‘दरद दीवानी’ की कविताएँ पढ़ने से पहले



दादा श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह अपने ब्लॉग पर देने की शुरुआत कर रहा हूँ। जो संग्रह मुझे मिल गए हैं, उन्हें एक के बाद एक, यहाँ देना जारी रखूँगा। उनके बाद जैसे-जैसे संग्रह मिलते जाएँगे, उनकी कविताएँ देता रहूँगा।

शुरुआत ‘दरद दीवानी’ से कर रहा हूँ।

‘दरद दीवानी’ दादा श्री बालकवि बैरागी का पहला काव्य संग्रह है। इसका प्रकाशन वर्ष किताब में कही नहीं दिया गया है। लेकिन डॉक्टर चिन्तामणिजी उपाध्याय की भूमिका में ‘नव वर्ष 2020’ लिख हुआ है। यह विक्रम संवत की तिथि है। जानकारों, मित्रों से तलाश किया तो इसकी तारीख 26मार्च 1963 निकली। 

यदि मार्च 1963 को ही इसका प्रकाशन वर्ष मान लें तो उस समय दादा की अवस्था 32 वर्ष और डेढ़ महीना थी। जाहिर है कि ये कविताएँ इस उम्र से पहले की लिखी हुई हैं। ये कविताएँ दादा की, आज की छवि से शायद कुछ अलग ही छवि प्रस्तुत करे। इसीलिए मुमकिन है, दादा के अधिसंख्य प्रशंसकों को ‘दरद दीवानी’ की कविताएँ चौंकाएँ भी और असहज भी करें। लेकिन यदि आज से 58 वर्ष पहले के काल-खण्ड के साहित्यिक वातावरण, सामाजिक परिस्थितियों, दादा की वय और पारिवारिक दशा को ध्यान में रखते हुए इन्हें पढ़ा जाएगा तो इन कविताओं का अधिक आनन्द मिल सकेगा।

महाविद्यालयीन शिक्षा में दादा दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी रहे थे। वे दर्शन शास्त्र के ख्यात प्राध्यापक श्री ग. वा. कविश्वर साहब के प्रिय विद्यार्थी थे। कविश्वर साहब उस समय शासकीय महाविद्यालय मन्दसौर के प्राचार्य थे। दादा पर उनका और दर्शन शास्त्र का पर्याप्त प्रभाव रहा। सम्भवत इसी कारण, इस संग्रह की कुछ कविताएँ, दार्शनिकता से सराबोर हैं।

यह कविता संग्रह दादा ने मेरी भाभीजी श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी को अर्पित किया है। किन्तु अर्पण में उनका नामोल्लेख न कर, ‘पिया’ उल्लेखित किया है। दादा, भाभी को आजीवन इसी सम्बोधन से पुकारते रहे। इस सम्बोधन के एक विरोधाभास की ओर शायद कभी, किसी का ध्यान गया हो। व्याकरण के लिहाज से ‘पिया’ पुल्लिंग है। यह तो सम्भव नहीं लगता कि यह बात दादा को मालूम नहीं रही हो। दो-एक बार मैंने यह ‘रहस्य’ जानना चाहा तो दादा ने मुझे ‘ऐसी फालतू बातों’ में न उलझने की सलाह दी।

इस संग्रह में दादा की सैंतीस कविताएँ हैं। सारी कविताएँ गीत-विधा में, गेय हैं जिन्हें संगीतबद्ध किया जा सकता है।

ब्लॉग पर पोस्टों/पन्नों की संख्या बढ़ाने से बचने के लिए मैं, संग्रह से जुड़ी सूचनाएँ, समर्पण, चिन्तामणिजी लिखित भूमिका, दादा का वक्तव्य और कविताओं से पहले दिए गए दो मुक्तक इसी पोस्ट/पन्ने पर दे रहा हूँ। 

कल से अगले सैंतीस दिनों तक, प्रतिदिन एक कविता ब्लॉग पर प्रकाशित होती रहेगी।

- विष्णु बैरागी

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समर्पण

मेरी उस खामोश ‘पिया’ को -

जिसने दर्द पिया उमर भर

              -बालकवि बैरागी

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मुक्तक

आज भले ही पत्थर बनकर तू मुझको ठुकरायेगी

मुझे छोड़ कर किसी और के सपनों में बस जायेगी,

तुझसे जितना हो तू करले, लेकिन ये भी सुन लेना

मैं तो परघट तक ही आया तू मरघट तक आयेगी।

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मेरी विवशता

पैदा तो हो गए अभागे, कब रुकते ये मेरे रोके

दे दूँ इनको देश निकाला, आये ऐसे लाखों मौके

लेकिन तुम ही फिरे घूमते, इनको होठों से लिपटाये

बुरा न मानो, सच कह दूँ, मुझसे ज्यादा तुमने गाये


आज तोड़ दो, अभी तोड़ दो, बेशक इनसे नेह पुराना

लेकिन यूँ तो मत कतराओ, मत सीखो यूँ आँख चुराना

यदि तुम मेरे गीत न गाओ, कोई हर्ज नहीं मत गाना

                                                 -बालकवि बैरागी

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आभार -

केवल चार महानुभावों का जिन्होंने ‘दरद दीवानी’ को यह रूप दिया और मुझे पहली बार प्रकाशन का पनघट दिखलाया।

श्री भानु भाई त्रिवेदी, बालाघाट (म. प्र.) 

श्री शम्भू नेमा, बालाघाट (म. प्र.) 

सुश्री छाया उपाध्याय

और

श्री डॉ. चिन्तामणि उपाध्याय, उज्जैन (म. प्र.)

श्री शम्भू दादा एवं छाया बहिन ने मुझे भानु भाई तक पहुँचाया और भानु भाई ने ‘दरद दीवानी’ के गरीब गीतकार का दर्द समझा तथा ये गीत आप तक पहँचाने के लिये सरस्वती और लक्ष्मी का संयोग जुटाया। दादा श्री चिन्तामणिजी ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी। मैं जानता हूँ कि उनके पास समय की कमी है किन्तु दर्द की नहीं।

आपके सिवाय और कोई दिखाई नहीं पड़ता जिसका कि मैं आभार प्रदर्शित करूँ। बस।

                                                                                              - बालकवि बैरागी


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भूमिका -

यह दर्दायन

‘बालकवि बैरागी’ अपनी सहज प्रवृत्ति से ‘‘मालवी’’ के कवि हैं। और मालवी के माध्यम से ही जन-हृदय को स्पर्श कर भूमि की सार-सत्ता को उन्होंने सजीव रूप प्रदान किया है। आंचलिक भाषाओं में अपनी अनुभूतियों को, जन और संस्कृति की समस्त चेतनाओं को, व्यक्त करने में काव्य का क्षेत्र संकुचित हो जाता है, यह हम नहीं मानते। गर्व के साथ यह कहा जा सकता है कि अपनी मातृभाषा से संबंधित एवं संचित चेतना को कवि ने उसी मर्म के साथ राष्ट्रभाषा-हिन्दी में उतारने का प्रयास किया है और वह सफल भी हुआ है। इसके लिए मुझे प्रमाण या प्रशस्ति-पत्र देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। देश के किसी भी कोने में जिस किसी व्यक्ति ने एक बार ही ‘बालकवि’ को सुना है वह बरबस ही उसकी प्रौढ़ काव्य-साधना की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सका होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

आजकल साहित्य के क्षेत्र में काव्य सृजन की साधना एवं उसकी प्रेषणीयता का एक ज्वलन्त प्रश्न उपस्थिति होता है। काव्य का केवल प्रकाशन या मुद्रण ही पर्याप्त नहीं होता। कवि के हृदय में उर्मिल भावनाओं ने संवेदन की आंच पर तपकर, निखर कर जो तेजस्वी रूप धारण किया है, उसकी अनुभूति एवं रस की प्रतीति में मुद्रण की अपेक्षा वाणी का माध्यम ही अधिक सशक्त होता है। इस शक्ति परीक्षा में ‘बालकवि बैरागी’ पूर्ण रूप से सौ टंच खरे उतरने के बाद यदि अपनी गेय भावनाओं को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार करने के लिए तत्पर होते हैं तो उनका यह प्रयास रस-पिपासुओं के लिये कवि की कण्ठ-माधुरी से सिक्त वाणी की तरह आनन्द प्रदायक ही होगा।

‘दरद-दीवानी’ कवि की गेय रचनाओं का प्रथम संकलन है जो आपके हाथों में है। वैसे कवि की काव्य-साधना में राष्ट्रीयता का उद्दाम आवेग, पीड़ित मानवता की छटपटाहट, करुणा एवं प्यार और मनुहार की गुदगुदी ये सभी भावनाएँ उर्मिल हुई हैं, किन्तु जहाँ तक जोश की बात है उसमें वह शक्ति नहीं जो करुणा प्लावित हृदय को उस स्थिति तक ले जाय जहां कवि और श्रोता, भक्त और भगवान, प्रेमी और प्रेय एकाकार हो जायें। पीड़ा और दर्द का प्रसंग प्रणय के क्षेत्र में केवल वियोग श्रृंगार की रूढ़ियों को ही यदि छूकर रह जायेगा तो उसका संवेदनशील मार्मिक प्रभाव सर्व व्यापी नहीं बनेगा। और यही कारण है कि आदिकवि की वाणी से लेकर आज तक मानवीय संवेदनाओं को जगाने में जितने भी कवि समर्थ हुए हैं उनकी व्यक्तिगत, लौकिक आधार से प्रेरित भाव-चेतना, समष्टि की अनुभूतियों से घुल मिलने पर ही अपना शाश्वत प्रभाव स्थापित कर सकी हैं। वस्तुतः वही कवि या काव्य-साधक पूजा गया है जो जीवन और जगत की समस्त अनुभूतियों को पीकर, अपनी व्यष्टि सत्ता में उनको समेट कर फिर समाज को उन्मुक्त होकर  दरद-दीवाना बनानने की कला में समर्थ हुआ हो। यह बात दूसरी है कि जहाँ लौकिक भावनाओं का उदात्तीकरण होता है वहाँ काव्य के क्षेत्र की भावभूमि कुछ आध्यात्मिक हो उठती है। लेकिन जिस आध्यात्मिक प्रेम की ओर हमारे मध्ययुगीन संत और कवि उन्मुख हुए उनकी अनुभूति का आधार भी तो लौकिक ही था। प्रेम की मधुर पीर के दीवाने हिन्दी के सूफी कवि, या कृष्ण की प्रेम-दीवानी चिर चिरहिणी राधा की प्रतिमूर्ति मीरा, या परलोेक के प्रियतम के विरह में छटपटाती हुई महादेवी, इन सब में जिस दर्द की, जिस व्यथा की, जिस तड़पन की व्यंजना हुई है, वह चाहे काव्य और भक्ति के क्षेत्र में जो भी स्थान रखे, भौतिक पीड़ा से त्रस्त साधारण मानव को अपनी उदात्त स्थिति में ही आकर्षित कर पाती है। इस पीड़ा को स्वयं में जगाना, और जगी हुई पीड़ा को उभार कर व्यक्त करना काव्य-कला के लिए खिलवाड़ मात्र नहीं है। ‘बालकवि’ दर्द के इस मर्म को समझता है। और इसीलिए:-

..... ‘द्वार द्वार से दर्द मांगकर अपने घर में लाना होगा’....

.....‘पीड़ाओं के सौ-सौ सागर मैंने हँस-हँस पी डाले’ .....

.........‘कहीं किसी का दर्द मिला तो अंजली भर कर पी लेता हूँ’.....

आदि भावना-प्रवण पंक्तियाँ केवल सामान्य उक्तियाँ मात्र ही नहीं हैं, किन्तु उनमें कवि की आत्मा का रस घुलमिल गया है और यही कारण है। कि कवि के गीत दूसरों के हृदय में मानवीयता संवेदनशील तत्व प्रस्थापित करने में पूर्ण समर्थ हैं। 

यह प्रसन्नता की बात है कि कवि आजकल काव्य-क्षेत्र में व्याप्त आडम्बर एवं व्यक्ति-प्रदर्शन की प्रवृत्ति से बच सका है। आज जिस तरह की गद्यात्मक रचनाएँ ‘नई कविता’ के नाम से चर्चा का विषय बनी हुई हैं, तब कवि के इन गीतों को श्रेणी विभाजन की दृष्टि से क्या स्थान मिलेगा यह कहना कठिन है, किन्तु इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जिन तथ्यों को लेकर नई कविता का आधार खड़ा होता है वह सब ‘दरद-दीवानी’ के इन गीतों में मिल जायेगा। प्रस्तुत संग्रह के गीतों की जो विशेषता है वह मध्ययुगीन काव्य की तरह साधारणीकरण की क्षमता है। जो प्रायः आज के काव्य में नहीें मिल पाती। कवि और श्रोता की तदात्मक स्थिति कवि की रससिद्धि होती है। बैरागी ने भाव, कला और संगीत से सम्पृक्त इन गीतों में जिस दर्द को जगाया है उसमें लौकिकों को अपने प्रणय के क्षेत्र की अडिग निष्ठा मिलेगी तो दूसरी ओर संत और भक्त प्रवृत्ति के लोगों को कबीर और मीरा के भाव, कला के भी दर्शन होंगे। किन्तु मेरी ऐसी धारणा है कि ‘बालकवि बैरागी’ सचमुच इसी मिट्टी का कवि है और उसमें यत्र तत्र कुछ ‘उस पार’ की, ‘क्षितिज’ की, ‘कफन’ और ‘चदरिया’ की जो बातें आ गई हैं वे किन्हीं विशिष्ट क्षणों की देन ही कही जायेंगी। कुछ गीत अवश्य ऐसे हैं जिनमें बालकवि ‘‘प्रौढ़’’ दिखाई देते हैं। यह प्रौढ़ता बुढ़ापे का लक्षण है। अभी वे साधना के ‘इस पार’ ही रहें। यह तो दर्द जगाने का श्री गणेश है। आशा है दर्द के अलख जगाने में कवि साहित्य को बहुत कुछ दे सकेगा।

                   - ‘कबीरा सोई पीर है जो जाने पर पीर’

                                                                                                                                       -चिन्तामणि उपाध्याय

नव वर्ष 2020

माधव कालेज

उज्जैन (म. प्र.)


