बालकवि बैरागी - वह सब-कुछ विस्तार से, जो हर कोई जानना चाहता है



डॉ. राजेन्द्र जोशी

(दादा के साक्षात्कारों पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। किन्तु अचानक ही ऐसा हुआ कि दादा के, एक के बाद एक, पाँच साक्षात्कार मेरे सामने आ गए। तब मैंने तय किया कि इन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इन साक्षात्कारों को प्रकाशन हेतु तैयार करते-करते मुझे दो साक्षात्कार और मिल गए। अब, जब साक्षात्कार प्रकाशन का यह क्रम शुरु कर रहा हूँ तब कुल सात साक्षात्कार मेरे सामने हैं। इन साक्षाकारों को सार्वजनिक करने का मेरा एक ही उद्देश्य है - दादा से जुड़ी अधिकाधिक सामग्री नेट’ के जरिये सार्वजनिक हो ताकि पहली बात तो यह कि दादा के बारे में जानने के जिज्ञासुओं को अधिकाधिक सामग्री एक स्थान पर मिल जाए और दूसरी बात यह कि ‘नेट’ पर उपलब्धता इन्हें स्थायित्व प्रदान करेगी। इन साक्षात्कारों की साहित्यिक उपयोगिता, उपादेयता मेरे विचार में बिलकुल नहीं रही है। वह, आप, पाठक ही तय कीजिएगा। यह साक्षात्‍कार आमने-सामने लिया गया था।- विष्णु बैरागी।)



जन्‍म के समय आपके परिवार का परिदृश्य क्या और कैसा था?

मेरे जन्म के समय मेरा परिवार अत्यन्त गरीब और विपन्न स्थिति में था। निर्धन, गरीब और विपन्न शब्द भी छोटे पड़ते थे। मेरे पिता जन्म से ही विकलांग और लाचार थे। वे गर्भ से ही अपने दोनों पाँवों और दाहिने हाथ से विकलांग हो चुके थे।

परिवार का पारम्परिक व्यवसाय क्या था?

परिवार का पारम्परिक व्यवसाय था मन्दिर में पूजा और भिक्षावृत्ति।

परिवार में आपका लालन-पालन कैसे हुआ?

मेरा लालन-पालन भिक्षान्न पर हुआ। जब मैं मात्र साढ़े चार वर्ष का था, तब मेरी माँ ने मुझे जो पहला खिलौना खेलने के लिए दिया, वह था भीख माँगने का बर्तन। इससे आप अनुमान लगा लें कि ‘लालन-पालन’ शब्द मुझे कैसे लगते रहे होंगे।

आप कितने भाई-बहन हैं। इनमें आप किस क्रम में आते हैं?

हम कुल 12 भाई-बहन पैदा हुए। मैं सबसे बड़ा (जेठा) हूँ। हम दो भाई और दो बहनें इस समय जीवित हैं। मेरे भाई-बहन कुपोषण और अकाल मृत्यु से मरे। उपचार का सवाल ही नहीं था। मैंने खुद कई जगह कहा और लिखा है कि ‘गरीब के घर में बच्चा पैदा नहीं होता-हमेशा बूढ़ा जनम लेता है।’ मैं भी वही हूँ।

शिक्षा, दीक्षा कहाँ कैसे और कितनी हुई?

शिक्षा मेरी बहुत कठिनाई से हुई। मेरा पितृनगर मनासा होल्कर राजाओं का नगर था। एक मामूली कस्बा। स्कूल वहाँ केवल 7वीं तक था। वर्नाक्यूलर फाइनल कहा जाता था। 7वीं की परीक्षा देने इन्दौर जाना पड़ता था, मनासा से 280 कि.मी. दूर। मैंने 7वीं वहीं से पास की। भीख से भाड़ा इकट्ठा करके मैं इन्दौर गया 1944 में।

हाईस्कूल तक शिक्षा मैंने ननिहाल रामपुरा में 1944 से 1947 तक पूरी की। रामपुरा मेरा जन्मस्थान-नगर है। मनासा से 32 कि.मी. दूर। यहीं से मैंने बमुश्किल मैट्रिक (10वीं) पास की। परीक्षा देने इन्दौर-होल्करों की राजधानी जाना होता था। भिक्षावृत्ति एकमात्र सहारा था। रामपुरा-मनासा की दूरी प्रायः पैदल तय करता था। मनासा में परिवार के लिए और रामपुरा में खुद के लिए भीख माँगता था। भीख में आटा, रोटी, कपड़े, कापियाँ, पुस्तकें, कलमें, सब माँगना पड़ता था।

पूरे 12 वर्ष बाद 1959 में मैंने प्राइवेट स्तर पर इण्टरमीडिएट पास किया। फिर मन्दसौर कॉलेज से सन् 1961 में बी.ए. किया। एक वर्ष का फिर अन्तराल लेना पड़ा।

सन् 964 में उज्जैन माधव महाविद्यालय से (विक्रम विश्वविद्यालय) हिन्दी में एम. ए. (प्रथम श्रेणी) किया।

मेरी शिक्षा पर आप सौ-दो सौ पृष्ठ आराम से लिख सकते हैं। पारिवारिक संघर्ष और सस्याओं से जूझना तथा अपना जीवन चलाना, सैंकड़ों पृष्ठों का मामला है। मुझे ‘शिक्षा’ तो मिली पर ‘दीक्षा’ आज तक नहीं मिली।किसी भी दीक्षान्त समारोह में शामिल नहीं हुआ।

गीत, कविता लिखने और मंचों से पढ़ने के प्रति कब से रुझान बढ़ा?

मेरे माता-पिता अच्छे गायक थे। घर में संगीत का वातावरण था। पिताजी छोटी सारंगी (चिकारा) अच्छा बजाते थे। माँ के पास लोकगीत और सन्त गीत थे। सारा घर सुर में था। मैं कभी पिताजी और माँ के साथ गाया करता था। स्कूल के मंचों पर तो मैं चौथी-पाँचवीं कक्षा से ही आ चुका था। अपनी पहली कविता ‘भाई सभी करो व्यायाम’ अपनी चौथी क्लास में, 9 वर्ष की आयु में ही लिखकर अन्तर्कक्षा प्रतियोगिता में मैं अपनी कक्षा का प्रतिभागी प्रतिनिधि बना। चूँकि यह ‘भाषण प्रतियोगिता’ थी, सो तकनीकी तौर पर मेरी कक्षा हार गई, पर मुझे कविता के कारण पहला पुरस्कार मिल गया था। यह सन् 1940 या 41 का वर्ष था।

किन-किन महान कवियों, लेखकों, चिन्तकों, विचारकों और महान् विभूतियों के सम्पर्क में आने का मौका मिला?

यह सूची बहुत लम्बी और अनन्त है। आज तक सतत् है। मेरे पद्य या कि कविता पर तीन महाकवियों का सीधा प्रभाव है। पूज्य श्री स्व. पं. भवानी प्रसादजी मिश्र (मन्ना), पूज्यश्री स्व. राष्ट्रकवि रामधारी सिंहजी ‘दिनकर’ और पूज्य स्व. श्री डा. शिवमंगल सिंहजी ‘सुमन’। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। वैसे ही मेरे गद्य के शिल्पी हैं स्व. डॉ. श्री धर्मवीरजी भारती, स्व. डॉ. श्री महावीरजी अधिकारी, स्व. श्री राहुल बारपुते, स्व. श्री राजेन्द्र माथुर जैसे महान पत्रकार हैं। मैं वैसे अपने गद्य के मामले में सम्पादकाचार्य पं. श्री कन्हैयालालजी मिश्र ‘प्रभाकर’ (स्वर्गीय) का सीधा ‘एकलव्य’ हूँ।

राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कब और कैसे हुआ?

सन् 1945 में मेरे जन्म नगर रामपुरा में इन्दौर राज्य प्रजा मण्डल का प्रान्तीय अधिवेशन था। मैं 8वीं पास कर चुका था। 9वीं का विद्यार्थी था। इन्दौर के सुप्रसिद्ध कवि गीतकार, स्वतन्त्रता सेनानी श्री नरेन्द्र सिंहजी तोमर (ईश्वर की कृपा से वे अब भी स्वस्थ-प्रसन्न हमारे बीच में हैं) इस सम्मेलन में आने वाले थे, पर किसी कारणवश वे नहीं पधार सके। बस! श्री माणकलालजी अग्रवाल, श्री स्व. रामलालजी पोखरना, स्व. हकीम अब्बास अली जी, स्व. श्री लक्ष्मणसिंह जी चौहान जैसे बड़े सेनानियों ने रामपुरा के अधिवेशन स्थल ‘छोटे तालाब’ में तोमरजी की भूमिका मुझे सौंप दी। उस दिन कांग्रेस में मेरा सीधा प्रवेश हुआ। तब से आज तक मैं अटल, अडिग, अविचल, अनवरत, तिरंगा थामे अपना समर्पित जीवन जी रहा हूँ।

सर्वप्रथम 1967 के निर्वाचन में मनासा विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवारी के लिए क्या आपने आवेदन दिया था?

नहीं। मैंने कोई आवेदन नहीं किया था।

काँग्रेस पार्टी ने मनासा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से आपको जनसंघ के कद्दावर नेता श्री सुन्दरलाल पटवा के विरुद्ध अपना उम्मीदवार बनाया। पार्टी ने आपमें ऐसी कौन-सी खूबी देखी, जिसके कारण आपको इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया?

अपनी आयु के 14वें वर्ष से ही मैं कांग्रेस में सक्रिय रहा हूँ। सन् 1945 से मैं पार्टी में निष्ठा, ईमानदारी, कर्मठता, मेहनती और कर्त्तव्यपरायण कार्यकर्ता के रूप में प्रतिबद्धता से जुड़ा हूँ। सन् 1967 के निर्वाचन में पार्टी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता की वजह से ही शायद मुझे इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए उपयुक्त समझा गया हो। मेरे राजनीतिक जीवन के निर्माताओं के आशीष का ही मैं इसे प्रतिफल मानता हूँ।

राजनीति में निरन्तर मिल रही कामयाबी और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर मिली संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में आपको कैसा महसूस हुआ?

राजनीतिक जीवन में मिली जिम्मेदारियों को मैंने देशसेवा और जनसेवा के लिए एक स्वर्ण अवसर माना। तत्कालीन मुख्यमन्त्री पण्डित द्वारिका प्रसादजी मिश्र ने तो मुझे अपना संसदीय सचिव बनाया। पण्डित श्यामाचरण शुक्ल ने मुझे अपने मन्त्रि मण्डल में राज्य मन्त्री बनाकर सूचना-प्रकाशन और भाषा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। श्री अर्जुन सिंह ने मुझे सन् 1980 में अपने मन्त्रि मण्डल में राज्य मन्त्री के रूप में शामिल किया। तब मैंने खाद्य विभाग और लोक निर्माण विभाग की जिम्मेदारी सम्हाली थी। बाद में मैं लोकसभा और उसके बाद राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुआ। इन सभी पदों पर मैंने बड़ी ही लगन और दिलचस्पी के साथ अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया। इन पदों पर मुझे सेवा के जो अवसर मिले, उनसे मुझे बहुत सन्तोष मिला।

राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में आप समान रूप से निरन्तर कामयाबी की मंजिल की ओर अग्रसर रहे । आपकी राजनीतिक यात्रा कब से शुरु हुई और आज तक के इस मुकाम पर आते-आते किन-किन पड़ावों से आपको गुजरना पड़ा?

