी के बाद, अगले ही दिन से होनी चाहिए थी। बढ़ती शिक्षा, इससे उपजी सजगता, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट के चलते बढ़ती पारदर्शिता जैसी बातों के चलते अब सड़कछाप आदमी भी समझने लगा है कि नेता उसका वेतनभोगी प्रतिनिधि है, उसका मालिक, उसका भगवान नहीं। केवल  संस्कारवश ही उसे वह भगवान का दर्जा दिए बैठा है। नेता इसे ही सच मानने लगा है। आम आदमी सवाल पूछ कर, हिसाब-किताब माँग कर अपने नेता का यही भ्रम दूर करने लगा है। नेता को असुविधा होने लगी है। उसे उपदेश देने की, भाषण झाड़ने की आदत है। सवाल सुनने और जवाब देने की नहीं।

सतह का परिदृष्य चीख-चीख कर नेताओं को चेतावनी दे रहा है - ‘सम्हल जाओ! वर्ना कहीं के नहीं रहोगे।’ वह जमाना गया जब नेता बिना सोचे-विचारे कुछ तो भी बोल देता था, हवाई वादे कर दिया करता था और भूल जाया करता था। अब लोग याद ही नहीं रखते, उनके आडियो-वीडियो भी रखते हैं और जैसे ही नेता बात को टालने की या अपनी बात से पलटने की कोशिश करता है, आईना लेकर उसके सामने खड़े हो जाते हैं। नेता को शर्मिन्दा होना चाहिए। लेकिन नहीं होता। उल्टे, गुस्सा हो जाता है। 

यह सही समय है जब नेता और राजनीतिक दल अपनी गरेबान में झाँकें। वही वादे करें जिन्हें पूरा कर सकें। अपने बोले हुए पर कायम रहें। पलटी न मारें। इसके लिए उन्हें खुद या अपने जिम्मेदार प्रतिनिधियों के जरिए अपने मतदाताओं से जीवित सम्पर्क बनाए रखना पड़ेगा। लोगों की जरूरतें, उनकी मुश्किलें, उनकी आवश्यकताएँ जाननी पड़ेंगी। उन्हें अपने मतदाताओं से एक कदम आगे रहना पड़ेगा। 

यह काम पार्टियों को संगठन स्तर भी करना चाहिए। प्रतिपक्षी उन्हें आईना दिखाएँ, उससे पहले वे खुद ही अपने घर पर, अपने आदमी पर नजर रखें, उसे नियन्त्रित करें और उसे दुरुस्त करें। वे खुद ही अपना राजनीतिक ऑडिट करें। लोगों के सवालों पर खीझें, झल्लाए नहीं। उनके सवालों को खारिज नहीं करें। 

लोगों के जिन सवालों को ‘कुछ नहीं’, ‘फालतू की बातें’, विरोधियों की चाल’ कह कर खारिज किया जाता है वे सवाल ही हमारे लोकतन्त्र के जीवित, गतिशील और विकासशील होने का प्रमाण भी है और पोषक तत्व भी। ये सवाल ही हमारे लोकतन्त्र का विशाल वट वृक्ष हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे कि ऋषि उद्दालक ने श्वेतकेतु से कहा था - “यह, जिसे तुम ‘कुछ नहीं’ कह रहे हो, यह ‘कुछ नहीं’ ही सब चीजों का सार है। यही सर्वोच्च वास्तविकता है।”

लोगों के सवालों से चिढ़िए मत! उन्हें धन्यवाद दीजिए। आभार और कृतज्ञता प्रकट कीजिए। उनके सवाल ही हमारे लोकतन्त्र का बीज, लोकतन्त्र का सार हैं।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 12 जुलाई 2018

बर्लिन की पहचान और आकर्षण: टेलीविजन टॉवर

‘बर्लिन से बब्बू को’ - चौथा पत्र: तीसरा हिस्सा



बर्लिन में मुख्य चौक पर वहाँ का आधुनिकतम विशाल टेलीविजन टॉवर है। यह टॉवर विज्ञान का एक चमत्कार ही कहा जाएगा। जमीन से 365 मीटर ऊपर गगनचुम्बी ऊँचाई लिये यह टेलीविजन टॉवर मीलों दूर से दिखाई पड़ता है। इसकी लिफ्ट अनूठी है। कोई 260 मीटर ऊपर इसमें एक आधुनिकतम रिवाल्विंग कैफे बना हुआ है, जिसमें बैठकर दर्शक चाय काफी पीते हुए एक घण्टे तक बर्लिन को दूर-दूर तक आराम से देख सकते हैं। दर्शक अपनी सीट पर ही बैठे रहते हैं और होटल पूरा एक चक्कर लगा लेता है। सारे संसार में यह काफी हाऊस “टेली  कैफे  के नाम से मशहूर है। हम 21 लोगों का इस काफी हाऊस में काफी और केक खाने का बिल कोई 220 मार्क याने केवल 880 भारतीय रुपयों का आया। टॉवर की प्रवेश फीस अलग है, जो कि प्रति व्यक्ति शायद दो या पाँच मार्क है। इस टॉवर पर से पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन साफ दिखाई पड़ता है। बर्लिन की ऐतिहासिक दीवाल यहाँ बैठकर देखने वालों के लिए अपने सारे अर्थ खो देती है। इस टॉवर पर हमारे दल के अधिकांश सदस्यों ने एक काम जानबूझकर किया। वह काम है धरती पर 260 मीटर की ऊँचाई से पेशाब करना।

बर्लिन टॉवर के केफे गलियारे का एक दृष्य

बर्लिन में प्रायः तीन तरह के पेशाब घर बने होते हैं। होटल के अपने कमरों में पेशाब करने के सिवाय यदि कोई बाहर किसी मूत्रालय में मूत्र विसर्जन करता है तो उसे वहाँ के दस, बीस या तीस पैसे चुकाने पड़ते हैं। याने भारतीय हिसाब से 40, 80 और 120 पैसे हुए। व्यवस्था और स्थान के हिसाब से मूत्रालय तीन श्रेणियों में बँटे हुए हैं। भारतीय जलवायु में पले हुए शरीरों से, ठण्डे प्रदेशों में चाय, काफी, बीयर और व्हिस्की तथा कोला आदि पेय अधिक पीने के कारण बार-बार मूत्र विसर्जन के लिए जाना पड़ता है। तुम इसे मजाक समझोगे, पर यदि कोई व्यक्ति बर्लिन में एक महीना रहे और दिन में 4-5 बार भी पेशाब करने के लिए ऐसे पेशाब घरों में जाए तो भारत सरकार जितनी विदेशी मुद्रा उसे देती है वह सारी की सारी केवल इसी काम में खर्च होने की पूरी सम्भावना सर पर मँडराती रहती है। पर टेलीविजन टॉवर पर जब मैंने इस काम की शुरुआत की तो लोग एक दूसरों से चिल्लर-पैसा उधार लेकर बाथरूम में घुस गये। इस टॉवर को देखने के लिए संसार भर के यात्री यहाँ भीड़ बनाये खड़े रहते हैं।

बर्लिन टॉवर का गलियारा रात में



अचानक मिल गईं ग्‍वालियर की पत्तोबाई

इस टॉवर के ठीक नीचे मैंने पहली बार भारत की प्रसिद्ध पुतली विशेषज्ञा पत्तोबाई से बात की। जिन दिनों हम लोग जी. डी. आर. में घूम रहे थे, उन दिनों वहाँ भारतीय हस्त शिल्पकला की एक प्रदर्शनी चल रही थी। कोई श्रीमती प्रसाद इस प्रदर्शनी की इंचार्ज थी और मधुबनी तथा राजस्थान के कई कलाकार वहाँ अपनी कलाओं का प्रदर्शन कर रहे थे। पत्तोबाई ग्वालियर की हैं और राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत हैं। यह दल गये कुछ महीनों से यूरोप में घूमकर अपनी कला प्रदर्शनी लगा रहा है। मकवाना के एक राजस्थानी शिल्पी से जब मैंने मालवी बोली में बात शुरु की तो वह अपनी कठपुतलियों का तमाशा रोककर मेरे पास आकर मुझसे बात करने लगा। महीनों बाद उसने अपनी बोली सुनी। उसे बिलकुल विश्वास नहीं हुआ कि यहाँ कोई उससे उसकी बोली में बोलने इस तरह आ जाएगा।

और बच्चे तब भी नहीं रोएँगे

बर्लिन शहर में घूमते हुए हमारी गाईड, हमारी चलती हुई बस में हमें लाउडस्पीकर पर अंग्रेजी में गलियों और इमारतों का परिचय दे रही थी। तब एक स्थान पर एकाएक श्रीमती रुथ ने गाड़ी रुकवाकर मुझसे कहा कि मिस्टर बैरागी आप कुछ देर के लिये सामने वाली इमारत में चले जाईये, आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। आप दो हफ्तों से हमारे देश में रोता हुआ बच्चा ढूँढ रहे हैं, वह आपको इस इमारत में मिल जाएगा। जब मैंने उस इमारत का परिचय जानना चाहा, तो रुथ ने हँसते हुए बताया कि वह बर्लिन का प्रसिद्ध जच्चाखाना है और हमारे बच्चे यहाँ जन्म लेते हैं। पर जब बस चली तो श्रीमती रुथ ने बहुत गम्भीर होकर मुझसे कहा कि मेरे कवि मित्र! हम लोग समाजवाद की ओर से साम्यवाद की ओर बढ़ रहे हैं। हमारा बस चला तो हम यह प्रयत्न करेंगे कि हमारी व्यवस्था में बच्चा पैदा होते समय भी नहीं रोये। बच्चों को प्रसन्न रखना हमारा एक राष्ट्रीय दायित्व है। यद्यपि यह बात तब हँसी में उड़ा दी गई थी, पर इस बात के पीछे एक छटपटाता हुआ संकल्प मुझे साफ दिखाई दे रहा है। असम्भव को सम्भव करने के लिये ये लोग कितने आतुर हैं!