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संग्रह से जुड़ी सूचनाएँ -

‘दरद दीवानी’
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट (म. प्र.)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिण्टरी, इन्दौर
मूल्य - दो रुपये
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पहली कविता: ‘तन को तो मैं समझा लूँगी’ यहाँ पढ़िए 


‘गौरव गीत’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिल जाऍंगी 





बब्बू के मुँह से बोली भारत की असली ताकत

यह इसी तेरह मार्च की बात है। अपराह्न लगभग तीन बजे बब्बू को फोन किया - ‘दुकान कतरी वजाँ तक खुली रेगा?’ (दुकान कितनी बजे तक खुली रहेगी?) जवाब में उसकी आवाज से लगा, उछलकर बोल रहा हो - ‘अरे! आप! मूँ तो समझो थो के आप मने ने म्हारी दुकान ने भूली ग्या। दुकान कित्ती बजे तक खुली रेगा या छोड़ो। आप तो वताओ, आप कितरी वजाँ पधारोगा? आप आओगा तब तक दुकान खुली रेगा।’ (अरे! आप! मैं तो समझ बैठा था कि आप मुझे और मेरी दुकान को भूल गए हैं। दुकान कितनी बजे तक खुली रहेगी यह बात छोड़ो। आप तो बताओ, आप कितनी बजे पधारेंगे? आप आएँगे तब तक दुकान खुली रहेगी।) सुनकर मैं झेंप गया। कहा - ‘साढ़े सात वजाँ के आसपास अऊँगा।’ (साढ़े सात बजे के आसपास आऊँगा।) खनकती खुश-आवाज में जवाब आया - ‘पधारो! पधारो! मूँ आपकी वाट नारूँगा।’ (पधारिए! पधारिए! मैं आपकी बाट जोहूँगा।)

बब्बू याने लक्ष्मीनारायण सोलंकी। कोई तीस बरसों से मेरे बालों की देखरेख का (और मुझे ‘ढंग-ढांग का आदमी’ दिखाए रखने का) जिम्मा उसी ने ले रखा है। सैलाना मार्ग पर,  राम मन्दिर की दुकानों में से एक में उसका ‘जयश्री हेयर कटिंग सेलून’ है। बरसों पहले मैंने, ‘उपग्रह’ में, अपने स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में उस पर लम्बा आलेख लिखा था। तब मैंने लिखा था कि ईश्वर की कृपा और उसका व्यवहार उसकी ऐसी परिसम्पत्तियाँ हैं कि उसे ग्राहक की बाट नहीं जोहनी पड़ती। प्रतिदिन शटर उठाते समय एक न एक ग्राहक उसकी प्रतीक्षा में पहले ही खड़ा मिलता है।

लेकिन कोरोना-काल ने काफी-कुछ गड़बड़ा दिया। उसकी चपेट से जब अच्छे-अच्छे नहीं बच पाए तो भला बब्बू कैसे बच पाता? सबसे पहले तो सख्त तालाबन्दी ने घर में बाँध कर रख दिया और दूसरे, लोगों में दहशत भर दी। दूसरों की नहीं खुद अपनी कहूँ तो मैं चाह कर भी बब्बू की दुकान पर नहीं जा सका। अव्वल तो  मैं ही डरा हुआ और दूसरे, भयभीत बच्चों की टोका-टाकी। कभी बेटे वल्कल से, कभी सहायक नवीन भाई शर्मा से, कभी किरायेदार प्रतीक शिन्दे से, कभी पड़ौसी गुड्डु (अक्षय छाजेड़) से, घर पर ही कटिंग करवाता रहा। तालाबन्दी में जब आंशिक छूट मिलनी शुरु हुई तो बब्बू ने दो बार फोन किया। दोनों ही बार मैंने इस तरह जवाब दिया कि बब्बू ने फौरन भाँप लिया। पहली बार तो वह कुछ नहीं बोला लेकिन दूसरी बार हँस कर बोला - ‘अरे! सा‘ब! कटिंग मत कराजो पण दर्शन देवा ने पधारो। आपकी शकल देख्याँ ने घणा दन वेईग्या।’ (अरे! साहब! कटिंग मत कराइएगा लेकिन दर्शन देने पधारिए। आपकी शकल देखे बहुत दिन हो गए हैं।) जवाब में मैं ‘हाँ, हूँ’ करके और ‘हें! हें! कसी वात करी र्यो यार तू? थारे पास नी अऊँगा तो कटे जऊँगा? थारे वना म्हारो काम चालेगा? अऊँगा-अऊँगा। जल्दी अऊँगा।’ (कैसी बात कर रहा यार तू? तेरे पास नहीं आऊँगा तो कहाँ जाऊँगा? तेरे बिना मेरा काम चलेगा? आऊँगा-आऊँगा। जल्दी आऊँगा।)

लेकिन यह ‘जल्दी’, जल्दी नहीं, पूरे पौने चौदह महीनों के बाद आया। 19 जनवरी 2020 को मैं बब्बू की दुकान पर गया था। उसके बाद अब, 13 मार्च 2021 को गया।

मैं पहुँचा तो जी धक् से रह गया। दुकान में वह अकेला था। तीस बरसों में मैंने पहली बार बब्बू को ग्राहक की प्रतीक्षा करते देखा। मुझे उदासी ने घेर लिया लेकिन बब्बू खुश था। छलकती आत्मीयता और पुरजोर ऊष्मा से उसने मेरी अगवानी की। मैं कुर्सी पर बैठा और वह शुरु हो गया। मैं उससे बहुत कुछ जानना चाहता था लेकिन मेरे बोल नहीं फूट रहे थे। बातों का सिलसिला उसी ने शुरु किया।

मालूम हुआ कि तालाबन्दी के शुरुआती तीन महीने तो घर में ही कटे। दुकान की झाड़ू भी नहीं लग पाई। उसके बाद दुकान खुली तो ग्राहक का नाम-ओ-निशान नहीं। छुट-पुट ग्राहकी शुरु हुई तो हर ग्राहक डरा हुआ। सुरक्षा उपायों के प्रति अतिरिक्त और अत्यधिक चौकस। पढ़े-लिखे, ज्ञानी-बुद्धिजीवी ग्राहक सबसे ज्यादा डरे हुए मिले। औसत-मध्यमवर्गीय, कम पढ़े-लिखे, श्रमजीवी ग्राहक बेधड़क आए। धीरे-धीरे ग्राहक संख्या बढ़ने लगी। लेकिन अब, साल भर बाद भी ग्राहकी आधी ही है।

मेरी कटिंग वह सामान्यतः बारह-पन्द्रह मिनिट में निपटा देता था। लेकिन इस बार उसने लगभग आधा घण्टा लिया। उसकी बातों से लग रहा था मानो वह अपनी बात सुनाने के लिए मौका और श्रोता तलाश कर रहा हो। उसकी बातों के जवाब में मेरे पास कुछ नहीं था। सहानुभूति-सांत्वना के दो बोल भी मेरे मुँह से नहीं फूट रहे थे। वस्तुतः उसका प्रत्येक वाक्य, उसकी हर बात मुझे अवाक्, निःशब्द कर रही थी। उसके स्वरों में निराशा, उदासी, थकान, किसी के प्रति शिकायत, उलाहना कुछ नहीं था। मुझे लगता रहा कि उससे सहानुभूति जता कर, उसे सांत्वना दे कर मैं उसकी अवमानना कर दूँगा। मैं चुप ही बना रहा।

चलते-चलते, उसकी प्रशंसा करते हुए, उसका हौसला बढ़ाने की मंशा से मैंने कहा - ‘थने अणी तरे देखी ने, थारी वाताँ हुणी ने हिवड़ो ठण्डो वेईग्यो बब्बू! हिम्मत राखजे। घबराजे मती। रामजी सब हऊ करेगा।’ (तुझे इस तरह काम करते देख कर, तेरी बातें सुन कर जी को बड़ी ठण्डक मिली बब्बू! हिम्मत रखना। घबराना मत। ईश्वर सब अच्छा करेगा।)

जवाब में बब्बू ने जो कहा, उसने मुझे ठेठ जड़ों तक हिला दिया - ‘सई क्यो आपने! रामजी सब हऊ ई ऽ ज करेगा। पण सा‘ब! आपका-म्हारा जसा लोग तो यो झटको झेली ग्या। मालम नी, गरीबाँ पर कई गुजरी वेगा। रामजी वणा की राखे।’ (आपने सही कहा! ईश्वर सब ठीक ही करेगा। लेकिन साहब! आपके-मेरे जैसे लोग तो यह झटका सहन कर गए। मालूम नहीं, गरीबों पर क्या गुजरी होगी। ईश्वर उनकी रक्षा करे।)

बब्बू की बात सुनकर मेरे पैर मानो जमीन में गहरे धँस गए। मन कैसा हो गया, यह कहने के लिए मेरे पास, बीस दिनों के बाद, अब तक भी उपयुक्त और समुचित शब्द नहीं है।

मैं उसकी दुकान से चला तो, लेकिन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाया। आँखें बरसने लगीं। रास्ता दिखना बन्द हो गया। सौ-पचास कदम, चेतक सेतु के मुहाने पर स्कूटर खड़ा कर, देर रोता रहा।  

बब्बू की यह बात ही भारत की वास्तविक शक्ति है - अपने से कमजोर, कमतर की चिन्ता करना। छोटी सी दुकान में, सीमित साधनों-संसाधनों वाला साधारण सैलून चला रहा बब्बू, आर्थिक सन्दर्भों में कहाँ खड़ा होगा, यह कल्पना आप-हम आसानी से कर सकते हैं। लेकिन विपत्ति काल में उसे अपने से कमतर, कमजोर की चिन्ता रही।   यह चिन्ता भारत का कोई ‘बब्बू’ ही कर सकता है - कोई धन कुबेर नहीं।

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मेरी कटिंग करता हुआ बब्बू


घर पर अपनेवालों से कटिंग करवा कर इस स्परूप में रहा मैं


 

यह पोस्ट आज, भोपाल से प्रकाशित हो रहे दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में छपी


कुत्ते की जगह जज साहब

यह पोस्ट 23 अगस्त 2020 को फेस बुक पर प्रकाशित हुई थी। इन्दौरवाले मेरे आत्मन प्रिय धर्मेद्र रावल को इसकी जानकारी, कुछ दिनों के बाद मिली - अपने एक सजातीय से। धर्मेन्द्र और सुमित्रा भाभी इन दिनों अपने बेटे-बहू समन्वय-आभा के पास बेंगलुरु में है। पढ़ने के बाद धर्मेन्द्र ने मुझे बेंगलुरु से फोन पर हड़काया - ‘तुमने यह कैसे मान लिया कि सबके सब फेस बुक पर हैं? अभी भी अनगिनत लोग ऐसे हैं जो फेस बुक का फेस देखना पसन्द नहीं करते। वे अभी भी ब्लॉग से यारी निभा रहे हैं। इसलिए हे सज्जन! अपनी पोस्टें फेस बुक पर भले ही दो लेकिन उन्हें ब्लॉग पर देना मत भूलो। बल्कि मेरा तो कहना है कि पहले ब्लॉग पर दो और फिर फेस बुक पर दो।’

सो, धर्मेन्द्र की डाँट के परिपालन में यह पोस्ट ब्लॉग पर प्रस्तुत है।


यदि कोई दैवीय चमत्कार नहीं हुआ तो, ख्यात वकील प्रशान्त भूषण, सोमवार 24 अगस्त 2020 को सर्वाेच्च न्यायालय की अवमानना करने के अपराध में सजायाफ्ता हो कर इतिहास में दर्ज हो जाएँगे। 

यही सब सोचतत सोचते-सोचते मुझे एक और जज साहब याद आ गए। ये जज साहब भी मेरे पैतृक नगर मनासा में ही पदस्थ थे। जज साहब के मिजाज से जुड़ा यह किस्सा-ए-हकीकत भी मेरे स्कूली दिनों का, याने वर्ष 1964 के आसपास का है। ‘राव लोणकर’ नामधारी ये जज साहब, पारम्परिक जजों से एकदम हटकर थे। जज लोग सामान्यतः सामाजिक सम्पर्कों से परहेज करते हैं। लेकिन राव लोणकर साहब अति सामाजिक थे। वे मेरे कस्बे की सड़कों पर पैदल चलते भी मिल जाया करते थे। लोगों से बतियाना उन्हें अच्छा लगता था। ‘हँसमुख’ से कहीं आगे बढ़कर हँसोड़ और भरपूर परिहास प्रेमी। बिना लाग-लपेट, निश्छल, निष्कपट भाव से बतियाते। मुझे नहीं पता कि वे मालवा अंचल से थे या नहीं किन्तु मालवी सहजता से समझ लेते थे। वे खुद पर हँसने के दुर्लभ साहस के धनी थे। खूब मस्त-मौला।  किन्तु कस्बे से इस आत्मीयता का रंचमात्र प्रभाव भी उनके फैसलों पर कभी, किसी को अनुभव नहीं हुआ। वे इस मामले में ‘विदेह’ जैसे बने रहे। 