सन् 1945 से ही कांग्रेस में सक्रिय रहा। उम्र और परिवार के संघर्ष आड़े आ गए। दुर्भाग्य से स्वतन्त्रता संग्राम का सिपाही नहीं बन सका। सन् 1967-1972 में मध्य प्रदेश विधानसभा में मनासा क्षेत्र से कांग्रेस का विधायक। फिर संसदीय सचिव, फिर सदस्य प्रतिपक्ष, फिर राज्य मन्त्री। तब मध्य प्रदेश के मुख्य मन्त्री पं. श्री द्वारिका प्रसादजी मिश्र और पं. श्री श्यामाचरणजी शुक्ल थे।

सन् 1980-1984 में मध्य प्रदेश की विधानसभा में मनासा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस का विधायक रहा। सन् 1981 के जून तक राज्य मन्त्री रहा। तब म. प्र. के मुख्य मन्त्री श्री अर्जुन सिंहजी थे। सन् 1984-1989 तक मध्य प्रदेश के मन्दसौर-जावरा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा। जीता। भारत के प्रधान मन्त्री स्व. श्री राजीव गाँधी थे। मैं कांग्रेस के टिकट पर ही लड़ा और जीता। सन् 1989 में कांग्रेस टिकट पर मन्दसौर जावरा सीट का लोकसभा चुनाव लड़ा। हार गया। सन् 1993 में मध्य प्रदेश की विधानसभा का चुनाव कांग्रेस टिकट पर नीमच क्षेत्र से लड़ा और केवल 66 वोटों से हार गया। सन् 1998 जून से सन् 2004 जून तक मध्य प्रदेश की ओर से कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा का चुनाव लड़ा और निर्विरोध जीता। पूरे 6 वर्ष ससम्मान राज्यसभा सदस्य रहा। तब दो प्रधान मन्त्री देखे (1) पं. श्री अटल बिहारी वाजपेयी और (2) सरदार श्री मनमोहन सिंहजी। मुझ पर दलबदल का कलंक कभी नहीं लगा। मैं कभी नहीं बिका। विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में मेरी उपस्थिति 99 प्रतिशत रही। विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में उत्तेजक से उत्तेजक क्षणों में भी कभी मैं अध्यक्ष की आसन्दी के सामने गर्भगृह में नहीं गया। अपनी सीट कभी नहीं छोड़ी। सदनों का अनुशासन और मर्यादा कभी नहीं तोड़ी।

माता-पिता ने आपको जीवन के किस क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखा था। उनके जीवन का आप पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ा?

एक अत्यन्त विपन्न और गरीब, भिक्षान्न पर पलने वाले संघर्षरत परिवार में मुझे प्रभु ने जन्म दिया।  मात्र साढ़े चार वर्ष की उम्र में माँ ने मुझे जो पहला खिलौना थमाया, वह था ‘भिक्षा-पात्र’। यह भिक्षा-पात्र घनघोर संघर्षों के बाद छूटा। मेरा सारा शिक्षण भीख से ही पूरा हुआ। मैं माँ का निर्माण हूँ। सन् 1952 से ही मैं खादीधारी हूँ। अपने अतीत को भूल नहीं जाऊँ, इसलिए आज भी मैं कपड़े माँग कर पहनता हूँ।

आप क्या किसी धार्मिक, साम्प्रदायिक या जाति विशेष के नेता के रूप में जाने जाते हैं?

इस तरह का सवाल मुझ जैसे व्यक्ति के लिए कोई मानी नहीं रखता है। साहित्य मेरा धर्म और राजनीति मेरा कर्म है। मैं मूलतः आस्थावान व्यक्ति हूँ। धर्म निरपेक्षता का अनुयायी हूँ। मैं सिर्फ साधारण से साधारण एक इंसान हूँ और इसी रूप में अपनी पहचान कायम रखना चाहता हूँ।

कहा जाता है राजनीति में दुश्मनों की और साहित्य में ईर्ष्यालुओं की संख्या जितनी ज्यादा होती है, व्यक्ति उतना  ही अपने क्षेत्र में कामयाब माना जाता है। आपकी टिप्पणी ?

मैंने तो कभी किसी को दुश्मनी या ईर्ष्या की नजर से नहीं देखा। हाँ, यदि देखने वालों को ऐसा लग रहा हो, तो मुझे कुछ नहीं कहना। मैं तो सभी तरह के लोगों के बीच प्रसन्नतापूर्वक जीना सीख गया हूँ।

प्रत्येक कामयाब व्यक्ति के पीछे कोई न कोई होता है या कुछ ऐसे महान् पुरुष होते हैं, जिनसे उसे सदैव प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलता रहता है। क्या आपका जीवन भी किसी महान व्यक्ति से प्रभावित है?

राजनीति में मेरे प्रेरक हैं-राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, श्री लाल बहादुर शास्त्री, मौलाना आजाद, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, श्रीमती इन्दिरा गाँधी, श्री जगजीवरामजी, श्री राजीव गाँधी, श्रीमती सोनिया गाँधी, श्री एस.एन. सुब्बाराव आदि। तिरंगा ध्वज भी मेरी प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है।

क्या आपने साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में कोई शिष्य या पट्ठा तैयार किया है? क्या आपके आसपास भी चाटुकारों का जमघट लगा रहता है?

गुरुडम थोपने जैसे विकार से मैं काफी दूर हूँ। जो मुझसे जुड़ते चले गए और जो मुझे प्रेम, आदर, स्नेह और सम्मान देते हैं, वे मेरे भाई की तरह हैं। आयु और अनुभव में कई मुझसे उन्नीस-बीस हो सकते हैं, किन्तु उनसे मेरा नाता गुरु-शिष्य का नहीं, बल्कि भाइयों जैसा ही है। झूठी प्रशंसा कर अपना उल्लू सीधा करनेवाले लोग मुझसे नहीं जुड़ पाते हैं। ऐसे लोगों का जमघट लगाने का मुझे कोई शौक भी नहीं है।

क्या आपने कभी थकावट महसूस की है या कोई ऐसा दिन आया है, जब आपने फुरसत में हाथ पर हाथ धरकर गुजारा हो?

मेरी अपनी एक दिनचर्या है। उम्र तीन चौथाई शतक पार कर चुकी है। थकता वह है, जिसमें ईर्ष्या, राग-द्वेष, निराशा, आलस्य और उदासीनता के भाव हों। मैंने अपने जीवन में सक्रियता को अपना लिया है। फुरसत से बैठना तो मैं सोच ही नहीं सकता।

हर्ष और विषाद की घड़ियों के अनुभव भी जीवन में आए होंगे?

न तो हर्ष की घड़ियों में कभी इतराता हूँ और न ही विषाद की घड़ियों में टूटता हूँ। खुशी और गम के पलों को जीवन की अनिवार्यता मानकर ‘इंज्वाय’ करता हूँ।

आपका पारिवारिक परिदृश्य क्या है? क्या आप अपने परिवारजनों और सन्तान पक्ष से मिल रहे व्यवहार से सन्तुष्ट हैं?

मैं अपने आपको बहुत खुशनसीब और सुखी मानता हूँ। माता-पिता के स्नेह के साथ ही धर्मपत्नी, भाई-बहन, पुत्रों और तीसरी पीढ़ी के सदस्यों से मिल रहे आत्मीय व्यवहार पर मैं गर्व करता हूँ। सन्तानपक्ष की तरफ से मैं निश्चिन्त हूँ और तनावरहित जीवन गुजार रहा हूँ। मेरा पारिवारिक परिदृश्य इस तरह से है-

मेरी पत्नी हैं सौ. सुशील चन्द्रिका बैरागी, जिसके साथ मेरा विवाह दिनांक 7 मई, 954 को सम्पन्न हुआ। बड़ा पुत्र है सुशील नन्दन बैरागी (मन्ना बैरागी)। पुत्र वधू है-सौ. कृष्णकान्ता बैरागी (उज्जैन)। पोती रौनक बैरागी-उसकी शिक्षा है बी.एस. सी./एम. ए. (लोक प्रशासन) प्रथम श्रेणी, गोल्ड मेडलिस्ट, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, नेट परीक्षा उत्तीर्ण। (राजस्थान प्रशासन सेवा की परीक्षा भी उसने पास की है)। विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से विनिवेश विषय में पी.एच.डी. हासिल की है। पोता है-नमन बैरागी, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से बी. ई. पास किया है। वर्तमान में एच. एस. बी. सी. मल्टीनेशनल कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और फिलहाल अमेरिका में बफेलो में पदस्थ। मेरा दूसरा बेटा है-सुशील वन्दन बैरागी (गोर्की बैरागी) और पुत्रवधू का नाम है श्रीमती नीरजा (सक्सेना) भोपाल। उसकी दो बेटियाँ (मेरी पोतियॉं) हैं -बड़ी बेटी-कुमारी अभिसार बैरागी, जो कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता में एल. एल. बी. (कानून) की प्रथम वर्ष की छात्रा है और दूसरी-कुमारी अनमोल बैरागी-भोपाल में अध्ययनरत है।

सन्तान पक्ष से मिले कोई सकारात्मक या नकारात्मक अनुभव? क्या आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ अन्य राजनेताओं की तरह कोई भौतिक या आर्थिक सम्पदा बना ली है?

मैं पूर्व में ही बता चुका हूँ कि सन्तानपक्ष से मुझे सुख और निश्चिन्तता दोनों मिले हैं। मैं इस कथन पर विश्वास रखता हूँ-‘पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय।’

अब आप वानप्रस्थ आश्रम की परिधि में हैं? कैसा अनुभव कर रहे हैं?

उत्तर - (इस सवाल पर ठहाका लगाते हुए) अच्छा सवाल किया है तुमने राजेन्द्र। मेरे जीवन के इस कटु सत्य को तुम अच्छी तरह समझते हो। मैं बालकवि के रूप में जाना जाता हूँ। बैरागी खानदान में पैदा हुआ हूँ, इसलिए मेरे गोत्र में बैराग्य की झलक मिलती है। जिस व्यक्ति ने बचपन में, बाल्यकाल न भोगकर यौवन की जिम्मेदारियाँ और बुढ़ापे की शालीनता को भोगा है, उसे यदि उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते बैरागी या बाल यानी कि बच्चा बने रहने का सम्बोधन मिलता है, तो अपने जीवन की इसे मैं एक उपलब्धि मानता हूँ। मैं किसी भी उम्र से गुजरा, मैं ‘बालकवि’ ही रहा और मैं किसी भी आश्रम से गुजरा ‘बैरागी’ ही रहा। प्रत्येक आश्रम की अपनी-अपनी मस्ती है, मौज है। मैं कल भी मजे में था, आज भी मजे में हूँ।

माता-पिता ने नन्दराम दास नाम रखा था। ये ‘बालकवि’ सम्बोधन कब से और कैसे पड़ गया?

सन् 1951 (नवम्बर) में मनासा की एक आमसभा में तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री डा. कैलाशनाथजी काटजू ने नन्दराम दास बैरागी की कविताएँ सुनकर उसे बालकवि बैरागी नाम दे दिया और तभी से मैं इस नाम से छा गया हूँ।

साहित्य क्षेत्र में, विशेषकर लोक-भाषा और लोक-साहित्य के क्षेत्र में आपका विशेष योगदान है। अपने रचना संसार पर कुछ कहना चाहेंगे? 