जब बी. बी. सी. पर समाचार आया कि पाकिस्तान ने हमारे अपहृत हवाई जहाज को अपनी सूझबूझ और विवेक से बचा लिया है तथा सभी यात्रियों को अपना मेहमान बना लिया है, तब हम लोगों में हर्ष की लहर व्याप्त हो गई। हमारे मेजबान देश ने भी अच्छा महसूस किया। तुम्हें मालूम है कि इस हवाई जहाज में राजस्थान के मन्त्री श्री गुलाबसिंह शक्तावत (जो मेरे निजी मित्र हैं) भी सफर कर रहे थे। मैं बहुत चिन्तित था। 

जी. डी. आर. में हमारे राजदूत श्री अरविन्द देव एक सुलझे हुए व्यक्ति हैं और अत्यन्त आदर पाते हैं। जिस इमारत में भारतीय दूतावास है, उसी में पाकिस्तान का दूतावास भी है। नीचे की मंजिल पर पाकिस्तान और ऊपर की मंजिल पर भारत के झण्डे लहराते हुए दूर से दिखाई पढ़ते हैं। श्री देव से हमारी मुलाकात कोई तीन बार हुई। पहली बार उनके कार्यालय में। दूसरी बार इण्डिया क्लब के स्वागत समारोह में और तीसरी बार आज की काकटेल पार्टी में। काकटेल पार्टी को मैंने मयूरपंखी पार्टी कहना ठीक समझा। लोगों ने रात को कोई दो बचे तक शराब पी। शराब क्या, तरह तरह की शराबें पी। मैं वहाँ से रात साढ़े आठ बजे ही लौट आया और तुझे पत्र लिखने बैठ गया। अभी तक लोग उस पार्टी से लौट रहे हैं। अधिकृत तौर पर यह कार्यक्रम हमारा इस यात्रा का अन्तिम कार्यक्रम था।
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चौथा पत्र: चौथा हिस्सा निरन्तर


पूर्वी जर्मनी के सहज, समझदार स्कूली बच्चे

‘बर्लिन से बब्बू को’ - चौथा पत्र: दूसरा हिस्सा


बर्लिन आने से पहले हम लोग एक और काउण्टी के केन्द्रीय नगर में ले जाए गये। यहाँ हमें जवाहरलाल नेहरू स्कूल में ले जाया गया। पण्डितजी के नाम पर सात समन्दर पार इतना अच्छा स्कूल चलना अपने आप में एक सुखद उपलब्धि है। यह भारत का गौरव है। जिस शहर में यह स्कूल चल रहा है उसकी आबादी 30 हजार के आसपास होगी किन्तु मैं कह सकता हूँ कि ऐसा स्कूल भारत में शायद बम्बई व दिल्ली में भी नहीं होगा। स्कूल में सारी कार्यवाही का संचालन 12 वर्ष तक की उम्र के बच्चों ने किया। उन्होंने तरह-तरह के गीत गाये और अपने स्कूल की गतिविधियों की कई स्लाईडें अपने प्रोजेक्टर पर हमें दिखाईं। इन स्लाइडों की कामेण्ट्री भी वे बच्चे ही कर रहे थे। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के जी. डी. आर. दौरे के समय उस स्कूल के बच्चों ने उनसे भेंट की थी। उस भेंट की कुछ पारदर्शियाँ हमें बच्चों ने दिखाई। इस में सबसे अन्तिम पारदर्शी जो दिखाई गई वह थी पकवानों से सजी सजाई एक टेबल। याने हमारे दोपहर के भोजन की पूर्व सूचना।

इस स्कूल के बच्चों ने एकाएक हमसे कहा कि अब आप लोग हमसे मनचाहे प्रश्न कर सकते हैं। सारा प्रतिनिधि मण्डल एकाएक सन्नाटे में आ गया।  सन्नाटा बच्चों ने ही तोड़ा। एक मिनिट तक जब उनसे किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया तो एक बच्चे ने अपनी ओर से प्रश्न किया कि आप भारत के कौन-कौन से प्रान्तों से आये हैं और क्या आप हमें अपना परिचय देंगे?

उस स्कूल में मैने दो गीत गाये। पर जब सारा कार्यक्रम समाप्त हुआ तब हम लोग नीचे उनकी मेस में गये, तो मैंने देखा कि वहाँ सैकड़ों बच्चे भोजन कर रहे हैं। कहीं शोर-शराबा नहीं था। हमारे दल को अपने बीच पाकर भोजन करते हुए एक बच्चे ने उठकर कहा माननीय महानुभाव! आईये, हमारे साथ भोजन कीजिये। हमने सुना है कि आपके दल में एक कवि भी है, क्या वे कवि महाशय हमें अपनी कोई रचना सुनायेंगे? और सारी मेस तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज गई। मैं गीत गाता रहा। बच्चों ने खाना रोक दिया और जब दुभाषिये ने उन्हें पूरा गीत समझाया तब फिर उन्होंने मेरा अभिवादन किया। मेरे लिये यह सब कुछ किसी कविता से कम नहीं था। इतने निस्संकोच, ताजा और उमंग भरे मुखर बच्चे मैंने अपने जीवन में शायद पहली बार देखे थे। हमारा दोपहर का भोजन इस स्कूल की ओर से था, पर था वह एक शानदार होटल में। स्कूल के बाल प्रतिनिधियों ने हमारे साथ भोजन किया पर किसी किस्म की बीयर या शराब या सिगरेट उन्होंने हमारे सामने नहीं पी। हाँ, उनकी शिक्षिकाएँ अवश्य यह सब सेवन कर रही थी।

सफर निःशुल्क हो गया तो?

बर्लिन अपने आपमें एक अद्भुत शहर है। इसकी प्राचीनता और आधुनिकता दोनों अपनी-अपनी जगह बेमिसाल हैं। सारे शहर में आवागमन के पर्याप्त साधन हैं। जमीन के अन्दर चलने वाली मेट्रो मैंने पहली बार देखी। यह गाड़ी बहुत तेज चलती है। इस गाड़ी में हम लोग कोई 3-4 स्टेशन तक गये। मेट्रो के ऊपर बिजली से चलने वाली सामान्य रेलें हैं और फिर ट्राम, बसें और कारें हैं। किसी यात्री पर कोई चेकिंग नहीं। हमारे अस्सी पैसे याने उनके बीस पैसे का टिकिट लो और मनचाहा घूमो। टिकिट की मशीन रहती है, खुद ही टिकिट निकालो और उसे खुद ही पंंच करो तथा सफर शुरु करो। वैसे टिकिट के लिये खिड़की पर आदमी भी बैठता है। वक्त-बेवक्त वहाँ क्यू भी लगते हैं, पर कोई यात्री बिना टिकिट सफर नहीं करता। पंंच किया हुआ टिकिट दूसरी बार काम नहीं आता। लोग एक ही बार जितना पैसा होता है उतना टिकिट निकाल लेते हैं। अपने पास रखते हैं। सफर शुरु करने से पहले उस टिकिट को पन्च कर लेते हैं। बेईमानी की पूरी गुंजाईश है पर कोई बेईमान हो तो बेईमानी करे! आप क्यू में खड़े हैं, आपके पास टिकिट के लिये यदि बीस पैसे नहीं है तो आपका पड़ोसी अपनी जेब से 20 पैसे आपको टिकिट के लिए दे देगा। संगोष्ठी में मैंने जब उन 20 पैसों के बारे में जानकारी ली, तो संगोष्ठी के प्रमुख ने मुझे बताया कि हमें यह बीस पैसा मशीन से खजाने तक पहुँचाने में 28 पैसा खर्च करना पड़ता है, याने प्रति टिकिट आठ पैसे का घाटा। सरकार यह सोच रही है कि वहाँ ऐसी यात्री फ्री कर दी जाये ताकि इस घाटे से देश को बचाया जा सके। बर्लिन की आबादी कोई 11 लाख है और वहाँ इन साधनों से प्रतिदिन कम से कम 10 लाख आदमी सफर करते हैं। इससे तुम प्रतिदिन के घाटे का अन्दाजा लगा सकते हो। यदि देश में यह ट्रांसपोर्ट मुफ्त कर दिया तो सारे संसार में तहलका मच जाएगा। उधर रूस के अर्थशास्त्री इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं कि पूरे रूस में डबल रोटी मुफ्त हो जाए। तुम सोचो, अगर रूस में डबल रोटी मुफ्त और जी. डी. आर. में शहरी भ्रमण निःशुल्क हो गया तो संसार का अर्थशास्त्र किस मोड़ पर जाकर खड़ा हो जाएगा?

बसों, रेलों और ट्रमों में फाटक अपने आप खुलते हैं, अपने आप बन्द होते हैं और बच्चों, अपाहिजों, बीमारों तथा घायलों के लिये सीटें अलग से चिह्नित की हुई रहती हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्ति सफर नहीं कर रहा तो तो उन सीटों पर कोई भी बैठ सकता है।

जी. डी. आर. में मैंने विकलांग बहुत देखे। शायद यह सब युद्ध का अवशेष है, पर मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है कि वहाँ मुझे अन्धे, काने और ऍंचकताने चेहरे देखने को नहीं मिले। होंगे जरूर पर अपने हिसाब से रहते होंगे। महिलाओं में एक विशेष खब्त देखा। वे अपने आपको काला या साँवला बनाना और दिखाना चाहती हैं। इसलिये पाँवों में कमर तक के साँवले और हल्के साँवले रंग के नायलॉन के स्लेक्स पहनना वहाँ बहुत प्रचलित हैं। तुम कल्पना करो कि टाँगें साँवली और हाथ-मुँह गोरे! कैसी लगती होंगी ऐसी महिलाएँ?
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सार्थकता जहाँ सर्वोपरि है


‘बर्लिन से बब्बू को’ - चौथा पत्र: पहला हिस्सा


चौथा पत्र

बर्लिन से
21 सितम्बर 1976

प्रिय बब्बू,

सुखी रहो,

राम जाने तुम्हें मेरे पहले वालेे पत्र मिलेे भी होंगे या नहीं। मैं यही मानकर निरन्तर तुम्हें लिखता जा रहा हूँ कि मेरे सभी पत्र तुझे बराबर मिल रहे होंगे।


