नरक दुवारे जाऊँगा ही

श्री बालकवि बैरागी
के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की नौवीं कविता



मृत्यु लोक का मनुज अपूरण, मैं कमजोरी का पुतला

स्वर्ग अगर ठुकरायेगा तो नरक दुवारे जाऊँगा ही


मेरे जैसे जितने भी तन इस दुनिया में आते हैं

इस बनजारे मन के हाथों सभी विवश हो जाते हैं

विवश किया है मुझको भी इस पगले मन ने, जीने को

(तो) सागर के तट पर आया हूँ मैं भी अमृत पीने को


अभी तलक तो देव-पुत्र हूँ, अमृत का अधिकारी हूँ

(पर) देव अगर तरसायेगा तो राहू तो कहलाऊँगा ही

                                        नरक दुवारे जाऊँगा ही।



चरम सत्य का मैं अन्वेषक, आराधक शिव-सुन्दर का

दर्द पराया पीना अब तक धर्म रहा मेरे अन्तर का

इसी दाँव पर हार गया हूँ मैं अपना यह जीवन सारा

बलि-पथ पर ही मुझे मिल गया प्राण! अचानक द्वार तुम्हारा


मेरा धरम तड़प कर तुमसे, पीर तुम्हारी माँग रहा है

(पर) कामधेनु कतरायेगी तो बकरी तो दुहवाऊँगा ही।

                                        नरक दुवारे जाऊँगा ही।



पग-पग पर हैं चोर ठगारे, फिर भी मुझको जाना है

साँसों की यह निर्धन गठरी, मरघट तक पहुँचाना है,

तुम क्या जानो कितना भारी बोझा मेरे माथे है

कितने भारी दिन हैं मेरे, कितनी भारी रातें हैं


राह सुलभ करने को मेरी, अपनी पूनम दे भी दो

तुम यदि चाँद छिपाओगे तो, मावस गले लगाऊँगा ही।

                                        नरक दुवारे जाऊँगा ही।



मुझे शिकायत नहीं रही है अब तक अमर, अमीरी से

तुम तो भली-भाँति परिचित हो, मेरी मस्त फकीरी से,

मन की राहों पर जाता हूँ औ’ मन की राहों आता हूँ

दर-दर पर मैं अलख जगा कर, अपनी मस्ती गाता हूँ,


दुनिया से डर कर तुम चाहे अपना द्वार छुड़ा लेना

(पर) पौरुष यदि आजमाओगे तो, दुनिया नई बसाऊँगा ही।

                                        नरक दुवारे जाऊँगा ही।



तन से यदि कुछ भूल हुई हो, तब तो मैं अपराधी हूँ

मन से तो मैं ही क्या बोलूँ, पहले ही मन-वादी हूँ,

मन ने जो कुछ कर डाला है, उस पर है अभिमान मुझे

चाहे देवल अपमानित हो या चाहे शमशान पुजे,


चरण धूलि हूँ, पड़ा हुआ हूँ, दुर्बल देह लिए पथ पर

फिर भी यदि ठुकराओगे तो, सिर-आँखों पर आऊँगा ही।

                                        नरक दुवारे जाऊँगा ही।

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963












ओ! निष्ठुर पाषाण

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की आठवीं कविता



अब तो परख वेदना मेरी ओ! निष्ठुर पाषाण

अरे ओ! कठिन हृदय पाषाण!


साँस-साँस न्यौछावर कर दी मैंने तेरे पूजन में

शैशव-यौवन-मधुमय जीवन किया समर्पित वन्दन में

किस सीमा तक सहन करूँ मैं अर्चन के अपमान?

                                अरे ओ! निठुर हृदय पाषाण!


नयन नीर से मैंने तेरा पल-पल पर अभिषेक किया

सप्त स्वर्ग की सौख्य सुधा को ठुकरा क्या अविवेक किया!

कब तक रहूँ जगाता मैं सपनों के बता श्मशान?

                                अरे ओ! निठुर हृदय पाषाण!


तेरे यश के गीत सुनाये मैंने पग-पग, गली-गली

जब-जब जग ने पागल समझा, कहते मेरी हँसी चली-

गीतों के कफनों में कब तक दुलराऊँ अरमान?

                                अरे ओ! निठुर हृदय पाषाण!


तेरी खातिर मैंने अपनी कितनी कसमें तोड़ीं

तट पर जाती नाव सैंकड़ों बार प्रलय में मोड़ी

कब तक करता रहूँ बता मैं अनबोले बलिदान?

                                अरे ओ! निठुर हृदय पाषाण!


अन्तिम साँसों के दीपों से करूँ आरती तेरी

परख अगर तू परख सके तो, मौन साधना मेरी

ठकुराई को निठुराई का मत पहना परिधान।

                                अरे ओ! निठुर हृदय पाषाण!