मालवा के ग्रामीण अचंलों में ‘बकरियाँ बैठाना’ भी एक धन्धा है। जब हम पशु-पालन की बात करते हैं तो हमें सामान्यतः केवल गायें-भैंसें और इनके तबेले ही याद आते हैं। लेकिन कुछ लोग बकरियाँ भी पालते हैं। ये भी दूध का ही धन्धा करते हैं। गायों-भैंसों को तबेलों में रखा जाता है तो बकरियों को बाड़े में। धोबी मोहल्ले में, हमारे घर के ठीक सामने जीवा काका पुरबिया का, बकरियों का बाड़ा था। बाड़े के सामने, सुबह-सुबह, लोटे-भगोनियाँ लिए दूध लेनेवाले प्रतीक्षारत लोगों को मैंने बरसों देखा है। जिन दुधमुँहे शिशुओं के मुँह में छाले हो जाते थे (जिसे मालवा में ‘मुँह आना’ कहा जाता है) उन शिशुओं के मुँह में बकरी के ‘थन’ (स्तन) से सीधे दूध की धार डलवाना देसी ईलाज होता है। ऐसे शिशु लिए कोई न कोई माँ-बाप भी रोज ही नजर आते थे। उन शिशुओं के मुँह में धार डालते-डालते जीवा काका कभी-कभी मुझे भी आवाज लगा देते और सीधे बकरी के थन से मुझे भरपेट दूध पिला देते। इस तरह से दूध पीने के बाद पूरा मुँह सफेद, मीठे और गरम-गरम झाग से भर जाता था। दूध का वह स्वाद, वह ऊष्मा और उस तरह दूध पीने का आनन्द अवर्णनीय है। उसे तो केवल अनुभव की किया जा सकता है। मैं जब यह बात लिख रहा हूँ तो मुझे वह गरम-गरम दूध का झाग और उसकी मिठास अपने होठों पर अनुभव हो रही है।

ऐसे कई बकरीपालक, किसानों के खेतों में रातों को अपनी बकरियाँ बैठाने का धन्धा करते थे। बकरियों की मिंगनियों का खाद खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है। गर्मियों के मौसम में खेतों में कोई काम नहीं होता। सो, गर्मियों में बकरियाँ बैठाने का धन्धा भरपूर चलता था। अपने खेत में बकरियाँ बैठाने के लिए किसान, बकरीवाले को तयशुदा रकम चुकाता है। अपनी बकरियाँ खेत में बैठानेवाले बकरीपालक भी, बकरियों की चौकीदारी के लिए, बकरियों के साथ रात खेत में गुजारते हैं।

एक बार ऐसा हुआ कि एक बकरीवाले की कुछ बकरियाँ चोरी हो गईं। इस प्रकार का यह पहला मामला था। सबको जिज्ञासा हुई। चोर यदि मनासा से बाहर का है तब तो कोई बात नहीं। लेकिन यदि मनासा का ही हुआ तो बकरियों को कब तक छिपा सकेगा? उन्हें बन्द भी कर दिया जाए लेकिन मिमियाने से तो रोका नहीं जा सकेगा! बकरीवाले ने थाने में रिपोर्ट लिखवाई। 

पुलिस हरकत में आई। एक संदिग्ध हिरासत में लिया गया। मुकदमा राव लोणकर साहब की अदालत में पेश हुआ।

शुरु की दो-तीन तारीखें तो कागजी-खानापूर्ति के नाम पर निकल गईं। लेकिन जल्दी ही वह दिन आ गया जब बकरीवाले के बयान होने थे।

इससे पहले कि किस्सा आगे बढ़े, एक शब्द युग्म ‘म्हारो बेटो’ से आपका परिचय जरूरी है। इसका शाब्दिक अर्थ है - मेरा बेटा। लेकिन ये ‘म्हारो बेटो’ लोक प्रचलन में तकिया कलाम भी है तो किसी को इज्जत देने के लिए तो कभी किसी को हड़काने के लिए, किसी की खिल्ली उड़ाने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। 

आज की स्थिति तो मालूम नहीं किन्तु तब मनासा कोर्ट का कमरा बहुत बड़ा नहीं था। मुश्किल से आठ-दस लोग आ सकते थे। बहुत हुआ तो पन्द्रह-बीस। इससे अधिक नहीं। मुकदमा शुरु हुआ। फरियादी बकरीवाला कटघरे में आया। उसे गीता की सौगन्ध दिलाने की औपचारिकता पूरी की गई। सरकारी वकील ने उसका नाम-पता पूछ कर कहा - ‘हाँ तो हंसराज! खुल कर बताओ कि क्या हुआ।’ (‘हंसराज’ काल्पनिक नाम है।) दोनों हाथ जोड़कर हंसराज वकील साहब से बोला - ‘माराज.....’ (‘माराज’ याने ‘महाराजा’) वह आगे कुछ बोलता उससे पहले ही सरकारी वकील ने टोका - ‘मुझे नहीं, जज साहब को बताओ।’ 

करबद्ध मुद्रा और भीत स्वरों में हंसराज ने मालवी बोली में कहना शुरु किया - ‘माराज! म्हारी बकरियाँ चोरी वेईगी।’ (साहब! मेरी बकरियाँ चोरी हो गईं।) सरकारी वकील ने फिर टोका - ‘यह तो सबको मालूम है कि तुम्हारी बकरियाँ चोरी हो गई हैं। लेकिन तुम भी तो वहाँ थे! फिर कैसे चोरी हो गईं? खुल कर बताओ।’ 

हंसराज ने पहले वकील साहब को देखा, फिर जज साहब को। उसके बाद पूरे कमरे में नजर दौड़ाई और बोला - ‘माराज! म्हने नी मालम चोरी कसरूँ वी। म्हारे तो अबार भी हमज में नी अई री के चोरी कसरूँ वेई गी? अबे आप ई विचार करो माराज! के जशो मूँ याँ हूँ वशो को वशो वटे खेत में बेठो तको। (फिर, कमरे में बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए) जशा ई लोग बेठा वशी म्हारी बकरियाँ बेठी तकी। ने आप बेठा वशो म्हारो पारतू टेगड़ो बेठो! फेर भी म्हारो बेटो बकरियाँ चोरी लेई ग्यो।’ (साहब! मुझे नहीं मालूम कि चोरी कैसे हुई। मुझे तो अभी समझ नहीं आ रहा कि चोरी कैसे हो गई? अब आप ही विचार कीजिए साहब! कि जैसे मैं यहाँ हूँ उसी तरह मैं वहाँ खेत में बैठा था। जैसे (कमरे में) ये लोग बैठे हैं उसी तरह मेरी बकरियाँ बैठी हुई थीं। और साहब! जैसे आप बैठे हैं उसी तरह मेरा पालतू कुत्ता बैठा हुआ था। फिर भी ‘मेरा बेटा’ बकरियाँ चुरा ले गया।)

हंसराज की बात पूरी हुई नहीं कि राव लोणकर साहब ठहाका मारकर हँसने लगे। हंसराज की बात सुनकर और जज साहब की दशा देखकर सरकारी वकील साहब हक्के-बक्के हो गए, घबरा गए। एक पल तो उन्हें सूझ ही नहीं पड़ी कि हंसराज ने क्या कह दिया, क्या कर दिया। उन्हें लगा कि मामले का फैसला उनके खिलाफ हो गया। उन्होंने हकलाते हुए, मामले को सुधारने की कोशिश की - ‘अरे! अरे!! क्या कह रहे हो? तुम्हें पता भी है कि तुम किसके सामने बात कर रहे हो? जरा ढंग से बात......।’ 

लेकिन सरकारी वकील की, टूट-फूट की मरम्मत करने की कोशिश पर राव लोणकर साहब ने लगाम लगा दी। बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकते हुए, बोले - ‘नहीं! नहीं वकील साहब! फरियादी और कोर्ट के बीच में आप मत आइए। फरियादी को अपनी बात कहने दीजिए।’ फिर हंसराज से बोले - ‘तुम्हारी बात पूरी तरह से समझ में नहीं आई। एक बार फिर से पूरी बात समझाओ।’ 

जज साहब की बात सुनकर सरकारी वकील साहब को पसीना छूट गया। लगा कि वे रो देंगे। जज साहब को जैसे ही लगा कि सरकारी वकील साहब हंसराज को समझाना चाहते हैं, उन्होंने फौरन वकील साहब को फन्दे में लिया - ‘नहीं वकील साहब। आपसे कह दिया ना कि फरियादी और कोर्ट के बीच में आप मत आओ। फरियादी को बेहिचक अपनी बात कहने दो।’ फिर हंसराज से बोले - ‘हाँ। बोलो। डरो मत। फिर से पूरी बात बताओ।’

 बेचारे हंसराज ने निरीह भाव से अपनी बात लगभग शब्दशः दुहरा दी। जैसे ही हंसराज की बात पूरी हुई, राव लोणकर साहब फिर ठठाकर हँसने लगे। वे चाहकर भी अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे थे। उनकी दशा देख कर सरकारी वकील परेशान और हंसराज हैरान। 

जज साहब अब घुटी-घुटी हँसी हँस रहे थे। उसी दशा में बोले - ‘आज तो कोर्ट का पुनर्जन्म हो गया। अब अभी और कुछ काम नहीं हो पाएगा। अब लंच तक कोर्ट की छुट्टी।’ फिर सरकारी वकील साहब से बोले - ‘आप अगली तारीख ले लो। हंसराज का बाकी बयान तभी सुनेंगे।’

उसके बाद क्या हुआ और क्या नहीं, यह जानने की मैंने कोशिश ही नहीं की। हाँ, इतना मालूम है कि हंसराज पर कोई दण्डनीय कार्रवाई नहीं हुई। इतना और मालूम है कि बाद में यह किस्सा खुद राव लोणकर साहब ही, अपनी मित्र-मण्डली में सुनाते रहे।

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ईमानदार जज साहब

यह पोस्ट 19 अगस्त 2020 को फेस बुक पर प्रकाशित हुई थी। इन्दौरवाले मेरे आत्मन प्रिय धर्मेद्र रावल को इसकी जानकारी, कुछ दिनों के बाद मिली - अपने एक सजातीय से। धर्मेन्द्र और सुमित्रा भाभी इन दिनों अपने बेटे-बहू समन्वय-आभा के पास बेंगलुरु में है। पढ़ने के बाद धर्मेन्द्र ने मुझे बेंगलुरु से फोन पर हड़काया - ‘तुमने यह कैसे मान लिया कि सबके सब फेस बुक पर हैं? अभी भी अनगिनत लोग ऐसे हैं जो फेस बुक का फेस देखना पसन्द नहीं करते। वे अभी भी ब्लॉग से यारी निभा रहे हैं। इसलिए हे सज्जन! अपनी पोस्टें फेस बुक पर भले ही दो लेकिन उन्हें ब्लॉग पर देना मत भूलो। बल्कि मेरा तो कहना है कि पहले ब्लॉग पर दो और फिर फेस बुक पर दो।’

सो, धर्मेन्द्र की डाँट के परिपालन में यह पोस्ट ब्लॉग पर प्रस्तुत है।


ख्यात वकील प्रशान्त भूषण के बरसों पुराने ट्वीट को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायाधीश जो सख्ती दिखा रहे हैं उसे देख-देख कर मुझे मेरे पैतृक नगर मनासा में पदस्थ रहे एक जज साहब बहुत याद आ रहे हैं। 

बात मेरे स्कूली दिनों की है। मैंने 1964 में हायर सेकेण्डरी पास की थी। उसके बाद से मैंने मनासा छोड़ दिया। इसलिए, बात 1964 या उससे पहले की ही है। 

तब मनासा की आबादी दस-बारह हजार रही होगी। थानेदार, तहसीलदार, जज और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ‘बड़े अफसर’ हुआ करते थे। जज साहब याने प्रथम श्रेणी न्यायाधीश जिन्हें रौबदार अंग्रेजी में एमएफसी (मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास) पुकारा जाता था। तबादले पर एक जज साहब मनासा आए। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, उनका नाम एल. के. सिंह था। कुछ वकील उन्हें सिंह साहब तो कुछ लाल साहब कहते थे।

जज साहब अकेले नहीं आए थे। अपने साथ भूचाल लाए थे। उनकी कार्यशैली ने पूरी मनासा तहसील की जमीन थर्रा दी। वकीलों में हड़कम्प मच गया। उनकी आलमारियों में बन्द, लाल-काली जिल्ददार किताबों के दिन फिर गए। वकीलों के मुंशियों का अलालपना झड़ गया। जज साहब ने वह सक्रियता और तेजी बरती कि बार रूम में कोहराम मच गया। ज्ञान और अनुभव के दम पर काम करनेवाले ‘व्यवसायियों’ (जिन्हें आप-हम ‘प्रोफेशनल’ कहते हैं) को तो उन्नीस-बीस का ही फरक पड़ा किन्तु तारीखें बढ़वाने और जमानत करवानेवाले ‘व्यापारियों’ (कमर्शियल) पर आफत आ गई। नए जज साहब का असर यह रहा कि ऐसे लोगों को अपने काले कोट का मान रखने के लिए मजबूरन वकील बनना ही पड़ा। और रहे कर्मचारी! तो उनकी तो मानो शामत ही आ गई। एक महीना बीतते-बीतते उन्हें अपना पारिवारिक बजट पुनर्नियोजित करने की नौबत आ गई। 

नये आए ये जज साहब वक्त के बड़े पाबन्द थे। कोर्ट की घड़ी उनसे अपने काँटे मिलानेे लगी थी। ये जज साहब मामले निपटाने में विश्वास करते थे। कोई मामला सामने आया नहीं कि अगली सुनवाई के लिए दो दिन बाद की तारीख दे दी। वकीलों ने रियायत माँगी तो जवाब मिला - ‘आपका-हमारा यही तो काम है! काम अपने को ही निपटाना है। और फिर, तैयारी केवल आपको थोड़े ही करनी है! मुझे भी तो तैयारी करनी पड़ेगी। आपको तो अपने-अपने मुवक्किल की ही तैयारी करनी है। लेकिन मुझे तो आप दोनों के कागज देखने हैं। मुझे तो आपसे दुगुना काम करना पड़ेगा! जब मैं कर सकता हूँ तो आप तो ज्यादा आसानी से कर सकते हैं। तारीख नहीं बढ़ेगी। परसों मिलते हैं।’ वकीलों के पास कोई जवाब नहीं होता। 