आज बर्लिन आये हम लोगों को पूरा हफ्ता हो गया है। इस हफ्ते में हम लोग बहुत व्यस्त रहे और बर्लिन को खूब घूम फिर कर देखा। आसपास के इलाकों में भी हम लोग गये और कई संस्थानों, संस्थाओं और कारखानों में हम लोग घूमते फिरते रहे, मिलते रहे और इस देश को निकट से देखते रहे। अब मेरे पास लिखने को बहुत है, तो भी मैं जानता हूँ कि मैं उतना सब नहीं लिख पाऊँगा जितना कि लिखा जाना चाहिये। इन पत्राेंं के द्वारा मेरा उद्देश्य इस देश के बारे में नीरस आँकड़े लिख कर किसी तरह का प्रचार करना नहीं है। मैं तो उन बातों पर विशेष जोर दे रहा हूँ जो लगती बहुत छोटी हैं पर जिनके अर्थ कहीं गहरे होते हैं। जैसे आज अठारह दिन हो गये हम लोगों ने इतने भ्रमण के बावजूद इस देश में एक भी बच्चा रोता हुआ नहीं देखा। एक भी कार, बस या ट्रक या ट्रेक्टर का हॉर्न नहीं सुना। भौंकता हुआ कुत्ता नहीं देखा, हाथापाई करते हुए आदमी नजर नहीं आए और व्यर्थ की बहस या निकम्मी गपशप किसी रेस्तराँ या चौराहे पर होते नहीं देखी। न कोई ऊलजलूल नारेबाजी, न कोई अनचाही भीड़, न कोई धक्का-मुक्की। ये सारी  बातें बहुत छोटी हैं पर किसी देश के चरित्र से इन बातों का बहुत गहरा सम्बन्ध है। काश! मैंने कहीं भी एक भी क्यू टूटता हुआ देखा होता। कोई आदमी क्यू को तोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता। गलत जगह से सड़क पार करते हुए किसी को नहीं देखने पर हम लोगों को न जाने कैसा लगता रहा है। क्या तुम विश्वास करोगे कि इतना घूमने फिरने के बाद भी हम लोगों ने मुश्किल से दस महिलाएँ गर्भवती देखी होंगी? मेरे पाठक इस बात पर शायद मेरी आलोचना करेंगे कि मैं वहाँ क्या यही सब देखने  गया था? पर बब्बू! मुझे बहुत आनन्द हो रहा है यह लिखने में कि कितनी कम आबादी बाला देश होते हुए भी जी. डी. आर. परिवार नियोजन के प्रति बिना किसी आन्दोलन के अत्यन्त सजग है। अनावश्यक बच्चे पैदा करना इस देश की फितरत नहीं है।

सैक्स: शरीर की निकम्मी भूख नहीं

जब बात गर्भवती महिला की आती है तो मुझे यह लिखकर बहुत सुख मिल रहा है कि इस देश में ज्यों ही साढ़े तीन महीने से ऊपर का गर्भ हुआ कि उस महिला को एक विशेष तरह का वस्त्र पहनना होता है जो एप्रीन की तरह का होता है। दूर से ही पता चल जाता है कि सामने वाली महिला गर्भवती है। बात यहीं समाप्त नहीं होती। उस महिला को एक विशेष टोकन या कार्ड दे दिया जाता है, जिसे बताने मात्र से उसे फिर किसी क्यू में खड़ा नहीं होना पड़ता। वह भीड़ से बचायी  जाती है और सर्वत्र प्राथमिकता के आधार पर बैठने का स्थान पाती है। उसकी समुचित देखभाल का पूरा जिम्मा सरकार का होता है। जच्चा और बच्चा दोनों की सारी देखभाल डाक्टरों के जिम्मे हो जाती है। उसे भरपूर निर्वाह का पैसा मिलता है और जब बच्चा पैदा हो जाता है तो उसके साल भर बाद तक उसे पर्याप्त रुपया अपने खर्च के लिए घर बैठे मिलता रहता है। साल भर के बाद वह महिला इत्मीनान से अपने काम पर लौट सकती है और अपने पुराने स्थान पर निश्चिन्त होकर काम कर सकती है। लेकिन वहाँ इतने (आर्थिक) आकर्षण के बावजूद  बच्चे कम पैदा किये जाते हैं। एक गोष्ठी में मैने वहाँ के एक जिम्मेदार व्यक्ति से जब यह पूछा कि आखिर आपके देश में बच्चे कम क्यों पैदा किये जाते हैं? तो उन महाशय ने मुझे उत्तर दिया कि जब स्त्री और पुरुष सबेरे आठ बजे से रात को साढ़े आठ बजे तक कठोर परिश्रम करें और अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या जियें तो बच्चा पैदा करने की शारीरिक स्थिति कैसी होती होगी, इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं। बात मेरे गले उतर गई। सेक्स इस देश में विलास नहीं है, वह शरीर की निकम्मी भूख भी नहीं है।

यूसाडेल से बर्लिन लौटने के दिन हम एक ट्रेड यूनियन के दफ्तर में खाना खाने गये और जब उस ट्रेड यूनियन के विशाल हाली-डे-होम  में घूम रहे थे तब मैंने उसे एप्रीन के आधान पर पहचान लिया कि जो लड़की इस समय हमारी गाईड है, वह गर्भवती है। मैंने उससे पूछा कि आपको इससे पहले कितने बच्चे हैं, उसका निस्संकोच उत्तर था, जी यह मेरा पहला गर्भ है। मैंने और हमारे सभी मित्रों ने बारीकी से देखा कि इस प्रश्न और उत्तर के समय उसकी आॅंंख में कोई झिझक या व्यर्थ की लज्जा नहीं थी। वह सन्तुलित थी, पर उसका अतिरेक एकाएक उस समय फूट पड़ा, जब मैंने उससे कहा- आपके प्रथम पुत्र के जन्म के उपलक्ष में मेरा हार्दिक अभिवादन स्वीकार करें और यदि सम्भव हो तो उस बच्चे को पहला चुम्बन भारत की ओर से दें। मेरा यह कथन सुनते ही उसकी आँखें बरबस बह चलीं और वह सब कुछ भूल कर मुझसे लिपट सी गई। पहले गर्भ से उसे पुत्र होगा, यह शुभकामना मात्र ही उसके लिए आनन्ददायक थी। होता यह है कि हम दुभाषियों के माध्यम से बात कर रहे होते हैं, तब भावों का सम्प्रेषण, वाक्य समाप्त होते ही नहीं हो जाता है। पर माँ अन्ततः माँ होती है। नारी केवल नारी होती है। व्यवस्था और वातावरण उसकी कोमलता को नष्ट नहीं कर पाते। इसका प्रमाण यह छोटी सी घटना है। भगवान उस कन्या को पुत्र ही प्रदान करे।


पूजा और प्यार का फर्क याने पश्चिम बनाम पूर्व

बर्लिन से बब्‍बू को
तीसरा पत्र - तीसरा/अन्तिम हिस्सा

क्या तुम परिवार वाले इस बात पर विश्वास करोगे कि इस साल मेरी सर्दियाँ 6.30 माह की हो गईं? 24 अगस्त को मैं घर से चला था। 26 अगस्त को मारिशस के लिए दिल्ली छूटी और 27 अगस्त को मैं वहाँ पहुँचा। तब से मैं गरम कपड़े, शाल और ओव्हर कोट पहन रहा हूँ। यह क्रम चलेगा मार्च के पहलेे सप्ताह तक। शाल तब छूटेगी। अगस्त अन्तिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह तक हो गये न 30 सप्ताह पूरे? सर्दी मुझ से सही नहीं जाती है और इस बार उसी से साबका खुलकर  पड़ा है। आज यहाँ इन 12 दिनों में सर्वाधिक कम तापमान है। +10 डिग्री तक आ गया। कल इस पखवाड़े का सर्वाधिक तापमान था +23 डिग्री। रोस्तोक से चलेे तो पसीना निकल रहा था। आज यहाँ सर्दी जान लेे रही है। मारे सर्दियों के चमड़ी सबकी सूख गई है और शकलें अधिक भारतीय हो गई हैं। यूसाडेल नामक यह स्थान न्यूब्राण्डेनबर्ग प्रान्त का एक सुन्दर स्थल है। न्यूब्रान्डेनबर्ग शहर की आजादी कुल 60 हजार है पर इसका साँस्कृतिक भवन इतना दर्शनीय है कि सारे म. प्र. में उसके मुकाबले का कोई थियेटर नहीं है। इन्दौर और भोपाल के रवीन्द्र भवन उसके सामने बौने लगते हैं। 14 मंजिला इस इमारत की 10वीं मंजिल पर आज शाम को हमने एक एक प्याला काफी पी। प्रति प्यालेे की कीमत चुकाना पड़ी केवल 15 भारतीय रुपये। शहर से कोई 20 मील दूर बर्लिन की तरफ एक छोटी सी टेकरी पर एक मोटेल (होटल नहीं) मित्रोपा में हम लोग ठहराये गये हैं। रोस्तोक के बारनो होटल से अधिक अच्छा कमरा इस मोटेल में मुझे दिया गया है। किराया यहाँ और वहाँ बराबर है, सिंगल बेड रूम 180 भारतीय रुपये और डबल बेड रूम 360 भारतीय रुपये प्रतिदिन।

आज दोपहर को एक देहाती रेस्तराँ में हमारा भोजन था। वहाँ खाना परोसने वाली एक कन्या ने पहली बार सौन्दर्य के नाम पर हम सबको आकर्षित किया। झूठी प्‍लेटें उठाते हुए भी उसका सौन्दर्य अपरिमित लग रहा था। इस देश की महिलाएँ दो कारणोंसे आकर्षित नहीं कर पातीं। एक तो उनकी पिण्डलियाँ। बड़ी मोटी और भद्दी होती हैं। दूसरे उनके दाँत। गोरे चिट्टे माखनी रंग-रूप में उनके दाँत शायद शराब, सिगरेट और मांसाहार के कारण न जाने कैसे गन्दे और सँवलाये-सँवलाये से लगते हैं। मुस्कान तक तो अच्छी भली लगती है पर हँसने पर सब गड़बड़ हो जाती है। वही हाल, चाल का है। उठ कर चली कि पिण्डलियाँ बल्लियों की तरह तन जाती हैं। उस पर ऊँची एड़ी की सेण्डिलें! अरे राम राम!

