कविता पाठ की नसीहत मेरे काम नहीं आई

           महेन्द्र गगन

बालकवि बैरागी ने मुझे किशोर उम्र में एक ‘हीरो’ के रूप में प्रभावित किया। मैं उज्जैन में हाईस्कूल में पढ़ता था। तब वहाँ हर वर्ष लगने वाला कार्तिक मेला बड़ा लोकप्रिय था और उसमें होनेवाला कवि सम्मेलन तो उज्जैन के साहित्यिक रुचि के हर उम्र के लोगों के लिए बहुत बड़ा अवसर था। उज्जैन वैसे भी कालिदास की नगरी है और वहाँ उस वक्त डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जैसे जनप्रिय साहित्यकार पूरी तरह सक्रिय थे और उन्होंने अपने विश्वविद्यालय से निकलने वाली कई पीढ़ियों को साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्कार दिए। शायद इसी के चलते उन दिनों उज्जैन के कार्तिक मेले में दस-पन्द्रह हजार आदमी कविता सुनने आते थे और पूरी-पूरी रात कविताओं का आनन्द लेते थे। उसमें सर्वप्रथम मैंने बैरागीजी को सुना। उनकी ओजपूर्ण आवाज और देशप्रेम की कविताएँ वीर रस के भाव से भर देती थीं। श्रृंगार की रचनाएँ उतनी ही कोमल और मन को छू लेनेवाली होती थीं। उनकी, श्रृंगार की एक कविता थी, जिसमें नव विवाहिता का श्रृंगारिक वर्णन था -

‘नवी उमरिया, नवी डगरिया,
नवा कन्त की नवी प्यारी।
नवी नगरी में, नवी गगरी ले,
पनघट जाई रही ओ’ पनिहारी।’

उन दिनों बहुत लोकप्रिय थी। अभी कुछ बरस पहले एक काव्य गोष्ठी में बैरागीजी से मैंने उस रचना का आग्रह किया, तो बोले, ‘यार! चालीस साल पहले जिस नायिका को देख यह गीत लिखा था, वह बूढ़ी हो गई है, मगर कविता अब भी जवान है।’

किसी भी महफिल या समारोह में हों, बैरागीजी के तत्काल तैयार किए मजाक पर आप लोगों को ठहाके लगाते पाएँगे। करीब पन्द्रह-बीस साल पहले की एक घटना मुझे आज भी याद भी है। सीहोर में उन दिनों एक बहुत प्रतिष्ठित कवि सम्मेलन हुआ करता था। इस कवि सम्मेलन में देशभर के ख्यातिनाम लोग आया करते थे। सीहोर जिले से स्व. उमराव सिंह मन्त्री थे और वे मेरे पिता स्व. चन्दनसिंह भाटी के अच्छे मित्र थे। उनकी वजह से मुझे इस बड़े कवि सम्मेलन में प्रारम्भ में कविता पढ़ने का अवसर मिला। उस मंच पर बालकवि बैरागीजी, स्व. दुष्यन्त कुमार जैसे बड़े कवि उपस्थित थे। मैंने जैसे-तैसे स्पीड में अपनी कविता पढ़ी और बैठ गया। बैरागीजी ने मुझे अपने पास बुलाया, मेरी पीठ ठोंकी और बोले ‘अच्छी कविता सुनाई तुमने। शाबास! लेकिन तुम्हें कविता पढ़ना नहीं आता। यदि मैं इस कविता को पढ़ता तो हर दूसरी पंक्ति पर ताली पड़वाता और पूरी तरह वाहवाही लूटता।’ फिर बोले ‘तुमने गाँव में बैल को तेल पिलाते हुए देखा है?’ मेरे ‘नहीं’ कहने पर उन्होंने बताया कि “एक बाँस के टुकड़े का मुँह आधा काट लेते हैं और फिर उसे बैल के हलक में फँसा देते हैं (जिससे बैल मुँह बन्द ना कर सके)। फिर उस पोले बाँस के दूसरे सिरे से तेल डालते हैं, जो बैल के हलक से सीधा उसके पेट में चला जाता है। बैल के पास तेल पी लेने के अलावा कोई गुंजाइश शेष ही नहीं रहती है। ठीक इसी तरह मंच से कविता को, श्रोताओं को ‘पेला’ जाता है। यदि तुम्हें मंच पर.जमना है तो यह तरीका अपनाओगे, तो ही सफल हो पाओगे।”  बालकविजी की नसीहत से मैं इतना भर समझ पाया कि मंच पर कविता पढ़ना मेरे बस की बात नहीं।

