प्रदर्शन (‘मनुहार भाभी’ की दूसरी कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की दूसरी कहानी





प्रदर्शन

सत्तारूढ़ दल का हर विधायक अपने-अपने इलाके में प्रदर्शन की तैयारियों के लिए गाँव-गाँव की धूल फाँक रहा था पर कदाचित् स्वामी थे कि बराबर राजधानी में ही डटे रहे। एक दिन के लिए भी वे क्षेत्र में नहीं गए। जब भी कभी कोई विधायक समय निकालकर राजधानी आता और चाय-वाय की बैठक के साथ कदाचित् स्वामी से प्रदर्शन की तैयारियों का हालचाल जानना चाहता तो वे बहुत ही सन्तुलित अन्दाज में कहते, ‘एक ही क्षेत्र से चार-चार बार चुनाव जीतकर आ जाना कोई आसान काम नहीं है। जनता की नब्ज पर हमारी पकड़ है और हमारे एक ही हल्ले पर हजारों आदमी नंगे पाँव दौड़कर राजधानी में आ जाएँगे। आ क्या जाएँगे बराबर आते रहे हैं। हमारी सारी तैयारियाँ बहुत तेजी से चल रही हैं। और फिर हम कह चुके हैं कि चाहे हमारा जिला राजधानी से बहुत दूर है और फिर हमारा अपना विधान सभा क्षेत्र भी एकदम प्रदेश की धुर सीमा पर बिल्कुल एकाकी है और ठेठ देहाती है तब भी हमारे यहाँ से एक हजार से ज्यादा ही प्रदर्शनकारी इस प्रदर्शन में आएँगे। प्रदेश का संगठन और मुख्य मन्त्री जी चाहे तो हमारे लोगों की मुण्डियाँ गिनवा लें।’

तैयारी में लगे और थके-हारे नए और अधकचरे विधायक कदाचित् स्वामी की यह बात सुनकर सनाका खा जाते। वे देखते थे कि यह सब कहते समय कदाचित् स्वामी के चेहरे पर तिल भर तनाव नहीं है। कई बार तो इस कथन के साथ उनके चेहरे पर अतिरिक्त उल्लास और भी झलक पड़ता था। इतना ही नहीं कदाचित् स्वामी इस सनाके को ज्यादा गहराई यह कहकर भी देते थे कि ‘इन सभी एक या सवा हजार कर्यकर्ताओं के  आने-जाने, खाने-पीने, ठहरने और यहाँ राजधानी में भ्रमण आदि की व्यवस्था भी वे खुद करेंगे। इसके लिए वे संगठन पर कोई बोझ नहीं डालेंगे। और फिर अभी तो प्रदर्शन में पूरे दो हफ्ते बाकी हैं! घबड़ाने और हाय-हल्ला करने की कौन-सी बात हो गई? आखिर हम लोग रूलिंग पार्टी के विधायक हैं। सरकार का समर्थन करने वाली रैली का कामकाज देख रहे हैं। प्रदर्शन होगा और डटकर होगा। राजधानी की सड़कें जनता-जनार्दन से पट जाएँगी। प्रतिपक्ष देखेगा कि हमारा संगठन और हमारे मुख्य मन्त्री का जनाधार कितना विशाल और कितना मजबूत है। आप तो अपने-अपने क्षेत्र की चिन्ता कीजिए। हमारे लिए यह कोई नया काम नहीं है। हमारा तो क्षेत्र ही इतना दूर है। अगर कहीं आप लोगों की तरह हम भी यहीं कहीं आस-ही-पास के होते तो हम बताते कि भीड़ किसे कहते हैं और संगठन पर पकड़ का मतलब क्या होता है। चलिए, आप चाय लीजिए। बेचारे नए-पुराने विधायक इस उल्लास, इस उत्तेजना और इस उमंग से इतने आतंकित हो जाते कि उनकी चाय का स्वाद चला जाता। एकाध पूछने का साहस करता भी तो बस इतना ही पूछता, ‘गुरु! भीड़ जुटाने का यह महामन्त्र हमको भी सिखा दो। आपके गुण गाएँगे। हम तो इलाके के लोगों की चौखटों पर सिर मार-मार कर तबाह हुए जा रहे हैं और एक आप हैं कि यहाँ बैठे ही बैठे सारी तैयारियाँ धूमधाम से चलने का हल्ला कर रहे हैं।’

कदाचित् स्वामी एक रहस्यमयी मुस्कान और फिर अपने टेलीफोन की ओर प्यार-भरी नजर से देखते, उसे सहलाते, उसकी डोरी को इधर-उधर उँगलियों पर लपेटते। हालाँकि मन-ही-मन उनकी इस बात की झल्लाहट भी छूटती थी कि वे इतने सीनियर विधायक हैं और आधा घण्टा हो गया इन जूनियर विधायकों को यहाँ बैठे गपियाते, पर एक बार भी इस कमबख्त की घण्टी नहीं बजी। पर इस मनोभाव को वे चतुराई से चबा जाते। फिर वे खुद ही चोंगा उठाते और अनजान बने से किसी विधायक से पूछते, ‘वो मुख्य मन्त्री जी के सचिवालय का नम्बर क्या है? जरा उनसे बात कर लें। प्रदर्शन की तैयारियों में अपने लायक कोई विशेष कामकाज हो तो पूछ लें। बेचारे विधायक असहाय से एक-दूसरे का मुँह देखते। पर नए विधायकों के पास ऐसे नम्बरों की जेबी डायरी मौजूद रहती है। कदाचित् स्वामी इस मनोविज्ञान से खूब परिचित थे इसलिए एक-न-एक विधायक उनको नम्बर दे ही देता। उनकी उँगलियाँ तब टेलीफोन के डायल पर चलने लग जातीं और हमेशा के मुताबिक मुख्य मन्त्री जी के सचिवालय का नम्बर एंगेज्ड ही मिलता। कदाचित् स्वामी यहाँ भी नहीं चूकते। वे कहते, ‘गनीमत है कि नम्बर एंगेज्ड मिला। अगर नम्बर मिल भी जाता तो मुख्य मन्त्रीजी बाथरूम में ही मिलते।’ और सारा कमरा तनावमुक्त हो जाता। पर आज शायद कुछ और ही गुन्ताड़ा वे मन-ही-मन भिड़ा रहे थे, सो ऐसा नहीं करके कमरे में बैठे मित्रों की तैयारियों का जायजा लेने लगे।

और सचमुच ही कदाचित् स्वामी इस प्रदर्शन की तैयारियों के मामले को लेकर कहीं भी नहीं भागे। न यहाँ गए न वहाँ। अपने कमरे में ही बैठे-बैठे उन्होंने सब कुछ कर लिया। हाँ, अपने टेलीफोन का इतना उपयोग उन्होंने जरूर किया कि अपने घर फोन करके यह संवाद छोड़ दिया कि कहीं कोई भी पूछताछ करे तो यही जवाब दिया जाए कि कदाचित् स्वामी प्रदर्शन की तैयारियों के सिलसिले में अपने चुनाव-क्षेत्र के देहातों में जन-सम्पर्क पर गए हुए हैं। जवाब यही होना चाहिए और यही होना बहुत आवश्यक भी है।

चूँकि वे चौथी बार चुने गए थे इसलिए सचिवालय और सरकार में उनकी जड़ें गहरी थीं। किसी भी तैयारी के लिए उनको कमरे से बाहर जाने की जरूरत वैसे भी नहीं थी। सरकारी कामकाज लेकर उनके पास तबादले वाले, तरक्की वाले, नियुक्तियों वाले लोग तो आते ही थे, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, हैण्ड पम्प विभाग, चिकित्सा विभाग जैसे दुधारु विभागों के ठेकेदार लोग भी आते रहते थे। वे प्रदर्शन रैली में लगने वाले सामान की तैयारियों की फेहरिस्त बनाकर आराम से अपने सोफे पर लेटे या बैठे रहते और जो भी उनसे किसी काम विशेष से मिलने के लिए आता उसके सामने फेहरिस्त खोलकर फैला देते। फेहरिस्त कोई विशेष लम्बी-चौड़ी नहीं थी। पार्टी के बीस झण्डे जिन पर दल का चुनाव-चिह्न छपा हुआ हो, पचास-साठ बैनर्स आठ फुट बाय दो फुट के-दोनों तरफ बाँस फँसाने के लिए जगह बनाकर सिले हुए, दस बैनर्स पाँच बाय तीन फुट के जो कि क्षेत्र से आने वाली बसों पर लगाए जाएँगे। एक सौ साठ मझले साइज के बाँस जो कि बैनरों और झण्डों में लगाए जाने के काम आते हैं। दो किलो सन की सुतली। एक जेबी कैंची और बैनरों पर अपनी पार्टी का नाम, पार्टी का चुनाव चिह्न, कदाचित् स्वामी के चुनाव क्षेत्र का नाम, जिले का नाम फिर उनका खुद का नाम और एकाध नारा संघर्ष का और मुख्य मन्त्रीजी की जय-जयकार का एक स्लोगन, यह सब लिखना-लिखवाना। उसके लिए पेण्टर का खर्चा और रंग-रोगन का खर्चा तथा तीन-चार छोटी-बड़ी कूँचियाँ जिनसे कि यह सब लिखाया जा सके। ज्ञान उनका बहुत ही व्यावहारिक था। वे जेब के मुताबिक बिल और गाल के मुताबिक थप्पड़ जड़ना खूब जानते थे। कौन आदमी कैसा काम लेकर आया है वे उसी से उसके जेब का अनुमान लगा लेते थे और उस फेहरिस्त में से जो जितना कर सकता था उतना राजी-खुशी करने के लिए कह देते थे। किसी पर विशेष वजन भी नहीं और किसी हो-हल्ला भी नहीं।