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963










मेरा कवि भी हार गया है

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की सातवीं कविता



पीड़ाओं के सौ-सौ सागर मैंने हँस-हँस पी डाले

लेकिन तेरे पनघट पर तो, मेरा कवि भी हर गया है।


जिस माटी से मेरे मन के महलों का निर्माण हुआ है

उसे करोड़ों झोंपड़ियों के इन्सानों की मिली दुआ है

हल्दी लगी हजारों क्वाँरी पीड़ाएँ इनमें रहती हैं

मेरे संरक्षण का वन्दन, गुम्बज पर चढ़कर करती हैं


गलबहियाँ तेरी पीड़ा के डाल-डाल मैं लिपट गया

लेकिन तेरी जोगन का तो सचमुच ही अवतार नया है।

                                        मेरा कवि भी हार गया है।



गली-गली, घर-घर जाता हूँ, मैं पीड़ा की प्यास लिये

आँखों, अधरों पर, जीवन का, मदमाता मधुमास लिये,

जहाँ-जहाँ मिलती है पीड़ा, ओक माँड कर पी लेता हूँ

दाता को मधुमास दिया औ’ खुद पतझर में जी लेता हूँ,


घुटनों के बल ओक माँडकर, बोल कहाँ तक बिठलायेगी

पानी, पनघट, पनिहारी का यह तो कुछ व्यवहार नया है।

                                        मेरा कवि भी हार गया है।



जिसकी भी पीड़ा पीता हूँ, तलछट तक पी जाता हूँ,

कसम कफन की, मरते-मरते, बहक-बहक जी जाता हूँ,

पी कर चता हूँ तो पीछे युग के युग चल पड़ते हैं

इसीलिये तो ये निर्बल पग, बढ़ते हैं और बढ़ते हैं,


लाखों ने प्रतिबन्ध तोड़कर मेरा पौरुष पूजा है

लेकिन तेरे प्रतिबन्धों का सचमुच ही परिवार नया है।

                                        मेरा कवि भी हार गया है।



प्रतिदिन तेरे पनघट पर मैं क्वाँरी प्यास लिये आता

तुझको बेबस पाता हूँ तो ओठ चाटकर रह जाता,

तेरे सिन्दूरी बन्धन पर मेरी प्यासें निछराऊँ

तू ही बतला हार मान कर किस मुँह से वापस जाऊँ,


मेरे पद चिह्नों पर लाखों कलमेें गुदना गोदेंगी

चिह्न बनाता इन राहों पर इक परबस, लाचार गया है।

                                        मेरा कवि भी हार गया है।



मुझ पीड़ा के प्यासे को यदि तू प्यासा लौटायेगी

(तो) पनघट से अब गागर भरकर दर्द लिये कैसे जायेगी,

गागर फोड़ूँगा, पीयूँगा, पानी हो या हो ज्वाला

आज रोेक ली राहें मैंने, बनकर गोकुल का ग्वाला,


राधा बनकर जो न दिया, वह जसुदा बनकर देती जा

जी भर देख, तेरे काह्ना का, रूप नया, सिंगार नया है।

                                        मेरा कवि भी हार गया है।

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963










यह कितना उपकार कर दिया

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की छठवीं कविता





दो पल से भी अधिक नहीं है उम्र हमारे परिचय की

पल भर में ही तुमने मुझ पर यह कितना उपकार कर दिया!



अनजानी जिज्ञासा तुमने मेरे अन्तर की पहचानी

चिर निन्द्रा से जगा दिया है, तुमने मेरा विज्ञानी,

तुमने मुझे विवश कर डाला, मैं यह बाह्य जगत निरखूँ,

बनूँ प्रयोगी और यहाँ के कण-कण, अणु-अणु को परखूँ


भौतिकता से भाँवर करके, पहले रथ में बैठा लूँ

नौसिखिया मन सारथि मेरा, कितना पटु, हुशियार कर दिया!

                                        यह कितना उपकार कर दिया..



आत्म-मनन, चिन्तन, परिशीलन बिलकुल ही अनिवार्य हो गया

कण्टक पथ का निर्धारण भी मुझसे तो सत्कार्य हो गया,

द्वार-द्वार से दर्द माँग कर अपने घर में लाना होगा

शशि-शेखर बनने से पहले, नीलकण्ठ कहलाना होगा,


भौतिकता में लिप्त प्रयोगी, योगी बन कर विचरेगा

सचमुच में तुमने अधोन्मुखी को अर्चनीय अवतार कर दिया

                                        यह कितना उपकार कर दिया..



बिना छुुए ही तुमने मेरा रोम-रोम झकझोर दिया है

शिव, सुन्दर के साथ सत्य के रस में पूरा बोर दिया है,

तर्कहीन मेरे मानस को, तुमने तर्क प्रदान किया है

जनम-मरण औ’ आदि-अन्त का, तर्कशील नवज्ञान दिया है,


जीवन की ही भाँति मृत्यु के ओठ चूमना सिखलाया

ओ! जीवन के शिल्पी तुमने, निराकार साकार कर दिया!

                                        यह कितना उपकार कर दिया..



प्राण! तुम्हारी दीक्षा को मैं चरणामृत सी पी लूँगा

और आचरण के आँचल से, साँस-साँस को सी लूँगा,

आदर्शों की रोली अपने, अंग-अंग पर मल लूँगा

ज्वालामुखियों पर भी अब तो हँसते-हँसते चल लूँगा,


मुझे परखनेवाले मेरी अर्थी पर पछतायेंगे

यह लो! जग की अमर चुनौती को मैंने स्वीकार कर लिया!

                                        यह कितना उपकार कर दिया..



तत्व-ज्ञान, दर्शन मन-मन्थन, बाह्य जगत का अवलोकन

आत्म-परीक्षण, स्तुत्य-आचरण, शिव-सुन्दर-सत्यान्वेषण

परिचय के इस प्रथम प्रहर में, मैंने जो कुछ पाया है

वह कुबेर ने कोटि जन्म लेकर भी नहीं जुटाया है,


ओ! मेरे अकलंक देवता! ओ! मेरे भोले भण्डारी!

जाने या अनजाने तुमने मेरा तो भण्डार भर दिया!

                                        यह कितना उपकार कर दिया.....

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963











या तो मेरे देस पधारो

श्री बालकवि बैरागी
के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की पाँचवीं कविता






                                या तो मेरे देस पधारो

                                या फिर अपने देस बुलाओ


        ना सन्देशे देते ही हो, ना सन्देशे लेते हो

        ना मुझको बुलवाते हो और ना ही आने की कहते हो

                                क्या पाओगे पाहनपन में 

                                पी, पल भर पाहुन बन जाओ

                                        या तो मेरे देस पधारो...


        मैं चाहूँ तो अगले पल ही, देस तुम्हारे आ सकती हूँ

        पंख कटे हैं, पैर बँधे हैं, फिर भी मंजिल पा सकती हूँ

                                पर तुम भी मेरे मंगल की

                                मान-मनौती तो मनवाओ

                                        या तो मेरे देस पधारो.....


        आठ पहर प्रियतम मैं तेरा पंथ बुहारा करती हूँ

        आस भरी आँखों से सूनी राह निहारा करती हूँ

                                या तो रथ की रास मरोड़ो

                                या मेरी डोली भिजवाओ

                                        या तो मेरे देस पधारो.....


        दुनिया से यदि डरते हो तो, में तरकीब बताती हूँ

         तुम उतरो अट्टा से नीचे, मैं कुछ ऊपर आती हूँ

                                और क्षितिज के पार सलौने

                                सचमुच का संसार बसाओ

                                        या तो मेरे देस पधारो.....