कोर्ट-कचहरी के जगजाहिर दलाल भी परेशान हो गए। उन्हें ‘सेट’ करने की हलकी सी गुंजाइश भी नहीं मिल रही थी। जज साहब की सामाजिकता अपनी कोर्ट और बंगले पर तैनात कर्मचारियों तक सीमित थी। वे कस्बे में किसी से मिलने नहीं जाते न ही किसी से अपने बंगले पर मिलते। कहीं से किसी आयोजन-समारोह का न्यौता आता तो विनम्रतापूर्वक, हाथ जोड़कर क्षमा माँग लेते। ईश्वर और पूजा-पाठ में भरपूर आस्था थी लेकिन सब कुछ अपने घर पर ही। कस्बे के किसी मन्दिर में जाते कभी नजर नहीं आए न ही घर पर कभी कोई कथा-कीर्तन, भजन-पूजन करवाया। कोर्ट और घर ही उनकी दुनिया थे। ईमानदारी का आलम यह कि यदि ईश्वर साँसों का कोटा निर्धारित करता तो जज साहब अपने कोटे से अधिक एक साँस भी न लें।

जज साहब के इस रवैये का असर भरपूर पड़ा। डेड़ बरस बीतते-बीतते हाल यह हो गया कि कोर्ट के रेकार्ड रूम की जिन फाइलों पर धूल की परतें जम गई थीं, जिनका रंग ही धूल जैसा हो गया था, जिन्हें झाड़ने पर भी धूल झड़ती नहीं थी, जिनके पन्ने पूरे कमरे में पसरे हुए थे, वे लगभग सारी फाइलें निपट कर लाल बस्तों में बँध गईं। रेकार्ड रूम में छाई सीलन की गन्ध को मानो देश निकाला दे दिया गया। पूरा कमरा नए-नकोर लाल बस्तों से सज गया। तीन-तीन पीढ़ियों के मुकदमे निपट गए। अब जज साहब के इजलास में सबसे पुराना मामला छह महीने पहले का था।

जज साहब पूरे तहसील इलाके पर छा गए थे। लोग भरे मन और खुले दिल से जज साहब को दुआएँ दे रहे थे - बरसों-बरस से कोर्ट के चक्कर जो काट रहे थे! कोर्ट और तहसील एक ही परिसर में लगती थी। तहसील दफ्तर की एक बगल में कोर्ट और दूसरी बगल में बार रूम। बार रूम के पास बनी, चाय की जिस दुकान पर कुर्सियाँ कम और बेन्चें संँकरी पड़ती थीं, वहाँ अब गिनती के ग्राहक नजर आते थे। ‘चाय-पानी’ अब खुद चाय-पानी को तरसते लगने लगे थे। 

जज साहब की वजह से लोगों में जय-जयकार और धन्धेबाजों में हा-हाकार छाया हुआ था। लोग दुआएँ कर रहे थे कि जज साहब मनासा से ही रिटायर हों जबकि परेशान प्राणियों के जत्थे रोज सामूहिक अरदास करते थे कि जज साहब से फौरन मुक्ति मिले।

किसी को पता नहीं कि इन दुआओं और प्रार्थना का असर हुआ या नहीं। तयशुदा प्रक्रिया के अधीन, निर्धारित समयावधि के बाद जज साहब का तबादला होना ही था। हो गया। पूरे तहसील इलाके में ‘कहीं खुशी, कहीं गम’ से तनिक हटकर ‘गम ज्यादा, खुशी कम’ का माहौल था। देहातों में तो मानो जवान मौत की खबर पहुँची हो।

जज साहब जिस तरह चुपचाप आये थे, उसी तरह चुपचाप चले गए। उन्होंने औपचारिक विदाई समारोह भी कबूल नहीं किया। न उनके आने पर पटाखे फूटे न जाने पर ढोल बजे। लेकिन जाने के बाद भी वे बरसों तक मनासा में बने रहे। ईमानदारी, समयबद्धता, हाथों-हाथ काम निपटाने, सबको एक नजर से देखने, एक जैसा व्यवहार करने की बात जब-जब भी होती, तब-तब जज साहब का जिक्र आता ही आता। इस सबके अलावा, चूँकि उनका तबादला ‘काले-कोस’ नहीं हुआ था, इसलिए गाहे-बगाहे उनके समाचार मिलते ही रहते थे। ‘मनासा से जाने के बाद उनका रवैया क्या है?’ इस जिज्ञासा के अधीन भी लोग उनके हालचाल तलाशते रहते थे। लेकिन कभी, कोई नया या चौकानेवाला समाचार नहीं मिला।

समय बीतने के साथ ही उनके बारे में बातें भी कम होने लगीं। उनके समाचार अब छठे-चौमासे आते थे। ‘आँख ओट - पहाड़ ओट’ की लोकोक्ति यूँ ही नहीं बनी। जज साहब अब किसी खास प्रसंग पर ही याद किए जाते थे।

सब कुछ ऐसा ही चल रहा था। एक खबर मिली कि अब वे अपने सेवाकाल की अन्तिम पदस्थापना पर हैं। संयोग ऐसा रहा कि मनासा का ही एक आदमी, किसी दूसरे सरकारी विभाग में उसी कस्बे में पदस्थ था। उसने जज साहब के बारे में खूब सुना था। सो, वह जिज्ञासा भाव से उनके बारे में जानता-सुनता रहता था। उसी ने एक दिन मनासा में वह जलजला पैदा कर दिया जैसा वे जज साहब अपने साथ लेकर मनासा में आए थे।

उसने खबर दी कि रिटायरमेण्ट से डेड़ महीना पहले वे जज साहब बर्खास्त कर दिए गए हैं। उन पर, पैसे लेकर फैसला लिखने का आरोप था जो प्रारम्भिक छानबीन में ही साबित हो गया वह भी दस्तावेजी सबूतों के दम पर।

उन जज साहब की अदालत में चल रहा एक मुकदमा अपने अन्तिम चरण में था। दोनों पक्षों की बहसें और परीक्षण-प्रति परीक्षण हो चुका था। फैसला सुनाया जाना था। लेकिन फैसला सुनाने से पहले ही जज साहब के घर छापा पड़ गया। शिकायत थी कि वे मोटी रकम लेकर अनुकूल फैसला सुनानेवाले हैं। 

छापामार दल को बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। मामले की फाइल घर में, जज साहब की टेबल पर ही रखी हुई थी। फाइल खोली तो उसमें मामले के दो फैसले लिखे हुए मिले - एक पक्ष में, दूसरा विपक्ष में। दोनों ही फैसले जज साहब की लिखावट में थे। जज साहब से मौके पर पूछताछ की गई तो पहली ही बार में उन्होंने अपना अपराध कबूल कर लिया। मामला इतना साफ, दो-टूक था कि जाँच के नाम पर खानापूर्ति ही बची थी। वह पूरी हुई और जज साहब, रिटायरमेण्ट से बालिश्त भर की दूरी पर बर्खास्त कर दिए गए।

जिस दिन खबर आई, उस दिन पूरे मनासा में और कोई बात सड़कों पर आई ही नहीं। उस दिन मैं संयोगवश मनासा में ही था। दादा जिन वकील साहब के यहाँ मुंशी थे, मैं उन्हीं, मनासा के सबसे पुराने वकीलों में अग्रणी, दीर्घानुभवीे वकील, जमनालालजी जैन वकील साहब के यहाँ बैठा था। खबर सुन कर भी वे निर्विकार ही बने रहे। पूछने पर बोले - ‘ताज्जुब मत करो। बुढ़ापे में आदमी लालची और डरपोक, दोनों हो जाता है। असुरक्षा भाव ने उन्हें लालची बना दिया। ऐसा किसी के भी साथ, कभी भी हो सकता है। वे अनोखे नहीं, अन्ततः एक सामान्य मनुष्य ही थे।’

प्रशान्त भूषणजी अपराधी करार दिए जा चुके हैं। कल, बीस अगस्त को उन्हें सजा सुनाई जानी है। मुझे रह-रह कर ‘वे जज साहब’ याद आ रहे हैं। पता नहीं क्यों।

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उन्होंने बिड़ला होने से इंकार कर दिया



चित्र 10 दिसम्बर 2017 का है। नन्दनी और हमारे छोटे बेटे तथागत के विवाह समारोह का।  

आज  दादा  की  तीसरी  पुण्य तिथि और दूसरी बरसी है - 13 मई 2018 को उनका देहावसान हुआ था। इस प्रसंग के बहाने उनसे जुड़े दो अनूठे संस्मरण।

काँग्रेस के 16 विधायकों ने, ज्योतिरादित्य सिन्धिया के कहने से दलबदल कर मध्य प्रदेश की, कमलनाथ के नेतृत्ववाली अपनी ही सरकार गिरा दी। सरकार के गिरने-गिराने के इस दौर में दादा का जिक्र कई बार आया। लेकिन सन्दर्भ एक ही था - दादा की दलीय निष्ठा।

श्री द्वारकाप्रसाद मिश्र दादा को संसदीय राजनीति में लाए थे। 1967 के विधान सभा चुनावों में उन्हीं ने दादा को मनासा विधान सभा क्षेत्र से श्री सुन्दरलाल पटवा के मुकाबले उम्मीदवार बनाया था। पटवाजी ‘दिग्गज’ उम्मीदवार थे। मतगणना के दौरान मिश्रजी पल-पल जानकारी ले रहे थे। नतीजा आया। पटवाजी हारे। दादा जीते। मिश्रजी ने दादा को फोन पर बधाई दी- ‘शाबास! तुमने वह कर दिखाया जो मैं चाहता था।’ 

मिश्रजी ने दादा को सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) का संसदीय सचिव बनाया था। उन दिनों मन्त्रि मण्डल चार स्तरीय होता था - केबिनेट मन्त्री, राज्य मन्त्री, उप मन्त्री तथा संसदीय सचिव। राजनीतिक सम्भावनाओं वालों को उप मन्त्री और संसदीय सचिव बनाया जाता था।

मिश्राजी की सरकार की शुरुआत तो अच्छी हुई थी लेकिन निहित कारणों और मन्तव्यों से श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया ने काँग्रेस के लगभग पैंतीस विधायकों से दलबदल करवाकर वह सरकार गिरवा दी। 

काँग्रेसी विधायकों से दलबदल करवाने के लिए श्रीमती सिन्धिया के दूत दिन-रात लगे हुए थे। पहली बार विधायक बनने वाले लोग सबसे आसान ‘शिकार’ माने गए। सो, ऐसे विधायकों को सबसे पहले ‘घेरने’ का अभियान चला। इसी क्रम में दादा से भी सम्पर्क साधा गया। दादा ने पहली ही बार में दो-टूक इंकार कर दिया। दादा कहते थे - ‘वे दिन बड़े तनावभरे थे। अफवाहों ने हवाओं पर कब्जा कर लिया था। शंका और अविश्वास साँसों में घुल गए थे। सबकी निष्ठा दाँव पर लगी हुई थी। अचानक एक नाम हवा में उछलता और कइयों की साँसें अटक जातीं।’

उन दिनों सब कुछ चौड़े-धाले हो रहा था। विधायक अपने-अपने कमरों में ही थे। खरीददार, विधायक विश्राम गृह के गलियारों और मैदानों में सहजता से अपना काम करते नजर आते थे। 

दादा का दो-टूक इंकार जब श्रीमती सिन्धिया तक पहुँचा तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। दादा को वे सबसे आसान शिकारों में सबसे पहला माने हुए थीं। दादा का इंकार उनके लिए झटका तो था ही, किसी चुनौती से कम भी नहीं था। दूतों का उनका निर्देश था - ‘कोशिशें जारी रखो। कोई कंजूसी मत करना।’

गहमागहमी और भगदड़वाले उस माहौल की वह एक सामान्य सुबह थी। नित्यकर्मों से निपट कर दादा ने दाढ़ी बनाई। स्नान से पहले नाखून काटने लगे। कटे नाखूनों को कागज में समेट ही रहे थे कि श्रीमती सिन्धिया का दूत आ पहुँचा। बातें होने लगीं। प्रस्ताव ही नहीं दोहराया गया, इंकार भी दोहराया गया। दूत मनाए, दादा न माने। अन्ततः दूत ने अपना, तुरुप का इक्का फेंका - ‘राजमाताजी ने कहा है, हमारे साथ आ जाइए। आप अपना सरनेम बैरागी से बदल कर बिड़ला कर लेंगे।’ दादा को इसका अनुमान था। कटे हुए नाखूनों को दूत के सामने सरकाते हुए, अपने चिरपरिचित परिहास भाव से बोले - ‘मैंने अभी-अभी अपने नाखून काटे हैं। आपके सामने रखे हैं। इन्हें ले जाइए और अपनी राजमाताजी से कहिएगा कि मुझे खरीदने से पहले मेरे ये कटे हुए नाखून खरीद कर दिखा दें। वे नहीं खरीद पाएँगी।’  दादा का यह जवाब सुनकर दूत हक्का-बक्का रह गया था। कलदारों की थैलियों की व्यर्थता के इस भाष्य की उसने तो कल्पना भी नहीं की थी!