फर्क पूजा और प्यार का
कल विश्व विद्यालय में मेरे एक प्रश्न ने हमारी दुभाषिनी श्रीमती इरीस क्रोबा को मुझसे नाराज कर दिया। मेरा प्रश्न था क्या इस सरस्वती मन्दिर में विद्यार्थियों को शराब सरे आम पीने दी जाती है? और, यहाँ केण्टीन में बिकती है? यह प्रश्न मैंने विश्व विद्यालय के अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क अधिकारी से किया था। श्री क्लोफर दुभाषिये का काम कर रहे थेे। मुझे सपने में भी ख्याल नहीं था कि 23 वर्षीया एक सुन्दर श्रीमती कन्या मुझमें अतिरिक्त दिलचस्पी लेे रही है। दस दिनों से यह पक्ष अँधेरा था। इरीस इस प्रश्न का बहुत-बहुत बुरा मान गई। मुझसे तुनक तक पड़ी। इरीस स्वयं पीने पिलाने में दक्ष लगती है। मैं इस मामलेे में निरा कोरा आदमी। बिलकुल अकेले में लेे जाकर उसने पूरे आहत भाव से मुझे साधिकार बुरा-भला कहा। तब मैंने कुछ पंक्तियाँ उससे कहीं -

उन ओठों और हाथों को
मैं प्यार करता हूँ
जो पीते हैं और पिलाते हैं।
पर इरीस !
ओ मेरी प्रिय इरीस !!
उन ओठों और हाथों को
जो न पीते हैं न पिलाते हैं
मैं पूजता हूँ।
पूजा और प्यार का फर्क समझने के लिये
तुम्हें आना होगा भारत
हाँ! मेरे देश।
याने की पूरब के भी और पूरब में
प्रिय को पूज्य बनाना केवल मेरा पूर्व जानता है।
अपना यह राजस रोष छोड़ो
जीवन की सम्पूर्णता के लिये
मेरे पूरब की ओर मुँह मोड़ो।

पर इरीस ने अपना रोष तब भी नहीं छोड़ा। अनमनी सी वह मुस्काती भी रही और अपना काम भी अंजाम देती रही। पर जब रोस्तोक और यूसाडेल की सफर के दौरान बस में मैं सुशील पिया के, मुन्ना, गोर्की और तेरे-मेरे तथा पिताजी के फोटो सबको दिखा रहा था तब इरीस ने मुझे अपनी शैली में जमकर निपटा दिया। उसने मेरे, मुन्ना के, गोर्की तथा सुशील पिया के एक फोटो को गहरी और घायल नजर से देखा। सुशील की खूबसूरती पर शायद उसे कुछ ईर्ष्या सी हुई, पर अविश्वस्त प्रशंसा करती हुई वह मुन्ना, गोर्की के बारे में प्रश्न करने लगी। पहिले उसने गोर्की के बारे में पूछा। मैंने कहा- मेरा छोटा बेटा है। फिर उसने मुन्ना के बारे में पूछा। मैने कहा- मेरा बड़ा बेटा है। फिर उसने सुशील के बारे में प्रश्न किया। यह इन दोनों की सगी माँ है? सबकी हँसी चल गई। तब उसने सवाल किया- मुन्ना की उम्र क्या है ? मेरा उत्तर था- 22वें साल में चल रहा है। उसने पूरी नाटकीयता के साथ मुझे घूरा। फोटो वापस देते हुए एक लम्बी साँस छोड़ी और कहा। कहा क्या सबको सुनाकर कहा - ‘तब तो आप मेरे पिता की तरह हैं। मैं 23 साल की जो हूँ।’ और खूब खिलखिलाकर हँसती रही।

हमारी नेता श्रीमती फूलरेणु गुहा से लेकर बस के ड्रायव्हर तक के ठहाके लग गये। अपने आप को संसार का तीसमारखां मानने वाले श्री बालकवि बैरागी सिर झुकाये चुपचाप अपनी सीट पर आ बैठे। अब तू ही बता यार! परदेस में मैं एक महिला को क्या उत्तर देता। भारत भी होता तो मैं क्या बोलता? बात सच तो है ही।

बब्बू! मोहे भारत बिसरत नाहिं
दिल्ली से चलते समय एकाएक मुझे खाचरोद वाले श्री रामचन्द्र नवाल दिल्ली में विद्या भैया के यहाँ मिल गये थे। नागदा की कोई एक किलो बढ़िया सेव का पैकेट दिया था उन्होंने मुझे। हम लोगों ने उसे कितनी कंजूसी से खाया है? दाने गिन-गिन कर खाये सचमुच। जब वह पैकेट खत्म हुआ तो श्री मूलचन्द्र गुप्ता के सूटकेस पर छापा मारा। दिल्ली वाले कँवरजी का मशहूर नमकीन (आलू चिप्स) का एक पैकेट निकला। उस चिप्स को गिन-गिन कर खाया। वह भी समाप्त हो गया। इन छापों से पहिले शर्माजी को विदाई में मिला पूरा एक किलो सोहन हलवा हम लोग छीन झपट कर खा चुके हैं। घर की याद इतनी आती है कि कुछ कहा नहीं जाये। जब भी दस बीस मिनिट का समय मिलता है हम लोग भारत की तरफ मुँह करके अपने-अपने परिजनों और प्रियजनों की याद करने लग जाते हैं। अपने देश से अधिक अच्छा कोई देश नहीं होता। अपने घर से अच्छा कोई घर नहीं होता। अपनी बीबी से अच्छी कोई बीबी नहीं होती और अपनी माँ से अच्छी कोई माँ नहीं होती। हालत यह है कि यदि शिष्टमण्डल का कार्यक्रम रद्द हो जाए तो भाई लोग पैदल भाग कर भारत आ जाएँ। एक-एक दिन गिन रहे हैं। केलेण्डर पर गुस्सा आता है।

कल शाम को चार बजे बर्लिन पहुँच जाएँगे हम लोग। कल याने 15 सितम्बर को पूर्वी जर्मनी के उत्तराखण्ड की यात्रा कल समाप्त हो जायेगी। अब वहीं पहुँच कर कुछ लिखने लायक हुआ तो लिखूँगा।
भाई 
बालकवि बैरागी






खेती की स्थिति, मुद्रा-प्रयोग और रेडियो की आवाज


बर्लिन से बब्‍बू को
तीसरा पत्र - दूसरा हिस्सा

आज हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) है। हमारे दल ने इस दिन को एक देहात में मनाया। ऐसे देहात में जिसकी आबादी कुल चार हजार थी। साफ सुथरा गाँव। हर घर के आसपास हजारी के गेंदा फूलों और गुलाब की वाटिकाएँ। कब्रस्तान तक फूलों से लदालद। खुशहाल और सम्पन्न किसान परिवार। बस रोक कर एक किसान मि. लुत्श के घर में हम दनादन अनायास घुस गये। उसकी पत्नी घर में नहीं थी। उसके पुत्र्ा और पुत्र्ाी का एक वर्षीय बच्चा तथा वह किसान स्वयम् था। 1960 तक यह निजी स्तर पर जमींदार था। आज उसने अपनी सभी जमीन सहकारी, फिर सामूहिक और अब विकसित खेती योजना को दे दी। उसका झोंपड़ा देखकर हम चकरा गये। मन्दसौर जिलेे में इतनी सुविधओं वाला, इतना श्री सम्पन्न और आधुनिक घर शायद ही किसी किसान का हो। वैभव और श्री का फर्क हमारे पाठक खुद कर लेंगे तो कृपा होगी।

सवाल खेती का: उत्तर सहकारिता का
खेती यहाँ चार स्तरों पर होती है - सहकारी खेती, सामूहिक खेती, विकसित खेती और निजी खेती। सरकार के पास पटवारी नाम का प्राणी इस देश में नहीं है। जिला स्तर पर जमीन का रजिस्ट्रार होता है। वही सारी जानकारी रखता है।

आज हमने विकसित खेती के एक संस्थान का निरीक्षण किया। इस संस्थान के पास केवल 9500 हेक्टर जमीन है जिसमें खेती होती है। यहाँ एक हेक्टर ढाई एकड़ का होता है। इस संस्थान का निर्माण आसपास के गाँवों की कई सहकारी समितियों ने मिलकर किया है। एक मैनेजर है और कोई 1200 कामगार। जमीन की मिल्कियत निजी है और मुनाफे का बँटवारा जमीन की पैमाइश और श्रम के आधार पर। समिति में आप सदस्य तो बन सकते हैं पर निकल नहीं सकते। इस संस्थान के पास कोई 37000 पशु हैं। मशीनों और आधुनिक रासायनिक खादों से भरपूर इसके वर्कशाप और गोदाम हैं। मक्का, घास और चारा इस मौसम की मुख्य फसल है। चारा यहाँ साल में 4 बार काटा जाता है। आज हमने 8 भीमकाय मशीनों से चारा काटते हुए देखा। इन मशीनों को महिलाएँ चला रही थीं। एक महिला से मैंने प्रश्न किये। वह इस मशीन की ड्रायव्हर थी। तीन बच्चों की माँ (इस महिला का पति भी दूसरे संस्थान में ट्रेक्टर चलाता है। एक लड़का रोस्तोक विश्व विद्यालय में पढ़ रहा है और दो लड़कियाँ। दोनों कारखानों में काम करती हैं)। इस महिला को भी पुरुषों की तरह नियमित आठ घण्टे काम करना पड़ता है। तनख्वाह मिलती है प्रति माह 750 मार्क याने भारतीय 3000 रुपयों से कुछ ज्यादह। इतनी ही पति को। अपने जीवन और अपने काम दोनों से सुखी।

उधर श्री लुत्श और इधर इस महिला से मैंने सवाल किया - ‘आपकी महत्वाकांक्षा अब क्या है?’ दोनों का एक ही उत्तर था- ‘मेरे बच्चे मुझ से अधिक सुखी रहें। बस।’

इस संस्थान में पशुओं के बीच हमें नहीं लेे जाया गया। कारण बहुत स्पष्ट था। पशुओं में इन दिनों बीमारी फैली हुई है और उनका इलाज चल रहा है। उनके कारण आप किसी स्वास्थ्य संकट में नहीं पड़ जायें। इसलिए।