        ना आना और ना बुलवाना, रीत कहाँ की है प्यारे?

        जीना मुश्किल, मरना मुश्किल, ऐसी तो मत तड़पा रे!

                                पार लगाने आ न सको तो

                                नाव डुबाने ही आ जाओ

                                        या तो मेरे देस.....

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दरद दीवानी

कवि - बालकवि बैरागी

प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट

प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ

मूल्य - दो रुपये

आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन

मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर

प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963









रीता पेट भरूँगा कैसे


श्री बालकवि बैरागी
के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की चौथी कविता



प्रतिदिन सौ-सौ गीत लिखे पर कागज रीते पड़े हुए

कठिन प्रश्न है इन गीतों से रीता पेट भरूँगा कैसे?


ये चपटे, चौकर, त्रिकोण कपासी टुकड़े कागज के

अर्द्ध नग्न ही रह जाते हैं कवि को नगन-भगन करके,

आँसू औ’ छालों में मैंने कितनी स्याही घोली है

फिर भी इनकी भूख-प्यास तो इक रीती मरु झोली है


शोषक स्याही-चूस अभी देख रहा टेड़ा-तिरछा

रक्तहीन इस अस्थि चर्म को उसकी भेंट करूँगा कैसे?

                                        रीता पेट भरूँगा कैसे?


रत्नाकर से रत्न निकाले और हुआ जब बँटवारा

सबको कुछ तो प्राप्त हुआ ही अमृत या विष की धारा

अपना चाहा पाने वाले दैव-दैत्य सब साक्षी हैं

मेरू दण्ड और महाशेष के कर्ज अभी तक बाकी हैं


कवि के रतन लूटनेवाले देव! दानवों! बतलाओ

मेरू-शेष का वंशज मैं अब लम्बा हाथ करूँगा कैसे

                                        रीता पेट भरूँगा कैसे?


गीत भला मैं खाऊँ कैसे, गीत भला ओढ़ूँ कैसे?

दो दानों के दीप-महल तक, गीतों पर दौड़ू कैसे?

मातम में मर जानेवालों, तुम तो सिर्फ बराती हो

ये हैं मेरे साथी तो ही, तुम भी मेरे साथी हो


जिस साथी को खून पिलाया, पाला, पोसा, बड़ा किया

एक गढ़ा भरने को उससे दूजी बात करूँगा कैसे?

                                        रीता पेट भरूँगा कैसे?


तुम जैसे ही गोरे-काले, मुझको भी दिन-रात मिले हैं

देह मिली है तुम जैसी ही, ये देखो, दो हाथ मिले हैं,

पर, एक बार में एक काम ही इन हाथों से करवा लो

या तो दाने गिनवा लो या अपनी फिर पीर सँवरवा लो


अगर विषमता को न ओढ़ाई तुमने काली चूनरिया

बतलाओ मैं उस डायन की रीती माँग भरूँगा कैसे?

                                        रीता पेट भरूँगा कैसे?


जिसने चोंच बनाई वह ही चुगा जुटाया करता है

मित्र पेट इन आशाओं से नहीं भराया करता है,

माना अपनी माँ के स्तन में दूघ नहीं रख आया था मैं

तो क्या केवल माँ के आँचल लिपट, लूटने आया था मैं?


केवल माँ के दूध तलक ही कवि को जीवित रखनेवालों

अपना जीवन जी न सका तो अपनी मौत मरूँगा कैसे?

                                        रीता पेट भरूँगा कैसे

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963











मन बंजारा

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की तीसरी कविता





तन को तो मिल गई शरण ओ! दाता तेरे आँगन में

बता देवता कब तक भटकेगा मेरा यह मन बंजारा।


जिस-जिस हाट गया यह निर्धन, उसमें इसको मिली निराशा

इसकी पूँजी गई न परखी, क्वाँरी रही युवा अभिलाषा,

इसको देख, समेट दुकानें, चले गये सारे व्यापारी

भरी दुपहरिया साँझ हो गई, ज्यों ही इसने गाँठ पसारी,


ठहरा दिया इसे तूने भी अपनी अतिथि शाला में

बँधी गाँठ ले काटे कैसे रजनी, यह दर-दर का मारा

                                        बता देवता कब तक.....


सोचा था, तू इसे देखकर रंग महल खुलवायेगा

तू परखेगा इसके मोती, कुछ सौदा हो तायेगा,

पर, माखन से मुँह बिचका कर तू सिर्फ देखता रहा गगरिया

तेरे आँगन आकर मैंने लम्बी कर ली और उमरिया,


जीने को जी लूँगा मैं, चल भी लूँगा काँटों में

किन्तु कहाँ तक रख पाऊँगा, छालों में मैं सागर खारा

                                        बता देवता कब तक.....


सुनता था तू परखैया है, लाखों और हजारों में

तेरी साख बहुत चलती है बड़े-बड़े बाजारों में,

तेरे एक इशारे भर से नीलामी रुक जाती है,

तेरे आगे लाख कुबेरों की पूँजी चुक जाती है,


बता कौनसी खोट दिखाई देती मेरी गठरी में

निर्मम! जो तू कहता मुझसे, आ जाना फिर कभी दुबारा

                                        बता देवता कब तक.....


चाहे मेरा तन ठुकरा दे, पर मन को तो मत ठुकरा

चाहे मेरा मूल्य भुला दे, पर धन को तो मत बिसरा,

यह तेरा निर्माल्य बता मैं वापस कैसे लेकर जाऊँ

तेरे इस अकलंक विरद पर, मैं कलंक कैसे कहलाऊँ,


मैंने कब कीमत माँगी है, मेरे मूक समर्पण की

कब ललचा कर मैंने तेरे आगे रीता हाथ पसारा

                                        बता देवता कब तक.....


मन-महलों में रखा उन्हें जो मुझसे पीछे आये थे

बतला क्या वे मुझसे ज्यादह मँहगे मोती लाये थे,

मुझको ईर्ष्या-द्वेष नहीं है तेरे किसी पुजारी से

रार नहीं है मुझको तेरे द्वारा तृप्त भिखारी से


मेवल मेरा तन सहला कर पल-दो-पल को मत बहला

वर्ना तेरे आँगन में ही होगा मरघट का उजियारा

                                        बता देवता कब तक.....