अपने फ्लेट के एक कमरे में यह सारा सामान रखने का निर्देश वे अपने परिचारक को दे चुके थे। जैसे-जैसे लोग झण्डे, बैनर्स और चीज-वस्तु बनाकर या बनवाकर लाते वैसे-वैसे उन्हें एक कोने में रख दिया जाता था। प्रदर्शन की उनकी तैयारियाँ बहुत सलीके से चल रही थीं। चाहते वे यह थे कि उस पूरे दिन के लिए उन्हें एक फोटोग्राफर मिल जाए जो कि प्रदर्शन की उनकी सारी गतिविधियों के फोटो खींचने का काम अंजाम दे सके। इस काम के लिए उनको परफेक्ट आदमी की तलाश थी। उसमें क्षण को पकड़ने और समझने की बुद्धि होनी चाहिए वर्ना सारा किया-कराया गुड़ गोबर हो सकता है। वे जानते थे कि यह प्रदर्शन उनके अगले चुनाव के टिकट के लिए एक पूरा अलबम तैयार करने का मौका है। आगे काम आएगा।

जैसा कि होता आया है प्रतिपक्ष की ओर से आए दिन इस प्रदर्शन की खिल्ली उड़ाने के वक्तव्य अखबारों में आने लगे। हवा में तरह-तरह की बातें उड़ने लगीं। कदाचित् स्वामी कहाँ कच्ची गोलियाँ खेले थे! उन्होंने प्रतिपक्ष के एक वजनदार नेता के वक्तव्यों का सटीक और त्वरित उत्तर देने का जिम्मा खुद-ब-खुद अपने ऊपर ले लिया और अखबारों में शुरु हो गए। रोज की कतरनें रोज वे मुख्य मन्त्री और प्रदेश के अपने अध्यक्ष तथा दिल्ली हाई कमान के महत्त्वपूर्ण लोगों को भेजने में बिल्कुल नहीं चूके । बाजार की फोटोस्टेट मशीनों का उन्होंने जमकर उपयोग किया। जो भी सामने होता उसे ही वे उस दिन की कतरनें थमाकर उसकी चालीस-पचास फोटोस्टेट कापियाँ बनवाने का आग्रह पेश कर देते और उनका आग्रह अधिकाधिक बीस-पच्चीस रुपए खर्च तक का होता। कोई भी उसे मान लेता था। सारा काम बहुत व्यवस्थित और सिलसिले से चलता रहा। 

प्रदर्शन के दिन ज्यों-ज्यों निकट आते राजधानी में गहमागहमी बढ़ने लगी। अपनी पार्टी के प्रादेशिक कार्यालय को कदाचित् स्वामी ने लिखकर सूचना दी कि उनके क्षेत्र से दस बसों में करीब पाँच सौ लोग और उधर से आने वाली रेलों से करीब नौ सौ या हजार कार्यकर्ता इस प्रदर्शन के लिए राजधानी पहुँचें। इस तरह उस दिन इकट्ठी होने वाली भीड़ में सवा या डेढ़ हजार लोगों की भीड़ कदाचित् स्वामी के इलाके की अवश्य रहेगी। इन सभी लोगों के लिए हर तरह की व्यवस्था वे खुद करेंगे। पार्टी पर इनका कोई वजन नहीं पड़ेगा । तब भी यदि पार्टी सभी विधायकों को कुछ सुविधाएँ वगैरह दे रही हो तो उसकी सूचना उन्हें भी दे दी जाए ताकि वे इन सुविधाओं को यथासमय बटोर सकें। हालाँकि इस लिखित पत्र का कोई लिखित उत्तर कदाचित् स्वामी को पार्टी की ओर से नहीं दिया गया किन्तु उन्हें संकेत कर दिया गया कि वे अपनी कमिश्नरी के कमिश्नर से सम्पर्क कर लें। वहाँ यातायात विभाग के आर.टी.ओ. के जिम्मे प्रत्येक विधायक के लिए पाँच बसों की व्यवस्था डीजल-पैट्रोल सहित सरकार ने कर दी हे । वे बता दें कि उनके लिए बसें कहाँ-कहाँ लगा दी जाएँ ताकि लोग ढोए जा सकें। कदाचित् स्वामी इस व्यवस्था से मानो एक तरह से ‘ऊँऽह्’ जैसी मुद्रा में पार्टी के कार्यालय से वापस हुए। आने वाले हैं सवा या डेढ़ हजार लोग और पार्टी और सरकार मिल कर दे रही हैं कुल जमा पाँच बसें! एक बस में ज्यादा से ज्यादा पचास लोग भी ठूँस दो तो कुल लाए गए ढाई सौ लोग!  ऊँट के मुँह में जीरा ही हुआ यह तो! पर तब भी मन-ही-मन वे बहुत प्रसन्त थे। ऊपर से उदास दिखने वाले कदाचित् स्वामी मन- अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुख्यालय से राजधानी तक आने-जाने का हर बस का डीजल और तेल-पानी का खर्चा जोड़ रहे थे। प्रति बस कितना रुपया आर.टी.ओ. से वसूला जा सकता है। अपने कमरे पर आते-आते उन्होंने हिसाब लगाया कि यह राशि तीस हजार से चालीस हजार रुपयों के बीच में बैठती है। कमरे में आते ही उन्होंने आर.टी.ओ. साहब को ट्रंक कॉल बुक किया और वे प्रदर्शन की अगली तैयारियों में लग गए। आर.टी.ओ. और कमिश्नर को क्या कहना है, उसका रिहर्सल उन्होंने

दो-एक बार बुदबुदाकर कर लिया। कमिश्नर तो खैर राजधानी आज-कल में ही आने वाले हैं पर मूल बात है आर.टी.ओ. साहब का हाथ आ जाना। प्रदर्शन का गणित हर तरह कदाचित् स्वामी के पक्ष में बैठ रहा था। उनके वक्तव्य धुँआधार आ रहे थे। एक सीनियर विधायक की नोटिस प्रेस भला कैसे नहीं लेता? उनका हर कदम नपा-तुला था और बिल्कुल सही था। 

प्रदर्शन के दिन बड़ी भोर से ही कदाचित् स्वामी नहा-धोकर तैयार होकर फोटोग्राफर को साथ लेकर सबसे बड़ा झण्डा बाँस में फँसाकर अपने क्षेत्र से आने वाली गाड़ी के प्लेटफार्म पर बेसब्री से इन्तजार करते यहाँ-वहाँ भागदौड़ करते देखे गए। फोटोग्राफर को वे खूब समझा चुके थे कि उसे कब क्या करना है। गाड़ी के आते ही नारे लगाते लोग डिब्बे से उतरना शुरु हुए। कदाचित् स्वामी कन्धे पर बडा झण्डा और अपना झोला लटकाए एक डिब्बे से उतरे तरह-तरह की उम्र के लोगों के सामने खड़े हो गए।  और वे दूसरे समूह के सामने जाकर इसी तरह खड़े हो गए। फोटोग्राफर को देखते ही भीड़ का घेरा धक्का-मुक्की और आकाश-फाड़ नारों पर उतर आया। कदाचित् स्वामी ने उस समूह के साथ फोटू खिंचवाया और वे दूसरे समूह के सामने जाकर इसी तरह खड़े हो गए। आठ-दस बोगियों के लोगों के बीच वे इसी तरह नारों और कैमरों के क्लिक करवाते रहे। भीड़ में आखिर स्वर उठने ही थे। लोग कहते पाए गए- ‘देखिए, इसे कहते हैं विधायक! अपने कार्यकर्ताओं का कितना ध्यान रखता है यह आदमी! सबको लेने स्टेशन भी आया और सभी के फोटो तक की व्यवस्था की। इनके क्षेत्र के लोग धन्य हैं कि उन्हें इतना जागरूक विधायक मिला।’ इसी गहमागहमी में कदाचित् स्वामी रेलवे गेट पर जाकर टी.टी. से बहस करते देखे गए - ‘यह प्रदर्शन-स्पेशल है और आप हैं कि हर एक को रोक-रोककर टिकट की-पूछ रहे हैं? निकल जाने दीजिए।’ और खुद खड़े रहकर नारे लगाते लोगों को उन्होंने बाहर निकलने में सहायता की। उस गाड़ी से जुड़े इलाकों वाले दो-एक विधायक और भी पहुँचे और पार्टी के एक महामन्त्री भी आए, पर जयजयकार हो रही थी कदाचित् स्वामी की। सक्रियता उनकी ही सराही जा रही थी। प्रदर्शनकारी अपने-अपने सूत्रों के आसपास अपने-अपने ठहरावों पर जाने लगे। अपना टेम्पो और अपना फोटोग्राफर लेकर कदाचित् स्वामी वापस आवास पर आए। चाय पी, नाश्ता किया। फोटोग्राफर को कुछ और निर्देश दिए और बसों पर लगाए जाने वाले बैनर्स लेकर जेब में कैंची रखे सामने वाली सड़क पर आ गए। 

आसपास से सैकड़ों बसें प्रदर्शनकारियों को ले-लेकर राजधानी में बड़ी सुबह पहुँच चुकी थीं। कार्यकर्ता अपनी प्रातःकालीन चर्या से निपटने में लगे हुए थे। कुछ अपने-अपने विधायकों के कमरों में पसरे पड़े थे। सारी सड़क पर भीड़ की भारी चहल-पहल थी। कदाचित् स्वामी ने एक-आध किलोमीटर का चक्कर लगा-लगाकर सात-आठ सूनी बसों को चुना। उन पर लगे हुए दूसरे विधायकों और क्षेत्रों के नाम के बैनर कैंची से डोरियाँ काटकर, लटकते कर दिए। अपना बैनर बाँधा और बस के साथ फोटो खिंचवा लिया। आसपास जो भी लोग जुट गए उनको फोटो में शामिल कर लिया। कैमरामैन को देखकर हर बस के पास बड़ी भोर भी दस-बीस लोग तो आ ही गए। 

