बालकवि बैरागी: आत्मीय रिश्ते दुष्यन्त परिवार से...

राजेन्द्र जोशी

बैरागीजी सूचना प्रकाशन विभाग के राज्य मन्त्री थे। भाषा विभाग इसी मन्त्रालय के अधीन था और कवि दुष्यन्त कुमार इसी भाषा विभाग में अधिकारी थे। दोनों की मित्रता जगजाहिर थी। बैरागीजी, मन्त्री तो बहुत बाद में बने जबकि दुष्यन्तजी से उनकी मित्रता मानो जन्म-जन्मान्तर से चली आ रही थी। ‘मन्त्री-मित्र’ और ‘अधीनस्थ अधिकारी मित्र’, इन दोनों के सम्बन्धों और व्यवहार पर लोगों की नजरें गड़ी रहती थीं। दुष्यन्तजी के मरणोपरान्त, एक बार, इस स्थिति पर (पूछने पर) बैरागीजी ने कहा - “दुष्यन्त मेरे अत्यन्त ही प्रिय मित्र थे। वे सुन्दर, आकर्षक और मिलनसार थे। एक तरह से ‘मेग्नेट’ थे और अद्भुत कवि थे। मैं मन्त्री था और दुष्यन्त मेरे अधीन भाषा विभाग में कार्यरत थे। लेकिन मैं हमेशा मानता रहा कि वे मेरे पास नहीं थे बल्कि मैं उनके पास था। क्योंकि वे तो स्थायी थे जबकि मन्त्री तो आते-जाते रहते हैं।”


(आकाशवाणी, भोपाल पर काव्य-पाठ करते हुए दुष्यन्तजी का यह दुर्लभ चित्र,  उनके बड़े बेटे आलोक त्यागी से मिला है।) 




(आकाशवाणी, भोपाल पर काव्य-पाठ करते हुए दुष्यन्तजी का एक और दुर्लभ चित्र। भोपाल में फोटोग्राफी के किंवदन्ती पुरुष स्व. श्री हरेकृष्णजी जेमिनी का लिया यह चित्र उनके सुपुत्र श्री कमलेश जेमिनी से श्री विजय वाते को मिला और श्री विजय वाते से मुझे।)

दुष्यन्तजी के बेटे आलोक और कथाकार कमलेश्वर की बेटी मानू (ममता) के विवाह में बैरागीजी दोनों पक्षों की ओर से उपस्थित थे। अपनी उभयपक्षीय भूमिका के दौरान बैरागीजी ने एक पक्ष की ओर से मानू का, भोपाल की बहू के रूप में स्वागत तो किया तो उन्होंने दूसरे पक्ष की ओर से बेटी मानू की विदाई के वक्त दुल्हन से कहा-’बेटा मानू, तुम कहीं भी रहो, परन्तु भोपाल को ही अपना मायका समझना, तुम हमारी बेटी भी हो और बहू भी। यह विवाह सन् 1984 में भोपाल में सम्पन्न हुआ था। कमलेश्वरजी ने खुशी-खुशी अपनी बेटी को दुष्यन्तजी के परिवार को सौंपा, किन्तु उनके मन में अपने समधी दुष्यन्तजी से गले मिलने की हसरत पूरी नहीं हो सकी थी, क्योंकि सन् 1975 में दुष्यन्तजी इस दुनिया से विदा ले चुके थे। 

इस विवाह समारोह की याद करते हुए दुष्यन्तजी का परिवार आज भी बैरागीजी के उस आत्मीय व्यवहार को भूल नहीं पा रहा है। दुष्यन्तजी की पत्नी श्रीमती राजेश्वरी दुष्यन्त, बेटा आलोक और बहू मानू अब भी विवाह के दौरान उनकी उभयपक्षीय आत्मीय भूमिका में उनके मधुर व्यवहार को याद करते हुए भाव विहल हो जाते हैं। मानू बताती है कि जैसे ही शादी सम्पन्न हुई बैरागीजी ने पापा से कहा- ‘कमलेश्वर भाई! लड़की चौपाई हो गई और लड़का चौपाया।’ बैरागीजी की इस टिप्पणी पर कमलेश्वरजी सहित उपस्थित सभी अतिथि ठहाका मारकर हँसने लगे, यहाँ तक कि दूल्हा-दुल्हन भी अपनी हँसी नहीं रोक सके। 