मेरा रचना संसार इस प्रकर है -नौ वर्ष की आयु में पहली कविता लिखी। तब मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। मूलतः मालवी बोली से कविता लेखन शुरु तथा मालवी के वरिष्ठ कवियों में प्रमुख। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के स्नातक कोर्स (फाइनल) में मालवी की मेरी छह कविताएँ शामिल। सन् 1953 से आज तक देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में सतत्, निरन्तर आमन्त्रित। लाल किले के कवि सम्मेलन में प्रमुख कवियों में शामिल। आकाशवाणी, दूरदर्शन और अन्य प्रसार चेनलों पर सतत् प्रसारित। देश की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित। छोटी-बड़ी 25-26 फिल्मों के लिए गीत-लेखन।

अब तक आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं?

मेरी कई पुस्तके हैं, जो गद्य और पद्य में छपकर आई हैं। उनमें कविता संग्रह हैं-दरद-दीवानी, जूझ रहा है हिन्दुस्तान, ललकार, भावी रक्षक देश के, दो टूक, रेत के रिश्ते, वंशज का वक्तव्य, कोई तो समझे, ओ! अमलतास, आओ बच्चो, गाओ बच्चो, गौरव गीत, दादी का कर्ज, शीलवती आग, आलोक का अट्टहास, (सूरीनाम विश्व हिन्दी सम्मेलन -2008 में वहाँ के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा लोकार्पित), मैं उपस्थित हूँ यहाँ, मन ही मन, गीत लहर, गीत बहार, सिण्ड्रैला (काव्यानुवाद), गुलिवर (काव्यानुवाद)। मालवी गीत संग्रह हैं-चटक म्हारा चम्पा, अई जावो मैदान में । गद्य में ये पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं-उपन्यास-सरपंच (सहयोगी उपन्यास लेखन) यात्रा वर्णन-कच्छ का पदयात्री, बर्लिन से बब्बू का। कहानी संग्रह-मनुहार भाभी, बिजूका बाबू। विशेष प्रकाशित-बैरागी की डायरी।

देश के प्रायः प्रत्येक राज्य के विभिन्न नगरों और गाँवों में आपने राजनीतिक और साहित्यिक यात्राएँ की हैं। क्या कभी आपने विदेशों की भी यात्राएँ की हैं?

राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों को अकसर विदेश यात्राओं के अवसर मिलते रहे हैं। सांसद होने के नाते विभिन्न समितियों के माध्यम से और साहित्यिक आयोजनों में एक रचनाकार होने के नाते मुझे भी विदेश-भ्रमण के अवसर मिलते रहे हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लेने के अलावा विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में भी मुझे विदेशों में आमन्त्रित किया जाता रहा है। मैंने अब तक निम्न देशों की यात्राएँ कर ली हैं-(1) अमेरिका (2) इंग्लैण्ड (3) मारीशस (दो बार) (4 जर्मनी (5) श्रीलंका (6) नेपाल (7) कम्बोडिया (8) सूरीनाम (9) म्यांमार (10) सेशल्स (11) बैंकाक (12) हालैंड-नीदरलैण्ड।

अवसरों, परिस्थितियों और व्यवस्थाओं के अनुरूप शब्द और वाक्यों का उपयोग करना भी आपके कला-कौशल की विशेषता है। कांग्रेस के एक क्षमतावान, ऊर्जावान और जागरूक जननेता श्री दिग्विजय सिंह के नाम का संक्षिप्तिकरण ‘दिग्गी राजा’ सम्बोधन भी आपके ही मस्तिष्क की उपज है। इसी तरह आपने समय-समय पर देश को बहुत सारे नारे भी दिए हैं, जो सहज ही लोगों के मन, मस्तिष्क और जुबान पर छाए हुए हैं। उनमें से कुछ नारों का कृपया जिक्र करें?

हम दो हमारे दो (सन् 1969-1970 में दिया, जब मैं मध्य प्रदेश की सरकार का सूचना राज्य मन्त्री था।)।

आजादी की पहरेदारी-नए खून की जिम्मेदारी (दिल्ली के रामलीला मैदान में पं. श्री जवाहरलालजी नेहरू ने देश को सौंपा)।

अंकुर को आकाश दो (बच्चों को विकास के अवसर दीजिए)।

खेत सुखी खलिहान सुखी-तो सारा हिन्दुस्तान सुखी।

हरियाली मर गई अगर तो खुशहाली मर जाएगी।

तन-मन-धन: सबसे ऊपर वन।

न मेरा न तुम्हारा-भारत सबका, हमारा।

केरल से कारगिल घाटी तक-गौहाटी से चौपाटी तक-सारा देश हमारा।

इन नारों के साथ ही आपने कुछ प्रेरक सूत्र भी दिए हैं जो देशभर में फैले हुए हैं। वे कौन-कौन से हैं?

मेरे कुछ सूत्र वाक्य इस तरह से हैं-

जो तना अपनी कोंपल का स्वागत नहीं करता, वह ठूँठ हो जाता है।

कोई भी नदी एक किनारे की नहीं होती। लोकतन्त्र भी दो किनारों के बीच बहता दरिया है। एक है पक्ष, दूसरा है प्रतिपक्ष। किनारे टूटे नहीं। दरिया प्रदूषित नहीं हो, यह हमारी जिम्मेदारी है।

जो लोकतन्त्र असहमति का सम्मान नहीं करता, वह चरित्रहीन हो जाता है।

आपके हितैषी हजार हो सकते हैं, पर मित्र दो-चार भी नहीं।

आइए! हम इस बात पर सहमत हो जाएँ कि हम सब एक दूसरे से असहमत हैं।

अभाव से अच्छा और सद्भाव से सच्चा कोई मित्र नहीं होता।

कड़वाहट, झल्लाहट और बौखलाहट से लोकतन्त्र नहीं चलता।

निराशा के बीज बोकर आप आशा की फसल नहीं काट सकते।

जो आलोचना नहीं सह पाता, वह सत्ता में नहीं रह पाता।

भारत धार्मिक लोगों का देश है, धर्मान्ध लोगों का नहीं।

सबकी सुनो और सही रास्ता चुनो।

भारत की राजनीति में वे ही आएँ, जिनका दिल, दिमाग और दरवाजा खुला हो और बड़ा हो।

परिश्रम, पसीना और पुरुषार्थ कभी पराजित नहीं होते।

सारे संसार के गटर मिलकर भी एक गंगा नहीं बना सकते। गटर करोड़ों हैं, गंगा अकेली।

उन पीढ़ियों को नकार देता है इतिहास, जिनमें नहीं होता आत्मविश्वास।

जीवन वह नहीं है जो तुम जीते हो। जीवन वह है, जो तुम जीना चाहते हो।

आरतियों और उत्सवों में जलते हुए दीये काम आते हैं। बुझे दीये नहीं।

हिन्दी यहीं थी, यहीं है और यहीं रहेगी। भारत से जब भी जाएगी,अंग्रेजी ही जाएगी।

बैरागीजी! आपने एक कवि और लेखक के रूप में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। मंच पर गीत पढ़ने और पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होने पर आपको प्रशंसकों से खूब वाहवाही मिली है। आप अपनी साहित्यिक उपलब्धियों पर सम्मानित भी होते रहे हैं। सम्मानों के बारे में कुछ बताएँगे?

यूँ तो सैकड़ों सम्मान और मान-पत्र मिले हैं, किन्तु कुछ ही का उल्लेख कर रहा हूँ। सभी सम्मानों, पुरुस्कारों और अभिनन्दनों का विवरण देना कठिन है-

- आचार्य तुलसी सम्मान (अखिल भारतीय) पुरुस्कार।
- श्री नेमीचन्द्र श्रीश्रीमाल सम्मान-पुरुस्कार, रायपुर (छत्तीसगढ़)।
- श्री झाबरमल शर्मा परुरस्कार (अखिल भारतीय)।
- अक्षर आदित्य सम्मान-मध्यप्रदेश।
- साहित्य महोपाध्याय सम्मान-साहित्य सम्मान (प्रयाग)।
- परम विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान-द्वितीय हिन्दी भाषा कुम्भ बैंगलूर (कर्नाटक)। (मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद एवं अखिल कर्नाटक हिन्दी अकादमी द्वारा)
- वैष्णव विभूति सम्मान।
- वैष्णव समाज रत्न सम्मान
- वैष्णव शिरोमणि सम्मान
- बन्दा बैरागी सम्मान-अखिल भारतीय पंजाब बैरागी महासभा द्वारा।
- खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती सम्मान-हिन्दी साहित्य और नव रचना हेतु (कल्याण-ठाणे-महाराष्ट्र द्वारा)।
-श्रीमती राधादेवी मालोटिया सम्मान-पुरुस्कार (अखिल भारतीय) कोलकाता द्वारा।
- श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ शैली सम्मान-पुरुस्कार (अखिल भारतीय) सहारनपुर (उ.प्र.)।

मन्त्री, सांसद और विधायक के रूप में तो आपने अपने दायित्वों का निर्वहन बड़ी ही कुशलता और सफलता से किया है। इन दायित्वों केअलावा भी क्या राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आपको दायित्व मिलते रहे हैं?

कई राजनीतिक और शासकीय समितियों में मुझे शामिल किया जाता रहा है। इन समितियों में रहकर मैंने देशव्यापी भ्रमण किया है। कुछदायित्वों का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहता हूँ-
- भारत सरकार की केन्द्रीय समिति का सदस्य (अध्यक्ष, प्रधानमन्त्री)।
- केन्द्रीय पोत परिवहन मन्त्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य।
- भारत सरकार के कार्मिक एवं पेंशन मन्त्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य।
- हिन्दी को राष्ट्रसंघ में स्थान दिलाने हेतु प्रयत्नशील भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय की समिति का सदस्य।
- श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति-इन्दौर (म. प्र.) का उपाध्यक्ष।

भाषा और साहित्य में राष्ट्रीय स्तर पर आपके योगदान के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपको कुछ दायित्व मिले हैं?