इस संस्थान के पास अपनी मशीनों के सिवाय अपना बाँध भी है। अनाज और हर जिन्स की कीमत सारे देश के लिए बिलकुल एक सी। सरकार तय करती है। कहीं कम या ज्यादा नहीं। इसलिये शोषण का डर किसी को नहीं है।

सार्थकता से जुड़ा मुद्रा प्रयोग
निजी स्वामित्व पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। आप दस मकान बना सकते हैं। चाहें तो बीस भी। पर उनसे किराया नहीं कमा सकते। आप दस कारें रख सकते हैं पर उनसे टेक्सी का काम लेकर भाड़ा नहीं कमा सकते। आप चाहें जितना बैंक बेलेंस कर सकते हैं पर उससे ब्याज नहीं कमा सकते। ब्याज की बात खूब चली। इस देश में खेती और व्यापार व्यवसाय के लिये कारखानों आदि के लिये बैंक पैसा देता है। खूब देता है। आप अपनी योजना उसके गलेे उतार भर दो। ब्याज कितना लगेगा? अधिकाधिक दो प्रतिशत। जी हाँ, कुल दो प्रतिशत। जीवनस्तर देहातियों का भी उच्च है। सफाई करने वाला भी हाथ में बढ़िया घड़ी और पाँव में अच्छा जूता पहनता है। 

कारखानों में कामगार अपनी-अपनी सुविधा से अपना ट्रांजिस्टर बजाते हैं। एक ही बड़े हाल में पचास कामगार काम कर रहे हैं और चालीस रेडियो अलग-अलग बज रहे हैं। पर मजाल है कि एक रेडियो की आवाज दूसरे तक पहुँच जाये। हमारे मनासा की खड़ा श्ोर गली में एक मोची भाई का रेडियो सारी गली को घनघना देता है। और जब दस-पाँच घरों में रेडियो बज उठते हैं तो सारी गली से लेकर बस स्टैण्ड तक कुहराम मच जाता है। पर यहाँ अपनी रुचि का कार्यक्रम अपने-अपने रेडियो पर एक ही हाल में खूब आराम से मजदूर सुनता भी है और काम भी करता है। ये कार्यक्रम उसकी कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं।

क्या देहात और क्या शहर! छोटी-छोटी बातों का भी इस देश में बड़ा ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए सड़कों पर छोटे से गड्ढे। जहाँ कहीं तुम्हें सफेद और लाल झण्डियों की झालर लगी दिखाई पड़े, समझ लो कि वहाँ सड़क पर गड्ढा है या काम चल रहा है। यदि आधा फुट का भी लम्बा या चौड़ा गड्ढा है तो भी झालर लगी है। दूर से दिखाई पड़ जाएगा कि रास्ता ठीक नहीं है। बाजारों और गलियों में न कोई पोस्टरबाजी है न दीवालों पर नारेबाजी। व्यवस्थित जगहों पर व्यवस्थित पोस्टर और नारों के होर्डिंग लगे हैं। इस डेढ़ सप्ताह में कम से कम 50 बाथरूम हम लोगों ने देखेे होंगे। किसी बाथरूम या शौचालय की दीवार पर न कोई गन्दी बात लिखी देखी न कोई फूहड़ चित्र। शौचालय, मैंने स्कूल से लेकर काउण्टी कौंसिल तक का देखा है। किसी किस्म की कुण्ठा जो नहीं है जवानों में।

तीसरा पत्र: तीसरा/अन्तिम हिस्सा



नाजी संस्कारों से बचाया अपने बच्चों को



बर्लिन से बब्‍बू को
तीसरा पत्र - पहला हिस्सा


यूसाडेल, मित्रोपा मोटेल
न्यूब्रान्डेनवर्ग काउन्टी
14 सितम्बर 76
रात्रि 8.30


प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

मेरे दो पूर्व पत्र मिल गये होंगे।

जी. डी. आर. (पूर्वी जर्मनी) के बारे में मैं बहुत कुछ लिखता जा रहा हूँ। यह मान कर लिखता हूँ कि और किसी तक यदि मेरा लेखन नहीं भी पहुँचे तो कम से कम मेरे परिजनों तक तो मेरे बहाने बहुत आसानी से पहुँच ही जाये। अस्तु।

विश्व विद्यालय जी. डी. आर. के
कल मध्याह्न भोजन के बाद हम लोगों ने रोस्तोक छोड़ दिया है। उस काउण्टी के राजनेताओं और कार्यकर्ताओं ने हमें भावभीनी विदाई दी। चलने से पूर्व सुबह का समय रोस्तोक विश्व विद्यालय में बिताया। कोई दो ढाई घण्टे हम लोग वहाँ प्रश्न और चर्चा करते रहे। विश्व विद्यालय के लिये कुछ बड़ी-बड़ी बातें लिख रहा हूँ।

1. यह विश्व विद्यालय 560 वर्ष पुराना है। संसार के विश्व विद्यालयों में इसकी बड़ी प्रतिष्ठा है। सन 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के कारण यह बन्द हो गया था। इसे वापस चालू किया गया।
2. संसार में कोई 50 देशों के विद्यार्थी इसमें पढ़ते हैं। पढ़ाई का स्तर तकनीकी और व्यावहारिक अधिक है। कला संकाय में बहुत कम विद्यार्थी हैं।
3. विश्व विद्यालय की लायब्रेरी में केवल 12 लाख पुस्तकें हैं।

4. विगत 25 वर्षों में सरकार ने इस विश्व विद्यालय के लिए मात्र 25 लाख मार्क याने सिर्फ 100 करोड़ भारतीय रुपये खर्च किए हैं। केवल चार करोड़ रुपया सालाना।

5. विश्व विद्यालय के केण्टीन में विद्यार्थियों को बीयर, ब्राण्डी, व्हिस्की, वोदका, कोनिया और अन्य शराबें सहज उपलब्ध हैं।

6. छात्राेंं की संख्या घटती बढ़ती रहती है पर होती है हजारों में।

हमारे विश्व विद्यालयों की अपनी समस्याएँ हैं और एक साम्यवादी विकसित देश और एक समाजवादी विकासशील देश की तुलना करना निरर्थक है। इस विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों ने हमें कोई विभाग या कक्षा नहीं दिखाई। कई प्रश्नों को वे टाल भी गये। कक्षा दिखाने की माँग का उत्तर यह था कि हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं उन्हें बाधा पहुँचाना उचित नहीं होगा।

सब कुछ, कितना नियोजित
बात फिर घूम फिर कर बच्चों और जवानों पर आती है। पता नहीं भारत के समाचार पत्रों में यह समाचार किस तरह स्थान बना पाया है कि विगत सप्ताह ही पूर्वी बर्लिन के एक प्रेरक और राष्ट्रीय समारोह में यहाँ की सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी के प्रथम सचिव और राष्ट्र एवं प्रशासन के सर्वेसर्वा श्री होनेकर ने माण्ट्रीयल ओलम्पिक में भाग लेने वाले पूर्वी जर्मनी के खिलाड़ी दल का वीरोचित राष्ट्रीय सम्मान किया है। यहाँ के अखबारों ने इस समारोह को मुखपृष्ठ पर आठ कालम न्यूज और आठ कालम फोटो देकर अपना कर्तव्य पूरा किया है। यशस्वी खिलाड़ियों को राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान दिये गये। दूसरों को यथोचित सम्मान प्रदान किया गया।

इस स्थिति की तैयारी इस देश ने 1945 से की है। 1945 से हिटलर के पतन के तत्काल बाद वाले मात्र चार महीनों में कोई 19000 उन शिक्षकों को स्कूलों से निकाल दिया गया जिन पर फासिस्ट और नाजी होने का या नाजियों से उनका सम्पर्क भर होने का सन्देह था। प्रमाण की बात नहीं, केवल सन्देह भर लिख रहा हूँ मैं। अपने बच्चों को कितनी सतर्कता के साथ नाजी संस्कारों से बचाया इस देश ने। भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और प्रशिक्षित कार्यकर्ता, शिक्षा विभाग में सर्वाधिक घुसपैठ क्यों कर गये और कर रहे हैं, उसकी रणनीति यहाँ समझ में आती है। भारत के लोकतन्‍त्र की जड़ों पर चोट करने का आर. एस. एस. का तरीका वास्तव में नाजियों और फासिस्टों का तरीका है। भारत में समाजवाद और लोकतन्त्र के हामियों के आगे पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग जैसे संगठित फासिस्ट गिरोहों पर निर्ममता पूर्वक निर्णय लेकर प्रहार करना होगा। वर्ना हम अपनी दो पीढ़ियों को तबाह कर चुके हैं। तीसरी पीढ़ी को बचाने का क्षण हमारे सामने उपस्थित है। इस देश ने उन 19000 शिक्षकों के बदलेे नये प्रशिक्षित 40 हजार शिक्षकों की ताबड़तोड़ व्यवस्था की। आज यहाँ प्रत्येक 6 बच्चों के पीछे एक प्रशिक्षित शिक्षक का औसत आता है। राष्ट्र की नींव पुख्ता भरी जा रही है और उत्कृष्ट राष्ट्रीयता एवम् स्वर्णिम भविष्य के प्रति पूरा राष्ट्र आश्वस्त है। सुरक्षित तो है ही।

रातें, औरतेंं, कारें, मशीनें और कविता



बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - पाँचवाँ/अन्तिम हिस्सा


इतने बड़े व्यस्त देश में आखिर निमाण कार्य कब होते हैं? क्या ये रात-दिन होते हैं? नहीं। सड़कें और भवन निर्माण तथा शहर, सड़कों, गलियों और चौराहों की सफाई के सारे काम रात में होते हैं। दिन में कोई खट-खट नहीं। सड़कों पर दवा का छिड़काव नियमित होता है पर साँझ ढले। रात नौ बजे के बाद किसी को टेलीफोन करना भी बुरा माना जाता है। नाईट क्लब जरूर हैं पर इने-गिने। कोई विशेष नाईट लाईफ नहीं है। सप्ताह में शनिवार, रविवार की छुट्टी  होती है पर महीने में प्रत्येक व्यक्ति को 192 घण्टे काम करना ही होता है। इससे कम की गुंजाइश नहीं है। मजदूर, किसान और हर कामगार के लिये ओव्हर टाईम की व्यवस्था है पर लालच में उसको जान नहीं देने दी जाती है। राजनीतिज्ञ हमारी तरह चौबीसों घण्टे भाइयों! बहनों! नहीं करते फिरते।

सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह के पाँचों दिन यदि सड़कों पर देखो तो कुल दो चीजें दिखाई देंगी। कारें-कारें-कारें और फिर औरतें-औरतें-औरतें। इसका अर्थ यह नहीं है कि और कुछ दिखाई नहीं देता, पर पहिले आपको ये दो चीजें देखनी होंगी। अन्य बाद में।

खेती का सारा आधार या तो सहकारी खेती है या फिर सामूहिक खेती। समूची खेती मशीनों से होती हैं। कहीं कहीं घोड़ों से भी  होती दिखाई पड़ी। खेती की कोई मेड़ नहीं। एक खेत शुरु हुआ तो मीलों तक चला गया। फिर सौ-पचास एकड़ का जंगल आ गया। फिर खेत शुरु हो गया। उत्तरी जर्मनी में कोई पहाड़ है ही नहीं। उधर दक्षिण जी.डी. आर. में पहाड़ है पर उत्तरी जी.डी. आर. मैदानों, खेतों, छोटे टीलों और छोटे जंगलों का इलाका है। जंगल घने हैं पर बीहड़ नहीं। पेड़ों में चीड़, देवदारु मुख्य। सारे देश में लकड़ी का काम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मिलेगा।

कारखानों में मशीन, मनुष्य की गुलाम है। मनुष्य मशीन का दास नहीं। निजी स्वामित्व समाप्त सा हो गया है। मशीन यहाँ मनुष्य की सहायता करती है। भारत में कितने ही कामों को मैं मशीन से हुआ मानता था पर यहाँ देखा कि यह सब काम मनुष्य हाथों से कर रहा है। यदि मशीनीकरण में मानव श्रम की गुंजाईश नहीं रखी गई तो मशीन मनुष्य को खा जायेगी। मार्क्स और गाँधी शायद इस बिन्दु पर एक हैं।

और उलरिच ने कविता पढ़ी
यहाँ के कवियों-लेखकों-नाटककारों का भी देश व्यापी संघ बना हुआ है और वे भी करीब-करीब ट्रेड यूनियनी तरीकों से काम करते हैं। रोस्तोक के एक 36 वर्षीय युवा कवि श्री उलरिच (Ulrich) से भोजन पर मेरी भेंट करवाई गई। कोई दो घण्टे हमारी कविताबाजी वहीं भोजन के समय चलती रही। मैंने कविता सुनाई, मिट्टी, रक्त, पसीने, श्रम, संघर्ष और भाईचारे की। जब उससे कहा गया तो उसने कविता पढ़ी। विचित्र लगी सबको। शीर्षक था ‘गलियारे में।’ अनुवाद मैंने किया। कविता इस तरह बही-

फ्लेट तुम्हारे पास भी है फ्लेट मेरे पास भी
एकान्त तुम्हारे पास भी है, एकान्त मेरे पास भी
पर ओ! मेरी प्रेमिका!
जो रोमाँच
इस गलियारे में लिये गये
आलिंगन, चुम्बन देते हैं
वह कमरों के एकान्त में कहाँ?
कमरों में हमें हाथ धोना पड़ते हैं
गलियारों में नहीं
कमरों के कसाव ढीले पड़ जाते हैं
गलियारे के सुदृढ़।
आओ न गलियारे में
कुछ करें
एक दूसरे की बाहों और आँखों में
डूब मरें।
आओ न गलियारे में
कुछ करें।।
ओ! मेरी प्रेमिका !
आओ गलियारे में।।

जापानी सिरेमिक्स की प्रदर्शनी इस देश की रोस्तोक आर्ट गेलरी में देखने के बाद ऊपर वाली कविता एक समाजवादी साम्यवादी- प्रगतिशील से सुनकर मुझे बिलकुल अनपेक्षित नहीं लगा। हाँ, दूसरे श्रोताओं को अवश्य आश्चर्य हुआ।

बर्लिन की मेरी 15-9 से 22-9 वाली यात्रा में मैं इस देश की महान् कवयत्री श्रीमती अन्ना सेगर से मिलने की जिद किये हुए हूँ। कोई 80 वर्षीया इस वन्दनीया नारी को मैं प्रणाम करना चाहता हूंँ। मुझे विश्वास है कि मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हो जाएगा।

बड़ा मन है हम सबका इस शेष यात्रा में दक्षिण का प्रसिद्ध शहर लिपजिग देखने का। लिपजिग का विश्व मेला अभी-अभी समाप्त होने को है। हमारे कार्यक्रम में दक्षिण का कोई भाग सम्मिलित है। हम लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयत्नशील हैं पर समस्या वही है- होटलों की। कोई बिस्तर वहाँ खाली नहीं मिल रहा है हमारे मेजबानों को।

आठ दिनों के बाद आज ज्ञात हो पाया है कि हम शाकाहारियों को नियमित तौर पर मशरूम भी खिलाया जाता रहा है। क्या होता है यह मशरूम? जब पल्ले पड़ा तो माथा ठोक लिया मैंने। रोज जो सब्जी हम यहाँ मशरूम की खा रहे हैं वह होता है कुकुरमुत्ता”- हमारे यहाँ ‘कुत्ते की छतरी।’ प्याज का दर्शन इस देश में अभी तक नहीं हो पाया। कहते हैं कि इसी साल इस देश ने भारत से कोई दो लाख रुपयों का प्याज लिया था। भगवान जाने उसे कौन खा गया?
भाई 

अपनी ही माँ को चुड़ैल कह बैठे

नए राजनीतिक मुहावरे गढ़ने, नए राजनीतिक मूल्य देने के लिए यह काल खण्ड इतिहास में दर्ज किया जाएगा। भाषा की शालीनता, आचरण की शिष्टता, संस्कारशीलता से मुक्ति पाने के लिए याद किया जाएगा। हमारी अगली पीढ़ियाँ हमें इसलिए याद करेंगी कि हम न तो सोच कर बोलते थे न ही बोलने के बाद सोचते थे। मूर्खता का जवाब मूर्खता से देने के हमारे सयानेपन पर वे गर्व करेंगी या शर्मिन्दा होंगी? 

हमारे नेताओं के बयानों से हैरत होती है। विरोधी को नंगा करने के लिए  खुद नंगे हो रहे हैं। खुद ही नहीं, अपने नेता को भी नंगा कर रहे हैं! हैरत पर हैरत यह कि नेता के नेता को भी फर्क नहीं पड़ रहा। हम राजनीति को किस मुकाम पर ले आए हैं? अगला मुकाम कौन सा तय किया है हमने?

आदमी के पास जब गिनाने को उपलब्धियाँ नहीं होती हैं तो वह अपने व्यक्तित्व का बखान शुरु कर देता है। यदि उसका व्यक्तित्व आभाहीन, प्रभावहीन हो तो वह अपने विरोधी का व्यक्तित्व हनन करता है। अपने नायक का यह आचरण देखकर उसके समर्थक ‘देव-आराधना’ की तरह अपने नायक के इस यज्ञ में अपनी आहुतियाँ देने में जुट जाते हैं। देश में आज यही हो रहा है।

मुझे सबसे पहले हतप्रभ किया था, अमित शाह ने। विरोधियों के जमावड़े की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने बड़ी अजीब उपमा दी। कहा कि जब बाढ़ आती है तो जान बचाने के लिए कुत्ते, बिल्ली, चूहे सब प्राणी एक जगह इकट्ठे हो जाते हैं। यह कहते समय वे अपने नेता और देश के प्रधान मन्त्री को ‘प्राकृतिक आपदा’ घोषित कर बैठे। यह भी भूल बैठे कि बाढ़  तो सब-कुछ ध्वस्त कर देती है। विनाश कर देती है। जान-माल की हानि होती है। निश्चय ही अमित शाह ने ऐसा तो नहीं ही कहना चाहा होगा। लेकिन वे मोदी को प्राकृतिक आपदा ही कह गए। वह भी गर्वपूर्वक।

सोशल मीडिया में इन दिनों एक सन्देश देखकर बड़ा ताज्जुब हो रहा है। मोदी का महिमा मण्डन करते हुए, मोदी के चित्र के साथ कहा जा रहा है - ‘शेर अकेला आता है। झुण्ड में तो सूअर आते हैं।’ विरोधियों को सूअर कहने से अधिक दुःख इस बात का है कि हममें तो गाली देने की भी तमीज और अकल नहीं रह गई है। किसी जमाने में देश के तमाम विरोधी दल इन्दिरा गाँधी के विरोध में एक जुट हुआ करते थे। उनमें अटलजी, आडवाणीजी भी शरीक थे। बाद में राजीव गाँधी के विरोध में भी ये सब एकजुट हुए थे। इस तुलना के मुताबिक तब इन्दिरा और राजीव शेर की दशा में थे और अटल-आडवाणी सहित तमाम नेता दूसरे पशुओं की दशा में। मोदी के महिमा मण्डन की कोशिश में क्या यही कहा जा रहा? और, शेर तो जंगल में रहता है! उसका तो शिकार किया जाता है और उसका सिर, उसकी खाल, ‘ट्राफी’ की तरह दीवालों पर प्रदर्शित की जाती है। क्या मोदी के लिए यही सब सोचा जा रहा है? 

लगभग ऐसा ही एक और अभियान चल रहा है। कहा जा रहा है कि जब सारा विपक्ष एकजुट हो जाए तो समझो कि देश का राजा ईमानदार है। इस पैमाने से तो मोदी से पहले इन्दिरा और राजीव को ईमानदारी का प्रमाण-पत्र दिया जा रहा है! जबकि उन्हें तो भ्रष्ट और बेईमान कह-कह कर तालियाँ पिटवाई जाती हैं। आखिर, सच क्या है?

