दीप कथन

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्र्रह
‘मन ही मन’ की तीसरी कविता

यह संग्रह नवगीत के पाणिनी श्री वीरेन्द्र मिश्र को समर्पित किया गया है।




दीप कथन

आप जलाएँ, मैं जल जाऊँ
आप बुझाएँ, मैं बुझ जाऊँ
इतना भी निरीह नहीं हूँ मैं।।

आप रख दें किसी
मन्दिर या मरघट में
देहरी या दीवट में
और मैं रखा रहूँ
इतना भी निरीह नहीं हूँ मैं ।।

आप रख दें
अपने चौराहों, चौपालों
चबूतरों, तुलसी चौरों
देहरी, दरवाजों, आलों
और किवाड़ों के कोरों पर
और में टिमटिमाता रहूँ
इतना भी निरीह नहीं हूँ मैं।।

आप रख दें अपनी आरती या
पूजा की थाली में
लड़ा दें मुझे आँधी और अँधेरे से
काली रात या दीवाली में
और में बैठा, खड़ा, पड़ा या अड़ा
लड़ता ही रहूँ
इतना भी निरीह नहीं हूँ मैं।।

बेशक मिट्टी, तेल, बाती
इनमें से कुछ भी नहीं है मेरा
तब भी निष्कम्प झिलमिलाती
यह ‘लौ’ मेरी है।।
और जब से यह ‘लौ’ लगी
तब से मैं खुद भी
मेरा नहीं रहा
मेरा कोई साँझ या सवेरा
नहीं रहा
मैं स्वयं में हो गया
एक व्रत
एक शील हो गया
सरोवर हो गया उजास का
रोशनी की झील हो गया।।

अब एक बार हो गया
जो मेरा व्रत
बन गया जो मेरा शील
वह किसी के तोड़े
न तो टूटेगा, न भंग होगा
सूरज तक छोड़ जाता है साथ तुम्हारा
मैं भी आँखें तरेर दूँ
तो इस महासमर में कौन
तुम्हारे संग होगा?

न मैं निरीह हूँ
न तुम समर्थ हो 
मैं हूँ ‘शील’ और ‘व्रत’ का पर्याय
इन दोनों के बिना
तुम कितने व्यर्थ हो।।
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संग्रह के ब्यौरे
मन ही मन (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पड़ाव प्रकाशन 
46-एल.आय.जी. नेहरू नगर, भोपाल-462003
संस्करण - नवम्बर 1997
मूल्य - 40 रुपये
आवरण - कमरूद्दीन बरतर
अक्षर रचना - लखनसिंह, भोपाल
मुद्रक - मल्टी ग्राफिक्स, भोपाल



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यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा श्री बालकवि बैरागी की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।







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