मुझे अन्तरारष्ट्रीय विश्व हिन्दी परिषद्, मारीशस के शासी निकाय में भारत सरकार द्वारा सदस्य नामित किया है। देशव्यापी भ्रमण भी मैंने खूब किए हैं-

संसद सदस्य के रूप में संचार मन्त्रालय, सूचना मन्त्रालय, मानव संसाधन विकास मन्त्रालय एवं पेट्रोलियम मन्त्रालय की स्थायी समितियों का सदस्य रहा।

संसदीय राजभाषा समिति की दूसरी और तीसरी उप समिति के सदस्य के रूप में राजभाषा के सन्दर्भ में सारे देश का कम से कम चार बार भ्रमण।
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नंदा बाबार: फकीर से वजीर,  ISBN 978.93.80458.14.4, सम्पादक - राजेन्द्र जोशी, प्रकाशक - सामयिक बुक्स, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, एन. एस. मार्ग, नई दिल्ली - 110002, मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086,  प्रथम संस्करण - 2010, मूल्य - 300.00, सर्वाधिकार - सम्पादक


अगला कड़ी में ढुराना (तहसील-(तहसील-गोहाना, जिला-सोनीपत, हरियाणा) निवासी डॉक्टर अशोक बैरागी द्वारा लिया गया साक्षात्कार। 


श्री बालकवि बैरागी के अन्‍य साक्षात्‍कार










श्री अमन अक्षर से बालकवि बैरागी की बातचीत यहाँ पढ़िए।




गीतकार वही जो व्यवस्था का विरोध करे, समय से समझौता नहीं करे, कलम को धोखा न दे



(दादा के साक्षात्कारों पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। किन्तु अचानक ही ऐसा हुआ कि दादा के, एक के बाद एक, पाँच साक्षात्कार मेरे सामने आ गए। तब मैंने तय किया कि इन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इन साक्षात्कारों को प्रकाशन हेतु तैयार करते-करते मुझे दो साक्षात्कार और मिल गए। अब, जब साक्षात्कार प्रकाशन का यह क्रम शुरु कर रहा हूँ तब कुल सात साक्षात्कार मेरे सामने हैं। इन साक्षात्कारों को सार्वजनिक करने का मेरा एक ही उद्देश्य है - दादा से जुड़ी अधिकाधिक सामग्री ‘नेट’ के जरिये सार्वजनिक हो ताकि, पहली बात तो यह कि दादा के बारे में जानने के जिज्ञासुओं को अधिकाधिक सामग्री एक स्थान पर मिल जाए और दूसरी बात यह कि ‘नेट’ पर उपलब्धता इन्हें स्थायित्व प्रदान करेगी। इन साक्षात्कारों की साहित्यिक उपयोगिता, उपादेयता मेरे विचार में बिलकुल नहीं रही है। वह, आप, पाठक ही तय कीजिएगा। - विष्णु बैरागी।)

(मुझे यह साक्षात्कार श्री लालबहादुर श्रीवास्तव से मिला है। यह साक्षात्कार सम्भवतः सन् 2014 में लिया गया था। इसमें मुझे, फिल्म ‘गोगोला’ और ‘भादवामाता’ के बारे में कुछ तथ्यात्मक विसंगतियाँ नजर आईं। इस साक्षात्कार के समय दादा अपने जीवन के 86वें वर्ष प्रवेश करनेवाले थे। तब ‘गोगोला’ को बने 50 वर्ष और ‘भादवामाता’ को बने 43 वर्ष बीत चुके थे। सम्भवतः इस अन्तराल के प्रभाव से ही ये विसंगतियाँ आ गई होंगी। पाठकों तक सही जानकारियाँ पहुँचें, इस सदाशयता और सद्भावना से मैंने वांछित संशोधन किए हैं। किन्तु ऐसा करते हुए यह पूरा ध्यान रखा है और पूरी कोशिश की है कि पाठक का रस-भंग बिलकुल न हो। इन सशोधनों के लिए मैंने लाल बहादुरजी से पूर्वानुमति नहीं ली है। विश्वास है, वे मेरी नीयत पर भरोसा करेंगे और मुझे क्षमा कर देंगे। कुछ और प्रश्नों के साथ यह साक्षात्कार, उज्जैन से प्रकाशित हो रहे ‘समावर्तन’ के मई 2015 अंक में छपा था। श्री लालबहादुर श्रीवास्तव ने यह साक्षात्‍कार आमने-सामने लिया गया था। -- विष्णु बैरागी)


आपने फिल्मों के लिए पहला गीत कब और किस फिल्म के लिए लिखा?

मेरी पहली फिल्म का नाम है ‘गोगोला’। सन्-सम्वत् तो मुझे याद नहीं। (यह फिल्म सन् 1966 में प्रदर्शित हुई थी। - विष्णु बैरागी) फिल्म में चार गीत थे और चारों मैंनें ही लिखे थे। तबस्सुम इसकी हीरोईन थी। कभी बेबी तबस्सुम के नाम से प्रसिद्ध थी। नागपुर के श्री जे. प्रभाकर इसके निर्माता तथा बालाघाट के श्री मुकुन्द त्रिवेदी इस फिल्म के निर्देशक थे। इस फिल्म की एक गजल ‘जरा कह दो फिजाओं से हमें इतना सताये ना’ (गायक-तलत महमूद और मुबारक बेगम) आज भी खूब प्रसारित होती है और लोकप्रिय है। मुकुन्दभाई इससे पहले अपनी प्रसिद्ध फिल्म ‘नर्तकी’ बना चुके थे।

आपका एक गीत फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ का ‘तू चन्दा मैं चाँदनी तू तरुवर मैं शाख’ उस जमाने में बडा चर्चित हुआ था आज भी है। जब आपको मालूम पड़ा कि इस गीत को स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर गाने वाली है तब आपको कैसा महसूस हुआ?

मुझे यह सूचना लताजी ने ही फोन पर दी थी। मुझे पता नही था कि यह गीत लता दीदी गाने वाली हैं। इस गीत की रिकार्डिंग भी मैंने नहीं देखी। संगीतकार जयदेवजी यह गीत लिखवाने मुम्बई (तब बम्बई) से भोपाल आये थे। मैं उस समय मध्यप्रदेश के सूचना और प्रकाशन विभाग का राज्य मन्त्री था। भोपाल के मेरे सरकारी आवास, पुतलीघर बंगले में रात को 10 से 12 बजे के बीच मैंने यह गीत लिख दिया था। जयदेवजी मेरे यहाँ ही ठहरे थे। दिन भर मैंने सचिवालय (वल्लभ भवन) में राजकाज किया और दफ्तर से लौटकर यह गीत लिखा। यह सन् 1970-71 की बात है।

एक दिन बडी सुबह जब हम दोनों पति-पत्नी सवेरे की चाय पी रहे थे तब लताजी ने फोन पर मुझे बताया कि उन्होंने मेरा लिखा गीत गाया है। मैं रोमांच और सुख से हर्षित होकर मारे खुशी से खड़ा हो गया था। उन दिनों मोबाईल नहीं था। मिनिस्ट्री-विनिस्ट्री धरी रह गई थी। फोन पहले मेरी पत्नी श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी ने उठाया। उधर से लता जी ने कहा ‘बम्बई से मैं लता बोल रही हूँ। बैरागीजी से बात करवाईये।’ सुशील ने नारी सुलभ ईर्ष्या के साथ फोन का चोंगा मुझे थमाते हुए कहा ‘लो! बम्बई से आपकी कोई लता बोल रही है। बात कर लो।’ जब लताजी ने अपना पूरा नाम ‘लता मंगेशकर’ बताया तो मैं रोमांचित होकर खड़ा हो गया। हमारी चाय हजार गुना मीठी हो गई। सब कुछ कल्पनातीत था। जयदेवजी इस गीत के लिए मीटर लाये थे ‘कठे गया म्हारा ऊँटड़ा’। इसी मीटर पर है ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’। ‘रेशमा और शेरा’ फिल्म से जुडे हम तीन लोग लोकसभा सदस्य बने। श्री सुनीलदत्त, श्री अमिताभ बच्चन और मैं स्वयं बालकवि बैरागी। फिर दो लोग राज्यसभा सदस्य बने, मैं और लता दीदी। इस गीत के कई संस्मरण है।

क्या लता जी से कभी आपकी भेंट हुई है?

लताजी से मैं सन् 1955 से ही परिचित हूँ। जयदेवजी ने ही परिचय कराया और पिछली आधी सदी में मैं उनसे खूब परिचित हूँ। समय देवता ने मुझे और उन्हें राज्य सभा में साथ-साथ रखा।

आपने बच्चों की फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। किन-किन बाल फिल्मों में आपने गीत लिखे हैं?

स्व. श्री रवि नगाईच की फिल्म ‘रानी और लाल परी’ में एक गीत को छोड़कर बाकी सारे गीत मेरे ही लिखे हुए है। श्री वसन्त देसाई इसके संगीत निर्देशक थे।

मालवी भाषा को आपने अपने गीतों से नई पहचान दी है, क्या मालवी भाषा में आपने किसी फिल्म में गीत/पटकथा लिखी है?

हाँ। मालवी की पहली फिल्म ‘भादवामाता’ मेरी ही प्रेरणा से सन् 1973 में बनी। नागपुरवाले श्री जे. प्रभाकर इसके निर्माता तथा बालाघाटवाले श्री मुकुन्द त्रिवेदी इसके निर्देशक थे। इसकी पटकथा श्री अर्जुन जोशी की थी। गीत सभी मेरे थे। संगीत ‘बाल-मुकुन्द’ के नाम से मैंने और मुकुन्द भाई त्रिवेदी ने दिया था। बालकवि से ‘बाल’ और मुकुन्द से ‘मुकुन्द’ लेकर ‘बाल-मुकुन्द’ नाम बनाया।

जब कोई गीत हिट होता है तो उसका सारा श्रेय गीतकार नही बल्कि संगीतकार ले जाता है, ऐसा क्यों?

प्रत्येक उद्योग की अपनी-अपनी शैली है। मेरे लिखे 70 गीत जयदेवजी की डायरी में गुमनाम चले गये। यदि संगीतबद्ध हो जाते तो दस पाँच गीत चल निकलते। शब्द अपनी जगह अमर हैं पर संगीत उन शब्दों का अजर-अमर बना देता है।

प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा का कोई मुद्दा नही है। ईर्ष्या का तो सवाल ही नही है। श्रेय जिसके भाग्य में होता है उसी को मिल जाता है।

आज के फिल्म गीतकार लयबद्ध न लिखते हुए तुकबन्दी पर ज्यादा आश्रित हैं। यह समय की माँग है या गीतकार जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं?

यह समय की माँग है। समय तत्व की अवहेलना कोई नही करता।

आज के फिल्मी गीतकार को एक गीत के लिए 4 लाख तक पारिश्रमिक मिल जाता है। आपके समय में गीतकार को तुलनात्मक रूप से क्या इतना ही पारिश्रमिक मिलता था?

पारिश्रमिक की बात मत पूछिये। ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ गीत को लिखने का पारिश्रमिक मुझे एक कलाई घड़ी मिला था। उस जमाने में बमुश्किल चार-पाँच सौ रुपये की थी यह घड़ी। पर सुनील दत्त-नरगिस परिवार का अगाध स्नेह, जयदेवजी और लताजी का आशीर्वाद पारिश्रमिक से बडी सम्पदा है।

आपके फिल्मी गीतों को किन-किन प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज दी है?

लताजी, आशाजी, मीनाजी, तलतजी, महेन्द्र कपूर, मन्ना डे, येसुदास जैसे दस बारह नाम स्मृति में कौंधते हैं।

आजादी के समय आपने कई क्रान्तिकारी गीत लिखे। उन गीतों का क्या राष्ट्रीय फिल्मों में उपयोग हुआ है?

हाँ, एक फिल्म ‘आजादी पच्चीस बरस की’ नाम से डाक्यूमेण्टरी बनी थी।

आपकी पसन्द के गायक कौन-कौन रहे हैं जिनके गीत आप आज भी गुनगुनाते हैं?

पसन्द-नापसन्द का कोई प्रश्न नही है। जो भी सुर में है वह सभी को पसन्द आ ही जाता है।

आज के गीत पुराने गीतों की तुलना में इतने कर्णप्रिय नही हैं जो दिल को छा जाएँ। क्या इसके पीछे प्रमुख कारण व्यावसायिकता है या कोई और?

आज के गीतों में माधुर्य नही है। सारा चक्कर और बखेड़ा व्यावसायिकता एवं व्यापार का है।

क्या गीतकार के लिए संगीत की स्वर लहरियाँ जानना जरूरी है?

यदि गीतकार संगीत का ज्ञान भी रखता हो तो ‘सोने पर सुहागा’ हो जाता है। जरूरी कुछ भी नही है।

आपके दिल के करीब रहने वाला कौन सा गीतकार है? जिसके गीतों ने आपके जीवन दर्शन को प्रभावित किया है?