अभिनेत्री सपना चौधरी के राजनीतिक फैसले की खिल्ली उड़ाते हुए उसे ‘ठुमके लगानेवाली’ कह कर खारिज किया गया। यह उपमा देते समय एक क्षण भी सुप्रसिद्ध अभिनेत्री हेमामालिनी का विचार मन में नहीं आया? फिल्मी दुनिया से परे, वे तो ख्यात नृत्यांगना भी हैं। सपना चौधरी की खिल्ली उड़ाते हुए क्या हेमामालिनी को ‘ठुमके लगानेवाली’ नहीं कह दिया? यदि ‘ठुमके लगानेवाली’ उपेक्षणीय है तो ‘अपनी ठुमकेवाली’ को क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है? सपना चौधरी की खिल्ली उड़ाने, उसे खारिज करने की कोशिश करने में हेेमामालिनी निशाने पर नहीं आ गईं? उन्हें कैसा लगा होगा? दूसरे की माँ को डायन कहते-कहते अपनी माँ को चुड़ैल कह देना इसी को कहते हैं।

अभी-अभी प्रभात झा का वक्तव्य पढ़ कर अत्यधिक निराशा हुई। वे तो पत्रकार भी रह चुके हैं। लेकिन क्या राजनीतिक लिप्सा, पत्रकारिता की आत्मा और चेतना को ढक देती है? स्व. अर्जुनसिंह की पत्नी श्रीमती सरोज देवी और उनके बेटे, मध्य प्रदेश विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता अजयसिंह के बीच उभरे विवाद को हथियार की तरह वापरते हुए झा ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी माँ को नहीं सम्हाल पा रहा हो वह भला प्रदेश को क्या सम्हालेगा? मैं अब भी चाह रहा हूँ कि प्रभात झा ने यह नहीं कहा हो। यह कहते हुए उन्हें अपने नेता, प्रधान मन्त्री मोदी की याद नहीं आई? मोदी ने, पवित्र अग्नि की साक्ष्य में, दोनों कुटुम्बों के सदस्यों की उपस्थिति में, भारतीय संस्कृति का निर्वाह करते हुए जसोदा बेन के साथ सात फेरे लिए थे। उन्हें अपनी अर्द्धांगिनी स्वीकार कर उनकी देखरेख, उनकी रक्षा के लिए वचनबद्ध हुए थे। लेकिन वे तो बिना कुछ कहे, बिना बताए, जसोदा बेन को छोड़ गए। अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। वे तो उन्हें पत्नी कबूल करने को भी तैयार नहीं थे। उन्होंने तो जसोदा बेन को अपनी पत्नी भी तब ही घोषित किया जब चुनाव लड़ने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया। क्या प्रभात झा को पल भर भी नहीं लगा कि जब वे अजय सिंह पर यह आरोप लगा रहे हैं तो बात मोदी तक पहुँचेगी? माँ की जिम्मेदारी निभाने में अक्षम व्यक्ति यदि प्रदेश का जिम्मा नहीं निभा सकता तो अपनी धर्म पत्नी की जिम्मेदारी से पीठ फेरनेवाला आदमी भला देश की जिम्मेदारी कैसे निभा सकेगा?

गुना के भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य भी मानो प्रभात झा से प्रतियोगिता कर रहे। उन्होंने कहा कि काँग्रेस शासन काल में पैदा हुए नेताओं को गलत नीति बनानेवाले नेता घोषित कर दिया। उन्हें पता ही नहीं होगा कि सत्रह सितम्बर 1950 को जब मोदी पैदा हुए तो देश में काँग्रेस की सरकार थी और नेहरू प्रधान मन्त्री थे। वही नेहरू जो मरने के चौपन बरस बाद भी मोदी को काम नहीं करने दे रहे। शाक्य के हिसाब से तो मोदी की नीतियाँ भी गलत हैं। 

हम कहाँ आ गए हैं? क्या अब चुनाव इन्हीं और ऐसे ही मुद्दों पर लड़ा जाएगा? क्या यही सब अब चुनावी घोषणा-पत्रों के मुद्दे बनेंगे? अधिक निराश करनेवाली बात यह कि प्रतिपक्ष भी मूर्खता का जवाब मूर्खता से दिए जा रहा है। न इनके पास बताने के लिए कोई उपलब्धि है न उनके पास कोई कार्यक्रम। मेहनत तो सब कर रहे हैं और खूब कर रहे हैं लेकिन अपनी लकीर बड़ी करने के लिए नहीं, सामनेवाले की लकीर छोटी करने के लिए। अपनी कमीज बेदाग बनाए रखने के बजाए सामनेवाले की कमीज गन्दी करने के लिए पतले गोबर में पत्थर फेंक रहे हैं जिसके छींटे इनकी खुद की कमीज पर भी गिर रहे हैं। दोनों की कमीजें गन्दी हो रही हैं। हवाओं में गालियाँ ही गालियाँ तैर रही हैं।

तकलीफ यही है। हम अपनी अगली पीढ़ियों को कैसी राजनीति देकर जा रहे हैं - शालीन, शिष्ट, सुसंस्कृत, संस्कारित राजनीति या घिनौनी, चरित्रहनन करने की, जुगुप्सा भरी राजनीति? राजनीति, सामाजिक बदलाव का प्रभावी और धारदार औजार होती है। यदि औजार ही नकली और भोथरा होगा तो बदलाव तो दूर रहा, इसका रख-रखाव ही भारी पड़ जाएगा। बोझ बन जाएगा। 

हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिए बदबूदार बोझ छोड़ जाएँगे या ठण्डी हवा, गहरी छाया देनेवाले, हरे-भरे, खुशबूदार फलदार बाग?
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 05 जुलाई 2018

.....परीक्षा लेते-लेते मैं खुद ही फेल हो गया

मुझे थोड़ा नहीं, बहुत अजीब लगा था, दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन के बाद अर्जुन की चुप्पी पर। उसने दादा के बारे में, उनकी आकस्मिक मृत्यु के बारे में मुझसे अब तक एक शब्द नहीं कहा। मनासा में अर्जुन का घर, मेरा दूसरा घर है। मैं जब भी मनासा जाता हूँ तो यह माना जाता है कि मैं अर्जुन से मिलकर ही गाँव में घुसा हूँ। उसके बेटे आलोक के विवाह में मनासा गया था तो अपने घर रुकने के जाय अर्जुन के घर ही रुका था। दादा को अच्छा नहीं लगा था। 



 दादा से अर्जुन के जुड़ाव को कोई और अनुभव करे न करे, मैं खूब अच्छी तरह अनुभव करता हूँ। दादा उसके आदर्श व्यक्तियों में से एक तो हैं ही, वह अपने जीवन के स्थायित्व में भी दादा को सहायक मानता है। ऐसे में उसकी चुप्पी मुझे अजीब लगनी ही थी। यह ‘अजीब लगना’, ‘बुरा लगना’ में बदलकर मुझे क्षुब्ध करने ही वाला था कि अल्हेड़वाले  सुरेश नागदा ने मुझे इस अपराध से बचा लिया।

अल्हेड़ मेरे पैतृक कस्बे मनासा से लगा हुआ, हैसियतवाला, ठाठदार गाँव है। दादा के निधन के बाद शोक प्रकट करने के लिए वह, नन्दलाल नागदा के साथ आया था। बातों ही बातों में सुरेश ने वह बात बता दी कि अर्जुन के प्रति मेरा क्षोभ, आत्म-ग्लानि में बदलने लगा।

दादा के निधनवाले दिन, 13 मई को अर्जुन सपरिवार, मनासा के पास स्थित तीर्थ भादवामाता गया हुआ था। राजस्थान में, कोटा के पास स्थित छबड़ा से उसकी बेटी नीतू अपने पति गिरीश और सवा तीन बरस के बेटे आशुतोष के साथ मायके आई हुई थी। अर्जुन का बेटा आलोक भी अपने बाल बच्चों के साथ मनासा आया हुआ था। वह मन्दसौर में, केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाता है। अर्जुन अपने पूरे परिवार के साथ गया था। उस दिन रविवार भी था। सो सब लोग पूरी तरह फुरसतिया मनोदशा में थे। शाम का भोजन भी साथ लेकर गए थे। यात्रियों की संख्या लगभग दस थी। सो, अर्जुन ने बड़ी गाड़ी भाड़े पर ली थी। सुरेश नागदा का बेटा धरमू इस गाड़ी का चालक था। 

सुरेश ने बताया  कि शाम करीब छः-सवा छः बजे उसे वाट्स एप पर दादा के निधन की सूचना मिली थी। सूचना पाकर सुरेश को धक्का लगा। अचानक ही उसे याद आया कि धरमू ‘अर्जुन सर’ के परिवार को लेकर गया है। अर्जुन और दादा के सम्बन्धों को सुरेश भली प्रकार जानता था। सुरेश ने धरमू से कहा कि वह ‘अर्जुन सर’ से उसकी बात कराए। बेटे ने फोन ‘अर्जुन सर’ को दिया। सुरेश ने यह खबर उन्हें दी। अर्जुन को विश्वास नहीं हुआ। उसने फौरी पूछताछ की और फोन बन्द कर दिया। 

सुरेश ने कहा - ‘मेरी बात सुनकर अर्जुन सर की आवाज तो बिलकुल मरी-मरी हो गई। जैसे उनमें जान ही नहीं रही हो। मैंने अपने बेटे से कहा कि वह सर का और उनकी फेमिली का ध्यान रखे। बाद में धरमू अर्जुन सर को मनासा छोड़ कर आया तो बताया कि जब मैं अर्जुन सर से बात कर रहा था फेमिली ने भोजन के डिब्बे खोल कर परोसना शुरु कर दिया था। लेकिन मुझ से यह खबर सुनकर अर्जुन सर उदास हो गए और सब से दूर, एक ओर जाकर माथा झुकाकर खड़े रह गए। उन्होंने भोजन भी नहीं किया। घरवालों ने खूब कहा लेकिन उन्होंने भोजन नहीं किया तो नहीं ही किया। बाकी घरवालों ने भोजन किया और सब मनासा चले आए। पूरे रास्ते अर्जुन सर चुपचाप बैठे रहे। शायद उन्होंने फेमिली को भी यह खबर घर पहुँचने के बाद दी होगी।’

सुरेश की बातों ने मुझे मन की तलहटी तक भीगो दिया। मैं अर्जुन से अत्यधिक निकटता का दावा करता हूँ लेकिन मैं उस पर सन्देह कर बैठा! मैंने उसकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा और प्रतीक्षा की! मुझे तो अपने मन से उसके मन की बात समझनी चाहिए थी! लेकिन मैं उसकी परीक्षा लेने लगा और इस परीक्षा में खुद ही फेल हो गया। 

बाद में मैंने उससे पूछताछ की तो उसने सहज भाव से कहा - ‘ऐसी बातें कहने-सुनने की कहाँ होती हैं? वे तो महसूस करने की होती हैं। तू तो खुद ही परेशान था। क्या कहता? और फिर! तू तो मुझे अच्छी तरह जानता है! तुझसे क्या कहना-सुनना?’