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963


पूर्व कथन - ‘दरद दीवानी’ की कविताएँ पढ़ने से पहले’ यहाँ पढ़िए

दूसरी कविता: ‘राधाएँ तो लाख मिलीं’ यहाँ पढ़िए 

चौथी कविता: ‘रीता पेट भरूँगा कैसे’ यहाँ पढ़िए








राधाएँ तो लाख मिलीं

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की दूसरी कविता







कलाकार की अन्तर्वेदना


जीवन के इस वृन्दावन की महकी-महकी गलियों में

राधाएँ तो लाख मिलीं पर, जसुदा एक न मिल पाई।


ज्यों ही मेरे वृन्दावन पर, फागुन ने डेरा डाला

त्यों ही ऐसा शोर उठा कि मान लग गई हो ज्वाला,

दल के दल तितली-भँवरों के प्यास बुझाने दौड़ पड़े

सबने पाया भाग बराबर फिर भी करते हैं झगड़े


इन कुंजों के शुचि संयम का बाँध तोड़ती, बल खाती

सरिताएँ तो लाख मिलीं पर, जमना एक न मिल पाई

राधाएँ तो लाख मिलीं.....



मुझे निमन्त्रण मिले हजारों, माखन चोरी कर जाओ

जमना तट पर चीर चुरा कर बंसी वट पर चढ़ जाओ

गागर फोड़ो, बाँह मरोड़ो, कर लो कुछ तो मनमानी

वेणु बजाओ, रास रचाओ, हमें नचाओ अज्ञानी,


मचलो-रूठो, मनो-मनाओ, मुकर-मुकर बदनाम करो

ललनाएँ तो लाख मिलीं पर श्रद्धा एक न मिल पाई

राधाएँ तो लाख मिली.....



मेरा ग्वाला वेश देखकर लाखों ने कजरी पाली

साँझ-सवेरे पंथ निहारे, ललक-ललक लट घुँघराली

लाखों अधरों ने चोरी से मेरी मुरली को चूमा है

पनघट जाते इसको सुनकर, लाखों का यौवन झूमा है


यमुना तीरे, कुंज-कुटीरे, इस अल्हड़ आवारा को

मुग्धाएँ तो लाख मिलीं पर ममता एक न मिल पाई

राधाएँ तो लाख मिलीं.....



मैं ममता का प्यासा लेकिन मेरी प्यास रही अनजानी

जो भी मिलती है, कहती है, तुम्हें पड़ेगी भूख मिटानी

किस भाषा में बात करूँ मैं, कैसे अपनी प्यास जताऊँ

कैसे भक्ष्य बनूँ मैं इनका, कैसे इनकी भूख मिटाऊँ


मुझ प्यासे को इन नंगों की इस नंगी रजधानी में

वनिताएँ तो लाख मिलीं पर वरदा एक न मिल पाई

राधाएँ तो लाख मिलीं.....



यह सच है, मैं आँसू पीकर, साँसों को बहला लेता हूँ

आतप, आकुल प्राण पपीहे को समझा-सहला लेता हूँ

कहीं किसी का दर्द मिला तो अंजुरी भरकर पी लेता हूँ

बन्दीगृह का परबस जीवन जैसे-तैसे जी लेता हूँ


इस कारा में आत्म शान्ति के अधिवेशन की अध्यक्षा-

विपदाएँ तो लाख मिलीं पर, सुखदा एक न मिल पाई

राधाएँ तो लाख मिलीं.....

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963





कविता संग्रह ‘गौरव गीत’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

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तन को तो मैं समझा लूँगी

श्री बालकवि बैरागी

के प्रथम काव्य संग्रह ‘दरद दीवानी’ की पहली कविता






                तन को तो मैं समझा लूँगी

                मन समझाने तुम आ जाओ

यूँ न समझो पग न उठेंगे, छलिये क्या फिर  दुहराऊँ

पग संचालित हैं नयनों से, तुमको कैसे समझाऊँ

                नैन मिला कर भी तो देखो

                ना न कहो, लो पलक उठाओ

                                    तन को तो मैं.....


मन ने मीत बना कर तुमको पाया कुछ भी सार नहीं है

तड़फाते हो, तरसाते हो, फिर भी तुमसे रार नहीं है

                जिसने तुमको मीत कहा है

                उससे कुछ तो प्रीत निभाओ

                                    तन को तो मैं.....


मेरी गली के दो शूलों से, इतने तो मत घबराओ

जग की लछमन रेखाओं से प्रियतम तुम मत  सकुचाओ

                सौ सागर मैं कूद पड़ूँगी

                तुम तो बस दो पग आ जाओ

                                    तन तो तो मैं.....


केवल मेरा मन प्यासा है, तन को तिल भर प्यास नहीं है

इस पिंजरे के पंछी को अब साँसों पर विश्वास नहीं है

                ऐसा याचक फिर न मिलेगा

                ओ दाता! यूँ मत तरसाओ

            तन को तो मैं.....


मरघट में तो आओगे ही, अच्छा है यूँ ही आ जाओ

नैन खुले हैं तब तक मुझको, लाल चुनरिया ओढ़ा जाओ

                रो रो कर जीवन बीता है

                शुभ घड़ियों में अब न रुलाओ

                                    तन को तो मै.....