प्रदीपजी और नरेन्द्रजी शर्मा मुझे हमेशा प्रेरित करते रहे।
प्रसिद्ध गीतकार प्रदीप जी का सान्निध्य क्या आपको मिला है?
हाँ। मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हूँ जिन्हें प्रदीपजी का स्नेह सान्निध्य मिला। मैं इस सौभाग्य के लिए स्व. श्री बद्री प्रसाद जी जोशी का उपकार मानता हूँ।

आपने अपने गीतों से नेहरूजी/इन्दिराजी को भी प्रभावित किया था, क्या यह सच है?

नेहरूजी और इन्दिराजी मुझसे प्रभावित थे या नहीं इस बात की मुझे जानकारी नहीं है किन्तु यह मेरा प्रबल सौभाग्य है कि दोनों मुझे मेरे नाम से जानते थे और समय-समय पर मुझसे छोटा-बडा काम लेते थे। यह उनका बड़प्पन और मेरे माता पिता के पुण्य के कारण हो सका। सरस्वती माता की कृपा तो है ही। मित्रों की शुभकामनाओं का प्रताप भी है।

एक गीतकार का समाज के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए?

समाज के मनोभावों को वाणी दे। व्यवस्था का विरोध करे। समय से समझौता नहीं करे। कलम को धोखा नहीं दे।

क्या आज भी आप फिल्मी/गैर फिल्मी गीतों के सृजन में सृजनरत हैं?

कोई मित्र लिखवाएगा तो लिख दूँगा। गीत बस गीत होता है। उसे फिल्मी और गैर फिल्मी में मत बाँटिये। क्या ‘वन्देमातरम्’ किसी फिल्म के लिए लिखा गया था? क्या ‘ज्योति कलश छलके’ गीत को आप फिल्मी कहकर अलग फेंक देंगे? ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ तो किसी भी फिल्म के लिए नही लिखा गया था।
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(श्री लालबहादुर श्रीवास्तव, मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय मन्दसौर में रहते हैं। जब यह साक्षात्कार पोस्ट हो रहा है तब वे जनपद पंचायत मन्दसौर में सहायक विस्तार अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका पता - ‘शब्द शिल्प’, एलआईजी ए-45, जनता कॉलोनी, मन्दसौर - 458004, मध्य प्रदेश तथा मोबाइल नम्बर 94250 33960 है।)

अगला कड़ी में भोपालवाले (अब स्वर्गीय) डॉक्टर राजेन्द्र जोशी द्वारा लिया गया साक्षात्कार। 


श्री बालकवि बैरागी के अन्‍य साक्षात्‍कार







 

श्री अमन अक्षर से बालकवि बैरागी की बातचीत यहाँ पढ़िए।


अब तुम मिलना स्सालों!

आपने वह किस्सा जरूर पढ़ा/सुना होगा जिसमें चार ठग मिल कर एक किसान के बछड़े को, अलग-अलग जगह, बकरा बता-बता कर उसका बछड़ा हड़प लेते हैं। इस किस्से को याद रखते हुए ही मेरी यह बात पढ़िएगा।

शारीरिक श्रम के मामले में बहुत ही आलसी हूँ। इतना कि यदि कभी जामुन के पेड़ की छाँव में लेटना पड़े तो मनोकामना होगी कि जामुन, सीधा मेरे मुँह में टपके, कोई और चबा ले, मुझे स्वाद आ जाए और गुठली भी कोई और ही थूक दे। आलसियों की कोई प्रतियोगिता हो तो छोटा-मोटा पुरुस्कार तो जीत ही सकता हूँ।

ऐसे में, जब भी पैदल चलता हूँ तो ‘मेरा भला चाहनेवाले’ टोकने लगते हैं - ‘बहुत तेज चलते हो। अब जवान नहीं रह गए हो। बुढ़ा गए हो। धीरे-धीरे चला करो। तेज-तेज चलते हुए ऐसे लगते हो जैसे गेंद लुड़क रही है। लुड़कती गेंद खुद पर काबूू नहीं रख पाती। सड़क पर इधर-उधर लुड़क सकती है। नाली में गिर सकती है।’ आलसीपने की वजह से यूँ तो पैदल चलना ही भूल गया हूँ। लेकिन जब भी पैदल चलने की कोशिश करता हूँ, ऐसी नसीहतें मिल जाती हैं।

कॉलेज में पढ़ते समय एनसीसी में भर्ती हुआ था। सेना के रिटायर्ड सुबेदार रामसिंह और हवलदार पूनाराम हमारे ‘उस्ताद’ थे। बताया करते थे कि ‘तेज चल’ में सामान्य टुकड़ी की गति 120 कदम प्रति मिनिट होती है और गोरखा टुकड़ी की गति 180 कदम प्रति मिनिट। सो, तब से ही तेज चलने की आदत तो बनी तो सही लेकिन वह अब तक बनी हुई है-यह मैं बिलकुल नहीं मानता। उम्र के पचहत्तर बरस पूरे कर लिए हैं। बेशक मन न तो बूढ़ा होता है न ही थकता है। लेकिन शरीर के साथ तो ऐसा बिलकुल नहीं होता। इसलिए, भाई लोग जब-जब मुझे तेज चलने पर ‘बड़े प्रेम से समझाते-दुलराते’ हैं तो मैं हँस कर रह जाता हूँ। लेकिन हर बात की एक हद होती है। सो, कभी-कभी लगने लगता है - ”इतने सारे लोग, अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगह पर जब एक ही बात कह रहे हैं तो ‘कुछ’ तो सचाई होगी।“ और मैं झाँसे में आ ही गया। मानने लगा कि मैं और लोगों के मुकाबले तेज चलता हूँ। 

लेकिन कल शाम गजब हो गया। 

कल शाम, ‘झाँसे में आया हुआ’, अपने-आप में मगन, मैं, अपनी ‘तेज चाल’ से, अच्छा-भला चला जा रहा था। खूब खुश-खुश कि भई लोग एकदम झूठ तो नहीं ही बोलते हैं। कि अचानक वह हो गया जो नहीं होना था। या कहिए कि वह हो गया जो एक न एक दिन तो होना ही था।

हुआ यह कि मुझसे भी अधिक बूढ़ी एक महिला, मेरे पीछे से आई और सरपट चाल से चलती हुई, पल भर ही में, मुझे पीछे छोड़ती हुई मुझसे आगे, ‘ये ऽ जा-वो ऽ जा!’ सड़क लगभग सुनसान। न तो कोई आवा-जाही न ही वाहनों की भरमार। ले-दे कर हम दो ही पद-यात्री। मुझे पार कर आगे निकली महिला को मैं ठिठक कर देखने लगा। पता ही नहीं लगा कि मैं कब रुक गया। मैं सनाका खा गया और हुआ यह कि मुझे, मुझे पीछे छोड़ कर जाती हुई उस महिला की पीठ पर मेरे उन सारे हितैषियों की शकलें नजर आने लगीं जो मेरी फिक्र में दुबले होते रहने का भरोसा मुझे दिलाते रहते हैं।

इसके बाद पूछिए मत कि मेरा मन कैसा-कैसा हुआ और अपने हितैषियों को मैंने कैसे-कैसे याद किया। बस! एक ही बात की तसल्ली रही कि जब मैं ‘कुछ भी कर गुजरने’ की मनोदशा में था तब, मुझे लड़ियाने-दुलराने वाले मेरे तमाम हितैषियों में से वहाँ कोई नहीं था। अच्छा हुआ कि वे सब और मैं तथा दोस्त और दोस्ती बची रह गई।

भगवान ऐसे दोस्त सबको मिलें जो मुगालते में रख कर दोस्तों को सुखी जीवन का उपहार देते हैं और मुगालते दूर करके हकीकत से वाकिफ भी बनाए रखते हैं।

दोस्ती जिन्दाबाद!

(अब तुम मिलना स्सालों! तुम सबने, अनायोजित रूप से मेरे मजे लिए। अब मैं एक-एक को निपटाऊँगा। तुम सबकी ऐसी गत बनाऊँगा कि सारी दुनिया तुम्हारे मजे लेगी। दोस्ती एक फर्ज है। यकीन मानो! पूरी शिद्दत और पूरी ईमानदारी से निभाऊँगा।)

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मन की बात

एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात,
करते हैं हम मन की बात।

कान लगा कर सुनो-सुनो,
मन में अपने गुनो-गुनो।
नाचे बादल, गाते मोर,
हरियाली है चारों ओर।

इसका मतलब, गाओ जी,
नाचो और नचाओ जी।
नाचें-गावें, हम सब साथ,
हरियाली हो, दिन और रात।

एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात,
करते हैं हम मन की बात।
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माँ से ज्यादा मौसी प्यारी

दिन भर मौसा पर गुर्राती,
बेलन का जौर दिखलाती

कोप-भवन में लेटी-लेटी,
घर-भर का खाना खा जाती।

फिर भी भूखी है बेचारी
,
माँ से ज्यादा मौसी प्यारी

जब-जब हमसे मिलने आती,
घर में शोक-सभा जुड़ जाती

वो भी रोए, माँ भी रोए,
हम हँसते तो डाँट पिलाती

कहती है खुद को दुखियारी,
माँ से ज्यादा मौसी प्यारी

माँ ने तो बस जनम दिया है,
(पर) मौसी ने जनम लिया है

हमको अपना मान रही है,
क्या यह कम उपकार किया है?

मेरी मौसी की बलिहारी
,
माँ से ज्यादा मौसी प्यारी

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मेरे पापाजी की कार

अड़ती तो बस! अड़ जाती है,
बढ़ती तो बस, बढ़ती जाती है।
जो भी इसके आगे आता,
उसके पीछे पड़ जाती है।

अपनी आदत से लाचार,
मेरे पापाजी की कार।

पेड़ो को भी गले लगाती,
लिप-लिपट खम्भों से जाती।
सिवा हार्न के सब बजता है,
पूरी बॉडी गाना गाती।

जीवों का करती उद्धार,
मेरे पापाजी की कार।

गेरेज से जब बाहर आती,
बस्ती मे हलचल मच जाती।
पूजा की थाली ले-ले कर,
गलियों से बहिनें आ जातीं।

इसकी महिमा अपरम्पार।
मेरे पापाजी की कार
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पापा करते कितना काम!

बड़ी सुबह वे चाय बनाते
नल पर से पानी भर लाते
कपड़े धोते, बर्तन मलते
फिर चूल्हे पर दाल चढ़ाते

तब तक माँ करती आराम
पापा करते कितना काम!

हमें जगाते, फिर नहलाते
सारा होम-वर्क करवाते
माँ का सिर दुखता रहता है
सबका खाना स्वयं पकाते

ले-ले करके हरि का नाम
पापा करते कितना काम!

दफ्तर जाते, वापस आते
फिर से चौके में घुस जाते
वही रसोई, वे ही बर्तन
फिर मम्मी के बाम लगाते

कट गई यूँ ही उमर तमाम
पापा करते कितना काम!
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बादल और मोर

बादल गरजा जोर से,
बोला प्यासे मोर से,
‘क्यों दिन भर चिल्लाता है?
आखिर किसे बुलाता है?
जब देखो तब हो-हल्ला
हो-हल्ला भी खुल्लम-खुल्ला
कल से शोर मचाना मत
घड़ी-घड़ी चिल्लाना मत।’

अब नबर था मोर का,
लगा ठहाका जोर का,
बाला- ‘सुन रे! सुन बादल!,
तू क्या जाने रे पागल!
मैं मस्ती में गाता हूँ,
गा कर तुझे बुलाता हूँ।

‘तू आता, गर्जन करता,
तब भी मैं नर्तन करता।
जब तू गा नहीं पाता है,
(तो) रोने लग जाता है।

‘बात-बात में रोना क्या?
पानी-पानी होना क्या?
मन चाहे तब आया कर।
लेकिन सुर में गाया कर।’
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कितना देता है आकाश!



कितना देता है आकाश!

देता है बेहद ऊँचाई,
देता है भरपूर प्रकाश।
रिमझिम करते बादल देता
और पवन देता उनचास।

तरह-तरह के मौसम देता
रंग-बिरंगे बारहमास,
कितना देता है आकाश!

जो भी देता, सबको देता,
भेद-भाव का नाम नहीं।
छोट-मोटा नहीं देखता,
राव-रंक का काम नहीं।

इसका नहीं पराया कोई,
सब ही इसके खासम-खास।
कितना देता है आकाश!
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कितना देती धरती मैया!


कितना देती धरती मैया!

हर मौसम में फसलें देती,
देती हमको, फल औ’ फूल।
घर-आँगन की मस्ती देती,
बस्ती, बस्ता और स्कूल।

नद्दी-नाले, परबत देती,
देती है पीपल की छैंया।
कितना देती धरती मैया!

कण लेती है, मन देती है,
नहीं बाँधती कोई गाँठ।
हँसते-हँसते सब सहती है,
देती है धीरज का पाठ।

तुमको घर औ’ मुझे घरौंदा,
देकर लेती रोज बलैंया।
कितना देती धरती मैया!
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अमर जवाहर


दादा से जुड़े कागजों का पुट्टल उलटते-पलटते अचानक ही यह गीत सामने आ गया। जाहिर है, जवाहरलालजी के निधन के बाद ही यह गीत लिखा गया होगा। 
  
होना तो यह चाहिए था कि इसे, जवाहरलालजी की पुण्य तिथि, 27 मई को दिया जाता। लेकिन क्या पता, तब तक मैं ही न जीयूँ! यह संयोग ही है कि आज जवाहरलालजी की जयन्ती है और आज ही यह गीत सामने आ गया। 
सो, 27 मई की प्रतीक्षा किए बिना, आज ही इसे दे रहा हूँ।
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अमर जवाहर
- बालकवि बैरागी

जिसने अपनी राख बिछा दी, खेतों में, खलिहानों में।
जिसने अपने फूल बिछाए, ऊसर रेगिस्तानों में।
जिसने अपनी पाँखुरियाँ दीं, ऐटम के शमशानों को।
जिसने अपनी मुसकानें दीं, तीन अरब इंसानों को।
जिसने अपनी बाँहें दे दीं, मानवता की आहों को,
जिसने अपनी आँखें दे दीं, भटकों को, गुमराहों को।
जिसने अपनी आहुति दे दी, संकल्पों की ज्वाला में।
चमक रहा है जो सुमेरु सा, जननी की मणि माला में।
उसका यश गायेगा अम्बर, धरती और पाताल रे!
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-1-

निर्मोही ने राजघाट से, ये जो नाता जोड़ा है।
यमुना-तट की ओर हठी ने, ये जो रथ को मोड़ा है।
ये जो माँ से अनपूछे ही, अमर तिरंगा ओढ़ा है।
ये जो तीन अरब लोगों को, नीर बहाते छोड़ा है।
ज्यों की त्यों रख कर के चादर, कर गया और कमाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-2-

आजीवन जो रहा हँसाता, क्यों-कर भला रुलायेगा?
मन कहता है, यहीं, कहीं है, अभी यहाँ आ जाएगा।
मेघ स्वरों में अगत-जगत के, हाल-हवाल बतायेगा।
भारत माता की जय हमसे, वो बार-बार बुलवायेगा।
शोर न करना वरना खुद को, कर लेगा बेहाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-3- 

अमन दिया, ईमान दिया और, जिसने हमें जवानी दी।
नये खून को राहें देकर, जिसने नई रवानी दी।
इतिहासों को नई दिशा दी, जिसने नई कहानी दी।
चन्दन में जल कर भी जिसने, माँ को अमर निशानी दी।
हमसे दूर करेगा कैसे, उसे बिचारा काल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-4-

नस-नस में भिद गया तुम्हारी, अपना खून टटोलो तुम।
कुछ तो सोचो, आँसू पोंछो, मोती और न रोलो तुम।
भावुकता भी भाषा साथी, और अधिक मत बोलो तुम।
तन की आँखें बन्द करो और, मन की आँखें खोलो तुम।
छूटी है माटी की ममता, बिछड़ा है कंकाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-5-

प्यार एक सा किया निठुर ने, बेला और बबूलों से।
पुजवा लिया स्वयं को जिसने, परबत जैसी भूलों से।
जिसने पावन कर दी गंगा, अपने पावन फूलों से।
वो आँसू से नहीं पुजेगा, पूजो उसे उसूलों से।
नहीं चाहिए उसको केसर, कुंकुम और गुलाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-6-

रोना-धोना बन्द करो और मस्तक जरा उठाओ रे!
भुजदण्डों पर ताल ठोेक कर, अंगद-चरण बढ़ाओ रे!
पीर पराई पी कर उसको, सच्चा सुख पहुँचाओ रे।
नीलकण्ठ के वंशज बेटों! कुछ तो जहर पचाओ रे।
उसका सरगम छूट न जाए, टूट न जाए ताल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

-7-

खेत-खेत में उगे जवाहर, नीलम फसलें लहरायें।
नहर-नहर की लहर-लहर में, श्रम का अमृत घुल जाये।
बाग-बगीचे, वन-उपवन में, नहीं कभी पतझर आये।
नये पसीने की नदियों से, रीते सागर भर जायें।
प्राण भले ही छूटें लेकिन, छूटे नहीं कुदाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।

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होनी ने अनहोनी कर ली, बिगड़ी बात सँवारेंगे।
कर्मक्षेत्र को पीठ न देंगे, उसका कर्ज उतारेंगे।
उसके पद-चिह्नों पर चलकर, बाकी उम्र गुजारेंगे।
चाहे जो हो जाए लेकिन हा! हा! नहीं पुकारेंगे।
हम ही गौतम, हम ही गाँधी, हमीं जवाहरलाल रे।
नहीं मरा है, नहीं मरेगा, अमर जवाहर लाल रे।
अभी करोड़ों साल जियेगा, अमर जवाहर लाल रे।
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यहाँ प्रस्तुत चित्र गाँधी सागर बाँध के उद्घाटन समारोह (19 नवम्बर 1961) का है। 19 नवम्बर इन्दिराजी की जन्म तारीख है। उद्घाटन की यह तारीख डॉक्टर कैलाशनाथ काटजू ने तय की थी। उद्घाटन समारोह का संचालन दादा ने ही किया था। 

कल्प ऋषि दादा बालकवि बैरागी



- डॉक्टर पूरन सहगल

साहित्य, संस्कृति और इतिहास को दिशा-बोध देने वाले लोक पुरुष को मैं ऋषि मानता हूँ। संस्कृत और इतिहास का मुझे ज्ञान नहीं है। जब भी इतिहास या पुरातत्त्व पर चर्चा करनी होती है,  ज्ञात इतिहासज्ञ और पुरातत्वेत्ताओं की शरण में जाने में तनिक भी संकोच नहीं करता।

मैं ‘धूल-धाये’ (न्यारगर) की तरह सुनार की धूल के ढेर में से सोना, चाँदी तलाशने का श्रम करता हूँ। न सोना मेरा होता है न चाँदी, न धूल। सब कुछ सुनार का होता है। मेरा तो श्रम मात्र होता है। लोक से लोक साहित्य प्राप्त करना भी ठीक वैसा ही है।

मैंने उस धूल में से जो निकाला है वह कितना मूल्यवान है और कितना व्यर्थ, इसकी परख भी मुझे नहीं हैं। कबीर ने अपनी वाणी में ‘पारख ज्ञान’ की बात कही है जो केवल सद्गुरु के पास ही होता। वही सच्चा पारखी है। उसी को हम ऋषि कह सकते है। मेरे प्राप्य की परख भी होती है। दादा बालकवि बैरागीजी उसे परखते हैं। मेरे द्वारा प्राप्त का मूल्यांकन वे बिना बोले कर देते हैं।  मुझे ‘सार-सार को गहि ले थोथा देहि उड़ाय’ का पालन करना होता है। 

एक लोकोक्ति है ‘करमहीन कलप्यो करे, कलप बिरछ की छाँव’। कर्महीन व्यक्ति कल्पवृक्ष के नीचे बैठ कर भी दुःखी होता रहता है। कल्प वृक्ष के नीचे बैठने के बाद भी अपने इच्छित की प्राप्ति के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है। 

मैं एक कल्प वृक्ष का उल्लेख यहाँ करना चाहता हूँ। इस कल्प वृक्ष को ‘कल्प ऋषि’ कहना अधिक उचित होगा। एक ऐसा ‘कल्प ऋषि’ जिसने स्वयम् को कल्प वृक्ष बना लेने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। आराम या विश्राम मैंने उनके जीवन में कभी नहीं देखा। जो मिल गया उसे मुकद्दर नहीं माना। श्रमफल माना। जो खो गया, उसे भुलाया नहीं। उसे याद रखते हुए सतत् प्रयत्न कर, पुनः प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित कर ‘चरैवेति-चरैवेति’ क्रम निरन्तर बनाए रखा। कबीर की तरह अपनी चादर को ओढ़ा भी, बिछाया भी लेकिन मैली नहीं होने दी। कबीर की ही तरह ज्यों की त्यों धर दी। मैं उन्हें डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और दादा चिन्तामणी उपाध्याय की जीवन्त परम्परा का निर्वाहक मानता हूँ। वे निराला और दिनकर के वंशधर तथा प्रेमचन्द के प्रतिनिधि हैं। इसके बावजूद बैरागी, बैरागी ही बना रहा। अपना बैरागीपन नहीं छोड़ा। फकीरी मौज और खरा-खरा कहने की कबीरी मस्ती बरकरार बनाए रखी। वे न तो किसी वट वृक्ष के नीचे सोते रहे और न उन्होंने किसी कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी मनोमना पूरी होने की आकांक्षा की।

अपनी मंजिल में आने वाले रोड़े स्वयं हटाए। काँटे, कंकर स्वयं चुने और मार्ग की वर्जनाओं को अपने आत्मबल से हटाया। व्यक्ति से व्यक्तित्व तक की कठिन-कठोर यात्रा उन्होंने स्वयम् के वामन कदमों से तय की। किसी के कन्धों पर बैठकर नहीं। ख्यातनाम साहित्यकार धर्मवीर भारती जी एक बार निराला जी से मिलने गए। निरालाजी अस्वस्थ किन्तु प्रसन्नचित्त थे। उन्होंने भारतीजी से कहा - ‘मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मुझे पता चल गया है कि मेरा परिवार बहुत बड़ा है। किन्तु व्यक्तित्व केवल दो हैं - भारतेन्दु और निराला।’ यह बात उन्होंने निराला युग में कही थी। आज मैं इसी कड़ी में एक नाम बालकवि बैरागी का भी जोड़ दूँ तब यह त्रिवेणी संगम अधिक पावन हो जाएगा। व्यक्ति से व्यक्तित्व बन जाना सुदीर्घ तपस्या का फल होता है।

एक बार बैरागीजी ने मुझे खलील जिब्रान की एक सूत्र पंक्ति सुनाई थी - ‘यदि ईश्वर तुम्हारे हाथों से मशाल ले ले तब मायूस मत होओ। शायद वह  तुम्हारे हाथों में आफताब थमाना चाहता हो।’ यह सूत्र सदा उनके जीवन का आधार बना रहा।