मेरे पास उसकी बात का जवाब न तब था न अब है। सन्देह करने के अपने अपराध को, उसके सामने कबूल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अब यह सब लिखकर अपना मन हलका कर रहा हूँ। 

मुझे माफ करना अर्जुन! मैंने अपना अविश्वास तुम पर थोपने का अपराध किया। माफ करना।
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बाँये सुरेश नागदा दाहिने नन्दलाल नागदा


ऑपेरा, हिन्दी, भीड़, किशोर और गर्भवती नारी


बर्लिन से बब्‍बू को
दूसरा पत्र - चौथा हिस्सा

यहाँ आकर यदि कोई ऑपेरा नहीं देखे तो यात्रा अधूरी मानी जाती है। हम लोगों को सौभाग्य से विश्व प्रसिद्ध कला सर्जक ऑपेरा आराध्य जर्मन लेखक  स्व. मोजार्ट का ऑपेरा ‘दी एस्केप’ अनायास देखने को मिल गया। यहाँ का आपेरा मंच चूँकि दुरुस्त किया जा रहा है इसलिये इसका प्रदर्शन कोई 300 लोगों की उपस्थिति में एक पुराने डान्स हाल में, फर्श पर किया गया। चिली, बल्गेरिया, जर्मन और पोलैण्ड के कलाकारों ने यह भव्य संगीत कथा जब बिलकुल हमसे कोई 7 या 8 फीट दूरी पर, ठीक हमारे सामने, फर्श पर प्रस्तुत की तो हम लोग साँस रोके देखते रह गये। यह एक सुल्तान के हरम से दो बेगमों को, उनके प्रेमियों द्वारा भगाये जाने की सुखान्त नाटिका है। कोई पर्दा नहीं। कोई सेट नहीं। हाँ, कोई 70 लोगों का कर्ण मधुर आर्केस्ट्रा अवश्य था। संगीत संचालक पसीने से नहा गया था। पहिली बार मैंने किसी जर्मन सर्वांग सुन्दरी नारी को इतने पास से इस देश में देखा था। यह इस ऑपेरा की नायिका थी। यहाँ की सुप्रसिद्ध गायिका भी है। ऑपेरा का रूप हमारे ‘माच’ और खास तौर पर ‘भोई’ से बिलकुल मिलता है। सवा दो घण्टे के इस प्रदर्शन में सम्वाद तो हमारे किसी की समझ में एक अक्षर भी नहीं आया पर अभिनय इतना अद्भुत था कि कथानक क्षण-क्षण प्राणों में उतरता चला गया। दो घटनाएँ इस आपेरा की मुझे सदा याद रहेंगी। एक तो समाप्ति पर बजी तालियाँ। कोई बीस मिनिट लगातार सारा सभागार तालियों से गूँजता रहा और कलाकार अभिवादन स्वीकार करते रहे। दूसरा, इस प्रदर्शन पर यहाँ के विजिटर्स बुक में लिखी मेरी टिप्पणी। मुझसे इस प्रदर्शन पर आपेरा की संचालिका ने कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने एक पृष्ठ की टिप्पणी हिन्दी में लिखी। जब संचालिका और नायिका को बताया गया कि यह टिप्पणी ‘हिन्दी’ में है तो दोनों ने उस पृष्ठ को भाव विभोर होकर चूम लिया। मैं इसे हिन्दी का गौरव मानता हूँ। मेरा यह विशेषाधिकार रहा कि मेरी टिप्पणी पर एक अन्तर्राष्ट्रीय लोक-नायिका-गायिका के ओठ भावाकुलता से लगे। मैंने तब उन्हीं के सामने अपने कलम को चूम लिया था। मैं और कर भी क्या सकता था?

भीड़ का चरित्र: रैली के सम्बन्ध में
आज हम लोग एक अन्तर्राष्ट्रीय रैली के दर्शक बने। 12 सितम्बर इस पूरे देश में फासिस्ट विरोधी दिवस के तौर पर मनाया गया। बड़े सबेरे नौ बजे यह रैली एक सभा में बदल गई। दो लाख की आबादी वाले इस शहर में कल शाम ऐसी कोई चहल-पहल नहीं थी। पर सुबह के नौ बजते-बजते शहर के मुख्य चौक में कोई पचास-साठ हजार आबाल-वृद्ध नर-नारी राष्ट्र पताकाओं और बैण्डबाजों की धुनों के साथ बिलकुल संयत होकर जुट गये। तीन या चार भाषण हुए। मंच पर कोई कुर्सी नहीं थी। जमीन पर कोई बिछात नहीं। मंच पर दस-दस की पंक्ति में पचास आदमी खड़े थे। सामने हजारों की भीड़। दस बजते-बजते सारी भीड़ न जाने कहाँ समा गई। न कहीं ट्रेफिक रुका, न कोई चिल्लपों मची, न सभा स्थल पर कोई गन्दगी  हुई, न कोई अनहोनी। सारा शहर एक घण्टे भर में वापस रविवार के सन्नाटे में डूब गया। 

उसके बाद हम लोग इसी काउण्टी की सरकारी बोट में बाल्टिक सागर तक सैर करने चले गये। इस सैर में खूब कविताएँ और खूब ठहाकेबाजी हुई। यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं यूरोपीय स्तर की अंग्रेजी बोल भी लेता हूँ। समझ भी लेता हूँ। कविताएँ मैं हिन्दी में लिखता और गाता हूँ।  श्री क्लोफर उनका जर्मनी में अनुवाद करते हैं। जर्मनी के लिये अंग्रेजी अनुवाद श्री प्रसाद और श्री सेठ करते हैं पर मैं अब यह काम खुद भी कर लेता हूँ।

मैं बात भीड़ की कर रहा था। भीड़ को सलीके और शिस्त से रास्ते लगाने के लिए अच्छी सड़कों का होना बहुत जरूरी है। मैं लिख चुका हूँ कि यहाँ की सड़कें खूब चौड़ी और चमकीली हैं। उनसे लगे ही हुए दोनों तरफ सबसे पहिले सायकल पाथ हैं। सायकल वालों का रास्ता कोई तीन फीट चौड़ा छोड़ने के बाद फिर पैदल चलने के लिये रास्ता है। सायकलें यहाँ बहुत हैं पर भारतीय सायकलों की तरह खूबसूरत नहीं हैं। अक्सर महिलाएँ, बच्चे और किशोर सायकलों पर भागते हैं। मोटरें, कारें और सायकलें यहाँ तेज अवश्य चलती हैं पर अन्धाधुन्ध नहीं। तीन साल के बच्चे को बिना पेडल की सायकल थमा दी जाती है। वह निश्चिन्त होकर इन सड़कों की उप सड़कों पर अपनी सायकल चलाता रहता है। यह सायकल भी दो पहियों की ही होती है।
वास्तव में बच्चों पर यह देश तभी से ध्यान देना शुरू कर देता है जब वह गर्भ में होता है। गर्भवती महिलाओं की इतनी देखभाल राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी-साम्यवादी देश में ही सम्भव है। गर्भवती नारी को यह देश राष्ट्रमाता का दर्जा देता है। उसका धारित गर्भ वस्तुतः राष्ट्र होता है। इस बहस में जी. डी. आर. कभी नहीं पड़ा कि गर्भ में लड़का है या लड़की। गर्भ के एक-एक दिन का हिसाब रखा जाता है और गर्भवती को अतिरिक्त सुख, सन्तोष और समुल्लास दिया जाता है। वन्दनीय है यह आराधना।

किशोरों और जवानों को अलग से यूथ क्लब की व्यवस्था दी गई है। 18 वर्ष का नागरिक यहाँ मतदान का अधिकारी है। यह राष्ट्र की अमानत और भविष्य होता है। यूथ क्लबों पर उपन्यास लिखे जा सकते हैं। उनका अनुशासन और कठोर प्रवर्तन, निर्मम नहीं आकर्षक है। 17 बरस का होते-होते विद्यार्थी कम से कम 100 मार्क (भारतीय 400 रुपये) प्रशिक्षण वृत्ति पाने लगता है। डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट, जैसी उसकी प्रतिभा और रुझान हो, उसके लिए अवसर का हर द्वार खुला है। सम्भावनाओं का क्षितिज निस्सीम है। वह शिकायत नहीं, प्रयत्न करने पर बाध्य है। राजनीति से वह जुड़े या नहीं जुड़े, कोई प्रतिबन्ध नहीं है। उसे स्वतन्त्र चिन्तन का पूरा अवसर मिलता है। लेकिन उसके आसपास का वातावरण ही ऐसा है कि वह राजनीति, समाजवाद, प्रगति, कठोर श्रम, अनुशासन, राष्ट्रीयता और विश्व-बन्धुत्व की चेतना से जुड़ जाता है। राजनीतिक दलों और मजदूर संघों के विशाल आराम देह कार्यालय यहाँ दर्शनीय हैं। उनमें पुस्तकालय से लेकर टी. वी. तक की सुविधा है। पार्टियों के कार्यालय यहाँ इतने विशाल और आधुनिकतम हैं कि भारत में बड़े से बड़े उद्योगपति का कार्यालय इतना साधन-सम्पन्न नहीं होगा। हाँ, उनमें साज सजावट बिलकुल नहीं है पर सुविधाएँ सभी हैं।