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दरद दीवानी
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
मूल्य - दो रुपये
आवरण पृष्ठ - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिंटरी, इन्दौर
प्रकाशन वर्ष - (मार्च/अप्रेल) 1963



पूर्व कथन - ‘दरद दीवानी’ की कविताएँ पढ़ने से पहले’ यहाँ पढ़िए

दूसरी कविता: ‘राधाएँ तो लाख मिलीं’ यहाँ पढ़िए



‘दरद दीवानी’ की कविताएँ पढ़ने से पहले



दादा श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह अपने ब्लॉग पर देने की शुरुआत कर रहा हूँ। जो संग्रह मुझे मिल गए हैं, उन्हें एक के बाद एक, यहाँ देना जारी रखूँगा। उनके बाद जैसे-जैसे संग्रह मिलते जाएँगे, उनकी कविताएँ देता रहूँगा।

शुरुआत ‘दरद दीवानी’ से कर रहा हूँ।

‘दरद दीवानी’ दादा श्री बालकवि बैरागी का पहला काव्य संग्रह है। इसका प्रकाशन वर्ष किताब में कही नहीं दिया गया है। लेकिन डॉक्टर चिन्तामणिजी उपाध्याय की भूमिका में ‘नव वर्ष 2020’ लिख हुआ है। यह विक्रम संवत की तिथि है। जानकारों, मित्रों से तलाश किया तो इसकी तारीख 26मार्च 1963 निकली। 

यदि मार्च 1963 को ही इसका प्रकाशन वर्ष मान लें तो उस समय दादा की अवस्था 32 वर्ष और डेढ़ महीना थी। जाहिर है कि ये कविताएँ इस उम्र से पहले की लिखी हुई हैं। ये कविताएँ दादा की, आज की छवि से शायद कुछ अलग ही छवि प्रस्तुत करे। इसीलिए मुमकिन है, दादा के अधिसंख्य प्रशंसकों को ‘दरद दीवानी’ की कविताएँ चौंकाएँ भी और असहज भी करें। लेकिन यदि आज से 58 वर्ष पहले के काल-खण्ड के साहित्यिक वातावरण, सामाजिक परिस्थितियों, दादा की वय और पारिवारिक दशा को ध्यान में रखते हुए इन्हें पढ़ा जाएगा तो इन कविताओं का अधिक आनन्द मिल सकेगा।

महाविद्यालयीन शिक्षा में दादा दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी रहे थे। वे दर्शन शास्त्र के ख्यात प्राध्यापक श्री ग. वा. कविश्वर साहब के प्रिय विद्यार्थी थे। कविश्वर साहब उस समय शासकीय महाविद्यालय मन्दसौर के प्राचार्य थे। दादा पर उनका और दर्शन शास्त्र का पर्याप्त प्रभाव रहा। सम्भवत इसी कारण, इस संग्रह की कुछ कविताएँ, दार्शनिकता से सराबोर हैं।

यह कविता संग्रह दादा ने मेरी भाभीजी श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी को अर्पित किया है। किन्तु अर्पण में उनका नामोल्लेख न कर, ‘पिया’ उल्लेखित किया है। दादा, भाभी को आजीवन इसी सम्बोधन से पुकारते रहे। इस सम्बोधन के एक विरोधाभास की ओर शायद कभी, किसी का ध्यान गया हो। व्याकरण के लिहाज से ‘पिया’ पुल्लिंग है। यह तो सम्भव नहीं लगता कि यह बात दादा को मालूम नहीं रही हो। दो-एक बार मैंने यह ‘रहस्य’ जानना चाहा तो दादा ने मुझे ‘ऐसी फालतू बातों’ में न उलझने की सलाह दी।

इस संग्रह में दादा की सैंतीस कविताएँ हैं। सारी कविताएँ गीत-विधा में, गेय हैं जिन्हें संगीतबद्ध किया जा सकता है।

ब्लॉग पर पोस्टों/पन्नों की संख्या बढ़ाने से बचने के लिए मैं, संग्रह से जुड़ी सूचनाएँ, समर्पण, चिन्तामणिजी लिखित भूमिका, दादा का वक्तव्य और कविताओं से पहले दिए गए दो मुक्तक इसी पोस्ट/पन्ने पर दे रहा हूँ। 

कल से अगले सैंतीस दिनों तक, प्रतिदिन एक कविता ब्लॉग पर प्रकाशित होती रहेगी।

- विष्णु बैरागी

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समर्पण

मेरी उस खामोश ‘पिया’ को -

जिसने दर्द पिया उमर भर

              -बालकवि बैरागी

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मुक्तक

आज भले ही पत्थर बनकर तू मुझको ठुकरायेगी

मुझे छोड़ कर किसी और के सपनों में बस जायेगी,

तुझसे जितना हो तू करले, लेकिन ये भी सुन लेना

मैं तो परघट तक ही आया तू मरघट तक आयेगी।

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मेरी विवशता

पैदा तो हो गए अभागे, कब रुकते ये मेरे रोके

दे दूँ इनको देश निकाला, आये ऐसे लाखों मौके

लेकिन तुम ही फिरे घूमते, इनको होठों से लिपटाये

बुरा न मानो, सच कह दूँ, मुझसे ज्यादा तुमने गाये


आज तोड़ दो, अभी तोड़ दो, बेशक इनसे नेह पुराना

लेकिन यूँ तो मत कतराओ, मत सीखो यूँ आँख चुराना

यदि तुम मेरे गीत न गाओ, कोई हर्ज नहीं मत गाना

                                                 -बालकवि बैरागी

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आभार -

केवल चार महानुभावों का जिन्होंने ‘दरद दीवानी’ को यह रूप दिया और मुझे पहली बार प्रकाशन का पनघट दिखलाया।

श्री भानु भाई त्रिवेदी, बालाघाट (म. प्र.) 

श्री शम्भू नेमा, बालाघाट (म. प्र.) 

सुश्री छाया उपाध्याय

और

श्री डॉ. चिन्तामणि उपाध्याय, उज्जैन (म. प्र.)

श्री शम्भू दादा एवं छाया बहिन ने मुझे भानु भाई तक पहुँचाया और भानु भाई ने ‘दरद दीवानी’ के गरीब गीतकार का दर्द समझा तथा ये गीत आप तक पहँचाने के लिये सरस्वती और लक्ष्मी का संयोग जुटाया। दादा श्री चिन्तामणिजी ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी। मैं जानता हूँ कि उनके पास समय की कमी है किन्तु दर्द की नहीं।

आपके सिवाय और कोई दिखाई नहीं पड़ता जिसका कि मैं आभार प्रदर्शित करूँ। बस।

                                                                                              - बालकवि बैरागी


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भूमिका -

यह दर्दायन

‘बालकवि बैरागी’ अपनी सहज प्रवृत्ति से ‘‘मालवी’’ के कवि हैं। और मालवी के माध्यम से ही जन-हृदय को स्पर्श कर भूमि की सार-सत्ता को उन्होंने सजीव रूप प्रदान किया है। आंचलिक भाषाओं में अपनी अनुभूतियों को, जन और संस्कृति की समस्त चेतनाओं को, व्यक्त करने में काव्य का क्षेत्र संकुचित हो जाता है, यह हम नहीं मानते। गर्व के साथ यह कहा जा सकता है कि अपनी मातृभाषा से संबंधित एवं संचित चेतना को कवि ने उसी मर्म के साथ राष्ट्रभाषा-हिन्दी में उतारने का प्रयास किया है और वह सफल भी हुआ है। इसके लिए मुझे प्रमाण या प्रशस्ति-पत्र देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। देश के किसी भी कोने में जिस किसी व्यक्ति ने एक बार ही ‘बालकवि’ को सुना है वह बरबस ही उसकी प्रौढ़ काव्य-साधना की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सका होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

आजकल साहित्य के क्षेत्र में काव्य सृजन की साधना एवं उसकी प्रेषणीयता का एक ज्वलन्त प्रश्न उपस्थिति होता है। काव्य का केवल प्रकाशन या मुद्रण ही पर्याप्त नहीं होता। कवि के हृदय में उर्मिल भावनाओं ने संवेदन की आंच पर तपकर, निखर कर जो तेजस्वी रूप धारण किया है, उसकी अनुभूति एवं रस की प्रतीति में मुद्रण की अपेक्षा वाणी का माध्यम ही अधिक सशक्त होता है। इस शक्ति परीक्षा में ‘बालकवि बैरागी’ पूर्ण रूप से सौ टंच खरे उतरने के बाद यदि अपनी गेय भावनाओं को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार करने के लिए तत्पर होते हैं तो उनका यह प्रयास रस-पिपासुओं के लिये कवि की कण्ठ-माधुरी से सिक्त वाणी की तरह आनन्द प्रदायक ही होगा।

‘दरद-दीवानी’ कवि की गेय रचनाओं का प्रथम संकलन है जो आपके हाथों में है। वैसे कवि की काव्य-साधना में राष्ट्रीयता का उद्दाम आवेग, पीड़ित मानवता की छटपटाहट, करुणा एवं प्यार और मनुहार की गुदगुदी ये सभी भावनाएँ उर्मिल हुई हैं, किन्तु जहाँ तक जोश की बात है उसमें वह शक्ति नहीं जो करुणा प्लावित हृदय को उस स्थिति तक ले जाय जहां कवि और श्रोता, भक्त और भगवान, प्रेमी और प्रेय एकाकार हो जायें। पीड़ा और दर्द का प्रसंग प्रणय के क्षेत्र में केवल वियोग श्रृंगार की रूढ़ियों को ही यदि छूकर रह जायेगा तो उसका संवेदनशील मार्मिक प्रभाव सर्व व्यापी नहीं बनेगा। और यही कारण है कि आदिकवि की वाणी से लेकर आज तक मानवीय संवेदनाओं को जगाने में जितने भी कवि समर्थ हुए हैं उनकी व्यक्तिगत, लौकिक आधार से प्रेरित भाव-चेतना, समष्टि की अनुभूतियों से घुल मिलने पर ही अपना शाश्वत प्रभाव स्थापित कर सकी हैं। वस्तुतः वही कवि या काव्य-साधक पूजा गया है जो जीवन और जगत की समस्त अनुभूतियों को पीकर, अपनी व्यष्टि सत्ता में उनको समेट कर फिर समाज को उन्मुक्त होकर  दरद-दीवाना बनानने की कला में समर्थ हुआ हो। यह बात दूसरी है कि जहाँ लौकिक भावनाओं का उदात्तीकरण होता है वहाँ काव्य के क्षेत्र की भावभूमि कुछ आध्यात्मिक हो उठती है। लेकिन जिस आध्यात्मिक प्रेम की ओर हमारे मध्ययुगीन संत और कवि उन्मुख हुए उनकी अनुभूति का आधार भी तो लौकिक ही था। प्रेम की मधुर पीर के दीवाने हिन्दी के सूफी कवि, या कृष्ण की प्रेम-दीवानी चिर चिरहिणी राधा की प्रतिमूर्ति मीरा, या परलोेक के प्रियतम के विरह में छटपटाती हुई महादेवी, इन सब में जिस दर्द की, जिस व्यथा की, जिस तड़पन की व्यंजना हुई है, वह चाहे काव्य और भक्ति के क्षेत्र में जो भी स्थान रखे, भौतिक पीड़ा से त्रस्त साधारण मानव को अपनी उदात्त स्थिति में ही आकर्षित कर पाती है। इस पीड़ा को स्वयं में जगाना, और जगी हुई पीड़ा को उभार कर व्यक्त करना काव्य-कला के लिए खिलवाड़ मात्र नहीं है। ‘बालकवि’ दर्द के इस मर्म को समझता है। और इसीलिए:-

..... ‘द्वार द्वार से दर्द मांगकर अपने घर में लाना होगा’....

.....‘पीड़ाओं के सौ-सौ सागर मैंने हँस-हँस पी डाले’ .....

.........‘कहीं किसी का दर्द मिला तो अंजली भर कर पी लेता हूँ’.....

आदि भावना-प्रवण पंक्तियाँ केवल सामान्य उक्तियाँ मात्र ही नहीं हैं, किन्तु उनमें कवि की आत्मा का रस घुलमिल गया है और यही कारण है। कि कवि के गीत दूसरों के हृदय में मानवीयता संवेदनशील तत्व प्रस्थापित करने में पूर्ण समर्थ हैं। 

यह प्रसन्नता की बात है कि कवि आजकल काव्य-क्षेत्र में व्याप्त आडम्बर एवं व्यक्ति-प्रदर्शन की प्रवृत्ति से बच सका है। आज जिस तरह की गद्यात्मक रचनाएँ ‘नई कविता’ के नाम से चर्चा का विषय बनी हुई हैं, तब कवि के इन गीतों को श्रेणी विभाजन की दृष्टि से क्या स्थान मिलेगा यह कहना कठिन है, किन्तु इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जिन तथ्यों को लेकर नई कविता का आधार खड़ा होता है वह सब ‘दरद-दीवानी’ के इन गीतों में मिल जायेगा। प्रस्तुत संग्रह के गीतों की जो विशेषता है वह मध्ययुगीन काव्य की तरह साधारणीकरण की क्षमता है। जो प्रायः आज के काव्य में नहीें मिल पाती। कवि और श्रोता की तदात्मक स्थिति कवि की रससिद्धि होती है। बैरागी ने भाव, कला और संगीत से सम्पृक्त इन गीतों में जिस दर्द को जगाया है उसमें लौकिकों को अपने प्रणय के क्षेत्र की अडिग निष्ठा मिलेगी तो दूसरी ओर संत और भक्त प्रवृत्ति के लोगों को कबीर और मीरा के भाव, कला के भी दर्शन होंगे। किन्तु मेरी ऐसी धारणा है कि ‘बालकवि बैरागी’ सचमुच इसी मिट्टी का कवि है और उसमें यत्र तत्र कुछ ‘उस पार’ की, ‘क्षितिज’ की, ‘कफन’ और ‘चदरिया’ की जो बातें आ गई हैं वे किन्हीं विशिष्ट क्षणों की देन ही कही जायेंगी। कुछ गीत अवश्य ऐसे हैं जिनमें बालकवि ‘‘प्रौढ़’’ दिखाई देते हैं। यह प्रौढ़ता बुढ़ापे का लक्षण है। अभी वे साधना के ‘इस पार’ ही रहें। यह तो दर्द जगाने का श्री गणेश है। आशा है दर्द के अलख जगाने में कवि साहित्य को बहुत कुछ दे सकेगा।

                   - ‘कबीरा सोई पीर है जो जाने पर पीर’

                                                                                                                                       -चिन्तामणि उपाध्याय

नव वर्ष 2020

माधव कालेज

उज्जैन (म. प्र.)


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संग्रह से जुड़ी सूचनाएँ -

दरद दीवानी’
प्रकाशक - निकुंज निलय, बालाघाट (म. प्र.)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
मुद्रक - लोकमत प्रिण्टरी, इन्दौर
मूल्य - दो रुपये
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पहली कविता: ‘तन को तो मैं समझा लूँगी’ यहाँ पढ़िए 


‘गौरव गीत’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

मालवी कविता संग्रह  ‘चटक म्हारा चम्पा’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘भावी रक्षक देश के’ के बाल-गीत यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगले गीतों की लिंक, एक के बाद एक मिलती जाएँगी।  

‘वंशज का वक्तव्य’ की कविताएँ यहाँ पढ़िए। इस पन्ने से अगली कविताओं की लिंक, एक के बाद एक मिल जाऍंगी 





बब्बू के मुँह से बोली भारत की असली ताकत

यह इसी तेरह मार्च की बात है। अपराह्न लगभग तीन बजे बब्बू को फोन किया - ‘दुकान कतरी वजाँ तक खुली रेगा?’ (दुकान कितनी बजे तक खुली रहेगी?) जवाब में उसकी आवाज से लगा, उछलकर बोल रहा हो - ‘अरे! आप! मूँ तो समझो थो के आप मने ने म्हारी दुकान ने भूली ग्या। दुकान कित्ती बजे तक खुली रेगा या छोड़ो। आप तो वताओ, आप कितरी वजाँ पधारोगा? आप आओगा तब तक दुकान खुली रेगा।’ (अरे! आप! मैं तो समझ बैठा था कि आप मुझे और मेरी दुकान को भूल गए हैं। दुकान कितनी बजे तक खुली रहेगी यह बात छोड़ो। आप तो बताओ, आप कितनी बजे पधारेंगे? आप आएँगे तब तक दुकान खुली रहेगी।) सुनकर मैं झेंप गया। कहा - ‘साढ़े सात वजाँ के आसपास अऊँगा।’ (साढ़े सात बजे के आसपास आऊँगा।) खनकती खुश-आवाज में जवाब आया - ‘पधारो! पधारो! मूँ आपकी वाट नारूँगा।’ (पधारिए! पधारिए! मैं आपकी बाट जोहूँगा।)

बब्बू याने लक्ष्मीनारायण सोलंकी। कोई तीस बरसों से मेरे बालों की देखरेख का (और मुझे ‘ढंग-ढांग का आदमी’ दिखाए रखने का) जिम्मा उसी ने ले रखा है। सैलाना मार्ग पर,  राम मन्दिर की दुकानों में से एक में उसका ‘जयश्री हेयर कटिंग सेलून’ है। बरसों पहले मैंने, ‘उपग्रह’ में, अपने स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में उस पर लम्बा आलेख लिखा था। तब मैंने लिखा था कि ईश्वर की कृपा और उसका व्यवहार उसकी ऐसी परिसम्पत्तियाँ हैं कि उसे ग्राहक की बाट नहीं जोहनी पड़ती। प्रतिदिन शटर उठाते समय एक न एक ग्राहक उसकी प्रतीक्षा में पहले ही खड़ा मिलता है।

लेकिन कोरोना-काल ने काफी-कुछ गड़बड़ा दिया। उसकी चपेट से जब अच्छे-अच्छे नहीं बच पाए तो भला बब्बू कैसे बच पाता? सबसे पहले तो सख्त तालाबन्दी ने घर में बाँध कर रख दिया और दूसरे, लोगों में दहशत भर दी। दूसरों की नहीं खुद अपनी कहूँ तो मैं चाह कर भी बब्बू की दुकान पर नहीं जा सका। अव्वल तो  मैं ही डरा हुआ और दूसरे, भयभीत बच्चों की टोका-टाकी। कभी बेटे वल्कल से, कभी सहायक नवीन भाई शर्मा से, कभी किरायेदार प्रतीक शिन्दे से, कभी पड़ौसी गुड्डु (अक्षय छाजेड़) से, घर पर ही कटिंग करवाता रहा। तालाबन्दी में जब आंशिक छूट मिलनी शुरु हुई तो बब्बू ने दो बार फोन किया। दोनों ही बार मैंने इस तरह जवाब दिया कि बब्बू ने फौरन भाँप लिया। पहली बार तो वह कुछ नहीं बोला लेकिन दूसरी बार हँस कर बोला - ‘अरे! सा‘ब! कटिंग मत कराजो पण दर्शन देवा ने पधारो। आपकी शकल देख्याँ ने घणा दन वेईग्या।’ (अरे! साहब! कटिंग मत कराइएगा लेकिन दर्शन देने पधारिए। आपकी शकल देखे बहुत दिन हो गए हैं।) जवाब में मैं ‘हाँ, हूँ’ करके और ‘हें! हें! कसी वात करी र्यो यार तू? थारे पास नी अऊँगा तो कटे जऊँगा? थारे वना म्हारो काम चालेगा? अऊँगा-अऊँगा। जल्दी अऊँगा।’ (कैसी बात कर रहा यार तू? तेरे पास नहीं आऊँगा तो कहाँ जाऊँगा? तेरे बिना मेरा काम चलेगा? आऊँगा-आऊँगा। जल्दी आऊँगा।)

लेकिन यह ‘जल्दी’, जल्दी नहीं, पूरे पौने चौदह महीनों के बाद आया। 19 जनवरी 2020 को मैं बब्बू की दुकान पर गया था। उसके बाद अब, 13 मार्च 2021 को गया।

मैं पहुँचा तो जी धक् से रह गया। दुकान में वह अकेला था। तीस बरसों में मैंने पहली बार बब्बू को ग्राहक की प्रतीक्षा करते देखा। मुझे उदासी ने घेर लिया लेकिन बब्बू खुश था। छलकती आत्मीयता और पुरजोर ऊष्मा से उसने मेरी अगवानी की। मैं कुर्सी पर बैठा और वह शुरु हो गया। मैं उससे बहुत कुछ जानना चाहता था लेकिन मेरे बोल नहीं फूट रहे थे। बातों का सिलसिला उसी ने शुरु किया।

मालूम हुआ कि तालाबन्दी के शुरुआती तीन महीने तो घर में ही कटे। दुकान की झाड़ू भी नहीं लग पाई। उसके बाद दुकान खुली तो ग्राहक का नाम-ओ-निशान नहीं। छुट-पुट ग्राहकी शुरु हुई तो हर ग्राहक डरा हुआ। सुरक्षा उपायों के प्रति अतिरिक्त और अत्यधिक चौकस। पढ़े-लिखे, ज्ञानी-बुद्धिजीवी ग्राहक सबसे ज्यादा डरे हुए मिले। औसत-मध्यमवर्गीय, कम पढ़े-लिखे, श्रमजीवी ग्राहक बेधड़क आए। धीरे-धीरे ग्राहक संख्या बढ़ने लगी। लेकिन अब, साल भर बाद भी ग्राहकी आधी ही है।

मेरी कटिंग वह सामान्यतः बारह-पन्द्रह मिनिट में निपटा देता था। लेकिन इस बार उसने लगभग आधा घण्टा लिया। उसकी बातों से लग रहा था मानो वह अपनी बात सुनाने के लिए मौका और श्रोता तलाश कर रहा हो। उसकी बातों के जवाब में मेरे पास कुछ नहीं था। सहानुभूति-सांत्वना के दो बोल भी मेरे मुँह से नहीं फूट रहे थे। वस्तुतः उसका प्रत्येक वाक्य, उसकी हर बात मुझे अवाक्, निःशब्द कर रही थी। उसके स्वरों में निराशा, उदासी, थकान, किसी के प्रति शिकायत, उलाहना कुछ नहीं था। मुझे लगता रहा कि उससे सहानुभूति जता कर, उसे सांत्वना दे कर मैं उसकी अवमानना कर दूँगा। मैं चुप ही बना रहा।

चलते-चलते, उसकी प्रशंसा करते हुए, उसका हौसला बढ़ाने की मंशा से मैंने कहा - ‘थने अणी तरे देखी ने, थारी वाताँ हुणी ने हिवड़ो ठण्डो वेईग्यो बब्बू! हिम्मत राखजे। घबराजे मती। रामजी सब हऊ करेगा।’ (तुझे इस तरह काम करते देख कर, तेरी बातें सुन कर जी को बड़ी ठण्डक मिली बब्बू! हिम्मत रखना। घबराना मत। ईश्वर सब अच्छा करेगा।)

जवाब में बब्बू ने जो कहा, उसने मुझे ठेठ जड़ों तक हिला दिया - ‘सई क्यो आपने! रामजी सब हऊ ई ऽ ज करेगा। पण सा‘ब! आपका-म्हारा जसा लोग तो यो झटको झेली ग्या। मालम नी, गरीबाँ पर कई गुजरी वेगा। रामजी वणा की राखे।’ (आपने सही कहा! ईश्वर सब ठीक ही करेगा। लेकिन साहब! आपके-मेरे जैसे लोग तो यह झटका सहन कर गए। मालूम नहीं, गरीबों पर क्या गुजरी होगी। ईश्वर उनकी रक्षा करे।)

बब्बू की बात सुनकर मेरे पैर मानो जमीन में गहरे धँस गए। मन कैसा हो गया, यह कहने के लिए मेरे पास, बीस दिनों के बाद, अब तक भी उपयुक्त और समुचित शब्द नहीं है।

मैं उसकी दुकान से चला तो, लेकिन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाया। आँखें बरसने लगीं। रास्ता दिखना बन्द हो गया। सौ-पचास कदम, चेतक सेतु के मुहाने पर स्कूटर खड़ा कर, देर रोता रहा।  

बब्बू की यह बात ही भारत की वास्तविक शक्ति है - अपने से कमजोर, कमतर की चिन्ता करना। छोटी सी दुकान में, सीमित साधनों-संसाधनों वाला साधारण सैलून चला रहा बब्बू, आर्थिक सन्दर्भों में कहाँ खड़ा होगा, यह कल्पना आप-हम आसानी से कर सकते हैं। लेकिन विपत्ति काल में उसे अपने से कमतर, कमजोर की चिन्ता रही।   यह चिन्ता भारत का कोई ‘बब्बू’ ही कर सकता है - कोई धन कुबेर नहीं।

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मेरी कटिंग करता हुआ बब्बू


घर पर अपनेवालों से कटिंग करवा कर इस स्परूप में रहा मैं


 

यह पोस्ट आज, भोपाल से प्रकाशित हो रहे दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में छपी