दोपहर एक बजे से प्रदर्शन शुरु होना था। भीड़ दस बजे से ही मैदान पर जुटनी शुरु हो चुकी थी। कदाचित् स्वामी ने बिल्कुल योजनाबद्ध तरीके से पैंतरा लिया। एक टेंपो में जुलूस वाले बड़े बैनर्स और बाँस का गट्ठर रखा। झण्डे रखे। दूसरे में फोटोग्राफर के साथ खुद बैठे और चल दिए मैदान की ओर। जहाँ नारे कम लाउड स्पीकर का रेकार्ड ज्यादा हल्ला कर रहा था। एक मुकाम पर कदाचित् स्वामी ने बाँस उतारे। बैनर्स उतारे और बैनरों में बाँस फँसा-फैंसा कर उनको उठाने लायक बना दिया। प्रदेश का पार्टी समूह प्रदर्शन के जुलूस को कतारों में खड़ा कर रहा था। यही समय था जबकि कदाचित् स्वामी अपने बैनर्स और पार्टी के झण्डों को सही हाथों में थमा देते। उन्होंने यह काम बहुत गम्भीरता और शालीनता से किया। वे पहले एक पढ़े-लिखे जैसे आदमी को पार्टी का झण्डा धमाते और फिर आसपास खड़ी भीड़ में दो-चार लोग वैसे परख लेते जिनको कि बैनर थमाए जा सके। फिर नारा लगाते। उनके साथ फोटो खिंचवाते और हिदायत देते कि जब कतार जम जाए तब तक वे यहीं रहें। इसी तरह मुख्य मन्त्रीजी को लेकर वे प्रदर्शन के समय यहीं आएँगे और कार्यकर्ताओं के साथ उनका फोटो खिंचवाएँगे। फ्लैश का एक ही उजाला कार्यकर्ताओं पर पड़ता और कदाचित् स्वामी की नींव पक्की हो जाती। वे कार्यकर्ता प्राण छोड़ने को तैयार हो जाते पर पार्टी का झण्डा और कदाचित् स्वामी का बैनर छोड़ने को तैयार नही होते। भीड़ का आलम यह था कि कदाचित् स्वामी मन-ही-मन हिसाब लगा रहे थे कि अगर ऐसा ही अनुमान होता तो वे आराम से अपने दो-एक सौ बैनर्स इस भीड़ में तैरा सकते थे। 

प्रदर्शन निकला और ठाठदार निकला। शान से निकला। जहाँ-जहाँ सम्भव हो सका वहाँ-वहाँ मुख्य मन्त्रीजी और अन्य नेताओं ने कार्यकर्ताओं के साथ चलकर नारे लगाए। फोटो खिंचवाए। संघर्ष का आह्वान किया । सरकार की जय बोली। सारे प्रदर्शन में सबसे ज्यादा बैनर्स कदाचित् स्वामी के ही दिखाई दे रहे थे। दूसरे विधायक इस बात को लेकर परेशान थे कि आखिर कदाचित् स्वामीजी ने इतने लोग अपने यहाँ से बुला कैसे लिए? दूसरे दिन के समाचार पत्रों ने प्रदर्शन के जो इने-गिने फोटो छापे उनमें दो फोटो कदाचित् स्वामी और उनके साथ चल रहे समूह के थे। प्रदर्शन का जो विहंगम दृश्य अखबारों ने छापा उसमें कदाचित् स्वामी के बैनर्स बड़ी दूर-दूर तक गिनने लायक दिखाई पड़ रहे थे। तीसरे दिन कदाचित् स्वामी मुख्य मन्त्रीजी से मिलने के लिए निर्धारित समय पर अपने कमरे से चले तो उनके पास एक भारी अलबम था और कार का ड्राइवर कह रहा था कि यह कार एक आर.टी.ओ. साहब ने दिन भर के किराए पर उठाई है। कदाचित् स्वामी के नौकर ने बताया कि आज का खाना विधायक जी का किसी आर.टी.ओ. साहब के साथ शहर के एक होटल में है।

-----


‘मनुहार भाभी’ की पहली कहानी ‘शोकाकुल’ यहाँ पढ़िए।

‘मनुहार भाभी’ की तीसरी कहानी ‘गच्चा’ यहाँ पढ़िए।



कहानी संग्रह के ब्यौरे
मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।



 



 

 

  



     

 

 

 

 


सेनापति के नाम

 
 


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की आठवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




सेनापति के नाम

अडियल घोड़े बदहवास हों
सारथि जिसके सूरदास हों
समर शेष है
ऐसे रथ से
मेरे रथी! उतर भी जाओ।

राज मार्ग के जय निनाद में, भूल गए अपनी पगडण्डी
सेनाएँ हो गईं प्रमादी, सेनापति हो गए शिखण्डी
इस सेना का अन्त निकट है-शेष समर अत्यन्त विकट है
रण ऋतु की रंगत पहिचानो, ओ रणव्रती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ।।

आलिगन में ऊष्मा हो तो, आँखों में रस बन्धन होते
द्रोपदी पल भर में बँट जाती, यदि सब कुन्ती नन्दन होते
सिर्फ उपद्रव जिनकी रति हो, दुर्गति ही जिनकी सद्गति हो
उनके रथ में राम नहीं है, लक्ष्मण जती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ।।

जनादेश को अपमानित कर वचन भंग के दो दोषी हो
संसद जिनका रनिवासा हो सत्ता जिनकी बेहोशी हो
सेना नहीं गिरोह बचा है, खुद जिसमें संग्राम मचा है
उनकी शैली उनको शुभ हो, ओ जय शती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ
-----



‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता ‘फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की नौवीं कविता ‘यौवन के उत्पात वसन्ती’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
-----





















  


गोवा की स्मृतियाँ

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की इकतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



गोवा की स्मृतियाँ

गोआनी मुछआरों की रोमानी जिन्दगी।
सागर की लहरों पर मनमानी जिन्दगी।।
हिचकिचा के फँसती हुई मछली किसी जाल में।
बहुत याद आएगी मुझको भोपाल में।।

तुलसी के चौरे के आस-पास क्रॉस ये।
लोहे पर मिट्टी का बढ़ता विश्वास ये।।
नारियल को देख रहीं अपलक सुपारियाँ।
जाने क्या लिख गई रेत पर कुमारियाँ।।
ताल नहीं, गढ़ा है ये गुईयाँ के गाल में।
हाय राम! भूलूँगा कैसे भोपाल में।।
  
मछली और सोम की गन्ध है बाजार में।
फेरी का प्रणय-पत्र उत्तरित है कार में।।
काजू के छिलकों पर ओठों की छाप है।
पाँच मिनट बारिश और पाँच मिनट साफ है।।
गिरजा भी गुम है, मन्दिर के ख्याल में।
तरस-तरस जाऊँगा, इसको भोपाल में।।

सूरज की सोनाली, चाँद की रुपालियाँ।
माँज रहीं साँझ-सुबह घर-घर में थालियाँ।।
ब्याह दी है बेटियाँ, सह्याद्रि को वरुणेश ने।
हरियाली जुए में हारी मंगेश ने।।
पगलाई प्रकृति यहाँ, सोलहवें ही साल में।
प्राण मेरा लेगी हाय राम! जाकर भोपाल में।।

नयन-नयन सपन और शुचिता की छाँव है।
धानों की मेड़ों पर, सपनों का गाँव है।।
कटहल के तने टिके, किसको अवकाश है।
सूरज की अँजुलि से छहरता प्रकाश है।।
पछुवा बेहाल हुई आखिर उस पाल में।
कैसे छुपाऊँगा, यह सब भोपाल में।।
   
घाटियों में गुम है जो, शायद वे गीत हैं।
हाँ, हाँ, वो कोकणी का छन्द मेरा मीत है।।
अपनी प्यास प्रेयसी की खोज में अधीर है।
मेरे गाल पर भी इसने खींच दी लकीर है।।
कण्ठ में रखूँ या इसे, बाँध लूँ रूमाल में।
चूमूँगा जाकर के इसको भोपाल में।।
-----
 


संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
-----



यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


करके देखो




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की पैंतीसवीं कविता 




करके देखो

घर-घर, देहरी-देहरी
छज्जे-छज्जे, आले- आले
सुहागनों ने रख दिए
अपने दीये
बरसा दिए अपने
आँचलों से
आसमान भर उजाले।
जगमग हो गया जगत
हर मुँडेर हो गई सुहागन
तब भी तुम्हारी
उदासी नहीं गई।
शर्तें लगाते हो
रोज नई-नई,
‘ऐसा हो तो वैसा करूँ
वैसा हो तो ऐसा करूँ’
ऐसे में कौन आएगा
दीया रखने
तुम्हारे सुनसान बियाबान में
शोकसभा करते रहो
जिन्दगी भर
अपने मसान में ।
फुरसत नहीं है दुनिया को
जो तुम्हारे सुख की सोचे
अपनापन देकर
तुम्हारे आँसू पोंछे।
अपना दीया खुद बनाओ
उसे नेह से भरो
बाती रखो संघर्षवती
संकल्पशील तीली की
जुगत करो।
दोस्ती करो उजाले से
बात करो
अपने गुमसुम आले से
देहरी लीपो
माँडो एकाध माँडणा
टेढ़ा-मेढ़ा।
और सुरे-बेसुरे ही सही
अगर तुमने ‘हीड़’
का कोई सुर छेड़ा
तो जुट जाएँगे लोग
कट जाएँगे सारे मनोरोग
अपने आप सज जाएगी
लक्ष्मी-पूजा की छोटी-बड़ी थाली
भाग खड़ी होगी
अमावस काली
कहेगी,
‘अरे! अरे!!
ये तो मनाने लगा
अच्छी -खासी दीवाली।’
मरी उदासी को कूड़े पर फेंका
और कुछ नहीं
कर पा रहे हो तो
ऐसा ही करके देखो।
-----





संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















शोकाकुल (‘मनुहार भाभी’ की पहली कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के 
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की पहली कहानी



 

आज के दिन
(कहानीकार का आत्‍म-कथ्‍य)

कविता मेरा मूल धर्म है। कहानी मेरा आनन्द है। कविता मुझे रस देती है। कहानी मुझे आह्लाद देती है, ऊर्जा देती है।

इसी प्राप्ति की प्रक्रिया में मेरी कुछ कहानियाँ आपके सामने हैं। मेरी कहानियों के सारे पात्र मेरे आसपास हैं। हो न हो ये आपके आसपास भी हो सकते हैं। इनकी ‘कहन’ मेरी है। इस सृजन में भी मैं निरन्तर हूँ। यह मेरा आत्मानन्द है।

‘मनुहार भाभी’ में ऐसी ही कुछ कहानियाँ हैं। उन्हें आप पसन्द करें या नहीं करे, मैं इस बहस में नहीं पड़ूँगा। अपनी-अपनी जिह्वा, अपना-अपना स्वाद।

बहरहाल, इस रूप में ‘कहानी’ के आँगन में यह मेरी पहली उपस्थिति है। शायद आप मेरी इस आवाजाही को उचित समझें।

आप जो पाठकीय सहयोग मुझे दे रहे हैं, उसके

प्रति मैं आपका कृतज्ञ हूँ।

प्रकाशक को धन्यवाद कि उन्होंने कई प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी इस संग्रह को आप तक पहुँचाया।

- बालकवि बैरागी
10 फरवरी 2001


 

अनुक्रमणिका
01. शोकाकुल
02. प्रदर्शन
03. गच्चा
04. सादर अपमानित
05. पाल्टी पोल्टी
06. साँप की राजनीति
07. विकल्प
08. हरिया बाबा
09. मनुहार भाभी
10. बुड्ढी पुलिया 
11. आभारी 
12. मूतिकार
13. घोषणा-पत्र
14. जनसम्पर्क
15. मृत्युभोज
16. आन्दोलनकारी
17. अन्ततः
18. दखल
19. भला आदमी
20. बाइज्जत बरी
21. जीत गया भई जीत गया
22. निकम्मा
--------


शोकाकुल

सारा वातावरण शोक में डूबा हुआ था। किसी का बोल सुनाई नहीं पड़ता था। यहाँ से वहाँ तक एक गम्भीर किस्म की फुसफुसाहट फैल रही थी। जानते सभी थे कि हर एक किसी न किसी से बात कर रहा है, पर सुनाई किसी को कुछ नहीं पड़ नहीं पड़ रहा था, मानो बोलने का अभिनय किया जा रहा हो। हिलते होंठ भर नजर आते थे। लोग सुनने की कोशिश में कान अपने पड़ोसी के मुँह के पास तक ले जाने का असफल उपक्रम करते और फिर बिना किसी प्रतिक्रिया के अपना सिर वापस हटा लेते।

हवेली के भीतर परिवार की सबसे जेठी सदस्या के मृत शरीर को परिजन शव-स्नान करवा रहे थे। सारा परिवार कहता ही उन्हें ‘जेठी माँ’ था। भरपूर उम्र लेकर वे आज बड़ी सुबह ही रामशरण हुई थीं। जितना लम्बा उनका जीवन रहा, उतना ही चौड़ा उनका परिवार होता गया। लोग इस घर में उनके आने से लेकर आज तक के समृद्धि-विस्तार की चर्चा तरह-तरह से कर रहे थे। पर लगता था हरकोई बुदबुदा रहा है, बोल कोई नहीं रहा। कभी-कभी, थोड़ी-थोड़ी देर के अन्तराल से, करुण हिचकियों का एक थपेड़ा-सा उठता और उस शोकाकुल वातावरण को और अधिक सघनता दे जाता। लोग उधर देखने की कोशिश करते और देखकर, मुँह फेर लेते। शवयात्रा में जाने वालों की भीड़ जेठी माँ और उनके परिवार की प्रतिष्ठा के अनुरूप ही बढ़ती जा रही थी। कारों और स्कूटरों का बहुत बड़ा जमावड़ा सारी सड़क पर हो चला था। वाहन खड़े करने की जगह नहीं बची थी। किसी ने पुलिस को फोन भी कर दिया था और सरकार का छोटा-सा अमला इस शवयात्रा के शुरु होने से पहले गली में भीड़ को नियन्त्रित करने के लिए अपने आप आ जुटा था। जो जहाँ भी था, वहीं से व्यवस्था कर रहा था या फिर उसमें सहायता करने की कोशिश कर रहा था। जेठी माँ के प्रति आदर का एक गम्भीर महिमामय शब्द-संसार, गली में यहाँ से वहाँ तक, आकार लेता लग रहा था। आसपास की खिड़कियों में शवयात्रा पर फूल बरसाने के लिए श्रद्धालु नर-नारी स्थान लेने की कोशिश कर रहे थे। शवयात्रा में होने वाला विलम्ब सभी को सशंकित कर रहा था। कोई-कोई मानता था कि भीतर सम्पत्ति का विवाद चल रहा है तो कोई अनुमान लगा रहा था कि शायद कोई निकट का रिश्तेदार आने वाला है, उसी की प्रतीक्षा हो रही है। एक-एक पल भारी होता जा रहा था, पर शवयात्रा थी कि शुरु होने का नाम ही नहीं ले रही थी। आखिर माजरा क्या हैं, इस जिज्ञासा को लेकर कोई-न-कोई हवेली के भीतर तक जाने की कोशिश करता और निराश होकर वापस लौट आता।

हवेली के बरामदे में अरथी सजी हुई रखी थी। बाहर बैण्ड ने रामधुन बजाना शुरु कर दिया था। लोगों में हलचल थी। शवयात्रा के सहयात्रियों का एक सयाना समूह पूर्व तैयारियों के लिए श्मशान में जा चुका था। वे लोग वहाँ इन्तजार कर रहे थे। बाहर लोगों को खड़े-खड़े आधा घण्टा से अधिक समय हो गया था। भीतर-ही-भीतर, कुछ-न-कुछ घट जरूर रहा है, वर्ना इतना विलम्ब होता ही क्यों?

भीतर परिजनों में जो बहस हो रही थी, वह बहुत चिन्ताजनक थी। तीन बातों में से किसी एक पर फैसला जब तक नहीं होगा, तब तक शव यात्रा शुरु नहीं हो सकती, यह जिद घर के सयाने समझदारों की थी। तीनों बातें विचार के लिए कुछ इस तरह थीं: पहली बात यह थी, कि शव यात्रा का रास्ता बदलो। दूसरी बात यह थी कि अगर रास्ता नहीं बदलना है तो फिर शव को मुखाग्नि देने के लिए, जो पावक-पात्र आगे-आगे चलाया जाता है उसे, परिवार के सदस्य बारी-बारी से उठा लेंगे पर, किसी भी कीमत पर वह थाली निश्चिन्तजी को नहीं दी जाएगी। वे उसे छुएँगे भी नहीं। अगर यह भी सम्भव नहीं हो तो फिर निश्चिन्तजी को हवेली के किसी कमरे में बन्द कर दिया जाए, जब शवयात्रा श्मशान में पहुँच जाए, तब उनको कमरे से बाहर निकालकर अग्निदान में शामिल कर दिया जाए।

चिन्ता के तीनों मुद्दे पल-पल खारिज हो रहे थे। शवयात्रा का रास्ता इसलिए नहीं बदला जा सकता था कि रास्ते पर जेठी माँ की ममता में पले परिवारों ने उनके शव-दर्शन के लिए खुद को द्वार-द्वार, गवाक्ष-गवाक्ष पर तैयार कर रखा था और जेठी माँ का परिवार किसी भी मोल उनको निराश नहीं करना चाहता था। सॉँझ-सवेरे जेठी माँ उसी रास्ते से मंदिर जाती-आतीं, देव-दर्शन करतीं और अपनी गाड़ी रोककर रास्ते भर प्रसाद बाँटतीं। ममता की आशीषें लुटातीं। ममता का आँचल अपने सिर पर डाले वे लोगउनका अन्तिम दर्शन भी नहीं कर सके, यह जेठी माँ की आत्मा की शान्ति में बाधक होगा। रास्ता नहीं बदलेगा। चाहे जो हो जाए। मृत्यु-महोत्सव का यह जुलूस उधर होकर ही गुजरेगा, जिधर से कि जेठी माँ रोज आती-जाती थीं।