दुष्यन्तजी और उनके परिवारजनों तथा बैरागीजी और उनके परिवारजनों के बीच अन्तरंगता के रिश्ते अधिक गहरे हैं। दुष्यन्तजी तो प्रायः बैरागीजी के मन्त्री निवास पर पहुँच जाया करते थे। श्रीमती राजेश्वरी दुष्यन्त भी अनेक बार दुष्यन्तजी के साथ बैरागी-निवास पर आती-जाती रही हैं। श्रीमती दुष्यन्त का तो बैरागी निवास में दुष्यन्तजी की वजह से आत्मीय स्वागत होता ही था, किन्तु बैरागी परिवार में उनके आदर और सम्मान का एक कारण और भी यह था कि वे बैरागीजी के बड़े बेटे मुन्ना (सुशील नन्दन) की शिक्षक भी थीं। दुष्यन्तजी तो हास-परिहास में कभी-कभी सुशील भाभी से कहा करते थे कि ‘भाभी! मैं आपके पतिदेव का मित्र तो हूँ ही, आपके बेटे की गुरु का स्वामी भी हूँ। अतः मेरे आदरभाव में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।’ दोनों परिवार जब-जब भी मिलते खूब ठहाके तो लगते ही, नोंक-झोंक भी चलती रहती। राजेश्वरीजी बताती हैं कि बैरागीजी के छोटे बेटे गोर्की (सुशील वन्दन) की शादी नीरजा से तो बाद में हुई किन्तु उसे मैं विवाह के पूर्व से ही बैरागीजी के घर आते-जाते देखती रही हूँ। बैरागीजी की बातों की शैली से प्रभावित राजेश्वरीजी बताती हैं कि बात-बात में बैरागीजी कविता की पंक्तियाँ और शेर-ओ-शायरी का खूब इस्तेमाल करते हैं। यही उनके सरस व्यक्तित्व की अनूठी पहचान है।


(चित्र परिचय : कुर्सी पर माताजी रामकिशोरीजी, पिताजी चौधरी भगवत् सहायजी, माताजी की गोद में, दुष्यन्तजी के छोटे भाई प्रेम नारायणजी का बड़ा पुत्र अमित, दादी-दादा के पीछे खड़े हुए, दुष्यन्तजी के छोटे और बड़े पुत्र अपूर्व और आलोक, पिछली पंक्ति में खड़े हुए बाँये से दुष्यन्तजी, उनकी पुत्री अर्चना, धर्मपत्नी राजेश्वरीजी, छोटे भाई की पत्नी दर्शनाजी और छोटे भाई प्रेम नारायणजी। चित्र है तो गूगल से किन्तु भेजा है, मन्दसौर से मेरे प्रिय अशोक त्रिपाठी ने।)

दुष्यन्तजी के बेटे आलोक, मुन्ना बैरागी और गोर्की बैरागी से अपनी बाल्यावस्था से ही मिलते रहे हैं। मुन्ना के साथ गुजारे कई प्रसंग याद करते हुए उन्हें वह प्रसंग भी याद है जब बैरागीजी ने अपने बेटे मुन्ना को फिल्म डायरेक्टर रवि नगाइच के साथ फिल्म फोटोग्राफी के लिए मुम्बई भेज दिया था। 

अपने पिता के निधन के बाद का वह दिन आलोक नहीं भूल पा रहे हैं, जब संवेदना प्रकट करने के लिए बैरागीजी अपने गाँव मनासा से विशेष तौर पर भोपाल आए थे। बैरागीजी ने घर में प्रवेश करते ही आलोक को अपने हृदय से चिपटा लिया और फफक्-फफक् कर रोने लगे। उन्होंने भाभी को देखते ही कहा-‘भाभी मैं तो मेरे मित्र के बिछुड़ने पर रो ही रहा हूँ, बाहर आटोरिक्शा वाले के आँसुओं की धार भी थम नहीं रही।’ बैरागीजी ने बताया कि मैं रेल से उतरकर आटो से सीधे आपके घर आ रहा हूँ। जैसे ही इस घर के सामने मैं उतरा तो आटोवाले ने पूछा -‘क्या आप दुष्यन्तकुमारजी के मेहमान हैं?’ मैंने अपने दुख को छुपाने की कोशिश करते हुए रुआँसे स्वर में कहा - ‘हाँ।’  जब मैंने उसे बताया कि दुष्यन्त नहीं रहे, मैं सांत्वना के लिए आया हूँ, तो वह सहसा चीख पड़ा और बोला आप ये क्या कह रहे हैं? फिर मैंने देखा उसकी आँखों में आँसू बह रहे थे और वह बोलता जा रहा था, ‘साहब! वो तो बड़े अच्छे इंसान थे। मेरी रोजी-रोटी उन्हीं की बदौलत चल रही है। यह आटो उठवाने में दुष्यन्तजी ने मुझे बहुत मदद की थी।’ इस वाकये के साथ बैरागीजी, दुष्यन्तजी के परिवारजनों के बीच काफी देर तक अपनी अश्रुधारा को रोकने में कामयाब नहीं हो पाए थे।

दुष्यन्तजी के परिवारजनों के प्रति सम्मान भाव और कमलेश्वरजी के साथ बैरागीजी की मित्रता के प्रसंग बैरागीजी के संवेदनशील व्यक्तित्व की अमिट पहचान बनकर रह गए हैं।

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(यह इस पुस्तक से प्रकाशित किया जा रहा अन्तिम लेख है।)





नंदा बाबा: फकीर से वजीर
ISBN 978.93.80458.14.4
सम्पादक - राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक - सामयिक बुक्स,
          3320-21, जटवाड़ा, 
    दरियागंज, एन. एस. मार्ग,
    नई दिल्ली - 110002
मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086
प्रथम संस्करण - 2010
मूल्य - 300.00
सर्वाधिकार - सम्पादक
आवरण - निर्दोष त्यागी


यह किताब मेरे पास नहीं थी। भोपाल से मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू अ. सौ. नीरजा ने उपलब्ध कराई।





 


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