आर्य समाज ने बैरागीजी को ‘आर्य रत्न’ सम्मान से विभूषित किया। आर्य रत्न तो वे हैं ही, वे तो इससे भी ऊपर, ‘हिन्दी रत्न’ एवम् ‘संस्कृति रत्न’ हैं। सच तो यह है कि बैरागी जी को सम्मानित करके कोई भी संस्था स्वयं सम्मानित और गौरवान्वित हो जाती है। सम्मान से ऊपर है ऐसे लोक पुरुष को, ऐसे कल्प ऋषि को सम्मान देकर स्वयं सम्मानित हो जाना।

अब उनका स्वाध्याय उन्हें निरन्तर दिव्यता प्रदान करता दीखता है। स्वाध्याय अर्थात् स्वयम् का अध्ययन। आत्मचिन्तन। स्वयं को जानने का प्रयत्न। अपने भीतर झाँक कर भीतर के उजास को जीवन्त बनाए रखने का प्रयास। इसे ही तो बुद्ध ने ‘अप्प दीपो भव’ कहा है। दादा बैरागीजी ने सदा यही किया है इसीलिए मैं उन्हें ‘कल्प ऋषि’ कहता हूँ। नहीं जानता कि कोई कल्प वृक्ष होता भी है या नहीं। किन्तु मैं ‘कल्प ऋषि’ को जानता हूँ। वे ऐसे कल्प वृक्ष हैं जिनके तले उगने वाला कोई पौधा न सूखा है न मुरझाया है। वह तो सदा पल्लवित और पुष्पित हुआ है। ऐसे कल्प वृक्ष को, ऐसे अश्वत्थ को, ऐसे ‘कल्प ऋषि’ को पीढ़ी का वन्दन, अभिनन्दन।

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(यह आलेख उज्जैन से प्रकाशित ‘समार्वतन’ के मई 2015 अंक में, इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का सम्पादित रूप है।)




डॉक्टर पूरन सहगल। जन्म - 13 जनवरी 1937, पंचग्राही, मियाँवाली, पाकिस्तान। ‘मालवालोक संस्कृति अनुष्ठान’ के संस्थापक-संचालक। मालवी लोक साहित्य और लोक संस्कृति पर निरन्तर शोध। अपराध पेशा और देह व्यवसाय में लिप्त जातियों, यायावर जाति वामनिया बंजारा, कालबेलिया, गाडोलिया, साटिया पर समाज शास्त्रीय अध्ययन-लेखन। दशपुर जनपद के सन्तों, सेनानियों पर लेखन। मालवी की कृष्ण-भक्त कवयित्री चन्द्रसखी, नवनिधि कुँवर, श्रृंगार की प्रसिद्ध कवयित्री सुन्दर एवम् रूपमति आदि के साहित्य का संकलन-सम्पादन-प्रकाशन। मालवी में उपलब्ध लोक देवता तेजाजी, वाबूजी, देवनारायणजी, रामदेवजी, महाराज विक्रमादित्य, भोज एवं भरथरी की गाथाओं का संकलन एवं सांस्कृतिक अनुशीलन। अब तक 78 पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पुरुस्कारों, सम्मानों से अलंकृत। पता - ऊषागंज कॉलोनी, मनासा-458110, जिला नीमच, मध्य-प्रदेश। मोबाइल - 94240 41310.

अपनी गंध नहीं बेचूँगा




- लाल बहादुर श्रीवास्तव -



चाहे सभी सुमन बिक जाएँ
चाहे ये उपवन बिक जाएँ
चाहे सौ फागुन बिक जाएँ
पर मैं गंध नहीं बेचूँगा
अपनी गंध नहीं बेचूँगा।

उक्त पंक्तियाँ देश के प्रख्यात साहित्यकार कवि, सांसद बालकवि बैरागी की कविता ‘अपनी गंध नहीं बेचूँगा’ उस समय के दौर की हैं, जब राजनीति में पार्टियाँ खरीद-फरोख्त करती हुई अधिक नजर आती थीं। नेता स्वार्थवश दल-बदल कर लेते थे। लेकिन बालकवि बैरागी उन राजनीतिज्ञों में से एक थे, जिन्होंने अन्त तक अपनी शुचिता को अक्षुण्ण बनाए रखा। कभी मौकापरस्ती का साथ नहीं देते हुए जीवनभर संघर्षशील रहे।

सन् 1968 के समय की बात है, जब बालकवि बैरागी म.प्र. विधानसभा में कांग्रेस के विधायक थे। वे तब मन्त्री मण्डल मे संसदीय सचिव भी थे। अचानक दल-बदल की आँधी चली, कांग्रेस की सरकार गिर गई। ग्वालियर घराने की राजमाता सिंधिया की उठापटक से श्री गोविन्द नारायणसिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी। तब राजमाता विजियाराजे सिंधिया ने बालकवि बैरागी के पास एक सन्देश भेजा कि दल बदलकर हमारी पार्टी में आ जाओ, तुम्हारा मन्त्री पद बना रहेगा।

ऐसी स्थिति में प्रायः राजनेता स्वार्थवश लुढ़क ही जाते हैं। अनेक नेता कांग्रेस से लुढ़ककर राजमाता के पक्ष में चले गए। लेकिन बालकवि बैरागी ने एक अनूठा उत्तर उस समय की सर्वाधिक ताकतवर और प्रभावशाली नेता, राजमाता सिंधिया को दिया, ‘राजमाता जी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। पूरी विनम्रता के साथ आपका आदर करता हूँ। लेकिन मैं आपकी बात नहीं मान सकता। मैंने आज सुबह ही अपने हाथ-पैरों के नाखून काटे हैं। आपकी सारी शक्ति और सम्पदा भी इन्हें नहीं खरीद सकती। अतः मुझे भी खरीदने की मत सोचिएगा।’

यह चरित्र था साहित्यकार, राजनीतिज्ञ बालकवि बैरागी का। जिन्दगी भर स्वच्छ राजनीति की। राजनीति की ‘काजल की कोठरी’ में अपने दामन पर कभी दाग नहीं लगने दिया। वे राजनीति को अपना कर्म एवं साहित्य को धर्म मानते थे। कभी एक-दूसरे को इसमें समावेश नहीं होने दिया। छल, प्रपंच, आडंबर से कोसों दूर। सबके चहेते, चाहे वे विरोधी पार्टियों के सदस्य हो, उन सबसे घुल-मिलकर रहते थे । उन्हें अपनी रचनाधर्मिता पर माँ सरस्वती का वरदहस्त प्राप्त था। दोनों क्षेत्रों में वे अति विनम्र थे और दृढ़ भी।

इन्दिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया, तब उन्होंने इसका पुरजोर विरोध स्वयं इन्दिरा गांधी के सम्मुख दर्ज करवाया और कहा, आपात काल लगाना जनता को परेशानियों में डालने जैसा कार्य कांग्रेस ने किया है, इसका परिणाम भी शीघ्र सामने आएगा। और हुआ भी ऐसा हो। दिल्ली से कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल गई।

इनकी दृढ़ता उन्हें कभी भी विचलित नहीं कर सकती थी। बड़ों को आदर देना, छोटों को आशीष, उनका सबसे बड़ा गुण था। दो बार म.प्र. शासन में कांग्रेस की सत्ता में मन्त्री, लोक सभा तथा राज्य सभा सदस्य रहे। इन्दिरा गांधी से लगाकर सोनिया गांधी के भाषणों के वे भाषण-लेखक थे। प्रधान मन्त्री से लेकर एक पानवाला तक उनका प्रशंसक था।

बालकवि बैरागी एक राजनेता ही नहीं श्रेष्ठ संचालक, एक कुशल वक्ता के साथ-साथ श्रेष्ठ गद्य लेखक भी थे। उनकी कालजयी रचनाएँ इतिहास के पन्नों पर अजर-अमर रहेंगी। उन्होंने 26 फिल्मों के सुमधुर गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों में पटकथाएँ लिखीं। भादवामाता, रानी और लाल परीे फिल्म के गीत व पटकथा लिखी। वे राष्ट्र के ऐसे मंगल कवि थे और रहेंगे, जिनकी रचनाओं ने देश-विदेश में बड़ी धूम मचाई। मालवी भाषा को देशभर में अपनी श्रृंगार रचना ‘पनिहारी’ से शीर्ष पर पहुँचानेवाले राष्ट्रकवि बालकवि बैरागी हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर थे। उनका वर्षा गीत ‘बादरवा अईग्या’, ‘लखारा’ लोकगीत ग्रामीण महिलाओं के कण्ठों का मधुर लोकगीत बना। संगीतकार जयदेव ने ’रेशमा और शेरा’ फिल्म के लिए ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ गीत बैरागीजी से लिखवाया, जो सुनील दत्त और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया, उसे स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेश्कर ने दिया था, उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ और आज भी है।

सन् 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब पाकिस्तान को करारी हार मिली, तब इसकी खुशी में लाल किले की प्राचीर पर हुए कवि-सम्मेलन में तत्कालीन प्रधान मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री के सम्मुख जब यह कविता ‘जबकि नगाड़ा बज ही गया है सरहद पर शैतान का, (तो) नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का’ सुनाई, तब शास्त्रीजी बड़े प्रभावित हुए और उन्होंने कवि बैरागीजी को गले लगा लिया।

महावीर स्वामी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। यही कारण था कि वे 20-25 देशों में घूमने के दौरान भी महावीर स्वामी की आहार संहिता का परिपालन करते थे! अभावों में रहकर जीवन भर संघर्ष कर उन्होंने अपने को अनमोल रत्न बना लिया था। उनका जीवन एक कल्प ऋषि-मुनि की तरह था। उनका सान्निध्य पाकर पत्थर दिल भी पारस हो जाया करते थे। वे डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन और रामधारीसिंह दिनकर के प्रिय शिष्य रहे।

जब कवि दिनकरजी विदा हुए तब बैरागीजी की कलम ने श्रद्धांजलि लिखी। 23 अप्रैल की रात दिनकर ने तिरुपति मन्दिर में जाकर भगवान विष्णु के दर्शन किए और मन्दिर प्रांगण में कविता सुनाने लगे। अश्रुधार निकली तो पूरा प्रांगण रोया, फिर रामेश्वरम में कविता पाठ किया, फिर सोये तो उठे ही नहीं। अखबार ने अगले दिन लिखा ‘हिन्दी का सूरज दिनकर डूब गया, प्रातः प्रणम्य दिनकर को शत-शत नमन।’

बैरागीजी ने खुद को दिनकर का वंशज माना था। उन्होंने ‘वंशज का वक्तव्य’ शीर्षक अपनी कविता में दिनकरजी को इस तरह श्रद्धांजलि दी -

क्या कहा? क्या कहा कि दिनकर डूब गया दक्षिण के दूर दिशांचल में;
क्या कहा कि गंगा समा गई रामेश्वर के तीरथजल में?
क्या कहा कि नगप्रति नमित हुआ तिरुपति के घने पहाड़ों पर?
क्या कहा कि उत्तर ठिठक गया दक्षिण के ढोल नयाड़ो पर?

कल ही तो उसका काव्य प्राठ सुनता था सागर शान्त पड़ा,
तिरुपति का नाद सुना मैंने, हो गया मुग्ध रह गया खड़ा,
वह मृत्यु याचना तिरुपति में। अपने श्रोत्रा से कर बैठा।
हो वहीं कहीं वह समाधिस्थ क्या कहते हो कि मर बैठा?