रहा सवाल निश्चिन्तजी को पावक-पात्र नहीं देने का, सो यह बहुत कठिन बात थी। जिस दिन जेठी माँ इस घर में बहू बनकर आई थीं, उस दिन यह सारा घर विपन्नता और वीरानी का दरिद्र-महल था। न यह हवेली थी, न यह समृद्धि का साम्राज्य। विवाह के बाद के पूरे दस साल जेठी माँ ने, इस परिवार की नींव भरने में जो संघर्ष किया था, वह जगजाहिर बात थी। एक विराट शून्य को जेठी माँ ने अपने खून-पसीने और पूजा-आराधना के बल पर, जिन परिस्थितियों में भरा था, उससे सभी वाकिफ थे। विपन्नता और दारिद्र्य के दसवें साल में, मात्र दस साल की उम्र का एक बच्चा, अनायास इस घर में न जाने कहाँ से, न जाने किस तरह आ गया। जेठी माँ ने माना था कि यह बच्चा भगवान ने भेजा है। रखा था उसे घरेलू काम-काज के लिहाज से, पर जेठी माँ ने पाया था, कि इस बच्चे का पग-फेरा उनके लिए बहुत ही शुभ सिद्ध हुआ है। ठीक वही दिन था, जबकि भूखों मरते परिवार के प्रमुख, जेठी माँ के पति, पुरुषोत्तम ने हताश और निराश जेठी माँ से शाम को कहा था-‘आज से मैं दूसरी शादी की बात भी नहीं करूँगा। भगवान ने दस साल तक हमारी गोद नहीं भरी है तो कोई बात नहीं। हम किसी का भी बेटा यहाँ-वहाँ से लेकर पाल लेंगे। सुख-दुःख साथ काटेंगे-बॉंटेंगे। आखिर कब तक इस ढूँठ पर कोंपल नहीं आएगी?’ और पुरुषोत्तमलालजी ने दूसरी शादी करने के कुविचार को दिल-दिमाग से ही निकाल दिया था। जेठी माँ ने तब इस बच्चे को पहली बार प्यार और ममता-भरी नजर से देखा था। न रूप न रंग, बेहद काला-कलूटा। सूरत-शकल का तो सवाल ही नहीं था। गन्दा इतना कि पास बैठाना तो ठीक, पर परछाईं भी पड़ जाए तो जी मिचलाने लगे। न जात का पता, न पाँत का पता। नाम पूछा तो बस इतना भर कहा, ‘लोग मुझे काजल कहकर बुलाते हैं। जहाँ जाता हूँ वहाँ लोग नया-नया नाम रख लेते हैं। आप कोई-सा भी नाम रख लो। नाम में क्या रखा है? घर का कचरा-बुहारा करता रहूँगा और.....।’

जेठी माँ ने माँ-बाप और नाम-गाँव का पता-ठिकाना पूछा, तो लड़का चुप रह गया था। कुछ पता हो तो बताए! पर जब उससे पूछा कि यहाँ किसने भेजा है? तो उसने बिना किसी विराम-विश्राम के कह दिया था-भगवान ने। और जेठी माँ ने इसे भगवान का भेजा हुआ ही मानकर उसमें भगवान को साक्षात् देखा। जबकि गए दस सालों से, ‘दूसरी शादी-दूसरी शादी, ‘सौत-सौत, वंश-बेल और बेटा-बेटा’ का जाप करने वाले कण्ठों में एकदम बदलाव आ गया। जेठी माँ एक दैवी उजास के साथ निश्चिन्त हो गईं। जेठी माँ ने इस बालक से कहा था-“बेटा! इस आँगन में तेरे पाँव पड़ते ही मैं एक चिन्ता से ‘नचीत’ हो गई। तेरा नाम मैं ‘नचीत’ रखती हूँ।” और यह लड़का उस मुहल्ले में ‘नचीत’ नाम से पुकारा जाने लगा। जब भले दिन आते हैं तो हर दिशा उजली हो जाती है। उसी साल जेठी माँ पहली बार गर्भवती हुई और नचीत के घर आने के डेढ़-पौने दो साल में ही जेठी माँ के घर में पालना बँध गया। थाली बज गई। पुरुषोत्तमजी का वंश चल पड़ा। कुछ काम-धन्धा शुरु हुआ और हवा का हर झोंका इस दरिद्रवास में चन्दनवास से आया लगने लगा। सुवास ही सुवास के दिन शुरु हो गए। जब-तब पुरुषोत्तमजी जेठी माँ को सौत लाने का जिक्र करके दुःख दिया करते थे, तभी गली मुहल्ले वाली बहू-भौजाइयों ने कहना शुरु कर दिया था कि इस घर में जिस दिन छोटी सुहागन आएगी, यह अपने आप जेठी हो जाएगी और ‘वाणी विनोद’ में दिया हुआ नाम ‘जेठी’ खुद-ब-खुद चल पड़ा। छोटी तो नहीं आई, पर जेठी माँ अपने-आप

जेठी हो गईं और पहला बेटा होते ही जेठी माँ कहलाने लगीं।

सम्पन्नता और समृद्धि के साथ-साथ घर में सब-कुछ बढ़ता गया। जेठी माँ इस सबको नचीत के नाम लिखने में कभी संकोच नहीं करती थीं। कहा करती थीं, जब से यह इस घर में आया, सब मंगल-ही-मंगल होता जा रहा है। यही कारण था, कि जेठी माँ पेट की आँत से ज्यादह ख्याल नचीत का रखतीं। बड़े बेटे के जन्म से पहले ही बात-बात में जेठी माँ ने एक दिन कहा था, ‘चलो मेरी अरथी के आगे हाँडी उठाने वाला आ गया। भगवान कन्धा देने वाला भी भेजेगा ही।’ और मरने से पहले जेठी माँ ने सारे घर के सामने अपनी कड़क आवाज में कहा था, ‘मुझे मसान ले जाते समय और कुछ करो नहीं करो, पर इतना जरुर करना, कि चिताग्नि वाली थाली नचीत ही उठाए!’ यह एक तरह से जेठी माँ की अन्तिम इच्छाओं में से एक और प्रमुख इच्छा थी। 

बड़े बेटे और नचीत की उम्र में पूरे ग्यारह साल का अन्तर था। नचीत का भी थोड़ा-बहुत लिखना-पढ़ना बड़े बेटे के साथ ही हुआ था। तभी उसने पाया कि ‘नचीत’ का मतलब ‘निश्चिन्त’ होता है। धीरे-धीरे यह नाम शुद्ध होता गया और बढ़ते कारोबार के साथ ‘नचीत’ शनैः-शनैः ‘निश्चिन्त’ हो गया।  जेठी माँ को यदा-कदा एक ही मलाल कचोटता रहता कि न जाने किसकी सोहबत-संगत में नचीत ने कलाली पर जाना शुरु कर दिया था। पर जेठी माँ मानती थी कि यह सब संस्कारों का खेल हैं और अपने घर की श्री-समृद्धि के प्रतीक नचीत की हर टेव-कुटेव में भी जेठी माँ ने कुछ-न-कुछ भगवान का किया हुआ भला ही देखा। 

शादी-विवाह नचीत का न होना था, न हुआ। किसी बात का अता-पता था नहीं। आखिर बेटी देता कौन? नचीत बाबू ने एक खूँटे से बँंधना कभी ठीक भी नहीं समझा। आए दिन उनके बारे में यहाँ-वहाँ से किस्से-कहानियाँ जेठी माँ और परिवार वालों के सामने आती थीं, पर वे सब जिस तरह आती उसी तरह लौट भी जातीं। जेठी माँ कहा करती थीं-‘मन में कोई रच-बस गई हो तो घर में बसा ले। पर यूँ पत्तल-पत्तल का जूठा मत खा नचीत!’ पर नचीतजी हल्के से सुरूर में अपनी काली-कलूटी काया में दी हुई कुदरत की रजत धवल दन्त-पंक्ति के साथ, पान की लाली लिपटी हँसी में, जेठी माँ की इस बात को सहज उड़ा देते और अपने कमरे में चले जाते। पुराना घर छोड़कर जेठी माँ और उनके परिवार ने जब यह हवेली खरीदी तो जेठी माँ ने सबसे पहले निश्चितजी के लिए उसमें कमरा तय किया था। अलग-का-अलग और साथ-का-साथ। जेठी माँ सोच ही नहीं सकती थीं, कि नचीत उनसे अलग हो जाए! 

जेठी माँ का 85 बरस उम्र जिया हुआ मृत शरीर, सुहाग चूनर में लिपटा, अरथी पर रखे जाने की तैयारियाँ चल रही थीं। 90 बरस के पुरुषोत्तमलालजी जैसे-तैसे श्मशान जाने की जिद में खाँस रहे थे। जेठी माँ के बेटे, नाती, पोते और शोकाकुल परिजन बड़ी संख्या में, अरथी के आस-पास अपना-अपना स्थान ले रहे थे। साठ साल के निश्चिन्तजी एक बार कलाली पर होकर आ चुके थे और भीड़ में यहाँ-वहाँ सिसकते फिर रहे थे। वे टुकुर-टुकुर देख रहे थे, कि कब शवयात्रा शुरु हो और कब ‘राम नाम सत्त है’ की आवाज के साथ, वे अपनी जेठी माँ को कन्धा

देने से पहले पावक-पात्र उठाएँ। जेठी माँ की अन्तिम इच्छा का आदर करना वे अपना विशेषाधिकार मानते थे। आखिर जेठी माँ ने अपनी हॉँडी उठाने का काम बार-बार निश्चिन्तजी के जिम्मे ही क्यों रखा? वे जेठी माँ की सम्पत्ति पर अपना अधिकार नहीं मानते थे, पर उसकी ममता और अन्तिम इच्छा पर अपना पूरा हक मानकर, आँसू बहाते बैठे थे। उनके लिए तो जेठी माँ माँ-बाप, बहन-भाई, देवी-देवता सब कुछ थीं।