बैरागीजी को चुनावी सभाओं में सुनना भी बहुत ही अच्छा लगता था। कई चुनावी सभाओं में उन्हें सुनता रहा हूँ। स्व. कन्हैयालाल मेहता की स्मृति में एक ग्रंथ हम लोगों ने प्रकाशित किया था, उसमें बैरागीजी का संस्मरण आया। संस्मरण थोड़ा तीखा था। बाकी संस्मरण मेहताजी की प्रशंसा में थे, मगर बैरागीजी ने मेहताजी की राजनीतिक यात्रा पर थोड़ा आलोचनात्मक संस्मरण भेजा। संपादक मण्डल को थोड़ा संकोच हो रहा था। तब मैंने उन्हें कहा कि बैरागीजी बेबाक आदमी हैं। इतनी प्रशंसाओं के बीच एक बेबाक संस्मरण जाना चाहिए। और वे मान गए। मैंने उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए बैरागीजी के स्वभाव का तर्क दिया कि जो आदमी अपनी जीवन यात्रा का शीर्षक ‘मँगते से मिनिस्टर’ दे सकता है, उसकी आलोचना की फिक्र हमें नहीं करना चाहिए। 

बैरागीजी का जीवन सचमुच एक खुली किताब की तरह है। वे राजनीति की काजल कोठरी में रहकर भी अपने कपड़ों की सफेदी और उसकी चमकार बचाए रख पाए हैं। मंच पर उन्होंने कभी चुटकुलों या हास्य के नाम पर फूहड़ कविता को अपना सहारा नहीं बनाया, बल्कि वे मंच की फूहड़ता को ललकारते हुए अपनी गम्भीर कविताओं को उसी श्रोता समाज से स्वीकार करवा लेते हैं, जिसे अन्य कवि उसकी पसन्द बताकर अपनी फूहड़ता-अश्लीलता का बचाव करते हैं।

फिल्म में भी गए तो ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ जैसे कई अमर गीत दिए। परिवार नियोजन के विज्ञापन में ‘चौथा पलना, मत बाँध अँगना, बिक जाएगा भाभी तेरा कंगना’ या ‘हम दो हमारे दो’ जैसे शाश्वत स्लोगन बैरागी जैसे प्रतिभा के लोग ही दे सकते हैं। बालकविजी जहाँ भी होते हैं, अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। उनका प्यार, स्नेह मुझे मिला, यह मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ।

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पहले पहल पाक्षिक
25-ए, प्रेस कॉम्पलेक्स
एम. पी. नगर, 
भोपाल

(दिनांक 4 अक्टूबर 2021 को गगनजी को हमने खो दिया।)




नंदा बाबा: फकीर से वजीर
ISBN 978.93.80458.14.4
सम्पादक - राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक - सामयिक बुक्स,
          3320-21, जटवाड़ा, 
    दरियागंज, एन. एस. मार्ग,
    नई दिल्ली - 110002
मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086
प्रथम संस्करण - 2010
मूल्य - 300.00
सर्वाधिकार - सम्पादक
आवरण - निर्दोष त्यागी

 


यह किताब मेरे पास नहीं थी। भोपाल से मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू अ. सौ. नीरजा ने उपलब्ध कराई।  

 


2 comments:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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    1. ब्‍लॉग पर आने और टिप्‍पणी करने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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