दादा को काँग्रेस में ही रहना था। उन्होंने अपनी निष्ठा बदलना तो दूर, रंच मात्र हिलने भी नहीं दी। मिश्राजी की सरकार गिर गई। सरकार गिरने के बाद मिश्राजी को ‘बैरागी-बिड़ला’ वाली बात मालूम हुई तो पहले तो चौंके, फिर बहुत खुश हुए। यह बात उन्होंने एकाधिक बार उल्लेखित की।

लेकिन दलीय निष्ठा की परीक्षा दादा अन्तिम बार नहीं दी थी। अविभाजित मन्दसौर जिले की काँग्रेसी गुटबाजी के चलते एक बार दादा को काँग्रेस से निष्कासित करने का अभियान सा शुरु हो गया। वास्तविकता कोई नहीं जानता था लेकिन हवाओं में निर्णायक सूचना तैर रही थी - ‘काँग्रेस से बैरागी का पत्ता कट्।’ दादा के समर्थक बेचैन। बार-बार दादा को टटोलें। लेकिन दादा इस सबसे बेखबर, बेअसर।

एक दिन वे रोज की तरह अपनी लिखत-पढ़त कर रहे थे कि मन्दसौर से एक दिग्गज काँग्रेसी नेता आए। जिला काँग्रेस कमेटी के दफ्तर में उनकी रोज की उठक-बैठक। उनकी शकल पर चिन्ता ने तम्बू तान रखा था। मौके पर मौजूद लोगों को लगा, ये नेताजी दादा का निष्कासन-पत्र लेकर आए हैं। दोनों के बीच राम-राम, शाम-शाम के बाद बात शुरु हुई तो मालूम हुआ, वे तो खुद अपनी परेशानी से मुक्त होने के लिए आए हैं। बौखलाए स्वरों में उन्होंने पूछा - ‘यार! बैरागी, इन्होंने सच्ची में तुझे काँग्रेस से निकलवा दिया तो?’ सुनकर दादा का ठहाका कमरे की छत फाड़ कर निकल गया। बोले - ‘निकाल दें तो निकाल दें। इसके अलावा ये और कर ही क्या सकते हैं? बन्दे को कई फर्क नहीं पड़ता।’ नेताजी हतप्रभ हो गए। बोले - ‘क्या बात करता है यार? फर्क कैसे नहीं पड़ता?’ अब दादा तसल्ली से बोले - ‘ये मुझे काँग्रेस से निकाल सकते हैं। लेकिन मेरे अन्दर की काँग्रेस को ये कैसे निकालेंगे? मैं तो तब भी गली-गली काँग्रेस का अलख जगाऊँगा, काँग्रेस के गीत गाऊँगा। रोक सकेंगे ये मुझे? रोकेंगे तो किस हैसियत से रोकेंगे?’ फिर बेहद भावुकता और संजीदगी से बोले - ‘इनके लिए काँग्रेस एक पार्टी है। लेकिन मेरे लिए तो माँ है। ये अपनी पार्टी चलाएँ। मैं अपनी माँ की देखभाल करूँगा।’ 

नेताजी अभी अचकचाए हुए थे। उनकी शकल देख कर दादा ने कहा - ‘आप फिकर छोड़ो। ठहाके लगाओ। कुछ नहीं होगा। कैफ भोपाली का शेर सुनो -

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
आँधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा

...तो भैया! बन्दा तो फूल से लिपटी हुई तितली है। कह देना उनसे।’ नेताजी हौसलाबन्द हो लौट गए। दादा के निष्कासन के अभियान का गर्भपात हो गया। 

आज दादा की दूसरी बरसी है। दादा आज होते तो क्या करते? कुछ नहीं! तब दादी को नाखून भिजवाए थे। अब पोते को भिजवा देते और कहते - ‘मुझे नहीं बनना बिड़ला।’
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भगीरथों की प्रतीक्षा में पुरखे

इन दिनों देश में पुरखों लेकर जमकर मारा-मारी मची हुई है। एक के पुरखों पर दूसरा झपट्टे मार रहा हैदूसरा उन्हें बचाने की कोशिशें कर रहा है। दुनिया दोनों की हकीकत जानती है। तमाशा देख-देख हँस रही है।

मुझे वीरेन्द्र सिंहजी भदौरिया  याद आ गए। बात 1997-98 की है। तब, आज के वाणिज्यिक कर विभाग को विक्रय कर विभाग याने सेल्स टैक्स डिपार्टमेण्ट कहा जाता था। सेवानिवृत्ति के बाद भदौरियाजी अभी ग्वालियर में बसे हुए हैं। तब वे इन्दौर में पदस्थ थे। उनके घर जाना हुआ। मैं घर में घुसा, भदौरियाजी ने दरवाजा बन्द किया। अचानक ही मेरी नजर बन्द दरवाजे पर (अन्दर की ओर) लगे एक ‘चिपकू’ (‘स्टीकर’ का यह हिन्दी नाम कैसा लगा आपको?) लगा हुआ था। उस पर लिखा हुआ फौरन नहीं पढ़ पर पाया। आश्चर्य इस बात पर हुआ कि सुभाषितों वाले ऐसे ‘चिपकू’ तो दरवाजों पर, बाहर की ओर, लोगों को दिखाने/पढ़ाने  के लिए लगाए जाते हैं। भला, बन्द दरवाजे के पीछे ‘चिपकू’ लगाने का क्या मतलब? 

भदौरियाजी मुझे बैठने के लिए आग्रह कर रहे थे लेकिन मैं अनसुनी कर ‘चिपकू’ की ओर बढ़ गया। ‘चिपकू’ पर, अंग्रेजी में लगभग चार पंक्तियों की इबारत थी। उसका हिन्दी भावानुवाद कुछ इस तरह था - ‘यह तो अच्छी बात है कि हम अपने पुरखों पर गर्व करें। लेकिन उससे अधिक अच्छी बात यह होगी कि पुरखे हम पर गर्व करें।’ इबारत का सन्देश मुझे बहुत भाया। तब से लेकर मैं इसका उपयोग करता चला आ रहा हूँ। जब मैं बीमा ग्राहकों के लिए अपने केलेण्डर छपवाता था तब एक बार, एक पन्ने पर यह वाक्य भी छपवाया था। इबारत पढ़कर, बन्द दरवाजे के पास खड़े-खड़े ही मैंने भदौरियाजी से पूछा - ‘इतनी अच्छी बात आपने दरवाजे के पीछे क्यों लगाई? बाहर लगाते तो सब लोग पढ़ते!’ भदौरियाजी बहुत धीमा बोलते हैं। उसी धीमी आवाज में जवाब दिया - ‘यह लोगों को पढ़वाने के लिए नहीं है। यह तो खुद के पढ़ने के लिए है और लगातार पढ़ते रहने के लिए है ताकि अनजाने में भी ध्यान से न उतरे।’ 

’चिपकू’ की वह इबारत तो कभी भूला नहीं। हाँ, पुरखों की लूट-खसोट और उन्हें बचाने की झूमा-झटकी देखते हुए भदौरियाजी का जवाब बेतरह याद आ रहा है।

ऐतिहासिक उपलब्धियों वाली जैसी समृद्ध विरासत काँग्रेस को मिली, वह अनुपम, अप्रतिम, अन्यों के लिए ईर्ष्याकारक ही है। इसके विरासतदाताओं की संख्या अब भी अनगिनत ही है। लेकिन नायक याद रह जाते हैं, योद्धा विस्मृत तो जाते हैं। काँग्रेस में भी ऐसा ही हुआ लेकिन इसमें भी हुआ यह कि नायकों में भी प्रमुख नायक याद रखे गए और अन्य नायक या तो भुला दिए गए या नेपथ्य में धकेल दिए गए। एक बात और हुई। जिस काँग्रेस के नाम पर नायकों और योद्धाओं ने लड़ाई लड़ी, वह काँग्रेस कोई राजनीतिक दल नहीं, मूलतः जनआन्दोलन थी। यह संयोग ही रहा कि आजादी की लड़ाई के इन नायकों ने काँग्रेस को राजनीतिक दल का स्वरूप दिया। दलगत राजनीति की हानियों को भविष्यदृष्टा गाँधी फौरन ही भाँप गए थे। इसीलिए, आजादी के बाद गाँधी ने काँग्रेस को विसर्जित करने की सलाह दी थी। 

गाँधी ने ‘काँग्रेस में भारत’ नहीं, ‘भारत में काँग्रेस’ देखी थी। इसीलिए जब देश के पहले मन्त्रि मण्डल की सदस्य सूची उनके सामने गई तो उन्हें सूची अधूरी लगी और डॉक्टर अम्बेडकर का नाम खुद लिखा दिया था। नेहरू को ताज्जुब हुआ था। उन्होंने कहा था - ‘बापू! आम्बेडकर तो काँग्रेस के और आपके मुखर विरोधी हैं!’ तब गाँधी ने हँसते-हँसते प्रतिप्रश्न किया था - ‘तुम भारत का मन्त्रि मण्डल बना रहे हो या काँग्रेस का?’ यह थी गाँधी की काँग्रेस। काँग्रेसी यदि गाँधी का यह प्रतिप्रश्न याद रखते तो वे आज की अपनी दुर्दशा से बच जाते। 

आजादी के बाद काँग्रेसियों ने अपने पुरखों के पुण्यों का लाभ दोनों हाथों से उठाया लेकिन उनके सन्देश, उनकी भावनाएँ, उनकी कामनाएँ (निश्चय ही जानबूझकर) भूल गए। लेकिन पुरखों की पुण्याई आखिर कब तक असर करती? सत्ता सुन्दरी की बाँहों में लिपटे, मदमस्त काँग्रेसियों ने पुरखों की पूँजी में बढ़ोतरी की कोई कोशिश नहीं की। वे पितरों को भूल गए, केवल सत्ता याद रही। आज उनके हाथ रीते हैं और कूल्हे कुरसियों के लिए मचल रहे हैं। लगता है, उन्हें तो श्राद्ध-पक्ष में भी पितर याद नहीं आए। अतृप्त पितर यदि अपने वंशजों को कोस रहे हों और नाराजी जता रहे हों तो क्या आश्चर्य! आज के काँग्रेसी ऐसे वंशज हैं जिनके पुरखे दुनिया में सराहे जाते हैं लेकिन अपने ही घर में उपेक्षित हैं। 

दूसरी ओर संघ परिवार की दशा इससे अधिक विचित्र है। संघियों के पुरखे परम प्रसन्न हैं। वे अपने वंशजों पर निश्चय ही गर्व कर रहे होंगे। संघियों ने अपने पुरखों की आकांक्षाएँ, मनोकामनाएँ पूरी करने की कोशिशें निरन्तर कीं और आज इस मुकाम पर हैं। किन्तु संघ परिवार का दुर्भाग्य यह कि इनका एक भी पुरखा ऐसा नहीं जो वर्तमान भारत की वैश्विक छवि के अनुरूप, अनुकूल हो। भारत की आजादी में इनमें से किसी का भी, व्यक्तिगत रूप से या सांगठानिक रूप से रंच मात्र भी योगदान नहीं। इसके विपरीत इन सबका इतिहास अंग्रेजों के समर्थन का है। भगतसिंह, चन्द्रशेखर जैसे जिन क्रान्तिारियों के नाम पर संघ परिवार देश में भावोद्वेलन करता रहता है, उन क्रान्तिकारियों को भी संघी नायकों ने, अंग्रेजों का विरोध छोड़कर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में लग जाने की सलाह दी। जिन सावरकर को ‘वीर’ कहते हैं, जिन्हें भारत रत्न देने को अपना अगला कार्यक्रम बताते हैं उन्हीं सावरकर ने, देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने के बजाय अपने प्राण बचाने के लिए छह-छह बार माफी माँगते हुए वादा किया कि यदि उन्हें जीवित रहने दिया गया तो वे आजीवन अंग्रेजों के प्रति वफादार रहेंगे। अंग्रेज सरकार ने उनकी माफियाँ न केवल मंजूर कीं बल्कि वफादारी के लिए पुरुस्कृत करते हुए उन्हें पेंशन भी दी। संघ परिवार का संकट यह है कि उनके पास एक भी ऐसा पुरखा नहीं है जिसका नाम वे छाती ठोक कर, गर्वपूर्वक देश-दुनिया के सामने जा सकें। दुनिया भी जानती है कि इनके पुरखे भारत की आजादी के दीवानों के विरुद्ध अंग्रेजों के मददगार थे। इसे संघ परिवार की विडम्बना कहिए या संकट कि ये ऐसे वंशज हैं जिनके पुरखे तो इन पर गर्व कर रहे होंगे लेकिन दुनिया के सामने अपने पुरखों पर गर्व करना इनके लिए सम्भव नहीं हो रहा। इसीलिए इन्हें काँग्रेसियों के पुरखे हड़पने पड़ रहे हैं।

पुरखों को लेकर काँगेसियों और संघियों का संकट सचमुच में रोचक है। काँग्रेसियों के पुरखे अपने वंशजों से शायद ही सुखी, सन्तुष्ट, प्रसन्न हों। अपने पुरखों के साथ काँग्रेसियों ने जो व्यवहार किया वह उनकी शर्मिन्दगी और दुर्दशा का कारण बना हुआ है। उन्होंने पुरखों की पुण्याई भोगी। खुद कुछ नहीं किया। संघ परिवार ने अपने पुरखों की सार-सम्हाल तो खूब की लेकिन वे जानते हैं कि उनके पुरखे  पुण्यवान नहीं। इसलिए वे काँग्रेसियों के पुण्यवान पुरखों को हड़पने में लगे हैं।

एक कुटुम्ब के पुरखे पुण्यवान हैं तो उनके वंशज निकम्मे हैं। वे अपने पुरखों पर गर्व करते हैं लेकिन उनके पुरखे अपने वंशजों पर गर्व नहीं कर पा रहे। दूसरे कुटुम्ब के पुरखे खुश हैं। अपने वंशजों पर गर्व कर रहे होंगे। लेकिन उनके वंशज जानते हैं कि उनके पुरखे पुण्यवान नहीं हैं। इसलिए उन पर गर्व नहीं कर पा रहे।