तीसरी शर्त मानने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। इस घर से गए पचास सालों से जो आदमी इतने गहरे तक जुड़ा हुआ है, उसे आखिर किस बूते पर आप कमरे में बन्द करके शव यात्रा निकाल सकेंगे? कुहराम मच जाएगा। निश्चिन्तजी इस घर को आसमान में पहुँचा देंगे। वो चिल्लपों मचेगी, कि कुछ कहिए मत! जेठी माँ की मिट्टी खराब हो जाएगी। सारे संसार में एक दैवत्व वाली मिट्टी का तमाशा बन जाएगा। रास्ता कुछ दूसरा निकालो।

बाहर लोग विचलित होते जा रहे थे और भीतर वाले निर्णय नहीं ले पा रहे थे। मिट्टी, मिट्टी में मिलने को आतुर थी। बैण्ड पर राम-धुन ऊँची सुनाई पड़ने लगी थी। महिलाओं का कोलाहल बढ़ चला था। पूरे रास्ते में शव-दर्शन के लिए लालायित लोगों की भीड़ अपना संयम खोने लगी थी। आखिर पुरुषोत्तमलालजी ने ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसा आर्डर सुनाया-‘जो होना होगा सो होगा, इसकी मिट्टी खराब मत करो। नचीत को अग्नि की थाली थमाओ और कन्धा दो। बोलो राम-राम......।’ और जेठी माँ की सजी-धजी अरथी अपने परिजनों के कन्धों पर पहुँच गई। पावक-्यात्र की सुतली के सिरे पकड़े, आगे-आगे सिसकियाँ भरते निश्चिन्तजी विलाप करते अपनी माँ को रोते हुए चल रहे थे। सबसे आगे बैण्ड था। शव पर जेठी माँ के वजन से ज्यादह वजन के फूल बताशे पड़े हुए थे। गुलाल का एकाध गुबार उठता। फूल बरसते। ‘राम नाम सत्त है’ का पवित्र घोष रास्ते भर शोक को सघन करता जा रहा था और श्मशान की राह जेठी माँ का रथ अबाध बढ़ चला। परिवार के चौकन्ने सदस्य रोना-धोना भूलकर यही कोशिश कर रहे थे कि जैसे-तैसे अग्नि-पात्र निश्चिन्तजी के हाथ से ले लिया जाए। पर निश्चिन्तजी अपने अधिकार को एक पल के लिए भी छोड़ने को तैयार नहीं थे। वे कभी विलाप करते, कभी क्रन्दन करते, कभी हिचकी लेते, कभी सिसकी भरते आगे-आगे चलते जा रहे थे।

शवयात्रा ने आधा रास्ता भी पार नहीं किया था, कि निश्चिन्तजी की नित नियम वाली मंजिल सामने आ गई। वही कलाली। उन्होंने एक बार पीछे शव यात्रा के जुलूस की ओर देखा। एक धाड़ मारी। माँ-माँ का क्रन्दित, करुण, रुदन-घोष किया और पावक-पात्र सहित वे कलाली में जा घुसे। शवयात्रा में भगदड़ मच गई। जिस बात का डर था वही हुआ। सारा परिवार यहाँ-वहाँ भागा। समझदार-सयानों ने समझाया कि शव को यहीं विश्राम दे दो, कन्धे बदल लो, रुको मत, और देर मत लगाओ। दो-एक सयाने भीतर जाकर चुपचाप पावक -पात्र उठा लाओ और चल पड़ो। पर भीतर जाए कौन?

लोग शव को कन्धों पर उठाए खड़े हैं। राम-नाम का नाद सुनाई पड़ रहा है और भीतर निश्चिन्तजी जेठी माँ के शोकाकुल ठेकेदार से शराब माँग रहे हैं। माँ को मुखाग्नि जब लगनी लग जाएगी। पर आज वे जेठी का पहला श्राद्ध, एक घूँट के साथ यहीं करेंगे। वे थाली छोड़ नहीं रहे थे। कलाली के सामने शवयात्रा ठिठककर खड़ी हो गई थी। ठेकेदार पसोपेश में था और सारा परिवार लज्जा और ग्लानि से मरा जा रहा था।

जीवन में जो कदम कभी इस देहरी पर नहीं पड़े थे, वे उधर मुड़े। पत्नी- शोक में अन्तिम साँसें लेते हुए 90 बरस के पुरुषोत्तमलालजी ने कलाली में प्रवेश किया। थाली उठाई और बाहर आ गए। निश्चिन्तजी ने अपने नियम के दो कुल्हड़ ढाले। बाहर आए, देखा कि शवयात्रा आगे बढ़ चुकी थी। शोकाकुल, सबसे निश्चिन्त होकर निश्चिन्तजी सबसे पीछे सिर झुकाए चले जा रहे थे। बिल्कुल बिना लड़खड़ाए।

----


‘मनुहार भाभी’ की दूसरी कहानी ‘प्रदर्शन’ यहाँ पढ़िए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे

मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032





रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।


 


  

 


सिपाहियों का गीत


 



श्री बालकवि बैरागी के गीत संग्रह
‘ललकार’ का बीसवाँ/अन्तिम गीत




दादा का यह गीत संग्रह ‘ललकार’, ‘सुबोध पाकेट बुक्स’ से पाकेट-बुक स्वरूप में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह की पूरी प्रति उपलब्ध नहीं हो पाई। इसीलिए इसके प्रकाशन का वर्ष मालूम नहीं हो पाया। इस संग्रह में कुल 28 गीत संग्रहित हैं। इनमें से ‘अमर जवाहर’ शीर्षक गीत के पन्ने उपलब्ध नहीं हैं। शेष 27 में से 18 गीत, दादा के अन्य संग्रह ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ में संग्रहित हैं। चूँकि, ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है इसलिए दोहराव से बचने के लिए ये 18 गीत यहाँ देने के स्थान पर इनकी लिंक उपलब्ध कराई जा रही है। वांछित गीत की लिंक पर क्लिक कर, वांछित गीत पढ़ा जा सकता है।  
  

सिपाहियों का गीत
   
रण जुझारे जा रहे हैं
आज हम सब लाम पर हैं
बाँकुरे संग्राम पर हैं.....

खेत मेरे! लहलहाना धान से भरपूर तुम
वक्त की आई चुनौती लो करो मंजूर तुम
देश भूखा रह न जाये
हम जरूरी काम पर हैं
आज हम सब लाम पर हैं
.....

ऐ मशीनों! धड़धड़ाना, खूब चलना शान से
एक पल रुकना नहीं, डिगना नहीं ईमान से
देश बेबस हो नहीं
हम मौत के मुक्काम पर हैं
आज हम सब लाम पर हैं.....

ऐ बुजुर्गों! पीठ ठोको, आज मचली है जवानी 
फिर नई लिखने चले हैं, हम शहीदों की कहानी
देश के आँसू न निकलें
खून सब नीलाम पर हैं
आज हम सब लाम पर हैं.....

बालकों! लो गीत गाओ, दो बिदा हम चल दिये
क्या पता आएँ न आएँ, अलविदा! हम चल दिये
देश का सर झुक न जाये 
सब तुम्हारे नाम पर है
आज हम सब लाम पर हैं.....
-----
       

 
 
इस संग्रह के, अन्यत्र प्रकाशित गीतों की लिंक - 

-----



गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
ने उपलब्ध कराया।

 

 

फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

कितने मोहक, कितने मादक
प्राण पुरुष! उत्पात तुम्हारे
फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

पल में पीली, पल में नीली
जीवन शाख बड़ी लचकीली
क्या-क्या रंग दिखा देते हैं
सतरंगे आघात तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हारे

बीज उगा, आँसू अँकुराया
जड़ को तुमने जीव बनाया
माटी का वृन्दावन रचकर
क्या आया है हाथ तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हा
रे

सक्षम हो सब कर सकते हो
गहरे और उतर सकते हो
मुझ घायल के सिवा वहाँ तक
कौन चलेगा साथ तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हारे
-----
 


‘ओ अमलतास’ की छठवीं कविता ‘क्यों तुमने यह बिरवा सींचा’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की आठवीं कविता ‘सेनापति के नाम’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
-----























 


लगे, फिर श्रम की थाप लगे


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की तीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



लगे, फिर श्रम की थाप लगे

फलें सृजन के स्वर फसलों में
युग यौवन उमगे
लगे, फिर श्रम की थाप लगे।
   
प्यास बुझे प्यासी धरती की
कोख फले बन्ध्या परती की
माटी का मन सुबरन करने
हल का सारा आलस हरने
        नई चेतना लेकर युग का
        गोरखनाथ जगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।

सिसको मत भूखे खलिहानों
पीढ़ी का पौरुष पहिचानो
मानिक मोती फिर बरसेंगे
सौ-सौ स्वर्ग तुम्हें तरसेंगे
        सजग सहोदर हैं मेहनत के
        लोहित-लाल सगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।

आओ हम कुछ ऐसा कर दें
नये स्वेद का सागर भर दें
लाज रखें नव-तरुणाई की
कालिख धो दें अरुणाई की
        नवल-भैरवी के राते-रंग
        युग के गीत रँगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।
                        -----
 



संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
-----



यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


पर जो होता है सिद्ध-संकल्प




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की चौंतीसवीं कविता


 

पर जो होता है सिद्ध-संकल्प

आसान नहीं था
किले गढ़ना

तब भी लोगों ने गढ़े।
आसान नहीं था
उनपर चढ़ना

तब भी ललकारकर
लोग उनपर चढ़े।

किले होते ही हैं
फतह के लिए

वैसे ही रात भी
होती ही है सुबह के लिए।

पर सुबह की प्रतीक्षा को ही
बना ले कोई
अपना लक्ष्य
तो उसे निगल जाता है
उसका अपना ही
शयनकक्ष।
वो या तो पड़े-पड़े
करवटें बदलता है
या सवेरे के इन्तजार में
आँखें मसलता है।

