आखिर तुमने भी ठुकराया

 
 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की उनतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



आखिर तुमने भी ठुकराया

भला करे भगवान तुम्हारा
आँखों को फिर धनी बनाया
आखिर तुमने भी ठुकराया

दोष नहीं है तनिक तुम्हारा
मैं ही हूँ किस्मत का मारा
पत्थर को इन्सान समझकर
लो मैंने भी किसे पुकारा

इससे ज्यादह क्या करते तुम
ठोकर दी और धरम निभाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


तुम्हें बधाई खूब रुलाओ
मेरा हर सपना सुलगाओ
ये तो सब यूँ ही चलता है
तुम अपना त्यौहार मनाओ

नालायक हैं सपन मेरे
नाहक तुमको रोष दिलाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


बहुत कठिन है मन समझाना
बहते छालों को सहलाना
इससे ज्यादह और कठिन है
इन नयनों की याद भुलाना

मेरा यह गौरव क्या कम है
कुछ तो काम तुम्हारे आया
आखिर तुमने भी ठुकराया
-----
 




संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
-----



यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


No comments:

Post a Comment

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.