आपको नहीं लगता कि दोनों परिवारों के पुरखे अपने उद्धार के लिए अपने-अपने भगीरथ की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
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अभी-अभी, आधी रात को मालूम हुआ कि ‘सुबह सवेरे’, 
भोपाल ने इसे गुरुवार 07 नवम्बर 2019 को छापा



यह काम कर सकते हैं राहुल गॉंधी


लगा था कि हरयाणा और महाराष्ट्र के चुनावी परिणामों के बाद राहुल गाँधी समाचारों-समीक्षाओं के केन्द्र में आ जाएँगे। शुरुआती दो-तीन दिनों तक ऐसा हुआ भी लेकिन दोनों राज्यों में सरकारें बनाने को लेकर हुई उठापटक ने राहुल गाँधी को नेपथ्य में धकेल दिया। लेकिन भारतीय राजनीति पर पोलेण्ड की वह कहावत शब्दशः लागू होती है जिसमें कहा गया है कि मेंढक जब भी पैदा होता है, सात औंस वजन का ही होता है। आदमी आज भले ही विस्मृति के अँधेरे गोदाम में फेंक दिया जाए। लेकिन यदि वह सशरीर जीवित है तो कभी भी सम्पूर्ण प्रभावशीलता से मंच पर केन्द्रीय भूमिका में नजर आ सकता है। 

राहुल गाँधी के प्रशंसक बड़ी संख्या में मिल जाएँगे किन्तु उन पर राजनीतिक भरोसा करनेवालों की संख्या उसके मुकाबले बहुत छोटी होगी। वे ऐसे राजनेता हैं जिसमें लोग (काँग्रेस से बाहर के भी) केन्द्रीय सत्ता के शीर्ष-पुरुष होने की सम्भावना देखते हैं। लेकिन खुद राहुल गाँधी इसके लिए तैयार नजर नहीं आते। चूँकि ईश्वर ने यह व्यवस्था नहीं की कि हम किसी के मन की बात जान सकें (अच्छा ही किया वर्ना हम, चौबीसों घण्टे एक-दूसरे को तमाचे मारते ही नजर आते) इसलिए हम सब अपने-अपने अनुमान ही लगा सकते हैं। ये अनुमान भी हम अपनी पसन्द, अपनी सुविधा और अपनी मनोदशा के अनुसार ही लगाते हैं। इस तरह अनुमान लगाते समय मोटे तौर पर हम खुद को सामनेवाले की जगह पर रखकर सोचते हैं। मैं भी कुछ इसी तरह कुछ अनुमान लगा रहा हूँ।

मुझे लगता है, राहुल महत्वाकांक्षी नहीं हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करता। वह या मुश्किलों में अवसर खोज लेता है या अवसर झपट लेता है। अपने प्रतिद्वन्द्वी के अवसर हड़पने में न तो देर करता है न ही लोक-लिहाज पालता है। सत्ता की राजनीति में तो इसे ही कौशल माना जाता है। राहुल गाँधी को तो खूब अवसर मिले, बार-बार मिले, लगातार मिले, तश्तरी में रखे गए गुलाबजामुनों की तरह मिले। लेकिन राहुल गाँधी ने अत्यन्त निस्पृहता (इसे ‘अनिच्छा’ कहना अधिक समीचीन लग रहा है मुझे) से अपनी भूमिका निभाई।

आगे मुझे लगता है, राहुल गाँधी में या तो समुचित आत्म विश्वास की कमी है या फिर वे जोखिम लेने में हिचकिचाते हैं। ‘नो रिस्क, नो गेन्स। मोअर रिस्क, मोअर गेन्स’ वाली अंग्रेजी कहावत राजनीति पर ही नहीं, जिन्दगी की हर साँस पर लागू होती है। लगता है, राहुल को सब कुछ रेडीमेड चाहिए। एक राजनेता के रूप में उन्होंने ऐसा कोई उद्वेलन, आन्दोलन नहीं किया जो जन-मन को मथ सके। मैं इसी बात को यूँ कहना चाहूँगा कि उन्हें मिले अवसरों को अनुकूल राजनीति परिणामों में बदलने का कौशल अब भी उनमें विकसित नहीं हो पाया है।

और आगे मुझे लगता है, राहुल गाँधी खुद को लेकर अस्पष्ट या कि हिचकिचाहट से ग्रस्त हैं। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सादगी, शुचिता से परिपूर्ण लोक-राजनीति करें या सत्ता की राजनीति। मनमोहनसिहं ने उन्हें मन्त्री पद प्रस्तुत किया था किन्तु उन्होंने मना कर दिया। इसके विपरीत, उन्हें जब-जब प्रधान मन्त्री के रूप में उल्लेखित किया तब-तब उन्होंने कभी प्रभावी प्रतिवाद नहीं किया। 

अगली बात मेरा अनुमान नहीं, सुनिश्चित धारणा है। सत्ता की राजनीति करनेवाले नेता में जो लोक रंजक वाक्पटुता, आक्रामकता-चतुराई (जिसे अंग्रेजी में ‘कनिंगनेस’ कहते हैं), अपनी बात से (बेशर्मी से) पलट जाने जैसे ‘गुणों’ का जो न्यूनतम प्रतिशत अनिवार्य होता है, वह राहुल गाँधी में नहीं है। उनकी यह विशेषता, उनकी सबसे बड़ा बाधा है। वे ‘भद्र-लोक’ बनकर साफसुथरी राजनीति करना चाहते हैं जो हमारे गले नहीं उतरती। हम वह विचित्र और पाखण्डी समाज हैं जो राजनीति में ईमानदार और भले लोगों की अनुपस्थिति की मुक्त-कण्ठ आलोचना करते हैं और भले-ईमानदार उम्मीदवार को कभी वोट नहीं देते। जब भला-ईमानदार आदमी वोट माँगने आता है तो हम उसके प्रति दया और सहानुभूति जताते हुए, उसके मुँह पर ही कहते हैं - ‘अरे! आप तो भले आदमी हैं। आप हमारे काम कैसे करवाएँगे?’ (यह बात मैंने अनुमान से नहीं लिखी है। इन्दौर के सुपरिचित साहित्यकार सदाशिव कौतुक एक बार निगम पार्षद का चुनाव लड़े थे। तब उन्हें अपने मतदाताओं से यह बात कई बार सुननी पड़ी थी। कौतुकजी को ‘भला आदमी’ का प्रमाण-पत्र देनेवाले मतदाताओं ने कौतुकजी की जमानत जप्त करवा दी थी।)

तो क्या राहुल गाँधी राजनीति में ‘मिसफिट’ हैं? उन्हें राजनीति छोड़ देनी चाहिए? इसका निर्णायक जवाब तो राहुल गाँधी ही दे सकते हैं किन्तु मुझे लगता है, राहुल गाँधी चाहें तो भी ऐसा नहीं कर सकेंगे। उनकी हालत ‘बाबाजी तो कम्बल छोड़ना चाहते हैं लेकिन कम्बल बाबाजी को नहीं छोड़ रहा’ वाली है। आत्मविश्वासविहीन हो चुके, सत्ता की गुड़भेली के काँग्रेसी चींटे उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे। उनके पास राष्ट्रीय स्तर पर ‘वोट अपील’ वाला कोई चेहरा नहीं है। राहुल गाँधी को काँग्रेस की राजनीति में बनाए रखना उनकी लाचारी है और वहाँ बने रहना राहुल गाँधी की ‘कृतज्ञता भरी विवशता’ है। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी परिणामों ने यह भी साबित कर दिया है कि राहुल की पसन्द के लोग चुनावी सफलताएँ दिलाने में सर्वथा नाकामयाब रहे। दोनों राज्यों के स्थापित क्षत्रपों ने ही काँग्रेस की वापसी कराई है। जाहिर है, सांगठानिक बदलाव की रणनीति के लिहाज से राहुल गाँधी विफल ही रहे हैं।

तो क्या, राहुल अब काँग्रेस के लिए अनुपयोगी हो गए हैं? मुझे लगता है, ऐसा बिलकुल नहीं है। आज की काँग्रेस वह काँग्रेस है ही नहीं जिसने देश को आजादी दिलाई थी। वह काँग्रेस तो कपूर हो गई। आज तो उसकी छाया मात्र है। ऐसे में, परिदृष्य पर राहुल गाँधी की कार्यशैली, व्यवहार और मिजाज को देखते हुए लगता है, राहुल गाँधी काँग्रेस को फिर से काँग्रेस बना सकते हैं। आज के काँग्रेेसियों को पता ही नहीं है कि काँग्रेस क्या है। उन्हें काँग्रेस का इतिहास ही पता नहीं। वे केवल उस काँग्रेस को जानते और मानते हैं जो कुर्सी दिलाती है। आजादी के आन्दोलन में काँग्रेस की भूमिका, भारत विभाजन में काँग्रेस और गाँधी-नेहरू-सरदार की भूमिका, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, अमर शहीद भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों से काँग्रेस के अन्तर्सम्बन्ध जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषयों पर सामान्य स्तर के काँग्रेसियों की घिग्घी बँध जाती है। धारा 370 को लेकर काँग्रेसियों की दुविधा जगहँसाई कराती है। काँग्रेस और काँग्रेसियों की वर्तमान दशा कुबेर सम्पदा वाले निर्धन वंशजों जैसी है। राहुल गाँधी, काँग्रेसियों को काँग्रेस से मिलवाने का यही आधारभूत काम कर सकते हैं।

काँग्रेस के शुरुआती समय में सेवादल ने लोगों को काँग्रेस से और वस्तुतः राष्ट्रीय एकता से जोड़ने का काम किया था। राहुल गाँधी उसी सेवादल को पुनर्जीवित कर शुरु से शुरुआत कर सकते हैं। प्रबुद्ध लोगों से कांग्रेस पूरी तरह कट चुकी है। उनसे जुड़ना चाहिए। गाँव-गाँव में चौराहों पर छोटी-छोटी गोष्ठियों के जरिए लोगों तक पहुँचने की शुरुआत दूरगामी और स्थायी नतीजे दे सकती है। 

एक बात और। राहुल गाँधी आज भी भारत की आत्मा से दूर ही लगते हैं। वे यायावर की तरह गाँवों में जाएँ, लोगों के बीच रहें और भारत को जानें-समझें। उन्हें दिल्ली और केमरों का मोह छोड़ कर भूखे-नंगे लोगों की पीड़ा अनुभव करनी चाहिए। देश के हालात कमोबेश 1947 से पहलेवाले बनते जा रहे हैं। राहुल गाँधी अपनी उलझन दूर करें, जोखिम लेने की हिम्मत जुटाएँ, निर्लिप्त भाव से लोक-राजनीति करें। यह काँग्रेस की नहीं, देश की जरूरत है। 

देश और काँग्रेस के राजनीतिक इतिहास में राहुल दर्ज हो चुके हैं। इतिहास में उनकी यह मौजूदगी धूमकेतु की तरह उल्लेखित हो या चिंगारी से ज्वाला बनने की तरह, यही देखनेवाली बात होगी।
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भोपाल के दैनिक 'सुबह सवेरे' ने आज इसे छापा



विभीषण बने बिना न रामराज आएगा न दीपावली

‘दीपावली का पर्व उपलब्ध कराने के लिए किसे धन्यवाद दिया जाना चाहिए?’ सबको प्रभु राम ही याद आएँगे। कुछ लोग रावण को श्रेय दे सकते हैं - उसने सीता हरण नहीं किया होता तो राम किसका वध करते? कैसे सीता सहित अयोध्या लौट पाते? वनवास से राम की सीता सहित वापसी पर ही तो अयोध्यावासियों ने दीपावली मनाई थी! 

लेकिन मेरे मन में बार-बार विभीषण का नाम उभर रहा है। वही विभीषण जिन्हें कभी घर का भेदी तो कभी विश्वासघाती के रूप में उल्लेखित किया जाता है। कहा जाता है कि रावण इसलिए क्योंकि उसका भाई उसके साथ नहीं था। विभीषण को हमारा ‘लोक’ खलनायक के रूप में याद करता है। लेकिन मुझे लगता है कि यदि विभीषण नहीं होता तो राम अपनी भार्या सीता प्राप्त नहीं कर पाते। तब अकेले राम अयोध्या कैसे लौट पाते और कैसे अयोध्यावासी दीपावली मनाते? और इससे भी आगे की, इससे बहुत बड़ी बात - यदि राम अयोध्या नहीं लौटते तो जो रामराज्य आज हमारी चिरन्तन अभीप्सा बना हुआ है, वह रामराज कैसे स्थापित हो पाता? 

चिन्तन की परतें ज्यों-ज्यों उघड़ रही हैं त्यों-त्यों मेरी धारणा मजबूत होती जा रही है - ये विभीषण ही थे जिन्होंने हमें रामराज  और दीपावली का महापर्व दिलवाया। 

विभीषण, लंका के राजा रावण का सगा छोटा भाई था। रावण के बाद लंका का राज उसे ही मिलना था। सुन्दरकाण्ड में खुद रावण ने उसे अपना उत्तराधिकारी माना है। रावण के अनुचर, राम के शिविर से जीवनदान प्राप्त कर लंका लौटे तो रावण ने उनसे विभीषण का हालचाल इस तरह पूछा था - 

पुनि कहु खबरि विभीषन केरी। जाहि मृत्यु अई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

जब तय था कि रावण के बाद लंका का राज्य विभीषण को ही मिलना था तो विभीषण को रावण की नाराजी मोल लेने की क्या जरूरत थी? विभीषण ने राज गद्दी हासिल करने के लिए षड़यन्त्र करना तो दूर, षड़यन्त्र का विचार भी नहीं किया। करते भी कैसे? किसके दम पर करते? वे तो लंका में खुद को ‘दाँतो के बीच जबान’ मानते थे -

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

तब फिर क्या बात रही कि विभीषण को ‘घर का भेदी’ बनने के लोकोपवाद का प्रतीक और पर्याय बनना पड़ा?

तुलसीदासजी ने विभीषण को ‘नीति विभूषण’ कहा है। विभीषण ‘नीतिवान’, नीति का पैमाना थे। मानस का सुन्दरकाण्ड केवल हनुमान की रामभक्ति और शौर्य की गाथा नहीं है। वह विभीषण के नीतिमान पुरुष होने का सुन्दर आख्यान भी है। विभीषण ने नीतिगत आचरण करते हुए ही वह सब किया जिसे आज हमारा लोक  अस्वीकार करता है।

विभीषण अपने सम्राट भाई का हित ही चाहते थे। वे चाहते थे कि उनका भाई जीवनपर्यन्त लंकापति बना रहे। इसीलिए उन्होंने लंका की चिन्ता की - लंका रहेगी तब ही तो उनका भाई लंकेश बना रहेगा! उनके चिन्तन-मनन में लंका और लंका का हित ही केन्द्र में रहा। उन्होंने ‘राज-हित’ की अपेक्षा ‘राज्य-हित’ या कहिए कि ‘राष्ट्र-हित’ को वरीयता दी। उन्होंने ‘राजा’ और ‘राज’ की अपेक्षा ‘राज्य’ की चिन्ता की। भाई की नहीं, भाई का राज बना रहे इसलिए राज्य की चिन्ता की। ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति तब ही सार्थक होती है जब ‘राजा प्रथम’ के मोह से मुक्त हुआ जाए।

‘राष्ट्र प्रथम’ की इसी भावना के अधीन विभीषण ने भरी सभा में अपने सगे भाई, लंकापति रावण को समझाने का साहस दिखाया। उन्होंने जब देखा कि उनका भाई नीति और मर्यादा भूल रहा है और पूरी सभा चापलूसी कर उनके भाई को कुमार्ग पर धकेल रही है तब उन्होंने सीधे परामर्श से पहले समझाया -

सुमति-कुमति सबके उर रहहिं। नाथ पुरान निगम अस कहहिं।।
जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना। जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना।।

और इसके बाद उन्होंने वह साहस दिखाया जो कोई सच्चा राष्ट्र प्रेमी ही दिखा सकता था। चापलूस सभासदों से भरी सभा में उन्होंने रावण को कहा -

तव उर कुमति बसी विपरीता। हित-अनहित मानहु रिपु प्रीता।।

किन्तु चापलूसी और अहम् से ग्रस्त रावण को यह सलाह अनुकूल नहीं लगनी थी। उसने लात मार कर विभीषण को दूर कर दिया। 

विभीषण ने जब देखा कि उनकी सही बातों को सुनने-मानने के बजाय उन्हें प्रताड़ित, अपमानित किया जा रहा है तो वे ‘राम सत्यसंकल्प प्रभु, सभा कालबस तोरि’ की सूचना देकर रामजी की शरण में चले गए। विभीषण के लंका त्याग पर गोस्वामीजी ने लिखा -

अस कहि चला विभीषण जबहिं। आयूहीन भये सब तबहिं।।
रावन जबहिं विभीषन त्यागा। भयउ विभव बिन तबहिं अभागा।।

नीतिवान विभीषण के जाते ही रावण और उसके सारे दरबारियों की आयु पूरी हो गई और रावण वैभवहीन तथा अभागा हो गया। यहाँ नाम अवश्य विभीषण और रावण के हैं किन्तु सन्देश सीधा और साफ है - आयुष्य, वैभव (राज वैभव) और सौभाग्य केवल नीतिगत आचरण से ही पाए जा सकते हैं। अनीति का वरण करने पर इनका नाश सुनिश्चित है।

विभीषण का यह नीतिवान स्वरूप केवल रावण तक ही सीमित नहीं रहा। पूछने पर उन्होंने प्रभु श्रीराम को भी नीति का पालन करने की सलाह दी। लंका पहुँचने के लिए समुद्र पार करना जरूरी था। प्रभु श्रीराम ने विभीषण से पूछा - क्या किया जाए? विभीषण ने कहा -

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।
जद्यपि तदपि नीति अस गाई। विनय करिअ सागर सन जाई।।

हे! राम, आप करोड़ों सागर सोख सकते हैं। किन्तु नीति तो यही कहती है कि आप सागर से विनयपूर्वक रास्ता माँगें।रामजी ने विभीषण से सहमति जताई। यह बात लक्ष्मण को रास नहीं आई। उन्होंने विनती करने को कायरता और आलस्य बताया तथा सागर को तुरन्त सोखने का आग्रह किया। रामजी ने अपने भाई की बात अनसुनी की और रावण के भाई की सुनी। नीति पर चलने का नतीजा पूरे जगत ने देखा। 

याने विभीषण अर्थात् नीतिगत आचरण। रावण ने नीति मार्ग छोड़ा तो न केवल राजपाट से हाथ धोना पड़े, प्राण भी त्यागने पड़े। नीति पर चलने से राम ने अपनी अपहृत भार्या पाई और पहले अयोध्यापति और बाद में मर्यादा पुरुषोत्तम बने और विश्व को आदर्श रामराज्य दिया।

यह सब सोचते-सोचते मुझे विभीषण, रामराज्य की आधार शिला रखनेवाले नीति पुरुष अनुभव होते हैं। न राम को विभीषण मिलते और न ही रामायण पूरी होती, न दीपावली का शुभारम्भ होता और न ही रामराज मिलता।

आज हम सब रामराज की बाट जोह रहे हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल हमें रामराज का सपना दिखाता है। हम हर बार भरोसा करते हैं और हर बार छले जाते हैं। हमारी दीपावली अब आत्माविहीन हो कर एक आयोजन (ईवेण्ट) में बदलती जा रही है। प्रकाश तो खूब हो रहा है लेकिन जिन्दगी के अंधेरे कम नहीं हो रहे। पटाखों का शोर हमारे कान फोड़ रहा है लेकिन आनन्द-उल्लास, सुख-सन्तोष छिटकते जा रहे हैं। न तो रामराज है न ही दीपावली।

विभीषण ही रामराज स्थापित करा सकते हैं और दीपावली मनवा सकते हैं। विभीषण एक व्यक्ति या एक शरीर नहीं है। विभीषण याने अपने राजा (राजा भी कौन? अपना सगा बड़ा भाई) को अनीति पर चलने से, भरी सभा में टोकने-रोकने का साहस। विभीषण याने जगत् नियन्ता को विनय करने की सलाह देने का साहस। विभीषण याने नीति पर चलने के लिए, सामने मिल रहा राज-पाट छोड़ने का साहस। विभीषण याने राजा नहीं, राष्ट्र प्रथम के विचार को सम्पूर्ण नैतिकता से आत्मा में उतारना। 

विभीषण की तलाश बेकार है। अब तो आवश्यकता है, खुद विभीषण बनने की। नीति विभूषण विभीषण बनने की। 
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(भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ ने आज अपने मुखपृष्ठ पर इसे सम्पादित रूप में छापा।)



खानदानी जमाइयों का ससुर

ये है हमारा लाला। लाला इसका असली नाम नहीं है। यह तो इसका ‘बोलता’, ‘घर का’ नाम है। वास्तविक नाम तो बृजभूषण शर्मा है। मकानों/भवनों की छतों पर ‘जल रोधी लेप’ लगाने (रूफ वाटरप्रूफिंग) का काम करता है। ईश्वर की कृपा से जरूरतें पूरी हो रहीं है। सो, पैसों के लिए जान नहीं झोंकता। सम्बन्धों को पूँजी मानता है इसलिए कभी-कभी घर में घाटा भी खा लेता। हर सीजन में कुछ लोग ‘आप तो अपनेवाले हो’ का वास्ता देकर भुगतान करने से हाथ जोड़ लेते हैं। लाला को घाटे का नहीं, सामनेवाले का, बात से पलट जाने का दुःख होता है। कहता है - ‘पैसा तो आनी-जानी चीज है। जितना तकदीर में होगा, उससे कम-ज्यादा नहीं होगा। नहीं देना था तो कोई बात नहीं। पर पहले ही बता देते! इस तरह झूठ बोलना अच्छी बात नहीं।’

लाला रतलाम रहता था। रतलाम में था तो इसने हमें अपने परिवार में शामिल कर रखा था। हमारा छोटा बेटा तथागत तो मानो इसकी ही गोद में बड़ा हुआ। इधर रात घिरती, उधर तथागत का दिन उगता। मेरी उत्तमार्द्धजी को नींद सताती। तब लाला ही तथागत को गोद में लिए, आधी-आधी रात तक हिलराता-दुलराता था। 

गए कई बरसों से लाला इन्दौरवासी हो गया है। लेकिन रतलाम से नाता नहीं टूटा। रतलाम आना-जाना बना रहता है। फर्क इतना पड़ा कि आने से पहले जाने का कार्यक्रम बना कर आता है। इसलिए हर बार मिलना नहीं हो पाता। जब कभी गुंजाइश होती है, मिलने घर जरूर आता है।

कल हम पति-पत्नी इन्दौर जाने के लिए भिण्ड एक्सप्रेस में बैठे तो लाला डिब्बे में मानो प्रकट हुआ। हम ‘सुखद आश्चर्य’ से उसकी शकल देखने लगे तो हँसते हुए बोला - ‘बैठने की जगह ढूँढ रहा था। आप दोनों पर नजर पड़ी तो तलाश खतम।’ उसने अपना झोला-झण्डा रखा और हम लोग रेल चलने से पहले ही बतियाने लगे।

मुझे लगा था, लाला धन्धे-पानी का कोई काम लेकर आया होगा। पूछने पर बोला - ‘नहीं। धन्धे-पानी का कोई काम नहीं था। आम के पौधे पहुँचाने आया था। हर बार तो सुबहवाली रेल से आ जाता हूँ। आज काम ज्यादा देर का नहीं था। इसलिए देर से आया और पौधे सौंप कर फटाफट स्टेशन आ गया। सुबह जल्दी आता तो मिलने घर पर जरूर आता।’ 

मुझे लगा, लाला ने नर्सरी का नया काम शुरु कर दिया है। घुमा-फिराकर पूछताछ करने लगा तो हँसकर बोला - ‘कोई नया धन्धा-वन्धा शुरु नहीं किया। अब क्या नया धन्धा शुरु करना? अभी जो काम है, उसी से फुरसत नहीं मिल रही।’ और उसके बाद जो कुछ उसने बताया वह सचमुच में तनिक अनूठा और अविश्वसनीय लगा। ‘अविश्वसनीय’ इसलिए कि जो उसने किया है, कर रहा है और इसे भविष्य में जारी रखने का इरादा जताया, उसके लिए हम सब उपदेश तो देते हैं लेकिन जब अपनी बारी आती है तो फौरन पल्ला छुड़ा लेते हैं।

लाला के आँगन में आम का एक पेड़ है। उस पर ‘मुरब्बा-आम’  आते हैं। मुरब्बा-आम याने जो खट्टे नहीं होते। उसके पड़ौसी सज्जन के आँगन में भी आम का एक पेड़ है। उस पर ‘केसर आम’ आते हैं। हर बरस की तरह इस बरस भी आम के मौसम में पक्षियों के खाये आम मिट्टी में गिरे। इस बरस बरसात कुछ अधिक ही हुई तो उनमें से कोई बीस-बाईस गुठलियाँ अंकुरित हो, पौधे बन गईं। ये पौधे आते-जाते लाला की आँखों में खुब गए। रतलाम के पास सैलाना में एक निजी वाटर पार्क की वाटरप्रूफिंग के लिए गया तो वहाँ खूब सारी खुली जमीन देखकर मालिक से पूछ बैठा - ‘मेरे पास आम के कुछ पौधे हैं। आप यहाँ लगाओ तो मैं ला दूँगा।’ मालिक ने कहा - ‘आपने तो मेरे मन की बात कह दी। फरक यही रहा कि मैं दो-चार महीने बाद पौधे लगाता। आपने आज ही कह दिया। आप पहुँचा दीजिएगा।’ उसी वाटर पार्क के लिए, आम के पाँच पौधे पहुँचाने के लिए लाला आज रतलाम आया था - गाँठ का रोकड़ा लगा कर और अपना कीमती समय निकाल कर। लाला ने इसके लिए सामनेवाले से धेला भी नहीं लिया। लाला ने कहा - ‘पौधे देखकर उनके चेहरे पर जो खुशी आई, वह देखकर मुझे तो मानो कुबेर का खजाना मिल गया भाई सा’ब!’

मुझे अच्छा तो लगा किन्तु अचरज भी हुआ। पूछा, ऐसा और भी कहीं किया है? लाला ने बताया कि दो जगह और उसने आम के पाँच-पाँच पौधे पहुँचाए हैं। इन्दौर में ही खण्डवा मार्ग स्थित आईटी पार्क में और हातोद स्थित, औद्योगिक केन्द्र विकास निगम के औद्योगिक परिसर में। ऐसा नही हुआ कि वह अपने किसी काम के लिए जा रहा था और पौधे भी साथ लिए चला गया। दोनों जगह वह केवल पौधे पहुँचाने के लिए अपना समय निकाल कर, भाड़े का वाहन लेकर गया। उसके पास अभी पाँच-सात पौधे और हैं जिनके लिए वह ‘सुपात्र’ देख रहा है। ‘सुपात्र’ याने वे सज्जन जो इन पौधों को लगाकर भूल न जाएँ।

यह सब सुनाते हुए लाला के चेहरे पर मानो होली के सारे रंग बरस रहे थे। उसकी खुशी अवर्णनीय थी। वह इस तरह सुना रहा था जैसे कोई बेटियों का बाप अपनी बेटियों को खानदानी हाथों में सौंपकर अपनी खुशी और निश्चिन्तता बयान कर रहा हो।

हम दोनों उसके चेहरे में देव-दर्शन कर रहे थे। उसे खूब-खूब बधाइयाँ दीं। हमारी हर बधाई पर वह संकुचित हो रहा था - ‘मैंने ऐसा क्या कर दिया कि आप मुझे बधाइयाँ दे रहे हैं। मैंने पौधे ही तो पहुँचाए हैं! और किया ही क्या है?’