पर जो होता है सिद्ध-संकल्प
वो ठानता है
अँधेरे से लड़ाई
कर बैठता है
उसके साम्राज्य पर
चक्रवर्ती चढ़ाई।

जलाता है दीया
सुलगाता है मोमबत्ती
और पाट लेता है
रात और प्रभात के
बीच की अन्धी खाई।

आज जब चप्पे-चप्पे पर
अँधेरे ने अपने
किले गढ़ लिये हैं
तब लाख टके का
एक ही सवाल है कि
हममें कितने सूरमा
ऐसे हैं
जो उनपर चढ़ लिये हैं?
-----





संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















स्याही का विश्वास





श्री बालकवि बैरागी के गीत संग्रह
‘ललकार’ का अठारहवाँ गीत





दादा का यह गीत संग्रह ‘ललकार’, ‘सुबोध पाकेट बुक्स’ से पाकेट-बुक स्वरूप में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह की पूरी प्रति उपलब्ध नहीं हो पाई। इसीलिए इसके प्रकाशन का वर्ष मालूम नहीं हो पाया। इस संग्रह में कुल 28 गीत संग्रहित हैं। इनमें से ‘अमर जवाहर’ शीर्षक गीत के पन्ने उपलब्ध नहीं हैं। शेष 27 में से 18 गीत, दादा के अन्य संग्रह ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ में संग्रहित हैं। चूँकि, ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है इसलिए दोहराव से बचने के लिए ये 18 गीत यहाँ देने के स्थान पर इनकी लिंक उपलब्ध कराई जा रही है। वांछित गीत की लिंक पर क्लिक कर, वांछित गीत पढ़ा जा सकता है।       

स्याही का विश्वास
   
जब तक मेरे हाथों में है, नील कण्ठनी लेखनी
दर्द तुम्हारा पीने से, इन्कार करूँ तो कहना

मुझे कलम क्या दी दाता ने, आग थमा दी हाथों में
अपने सपने आप जला कर, बैठा रहूँ अनाथों में
यूँ तो मेरे सपने जग में, मृत्युंजय कहलाते हैं
यूँ तो अम्बर के पनिहारे, मुझको भी ललचाते हैं
(पर) जब तक ये बारूद बिछा है, केश खुले हैं वसुधा के
अगर कहीं मैं अम्बर का, सिंगार करूँ तो कहना
जब तक मेरे हाथों में है.....

स्याही की दो बूँद मिलीं क्या, खुद से हुआ पराया हूँ
अमृृत बाँट रहा हूँ अविरल, विषघट घर ले आया हूँ
ये मेरा उपकार नहीं है, तिल भर भी एहसान नहीं 
इसके बिना अधूरा हूँ मैं, लगते मुझ में प्राण नहीं
(पर), भूले से भी टूट गई, यदि ये निर्जल एकादशी
अगर कहीं मैं जीने का कुविचार करूँ तो कहना
जब तक मेरे हाथों में है.....

ये पगडण्डी, ये चौराहे, ये गलियाँ, ये राजमहल
ये मधुुवन, ये झर-झर झरने, ये कजरारे ताजमहल
कई अजानी उर्वशियों का, रोज सन्देसा लाते हैं
या तो गुप-चुप कहते हैं या, सिरहाने रख जाते हैं
(पर) जब तक आँख तुम्हारी है कुछ, अकुलाई आँसू भरी
अगर कहीं मैं काजल से अभिसार करूँ तो कहना
जब तक मेरे हाथों में है.....

वे जो दो आँसू दिखते हैं, लगते जग से न्यारे हैं
अजर-अमर हैं, अपराजित हैं, प्राणों से भी प्यारे हैं
जैसे बहती वेद ऋचाएँ, ठिठकी गौएँ श्याम की
जिनके मुँह पर मुहर लगी है, केवल मेरे नाम की
(पर) जब तक लछमन रेख बनी है, और मिलन मजबूर है
अगर कहीं मैं प्रियतम की, मनुहार करूँ तो कहना
जब तक मेरे हाथों में है.....

लाओ अपना दर्द पिलाओ, समझो मेरी प्यास को
गया हुआ मत कभी समझना, स्याही के विश्वास को
आँसू का अनमोल खजाना, दे दो मेरी झोली में
मस्त रहो अपनी मेंहदी में, पनघट औ’ राँगोली में
जब तक दर्द तुम्हारा मेरी नस-नस में मौजूद है
अगर कहीं मैं गीतों का, व्यापार करूँ तो कहना
जब तक मेरे हाथों में है.....
-----
       

 
 
इस संग्रह के, अन्यत्र प्रकाशित गीतों की लिंक - 

-----


गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
ने उपलब्ध कराया।

 

क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की छठवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।



  
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

क्यों यह अर्ध्य दिया अभिमन्त्रित
क्यों इतना अनुराग उलीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

गगन टेक कर किरन लुकाटी
ढूँढ रहा है सुरभित माटी
अम्बर को तुम अपने तप से
क्यों ले आये इतना नीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

प्राण-प्राण मनवन्तर जुड़ती
पागल गन्ध निरन्तर उड़ती
छन्द-छन्द को बना दिया है
तुमने कैसा गन्ध-गलीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

आज ऋणी है स्पन्दन-स्पन्दन
यह कैसा पानी का बन्धन
अँकवारी भर जल ने जल को
क्यों कर यूँ बाँहों में भींचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा
-----


‘ओ अमलतास’ की पाँचवीं कविता ‘आज तो करुणा करो’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता ‘फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
-----





















 


आखिर तुमने भी ठुकराया

 
 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की उनतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



आखिर तुमने भी ठुकराया

भला करे भगवान तुम्हारा
आँखों को फिर धनी बनाया
आखिर तुमने भी ठुकराया

दोष नहीं है तनिक तुम्हारा
मैं ही हूँ किस्मत का मारा
पत्थर को इन्सान समझकर
लो मैंने भी किसे पुकारा

इससे ज्यादह क्या करते तुम
ठोकर दी और धरम निभाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


तुम्हें बधाई खूब रुलाओ
मेरा हर सपना सुलगाओ
ये तो सब यूँ ही चलता है
तुम अपना त्यौहार मनाओ

नालायक हैं सपन मेरे
नाहक तुमको रोष दिलाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


बहुत कठिन है मन समझाना
बहते छालों को सहलाना
इससे ज्यादह और कठिन है
इन नयनों की याद भुलाना

मेरा यह गौरव क्या कम है
कुछ तो काम तुम्हारे आया
आखिर तुमने भी ठुकराया
-----
 




संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
-----



यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


नसैनी




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की तैंतीसवीं कविता


 

नसैनी

बनाया उन्होंने मुझे
अपनी नसैनी
महज एक माध्यम
वही--ऊँचाइयाँ पानेवाली
सीढ़ी,
और तार लीं
अपनी दो-चार पीढ़ी।

सधते ही अपना स्वार्थ
मारकर मुझे लात
गिरा दिया जमीन पर
और मुझसे पाई हुई
ऊँचाइयों पर, ठाट से
अट्टहास करते हुए
चलाने लगे अपना राजपाट।
बोने लगे बबूल
उगाने लगे नागफनियाँ
लेने लगे प्रतिशोध
बना बैठे सन्देहों के संसार में
अपना लाक्षागृह,
अविश्वास और आत्मघात की
ईंटों से भुतहा राजमहल।

पर,
न वहाँ प्राणवायु
न वहाँ कोई बस्ती
न धूल-धरती का कोई स्पर्श
न तीज-त्यौहारों भरा
कोई पर्व-वर्ष
सन्देहों और अविश्वासों के
धधकते अलावों में
न कोई अपना
न कोई शुभ सपना।
समय के थपेड़ों ने
फेंका जब नीचे
तो फिर गिरे मुझपर ही।

लोग हँसे
सयानों ने ताने कसे
‘नसैनी खड़ी थी तो सीढ़ी थी
लात खाकर गिरी तो
आज काम दे रही है अरथी का,
खड़ी हो या पड़ी
काम यही आ रही है।’
और बोलते हुए
“राम-नाम सत्’
उठा लिया कन्धों पर
चल पड़े सीधे श्मशान की ओर।

वे चढ़े तब भी
मुझ पर वजन थे
गिरे, तब भी
मैं ही उन्हें ढो रहा हूँ।
लोग मुझपर हँस रहे हैं
और मैं?
अपनी, माध्यम होने की
मूर्खता पर रो रहा हूँ।
-----





संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली



















फूलों के बदले



 



श्री बालकवि बैरागी के गीत संग्रह
‘ललकार’ का सत्रहवाँ गीत







दादा का यह गीत संग्रह ‘ललकार’, ‘सुबोध पाकेट बुक्स’ से पाकेट-बुक स्वरूप में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह की पूरी प्रति उपलब्ध नहीं हो पाई। इसीलिए इसके प्रकाशन का वर्ष मालूम नहीं हो पाया। इस संग्रह में कुल 28 गीत संग्रहित हैं। इनमें से ‘अमर जवाहर’ शीर्षक गीत के पन्ने उपलब्ध नहीं हैं। शेष 27 में से 18 गीत, दादा के अन्य संग्रह ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ में संग्रहित हैं। चूँकि, ‘जूझ रहा है हिन्दुस्तान’ इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है इसलिए दोहराव से बचने के लिए ये 18 गीत यहाँ देने के स्थान पर इनकी लिंक उपलब्ध कराई जा रही है। वांछित गीत की लिंक पर क्लिक कर, वांछित गीत पढ़ा जा सकता है।    

फूलों के बदले
  
राजघाट की पावन माटी, सौ-सौ बार शपथ तेरी
फूलों के बदले अब तुझ पर, अरि के मुण्ड चढ़ायेंगे

युग की नींद हराम करी है, कुछ लोहू के प्यासों ने
राजघाट को ललकारा है, ऐटम के रनिवासों ने
(तो) प्रतिशोधी यौवन मचला है, अपना फर्ज निभाने को
लोहू आज बहुत व्याकुल है, सारा कर्ज चुकाने को
युग के तीरथ! बहुत सहा है, तेरी अजय अहिंसा ने
इसीलिए कुछ दिन हिंसा से, युग का रथ खिंचवायेंगे
फूलों के बदले अब तुझ पर.....