यदि यही मिलेगा देवों से उत्कृष्ट काव्य का पुरस्कार,
तो कौन करेगा धरती पर ऐसे देवों को नमस्कार?

इतिहास अपने आप को दोहराता है, उपरोक्त पंक्तियाँ फिर से सजीव हो उठीं। हिन्दी माँ के सरस्वती पुत्र बालकवि बैरागी अपने गुरु दिनकर की तरह मौन व्रत धारे चुपचाप इन्द्रसभा में दिनकर और सुमन के संग होनेवाले कवि-सम्मेलन में शरीक हो गए।

13 मई 2018 की सुबह वे उद्घाटन समारोह में पहुँचे। लगभग 40 मिनिट तक सबको हँसाया, गुदगुदाया। तीन बजे मित्रों के साथ गपशप की, फिर अपने शयनकक्ष में विश्राम के लिए चले गए। अपराह्न 4 बजे उनका सेवक जब चाय लेकर पहुँचा तो वे एक हाथ सिर पर रख सो रहे थे। उन्हें जगाया, वे नहीं उठे। ऐसा लग रहा था, शान्त मुद्रा में वे कोई कविता रच रहे हों। जब हिलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तब तक यह खबर आग की तरह देश भर में फैल गई। साहित्य मनीषी बालकवि बैरागी मौन धारण कर चुपचाप अलविदा कह गए। देश-विदेश में जिसने भी यह समाचार सुना, अश्रुधारा बह निकली। कवि-सम्मेलन के सहपाठी नीरज ने उनके निधन पर कहा, मेरे शरीर का आधा हिस्सा अनायास चला गया और कुमार विश्वास ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा, ‘एक और दिनकर प्रकृति की गोद में हम सबको अपनी ओजस्वी रचनाओं का रसपान कराकर चुपचाप चल दिया।’

बालकवि बैरागी का सूत्र वाक्य था-‘साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म। अपने धर्म और कर्म की शुचिता का मुझे पूरा ध्यान है। बाएँ हाथ से लिखता हूँ। ईश्वर ने मुझे बाएँ हाथ में कलम और पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने मेरे दाहिने हाथ में शहीदों के खून से रंगा तिरंगा थमाया। मैं दोनों की गरिमा को दाग नहीं लगने दूँगा।’ उन्हीं की ये पंक्तियाँ जिसका जीवनभर अनुसरण किया, ‘मैं मरूँगा नहीं, क्योंकि कोई काम ऐसा करूँगा नहीं’ पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया।

बालकवि बैरागी एक राष्ट्रकवि के रूप में कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर सदैव हम सबके दिलों में जिन्दा रहेंगे। माँ सरस्वती पुत्र को शब्द-श्रद्धा-सुमन अर्पित उन्हीं के इस छन्द से-

आज मैंने सूर्य से बस जरा सा यूँ कहा,
‘आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यों रहा?’
तमतमाकर वह दहाड़ा, ‘मैं अकेला क्या करूँ?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।’
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(श्री लालबहादुर श्रीवास्तव का यह आलेख, ‘साहित्य अमृत’ के फरवरी 2019 अंक में छपा था। श्री लाल बहादुर श्रीवास्तव मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय मन्दसौर में रहते हैं। जब यह आलेख पोस्ट हो रहा है तब वे जनपद पंचायत मन्दसौर में सहायक विस्तार अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका पता - ‘शब्द शिल्प’, एलआईजी ए-45, जनता कॉलोनी, मन्दसौर - 458004, मध्य प्रदेश तथा मोबाइल नम्बर 94250 33960 है।)

डॉ. काटजू ने पैर पटक कर कहा - ‘यहाँ, इसी जगह पैदा हुए थे कालिदास’

आज से उज्‍जैन में कालिदास समारोह प्रारम्‍भ हो रहा है। इस अवसर पर प्रस्‍तुत है, 
डॉक्‍टर मुरलीधर चाँदनीवाला की आँखों देखा प्रथम कालिदास समारोह 

1958 में, देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन उज्जयिनी में अखिल भारतीय कालिदास समारोह की शुरुआत हुई थी। पूरी नगरी उत्सवमयी थी। मैं तब मात्र सात वर्ष का था। तब मोबाइल, कैमरे आज की तरह न थे, किन्तु बहुत सारे दृश्य ज्यों के त्यों आँखों में अब भी तैरते ही रहते हैं। 

विवाद तो तब भी हुए। एक तो उद्घाटन के लिये राष्ट्रपति जी जिस विशेष रेलगाड़ी से आ रहे थे, उसके इंजिन का नाम ‘विक्रमादित्य’ रखा गया था,  जो इंजिन उसकी अगुआई कर रहा था, उसका नाम  ‘कालिदास’ रखा गया था। एक, तीसरे वैकल्पिक इंजिन का नाम ‘मेघदूत’ रखा गया था। तब जागरूक नेताओं और पत्रकारों ने इस व्यवस्था का जम कर विरोध किया था और इसे विक्रमादित्य व कालिदास का अपमान तक बता दिया था। 


डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद का स्वागत करते हुए मन्त्री डॉक्टर कैलासनाथ काटजू।

कालिदास समारोह के उद्घाटन अवसर पर  राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मुख्यमन्त्री डॉ.कैलासनाथ काटजू , डॉ. शंकरदयाल शर्मा, पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी,  पण्डित सूर्यनारायण व्यास, राज्यपाल हरिविनायक पाटस्कर  सहित राष्ट्र की महान् विभूतियाँ उपस्थित थीं। 

पहले कालिदास समारोह में ही कालिदास की जन्म-भूमि को लेकर विवाद खड़े हुए। सब विद्वान् यह मानने को तैयार नहीं थे कि कालिदास उज्जयिनी में पैदा हुए। विवाद बहुत ही गहरा था। मुख्यमन्त्री कैलासनाथ काटजू ने राष्ट्रपतिजी के सामने मंच पर माईक के सामने खड़े होकर अपने दाहिने पैर को जोर से जमीन पर पटकते हुए कहा - ‘मैं इस समय जहाँ खड़ा हूँ, कालिदास का जन्म यहीं, ठीक इसी जगह पर हुआ था।’ उनके यह कहने के बाद पूरे सात दिन के समारोह में  किसी विद्वान् ने कभी कालिदास की जन्मभूमि को लेकर विवाद नहीं छेड़ा।

प्रथम कालिदास समारोह समारोह के प्रसंग पर जुटी विभूतियों के इस समूह चित्र में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी, पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर, डॉक्टर भगवत शरण उपाध्याय आसानी से पहचाने जा सकते हैं। 

पहले कालिदास समारोह में रूसी विद्वान् वारान्निकोव भी आये थे। उन्होंने अपना भाषण संस्कृत में ही दिया। उन्हें बड़ी हैरानी हुई कि लगभग सभी भारतीय विद्वान् अपना भाषण अंग्रेजी में दे रहे थे। वारान्निकोव ने इस बारे में कुछ तल्ख टिप्पणियाँ भी कीं। उपस्थित विद्वानों और भारतीय संस्कृति की पैरवी करने वालों को उस दिन सबके सामने बहुत नीचा देखना पड़ा था। दूसरे ही दिन अखबारों में वारान्निकोव की टिप्पणियाँ सुर्खी में छपी थीं। 

उस दिन का एक रोचक किस्सा बड़ा मशहूर है। राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्रप्रसाद जी ने उज्जयिनी-भ्रमण की इच्छा व्यक्त की। वे पहली बार उज्जयिनी आये थे। उन्हें उज्जयिनी-भ्रमण कराने का जिम्मा तत्कालीन ग्वालियर नरेश श्रीमन्त जीवाजीराव सिन्धिया ने आगे हो कर लिया। वे राजेन्द्र बाबू के साथ खुली जीप में सवार हुए। जीप महाराजा ही चला रहे थे। छत्री चौक से होते हुए जब वे गोपाल मन्दिर पहुँचे, तब वहाँ दोनों तरफ कतारबद्ध खड़े जन-समूह ने ‘महाराजा जीवाजीराव  सिन्धिया अमर रहे!’ का घोष करना आरम्भ कर दिया। राष्ट्रपति जी अपार जन-समूह का उत्साह-संवर्धन करते हुए स्वयं भी दाहिना हाथ उठाकर ‘अमर रहे! अमर रहे!!’ का घोष करने लगे। 

ग्वालियर नरेश श्रीमन्त जीवाजीराव सिन्धिया का स्वागत करते हुए 
पण्डित सूर्यनारायणजी व्यास। प्रसन्नतापूर्वक निहारते हुए डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद।

संध्या समय सांस्कृतिक कार्यक्रम के अन्तर्गत कालिदास का नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ खेला जाना था। सब तैयारी हो चुकी थी। रंगमंच के नीचे प्रेक्षागृह में आगे की पंक्ति में राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, डॉ.कैलासनाथ काटजू, राज्यपाल सहित महत्वपूर्ण हस्तियाँ बैठी हुई थीं। दूसरी पंक्ति में राष्ट्रपति जी के ठीक पीछे पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर बैठे हुए थे। नाटक आरम्भ होने से पहले विशिष्ट अतिथियों को चाय पेश की गई। शीत लहर थी। राष्ट्रपति जी सहित सभी गणमान्य चाय का आनन्द ले रहे थे। तभी यवनिका हटी। मंच पर सूत्रधार ने प्रवेश किया। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ने चाय का स्वाद ले रहे राष्ट्रपति जी के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा - ‘राजेन्द्र बाबू! चाय का प्याला रख दीजिए। नाटक आरम्भ हो चुका है।’ और बस, राष्ट्रपति जी ने तत्काल चाय का प्याला  नीचे रख दिया।

उस वर्ष देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन पहले कालिदास समारोह के अवसर पर  उज्जयिनी में पधारे हुए विद्वान् अतिथियों के सम्मान में उज्जयिनी को बहुत ही सीमित साधनों के रहते सादगीपूर्वक, किन्तु बहुत ही सुन्दर ढंग से सजाया गया था।

मुझे अच्छी तरह से याद है, देर रात जब राष्ट्रपति जी रेल से बिदा हो रहे थे, तब मेरे बड़े भाई साहब कमल नयनजी मुझे साइकिल पर बैठाकर रेल्वे स्टेशन ले गये थे। मैंने देखा, राष्ट्रपति जी कम्पार्टमेण्ट के बाहर गेट पर खड़े होकर हाथ हिलाते हुए अभिवादन कर रहे थे। रेल सीटी दी रही थी, गॉर्ड हरी झण्डी दिखा रहा था। कोई अतिरिक्त भीड़-भाड़ नहीं थी। देखते ही देखते रेलगाड़ी रवाना हुई। बहुत दूर तक भी राष्ट्रपति जी मुस्कुराकर हाथ हिलाते हुए दिखाई देते रहे।

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अपनी जीवन संगिनी श्रीमती प्रतिभा चाँदनीवाला के साथ डॉक्टर मुरलीधर चाँदनीवाला। मुरलीधरजी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। रतलाम में रहते हैं। उनका पता - ‘मधुपर्क’, 07 प्रियदर्शिनी नगर, कस्तूरबा नगर, रतलाम-457001 और मोबाइल नम्बर 94248 69460 है। मुरलीधरजी का काम-चलाऊ परिचय मेरी इस पोस्ट पर उपलब्ध है। यह आलेख मैंने, मुरलीधरजी की फेस बुक वाल से ही लिया है।