लाला से विदा हुए लगभग चौबीस घण्टे होनेवाले हैं। उसके इस विनम्र जवाब का कोई जवाब मुझे अब तक नहीं सूझा है। आपके पास कोई जवाब हो (या आप उससे पौधे लेना चाहते हों) तो आप उससे मोबाइल नम्बर 96858 22767 पर बता दीजिएगा। जवाब या पौधे की जरूरत न भी हो तो एक अच्छा काम करनेवाले भले आदमी को बधाई देकर उसे उत्साहित तो आप कर ही सकते हैं।

पौधे विकसित करने और बाँटने का यह क्रम वह बनाए रखना चाह रहा है। मुमकिन है, अगले बरस वह दुगुने-तिगुने पौधे तैयार करे।
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‘मंगते से मिनिस्टर’ की अन्तर्कथा


दादा श्री बालकवि बैरागी के चाहनेवाले, प्रशंसक सचमुच में अनगिनत हैं। देश-विदेश में फैले इन आत्मीयों के पास दादा से जुड़े किस्से भी अनगिनत हैं। सबके अपने-अपने संस्मरण हैं जिनके जरिये वे समय-समय पर दादा के प्रति अपनी भावनाएँ व्यक्त करते रहते हैं। इन संस्मरणों, यादों के माध्यम से दादा के व्यक्तित्व और कृतित्व के  जाने-अनजाने पक्ष सामने आते रहते हैं।


इसी क्रम में दादा की आत्मकथा को लेकर विभिन्न जानकारियाँ सामने आ रही हैं। इनमें से अधिकांश जानकारियाँ या तो आधी-अधूरी हैं या सुनी-सुनाई।

कुछ ऐसी ही स्थिति मुझे श्रीयुत जयप्रकाशजी मानस की, 17 अक्टूबर 2019 की, ‘अपने दिनों को मैं कभी नहीं भूला’ शीर्षक पोस्ट में और पोस्ट पर आई श्री राजशेखरजी व्यास की टिप्पणी में नजर आई।

मानसजी की पोस्ट में उध्दृत ब्यौरों से ध्वनित होता है मानो मेरी माँ (मेरी माँ का नाम पोस्ट में दापू बाई लिखा है जो वास्तव में धापू बाई है) ने दादा को किसी प्रसंग या अवसर पर कटोरा भेंट किया जो दादा के लिए ‘बड़ी चीज’ और उनके जीवन का ‘पहला खिलौना’ था।

बातें तो सच हैं लेकिन ‘कहन’ के अन्तर ने समूचा चित्र बदल दिया। दादा ने विपन्नता के चरम को जीया। अपनी विपन्नता का उल्लेख वे कुछ इस तरह करते थे - ‘मेरी माँ ने मुझे सबसे पहला जो खिलौना दिया, वह था - भीख माँगने का कटोरा जो हमारे परिवार की आजीविका का साधन था।’ मुझे लगता है, मानसजी के पोस्ट के उद्धरण में और दादा की इस बात में यथेष्ट अर्थान्तर है।

इसी तरह इस उद्धरण में कहा गया है - ‘पिताजी द्वारकादासजी अपंग थे। माँ उन्हें लाठी के सहारे भीख माँगने निकलती थी। पिताजी सारंगी बहुत बढ़िया बजाते थे। वो बजाते, मैं और माँ गाते और घर-घर भीख माँगते।’ इस अंश में वर्णित सारे तथ्य सही हैं किन्तु उनकी प्रस्तुति सर्वथा काल्पनिक है। यह विवरण पढ़ते-पढ़ते आँखों के सामने चित्र बनने लगता है जिसमें एक अपंग आदमी, अपनी पत्नी का सहारा लिए, सारंगी बजा रहा है और उसकी पत्नी और बेटा गा-गा कर संगत करते हुए भीख माँग रहे हैं। ऐसा लगता है, किसी ने, विवरण को प्रभावी बनाने की सदाशयता से तथ्यों को अपनी कल्पना से एक सिलसिला दे दिया।

मेरे पिताजी सारंगी सचमुच में बहुत बढ़िया बजाते थे। मेरी माँ घर-घर जाकर रोटियाँ माँगती थी। कभी-कभी दादा भी उनके साथ जाते थे। लेकिन ये सारी बातें अलग-अलग समय पर, अलग-अलग घटती थीं। मनासा के कुछ कृपालु श्रेष्ठि परिवार अपनी धार्मिकता के अधीन मेरी माँ को रोटियाँ देते थे। ये घर गिनती के थे। माँ इन्हीं घरों पर जाकर रोटी माँगती थी। ये परिवार भी मेरी माँ की प्रतीक्षा करते थे और यथासम्भव गरम-गरम रोटी देने की कोशिश करते थे। पिताजी का सारंगी बजाना और मेरी माँ का भीख माँगना सर्वथा भिन्न-भिन्न सन्दर्भों की, भिन्न-भिन्न बातें हैं। पिताजी ने सारंगी वादन कस्बे के संगीत जलसों में और मन्दिरों में किया। मौज में आकर, घर के बाहर चबूतरे पर बैठकर प्रायः ही सारंगी बजाया करते थे। सड़कों पर कभी भी सारंगी वादन नहीं किया। भीख माँगने के निमित्त तो कभी नहीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि भीख माँगने के लिए ये तीनों कभी एक साथ निकले हों।

नवीं कक्षा की पढ़ाई के लिए दादा, रामपुरा में भर्ती हुए थे। मनासा-रामपुरा की दूरी, जैसाकि मानसजी की पोस्ट में बताया गया है, 20 मील, याने कि 32 किलो मीटर है। दादा के पास बस किराए के पैसे कभी नहीं रहे। वे प्रति सोमवार सुबह रामपुरा के लिए पैदल निकलते और प्रति शनिवार रामपुरा से मनासा के लिए पैदल लौटते। इस पदयात्रा के दौरान भीख माँगने की बात सही नहीं है।

दादा 1967 में विधायक और 1969 में राज्य मन्त्री बने। उससे काफी पहले, दादा ने माँ का रोटियाँ माँगना छुड़वा दिया था। इसके लिए दादा को घर और बाहर, दोनों स्तर पर संघर्ष करना पड़ा। माँ रोटी माँगना छोड़ना चाहती थी लेकिन पिताजी इसे हमारे परिवार का धर्म मानते थे। दादा को सचमुच में धरना देना पड़ा था। लेकिन जिन घरों से माँ रोटियाँ माँग कर लाती थी, उन श्रेष्ठि परिवारों ने भी दादा पर दबाव बनाया। कहा कि दादा उन्हें धर्मपालन करने और पुण्य लाभ अर्जित करने से वंचित कर रहे हैं। तब दादा ने जो जवाब दिया था, उसका कोई उत्तर उन परिवारों के पास नहीं था। दादा ने कहा था कि यदि वे सचमुच में धर्मपालन कर पुण्य अर्जित करना चाहते हैं तो वे सब हमारे घर आकर रोटियाँ दे जाएँ। 

इसके बाद से माँ का रोटी माँगना बन्द हो गया। मुझे खूब अच्छी तरह याद है, उस दिन मेरी माँ बिलख-बिलख कर रोई थी। बड़ी देर तक रोती रही थी। उसके आँसू थम नहीं रहे थे और हिचकियाँ बन्द नहीं हो रही थीं। उस दिन मेरी माँ ने दादा को एक-एक पल में हजारों-हजारों बार असीसा था। बार-बार कह रही थी - ‘नन्दा! तूने मेरा जनम सुधार दिया।’ इस समय जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ तब मेरी आँखे बह रही हैं। टाइप करने में मुझे बहुत ज्याद असुविधा और तकलीफ हो रही है।

मानसजी द्वारा उद्धृत आलेख की  यह सूचना भी सही नहीं हैं कि दादा के सांसद बनने के बाद भी मेरी माँ पड़ोसियों के यहाँ अनाज बीनती थी। दादा ने माँ को सारे कामों से मुक्ति दिला दी थी। घर के दैनन्दिन कामों के सिवाय माँ को कोई काम नहीं रह गया था। वस्तुतः विधायक बनने के कुछ बरस पहले से ही दादा ने (कवि सम्मेलनों की आय से) आय-कर चुकाना शुरु कर दिया।

यह बात बिलकुल सच है कि दादा अपने कपड़े नहीं खरीदते थे। मंच हो या निजी चर्चाएँ, दादा इस बात का उल्लेख करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। दादा की इस मनःस्थिति की जानकारी सार्वजनिक हो चुकी थी जिसके चलते उनके चाहनेवाले, दादा के माँगे बिना ही उन्हें खादी खरीद कर देने लगे थे। लेकिन जब भी उन्हें कपड़ों की आवश्यकता होती वे निस्संकोच माँग लेते थे। लोग पूछते थे - ‘आप ऐसा क्यों करते हैं?’ दादा ठहाका लगा कर जवाब देते - ‘इससे मेरा दिमाग दुरुस्त रहता है।’ 

राजशेखरजी की यह जानकारी सही नहीं है कि दादा ने अपनी आत्म-कथा नहीं लिखी। सच तो यह है कि राजशेखरजी की इस टिप्पणी ने मुझे विस्मित किया। राजशेखरजी का जिक्र दादा के मुँह मैंने अनेक बार सुना है। जिस आत्मीयता और प्रेम भाव से वे राजशेखरजी का जिक्र करते थे उससे मेरी यह धारणा इस क्षण भी बनी हुई है कि राजशेखरजी दादा के ‘प्रियात्मन’ रहे हैं।

दादा ने अपनी आत्म-कथा लिखी थी। उसका शीर्षक ‘मंगते से मिनिस्टर’ भी उन्होंने ही दिया था। मैं उनकी आत्म-कथा लेखन का साक्षी रहा हूँ। दादा ने अपनी यह आत्म-कथा बिना किसी कागजी तैयारी के लिखी थी। वे टाइप रायटर पर कागज चढ़ाते और शुरु हो जाते। वे इस तरह टाइप करते मानो सब कुछ उन्हें मुँह जबानी याद हो। इसके लिए उन्होंने कभी ‘रफ वर्क’ नहीं किया, टिप्पणियाँ याकि नोट्स नहीं लिखे। टाइप करने के बाद उसे जाँचते और आवश्यक होने पर हाथ से सुधार करते। लेकिन ऐसे सुधार भी नाम मात्र के ही होते।

यह आत्म-कथा उन्होंने राइस पेपर पर, चार प्रतियों में टाइप की थी। पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस के मालिक बापू दादा जैन ने उसकी नीले रंग की क्लाथ बाइण्डिंग कराई थी। ठीक-पृष्ठ संख्या तो मुझे अब याद नहीं किन्तु अच्छी-खासी, मोटी पाण्डुलिपि थी। मैं अनुमान करता हूँ कि ढाई सौ पृष्ठ तो रहे ही होंगे।

उनकी प्रबल इच्छा तो थी कि उनकी आत्म-कथा प्रकाशित हो। किन्तु प्रकाशकों के चक्कर काटना उनकी प्रकृति में नहीं था। उनके मित्रों ने ही इसके लिए कोशिशें की। कम से कम तीन प्रकाशकों से उनकी बात हुई। इन तीनों मुलाकातों का मैं प्रत्यक्षदर्शी हूँ। यह संयोग ही था कि तीनों को ‘मंगते से मिनस्टिर’ के वे अंश असुविधाजनक लगे थे जिनमें दादा ने डी. पी. मिश्रा सरकार गिराने के लिए श्रीमती विजयालक्ष्मी सिन्धिया की भूमिका का ब्यौरा बहुत बारीकी से और बहुत विस्तार से दिया था। प्रकाशकों का कहना था कि ये ब्यौरे मानहानि के दायरे में आ सकते हैं और यदि श्रीमती सिन्धिया ने मुकदमा लगा दिया तो उनकी (प्रकाशकों की) मुश्किल हो जाएगी। वे इस ब्यौरे को निकलवाना चाहते थे। लेकिन दादा ने हर बार इंकार कर दिया और कहा कि किताब यदि छपेगी तो इसी मूल स्वरूप में छपेगी। फलस्वरूप किताब छपी ही नहीं। यह शायद ऐसी बिरली किताब होगी जो छपी तो नहीं लेकिन जिसका जिक्र व्यापक स्तर पर इस तरह हुआ मानो छप गई हो और लोगों ने पढ़ ली हो। बहुत बाद में दादा ने इसी शीर्षक से एक लेख जरूर लिखा था लेकिन मानसजी की पोस्ट में उद्धृत आलेख, दादा के उस लेख का हिस्सा नहीं है।

राजशेखरजी की यह बात सौ टका सही है कि दादा ने इसका दूसरा भाग लिखने से पहले ही इसका नामकरण ‘मन्त्री से मनुष्य’ कर दिया था। यह किताब लिखी ही नहीं गई।

प्रेमी लोग दादा को जिस श्रद्धा और आदर-भाव से याद करते हैं वह देख-देख कर मैं हर बार विगलित होता हूँ और इन सबको प्रणाम करने के लिए मेरे हाथ अपने-आप जुड़ जाते हैं, माथा झुक जाता है। यह सब देख-देख कर मुझे प्रायः ही लगता है हम लोग तो केवल कहने भर को दादा के परिजन हैं। वास्तविक परिजन तो वे ही हैं जो निस्वार्थ भाव से, आदर-श्रद्धा से दादा को अपने अन्तर्मन से याद करते हैं। हमसे पहले वे ही दादा के परिजन हैं और  दादा पर पहला हक उन्हीं का है। हमसे बहुत पहले।

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