तुझ को शीश झुका कर युग को, धोखा दिया पड़ौसी ने
कायरता के कलश उठाये, अब तक की खामोशी ने
लेकिन अब ज्वालामुखियों ने, सभी अबोले तोड़े हैं
और कहारों को गंगा ने, फिर उत्तर में मोड़े हैं
युग के कुंकुम! क्षमा दान दे, इन पागल अंगारों को
अब तक आग बुझाई लेकिन, अब धरती धधकायेंगे
फूलों के बदले अब तुझ पर.....

तिल-तिल तृण-तृण धरती के हित, कोटि-कोटि कट जायेंगे
अरि लोथों से हिम-प्रस्थों के, रीते पथ पट जायेंगे
महास्नान होगा चण्डी का, रक्तोदधि लहरायेगा
जो भी सीमा पार करेगा, कट कर ठोकर खायेगा
युग के केवट! पतवारें रख, हमने थामी तलवारें
पता नहीं इस रक्त-सिंधु के ज्वार कहाँ तक जायेंगे
फूलों के बदले अब तुक पर.....

सिर पर कफन लपेट लिये हैं, फिर तेरी सन्तानों ने
महानाश के आमन्त्रण को, स्वीकारा निर्माणों ने
श्रम-बाला के साथ आज हम, रण-बाला भी वरते हैं
परिणामों की चिन्ता तेरे, पूत भला कब करते हैं
युग के त्राता! राह देखना, उद्भट जब भी लौटेंगे
अरि मस्तक होंगे हाथों में, खाली हाथ न आयेंगे
फूलों के बदले अब तुझ पर.....

तेरी कसम कभी भी हमने, नहीं अवज्ञा की तेरी
लेकिन तुझसे बिन पूछे ही, पड़ी बजानी रणभेरी
आज प्रश्न है तेरी वाणी, मुखर रहे या मूक रहे
शान्ति-कपोत उड़े नभ में या, महानाश की भूख रहे
युग की करुणा! वरद हस्त रख, रणोन्मत्त इन शीशों पर
तुझे झुकाये हैं जो मस्तक, केवल तुझे झुकायेंगे
फूलों के बदले अब तुझ पर.....
-----

      

 
 
इस संग्रह के, अन्यत्र प्रकाशित गीतों की लिंक - 

-----


गीतों का यह संग्रह
दादा श्री बालकवि बैरागी के छोटे बहू-बेटे
नीरजा बैरागी और गोर्की बैरागी
ने उपलब्ध कराया। 

आज तो करुणा करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की पाँचवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।





आज तो करुणा करो

हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो प्रभंजन
आज तो करुणा करो

000

वन्दना की वेदना से मैं अपरिचित
पर निरत हूँ वन्दना में रात दिन
तुम सुपरिचित मैं अपरिचित
आ गई कजरी निशा कितनी भयावह प्रातः बिन
हर निशा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो किरण कण
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया

 000

व्यग्र, व्याकुल, विरह विगलित
छटपटाते प्राण का मैं क्या करूँ
डूबती तम तोम में
पल-पल सिसकती वर्तिका को
छोड़ कर मन्दिर तुम्हारा
और किसके पग धरूँ
हर शिखा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो कवच-मन
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया

000

झिलमिलाती कामनाएँ चेतना को
चूमकर चुपचाप हैं
अश्रु स्नाता एक चितवत कर रही संकेत मुझको
यह तम्हारी, हाँ तुम्हारी
पावनी पदचाप है
हर तृषा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तृम ही हो सजल घन
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया
-----





संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
-----









 











घन बालाएँ केश बिखेरे

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की अट्ठाईसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



घन बालाएँ केश बिखेरे

रत्नाकर की राज-सुताएँ
करती हैं उत्पात घनेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

पाकर के ऊषा की आहट
इधर-उधर से आकर नटखट
उलट लाज के सारे घूँघट
लिपट-लिपट जाती सूरज से
निर्वसना ही साँझ-सवेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

भरी दुपहरिया लरज-लरज कर
झूम-झूम कर गरज-गरज कर
लोक-लाज को बरज-बरज कर
मनु-श्रद्धा के कर्मांचल में
कर जाती हैं सौ-सौ फेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

मत पूछो संध्या की बतियाँ
पुरवा को दे-देकर पतियाँ
निठुर ठगारी ये सूरतियाँ
ना जाने किस प्रियतम के हित
चुनती हैं नित लाल कनेरें
घन बालाएँ केश बिखेरे

और रात को देकर ताले
बजा-बजा नूपुर मतवाले
छलका-छलका रस के प्याले
बेसुध कर देतीं चन्दा को
कस-कस कर बाँहों के घेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे 
-----
 




संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
-----



यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


रामबाण की पीड़ा




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘आलोक का अट्टहास’ की बत्तीसवीं कविता 




रामबाण की पीड़ा

राम मेरे!
हो गया वनवास पूरा
लौट आए तुम अयोध्या में
विजेता बन
मन गईं दीवालियाँ सारे अवध में
हो गया हर शत्रु का सन्धान-वध।
शेष अब कुछ भी नहीं है
जो तुम्हारे शौर्य या सन्धान का
कारण बने।
अब
राज्य को दोगे नया ही नाम
जिसको लोग कहकर गर्व से
उन्मत्त होंगे, राज्य है यह राम का,
यानी कि संज्ञा से विशेषण
या विशेषण से कसौटी
जो कहाए-‘रामजी का राज्य’।
और फिर होगा वही सब
जो सुनिश्चित है,
वनवास माता जानकी को फिर,
पुनः सामना अपने स्वयं के अंश से।
और सीता का, सुयश के बाद
अपनी माँ- धरा की गोद पाना
फिर तुम्हारा शेष जीवन
ग्लानि से भरकर बिताना।
छटपटाना, तिलमिलाना
किन्तु मर्यादा निभाना।
और फिर चुपचाप-एकाएक
पुण्य-सलिला मातु सरयू के किनारे
जा खड़े होना
जल-समाधि के लिए।
लोग जय-जयकार में
धन्य हो प्रभु! धन्य हो!
तुमको कहेंगे
चल पड़ोगे तुम अगम जलराशि में।
शस्त्र अपने सब रखोगे वहीं तट पर
और ‘मै’, हाँ! हाँ! तुम्हारा ‘रामशर’
तट पर पड़ा रह जाऊँगा
तूणीर में।
कोसता, रोता रहूँगा दैव!
इस दुर्भाग्य पर,
मैं तुम्हारी पीठ पर तूणीर में
निष्प्राण ही करता प्रतीक्षा
रात-दिन सिसका किया
कि आज तुम सन्धान में
मुझको वरोगे, जन्म मेरा भी सफल
सार्थक करोगे।
किन्तु मेरे राम!
मैं लदा बैठा रहा
मेघवर्णी पीठ पर तूणीर में
मात्र बोझा ही रहा रघुवंश पर
समय पर तुमने
मुझे साधा नहीं।

हाय!
यह अपयश भरा जीवन निरर्थक
मैं कहो कैसे जीऊँगा?
काम कुछ आया नहीं
राम का शर बन गया पर
शौर्य का संस्पर्श तक पाया नहीं ।

तूणीर से तनते धनुष तक
नासिका से कर्ण तक की यात्रा देते मुझे
बेधता मैं लक्ष्य को
मित्र करते ईर्ष्या
और अपने अग्निवंशी हास्य से
मैं करता निरुत्तर।

किन्तु मेरे राम!
मैं निरर्थक ही रहा बोझा बना
तूणीर तरकश में पड़ा
एक बन्धक की तरह श्यामल,
तुम्हारी पीठ पर
क्या करूँ इस आग का?
लाभ क्या रण-राग का?
और सचमुच एक दिन
राह का काँट समझकर फेंक देंगे
अवधवासी।

मुझ अभागे की करुणा गाथा
पूज्य! मेरा कष्ट जानेंगे नहीं
राम का मैं बाण था
लोग मानेंगे नहीं।
कर सको तो
मात्र यह उपकार कर दो
साधकर चाहे मुझे आकाश में
छोड़ दो बिलकुल अकेला,
पात्र हूँ मैं भी तनिक सम्मान का,
काम आया कुछ तुम्हारे
यह मेरा सन्तोष होगा
दो मुझे सादर विदा
क्षण मुझे मत दो
हलाहल पान का
पात्र हूँ में भी
तनिक सम्मान का!
-----





संग्रह के ब्यौरे
आलोक का अट्टहास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - सत्साहित्य प्रकाशन,
          205-बी, चावड़ी बाजार, 
          दिल्ली-110006
सर्वाधिकार - सुरक्षित
संस्करण - प्रथम 2003
मूल्य - एक सौ पच्चीस रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली